गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

सतसंग DB शाम RS 25/02

 राधास्वामी!! 25-02-2021- आज शाम सतसंग में पढे गये पाठ:- 

                                   


(1) सुरतिया हरष रही। निरखत गुरु चरन बिलास।।

 भँवरगुफा धुश सुन गई आगे। निज सूरज सँग मिला अभास।। -

(राधास्वामी मेहर दृष्टि से हेरें। प्रेम दुलार होय खाससुल्खास।।)

(प्रेमबानी-4-शब्द-12- पृ.स. )

                                                 

(2) सतगुरु मेरे पियारे। गुरु रुप धर के आये।

एक छिन में आप मुझको। चरनन लिया जगाय।।-

( करमों के अपने बस हो।

 देह ली मैं अब निरस हो।

चरनों की ओर ताकूँ।

 जल्दी लेओ बुलाये।।)

( प्रेमबिलास-शब्द-11-पृ.सं.)           

                                    

(3) यथार्थ प्रकाश

-भाग दूसरा-कल से आगे।।    

                                                    

  सतसंग के बाद- यू० पी० आर० एस० ऐ० की कव्वाली:-                                            

  (1) हर सू है आशकारा जाहिर जहूर तेरा।

 हर दिल में बस रहा है जलवावनूर तेरा।।

(प्रेमबिलास-शब्द-136-पृ.सं.200)  

                                                     

 (2) डा० जोशी बहन जी की कव्वाली:-                                                             

 बधाई हे बधाई बधाई है बधाई।

पावन घडी आई है । पावन घडी आई।।                                                    

  🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**


**राधास्वामी l l 25-02 -2021-

आज शाम सत्संग में पढ़ा गया बचन-

 कल से आगे:-( 164 )

-आप संसार में ऐसी वस्तु का दृष्टांत पूछते हैं जो एकरस हो और उसमें लहर पैदा हो जाय। कदाचित आपको यह ज्ञात नहीं है कि संसार का सब मसाला क्षणभंगी है अर्थात् इसमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता है। पर हाँ, अपने शास्त्रों से क्यों नहीं पूछते कि उसे एकरस ब्रह्म में क्रिया कैसे हुई? 

                                                            

  ( 165)- प्रश्न ४ का उत्तर ऊपर आ गया ।सृष्टि के आरंभ में कुल मालिक था किंतु वह कर्तारूप न था । वह रचना की क्रिया आरंभ होने पर कर्तार बना। जैसे समुद्र और समुद्र की लहर परस्पर विरुध नहीं होती ऐसे ही मालिक और मालिक की मौज भी विरोधी बातें नहीं हैं। 

                                            

(166)- प्रश्न ५- शब्द से यहाँ तात्पर्य उस आवाज से नहीं है जो जानदारों के मुंह से या चीजों के टकराने या चलायमान होने से उत्पन्न होती हैं। आपके शास्त्रों में इसी स्थूल शब्द को आकाश का गुण बतलाय है। तदनुसार वैशेषिक दर्शन में लिखा है कि " श्रोत( कान) से ग्रहण किया जाता जो अर्थ है, वह शब्द है" ( २/२/२१)। पर सृष्टि के आदि में जो शब्द प्रकट हुआ वह चेतन शब्द था, वह स्थूल कान से सुनाई देने वाला शब्द न था। सुरत-शब्द-योग के वर्णन में एक शब्द के विषय पर और अधिक प्रकाश डाला जायगा। इस समय इतना ही बता देना पर्याप्त होगा कि वह शब्द चेतन शक्ति का आदिम आविर्भाव था।।                                                

🙏🏻राधास्वामी🙏🏻

यथार्थ प्रकाश- भाग दूसरा-

परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज!


🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

शाहरुख का कोलबंस / विवेक शुक्ला


शाहरुख़ से भी चमकदार रतन भरे हैं सेंट कोलबंस में / विवेक शुक्ला 


बेशक,किसी भी स्कूल-कॉलेज की पहचान होते हैं वहां के विद्यार्थी और अध्यापक। इस मोर्चे पर 1941 में स्थापित सेंट कोलबंस स्कूल लगातार शानदार उदाहरण पेश करता रहा है। 

सेंट कोलबंस स्कूल ने बॉलीवुड बादशाह शाहरुख खान, एम्स के डायरेक्टर डा. रणदीप गुलेरिया, मोटिवेशनल गुरु डा. दीपक चोपड़ा, पुलित्जर पुरस्कार विजेता लेखक डा. सिद्धार्थ मुखर्जी, डा. पलाश सेन, नजीब जंग, अभिषेक मनु सिंघवी, स्पाइस जेट के फाउंडर राजीव सिंह जैसी सैकड़ों हस्तियां को तराशा और बेहतर नागरिक बनाया। 

यहां से 1984 में पास आउट शाहरुख खान ने इधर ही नाटकों में भाग लेना शुरू कर दिया था। वे ‘मैं हूं ना’ फिल्म में अपने स्कूल के एक टीचर से मिलता-जुलता किरदार बिन्दु से करवाते हैं। 

सेंट कोलबंस स्कूल के पुराने स्टुडेंट को याद हैं स्वीमिंग कोच साहू सर। उनकी इंग्लिश गजब थी। दो उदाहरण पेश हैं। इन्हें पढ़कर मुस्कुराना मना है। वे कहते थे ‘मीट मी बिहाइंड दि लंच’ और ‘ओपन दि विंडो सो डैट क्लाइमट कैन कम’। अगर आपने ‘मैं हूं ना’ देखी होगी तो आपको याद होगा कि बिन्दु भी साहू सर वाले डायलाग बोलती हैं।

आप जब भी गोल डाक खाना के आगे से गुजरेंगे तो सेंट कोलंबस स्कूल की लाल रंग की इमारत आपका ध्यान खीचेगी। इसके डिजाइन में एक गरिमा है। आयरलैंड की क्रिश्चन ब्रदर्स नाम की संस्था ने सेंट कोलबंस को शुरू किया था। उसे एक अलग स्तर   पर ले जाने में ब्रदर एरिक डि सूजा.ब्रदर जी.पी.पिटो, मैडम एल डिसा जैसे दर्जनों अध्यापकों का अमूल्य योगदान रहा। इन और इन जैसे गुरुओं ने सेंट कोलंबस स्कूल में अनुशासन पर जोर दिया पर अनुशासन की आड़ में आतंक नहीं फैलाया। यहां पर बच्चों को अपने शिक्षकों से सवाल करने और स्वस्थ डिबेट करने की हमेशा छूट रही। 


सेंट कोलबंस स्कूल ने भारतीय सेना से एक करीबी रिश्ता बनाकर रखा। सेंट कोलबंस के ही छात्र रहे थे परमवीर चक्र विजेता लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल। अरुण खेत्रपाल 1971 की जंग के हीरो थे। उन्होंने पंजाब-जम्मू सेक्टर के शकरगढ़ में शत्रु के दस टैंक नष्ट किए थे। वे तब 21 साल के थे। इतनी कम आयु में अब तक किसी को परमवीर चक्र नहीं मिला है।

 नोएडा का अरुण विहार उसी रणभूमि के योद्धा के नाम पर है। अरुण खेत्रपाल ने इंडियन मिलिट्री अकाडमी से जून, 1971 में ट्रेनिंग खत्म की। उसी साल दिसंबर में पाकिस्तान के साथ जंग शुरू हो गई। अरुण खेत्रपाल की स्क्वेड्रन 17 पुणे हार्स 16 दिसम्बर 1971 को शकरगढ़ में थी। वे टैंक पर सवार थे। टैंकों से दोनों पक्ष गोलाबारी कर रहे थे। वे शत्रु के टैंकों को बर्बाद करते जा रहे थे। तब ही उनके टैक में आग लग गई। वे शहीद हो गए। लेकिन उनकी टुकड़ी उनके पराक्रम को देखकर इतनी प्रेरित हुई कि वह दुश्मन की सेना पर टूट पड़ी। युद्ध में भारत को सफलता मिली। अरुण खेत्रपाल को शकरगढ़ का टाइगर कहा जाता है। 

अफसोस कि दिल्ली ने उनके बलिदान को किसी रूप में याद नहीं रखा। लेकिन सेंट कोलंबस स्कूल को उन पर नाज है। इससे पहले भारतीय नेवी के एडमिरल बी.एस. सोमन ने 1962 में स्कूल के स्वीमिंग पूल का उदघाटन किया था। भारत-पाक की 1965 की जंग के बाद यहां भारतीय सेनाध्यक्ष जनरल जे.एन.चौधरी आए। सेंट कोलबंस स्कूल ने उस जंग में शत्रु सेना पर ताबड़तोड़ हमले करने वाले मेजर भास्कर राय का भी गर्मजोशी से स्वागत किया। वे सेंट कोलंबस से ही थे। बहरहाल, चार अध्यापकों और 32 छात्रों के साथ शुरू हुआ सेंट कोलबंस स्कूल इस साल 80 साल की यात्रा पूरी कर रहा है। राजधानी में इससे पहले और बाद में भी कई स्तरीय स्कूल खुले। आगे भी खुलेंगे। पर सेंट कोलबंस स्कूल के शिखर को छूना इतना आसान नहीं है। Vivek Shukla 

लेख25 फरवरी 2021 को नवभारत टाइम्स के साड्डी दिल्ली कॉलम में छपा।

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

निकट का बांग्ला साहित्य पर केंद्रित एक यादगार संग्रहणीय और पठनीय अंक / सुभाष नीरव

 निकट : बांग्ला साहित्य पर केंद्रित अंक / सुभाष नीरव 



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इसमें कोई दो राय नहीं कि भारतीय भाषाओं का साहित्य बहुत समृद्ध और अमीर रहा है। इसकी झलक अनुवाद के माध्यम से हिन्दी पाठकों को मिलती रही है। हिन्दी की छोटी-बड़ी पत्रिकाओं और अखबारों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता जो समय समय पर भारतीय भाषाओं में लिखे जा रहे श्रेष्ठ साहित्य को अनुवाद के जरिये अपने पाठकों से रू-ब-रू करवाती रहती हैं। कोई भी व्यक्ति सभी भाषाओँ को नहीं सीख सकता है। उसे अन्य भाषाओं के साहित्य को पढ़ने, जानने-समझने के लिए अनुवाद पर ही आश्रित रहना पड़ता है। मैंने स्वयं विश्व का क्लासिक साहित्य ही नहीं, अपितु भारतीय भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य को अनुवाद के माध्यम से ही पढ़ा है। अनुवाद की महत्ता को समझते हुए बहुत सी पत्र पत्रिकाएं अनूदित रचनाएं अब स्थायी तौर पर नियमित छापने लगी हैं। पर दूसरी भाषाओं का साहित्य अभी हिन्दी पाठकों के सम्मुख टुकड़े टुकड़े रूप में आता है। ऐसे में हिन्दी की कुछ पत्रिकाओं ने भारतीय भाषाओं के साहित्य पर केंद्रित विशेषांक प्रकाशित कर बड़े काम भी किये हैं जिससे हिंदी के साहित्यप्रेमी पाठक को किसी भाषा का साहित्य एक स्थान पर समग्र रूप में पढ़ने को उपलब्ध हो जाता है। पिछली सदी के अंतिम वर्षों में हिन्दी की प्रसिद्ध पत्रिका 'कथादेश' ने 'उर्दू कहानी विशेषांक' और 'पंजाबी कहानी विशेषांक' प्रकाशित किये जो हिन्दी पाठकों द्वारा बड़े पैमाने पर सराहे और पसंद किए गए। इससे पहले 'सारिका' पत्रिका भी ऐसा करती रही। 'मंतव्य'और 'हिन्दी चेतना' ने भी 'पंजाबी कहानी' पर केंद्रित विशेष अंक प्रकाशित किये। 


ऐसा ही बेहद महत्वपूर्ण काम कथाकार कृष्ण बिहारी जी ने किया। उन्होंने अपनी पत्रिका 'निकट' का अक्टूबर-दिसम्बर 2020 अंक बांग्ला साहित्य पर केंद्रित कर उसे पूजा विशेषांक के रूप में हिन्दी के विशाल पाठक को उपलब्ध करवाया। यह बहुत ज़रूरी और दस्तावेजी अंक  हिन्दी के वरिष्ठ लेखक श्याम सुंदर चौधरी के अतिथि संपादन में आया है। श्याम सुंदर चौधरी हिन्दी-बांग्ला के साहित्यप्रेमियों में एक जाना-माना नाम हैं। वह हिन्दी में वर्षों से कहानियां लिख रहे हैं, अनेक कहानी संग्रह उनके प्रकाशित हो चुके हैं, वह फ़िल्म पत्रकारिता से भी जुड़े रहे हैं। सिनेमा पर इनके अनेक लेख अंग्रेजी-हिन्दी में छपते रहे हैं। इस सबके के साथ साथ उनका एक मजबूत पक्ष वर्षों से अनुवाद के रूप में हमारे सामने आता रहा है। वह हिन्दी से बांग्ला और बांग्ला से हिन्दी अनुवाद क्षेत्र में एक बड़े और समर्थ अनुवादक के रूप में जाने जाते हैं। अनुवाद की अनेक किताबें उनके खाते में चढ़ चुकी हैं। इनकी इसी प्रतिभा को देखते हुए शायद कृष्ण बिहारी जी ने इन्हें 'निकट' के बांग्ला साहित्य पर केंद्रित अंक का कार्य सौंपा होगा। और इस अंक को देख-पढ़ कर चौधरी की कार्य क्षमता और प्रतिभा का कायल होना पड़ता है। इस अंक में उन्होंने अपने दायित्व को बड़ी ईमानदारी से बखूबी निभाया है। श्याम सुंदर चौधरी ने इस अंक के लिए कहानियों, लघुकथाओं, साक्षात्कारों, कविताओं और अन्य रचनाओं का स्वयं चयन ही नहीं किया, बल्कि उन सबका स्वयं अनुवाद भी किया, जो निसंदेह चयन प्रक्रिया से कहीं अधिक श्रमसाध्य और दुष्कर कार्य है। बांग्ला के 13 कहानीकारों की कहानियां, छह लेखकों की लघुकथाएं, सात कवियों की कविताएं तो इस अंक में पढ़ने को मिलती ही हैं, इसके साथ साथ बांग्ला के प्रख्यात लेखक सुनील दास का  श्याम सुंदर चौधरी द्वारा लिया गया एक महत्वपूर्ण साक्षात्कार भी पढ़ने को मिलता है। बांग्ला साहित्य की बात हो और नाटक पर बात न हो, ऐसा नहीं हो सकता। 'नाट्य प्रसंग' इस अंक का ऐसा ही विशिष्ठ हिस्सा है।

रवींद्र नाथ टैगोर, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, विभूतिभूषण बंधोपाध्याय, विमल मित्र, शचीन्द्रनाथ वंधोपाध्याय, वरेन गंगोपाध्याय, बुद्धदेव गुहा, झरा बसु, सुनील दास, तपन बंधोपाध्याय, असित कृष्ण डे, राणा चट्टोपाध्याय, दुर्गादास चट्टोपाध्याय की कहानियों, रवींद्रनाथ टैगोर, दुर्गादास चट्टोपाध्याय, प्रगति माइति, दिलीप चौधरी, रमेन्द्रनाथ भट्टाचार्य, कृपाण मोइत्रा की लघुकथाओं और गौरीशंकर वंधोपाध्याय, शंकर चक्रवर्ती, श्यामल कांति दास, तापस ओझा, गौतम हाज़रा और स्वरूप चंद की कविताओं से गुजरते हुए यह बात पुख्ता हो जाती है कि बांग्ला में  विचार और संवेदना की दृष्टि से लिखा और लिखा जा रहा साहित्य बहुत विशिष्ट और उत्तम साहित्य है।


सबसे अच्छी बात मुझे यह लगी कि श्याम सुंदर चौधरी ने बांग्ला में लिखी जा रही लघुकथाओं को भी अपनी चयन प्रक्रिया में तरजीह दी।


एक कमी इस अंक में मुझे जो खली, वह यह कि इस अंक में बांग्ला के युवा कथाकारों और कवियों का प्रतिनिधित्व न के बराबर हुआ है। बांग्ला में नई पीढ़ी के लोग क्या और कैसा लिख रहे हैं, हिन्दी के पाठक को इसकी भी जानकारी इस अंक से मिलती तो अधिक बेहतर होता और अंक और भी अधिक मजबूत बन पड़ता।


अंत में, अतिथि संपादक के तौर पर चौधरी ने अपने संपादकीय में अनुवाद को लेकर बहुत महत्वपूर्ण और जायज़ प्रश्नों को उठाया है। ये प्रश्न नए हैं और ग़ौरतलब हैं। अनुवाद की पीड़ा को एक अनुवादक ही बेहतर समझता है। मैंने स्वयं कई मंचों से अनुवाद से जुड़ी पीड़ाओं को साझा किया है। आज भी अनुवादक के श्रम को वो मान-सम्मान और मेहनताना नहीं मिलता, जिसका वह  अधिकारी होता है। अभी भी साहित्य समाज में अनुवाद के श्रमसाध्य काम को दोयम दर्जे का समझ कर उसकी अवहेलना की जाती है। यही कारण है कि साहित्यिक अनुवाद क्षेत्र में समर्पित भाव से बहुत कम लोग आना पसंद करते हैं।

बहरहाल, इस महती कार्य के लिए निकट के संपादक कृष्ण बिहारी जी और श्याम सुंदर चौधरी, दोनों ही बधाई के पात्र हैं।

-सुभाष नीरव

23 फरवरी 2021

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

गोदी मीडिया के बाद अब गोदी कोर्ट की तैयारी

91 99111 47707 / मीडिया के बाद 'न्यायपालिका' का 'शव' भी आने के लिए तैयार है।इस पूरी क्रोनोलॉजी पर आपका ध्यान नहीं गया होगा~


●12 जून, 1975 

को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस देश की सबसे ताकतवर महिला को प्रधानमंत्री पद से बर्खास्त कर दिया! 


