मंगलवार, 27 जून 2023

रवीश कुमार के बारे में / संजय सिन्हा

 

संजय सिन्हा-


आप किसी से अपने बारे में कुछ कहने को कह दीजिए तो उन्हें सांप सूंघ जाएगा। लेकिन दूसरों के बारे में वो कुछ भी कह सकते हैं। दूसरों के बारे में वो अपने से अधिक जानते हैं। कमाल है।

कल पटना में मेरी मुलाकात रवीश से हो गई। रवीश कुमार पत्रकार हैं और उनसे मेरा मिलना कोई महान खगोलीय घटना नहीं है। हम दोनों एक ही धंधे के हैं। एक ही शहर में रहते हैं। एक ही संस्थान से पढ़ कर निकले हैं। हमारा मिलना और नहीं मिलना क्या बड़ी बात है? रवीश की अपनी पहचान है। मेरी अपनी। रवीश की पहचान मेरी तुलना में कई गुना अधिक है। मैंने तो जो थोड़ी बहुत पहचान बनाई, वो टीवी से अधिक फेसबुक से बनी। लेकिन रवीश को लोग हार्डकोर जर्नलिस्ट के रूप में जानते हैं। मैं हमेशा पर्दे के पीछे रहा, सिवाय तेज़ चैलन के अपने कार्यकाल में कहानी वाले संजय सिन्हा के रुप में जाने जाने के।

मैं हमेशा संपादकीय विभाग में रहा। जो लोग पत्रकारिता के भीतरी व्याकरण को नहीं समझते उनके लिए बता रहा हूं कि मैं अखबार में डेस्क पर रहा। टीवी में प्रोडक्शन में रहा। मुझे खुद सामने आने का कभी शौक नहीं रहा। मैं लोगों की रिपोर्ट ठीक करने में लगा रहा।

अगर असमय मेरे छोटे भाई का निधन न हो जाता और मैं खुद को व्यस्त करने के लिए फेसबुक पर लिखने न आता तो मैं रोज़ एक कहानी भी नहीं लिखता। मैंने दस साल पहले फेसबुक पर रोज़ एक कहानी लिखने का सिलसिला शुरू किया और मेरी कंपनी के प्रबंधकों को जब पता चला कि मैं रोज़ एक कहानी फेसबुक पर लिखता हूं तो उसे मेरे ही चैनल पर रोज़ सुनाने की मुझे अनुमति मिल गई। मेरी थोड़ी पहचान उसी माध्यम से बनी ‘रिश्ते- संजय सिन्हा की कहानी’। लेकिन रवीश अपनी जन रिपोर्ट के कारण जाने गए।

पत्रकारिता की दुनिया में मेरा कोई आदर्श नहीं। पर मुझे कभी-कभी लगता है कि अगर पत्रकारिता में मैं किसी को अपना आदर्श मान सकता हूं तो वो रवीश ही होंगे। रवीश के अलावा मुझे भड़ास वाले यशवंत सिंह की पत्रकारिता भी कमाल की लगती है। मेरे चाहने वाले हैरान हो सकते हैं कि संजय सिन्हा खुद को प्रभाष जोशी, बनवारी, राजेंद्र माथुर बनते नहीं देखना चाहते हैं और पता नहीं कहां से दो नाम ढूंढ कर ले आए – रवीश और यशवंत।

ये निजी पंसद का मसला है। मैंने अपने जीवन में इन दोनों को फक्कड़ पत्रकारिता करते देखा है। दोनों में तुलना नहीं, लेकिन दोनों मुझे भाते हैं।

इंदौर एयरपोर्ट पर एक बार मुझे यशवंत सिंह मिल गए तो मैंने उनके साथ तस्वीर खिंचवाई थी। कल पटना में मुझे होटल मौर्या में रवीश मिल गए तो मैंने उनके साथ तस्वीर खिंचवाई।

लेकिन कमाल हो गया। रवीश के साथ मेरी तस्वीर देख कर मेरे अपने परिजनों ने इतनी तीखी प्रतिक्रिया जताई है कि मैं हैरान रह गया हूं।

इससे पहले एक बार मैंने राजदीप सरदेसाई के साथ अपनी तस्वीर फेसबुक पर डाली थी तो लोग मेरे पीछे पड़ गए थे। राजदीप हमारे साथ काम करते थे। उनके साथ रोज मेरी तस्वीर हो सकती थी। लेकिन लोगों ने मुझे ट्रोल किया था। क्यों? राजदीप ने ऐसा क्या किया है? आप उन्हें कितना जानते हैं?

यशवंत को भी आप बहुत नहीं जानते। उन्हें मीडिया के लोग अधिक जानते हैं। उनके साथ तसवीर खिंचवाने पर मीडिया के लोगों ने मुझे टोका था कि आप यशवंत के साथ? क्यों? क्या परेशानी है जो संजय सिन्हा किसी के साथ तस्वीर खिंचवाएं?

खैर, मेरी सारी तस्वीरें मेरी पिछली पोस्ट में होंगी। आप ढूंढ कर लोगों के कमेंट पढ़ लीजिएगा। लेकिन कल तो हद ही हो गई।

मैंने रवीश के साथ अपनी तस्वीर साझा की तो मेरे कई परिजन मुझे छोड़ देने की धमकी देने लगे। एक भाई (कोई प्रमोद मिश्रा हैं) ने तो कहा कि संजय सिन्हा जी, आज से आपकी वॉल पर आना बंद। आज से आपको पढ़ना बंद। एक भाई ने कहा कि संजय सिन्हा जी आप देशद्रोही के साथ? एक ने रवीश को पनौती कहा। कुछ लोगों ने मजे लिए और पूछा कि क्यों आपने उनसे उनकी जाति नहीं पूछी – कौन जात हो भाई?

और तो और कुछ लोगों ने बताया कि वो ब्राह्मण नहीं, भूमिहार ब्राह्मण हैं। लोगों ने बहुत कुछ कहा रवीश के साथ मेरी उस तस्वीर पर। कुछ ने खुल कर निंदा की तो कुछ लोगों ने सराहा भी। लेकिन सच्चाई यही है कि रवीश से नाराज़ लोगों ने कल मुझे घेरने की बहुत कोशिश की।

मेरे एक साथी उनके पूरे खानदान की कुंडली मेरे सामने लेकर चले आए। उनके पिता, उनके भाई सभी की कहानी। एक भाई ने दावा किया कि रवीश ने बहुत पैसे बनाए हैं। ओ उनके पास मर्सडीज कार है। मैंने बताने वाले से पूछा कि क्या आपने उनकी कार देखी है?

वो चुप हो गए।

मैंने अपने परिचित से कहा कि मैंने दो बार मर्सडीज कार खरीदी है। दो बार बेच चुका हूं। दो बार बीएमडब्लू कार भी खरीद कर बेच चुका हूं तो क्या आप मुझे भी चोर समझते हैं? वो चुप हो गए।

असल में जब आप किसी के बारे में जाने बिना राय बनाते हैं तो आपको चुप हो जाना पड़ता है।

मैं दावे से कह सकता हूं कि मुझे मेरी वॉल पर घेरने वाले रवीश कुमार को नहीं जानते हैं। मैं रवीश को जानता हूं। इसलिए कि वो मेरे बाद के बैच में आईआईएमसी (भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली) के छात्र रहे हैं। उस संस्थान में दाखिला मिलना ही पत्रकारिता के छात्र के लिए सम्मान की बात है। रवीश मेरी जानकारी में इकलौते ऐसे छात्र हैं जिन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई छोड़ दी थी। छोड़ना आसान नहीं होता है। वही छोड़ सकता है, जिसे खुद पर भरोसा हो, जो डिग्री से ऊपर की सोच रखता हो।

संजय सिन्हा ने तो जनसत्ता में नौकरी मिलने के बाद आईआईएमसी की पढ़ाई शुरू की थी, जिसकी उन्हें कतई ज़रूरत नहीं थी, फिर भी डिग्री पाने का मोह मैं नहीं छोड़ पाया था। उनकी तरह ही यशवंत सिंह (भड़ास वाले) ने हम दोनों से पहले नौकरी छोड़ने का दम दिखलाया था।