I repeat "Prime Minister Post" !


● 28 अक्टूबर, 1998

Three judges Case, में, सुप्रीम कोर्ट ने खुद को और अधिक मजबूत किया, और कोलेजियम सिस्टम को इंट्रोड्यूस किया, इससे ये हुआ कि अब जजों की नियुक्ति खुद न्यायपालिका करेगी, न कि सरकार करेगी।इससे सरकार का हस्तक्षेप कुछ कम हुआ, तो न्यायपालिका पर दबाव भी कम हुआ, कुलमिलाकर इसके बाद न्यायपालिका की स्वतंत्रता और अधिक बढ़ी।इसे न्यायपालिका की शक्ति का चर्मोत्कर्ष मान सकते हैं।


••••••••••••इसके बाद आई मोदी सरकार••••••••


●16 मई, 2014

मैं नरेंद्र मोदी शपथ लेता हूँ.......


●1 दिसम्बर 

जज लोया की मौत रहस्यमयी ढंग से हो जाती है, अमित शाह पर मर्डर और किडनैपिंग के मामले की सुनवाई इन्हीं जज लोया के अंडर हो रही थी।carvan मैगज़ीन ने इसपर डिटेल्ड स्टोरी की थीं।


●13 अप्रैल, 2015

मोदी सरकार ने National Judicial Appointments Commission (NJAC) एक्ट पास किया, इसका मोटिव था कोलेजियम व्यवस्था को तोड़ना, और जजों की नियुक्ति में सरकार का हस्तक्षेप लाना था।एकतरह से न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर मोदी सरकार का ये पहला स्पष्ट हमला था।


●16 अक्टूबर, 2015 

चूंकि अभी मोदी सरकार अपने शुरुआती दिनों में थी।न्यायपालिका में भी कुछ दम बचा हुआ था।सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 के बहुमत के साथ, NJAC कानून को अनकॉन्स्टिट्यूशनल करार देते हुए, खत्म कर दिया।इस तरह इस पहले टकराव में न्यायपालिका की जीत हुई।


● इसके बाद न्यायपालिका मोदी सरकार के निशाने पर आ गई. अब मोदी सरकार ने जजों की नियुक्तियों को मंजूरी देने में जानबूझकर देर लगाना शुरू कर दिया. पूर्व चीफ जस्टिस टी. एस. ठाकुर ने तो सार्वजनिक मंचों से कई बार इस बात के लिए नरेंद्र मोदी सरकार मुखालफत की।चूंकि मोदी सरकार प्रत्यक्ष रूप से न्यायपालिका में हस्तक्षेप नहीं कर सकती थी, इसलिए उसने बैक डोर से हस्तक्षेप करना शुरू किया।एक जज को, उनसे उम्र में 2 बड़े जजों को पास करते हुए देश का चीफ जस्टिस बना दिया।


● 11 जनवरी, 2018

अब तक न्यायपालिका की हालत वहां तक आ पहुंची थी कि सर्वोच्च न्यायालय के चार जजों को प्रेस कॉन्फ्रेंस करनी पड़ गई।ऐसा देश के न्यायिक इतिहास में पहली बार हुआ कि सुप्रीम कोर्ट के जजों ने कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस की हो।अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार में भी ऐसा कभी नहीं हुआ।जजों ने मीडिया में आकर कहा - "All is not okay, democracy at stake"


● आज पूरे देश की हालत क्या है, सबको पता है।पूरे देश भर में प्रदर्शन हो रहे हैं, नागरिक अधिकारों का इतना स्पष्ट हनन कभी नहीं हुआ।देश में नागरिक अधिकारों का संरक्षण करने की जिम्मेदारी न्यायपालिका की है।संसद के एक कानून से लोग सहमत भी हो सकते हैं, असहमत भी हो सकते हैं।लेकिन सरकार ने एक ही विकल्प छोड़ा सिर्फ सहमत होने का, अन्यथा जेल।यदि आप No CAA का पोस्टर लेकर अपने घर के सामने भी खड़े होते हैं तो पुलिस उठाकर ले जा रही है।छात्रों के प्रदर्शन पर गोलियां बरस रही हैं।आसूं गैस, और वाटर कैनन का यूज तो आम बात हो गई।लेकिन न्यायालय एक मृत संस्था की भांति मौन हुआ पड़ा है।


सरकार के पास सबका इलाज है, पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोगोई पर एक लड़की के साथ छेड़छाड़ का आरोप है।जिसकी जांच भी उन्होंने स्वयं ही की।अंततः लड़की को ही समझौता करना पड़ा।इसके पीछे का गणित समझना उतना मुश्किल भी नहीं है।ऐसा भी अनुमान लगाया जाता है कि इसके पीछे सरकार और मुख्य न्यायाधीश के बीच कोई समझौता रहा है।


●9 जनवरी, 2019

CAA पर सुप्रीम कोर्ट में पहली सुनवाई हुई, अब आप मुख्य न्यायाधीश का बयान सुनिए 

" देश मुश्किल वक्त से गुजर रहा...आप याचिका नहीं शांति बहाली पर ध्यान दें! जब तक प्रदर्शन नहीं रुकते, हिंसा नहीं रुकती, किसी भी याचिका पर सुनवाई नहीं होगी." 


आप अनुमान लगा सकते हैं कि उच्च न्यायालय के सबसे बड़े न्यायाधीश किस हद तक असंवेदनशील हो चुके हैं।क्या शांतिबहाली का काम भी पीड़ितों का है? सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं है? स्टेट स्पोंसर्ड वायलेंस को भी याचिकाकर्ता ही रोकेंगे? और जब तक हिंसा नहीं रुकती न्याय लेने का अधिकार स्थगित रहेगा? ये कैसा न्याय है?


चीफ जस्टिस बोबड़े के अगली पंक्ति पर तो आप सर पकड़ लेंगे, बोबड़े कहते हैं- "हम कैसे डिसाइड कर सकते हैं कि संसद द्वारा बनाया कानून संवैधानिक है कि नहीं?" 


ऊपर वाली पंक्ति इस बात को साबित करने के लिए काफी है कि न्यायपालिका, सरकार की तानाशाही के आगे नतमस्तक हो चुकी है।अगर न्यायपालिका नहीं जाँचेगी तो कौन जाचेगा? ये कैसी बेहूदी और मूर्खाना बात है कि न्यायपालिका जांच नहीं करेगी!


सच तो ये है कि आज किसी भी जज की हिम्मत नहीं है कि जजों का "लोया" कर देने वाले अमित शाह के सामने मूंह खोलने की हिम्मत कर लें।


डेमोक्रेसी का एक फोर्थ पिलर मीडिया पहले ही गिर चुका है। आज मीडिया का प्रत्येक एंकर, सरकार का भोंपू बन चुका है।चैनल का मालिक गृहमंत्री के स्तुति गान में लगा हुआ है, ऐसे में लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण खम्बा यानी न्यायपालिका भी अब लगभग गिरने को है।


न्यायपालिका कोई बहुमंजिला इमारत नहीं है, जिसकी, ईंट,पत्थर, दरवाजे गिरते हुए दिखेंगे।न्यायपालिका एक तरह से जीवंत संविधान है।जो हर रोज आपके-हमारे सामने मर रहा है।


बीते दशकों में न्यायपालिका एक 'प्रधानमंत्री' को बर्खास्त करने से लेकर एक 'गृहमंत्री' के चरणों में लिपट जाने तक का सफर तय कर चुकी है।बस उसका शव आपके सामने आना बाकी है!!!

[2/23, 21:32] +91 85298 64918: https://youtu.be/FWOxgd4OZXM

गांधी, संसद, प्रतिमाएंऔर चित्र विवेक शुक्ला

 संसद का बजट सत्र चालू हुआ तो संसद भवन में आने वालों को यहां पर स्थापित महात्मा गांधी की आदमकद प्रतिमा को ना देखकर हैरानी हुई। कहां गई? इसे देश संसद सत्र के समय बार-बार देखता रहा है। इसके आगे विपक्षी दलों के नेता धरना दे रहे होते थे या किसी मसले पर सरकार का ध्यान आकृष्ट करने के लिए नारेबाजी कर रहे होते थे।


चूंकि नई संसद के निर्माण का काम गति पकड़ रहा है, इसलिए बापू की मूर्ति को सुरक्षित स्थान पर रख दिया गया है। अब उसे नई संसद भवन परिसर के किसी उपयुक्त स्थान पर लगाया जाएगा। ध्यान की मुद्रा में बनी यह मूर्ति 17 फीट ऊंची है। इसका तत्कालीन राष्ट्रपति डा.शंकर दयाल शर्मा ने 2 अक्तूबर1993 को अनावरण किया था।


 इसके साथ ही संसद भवन के बाहर और रेल भवन के आगे स्वाधीनता सेनानी गोविन्द वल्लभ पंत की आदमकद मूर्ति  को भी फिलहाल हटा दिया गया है। वजह वही नई संसद भवन के निर्माण का काम है। नई दिल्ली में आजादी के बाद लगी किसी शख्यिसत की यह पहली प्रतिमा थी। पंत जी के 7 मार्च 1961 को निधन के बाद इसे 1963 में स्थापित किया गया था। इसमें गति व भाव का शानदार समन्वय है। इसके पास खड़े होकर देखें तो लगता है कि मानो पंत जी राजधानी पर पैनी नजर रख रहे हैं।


संसद भवन परिसर के भीतर देश की लगभग 50 आदरणीय शख्सियतों की आदमकद या ध़ड़ प्रतिमाएं अलग-अलग स्थानों पर स्थापित हैं। इनमें महाराणा प्रताप,महाराजा रणजीत सिंह,महात्मा ज्योतिराव फुले,रविन्द्र नाथ टेगौर, जवाहर लाल नेहरु,बिरसा मुंडा,शहीद भगत सिंह वगैरह शामिल हैं।


 इन्हें राम  सुतार,जी.के.महात्रे, देवव्रत चक्रवर्ती, बी.वी.वाघ,फकीर चंद परीदा जैसे चोटी के मूर्तिशिल्पियों ने बनाया है।ये सब मूर्तियां भी नए संसद भवन में स्थापित की जाएगी। कोशिश ये होनी चाहिए कि ये उन स्थानों पर लगें ताकि इनके लोग दर्शन कर पाएं। अभी गेट नंबर 12 पर महाराणा प्रताप की प्रतिमा स्थापित है। यह 18 फुट ऊँची कांस्य प्रतिमा है। इसे यहां आने वाले कायदे से देख नहीं पाते क्योंकि इस तरफ से ही उपराष्ट्रपति का आना-जाना होता है।

 लिहाजा सुरक्षा बल इस ओर लोगों को  आने- जाने नहीं देते हैं। संसद भवन परिसर में 107 महापुरुषों के चित्र भी लगे हैं। इन्हें  बहुमुखी प्रतिभा के धनी निकलाय रोरिक, के.के.हेब्बार, चिंतामणी कार, वसीम कपूर वगैरह ने तैयार किया  है।संसद भवन में पहला चित्र गांधी जी का सेंट्रल हॉल में 28 अगस्त 1947 को लग गया था। मतलब उनके जीवनकाल में ही उनका चित्र संसद भवन में लगा दिया गया था। इसे  ओस्वर्ड बिरली ने तैयार किया था। 


गांधी जी के बाद बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय,बल्लभभाई पटेल  वगैरह के भी चित्र  संसद भवन में लगते रहे। लाला लाजपत राय का चित्र बनाया था सतीश गुजराल ने। इसका पंडित जवाहरलाल नेहरु ने 17 नवबंर 1956 को अनावरण किया था। इसे देखकर लगता है कि लाला लाजपत राय कभी भी बोलने लगेंगे। अदभुत है यह।  कहते हैं, इस चित्र को देखकर नेहरु जी ने सतीश गुजराल को तीन मूर्ति भवन में चायपान के लिए बुलाया था।


सतीश जी के साथ तीन मूर्ति भवन उनके अग्रज आई.के.गुजराल भी गए। नेहरु जी के साथ उस बैठक के बाद आई.के.गुजराल बार-बार तीन मूर्ति भवन जाने लगे। अनुज की बदौलत उनकी किस्मत के सितारे खुल गए। इधर एम.एफ.हुसैन का कोई चित्र ना होना हैरान करता है। बहरहाल,संसद भवन में लगे चित्र नई संसद को भी सुशोभित करेंगे।


नवभारत टाइम्स में पिछली 18 फरवरी,2021 को छपे  लेख के अंश।

अखंड आजमगढ़ माटी के लाल आजमियो की तलाश

  शहर की इस भीड़ में चल तो रहा हूं,

जेहन में पर , गांव का  नक्शा रखा है ।


सुनील कुमार मल्ल                                                         

प्रस्तुति सुनील दत्ता कबीर ,


ताहिर अजीम के इस शेर का असर अखंड आजमगढ़ बेल्थरा रोड दोहरी घाट सड़क पर बेल्थरा से 11 किमी पश्चिम और मधुबन से 8 किमी पूर्व मर्यादपुर स्टेशन है । मार्यादपुर बस अड्डे से 2 किमी उत्तर एक , गांव है "लखनौर" के मल्ल परिवार में 28 जून 1966 को आसमान से एक चमकता सितारा , गांव में रौशन हुआ ।

घर के लोग उसे सुनील नाम दिए , ।


शिक्षा। प्राथमिक पाठशाला ,उरुवा बाजार गोरखपुर से पूरा किया उसके बाद श्री राम रेखा सिंह इन्टर कालेज उरुवा बाजार गोरखपुर से सीधी उड़ान 1984 में अाई अाई टी रुड़की से होते हुए 1988 में महामना द्वारा स्थापित काशी हिन्दू विश्व विद्यालय में अाई अाई टी में प्रवेश लिया और शानदार सफलता अर्जित किया ।

इसके बाद 1992 में भारतीय राजस्व सेवा में सहायक आयुक्त पद पर कार्य करने लगे । 1994 से 2018 तक अहमदाबाद और बड़ौदा में विभिन्न पदों पर कार्य करते हुए 2019 में मुंबई में कस्टम आयुक्त के रूप में वर्तमान में कार्यरत है , महानगरों में रहते हुए भी सुनील मल्ल जी अपने गांव की सोधी महक उसके एहसास को खेत खलिहानों के उछल कूद को आज भी अपने जेहन में ताजा किए हुए है, आइए उनके इन एहसासों के साथ हम सब जुड़कर अपनी सोधि मिट्टी का एहसास करे ।

सलाम लखनौर


शहर की इस भीड़ में चल तो रहा हूँ,

जेहन में पर, गाँव का नक्शा रखा है |     

                 --- ताहिर अजीम


    गांव  की जमीन से सक्रिय सम्बन्ध खत्म हुए अब तीन दशक से ऊपर हो रहे हैं | पर आज भी रात में सोते समय शहर के घर की सूनी छत को निहारते हुए गाँव के उस फैले आसमान की याद आ जाती है जिसकी बदौलत सप्तर्षि मंडल और आकाशगंगा हमारी हर रात के हिस्से होते थे | अपने अनजान पडोसी के बगल से गुजरते हुए गांव का मंजर याद आता है जिसमें जिंदगी अपनेपन से सराबोर थी और जहाँ परायेपन का किसी को भान नहीं था |

    बेल्थरा रोड- दोहरीघाट सड़क पर बेल्थरा से 11 कि.मी. पश्चिम और मधुबन से 8 कि.मी. पूर्व मर्यादपुर स्टेशन है | मर्यादपुर बस स्टेशन से 2 कि.मी. उत्तर एक गांव है “लखनौर” | यही लखनौर गांव मेरे बचपन की यादों के केंद्र में अवस्थित है | इस गांव में अधिकतर ‘मल्ल’ परिवार हैं जो ‘विशेन’ वंशीय क्षत्रीय हैं | साथ ही ब्राह्मण, यादव , कोइरी, गोड़, बारी  और हरिजन परिवार भी हैं | गांव में एक मुस्लिम परिवार भी है |

 मध्युगीन भारत में “माध्यमिका” क्षेत्र पर मल्लों के पूर्वज राज करते थे और उनकी राजधानी ककराडीह थी जो मधुबन के पास ताल रतोय के किनारे है | सन 1193 में मुहम्मद गोरी के हाथों जयचंद की पराजय के बाद माध्यामिका क्षेत्र की सीमा मुहम्मद गोरी की सीमा से टकराने लगी | इस कारण सुरक्षा की दृष्टि से माध्यामिका क्षेत्र के तत्कालीन शासकों ने अपनी राजधानी को सरयू के उस पार मझौली में स्थानांतरित कर दिया | इस तरह मल्लों का मझौली राज्य अस्तित्व में आया | अकबर के शासन काल में मझौली राज्य पर राजा देव मल्ल का शासन था | राजा देव मल्ल अकबर के कृपा पात्रों में से थे | अकबर के प्रभाव में राजा देव मल्ल ने अपने तीन पुत्रों-प्रसाद मल्ल, माधव मल्ल और राय मल्ल , में से अपने मंझले पुत्र माधव मल्ल को सरयू के इस पार के विस्तृत क्षेत्र  का प्रबंधन संभालने के लिए भेज दिया | माधव मल्ल ने अपनी राजधानी जिस जगह पर बनायी उस जगह का नाम उन्हीं के नाम पर ‘मधुबन’ पड़ा जो आज मऊ जिले की एक तहसील हैं | राजा माधव मल्ल के बिशेनवंशीय मल्ल वंशज मधुबन के ईर्द-गिर्द करीब दर्जन भर गांवों में रहते हैं | इस पुरे इलाके को “मल्लान” के नाम से जाना जाता है | क्षेत्रीय भाषा भोजपुरी है | भोजपुरी की छ: मुख्य उप-शाखायें है , यथा (1) मल्लिका ( मल्ल गणतंत्र, आजमगढ़ क्षेत्र), (2) काशिका (काशी क्षेत्र), (3) बल्लिका (बलिया-आरा क्षेत्र ), (4) छपरहिया (छपरा-पटना  उत्तर गंगा) (5) नगपुरिया (कर्मनाशा से रांची क्षेत्र) और , (6) विदेशी (सूरीनाम, मॉरिशस, फिजी, गयाना इत्यादि) | अथ, यही मल्लिका भोजपुरी इस क्षेत्र की भाषा है| राहुल सांकृत्यायन, अयोध्यासिंह उपाध्याय “हरिऔध”, लक्ष्मीनारायण मिश्र, डॉ विजयशंकर मल्ल और पण्डित  कन्हैयालाल मिश्र सरीखे महापुरषों की मातृभाषा यही मल्लिका भोजपुरी रही है | भाषा की मिठास ऐसी कि इस मिठास पर भी कटाक्ष किया जाता था | बचपन में मैंने ऐसी ही कटाक्षभरी कुछ पंक्तियां सुनी थी जो आज भी याद हैं –

                          चार चोर चौदह हमनी के,

 खेदलें चोर, भगलीं हमनी के,

वहा रे हमनी के, वहा रे हमनी के |  

राजा माधव मल्ल की सांतवी पीढ़ी के वंशज बाबू रामदुलार मल्ल ने 1750 ई. में लखनौर गांव  बसाया | गांव  के सीवान पर पडोसी गांव  हैं – मर्यादपुर, अजोरपुर, बांकेपुर, बैरियाडीह, भेड़ौरा, डुमरी इत्यादि | शिक्षा और समृद्धि दोनों ही मामलों में लखनौर क्षेत्र के अग्रणी गांवों में शुमार होता रहा है | जमींदारी उन्मूलन से पहले क्षेत्र के कुछ सबसे बड़े जमींदार इस गांव के थे | गांव की  प्राथमिक पाठशाला, जिसकी स्थापना ईस्ट इंडिया कम्पनी के प्रथम भारतीय वकील मुंशी चोआलाल ने  अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्घ में की, बहुत लम्बे अरसे तक दूर-दराज के बच्चों को उपलब्ध एकमात्र स्कूल था | प्रसिद्ध विधिवेत्ता और उत्तर प्रदेश के दीर्घकालीन महाघिवक्ता पण्डित कन्हैयालाल मिश्र और हिन्दी के प्रसिद्ध ऐतिहासिक नाटककार पं. लक्ष्मीनारायण मिश्र ने इसी स्कूल से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की | लखनौर के बाबू जमुनाप्रसाद मल्ल, जिन्होंने सन 1900 के आस-पास थामसन कॉलेज ऑफ़ सिविल इंजीनियरिंग (वर्तमान में आई.आई.टी रूडकी) से डिप्लोमा किया, डॉ विजयशंकर मल्ल, जो हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार और बनारस हिन्दू विशवविधाल्य  में प्रोफेसर हुए, डॉ लल्लन प्रसाद मल्ल, जो उज्जैन विशवविधाल्य में वनस्पति शास्त्र के प्रोफ़ेसर हुए और श्री कृष्णमोहन मल्ल जो भारतीय रेलवे से महाप्रबन्धक (जी एम) पद से रिटायर हुए-सभी ने अपनी प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक पाठशाला लखनौर से ग्रहण की | बींसवी शताब्दी के पूर्वार्ध में पढने-लिखने की ऐसी समृद्ध परम्परा ग्रामीण भारत के लिए विरली ही थी |

 इस श्रृंखला की एक कड़ी मेरे बाबूजी स्वर्गीय हृद्याशंकर मल्ल भी थे जो तमाम आर्थिक आवरोधों के बावजूद प्राथमिक पाठशाला लखनौर, मिडिल स्कूल फतेहपुर, शहीद इंटर कॉलेज मधुबन से होते हुए गोरखपुर विशवविधाल्य से अंग्रेजी में स्नात्तकोत्तर (पोस्ट ग्रेजुएट) होने में सफल हुए और फिर सन 1960 से सन 1994 तक इंटरमीडिएट कॉलेज, उरुवा बाज़ार गोरखपुर में अंग्रेजी के प्राध्यापक और फिर प्रधानाचार्य के रूप में जिन्होंने न सिर्फ अपने परिवार के लोगों में, अपितु सैंकडो-हजारों अन्य की जिन्दगी में, शिक्षा को एक केन्द्रीय स्थान दिलाने में सफलता प्राप्त की |

 गोरखपुर शहर से करीब 43 किमि दक्षिण में कस्बाई चरित्र  वाला एक गाँव है उरुवा बाजार | बाबूजी वहां पर आध्यापक थे और हमारा जुलाई से मार्च का शिक्षा सत्र  उरुवा में ही गुजरता था | पर मार्च का अंत आते-आते इंटरमीडिएट कॉलेज में परीक्षायें  समाप्त हो जाती थीं  और हम सब लखनौर के लिए प्रस्थान करते थे | फिर मार्च के अंत से कॉलेज खुलने तक, अर्थात जुलाई के प्रथम सप्ताह तक, लखनौर का घर-आंगन, खेत-खलिहान, ताल-तलैया, बाग-बगीचे, हाहा (घाघरा की एक उपशाखा) हमारे संगी-साथी हो जाते |

 गांव  में प्रवेश करते ही वो अभिवादन सुनाई देता जो लखनौर की सोच और संस्कृति दोनों का बयान करता है | अगर बाबूजी साथ हुए तो गांव के बड़ों को देखकर  बोलते थे – “काका सलाम” “चाचा सलाम” “सलाम बाबा” और अगर आम्मा साथ होती थी तो गाँव के बाबूजी के हमउम्र अभिवादन करते हुए बोलते थे “भौजी सलाम” और हमारे हमउम्र बोलते थे “ चाची सलाम” “काकी सलाम” | पता नहीं लखनौर में सलाम कहने और करने की यह परम्परा कब और कैसे आयी पर घाघरा के उस देहात में गंगा-जमुनी तहजीब का यह अकेला उदाहरण नहीं था | अपने बचपन में लखनौर की इस परम्परा पर मुझे बहुत गर्व होता था और आज, गांव से इतनी दूर बैठकर लिखते हुए, मन में घबराहट हो रही है कि पता नहीं आज के दूषित माहौल में यह परम्परा अब जीवित बची है कि नहीं |

 लखनौर के दो कोस उतर (करीब 6-7 कि मी) सोनाडीह नामक जगह है जहाँ पर हमारे गांव  के लोगों की सिद्ध देवी का मंदिर है और मुंडन इत्यादि  अनुष्ठान वहीँ पर संपन्न किये जाते हैं | (मेरे दो बेटों का मुण्डन तो अहमदाबाद और बड़ौदा में बिना किसी अनुष्ठान के सम्पन्न हुआ पर अम्मा ने बाद में उनके बाल को सोनाडीह में अनुष्ठापूर्वक चढ़ाया) | हमारे बचपन में हर वर्ष नवरात्रि के समय सोनाडीह में माह भर चलने वाला मेला लगता था | जब हम मार्च के अंत में उरुवा बाजार से लखनौर पहुँचते तो यह मेला अपने अंतिम चरण में होता | गांव पहुँचते ही सबसे पहले तो अपने चचेरे भाइयों-बहनों और यार-दोस्तों से उस साल के मेले की कहानियां इकट्ठी की जातीं और रात में सोने से पहले ही यह निर्णय भी ले लिया जाता कि सोनाडीह कब जाना है | सोनाडीह के मेले का महत्व सबकी जिन्दगी में ऐसा था कि गांव के बुजुर्ग भी पहला प्रश्न यही करते थे कि हम लोग सोनाडीह गये कि नहीं | इतना ही नहीं, गांव के बुजुर्ग मेले के लिए हम बच्चों को अपनी-अपनी  क्षमतानुसार पैसे भी देते थे- दसपैसे, चार आना, आठ आना | और,  फिर अगले दो-चार दिन हमारी जिन्दगी मेले में ख़रीदे गये खिलौनों के साथ व्यतीत होती | वैसे तो इस मेले में मैंने ऐसा कुछ भी नहीं ख़रीदा जिससे मेरी सोच “ईदगाह” कहानी के हामिद जैसी लगे पर आजभी यह सोच कर शर्म और फक्र (और हसीं भी) का मिला जुला भाव आता है कि एकबार मेले में एक दुकान से चंदन की लकड़ी का एक छोटा सा टुकड़ा बिना पैसे दिये उठा लेने में मैंने अपने चचेरे भाइयों का साथ दिया था- यह सोचकर कि मेरी बड़ी मां, जिसे हम लोग माई कहते थे, शुक्रवार के दिन संतोषी माता का व्रत और पाठ करती है और उसे चंदन की लकड़ी का भी इस्तेमाल करना होता है |

 मार्च के अंत में, जब हम गांव पहुँचते थे, आम के पेड़ों पर बौर आ चुके रहते थे- अकसर पेड़ों पर बौर के बाद छोटे-छोटे टिकोरे भी आ चुके होते थे | गाँव पहुंचते ही दोस्तों से यह भी ब्योरा लिया जाता था कि इस बार आम की फसल कैसी है, कि इसबार लंगडू बाबा के बारहमासी पेड़ों पर फल लगे हैं कि नहीं, कि बुढ़िया की बारी (एक बड़ा सा बगीचा जिसकी रखवाली एक बुढ़िया करती थी और जिसके होते हुए आम तोड़ना नामुमकिन था) की बुढ़िया अभी जिन्दा है की मर गई, कि कालीमाई के मंदिर के पास वाले बुदबुदहवा पेड़ पर आम हैं कि नहीं, कि भीते के पास सिनुरहवा ( सिन्दूर जैसे आम ) पर फसल आई है कि नहीं, कि “मियां की बागी” (बागीचे में) में इसबार आम हैं कि नहीं |

 गांव के जिस हिस्से में हमारा घर था उसको “पूरब” टोला बोलते थे | गांव के ठीक पूर्व तीन पोखरे थे- नौका पोखरा (जिसमें दो तरफ पक्के घाट बने हुए थे और जिसका प्रयोग सिर्फ नहाने के लिए होता था), पुराना पोखरा (या पुरनका पोखरा जिसके पानी का इस्तेमाल नित्य कर्म के लिए होता था) और धोबियों का पोखरा (जिसका प्रयोग गांव के धोबी कपडे धोने के लिए करते थे) | इन पोखरों के ईर्द-गिर्द और इनके बाद एक विस्तृत क्षेत्र था- कम से कम दो वर्ग किमी का-जिसमें गांव के सभी लोगों के सम्मिलित बाग-बगीचे-बंसवारी थे | इनमें अधितकर पेड़ आम के थे और इन पेड़ों और बगीचों को हम इनके रखवालों के नाम से जानते थे, मालिकों की चिन्ता हमें नहीं थी | मेरे जैसे सभी बच्चों का सुबह के शाम तक का लगभग सम्पूर्ण समय बगीचे में आम बीनते या तोड़ते, पोखरे में नहाते या खेलते हुए व्यतीत होता | सुबह की शुरुआत मुहं अंधेरे बगीचे में पहुँचने से होती – रात के गिरे हुए आम बटोरने के लिए | दिन में एक बार पोखरे में नहाने की अनुमति होती थी जो सुबह आठ-नौ बजे ही पुरी हो जाती | फिर दिन में तीन- चार बार बिना घर में बताये नहाने का दौर होता था और फिर गीले कपड़ों में ही बाग में घूमना होता था जब तक कि गीले कपड़े सूख न जायें | इकट्ठा  किये और तोड़े हुए आमों को दिनभर ट्राफियों की तरह प्रदर्शित करने के बाद शाम को उनके यथोचित उपयोग का निर्णय होता था- कच्चे हुए तो खट्मीठवा, अचार, मुरब्बा इत्यादि और पके हुए तो गादा, अमावट  इत्यादि | दिनभर बगीचे में तरह तरह के खेल भी होते रहते थे- ओल्हा-पाती (पेड़ पर), लट्ठा दौड़ (पोखरे में), कबड्डी, चिक्का, ऊ़़ढा़ कूद (एक ऊँचे प्लेटफॉर्म से अखाड़े में कूदना), कुश्ती, खुन्टेलवा, गिल्ली-डंडा इत्यादि | गरज कि दिन का एक-एक लम्हा किसी न किसी सक्रिय काम में ही गुजरता | घर पर सिर्फ नाश्ता और खाने के लिए आना होता | हमारे गाँव के घर पर मेरी बड़ी मां (माई) हमारी चचेरी बहन के साथ रहती थी | घर की मलिकाइन का दर्जा माई को ही प्राप्त था | पुरे गरमी की छुट्टी जब तक हम गांव  में रहते हमारी सारी जरूरतें माई द्वारा ही पूरी होतीं ए माई खाना दो !, ए माई  ! पैसा दो, ए माई ! क्या बना है, गरमी  ये बनाओ इत्यादि । पूरीगरमी भर माई ही हमारी दात्री होती, साथ ही वह अम्मा, भाई और बहनों के हाथों डांट और पिटाई में भी हमारे रक्षक का काम करती । 

   गांव में बड़े और बुजुर्गों के भी अड्डे थे जहाँ रुचि अनुसार लोग इकट्ठे होते थे अपने अपने शौक पूरा करने के लिए । इनमें एक अड्डा था हमारे घर की चहारदीवारी से लगा हुआ “बरदौर” जहाँ पर लोगों के बैल-गाय रखे जाते थे और अनाज और पशुओं का चारा संग्रहीत होता था | उसी बरदौर में, एक छप्पर के नीचे, हर दोपहर तीन-चार बजे के आस-पास गांव के कुछ बुजुर्ग जुटते थे- ताश खेलने के लिए |   भीड़ में तीन पीढ़ियों के लोग होते थे- बाबा भी और नाती भी | बीच में बाबूजी की पीढ़ी थी | दो-तीन टीमें अलग-अलग,  पर एक ही छप्पर के नीचे,  ट्वेंटी नाइन खेलने में व्यस्त रहती | मेरी पीढ़ी के बहुत सारे बच्चे अपने दादाजी-चाचाजी को सलाह देने में लगे रहते कि “पनवा का इक्कवा चलीं” | फिर अचानक राम लाल बाबा की कान के पर्दे चीरने वाले तेज़ आवाज़ सुनाई देती की “ हई पेवर (यानी पेयर) ह पेवर !”


दूसरा अड्डा था “बिन्सरी बाबा का हाता” यानी विन्देश्वरी पंडित का हाता । यहाँ की बैठकों का चरित्र अलग होता था । यहाँ पर गाँव के विवेकशील  और कुछ विवादशील  लोग सम सामयिक घटनाओं पर, इतिहास और साहित्य पर बहस (और कभी-कभी विवाद) करते थे- सयंत और असयंत | ऐसे में मुझ जैसे बच्चों का काम था बगल में पनहारिन के घर से बाबा-चाचाजी लोगों के लिए उनकी पसंद का पान  लाना। इन्हीं अड्डों पर एक पीढ़ी द्वारा अगली पीढ़ी को बुजुर्गों और माटी का इतिहास सौंपा जाता था, किस्से-कहानियों और गल्पों के साथ। इन परंपरागत कहानियों में कितना सच होता है और कितना झूठ या रोमांस, कहना मुश्किल है। पर, लिखित इतिहास तो सिर्फ राजाओं-महाराजओं का होता है। आम आदमी की गाथायें तो ऐसे किस्सों कहानियों के माध्यम से ही जीवित रह पाती हैं | ऐसी ही चौपाल की कहानियों से मैंने बचपन में ही जान लिया था कि -

बाबर की सेना अफगानों से लड़ाई के पश्चात वापस लौटते हुए हमारे गाँव के सिवान में रुकी थी और इसलिए हमारे गाँव के उस हिस्से के खेत आज भी “खेमहुआं” कहलाते हैं (खेमा शब्द से व्युत्पति)

अठारह सौ सत्तावन के स्वतंत्रता संग्राम में हमारे गाँव के लोगों ने हिस्सा लिया था और कुँवरसिंह की सेना को खाना खिलाया था। मैंने ये भी सुना है की विजयशंकर बाबा के हाते के निर्माण के लिए नींव की खुदाई करते समय स्वतंत्रता संग्राम के दिनों की बंदूकें जमीन के अंदर गड़ी हुई मिलीं। 

जमीन के स्थायी बंदोबस्त के अपने आखिरी चरण में लॉर्ड कार्नवालिस मधुबन क्षेत्र में था और उसी क्षेत्र में वह बीमार पड़ गया और फिर गाजीपुर पहुँचकर उसकी मृत्यु हो गई। चूंकि कार्नवालिस अपने दौरे के लिए ऊंट का प्रयोग कर रहा था जिसे स्थानीय लोग “डंकिनी” कह कर बुलाते थे इसलिए स्थायी बंदोबस्त वाले इलाके को मल्लान के लोग लंबे दौर तक “डंकिनी” ही के नाम से जानते थे। 

शेरशाह सूरी की पहली संतान, उसकी बेटी मानु बेगम, रौजा दरगाह (मधुबन के पास) के पीर के आशीर्वाद स्वरूप पैदा हुई और मन्नत स्वरूप शेरशाह ने मानुबेगम को दरगाह को सौंप दिया। दरगाह की आमदनी के लिए शेरशाह ने बावन गावों की मालगुजारी भी दरगाह को सौंप दी। इसलिए, सदियों तक उन बावन गांवों के समूह को “चकमानो”कहा जाता था। 

गांव के दक्षिण-पश्चिम में एक “मंगलहिया” गाड़ही भी थी जिसके बारे में प्रसिद्ध था की बाबर की सेना ने ही उसकी खुदाई की थी। लखनौर में “मटन” को, जिसे गोरखपुर में “गोश्त’ के नाम से जाना जाता था, “कालिया” कहते थे (बबरनामा के हिन्दी अनुवाद में भी मैंने मटन के लिए “कालिया” शब्द पढ़ा है)। जाहिर है की गंगा-जमुनी तहजीब मेरे गांव की मिट्टी में रची बसी है। वहाँ के खान-पान, संस्कृति और शब्द-व्यवहार हमारे संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को मूर्त रूप देते हैं। बचपन में लंबे समय तक गर्मी की छुट्टियाँ लखनौर में गुजारने के दौरान इन बातों ने मुझे छुआ भी होगा और आकार भी दिया होगा, इसमें कोई शक नहीं है। इसमें भी कोई शक नहीं कि मेरे शरीर और मन मस्तिष्क को रूप और आकार देने वाले और मेरे सबसे बड़े आदर्श मेरे बाबूजी के विशालमना व्यक्तित्व को भी सबसे मजबूत आधार इसी मिट्टी और इसकी संस्कृति से मिला होगा। 