रवीश चाहते तो उन्हें आराम से नौकरी मिल सकती थी और लाखों की मिल सकती थी। पर उन्होंने नौकरी से जब इस्तीफा दिया तो उस कहानी को सार्वजनिक किया था। क्यों छोड़नी पड़ी उन्हें नौकरी।

संजय सिन्हा आज तक ये दम नहीं दिखला पाए हैं। नौकरी मैंने भी छोड़ी। पर किसी से कह नहीं पाया कि क्यों? आसान नहीं होता है सारा सच उड़ेल देना।

मैं जानता हूं कि रवीश आज कहीं ज्वाइन करना चाहें तो लोग उन्हें हाथोंहाथ ले लेंगे। उनकी लोकप्रियता किसी कार्यक्रम को हिट कर देने के लिए काफी है। नौकरी की कमी मेरे पास भी नहीं थी, नहीं है। मेरे नौकरी छोड़ने के बाद कई ऑफर आए। लेकिन मेरा मन नहीं किया कहीं बंधने का।

आसान नहीं होता है लाखों की सैलरी का हर महीने का मोह छोड़ना। पर मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि जो उसे छोड़ने का दम दिखलाते हैं, उनकी आप सराहना मत कीजिए, पर झूठी कहानियां भी मन में मत पालिए। आप में अधिकतर लोग न रवीश को जानते हैं, न संजय सिन्हा को। आपके मन में जो भी राय है, वो सिर्फ आपकी सुनी सुनाई राय है।

आसान नहीं होता है इतने साल तक काजल की कोठरी में काम करते हुए बिना कालिख के बाहर निकल आना। आसान नहीं होता है लाइट, कैमरा और ऐक्शन की दुनिया को यूं मिनटों में छोड़ देना। आसान नहीं होता है अपने मीडिया के परिचय पत्र की उस हनक से बाहर हो जाना, जिसे दिखला कर आप देश के किसी विभाग में कहीं भी आसानी से प्रवेश पा लेते रहे हैं।

आप कुछ भी कह देते हैं। दलाल, चोर, भांड। जो मुंह में आता है लिख देते हैं। आप नहीं सोचते कि मीडिया को जिंदा रवीश जैसे पत्रकारों ने रखा है। उन लोगों ने नहीं, जो मुंह पर पाउडर लगा कर कैमरे के आगे चीख रहे हैं। हर विधा का एक काल होता है। मुझे नौकरी छोड़ने का अधिक अफसोस इसलिए नहीं हुआ क्योंकि मैं बचपन से नौकरी के बंधन में बंधना ही नहीं चाहता था। मैं बहुत देर तक किसी की धौंस सह ही नहीं सकता हूं। मेरा स्वभाव मुझे किसी सरकारी या वैसी प्राइवेट नौकरी से जुड़ने से रोकता रहा और इसीलिए मैं मीडिया में आया था कि वहां किसी की नहीं सहनी होगी।

जनसत्ता में नौकरी मिली, शुद्ध योग्यता की बदौलत। वहां नौकरी करते हुए साल भर में मैं ट्रे़ड यूनियन की हड़ताल में शामिल हो गया था। उसका नतीजा ये रहा कि मैं अपने प्रधान संपादक प्रभाष जोशी और जेनरल मैनेजर सुदर्शन कुमार कोहली की नज़र में आ गया और मेरा प्रमोशन दस साल नहीं हुआ। मुझ पर रत्ती भर फर्क नहीं पड़ा। जब प्रभाष जोशी हटे, राहुल देव संपादक बने तो जनसत्ता में मेरा पहला प्रमोशन हुआ था सब एडिटर से सीनियर सब एडिटर। पर मुझे न प्रमोशन नहीं होने का दुख था, न हो जाने की खुशी हुई थी। जो था, मेरा चुना रास्ता था।