 गांव से इतने लंबे समय तक दूर रहने के बावजूद आज भी जब शहर की भौतिकता और कृत्रिमता मन को अवसादग्रस्त करने लगती है तो उस गांव की और बचपन की यादें ही सहारा देती हैं। मेरे शहर के अंदर अगर मेरा गांव नहीं होता तो जीवन का संतुलन निश्चित ही बिगड़ जाता। इसलिए मैं हमेशा सलाम करता हूँ गाँव के उस खु़लूस को, उस जिन्दादिली और नेकदिली को जिससे शहरी ज़िन्दगी की कलुषताओं का सामना करने की एक सहज सामर्थ्य मुझे मिली है। 

 सुनील कुमार मल्ल                                                         

प्रस्तुति सुनील दत्ता कबीर ,

 स्वतंत्र पत्रकार , दस्तावेजी प्रेस छायाकार

यूपी के 10 लाख अभ्युदय योजना के छात्रों को मिलेगा टैबलेट / राजेश सिन्हा

 *'अभ्युदय' के मेधावी छात्रों को  मिलेगा टैबलेट का तोहफा*


*मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना के लिए 28 फरवरी तक करा सकते हैं पंजीयन*


*बजट में सरकार ने की है टैबलेट देने की घोषणा, जल्द जारी होंगे पात्रता नियम*


*05 और 06 मार्च को होगी ऑनलाइन परीक्षा, समय-सारणी घोषित*


राजेश  सिन्हा

*लखनऊ, 23 फरवरी:l

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाली अनूठी कोचिंग 'अभ्युदय' के छात्रों को जल्द ही टैबलेट का तोहफा मिलने जा रहा है। योगी सरकार के ताजा बजट में इस बाबत घोषणा के बाद एक ओर जहां छात्रों में उत्साह है, वहीं अधिकाधिक युवाओं को इसका लाभ देने के लिए पंजीयन की प्रक्रिया एक बार फिर शुरू कर दी गई है। प्राथमिक योजना के मुताबिक मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना में पंजीकृत करीब 10 लाख युवाओं को टैबलेट प्रदान किए जाने की योजना है, ताकि घर बैठे वह दुनिया-जहान की जानकारी अच्छे ढंग से हासिल कर सकें। 


'मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना' के क्रियान्वयन के लिए गठित राज्य स्तरीय समिति के सदस्य, मंडलायुक्त लखनऊ रंजन कुमार ने बताया कि टैबलेट वितरण के लिए पात्रता नियम बहुत जल्द घोषित किए जाएंगे। वर्तमान में करीब 05 लाख युवा अलग-अलग प्रतियोगी छात्र इस मंच के माध्यम से पढ़ाई कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि अभ्युदय योजना के अंतर्गत समस्त मंडलों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए निःशुल्क कोचिंग की साक्षात कक्षाओं के लिए आवेदन फिर से शुरू हो गए हैं। इच्छुक युवा http://abhyuday.up.gov.in पर पंजीयन करा सकते हैं। मंडलायुक्त लखनऊ ने बताया कि टैबलेट वितरण के लिए पात्रता नियम बहुत जल्द घोषित किए जाएंगे। उन्होंने बताया कि सिविल सेवा, जेईई, नीट, एनडीए व सीडीएस परीक्षा के लिए स्तरीय तैयारी की सुविधा वाली इस खास कोचिंग की साक्षात कक्षाओं के लिए 28 फ़रवरी 8 बजे तक आवेदन किया जा सकता है। इस तिथि के बाद आवेदन स्वीकार नहीं किए जाएँगे। जो छात्र पहले से साक्षात कक्षायें कर रहे हैं उन्हें आवेदन करने की आवश्यकता नहीं है। वो छात्र जिन्होंने 28 फ़रवरी से पहले पंजीकरण करा लेंगे अथवा वो पहले से ऑनलाइन कक्षाओं के लिये पंजीकृत हैं, वह सभी यह परीक्षा दे सकेंगे।

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*साक्षात कक्षाओं के लिए प्रवेश परीक्षाओं की समयसारणी*

एनडीए/सीडीएस: 5 मार्च 12 बजे से 1 बजे

जेईई: 5 मार्च 2 बजे से 3 बजे

नीट: 5 मार्च 4 बजे से 5 बजे

सिविल सेवा : 6 मार्च 2 बजे से 3 बजे


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*मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना की खास बातें*


*ई-लर्निंग प्लेटफार्म*

राज्य स्तर पर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं से संबंधित डिजिटल कन्टेन्ट उपलब्ध कराने हेतु एक ई-लर्निंग प्लेटफार्म की व्यवस्था है|


*राज्य सरकार में कार्यरत अधिकारियों द्वारा निःशुल्क मार्गदर्शन एवं शिक्षण*

आईएएस, आईपीएस, भारतीय वन सेवा, पीसीएस संवर्ग के अधिकारियों द्वारा निःशुल्क मार्गदर्शन एवं शिक्षण की व्यवस्था


*वर्चुअल क्लासेज*

राज्य स्तर के मार्गदर्शन एवं विषय वस्तु से संबंधित वर्चुअल क्लासेज का आयोजन ई-लर्निंग प्लेटफार्म के माध्यम से


*गाइडेंस एवं संदेह निवारण*

प्रत्येक मंडल मुख्यालय पर गाइडेंस एवं संदेह निवारण के लिए राज्य सरकार के अधिकारियों द्वारा वर्चुअल एवं साक्षात कक्षाओं का आयोजन किया जा रहा है


*कॅरियर काउंसलिंग*

प्रत्येक जनपद में युवाओं हेतु कैरियर काउंसलिंग सत्रों का आयोजन वेब पोर्टल एवं साक्षात्कार के माध्यम से किया होगा

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

कौन जिम्मेदार? / ऋषभ देव शर्मा

 महिला बेरोजगार : कोरोना ज़िम्मेदार!/ ऋषभ देव शर्मा 

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परिवर्तन और विकास के तमाम दावों के बावजूद भारतीय समाज का स्त्रियों के प्रति सोच और व्यवहार अब भी बड़ी हद तक दकियानूसी ही बना हुआ है। समाज में बढ़ते यौन अपराध तो इस बात की गवाही देते ही हैं,  समय समय पर रोजगार और आर्थिक स्थिति के सर्वेक्षण भी इसकी पुष्टि करते हैं। हाल ही में सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई)  का यह खुलासा चौंकाने वाला है कि भारत में केवल 7 प्रतिशत शहरी महिलाएँ ऐसी हैं, जिनके पास रोजगार है या वे उसकी तलाश कर रही हैं। इस समूह का मानना है कि महिलाओं को रोजगार देने के मामले में हमारा देश इंडोनेशिया और सऊदी अरब से भी पीछे है! 


इसमें संदेह नहीं कि कोरोना महामारी ने महिला बेरोजगारी की समस्या को और गहरा बनाया है।  समाज के रूढ़िवादी सोच के साथ ही सरकार की नीतियों को भी इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। इससे हमारे यहाँ स्त्री सशक्तीकरण की पोल भी खुलती है। क्योंकि महिलाओं को रोजगार मिलना बड़ी हद तक स्त्री सशक्तीकरण  का एक महत्वपूर्ण उपकरण ही नहीं, सामाजिक परिवर्तन का भी सूचक है। इसीलिए  भारत में इतनी कम संख्या में शहरी औरतों का रोजगार में होना सयानों को चिंताजनक प्रतीत हो रहा है।  'द इकोनॉमिस्ट' पत्रिका ने यह समझाया है कि “वैश्विक महामारी कोरोना से उन कार्यक्षेत्रों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा, जिन पर महिलाएँ सीधे तौर पर रोजगार के लिए निर्भर हैं।  चाहें डोमेस्टिक हेल्प हो, स्कूलिंग सेक्टर हो, या टूरिज्म और कैटरिंग से जुड़ा सेक्टर।” यह तो सबकी देखी-बूझी सच्चाई है कि कोरोना संकट काल में भारी संख्या में महिलाओं को इन सभी कार्यक्षेत्रों से निकाला गया। एक ओर तो स्त्रियाँ बेरोजगार हो  गईं। दूसरी ओर  बच्चों के स्कूल बंद हो जाने से उनकी देखरेख का अतिरिक्त बोझ भी स्त्रियों पर आ पड़ा। इस कारण भी इस दौरान काफी महिलाओं को अपनी लगी-लगाई नौकरी छोड़नी पड़ी।  


सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) के विशेषज्ञों की राय है कि भारत में लगभग 10 करोड़ महिलाएँ  पारंपरिक आर्थिक क्षेत्र  में काम कर सकती हैं, लेकिन उन्हें काम नहीं मिल रहा। अगर इन सबको समुचित रोजगार मिल जाए, तो इससे भारत की अर्थव्यवस्था में  अभूतपूर्व तेजी आ सकती है, क्योंकि  यह  संख्या इतनी बड़ी है कि  फ्रांस, जर्मनी और इटली की कुल 'वर्कफोर्स' भी शायद इससे कम ही हो! लेकिन अफसोस कि महिला बेरोजगारी को दूर करने के लिए सोचने की हमारे यहाँ  किसी को फुरसत ही नहीं है! अब इसे क्या कहिएगा कि कोरोना महामारी के दौरान  शहरी महिला कामगारों की संख्या 6.9 प्रतिशत रह गई, जो  2019 में 9.7 प्रतिशत थी?


इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन (आईएलओ) के  सर्वेक्षण में भी यह पाया गया बताते हैं कि कोरोना से पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के रोजगार पर ज्यादा बुरा असर पड़ा।  मुंबई में किए गए सर्वेक्षण से पता चला है कि इस दौरान 75 प्रतिशत पुरुषों की तुलना में 90 प्रतिशत महिलाओं ने अपना रोजगार गँवाया। इसी अध्ययन से अगली सच्चाई यह भी खुली कि  पुरुषों के लिए नया रोजगार पाना महिलाओं के मुकाबले आठ गुना आसान रहा! इसकी एक वजह हमारा सामाजिक ढाँचा भी रहा, जिसमें कुछ कार्यक्षेत्र केवल पुरुषों के लिए आरक्षित जैसे हैं। जैसे सामान डिलीवर करने का काम स्त्रियों की तुलना में पुरुषों को आसानी से मिल जाता है। 

 

वैसे सारा दोष कोरोना के सिर मढ़ना भी शायद उचित नहीं होगा। क्योंकि कोरोना के विस्फोट से पहले भी भारत में कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत घट रहा था। इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन का कहना है कि 2010 में भारत की 'लेबर फोर्स' में महिलाओं का हिस्सा 26 प्रतिशत था, जो 2019 में घटकर 21 प्रतिशत हो गया।  इसी तरह सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकॉनमी की मानें तो 2016 में महिलाओं की श्रम भागीदारी 16 प्रतिशत थी, जो 2019  में घटकर 11 प्रतिशत  पर आ गई थी। तब तक कोरोना का कहीं नाम-निशान न था। यानी, कोरोना के अलावा भी देश की परिस्थितियाँ और लैंगिक भेदभाव की रूढ़ियाँ स्त्रियों को रोजगार से दूर रखने के लिए ज़िम्मेदार हैं। 

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धडक़ने के लिए कोरोना से सतर्कता जरूरी / मनोज कुमार


 धडक़ने के लिए कोरोना से सतर्कता जरूरी / मनोज कुमार 


वासंती हवाओं के साथ मन में इस समय प्रेम की जगह भय ने ले लिया है. एक बार फिर डराने की सूचना से सबके चेहरे पर शिकन दिखने लगी है. जानलेवा कोरोना का एक और दौर शुरू हो गया है. आंकड़ों की बतकही पर ना भी जाएं तो कोरोना का जो वैश्विक रूप से देखने को मिल रहा है, वह सुकून देने वाला तो कतई नहीं है. बीते एक साल जो कुछ हम सबने झेला, उससे आज तक हम उबर नहीं पाए हैं. अब फिर सूचना आने लगी है. चेतावनी दी जाने लगी है कि कोरोना का यह दौर पहले से ज्यादा खतरनाक है. सरकारें भी सचेत हो गई हैं. मध्यप्रदेश के इंदौर और भोपाल में धडक़न जिस तरह से थमने लगी थी, उस पर शासन-प्रशासन की सख्ती से किसी तरह काबू पाया जा सका था. जो गया, उसकी वापसी नहीं हो सकती थी लेकिन जिन्हें बचाया जा सकता था, उन्हें बचाने की भरसक कोशिश की गई. काल का दूसरा नाम कोरोना है. और कोरोना से बचने की जिम्मेदारी हम सब की है. सरकार और तंत्र को सहयोग करना हमारी नैतिक जवाबदारी है. सरकार ने फरमान जारी कर दिया है कि मॉस्क लगाना कम्पलसरी होगा लेकिन असल सवाल यह है कि हम क्यों नहीं चेत जाते? क्यों अभी हम मॉस्क से तौबा-तौबा कर रहे हैं? अभी नहीं, आगे भी मॉस्क, फिजीकल डिस्टेंसिंग और हेंडवॉश की आदत बनाये रखिए. कई लोगों को इस बात का भरम है कि वैक्सीनेशन के बाद वे सेफ हैं. यह बात भी ठीक है लेकिन वेक्सीनेशन आपको बेफ्रिक बनाती है, लापरवाह नहीं.  


कोरोना यह नहीं देखता है कि आप पर क्या जवाबदारी है? आपके घर को आपकी क्या जरूरत है? वह तो चाहे जिस पर हमला बोल दे. हमारी धडक़न कायम रहे. हम स्वस्थ्य रहें, इसके लिए जरूरी है कि एक साल से जो नसीहतें हमें मिल रही है, उसे ना भूलें. बहुत छोटी छोटी सी सावधानियां है जिनका अनदेखा किये जाने से हमारी जान पर बन आती है. चेहरे पर मुंह और नाक पर मॉस्क जरूर लगाएं. कोशिश हो कि सर्जिकल मॉस्क का उपयोग करें क्योंकि डॉक्टरों की सलाह है कि यह सबसे सेफ है. वैसे आप अपने डॉक्टर से बात कर कौन सा मॉस्क कोरोना से सुरक्षा देगा, पहन लें. मॉस्क अपनी सुविधा से खरीदें लेकिन मॉस्क का उपयोग आप घर से बाहर कदम रखने और लौटने तक करें. घर वापसी के साथ आप साबुन से हाथ धोना नहीं  भूलें. घर पर होने के बाद भी अधिकतम समय हाथ धोते रहें. कपड़ों को धोने से डालें तो स्वयं आत्मनिर्भर बनकर. स्वयं के कपड़े खुद पानी में डुबो दें और उस पर डिटॉल छिडक़ दें. ध्यान रहे आपकी यह सावधानी आपके परिवार को अनचाही मुसीबत से बचा सकती है. गर्म पानी पीना और गरारे करने की हिदायत डॉक्टर दे रहे हैं. इसका पालन भी सुनिश्चित करें. जीभ तो हर वक्त स्वाद के लिए बेताब रहती है. स्वयं पर नियंत्रण पाना सीखें. घर पर बना सादा गर्म भोजन करें. बेवजह तफरी करने घर से बाहर ना निकलें. यह आपके हमारे लिए हानिकारक हो सकता है.


कोरोना से बचने के लिए आपकी सर्तकता और सावधानी से आप अपने और अपने परिवार को सुरक्षा कवच देते हैं तो प्रशासन की आप मदद करते हैं. स्वयं पर नियंत्रण कर लेते हैं तो अनावश्क जो काम का भार उन पर पड़ता है, वह बच जाता है. हमारी सुरक्षा के लिए जो एक बड़ा तंत्र तैनात होता है, उस पर बजट भी भारी खर्च होता है. यह बजट आपके हमारे जेब से जाता है. लेकिन हम और आप सावधानी बरतेेंगे तो बजट की राशि कम होती जाएगी और यह बजट हमारे कल्याणकारी दूसरे खर्चो में उपयोग आएगा. घर पर ही अपने ही स्तर पर छोटी-छोटी सावधानी से अस्पतालों में बढ़ती भीड़ से भी मुक्ति मिलेगी. हमारे कोरोना वॉरियर डॉक्टर और पुलिस को अथक मेहनत करना पड़ती है. सो उन्हें भी राहत होगी. अभी कोरोना का दूसरा चरण शुरू ही हुआ है. अभी सम्हल जाएं और खुद को सम्हाल लें. आपकी धडक़न आपके परिवार के लिए महत्वपूर्ण है. सरकार और मुख्यमंत्री एक्शन के मूड में हैं. जो तकलीफ प्रदेशवासियों ने बीते दिनों में हुई है, उसे दुबारा नहीं होना देना चाहते हैं. वे जानते हैं कि कोरोना का इलाज कितना महंगा होता है. जान की कीमत पर पैसा कोई मायने नहीं रखता है लेकिन आर्थिक रूप से परिवार कमजोर हो जाता है. कोरोना को उसके शुरूआती दौर में नहीं रोका गया तो घर, समाज और सरकार आर्थिक तंगहाली से घिर जाते हैं. व्यापार व्यवसाय पर घात होता है और नतीजा फिर हम एक बड़े संकट से घिर जाते हैं. इसलिए जरूरी है कि हम सावधानी बरतें, सर्तकता रखें क्योंकि आप अपने घर परिवार के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं. ध्यान रहे यह बात आपको पता है, कोरोना को नहीं.  

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

मुख्यमंत्री हेल्पलाइन नंबर 1076. जनता से एक कदम और करीब हो गये योगी जी / राजेश सिन्हा

 *CM reaches the doorsteps of the common man*


*The hoardings of CM Helpline 1076 to be put at all the tehsils and police stations*


*If this office is not able to redress your problem, the CM office will help you*


*CM puts redressal of people complaints on 'high priority' list*


*Yogi insists if grievances not heard at local level, call Chief Minister Helpline 1076*


*Directs to make people aware of the complaint redressal system*



 Rajesh Sinha

Lucknow, l 


In a novel way to have direct connect with the people of state, Uttar Pradesh Chief Minister Yogi Adityanath has made access of any aggrieved person easy by opening his office through 1076 helpline in a fresh manner.  


    The CM has directed to put hoardings of 1076 CM Helpline on every Tehsil and Police Station in the first phase to be placed at all the government offices in the next phase thereby signifying that the Chief Minister has reached the doorsteps of the people of the state. Idea is to make people confident that their complaints, grievances and the concerns will be attended to by none other than the Chief Minister. The board will say " if this office is not able to redress your problems, come to us through 1076. The CM office will help You."


      The very thought of throwing open doors of CM office to the common man struck when a random distress call reached CM Yogi and his sensitivity prompted him to put a system in place to attend to the problems of the people, in general. Not before, the CM issued strict directions to the field officers to maintain the efficacy of 'thana diwas' and 'tehsil diwas' with a proper feedback system.


        In his directions, the CM made it clear that iIf the grievances of the public are not redressed properly at police station, tehsil or even district level, they should come to The Chief Minister directly. The CM Helpline number 1076 is there to help any citizen who comes with a genuine problem. 



         

           The CM desired that the 'tahsils' and 'police stations' of all the districts should be sensitised enough to redress the woes of the poor. If not, the officers will be taken to task and the DMs and SPs of the concerned district will be held liable for the lapse. Furthermore, if the complainant is not satisfied with the redressal, then he or she may approach the CM helpline.


     The CM helpline, which the CM wans to be strengthened further in terms of effective monitoring and a robust feedback mechanism, had come into operations from February 13,2018. It is manned by some 250 personnel who receive about 35,000 calls everyday. The complaints received from CM helpline are forwarded to different departments where they belong to. A proper feedback system is in the place to monitor the status of complaints with the instructions that the aggrieved person should be asked about his 'satisfaction level' .


        Out of a total of about 45 lakh complaints lodged on CM helpline, more than 35 lakh have so far been disposed of. The real importance of CM helpline came to fore during Covid times when it was extensively used by the migrants and all those who were in distress. In fact, the local public representatives, DM offices, Asha workers and corporations were all integrated into the system to provide relief to the complainants.

तीन माह में यूपी की करीब 22 हजार पुल पुलियो का होगा जीर्णोद्धार / राजेश सिन्हा


100 दिन में पूरा हो नहरों के पुल-पुलियों का जीर्णोद्धार: सीएम योगी*


*100-150 वर्ष से पुरानी नहरों के पुल-पुलियों के जीर्णोद्धार महाभियान का मुख्यमंत्री ने किया शुभारंभ*


*नहरों पर निर्मित 21542 पुल-पुलियों का होगा पुनर्निर्माण, बनेंगे 3508 का नए पुल व पुलिया*


*जनप्रतिनिधियों करेंगे काम की गुणवत्ता का सत्यापन, होगी सभी की जियो टैगिंग*


राजेश सिन्हा

लखनऊ, 22 फरवरी:l

किसानों की समृद्धि के महत्वपूर्ण आधार 'सिंचाई तंत्र' को उन्नत करने की दिशा में नियोजित काम कर रहे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अब नहरों पर बने पुल-पुलिया के जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया है। प्रदेश में 100-150 साल से भी अधिक पुरानी नहरों पर बने पुल-पुलिया की जर्जर हालत को देखते हुए सीएम ने इनकी मरम्मत और पुनर्निर्माण का महाभियान शुरू किया है। मुख्यमंत्री ने सिंचाई व जल संसाधन विभाग को निर्देश दिए हैं कि इस काम को शीर्ष प्राथमिकता देते हुए को इसे अगले 100 दिन में पूरा कर लिया जाए।


रविवार को मुख्यमंत्री आवास पर आयोजित कार्यक्रम में वर्चुअल माध्यम से सभी सम्बंधित जिलों के जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से संवाद करते हुए सीएम योगी ने कहा कि प्रदेश में नहरों पर लगभग 70,000 पुल-पुलिया निर्मित हैं, जिनमें से लगभग आधी कमोबेश क्षतिग्रस्त हैं। प्रदेश के इतिहास में पहली बार समूचे राज्य की नहरों की क्षतिग्रस्त पुल-पुलियों के जीर्णोद्धार का कार्य एक महा-अभियान के रूप में किया जा रहा है। इस अभियान से आम जन को आवागमन की सुविधा के साथ कृषकों को भी अपने खेत खलिहानों तक पहुंचने में सुविधा होगी। इस महा अभियान में प्रदेश के समस्त जनपदों में नहरों पर स्थित 25,050 क्षतिग्रस्त पुल पुलियों का जीर्णोद्धार एवं पुनर्निर्माण किया जाएगा। इसमें 3508 पुल-पुलियों का नवनिर्माण भी शामिल है। उन्होंने बताया कि इस अभियान के लिए वित्तीय व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई है। 


*दो सदी पुरानी नहरें, आयु पूरी कर जर्जर हो चुके हैं पुल-पुलिया:*

कार्यक्रम में सीएम योगी ने कहा कि उत्तर प्रदेश में मुख्य नहर प्रणालियां 100 वर्षों से भी अधिक पुरानी है। पूर्वी यमुना नहर प्रणाली लगभग 190 वर्ष, ऊपरी गंगा नहर प्रणाली 166 वर्ष, निचली गंगा नहर प्रणाली 142 वर्ष, बेतवा व केन नहर प्रणाली 135 वर्ष, धसान नहर प्रणाली 113 वर्ष एवं शारदा नहर प्रणाली 92 वर्ष पुरानी है। इन पर निर्मित अधिकतर पुल-पुलिया अपनी आयु पूर्ण कर चुके हैं। पुरानी नहर प्रणालियों में पुरानी तकनीकों व तब की आवश्यकता अनुसार पुल बनाए गए थे। बदलते समय के साथ इन पुलों से गुजरने वाले वाहनों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है, वहीं दूसरी ओर वाहनों की क्षमता एवं भार भी बढ़ता गया। नतीजतन, नहरों पर निर्मित पुल क्षतिग्रस्त होते चले गए। यही नहीं, मुख्यमंत्री में पिछली सरकारों द्वारा जन महत्व के इस विषय पर ध्यान न देने पर आश्चर्य भी जताया। उन्होंने कहा कि कृषकों की इस समस्या को क्षेत्रीय प्रतिनिधियों द्वारा हर मंच , पर उठाया जाता रहा है। ऐसे में राज्य सरकार इसे अभियान का रूप देते हुए मिशन मोड में काम करने जा रही है। 


*मौके पर जाएं, गुणवत्ता परखें, कमी हो तो दें जानकारी:* आगरा, मथुरा, रामपुर, सिद्धार्थनगर, बिजनौर आदि जिलों के विभिन्न सांसद-विधायकगणों से संवाद करते हुए सीएम योगी ने कहा कि सभी जनप्रतिनिधि अपने-अपने क्षेत्रों में हो रहे निर्माण कार्यों, जीर्णोद्धार कार्यों की सतत मॉनिटरिंग करते रहें। काम की गुणवत्ता परखें, अगर कहीं गड़बड़ी या कमी दिखे तो उसकी जानकारी दें। तत्काल कार्यवाही कराई जाएगी। जनप्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री के इस अभियान को ऐतिहासिक बताया। 


*120 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षमता का हुआ सृजन:*

जल शक्ति मंत्री डॉ.महेंद्र सिंह ने खेती के लिए सिंचाई के महत्व की चर्चा करते हुए पुल-पुलिया जीर्णोद्धार कार्य के लिए मुख्यमंत्री का आभार जताया। विभागीय मंत्री ने बताया कि प्रदेश के कृषक को कृषि उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग द्वारा सिंचाई हेतु 74,659 किमी लम्बी नहरों एवं 34401 नलकूपों का निर्माण किया गया है, जिससे एक करोड़ बीस लाख हेक्टेयर सिंचाई की क्षमता सृजित की गई है। अब 25 हजार से अधिक पुल-पुलियों के जीर्णोद्धार का ऐतिहासिक काम शुरू हो रहा है। डॉ. महेंद्र ने मुख्यमंत्री को विश्वास जताया कि नहरों के जीर्णोद्धार का काम अगले 100 दिनों ने पूर्ण कर लिया जाएगा। अपर मुख्य सचिव टी. व्यंकटेश ने मुख्यमंत्री को विभागीय गतिविधियों की अद्यतन प्रगति से अवगत कराया। कार्यक्रम में जल शक्ति राज्य मंत्री बलदेव सिंह औलख ने आभार ज्ञापन किया।

आज़मगढ़ के प्रकाश स्तंभ हैँ प्रकाश सिंह

 माटी के लाल आजगढ़ियों की तलाश में

पुलिस सुधार में अद्वितीय योगदान देने वाले प्रकाश सिंह को पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है.. 

@ अरविंद सिंह

आजमगढ़ एक खोज़.. 

प्रकाश सिंह एक सेवानिवृत्त भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी हैं, जो पुलिस महानिदेशक (DGP) के उच्चतम पद तक पहुंचे। उन्होंने सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ), उत्तर प्रदेश पुलिस और असम पुलिस के प्रमुख के रूप में भी कार्य किया है।  उन्हें भारत में पुलिस सुधारों के प्रमुख वास्तुकार के रूप में भी जाना जाता है. उनकी यह भूमिका उन्हें एक श्रेष्ठ पुलिस अधिकारी के रूप में ख्याति देती है। 1996 में सेवानिवृत्त के बाद, उन्होंने भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की। पीआईएल का ऐतिहासिक फैसला 2006 में आया था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को विशिष्ट निर्देश दिए हैं कि-"वे पुलिस में संरचनात्मक परिवर्तन करें और उस पर बाहर के दबाव( राजनीतिक) से मुक्त कर, उसे लोगों के प्रति जवाबदेह बनाएं"


व्यक्तिगत जीवन :-


श्री सिंह का जन्म 10 जनवरी 1936 को भारत के उत्तर प्रदेश के मेहनाजपुर आज़मगढ़ जिले के पास एक छोटे से गाँव में हुआ था और वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण किए. उनका विवाह सावित्री सिंह से हुआ जिनसे दो पुत्र हुएं। उनके बड़े बेटे पंकज कुमार सिंह राजस्थान कैडर (1988 बैच) के आईपीएस अधिकारी हैं, जबकि उनका छोटा बेटा पीयूष कुमार सिंह अमेरिका में एक आईटी कंपनी का सीईओ हैं। वर्तमान में वह अपनी पत्नी के साथ नोएडा में रहते हैं।


कैरियर :-

प्रकाश सिंह 1959 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के भारतीय पुलिस सेवा अधिकारी हैं. जो अपने बैच के टापर रहे हैं। IPS अधिकारी के रूप में उनकी पहली पोस्टिंग सहायक पुलिस अधीक्षक, कानपुर (ASP कानपुर) के रूप में हुई थी


 पोस्ट रिटायरमेंट गतिविधियाँ :-


भारतीय पुलिस फाउंडेशन और संस्थान के वर्तमान अध्यक्ष। 

एसोसिएट फेलो, संयुक्त विशेष संचालन विश्वविद्यालय।

2016 में हरियाणा जाट आरक्षण आंदोलन की जांच अधिकारी नियुक्त हुएं.

सदस्य, 2013-2014 के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड।

सदस्य, 2008 में चरमपंथी प्रभावित क्षेत्रों में चुनौतियों का अध्ययन करने के लिए योजना आयोग के विशेषज्ञ समूह।

2007-2008 के बीच यूपी में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा डी-क्रिमिनल राजनीति के लिए गठित समिति के अध्यक्ष।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 2006 में पुलिस सुधार के लिए पुलिस बलों को बहाल करने की उनकी याचिका पर आदेश दिए।

2004 में नक्सलियों द्वारा एन० चंद्रबाबू नायडू की हत्या के प्रयास की जांच के लिए जांच आयोग का नेतृत्व किया। 

अखिल भारतीय सिविल सेवा अधिकारियों के चयन में विशेषज्ञ के रूप में संघ लोक सेवा आयोग की सेवा।


प्रकाश सिंह समितियां :-

सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें दो मौकों पर जांच कमेटियों का प्रमुख बनाया गया।

फरवरी 2016 में उन्हें हरियाणा सरकार में हरियाणा में जाट आरक्षण के दौरान नागरिक प्रशासन और पुलिस के अधिकारियों की भूमिका पर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए हरियाणा सरकार द्वारा नियुक्त किया गया था। आंदोलन के परिणामस्वरूप 30 जिलों का नुकसान हुआ, राष्ट्रीय राजमार्गों की नाकाबंदी, 20,000 करोड़ रुपये के लगभग कई जिलों में सार्वजनिक और निजी संपत्तियों को नुकसान हुआ।  80 सरकारी अधिकारियों को दर्शाते हुए 451 पृष्ठों की रिपोर्ट, 71 दिनों की रिकॉर्ड अवधि में प्रस्तुत कर दिया।

2003 में, आंध्र प्रदेश सरकार ने उन्हें 1 अक्टूबर 2003 को चित्तूर जिले के तिरुमाला घाट रोड पर खदान विस्फोट की घटना की जांच करने के लिए कहा था, जिसमें नक्सलियों ने राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री एन०चंद्रबाबू नायडू पर जानलेवा हमला किया था.उनके द्वारा 6 फरवरी 2004 को एक व्यापक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। 


एक लेखक के रूप में निम्नलिखित पुस्तकें लिखी हैं..... 


०अनियमित युद्ध: भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए माओवादी चुनौती- संयुक्त विशेष संचालन विश्वविद्यालय(2014) 

०भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र: द फ्रंटियर इन फेरमेंट- संयुक्त विशेष संचालन विश्वविद्यालय(2008) 

०हिस्टॉयर डू नक्सलवाद (फ्रेंच )-लेस निप्स रूज (2003) 

०कोहिमा टू कश्मीर: ऑन द टेररिस्ट ट्रेल- रूपा एंड कंपनी (2001) 

०प्रकाश सिंह; संयुक्त राष्ट्र विभाग की सेना; विदेशी सैन्य अध्ययन कार्यालय (2000):भारत में आपदा प्रतिक्रिया- पुस्तक एक्सप्रेस प्रकाशन।

०भारत में नक्सली आंदोलन-रूपा एंड कंपनी (1995)

०नागालैंड: नेशनल बुक ट्रस्ट (1972) 


पुरस्कार :-


प्रकाश सिंह को सिविल सेवा में उनके योगदान के लिए वर्ष 1991 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।  उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा राज्य पुरस्कार, मेधावी सेवा के लिए पुलिस पदक और विशिष्ट सेवा के लिए पुलिस पदक से भी सम्मानित किया गया है।

पोदीना | पुदीना | Mint* से घरेलू उपचार

 *पुदीना से सरल सफल कारगर उपचार |*/ कृष्ण मेहता 


*🌹घरेलू चिकित्सा के महानायक 'अग्रज तुल्य गुरु श्री गोविंद शरण प्रसाद जी 9958148111'🌹के ज्ञान को संग्रहित कर आप सभी के बीच 'मैं दीपक आर्य व परम् मित्र अरुण आर्य' आप सभी से विनती करता हूँ आज व अभी से श्री राजीव दीक्षित जी को सुनना प्रारम्भ करें व अपने जीवन को धन्य बनायें व राष्ट्र हित में इस ज्ञान को अवश्य पढ़ें व औरों में बाँटें।🌹*


*भारत के लगभग सभी प्रदेशों में पोदीना उगाया जाता है। पोदीने में अधिक तेज खुशबू होती है। पोदीने की चटनी अच्छी बनती है। पोदीने का उपयोग कढ़ी में और काढ़ा बनाने में किया जाता है। दाल-साग आदि में भी इसका प्रयोग किया जाता है। यदि हरा व ताजा पोदीना उपलब्ध न हो तो उसके पत्तों को सुखाकर उपयोग में लाया जा सकता है। पोदीने में से रस निकाला जाता है। पोदीने की जड़ को जमीन में बोकर पोदीने की उत्त्पति की जाती है। पोदीना किसी भी मौसम में उगाया जा सकता है। घरों के बाहर लॉन में, बड़े गमलों में पोदीने को उगा सकते हैं। पोदीने के पत्तों से भीनी-भीनी सुगंध आती है।*


*पुदीना के गुण :- पोदीना भारी, मधुर, रुचिकारी, मलमूत्ररोधक, कफ, खांसी, नशा को दूर करने वाला तथा भूख को बढ़ाने वाला है। यह हैजा, संग्रहणी (अधिक दस्त का आना), अतिसार (दस्त), कृमि (कीड़े) तथा पुराने बुखार को दूर करने वाला होता है। यह मन को प्रसन्न करता है, हृदय और गुर्दे के दोषों को दूर करता है, हिचकियों को रोकता है, बादी को समाप्त करता है, पेशाब और पसीना लाता है, बच्चा होने में सहायता करता है, इसके सूंघने से बेहोशी दूर हो जाती है। पोदीना अजीर्ण (अपच), मुंह की बदबू, गैस की तकलीफ, हिचकी, बुखार, पेट में दर्द, उल्टी, दस्त, जुकाम, खांसी आदि रोगों में लाभदायक होता है। पोदीना का प्रयोग अर्क (रस) सूप, पेय के रूप में किया जाता है। यह चेहरे के सौंदर्य को बढ़ाने वाला, त्वचा की गर्मी दूर करने वाला, रोगों के कीटाणुओं को नष्ट करने वाला और दिल को ठंडक पहुंचाने वाला है। यह जहरीले कीड़ों के काटने पर और प्रसूति ज्वर में भी लाभकारी होता है।*