उन दिनों मेरी दोस्ती ज़ी टीवी नेटवर्क के मैनेजिंग डाइरेक्टर विजय जिंदल जी से हो गई थी। उन्होंने मुझे प्रिंट से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आने के लिए प्रेरित किया। वही मुझे ज़ी न्यूज़ लेकर गए। वहां से मैं इसी विधा में आगे बढ़ता रहा, कछुआ चाल से। बीच में मेरी पत्नी का इंडिया से अमेरिका नौकरी में ट्रांसफर हो गया तो मैं अमेरिका चला गया, पत्नी भक्ति में ज़ी न्यूज़ की नौकरी छोड़ कर। मुझे बिना नौकरी के रहने का अभ्यास है। घर की साफ-सफाई करने, बर्तन धोने, खाना बनाने और कपड़े धोकर प्रेस करने का भी अभ्यास है। मेरे मन में इन बातों को लेकर कभी हीन भावना नहीं आती कि मैं नौकरी नहीं करता, घर के काम करता हूं। मेरी नज़र में नौकरी सिर्फ जीने का जरिया है। काम तो इतना ही है कि कुछ गलत न करूं। पैसे की सीमा नहीं होती। जितना हो अधिक है। जितना हो कम है।

बात रवीश की हो रही थी। रवीश से चाहे आप नफरत करें या प्यार पर सच्चाई यही है कि अभी वो सही मायने में पत्रकार हैं।

याद रखिएगा पत्रकार के तीन ही काम होते हैं और रवीश कुमार उन तीनों में अव्वल है। पत्रकार का काम होता है खबरें पहुंचाना। जन सरोकार के काम से जन को जोड़ना और सरकार की आखों मे आंख डाल कर प्रश्न पूछना। रवीश का इन तीनों कामों में किसी से मुकाबला नहीं। सही कहूं तो दूर-दूर तक उन जैसा कोई नहीं। मैं भी नहीं।

तो प्लीज़ आप रवीश को लाइक करें न करें फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन याद रखिएगा, जब आपका कोई साथ नहीं देता है तो आखिरी उम्मीद पत्रकार ही होते हैं। मेरी आपसे गुजारिश है कि आप कम से कम रवीश जैसे पत्रकारों का हौसला तोड़ने वाली बातें न कहें ( सच ये है कि आप उनके विषय में कुछ नहीं जानते)। आपकी राय किसी के लिए कुछ भी हो सकती है। पर ये मत भूलिए कि आपके पास अपने ही कहे को साबित करने का एक भी साधन उपलब्ध नहीं है।

फिर भी आप रवीश से नफरत करते हैं, उनके साथ मेरी तस्वीर पर मेरी खिंचाई करते हैं तो मैं कुछ अधिक नहीं कहूंगा। आप एक आजाद देश के आजाद नागरिक हैं। आपको हक है किसी के लिए कुछ भी कहने का। पर जैसे आप खुद को नहीं बदल सकते, संजय सिन्हा से आप क्यों उम्मीद करते हैं कि वो बदल जाएं? मेरा भी जो मन होगा, लिखूंगा। जिसके साथ मन होगा, तस्वीर खिंचवाऊंगा। पर इतने के लिए आप ये न कहें कि संजय सिन्हा अब आपको छोड़ कर चला जाऊंगा।

मत जाइए मुझे छोड़ कर। आप हैं तो मैं हूं। आपको तो पता ही है कि मैं भाव का भूखा हूं। आपसे जुड़ कर तो मैंने जीना सीखा, नहीं तो अपने छोटे भाई के निधन के बाद मेरी ज़िंदगी में क्या बचा था?

आप मुझे कोसिए। आप मेरी सराहना मत कीजिए। ये सब चलता रहेगा। पर प्लीज़ मुझे छोड़ कर जाने की बात न कीजिए। मेरा दिल टूट जाएगा। बाकी पत्रकार खबरों को जीते होंगे, संजय सिन्हा तो रिश्तों को जीते हैं। मुझे रवीश मिलते रहेंगे, मैं उनके संग तस्वीर खिंचवाता रहूंगा। वो मेरी व्यक्तिगत पसंद हैं। इतनी आज़ादी तो आप मुझे देंगे न?