*सेवन की मात्रा : 6 ग्राम पोदीने का सेवन कर सकते हैं। पोदीने के पत्तों का रस 10 से 20 मिलीलीटर तेल में 1 से 3 बूंद तक ले सकते हैं।*


*जब पुदीने का चूर्ण उपयोग करना पड़े तो लगभग 6 ग्राम , अगर रस उपलब्ध हो तो 10 से 20 ml तक व अगर पुदीने का तेल उपलब्ध हो तो 1बून्द से 3 बून्द तक ले सकते हैं।*


*•गले की सभी समस्याओं से बचाव हेतु सेवन करें पुदीने के इस योग को:- 5-5 ग्राम पोदीना सत्व, लोहबान और अजवायन सत्व, 5 ग्राम कपूर, 5 ग्राम हींग चूर्ण, 5 ग्राम हल्दी चूर्ण को 25 ग्राम शहद में मिलाकर एक साफ शीशी में भरकर रख लें, फिर पान के पत्ते में चूना-कत्था लगाकर शीशी में से 4 बूंदे इस पत्ते में डालकर खाने से गले के सभी रोग (सूजन,जलन,चुभन,दर्द,खुजली,छाले,रसौलि, आवाज,टॉन्सिल,इत्यादि) नस्ट होता है।*


*गले की समस्या में आप अभी दो दो चुटकी हल्दी,कालीमिर्च या 6  7 पुदीना के पत्ते या धनिया या एक चुटकी फिटकिरी को एक कप पानी मे उबालकर गरारे करें व पियें 3  4 बार करें खट्टे व ठंडे का पूर्णतः परहेज रखें।*


*•निम्नरक्तचाप (लो ब्लडप्रेशर) हेतु 50 ग्राम पोदीने को पीसकर उसमें स्वाद के अनुसार सेंधानमक, हरा धनिया और कालीमिर्च को डालकर चटनी के रूप में सेवन करना चाहिए।*


*•गठिया के रोगी (मूत्रावरोध के कारण) को पोदीने का काढ़ा बनाकर पीलाने से पेशाब खुलकर आता है और गठिया रोग में नस्ट होता है।*



*•पुदीना के रस को शहद के साथ पन्द्रह दिनों तक सुबह शाम सेवन करने से पीलिया रोग नस्ट होता है*


*•शराब के अंदर पुदीने की पत्तियों को पीसकर चेहरे पर लगाने से चेहरे के दाग, धब्बे, झांई सब मिट जाते हैं और चेहरा भी चमक उठता है।*


*•हरे पोदीने को पीसकर कम से कम 20 मिनट तक चेहरे व त्वचा पर लगाने से चेहरे व त्वचा की गर्मी समाप्त हो गर्मी से उतपन्न रोग भी नस्ट हो जाती है।*

छालो से पाए राहत

 ☘️ *_मुंह में छाले होने पर ये चीजें खाएं, मिलेगी राहत_* 


*Dr Rao P Singh*

प्रस्तुति - संत शरण  / अम्मी शरण के साथ रीना शरण 


मुंह में छाले हो जाने की समस्या बेहद आम है और हम सभी को अक्सर इस समस्या का सामना करना पड़ता है.


 *इसका कारण -*

● हमारा खान-पान और पेट की खराबी.

● कब्ज या पेट में गर्मी होना.

● धूम्रपान की बढ़ती आदत.

● ये किसी बीमारी के कारण भी हो सकते हैं.


 *इस बात पर ध्यान दें*

इस स्थिति में जरूरी होता है कि हम सही खान-पान को चुनें. ताकि मुंह के छालों से परेशानी भी ना हो और पोषण की कमी के कारण कमजोरी भी ना आए.


 *ये चीजें खाने से करें परहेज*

● मसालेदार और डीप फ्राइड तीखा खाना खाने से परहेज करें. 

● चिप्स और नमकीन जैसी चीजें ना खाएं. 

● कोशिश करें कि मुंह ठीक होने तक आलू से बनी चीजें ना खाएं.


 *क्या पीना है और क्या नहीं!*

● जलजीरा पानी या कॉक जैसे पेयपदार्थ लेंगे तो इनसे छालों में तेज जलन या चुभन हो सकती है.

● आपको बहुत खट्टी चीजें ट्राई करने से बचना चाहिए. 

● आप मीठी छाछ और लस्सी पी सकते हैं. इनसे लाभ होगा.


 *इन्हें खाने से लाभ होगा*

● ठंडा दूध पिएं. 

● मुंह में छाले होने पर फाइबर युक्त भोजन करें. 

● दलिया जरूर खाएं. नमकीन दलिया खाने में समस्या हो तो मीठा (दूध में बना) दलिया खाएं. 

● हल्के नमक वाली पतली खिचड़ी या ताहिरी खाएं.


 *मिलेगी ठंडक*

● रात को पानी में भिगोकर रखे गए छुआरे खाएं. 

● बेल और आंवले का मुरब्बा खाएं. इन चीजों से पेट में ठंडक बढ़ेगी.


वंदे मातरम 🇮🇳

स्वस्थ और सबल भारत 


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शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

गुर्दे की सूजन (Bright disease nephritis)* आसान उपचार

 *गुर्दे की सूजन (Bright disease nephritis)*


प्रस्तुति - कृष्ण मेहता


         *कभी-कभी गुर्दे में खराबी के कारण गुर्दे (वृक्क) अपने सामान्य आकार से बड़े हो जाते हैं और उसमें दर्द होता है। इस तरह गुर्दे को फूल जाने को गुर्दे की सूजन कहते हैं। इसमें दर्द गुर्दे के स्थान से चलकर कमर तक फैल जाता है।*


        *गुर्दे रोगग्रस्त होने से रोगी का पेशाब पीले रंग का होता है। इस रोग से पीड़ित रोगी का शरीर भी पीला पड़ जाता है, पलके सूज जाती हैं, पेशाब करते समय कष्ट होता है, पेशाब रुक-रुककर आता, कभी-कभी अधिक मात्रा में पेशाब आता, पेशाब के साथ खून आता है और पेशाब के साथ धातु आता (मूत्रघात) है। इस रोग से पीड़ित रोगी में कभी-कभी बेहोशी के लक्षण भी दिखाई देते हैं।*


*गुर्दे की सूजन से पीड़ित रोगी को भोजन करने के बाद तुरन्त पेशाब करना चाहिए। इससे गुर्दे की बीमारी, कमर दर्द, जिगर के रोग, गठिया, पौरुष ग्रंथि की वृद्धि आदि अनेक बीमारियों से बचाव होता है।*

*ज्यादा मात्रा में दूध, दही, पनीर व दूध से बनी कोई भी वस्तु न खाएं। इस रोग से पीड़ित रोगी को ज्यादा मांस, मछली, मुर्गा, ज्यादा पोटेशियम वाले पदार्थ, चॉकलेट, काफी, दूध, चूर्ण, बीयर, वाइन आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।*

*इस रोग में सूखे फल, सब्जी, केक, पेस्ट्री, नमकीन, मक्खन आदि नहीं खाना चाहिए।*

*औषधियों से उपचार-*


*1. फिटकरी : भुनी हुई फिटकरी 1 ग्राम दिन में कम से कम 3 बार लेने से गुर्दे की सूजन दूर होती है।*


*2. दालचीनी : दालचीनी खाने से गुर्दे की बीमारी मिटती है।*


*3. सत्यानाशी : सत्यानाशी का दूध सेवन करने से गुर्दे का दर्द, पेशाब की परेशानी आदि दूर होती है।*


*4. तुलसी : छाया में सुखाया हुआ 20 ग्राम तुलसी का पत्ता, अजवायन 20 ग्राम और सेंधानमक 10 ग्राम को पीसकर चूर्ण बना लें और यह चूर्ण प्रतिदिन सुबह-शाम 2-2 ग्राम की मात्रा में गुनगुने पानी के साथ लें। इसके सेवन से गुर्दे की सूजन के कारण उत्पन्न दर्द व बैचनी दूर होती है।*


*5. नारंगी : सुबह नाश्ते से पहले 1-2 नांरगी खाकर गर्म पानी पीना चाहिए या नारंगी का रस पीना चाहिए। इससे गुर्दे की सूजन व अन्य रोग ठीक होता है। नारंगी गुर्दो को साफ रखने में उपयोगी होता है। गुर्दे के रोग में सेब और अंगूर का उपयोग करना भी लाभकारी होता है। गुर्दो को स्वस्थ रखने के लिए सुबह खाली पेट फलों का रस उपयोग करें।*


*6. गाजर : गुर्दे के रोग से पीड़ित रोगी को गाजर के बीज 2 चम्मच 1 गिलास पानी में उबालकर पीना चाहिए। इससे पेशाब की रुकावट दूर होती है और गुर्दे की सूजन दूर होती है।*


*7. बथुआ : गुर्दे के रोग में बथुआ फायदेमन्द होता है। पेशाब कतरा-कतरा सा आता हो या पेशाब रुक-रुककर आता हो तो इसका रस पीने से पेशाब खुलकर आने लगता है।*


*8. अरबी : गुर्दे के रोग और गुर्दे की कमजोरी आदि को दूर करने के लिए अरबी खाना फायदेमन्द होता है।*


*9. तरबूज : गुर्दे के सूजन में तरबूज खाना फायदेमन्द होता है।*


*10. ककड़ी : गाजर और ककड़ी या गाजर और शलजम का रस पीने से गुर्दे की सूजन, दर्द व अन्य रोग ठीक होते हैं। यह मूत्र रोग के लिए भी लाभकारी होता है।*


*12. आलू : गुर्दे के रोगी को आलू खाना चाहिए। इसमें सोडियम की मात्रा बहुत पायी जाती है और पोटेशियम की मात्रा कम होती है।*


*13. चंदन : चंदन के तेल की 5 से 10 बूंद बताशे पर डालकर दूध के साथ प्रतिदिन 3 बार खाने से गुर्दे की सूजन दूर होती है और दर्द शान्त होता है।*


*14. सिनुआर : सिनुआर के पत्तों का रस 10 से 20 मिलीलीटर सुबह-शाम खाने से गुर्दे की सूजन मिटती है। साथ ही सिनुआर, करन्ज, नीम और धतूरे के पत्तों को पीसकर हल्का गर्म करके गुर्दे के स्थान पर बांधने से लाभ मिलता है।*


15. हुरहुर : पीले फूलों वाली हुरहुर के पत्तों को पीसकर नाभि के बाएं व दाएं तरफ लेप करने से फायदा होता है।


16. कलमीशोरा : कलमीशोरा लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग से लगभग 1 ग्राम की मात्रा में गोखरू के काढ़े के साथ मिलाकर सुबह-शाम पीने से लाभ मिलता है। यह गुर्दे की पथरी के साथ होने वाले दर्द को दूर करता है।


17. आम : प्रतिदिन आम खाने से गुर्दे की कमजोरी दूर होती है।


18. मकोय : मकोय का रस 10-15 मिलीलीटर की मात्रा में प्रतिदिन सेवन करने से पेशाब की रुकावट दूर होती है। इससे गुर्दे और मूत्राशय की सूजन व पीड़ा दूर होती है।


19. जंगली प्याज : कन्द का चूर्ण, ककड़ी के बीज और त्रिफला का चूर्ण बराबर मात्रा में मिलाकर आधा चम्मच दिन में 2 बार सुबह-शाम प्रतिदिन खिलाने से गुर्दे के रोग में आराम मिलता है।


*20. मूली :गुर्दे की खराबी से यदि पेशाब बनना बन्द हो गया हो तो मूली का रस 20-40 मिलीलीटर दिन में 2 से 3 बार पीना चाहिए।पेशाब में धातु का आना (मूत्राघात) रोग में मूली खाना लाभकारी होता है। मूली के पत्तों का रस 10-20 मिलीलीटर और कलमीशोरा का रस 1-2 मिलीलीटर को मिलाकर रोगी को पिलाने से पेशाब साफ आता है और गुर्दे की सूजन दूर होती है। प्रतिदिन आधा गिलास मूली का रस पीने से पेशाब के समय होने वाली जलन और दर्द दूर होता है।*

*21. अडूसा (वासा) : अडूसे और नीम के पत्ते को गर्म करके नाभि के निचले भाग पर सिंकाई करें और अडूसे के पत्तों का 5 मिलीलीटर रस व शहद 5 ग्राम मिलाकर पीने से गुर्दे के भयंकर दर्द तुरन्त ठीक होता है।*


*22. पान : पान का सेवन करने से गुर्दे की सूजन व अन्य रोग में लाभ मिलता है।*


*23. पुनर्नवा : पुनर्नवा के 10 से 20 मिलीलीटर पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फल और फूल) का काढ़ा सेवन करने से गुर्दे के रोगों में बेहद लाभकारी होता है।*


*24. नींबू :नींबू के पेड़ की जड़ का चूर्ण 1 ग्राम पानी के साथ दिन में 2 बार सेवन करने से गुर्दे की बीमारी में लाभ मिलता है।लौकी के टुकड़े-टुकड़े करके गर्म करके दर्द वाले जगह पर रखने और इसके रस से मालिश करने से गुर्दे का दर्द जल्द ठीक होता है।*

*25. लौकी : लौकी के रस से गुर्दे वाले स्थान पर मालिश करने और पीस करके लेप करने से गुर्दे का दर्द तुरन्त कम हो जाता है।*


*26. अंगूर : अंगूर की बेल के 30 ग्राम पत्ते को पीसकर नमक मिले पानी में मिलाकर पीने से गुर्दे का दर्द ठीक होता है।*


*27. अपामार्ग : अपामार्ग की 5-10 ग्राम ताजी जड़ को पानी में घोलकर गुर्दे के दर्द से पीड़ित रोगी को पिलाने से दर्द में तुरन्त आराम मिलता है। यह औषधि मूत्राशय की पथरी को टुकड़े-टुकड़े करके निकाल देती है।*


*28. एरण्ड : एरण्ड की मींगी को पीसकर गर्म करके गुर्दे वाले स्थान पर लेप करने से गुर्दे की सूजन व दर्द ठीक होता है।*

माँ नर्मदा जल पावन पवित्र / संजीव आचार्य

 स्कंद पुराण में कहा गया है कि 'त्रिभिः सारस्वतं पुण्यं समाहेन तु यामुनम्‌। साद्यः पुनाति गांगेयं दर्शनादेव नर्मदा॥'यानी संसार में सरस्वती का जल 3 दिन में, यमुना का जल 7 दिन में तथा गंगा मात्र स्नान से जीव को पवित्र कर देती है, किंतु नर्मदा जल के दर्शन मात्र से जीव सभी पापों से मुक्त हो जाता है। पतित पावनी माँ नर्मदा की महिमा अनंत है। पुण्यसलिला माँ नर्मदा, माता गंगा से भी प्राचीन है। 


स्कंद पुराण में कहा गया है कि 'गंगा कनखले पुण्या कुरुक्षेत्रे सरस्वती। ग्रामे वा यदि वाऽरण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा॥' यानी गंगा कनखल (हरिद्वार) में पुण्य देने वाली है। पश्चिम में सरस्वती पुण्यदा है। दक्षिण में गोदावरी पुण्यवती है और नर्मदा सब स्थानों में पुण्यवती और पूजनीय है। भारत में वैसे तो अनेक पुण्यप्रदाता नदियाँ हैं पर उनका स्थान विशेष पर महत्व है। उदाहरणार्थ गंगा हरिद्वार, प्रयाग, काशी और गंगासागर में पुण्यदेने वाली मानी जाती है। 


सरस्वती नदी तो अब लोप हो चुकी है। गोदावरी का नासिक में महत्वपूर्ण तीर्थ है। लेकिन नर्मदा पग-पग पर पूजनीय है। नर्मदा की उत्पत्ति के बारे में शास्त्र कहते हैं कि भगवान शिव और शक्तिस्वरूपा माता पार्वती के बीच हास-परिहास से उत्पन्न पसीने की बूँदों से माता नर्मदा का जन्म हुआ। भगवान शिव की इला नामक कला ही नर्मदा है। 


आदि सतयुग में शिवजी समस्त प्राणियों से अदृश्य होकर 10 हजार वर्षों तक ऋष्य पर्वत विंध्याचल पर तपस्या करते रहे। उसी समय शिव-पार्वती परिहास से उत्पन्न पसीने की बूँदों से एक परम सुंदरी कन्या उत्पन्न हो गई। उस कन्या ने सतयुग में 10 हजार वर्ष तक भगवान शंकर का तप किया। भगवान शंकर ने तपस्या से प्रसन्न होकर कन्या को दर्शन देकर वर माँगने हेतु कहा। कन्या (श्री नर्मदाजी) ने हाथ जोड़कर भगवान शंकर से वर माँगते हुए कहा- 'मैं प्रलयकाल में भी अक्षय बनी रहूँ तथा मुझमें स्नान करने से सभी श्रद्धालु पापों से मुक्त हो जाएँ। 


मैं संसार में दक्षिणगंगा के नाम से देवताओं से पूजित होऊँ। पृथ्वी के सभी तीर्थों के स्नान का जो फल होता है वह भक्तिपूर्वक मेरे दर्शनमात्र से हो जाए। ब्रह्महत्या जैसे पापी भी मुझमें स्नान करने से पापमुक्त हो जाएँ।' भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर कहा- 'हे कल्याणी पुत्री! जैसा वरदान तूने माँगा है, वैसा ही होगा और सभी देवताओं सहित मैं भी तुम्हारे तट पर निवास करूँगा। इसी कारण भारतवर्ष में केवल नर्मदा की ही प्रदक्षिणा की जाती है।' 


मध्यप्रदेश के शहडोल जिले के अमरकंटक क्षेत्र से नर्मदाजी प्रकट हुईं। यह स्थान जहाँ नर्मदाजी का जन्म हुआ, वहाँ आमों के वृक्षों के नीचे एक छोटे से कुंड में से नर्मदाजी का जल गौमुखी धार होकर प्रकट हुआ है। यह कुछ दूरी पर जाकर एक कुंड में विलीन हो जाता है, जिसे माई की बगिया के नाम से जाना जाता है। वहाँ से 5-6 कि.मी. दूर अमरकंटक में एक कुंड से कपिलधारा के रूप में द्रुतगति से नर्मदा प्रवाहित होती हैं। 


माँ नर्मदा पौराणिक दृष्टि से तो सदैव पूजनीय हैं और नर्मदा में पाए जाने वाले पत्थर-कंकर का भी भक्तगण शंकर के रूप में ले जाकर श्रद्धा के साथ पूजन-अभिषेक करते हैं, इसीलिए तो शास्त्रों में कहा गया है कि 'नर्मदा के जितने कंकर, उतने सब शंकर'। नर्मदाजी के पूजन-अभिषेक के साथ-साथ इसकी प्रदक्षिणा भी अपना विशेष महत्व रखती है। हजारों भक्तगण परिवार के सुखों के लिए नर्मदाजी से माँगी गई मनौती की पूर्णता हेतु इसकी 1680 कि.मी. प्रदक्षिणा 3 वर्ष 3 माह 13 दिन में पैदल चलकर व संत रूप धारण कर पूर्ण करते हैं। 


माँ नर्मदा के नाम से परिक्रमावासी प्रतिदिन 5 गृहस्थों से भिक्षावृत्ति कर प्रदक्षिणा करते हैं। नर्मदाजी की 113 सहायक नदियाँ हैं। इसके मार्ग में 5 जल प्रपात, 25 पक्के घाट हैं। ओंकारेश्वर माँ नर्मदाजी का नार्थ कमल (मध्य) भाग है। 12 ज्योतिर्लिंगों में एक ओंकार-अमलेश्वर ज्योतिर्लिंग नर्मदा किनारे ही विराजमान है। 


रेवा कुंड : मांडूगढ़ की रानी रूपमती तो नर्मदाजी के दर्शन के बिना भोजन नहीं करती थी। इसलिए राजा ने रानी रूपमती का महल ऊँचा बनवाकर नर्मदा-दर्शन की व्यवस्था कराई। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर वहाँ एक कुंड में प्रकट होकर माँ ने रानी की इच्छा पूर्ण की। सैकड़ों वर्षों के बाद भी इस रेवा कुंड में नर्मदाजी विराजमान हैं।

आज़मगढ़ एक खोज / अरविंद सिंह

 माटी के लाल आज़मियों की तलाश में.. 