आप जिसे पसंद करते हैं, जिनकी स्तुति में फेसबुक रंगते हैं तो क्या मैं आपको कभी टोकता हूं? रिश्ते निभाने की पहली और आखिरी शर्त यही होती है कि एक-दूसरे की निजता की कद्र करें। आपकी पसंद आपको मुबारक। मेरी पसंद मुझे मुबारक। संपूर्ण सत्य कुछ नहीं होता है। सम्पूर्ण सत्य सिर्फ मृत्यु है। बाकी जो है, उसे धारणा कहते हैं। धारणा भ्रम है। भ्रम में रिश्ते न छोड़ें। न जाओ भईया, छुड़ा कर बईंया, कसम आपकी मैं रो पड़ूंगा।

सोमवार, 5 जून 2023

रवि अरोड़ा की नजर से....

 


शो मैन की वापसी  /  रवि अरोड़ा 





हिन्दी फिल्मों का शो मैन राज कपूर को कहा जाता है मगर देश का दुर्भाग्य है कि आजादी के 75 साल बाद भी हम थियेटर यानी रंगमंच अथवा नाटक का शो मैन नहीं ढूंढ पाए । हालांकि रंगमंच के ऐसे पचासों बड़े नाम हैं जो इस उपाधि का दावा कर सकते हैं मगर पता नहीं क्यों मुझे वे सभी हमारे महामानव के समक्ष बहुत छोटे जान पड़ते हैं। अब आप पूछ सकते हैं कि भला महामानव जी का नाटक से क्या लेना देना ? तो जनाब आपको उनकी अपनी किताब 'एग्जाम वॉरियर' पढ़नी चाहिए। इसमें उन्होंने स्वयं लिखा है कि बचपन में उनका नाटक से बेहद लगाव था । हो सकता है कि आपको अभी भी विश्वास न हो और आप भी मेरी तरह इसे चाय बेचने, भीख मांगने और मगरमच्छ पकड़ने जैसा ही कुछ समझें । मगर उन पर लिखी गई किताब 'द मैन ऑफ द मोमेंट' में भी लेखक एम वी कामथ ने इसकी तस्दीक की है कि स्कूल के दिनों में महामानव जी ने 'पीलू फूल' नाम का एक नाटक न केवल लिखा था अपितु उसका निर्देशन और उसमें अभिनय भी किया था । चलिए इसे भी छोड़िए और संसद के उद्घाटन को ही देख लीजिए । किसी सुपर डुपर नाटक से कम था क्या पूरा शो ?


चूंकि नाटकों से मेरा भी पुराना नाता रहा है अतः मैं रंगमंच की थोड़ी बहुत बारीकियां समझता हूं। रत्ती भर ही सही मगर मैं यह भी जानता हूं कि किसी अच्छे नाटक में क्या क्या गुण होने चाहिए । मगर हाय रे ! मेरी किस्मत, एक दशक तक नाटक लिखने, निर्देशित करने और इक्का दुक्का में अभिनय करने के बावजूद मैं आज तक यह नहीं सीख पाया कि कैसे फिक्शन को रियल जैसा बनाया जाए और कैसे सच्चे इतिहास को घंटे घड़ियालों के नाद के बीच दफ्न कर दिया जाए ?  मगर अब मैं फक्र के साथ स्वीकार करता हूं कि सभी 64 कलाओं में निपुण हमारे महामानव जी के लिए तो यह भी जैसे कोई नैसर्गिक गुण ही है। 