सैय्यद सिब्त- ए- हसन, पाकिस्तान के प्रख्यात विद्वान पत्रकार और राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में देश में बड़ी रेखा खींची.. 

@ अरविंद सिंह

आजमगढ़ एक खोज.. 


सैयद सिब्त-ए-हसन (31 जुलाई 1916 - 20 अप्रैल 1986) पाकिस्तान के प्रख्यात विद्वान, पत्रकार और राजनीतिक कार्यकर्ता थे। उन्हें पाकिस्तान में समाजवाद और मार्क्सवाद के अग्रदूतों में से एक माना जाता है. उन्होंने प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन की भावना का प्रसार किया है। 


जीवन परिचय :-

सिब्ते हसन का जन्म 31 जुलाई 1916 को अंबारी , आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश, भारत में हुआ था। अपने कॉलेज के दिनों में उनके शिक्षकों में अमरनाथ झा और फिराक गोरखपुरी जैसे बड़े लोग थे, दोनों भारत के महानतम बुद्धिजीवियों में थे जिन्हें देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक पुरस्कार पद्म भूषण मिल चुके हैं. सिब्त-षए- हसन ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से स्नातक किया। उच्च अध्ययन के लिए, वह कोलंबिया विश्वविद्यालय, यूएस गए। 1942 में, सिब्ते हसन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए। भारत के विभाजन के बाद, वह 1948 में लाहौर, पाकिस्तान चले गए। उन्होंने प्रसिद्ध पत्रिकाओं 'नया अदब' और 'लैल- ओ-नेहर' के संपादक के रूप में भी काम किया। भारत में एक सम्मेलन से लौटने के दौरान 20 अप्रैल 1986 को नई दिल्ली में दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। उसे कराची में दफनाया गया था। उनका सबसे उल्लेखनीय काम 'मूसा से मार्क्स तक' है। 


महत्वपूर्ण कार्य :- 

"मूसा से मार्क्स तक"-

कई दशकों तक, पाकिस्तान की वामपंथी राजनीति के कार्यकर्ताओं और छात्रों के लिए 'मूसा से मार्क्स तक' मौलिक मार्गदर्शक ग्रंथ के रूप में था। 


'शेहर-ए-निगारान', :-

'माजी के मजा़र' :-

ये पुस्तके पाकिस्तान में मुख्य तहज़ीब का इरतिका है, हसन ने पाकिस्तानी लोगों के इतिहास और देश जुड़ी जानकारी को आर्थिक आधार पर लिखा था। यह उस इतिहास के विपरीत कार्य है जो शासकों और राजाओं को मिलाता है। 


इंक़लाब-ए-ईरान :-

नावेद-ए-फ़िक्र:-

अफ्कार-ए-तजा (यह  देश के महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों पर आलोचनात्मक निबंधों और विभिन्न विचारों पर आलोचकों के जवाबों से युक्त एक पुस्तक है)

अदब और रोशन खयाली :

सुखनदार सुखन :

पाकिस्तान में विचारों का संघर्ष :

भगत सिंह हमारे साथी क्यों :

मार्क्स और मशरिक (उन्होंने समाज की पूर्वी परंपराओं और गठन पर मार्क्स और एंगेल्स के विचारों का विश्लेषण किया

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

तीसरी हँसी

 *देवदूत की हंसी*/ कृष्ण meht


*मृत्यु के देवता ने अपने एक दूत को भेजा पृथ्वी पर। एक स्त्री मर गयी थी, उसकी आत्मा को लाना था। देवदूत आया, लेकिन चिंता में पड़ गया। क्योंकि तीन छोटी-छोटी लड़कियाँ जुड़वाँ – एक अभी भी उस मृत स्त्री के शव से लगी है। एक चीख रही है, पुकार रही है। एक रोते-रोते सो गयी है, उसके आँसू उसकी आँखों के पास सूख गए हैं – तीन छोटी जुड़वाँ बच्चियाँ और स्त्री मर गयी है, और कोई देखने वाला नहीं है। पति पहले मर चुका है। परिवार में और कोई भी नहीं है। इन तीन छोटी बच्चियों का क्या होगा?*


*उस देवदूत को यह खयाल आ गया, तो वह खाली हाथ वापस लौट गया। उसने जाकर अपने प्रधान को कहा - मैं न ला सका, मुझे क्षमा करें, लेकिन आपको स्थिति का पता ही नहीं है। तीन जुड़वाँ बच्चियाँ हैं–छोटी-छोटी, दूध पीती। एक अभी भी मृत मां से लगी है, एक रोते-रोते सो गयी है, दूसरी अभी चीख-पुकार रही है। हृदय मेरा ला न सका। क्या यह नहीं हो सकता कि इस स्त्री को कुछ दिन और जीवन दे दिया जाएं? कम से कम लड़कियां थोड़ी बड़ी हो जाएं। और कोई देखने वाला नहीं है।*


*मृत्यु के देवता ने कहा - तो तू फिर समझदार हो गया; उससे ज्यादा, जिसकी इच्छा से मृत्यु होती है, जिसकी इच्छा से जीवन होता है! तो तूने पहला पाप कर दिया, और इसकी सज़ा मिलेगी। और सज़ा यह है कि तुझे पृथ्वी पर चले जाना पड़ेगा। और जब तक तू तीन बार न हँस लेगा अपनी मूर्खता पर, तब तक वापस न आ सकेगा।*


*इसे थोड़ा समझना। तीन बार न हँस लेगा अपनी मूर्खता पर – क्योंकि दूसरे की मूर्खता पर तो अहंकार हँसता है। जब हम अपनी मूर्खता पर हँसते हैं तब अहंकार टूटता है।*


*देवदूत को लगा नहीं। वह राज़ी हो गया दंड भोगने को, लेकिन फिर भी उसे लगा कि सही तो मैं ही हूँ। और हँसने का मौका कैसे आएगा?*


*उसे जमीन पर फेंक दिया गया। सर्दियों के दिन करीब आ रहे थे। एक मोची बच्चों के लिए कोट और कंबल खरीदने शहर गया था। जब वह शहर जा रहा था तो उसने राह के किनारे एक नंगे आदमी को पड़े हुए, ठिठुरते हुए देखा। यह नंगा आदमी वही देवदूत है जो पृथ्वी पर फेंक दिया गया था। उसको दया आ गयी। और बजाय अपने बच्चों के लिए कपड़े खरीदने के, उसने इस आदमी के लिए कंबल और कपड़े खरीद लिए। इस आदमी को कुछ खाने-पीने को भी न था, घर भी न था, छप्पर भी न था जहाँ रुक सके।* 


*मोची ने कहा - अब तुम मेरे साथ ही आ जाओ। लेकिन अगर मेरी पत्नी नाराज हो – जो कि वह निश्चित होगी, क्योंकि बच्चों के लिए कपड़े खरीदने लाया था, वह पैसे तो खर्च हो गए – वह अगर नाराज हो, चिल्लाए, तो तुम परेशान मत होना। थोड़े दिन में सब ठीक हो जाएगा।*


*उस देवदूत को लेकर मोची घर लौटा। न तो मोची को पता है कि देवदूत घर में आ रहा है, न पत्नी को पता है। जैसे ही देवदूत को लेकर मोची घर में पहुँचा, पत्नी एकदम पागल हो गयी। बहुत नाराज हुई, बहुत चीखी-चिल्लायी।*


*और देवदूत पहली दफा हँसा। मोची ने उससे कहा - हँसते हो, बात क्या है?*


*उसने कहा - मैं जब तीन बार हँस लूँगा तब बता दूँगा।*


*देवदूत हँसा पहली बार, क्योंकि उसने देखा कि इस पत्नी को पता ही नहीं है कि मोची देवदूत को घर में ले आया है, जिसके आते ही घर में हज़ारों खुशियाँ आ जाएंगी। लेकिन आदमी देख ही कितनी दूर तक सकता है!पत्नी तो इतना ही देख पा रही है कि एक कंबल और बच्चों के कपड़े नहीं बचे। जो खो गया है वह देख पा रही है, जो मिला है उसका उसे अंदाज़ा ही नहीं है– मुफ्त! घर में देवदूत आ गया है। जिसके आते ही हज़ारों खुशियों के द्वार खुल जाएंगे। तो देवदूत हँसा अपनी मूर्खता पर – क्योंकि उसे लगा यह पत्नी भी नहीं देख पा रही है कि क्या घट रहा है!*


*जल्दी ही, क्योंकि वह देवदूत था, सात दिन में ही उसने मोची का सब काम सीख लिया। और उसके जूते इतने प्रसिद्ध हो गए कि मोची महीनों के भीतर धनी होने लगा। आधा साल होते-होते तो उसकी ख्याति सारे लोक में पहुँच गयी कि उस जैसा जूते बनाने वाला कोई भी नहीं, क्योंकि वह जूते देवदूत बनाता था। सम्राटों के जूते वहाँ बनने लगे। धन अपरंपार बरसने लगा।*


*एक दिन सम्राट का आदमी आया। और उसने कहा - यह चमड़ा बहुत कीमती है, आसानी से मिलता नहीं, कोई भूल-चूक नहीं करना। जूते ठीक इस तरह के बनने हैं। और ध्यान रखना जूते बनाने हैं, स्लीपर नहीं!!*


*क्योंकि रूस में जब कोई आदमी मर जाता है तब उसको स्लीपर पहनाकर मरघट तक ले जाते हैं।*


*मोची ने भी देवदूत को कहा - स्लीपर मत बना देना। जूते बनाने हैं, स्पष्ट आज्ञा है, और चमड़ा इतना ही है। अगर गड़बड़ हो गयी तो हम मुसीबत में फँसेंगे!*


*लेकिन फिर भी देवदूत ने स्लीपर ही बनाए। जब मोची ने देखे कि स्लीपर बने हैं तो वह क्रोध से आगबबूला हो गया। वह लकड़ी उठाकर उसको मारने को तैयार हो गया - तू हमारी फाँसी लगवा देगा! तुझे बार-बार कहा था कि स्लीपर बनाने ही नहीं हैं, फिर स्लीपर किसलिए?*


*देवदूत फिर खिलखिला कर हँसा। तभी आदमी सम्राट के घर से भागा हुआ आया। उसने कहा - जूते मत बनाना, स्लीपर बनाना। क्योंकि सम्राट की मृत्यु हो गयी है।*


*भविष्य अज्ञात है। सिवाय उसके और किसी को ज्ञात नहीं। और आदमी तो अतीत के आधार पर निर्णय लेता है। सम्राट जिंदा था तो जूते चाहिए थे, मर गया तो स्लीपर चाहिए। तब वह मोची उसके पैर पकड़कर माफी माँगने लगा - मुझे माफ कर दे, मैंने तुझे मारा।* 


*पर उसने कहा - कोई हर्ज नहीं। मैं अपना दंड भोग रहा हूं।*


*लेकिन वह हँसा आज दुबारा। मोची ने फिर पूछा - हँसी का कारण?*


*उसने कहा - जब मैं तीन बार हँस लूँगा, तब बता दूँगा।*


*दोबारा हँसा इसलिए कि भविष्य हमें ज्ञात नहीं है। इसलिए हम आकांक्षाएं करते हैं जो कि व्यर्थ हैं। हम अभीप्साएं करते हैं जो कि कभी पूरी न होंगी। हम माँगते हैं जो कभी नहीं घटेगा क्योंकि कुछ और ही घटना तय है। हमसे बिना पूछे हमारी नियति घूम रही है। और हम व्यर्थ ही बीच में शोरगुल मचाते हैं। चाहिए स्लीपर और हम जूते बनवाते हैं। मरने का वक्त करीब आ रहा है और जिंदगी का हम आयोजन करते हैं।*


*तो देवदूत को लगा कि वे बच्चियाँ! मुझे क्या पता था कि भविष्य उनका क्या होने वाला है? मैं नाहक बीच में आया।*


*और तीसरी घटना घटी कि एक दिन तीन लड़कियाँ आयीं, जवान। उन तीनों की शादी हो रही थी। और उन तीनों ने जूतों के आर्डर दिए कि उनके लिए जूते बनाए जाएं। एक बूढ़ी महिला उनके साथ आयी थी जो बड़ी धनी थी। देवदूत पहचान गया, ये वे ही तीन लड़कियाँ हैं, जिनको वह मृत माँ के पास छोड़ गया था और जिनकी वजह से वह दंड भोग रहा है। वे सब स्वस्थ हैं, सुंदर हैं।*

*उसने पूछा - क्या हुआ? यह बूढ़ी औरत कौन है?*


*उस बूढ़ी औरत ने कहा - ये मेरी पड़ोसिन की लड़कियाँ हैं। गरीब औरत थी, उसके शरीर में दूध भी न था। उसके पास पैसे-लत्ते भी नहीं थे। और तीन बच्चे जुड़वाँ। वह इन्हीं को दूध पिलाते-पिलाते मर गयी। लेकिन मुझे दया आ गयी, मेरे कोई बच्चे नहीं हैं, और मैंने इन तीनों बच्चियों को पाल लिया।*


*अगर माँ ज़िंदा रहती तो ये तीनों बच्चियाँ गरीबी, भूख और दीनता और दरिद्रता में बड़ी होतीं। माँ मर गयी, इसलिए ये बच्चियाँ तीनों बहुत बड़े धन-वैभव में, संपदा में पलीं। और अब उस बूढ़ी की सारी संपदा की ये ही तीन मालिक हैं। और इनका सम्राट के परिवार में विवाह हो रहा है।*


*देवदूत तीसरी बार हँसा और मोची को उसने बुलाकर कहा - ये तीन कारण हैं। भूल मेरी थी। नियति बड़ी है। और हम उतना ही देख पाते हैं, जितना देख पाते हैं। जो नहीं देख पाते, बहुत विस्तार है उसका। और हम जो देख पाते हैं उससे हम कोई अंदाज़ नहीं लगा सकते, जो होने वाला है, जो होगा। मैं अपनी मूर्खता पर तीन बार हँस लिया हूँ। अब मेरा दंड पूरा हो गया और अब मैं जाता हूँ।*


*अगर हम अपने को बीच में लाना बंद कर दें, तो हमें मार्गों का मार्ग मिल गया। फिर असंख्य मार्गों की चिंता न करनी पड़ेगी। छोड़ दें उस पर। वह जो करवा रहा है, जो उसने अब तक करवाया है, उसके लिए धन्यवाद। जो अभी करवा रहा है, उसके लिए धन्यवाद। जो वह कल करवाएगा, उसके लिए धन्यवाद। हम बिना लिखा चेक धन्यवाद का उसे दे दें। वह जो भी हो, हमारे धन्यवाद में कोई फर्क न पड़ेगा। अच्छा लगे, बुरा लगे, लोग भला कहें, बुरा कहें, लोगों को दिखायी पड़े दुर्भाग्य या सौभाग्य, यह सब चिंता हमें नहीं करनी चाहिए।*

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**प्रस्तुति पं0 कृष्ण मेहता** 

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दिल्ली के भी नायक शिवाजी / विवेक शुक्ला


दिल्ली के भी नायक शिवाजी


छत्रपति शिवाजी को  दिल्ली भी अपने नायक के रूप में देखती है। हालांकि वे कभी यहां नहीं आए थे। वे दिल्ली के करीब आगरा तक ही आए थे। यहां पर बसा मराठी समाज शिवाजी महाराज की जयंती के करीब आते ही उत्साहित हो जाता है। आज उनकी जयंती है ।