संसद के उद्घाटन की किसी नाटक से तुलना के लिए आप मुझे क्षमा करें मगर जनाब नाटकों को आप भी कृपा हल्के में न लें। ईसा से सैंकड़ों साल पहले ही भरत मुनि ने जिस नाट्य शास्त्र की रचना की थी उसे ऋषि मुनियों ने पांचवें वेद की संज्ञा दी थी। बेशक हम मामूली लोग नाटकों को साधारण कला मानें मगर महामानव जी हमारे सरीखे बौने नहीं हैं अतः अपने एक एक कदम को नाटक ही बना कर दम लेते हैं। अब जब संसद का उद्घाटन हो तो भला वे भला इसमें क्यों चूकते ?  उन्हें भलीभांति मालूम है कि भव्य सेट रंगमंच की पहली बड़ी जरूरत है। बताइए कहीं कोई कमी दिखी ताज़ा तरीन सेट में आपको ? नाटक को लुभावना बनाने के कलाकार का मेकअप और कॉस्टयूम उम्दा होना चाहिए । इस कसौटी पर भी क्या महामानव जी दशकों से नंबर ही नहीं बने हुए हैं ?  डायलॉग डिलीवरी में तो कोई उनके सामने टिकता ही कहां है ? शब्दों के उतार चढ़ाव के हुनर से वे थकी सी स्क्रिप्ट को भी रोचक बनाने की सलाहियत रखते हैं। मंच पर लाइट इफेक्ट में कोई कमी न रह जाए इस लिए सौ पचास कैमरों की फ्लैश लाइट के बावजूद अपनी कार में अंदर की लाइटें तक जला लेते हैं और वीराने में भी फ़्लैश लाइटें देखते ही हाथ हिलाने लगते हैं। सफल नाटक में प्रॉपर्टी यानी तामझाम की बड़ी भूमिका होती है यह भला उनसे बेहतर कौन जानता होगा ? शायद इसी लिए ही तो इस नाटक में सेंगोल को झाड़ पोंछ कर उन्होंने धारण किया । नाटक में उनकी महारत ही तो कहेंगे कि दर्शकों और अपने बीच वे किसी अन्य अभिनेता को आने ही नहीं देते । भूले भटके कोई आ जाए तो फिर उसका क्या हश्र होता है, यह सबको पता है। रंगमंच का कोई ऐसा कोना वे नहीं छोड़ते जहां से दर्शक उन्हें देख न सकें। यही नहीं सफल अभिनेता की तरह वे अपने से अधिक नामी गिरामी व्यक्ति को भी कोई भूमिका नाटक में नहीं लेने देते और स्क्रिप्ट में परिवर्तन करा कर सारे डायलॉग अपने खाते में डलवा लेते हैं । सुपर स्टार सरीखा उनका एक ही फंडा है कि मुख्य भूमिका नहीं तो नाटक नहीं। बेशक हर नाटक में संगीत नहीं हो सकता मगर महामानव जी संगीत की बैक डोर एंट्री कराना भी खूब जानते हैं। हालांकि भक्ति संगीत गाने वाले उनके आगे पीछे चलते ही हैं मगर राज्याभिषिक का नाटक हो तो घंटे घड़ियाल वालों की भी मंच पर एंट्री कराना उन्हें आता है। बताइए क्या अब भी आप उन्हें नाटक का शो मैन स्वीकार नहीं करेंगे? चलिए मत करिए मगर मैं तो महामानव जी का कायल हो चुका हूं कि कैसे विवादों में फंसा नाटक भी उन्होंने जैसे तैसे हिट करवा दिया । वाकई बड़े शो मैन हैं हमारे महामनव जी ।


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 बीच में राम चंदर 


बचपन में हम उम्र मित्रों के साथ मस्ती करते हुए हम बच्चों ने एक दूसरे को चिढ़ाने के अजब गज़ब नुस्खे सीख रखे थे। यदि किसी बच्चे को सब के केंद्र में बैठने की जगह मिल जाए तो वह यह कह कर दूसरे बच्चों चिढ़ाता था- आस पास बंदर-बीच में राम चंदर । बैठने को यदि दूसरों से अधिक ऊंची जगह किसी बच्चे को मिल जाए तो वह बड़े फक्र से घोषणा कर देता था- राजा राजा ऊपर-फलाने फलाने नीचे । हमें तब पता ही कहां था कि खेलते कूदते जो तब कहा सुना जा रहा है, वही जीवन का सत्य है । सचमुच आस पास पड़े लोग बन्दर सरीखे ही तो हैं और जो केन्द्र में बैठा है, वही राम चंदर है। जिसे ऊंची जगह अथवा पद मिल जाए, वह राजा है और जो नीचे रह गए वे और कुछ नहीं बल्कि फलाने हैं ।  अब भाजपा सांसद और डब्ल्यूएफआई के निवर्तमान अध्यक्ष बृज भूषण शरण सिंह को ही देख लीजिए । वे ऊंच पर तो हैं ही, बीच में भी जमे हुए हैं सो आंदोलन रत महिला पहलवानों को जैसे चाहे चिढ़ा सकते हैं। बेचारे पहलवान आस पास तो क्या कोने में भी नहीं हैं इसलिए सिरे से फलाने ही साबित हो रहे हैं। वैसे बृज भूषण की किस्मत कितनी अच्छी रही जो वे 2014 में सपा छोड़ कर भाजपा में आ गए और राम चंदर हो गए । खुदा न खास्ता यदि आज भी सपा में होते तो शर्तिया आजम खां, मनीष सिसोदिया और सतेंद्र जैन जैसे सलाखों की बदौलत हड्डियों के ढांचे में तब्दील हो चुके होते । 


राजा और राम चंदर बनने के कितने फायदे हैं, यह जांचने को बृज भूषण शरण सिंह से बेहतर कोई दूसरा उदाहरण आपके पास हो तो बताइए। देश भर के लोग जब पहलवानों के साथ हों। सुप्रीम कोर्ट खुद उनकी एफआईआर कराने को सक्रिय हुआ हो। उनके लिए यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग भारत को अल्टीमेटम दे रहा हो और यही नहीं राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की एक बड़ी बिरादरी खुल कर पहलवानों के पक्ष में पंचायतें कर रही हो मगर फिर भी नेता जी से पूछताछ तक न हो ?


 आन्दोलनरत महिला पहलवान जो आरोप लगा रही हैं, वे इतने गंभीर हैं यदि इन नेता जी की जगह कोई विपक्षी नेता होता तो शर्तिया 24 घंटे भी न बीतते और उसका खेल ख़त्म कर दिया जाता । छापे, धरपकड़, बुलडोजर और न जाने क्या क्या करतब देखने को मिलते। सोचिए भला सीबीआई, आईटी और ईडी जैसे विभाग जब बिना बात अपने 100 में से 95 छापे विपक्षियों के यहां ही मारते हों, तब भला इन नेताजी का चिठ्ठा क्यों नहीं खोलते ? चिट्ठा भी वह जिसमें हत्या, हत्या का प्रयास और अपहरण जैसे दर्जनों मामले ही नहीं टाडा जैसा दाग भी हो तो उनका भला क्या हश्र होता ? और तो और दिल्ली पुलिस ने ही उनके इतने रिमांड लिए होते कि गिना ही न जाता । पिछले 9 सालों में पहले के मुकाबले चार गुना अधिक छापे मारने वाली सीबीआई और ईडी ने भाजपा शासन में 121 नेताओं पर छापे मारे और उनमें से भी 115 केवल विपक्षी ही थे तो भला इतना बड़ा शिकार कोई छुट्टा क्यों छोड़ता ? हां यदि छापे के बाद धुलाई पार्टी में आ जाते, तब शायद हिमंत बिस्वा की तरह मुख्य मंत्री ही बन जाते । वैसे पता नहीं आप किसी नतीजे पर पहुंचे हों अथवा नहीं मगर मेरी अकल में तो अच्छी तरह घुस गया है कि बीच में बैठो और शान से राजा और राम कहलवाओ। आस पास छिटके नहीं कि कोई भी बन्दर बना देगा ।

रवि अरोड़ा की नजर से.....


 नए पाखंड की तैयारी /  रवि अरोड़ा  


लीजिए अब एक और पाखंड से दो चार होने की तैयारी कर लीजिए। हरिद्वार के जिलाधिकारी ने एलान कर दिया है कि अब जूता चप्पल पहन कर आप हर की पैड़ी पर नहीं जा सकेंगे। पहले आप कोई जूता घर ढूंढिए और फिर घाट पर आइए।  ब्रह्म कुण्ड पर तो यह व्यवस्था पहले से ही लागू थी और धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप यह उचित भी था मगर अब गंगा में डुबकी लगाने के लिए भी घाट पर भी नंगे पांव जाएं, यह भक्तों के साथ मजाक सा लगता है। हो सकता है कि आपको यह भी धार्मिक भावनाओं के अनुरूप ही लगे मगर तब इसे आप पाखंड के अतिरिक्त और क्या कहेंगे जब आपको पता चले कि गंगा जिसे हम मां कह कर पूजने का नाटक सदियों से कर रहे हैं, वह हमारी वजह से ही आज दुनिया कि प्रमुख प्रदूषित नदियों में शुमार होती है। एक तरफ तो हम धार्मिक अनुष्ठान, औद्योगिक कचरे, कूड़ा करकट, इंसानी मल, सीवर, तमाम अपशिष्ट और शवों के निस्तारण का सबसे बड़ा केन्द्र इस नदी को बनाए हुए हैं और ऊपर से ढोंग यह कि उसके घाटों पर जाने से पहले झूठा सम्मान दिखाने को अपने जूते चप्पल पहले उतार देंगे। 