 दिल्ली में  शिवाजी की विभिन्न प्रतिमाएं और अर्धप्रतिमाएं लंबे से समय से स्थापित हैं।   कनॉट प्लेस से जो सड़क मिन्टो रोड की तरफ जाती है, वहां पर ही छत्रपति शिवाजी महाराज की सन 1972 में आदमकद प्रतिमा की स्थापना करके दिल्ली ने छत्रपति  शिवाजी के प्रति अपने गहरे सम्मान के भाव को प्रदर्शित किया था। इसे पुणे के मूर्तिकार और चित्रकार श्री चितेले ने तैयार किया था। इस श्रेष्ठ प्रतिमा  में गति व भाव का शानदार समन्वय मिलता है।

 गौर करें कि जिस वर्ष इस प्रतिमा की स्थापना हुई थी, उसी वर्ष लेडी हार्डिंग स्टेडियम का नाम शिवाजी स्टेडियम रख दिया गया था। अब तो मिंटो ब्रिज का नाम भी शिवाजी ब्रिज कर दिया है।

  एक धर्मनिरपेक्ष राजा की छवि रखने वाले शिवाजी महाराज की एक प्रतिमा 28 अप्रैल,2003 को संसद भवन में भी स्थापित हुई थी। इस 18 फीट ऊंची तांबे की मूर्ति को प्रख्यात मूर्तिकार राम सुतार  ने तैयार किया था। ये संसद भवन के गेट नंबर तीन पर रखी गई है। इसके ठीक सामने लोकसभा अध्यक्ष का कार्यालय भी है। इसका जिस दिन अनावरण हुआ उस दिन महाराष्ट्र के लगभग सारे सांसद और यहां पर बसे मराठी समाज के बड़ी तादाद में लोग मौजूद थे।

 महात्मा गांधी की अनेक और सरदार पटेल की बेजोड़ ‘स्टेच्यू आफ यूनिटी’   प्रतिमा बनाने वाले  राम सुतार ने शिवाजी महाराज अर्धप्रतिमा की एक अर्ध प्रतिमा को भी तैयार किया है। ये कुतुब इन्स्टिटूशनल एरिया में स्थित श्री छत्रपति शिवाजी महाराज भवन में स्थापित है।


 इसी तरह से एक अर्ध प्रतिमा  दिल्ली यूनिवर्सिटी के शिवाजी कॉलेज में भी स्थापित है। शिवाजी कॉलेज सन 1961 में  महाराष्ट्र से संबंध रखने वाले पंजाब राव देशमुख के प्रयासों से चालू हुआ था। वे नेहरु  सरकार में मंत्री थे। उनकी दिल्ली के चिड़ियाघर को स्थापित करने में भी अहम भूमिका रही थी। 


  राजधानी के मराठी समाज के नूतन मराठी स्कूल और कस्तूरबा गांधी मार्ग पर स्थित महाराष्ट्र सदन में  भी शिवाजी महाराज की  अर्धप्रतिमाएं


स्थापित है।

Wonderful Definitions🤣*

शब्दार्थ 



*🟡School*

A place where Parents pay, and children play. 


*Life Insurance*

A contract that keeps you poor all your life, so that you can die Rich.


*🟤Nurse*:

A person who wakes you up to give you sleeping pills.


*🟣Marriage*

It's an agreement in which a man loses his bachelor's degree, and a woman gains her masters..


*⚫Tears*

The hydraulic force by which masculine willpower is defeated by feminine waterpower.


*🟣Conference*

The confusion of one man multiplied by the number present.


*🔵Conference Room*

A place where everybody talks, nobody listens, and everybody disagrees later on.


*🟢Father*

A banker provided by nature


*⚫Boss*

Someone who is early when you are late and late when you are early


*Politician*

One who shakes your hand before elections and your Confidence after


*🟠 HOSPITAL*

An institution which holds your ills by pills and kills you by bills.


*😁Smile*

A curve that can set a lot of things straight.


*🟢Office*

A place where you can relax after your strenuous home life.


*🟡Yawn*

The only time married men ever get to open their mouth.


*🔵Etc*.

A sign to make others believe that you know more than you actually do.

 

*🟤Committee*

Individuals who can do nothing individually and sit to decide that nothing can be done together.

 

​LAUGHTER MAKES LIFE EASY.

भारत का दूरसंचार क्षेत्र और 5G तकनीक

 भारत में दूरसंचार का दायरा 

  • 08 Jul 2019
  •  
  • 14 min read

इस Editorial में The Hindu, Indian Express, Business Line, Down to earth, Political and economic weekly आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण शामिल हैं। इस आलेख में दूरसंचार क्षेत्र से जुड़ी समस्याएँ तथा 5G तकनीक के बारे में चर्चा भी शामिल है तथा आवश्यकतानुसार यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

कुछ समय पूर्व ही विश्व में सर्वप्रथम दक्षिण कोरिया में 5G तकनीक की शुरुआत की गई यह तकनीक निकट भविष्य में संचार के क्षेत्र में अभूतपूर्व संभावनाओं को व्यक्त कर रही है। इसको ध्यान में रखते हुए विभिन्न राष्ट्र इस तकनीक को तेज़ी से अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। वर्ष 2020 तक भारत भी 5G तकनीक आरंभ करने की योजना बना रहा है लेकिन कुछ लोगों के अनुसार, भारत के इस क्षेत्र से संबंधित अनुभव संतोषजनक नहीं रहे हैं। इस तथ्य के आलोक में भारत के संचार क्षेत्र का अध्ययन करना आवश्यक है ताकि इस क्षेत्र से जुड़ी हुई समस्याओं का समाधान खोजा जा सके।

दूरसंचार क्षेत्र का इतिहास

भारत में वर्ष 1994 में दूरसंचार क्षेत्र का उदारीकरण हुआ किंतु निजी क्षेत्र का दूरसंचार में प्रवेश नहीं हो सका। इसका मुख्य कारण लाइसेंस प्रणाली तथा टेलीग्राफ अधिनियम के अंतर्गत दूरसंचार सेवाएँ संचालित करने का अधिकार न होना था। उपर्युक्त स्थिति में निजी क्षेत्र हेतु दूरसंचार क्षेत्र उदारीकरण से पूर्व (Pre-1991) की स्थिति में ही बना रहा।

आरंभ में निजी निवेशकों ने इस क्षेत्र से जुड़ने में अत्यधिक उत्साह दिखाया, इसकी वज़ह निवेशकों का अधिक राजस्व प्राप्ति की आकांक्षा थी। लाइसेंस की संख्या कम होने तथा सेवाओं के लिये सरकार द्वारा अत्यधिक उच्च शुल्क निर्धारित किये जाने के कारण सेवाओं का उपयोग सीमित ही रहा जिससे राजस्व सीमित रूप से प्राप्त हो सका। वहीं इस क्षेत्र में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के एकाधिकार ने निज़ी क्षेत्र की मुश्किलें और बड़ा दी।

वर्ष 1999 में भारत सरकार ने दूरसंचार क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिये एक बढ़ा कदम उठाया सरकार ने लाइसेंस के शुल्क में कटौती कर दी क्योंकि अधिक लाइसेंस शुल्क इस क्षेत्र को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा था। इसके पश्चात् यह क्षेत्र राजस्व शेयर लाइसेंस शुल्क प्रणाली (Revenue-share license fee regime) की ओर बढ़ गया। यह प्रणाली वर्तमान में भी जारी है, इस कदम ने इस क्षेत्र को जीवित कर दिया जिसके परिणामस्वरूप सरकार और निज़ी क्षेत्र दोनों को लाभ हुआ।

दूरसंचार क्षेत्र की मौजूदा स्थिति

मौजूदा समय में भी यह क्षेत्र वर्ष 1999 के समान ही चुनौतियों का सामना कर रहा है। यह क्षेत्र गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रहा है। पिछले कुछ वर्षों से दूरसंचार क्षेत्र की कंपनियाँ सेवाओं के शुल्कों की कम दर करने के लिये प्रतिस्पर्द्धा कर रही हैं। यह परिस्थिति उपभोक्ता की दृष्टि से से तो सही है किंतु संचार क्षेत्र को गंभीर संकट की ओर ले जा रही है। सेवा प्रदाता छोटी कंपनियाँ समाप्त हो चुकी हैं तथा जो कंपनियाँ बाज़ार में मौजूद हैं वे भी इस प्रतिस्पर्द्धा के कारण अपनी उत्तरजीविता के लिये जूझ रही हैं। इस प्रतिस्पर्द्धा नें कंपनियों पर ऋण के बोझ को भी बढ़ा दिया है।

विनियामक से जुड़ी अनिश्चितता तथा स्पेक्ट्रम की नीलामी में देरी के कारण भारत में 4G सेवाओं के संचालन में पहले ही देर हुई है। विश्व 5G के वाणिज्यिक उपयोग की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है लेकिन भारत में 5G तकनीक का आरंभ होना अभी शेष है।

वर्ष 2012 में स्पेक्ट्रम नीति में कुछ बदलाव किये गए, ये बदलाव दूरसंचार ऑपरेटरों के लिये महत्त्वपूर्ण थे। इसके तहत लाइसेंस लेना आसान हो गया कोई भी कंपनी जो दूरसंचार सेवाएँ देना चाहती थीं, लाइसेंस ले सकती थीं। हालाँकि लाइसेंस प्राप्त करने में कोई बाधा नहीं हैं लेकिन लाइसेंस की उपलब्धता दूरसंचार क्षेत्र की बड़ी समस्या बन कर उभरी है।

5G तकनीक

यह अगली पीढ़ी की सेलुलर तकनीक है जो अल्ट्रा लो लेटेंसी (Ultra low latency) के साथ तेज़ और अधिक विश्वसनीय संचार सेवाएँ प्रदान करेगी। एक सरकारी पैनल की रिपोर्ट बताती है कि 5G के साथ पीक नेटवर्क डेटा स्पीड 2-20 गीगाबिट प्रति सेकंड (Gbps) की सीमा में होने की उम्मीद है। सरकार के एक पैनल के अनुसार, ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि भारत में 5G तकनीक वर्ष 2035 तक संचयी रूप से 1 ट्रिलियन डॉलर का आर्थिक प्रभाव उत्पन्न करेगी। साथ ही एक अध्ययन के अनुसार, भारत में वर्ष 2025 तक 70 मिलियन 5G कनेक्शन होने का अनुमान लगाया गया है।

लेटेंसी (Latency)

यह नेटवर्किंग से संबंधित एक शब्द है। एक नोड से दूसरे नोड तक जाने में किसी डेटा पैकेट द्वारा लिये गए कुल समय को लेटेंसी कहते हैं। लेटेंसी समय अंतराल या देरी को संदर्भित करता है।

radio spactrum

भारत में 5G के संचालन में समस्याएँ

भारत में 5G सेवा की शुरुआत वर्ष 2020 में होने की संभावना है, यह सेवा विश्व के परिप्रेक्ष्य में समय से पीछे है। भारत के दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) ने 5G सेवा के लिये ज़रूरी स्पेक्ट्रम की रिज़र्व कीमत अत्यधिक ऊँची रखी है, यह कीमत भारत में 5G सेवा की वृद्धि तथा इसके विस्तार में बाधक हो सकती हैं। ज्ञात हो कि भारत में पहले से ही दूरसंचार क्षेत्र आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है, हालाँकि राहत की बात है कि भारत के दूरसंचार विभाग ने TRAI की सिफारिशों को पुनर्विचार के लिये लौटा दिया है। मंत्रालय ने भी इस क्षेत्र हेतु करों और शुल्कों के निर्धारण के लिये दूरसंचार सचिव के अंतर्गत एक समिति गठित की है।

Evolving Mobile Technology

स्पेक्ट्रम के अलावा 5G संचार प्रणाली के मूल ढाँचे में परिवर्तन की आवश्यकता होगी। केवल मौजूदा LTE तकनीक को अपग्रेड करने से 5G उपयोग के सभी मामलों की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा नहीं किया जा सकता। एक रिपोर्ट के अनुसार, यह अनुमान लगाया गया है कि भारत में उद्योगों को 5G नेटवर्क लागू करने के लिए 60-70 बिलियन डॉलर के अतिरिक्त निवेश की आवश्यकता हो सकती है। ज्ञात हो कि वर्तमान में भारत के दूरसंचार उद्योग पर 7 लाख करोड़ रूपए का ऋण है।

चुनौतियों का समाधान

भारत का दूरसंचार क्षेत्र विकास के नए दौर से गुज़र रहा है। भारत की प्राथमिकता समय के अनुसार पारंपरिक दूरसंचार सेवाओं से उच्च गुणवत्ता वाली सेवाओं की ओर स्थानांतरित हुई है। इसको ध्यान में रखते हुए भारत के विनियामक ढाँचे में भी बदलाव किया जाना आवश्यक हो गया है। वायरलेस नेटवर्क पर अधिक निर्भरता, अधिक स्पेक्ट्रम मूल्य, डिजिटल विभाजन तथा अवसंरचना विकास आदि कुछ महत्त्वपूर्ण समस्याएँ है जिनका समाधान करना आवश्यक है।

इन समस्याओं के समाधान की शुरुआत विनियामक ढाँचे में बदलाव तथा दूरसंचार क्षेत्र से जुड़ी बाधाओं को समाप्त करके की जा सकती है। वर्तमान नीति जो स्पेक्ट्रम की नीलामी के माध्यम से अधिकतम राजस्व प्राप्त करने पर ज़ोर देती है, में बदलाव किया जाना चाहिये। ऐसी नीति पर ध्यान देना होगा जो इस क्षेत्र में स्पेक्ट्रम की कमी की चुनौती से निपट सके और भविष्य में यह भारत के लिये सामाजिक-आर्थिक स्तर पर भी उपयोगी हो। इस क्षेत्र में कुछ नवीन चुनौतियाँ जैसे- सेवा के लिये अधिक शुल्क की मांग, नेटवर्क कनेक्शन के मुद्दे, इंटरकनेक्शन शुल्क, विभिन्न सेवाओं को एक साथ खरीदने के लिये बाध्य करना आदि से निपटने के लिये भी ज़रूरी नियम और विनियम बनाए जाने की आवश्यकता है। दूरसंचार क्षेत्र के विकारों तथा प्रतिस्पर्द्दी बाज़ार के लिये चुनौती बनने वाले मामलों में भी भारतीय प्रतिस्पर्द्धा आयोग (CCI) तथा TRAI के मध्य बेहतर तालमेल बनाए जाने की आवश्यकता है।

दूरसंचार क्षेत्र का भविष्य

भारत में दूरसंचार क्षेत्र का अतीत वृद्धि एवं विकास के मामले में उतार-चढ़ाव वाला रहा है। किंतु भारत की वर्तमान स्थिति संदर्भित करती है कि देश में इस क्षेत्र के विकास की प्रबल संभावनाएँ हैं। भारत में इंटरनेट और दूरसंचार सेवाओं का उपयोग करने वाली विश्व की दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या निवास करती है। भारत की 70 प्रतिशत आबादी अभी भी ग्रामीण क्षेत्र में निवास करती है, इस आबादी में सिर्फ 58 प्रतिशत लोगों तक ही दूरसंचार सेवाओं की पहुँच है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए दूरसंचार क्षेत्र के विकास में भारत के ग्रामीण क्षेत्र का महत्त्वपूर्ण योगदान होगा। भारत की राष्ट्रीय डिजिटल संचार नीति जो पिछले वर्ष (2018) प्रकाश में आई, मे इस क्षेत्र के लिये वर्ष 2022 तक 100 बिलियन डॉलर के निवेश का लक्ष्य निर्धारित किया है। साथ ही इस क्षेत्र में 4 मिलियन रोज़गार सृजित करने का भी लक्ष्य है। सरकार की नीति निकट भविष्य में दूरसंचार क्षेत्र के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। वर्ष 2020 में भारत 5G तकनीक संचालित करने की योजना बना रहा है जिसके अनुप्रयोग और आर्थिक प्रभाव भारत के दूरसंचार क्षेत्र के बेहतर भविष्य को इंगित करते हैं। किंतु दूरसंचार के बेहतर विकास और समता पूर्वक उपयोग के लिये आवश्यक होगा कि भारत इस क्षेत्र से जुड़ी विभिन्न बाधाओं का भी समाधान करे।

Advantage India

निष्कर्ष

उदारीकरण के पश्चात् भारत में दूरसंचार क्षेत्र को भी निज़ी क्षेत्र के लिये खोल दिया गया लेकिन विभिन्न बाधाओं के कारण इस क्षेत्र का विकास नहीं हो सका। समय-काल में हुए विभिन्न आर्थिक एवं नीतिगत बदलावों के चलते इस क्षेत्र में भी बदलाव आया है। ऐसा माना जा रहा है कि भविष्य में संचार तकनीक का अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान होगा, इसलिये विभिन्न राष्ट्र संचार के क्षेत्र में अपनी क्षमता में वृद्धि कर रहे हैं। लेकिन भारत में इस क्षेत्र का अतीत उतार-चढ़ाव वाला रहा है, इसके लिये मुख्य रूप से भारत की नीतियाँ और अवसंरचना से जुड़ी खामियाँ ज़िम्मेदार हैं। विश्व में विभिन्न देश 5G तकनीक के उपयोग की शुरुआत कर रहे हैं या कर चुके हैं लेकिन भारत का यह लक्ष्य वर्ष 2020 तक ही पूरा हो सकेगा। इस तकनीक को लागू करने से पूर्व भारत को संचार क्षेत्र से जुड़ी बाधाओं को दूर करना होगा, साथ ही इसका क्रियान्वयन इस प्रकार करना होगा कि भारत में इसका व्यापक उपयोग सुनिश्चित हो सके। इससे भारत में सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के साथ साथ अर्थव्यवस्था की गति भी तीव्र हो सकेगी।

प्रश्न: भारत वर्ष 2020 में 5G तकनीक को आरंभ करने की योजना पर कार्य कर रहा है किंतु भारत के दूरसंचार क्षेत्र का अतीत उतार-चढ़ाव वाला रहा है। आपके विचार में इस क्षेत्र से जुड़ी ऐसी कौन-सी बाधाएँ हैं जिन्हें दूर करने की आवश्यकता है?

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