उक्त तर्क के विरोध में दावा किया जा सकता है कि मोदी सरकार गंगा की सफाई कर रही है और हालात बदलने की पूरी तैयारी है। मेरा अनुरोध है कि ऐसा दावा करने वाले लोग कृपया जमीनी हकीकत पहले अवश्य जान लें। बेशक साल 2014 के चुनाव से पूर्व मोदी जी ने वाराणसी जाकर एलान किया था कि उन्हें मां गंगा ने यहां बुलाया है। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने बीस हजार करोड़ रुपए की लागत से नमामि गंगे परियोजना की शुरुआत कर गंगा की सफाई का बीड़ा भी उठाया था । भाजपा की कद्दावर नेता उमा भारती को गंगा संबंधी मंत्रालय मिला तो उन्होंने भी घोषणा की थी कि साल 2018 तक गंगा निर्मल और अविरल नहीं हुई तो वे इसी नदी में जल समाधि ले लेंगी मगर न गंगा निर्मल हुई और न उमा भारती ने अपने संकल्प की फिर कभी चर्चा की। मोदी जी तो खैर अब गंगा का जिक्र ही नहीं करते । सरकारी फाइलें बताती हैं कि शुरुआती तीन सालों तक तो मंत्रालय की इस विषय पर कायदे से बैठक ही नहीं हुई । फिर लक्ष्य की तारीख आगे बढ़ा पहले 2019 और फिर साल 2020 कर दी गई । मगर वर्तमान गंगा संरक्षण मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने अब स्वीकार किया है कि सरकार अब तक 36513 करोड़ रूपये खर्च कर चुकी है और गंगा से जुड़े 428 प्रोजेक्ट में से मात्र 244 ही अब तक पूरे किए जा सके हैं। बकौल इनके बाकी काम पूरा करने में अभी तीन साल और लगेंगे। इतना खर्च करने के बाद गंगा कितनी साफ हुई है इससे संबंधी एक आरटीआई में खुद सरकार ने स्वीकार किया है कि उसे नहीं मालूम कि गंगा कितनी साफ हुई है। उधर, जल पुरुष राजेंद्र सिंह की मानें तो पैसे बांटने के अलावा जमीनी स्तर पर गंगा सफाई की दिशा में अभी तक कोई काम नहीं हुआ है। 


गंगा किनारे के लगभग सभी शहरों में मेरा आना जाना लगा रहता है। लगभग सभी जगह सीवर का गंदा पानी गंगा में आकर गिरते मैंने देखा है। अधजली लाशें गंगा में बहा दिए जाने की गवाही हर वह व्यक्ति भी दे सकता है, जो गंगा किनारे होने वाले किसी एक भी अन्तिम संस्कार में शरीक हो चुका हो । गंगा किनारे परमाणु बिजली घर, चमड़े और खाद के अनगिनत कारखानें देश की इस सबसे महत्वपूर्ण और पौराणिक नदी को दुनिया की संकटग्रस्त नदियों की सूची में अहम मुकाम दिलाए हुए हैं। स्वयं इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में अपने एक फैसले के दौरान कहा कि गंगा का पानी अब आचमन के योग्य भी नहीं रहा मगर हाय रे हमारा ढोंग! गंगा के तमाम अपमान के बावजूद हम फिर भी उसे अपनी मां कहेंगे और उसके निकट जाने से पहले जूते चप्पल उतारेंगे।

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