सोमवार, 30 मई 2022

महावीर त्यागी याद में / अमन tyagib

 शोधादर्श के बिजनौर विशेषांक के लिए


महावीर त्यागी जी क़ो याद करते हुए -- (संस्मरण)

-अमन कुमार त्यागी 


 सवतंत्रता सेनानी महावीर त्यागी का जन्म  31 दिसंबर, 1899 को अपनी ननिहाल ग्राम ढबारसी जिला मुरादाबाद (अब अमरोहा) में हुआ था। जबकि उनका पैतृक गांव जनपद बिजनौर का रतनगढ़ था। मेरठ में पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने ब्रिटिश सेना के इमरजेंसी कमीशन प्राप्त किया था। महावीर त्यागी निडर और स्पष्ट बोलने वाले थे। यही कारण था कि 1919 में जलियावाला बाग हत्याकांड के बाद ब्रिटिश सेना के इमरजेंसी कमीशन से त्यागपत्र देकर सवतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। सेना ने उनका कोर्ट मार्शल कर दिया। जिसकी सजा उन्हें अनेक बार जेल जाकर चुकानी पड़ी। अंग्रेजों द्वारा वो 11 बार गिरफ्तार किए गए, एक किसान आंदोलन के दौरान जब उनको गिरफ्तार करके यातनाएं दी गईं तो गांधीजी ने इसके लिए अंग्रेजों की आलोचना यंग इंडिया में लेख लिखकर की। वह अपने आदर्शों से कहीं भी समझौता करते हुए दिखाई नहीं देते हैं। चाहे उनका जेल जीवन रहा हो अथवा संविधान सभा या फिर लोकसभा और राज्य सभा ही रही हो। सभी स्थानों पर आप वह अपने आदर्शों पर अड़े रहे।  अंग्रेज सरकार ने उन पर देशद्रोह का केस लगा दिया था और पूरी कोशिश थी कि महावीर त्यागी की अकड़ को खत्म कर सके, लेकिन एक सैन्य अधिकारी रहने वाले महावीर त्यागी को ना झुकना कुबूल था और ना ही माफी मांगना।

हाज़िर जवाबी में तो आपका कोई सानी नहीं था। देहरादून का पूरा क्षेत्र उनका घर प्रतीत होता था। इन्हें देहरादून का सुल्तान या डिक्टेटर भी कहा जाता था। इनके आदर्शों और विचारों के कारण ही महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरु और रफी अहमद किदवई जैसे नेता इन्हें स्नेह देते थे और ‘प्रिय महावीर त्यागी जी’ कहकर संबोधित करते थे। भारत के बटवारे के समय 1947-48 के साम्प्रदायिक दंगों को रोकने के लिए इन्होंने कुछ स्वयंसेवक एकत्र किए और उनके साथ पुलिस की वर्दी पहनकर एक विशेष बल तैयार किया जिसे लोग ‘त्यागी पुलिस’ के रूप में जानते थे। 

 जिन दिनों अक्साई चिन चीन के कब्जे में चले जाने को लेकर विपक्ष ने हंगामा काट रखा था। नेहरू को उम्मीद नहीं थी कि उनके विरोध में सबसे बड़ा चेहरा उनके अपने मंत्रिमंडल में शामिल महावीर त्यागी का होगा। चीन से हार पर नेहरू को भरी संसद में मंत्री ने दिखाया था गंजा सिर और कहा था, ‘ये भी बंजर है इसे भी चीन को दे दूं।’ 1962 के युद्ध को लेकर संसद में काफी बहस हुई। जवाहर लाल नेहरू ने संसद में ये बयान दिया कि, अक्साई चिन में तिनके के बराबर भी घास तक नहीं उगती, वो बंजर इलाका है। तभी भरी संसद में महावीर त्यागी ने अपना गंजा सर नेहरू को दिखाया और कहा, ‘यहाँ भी कुछ नहीं उगता तो क्या मैं इसे कटवा दूं या फिर किसी और को दे दूं।’ महावीर त्यागी ने सिद्ध कर दिया कि वे सच्चे देशभक्त हैं। महावीर त्यागी को देश की एक इंच जमीन भी किसी को देना गवारा नहीं था, चाहे वो बंजर ही क्यों ना हो। 

-शेष पढ़ें शोधादर्श के बिजनौर अंक में

बिजनौर की पत्रकारिता के पितामह : बाबूसिंह चैहान


बिजनौर की पत्रकारिता के पितामह : बाबूसिंह  चौहान

अमन कुमार त्यागी 


बाबूसिंह चैहान का जन्म फाल्गुन पूर्णिमा, सन् 1928 को 

श्रीमती मेवा देवी एवं श्री बसंत सिंह के आंगन ग्राम महावतपुर, पो. जटपुरा, थाना अफजलगढ़, जिला बिजनौर में हुआ था।  आपके पिता कृषक थे परंतु शिक्षा के प्रति जागरूक थे।

बाबू सिंह चौहान शिक्षा प्राप्ति के दौरान ही स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए थे। सन् 1943 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान न सिर्फ धामपुर में गिरफ्तारी हुई बल्कि आर.एस.एम. इंटर कालेज, धामपुर से स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के आरोप में निष्कासन भी झेलना पड़ा। चौहान जी स्वतंत्रता से पूर्व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ता थे परंतु स्वतंत्रता के पश्चात् 1948 में जयप्रकाश नारायण, डा. राम मनोहर लोहिया और आचार्य नरेन्द्रदेव के साथ कांग्रेस छोड़कर सोशलिस्ट पार्टी में प्रवेश कर गए। आप 1952 तक सोशलिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य रहे। उन्हीं दिनों जयप्रकाश नारायण व डा. राम मनोहर लोहिया उनके पैतृक गांव महावतपुर में आए और गांव की मिट्टी को नमन करके उनके कार्यों की सराहना की। बाबू सिंह चैहान द्वारा संपादित पत्र ‘चिंगारी’ साप्ताहिक के संपादकीय मंडल में जयप्रकाश नारायण एक संपादकीय सहयोगी के रूप में रहे। सन् 1953 में सोशलिस्ट पार्टी छोड़कर कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जनांदोलन तथा मजदूर आंदोलन में अनेक बार जेल की यात्रा की।

श्रमिक आंदोलन में भी आप निरंतर सक्रिय रहे। बिजनौर जनपद के इतिहास में पहले श्रमिक आंदोलन का 1948 में सूत्रपात। 1949 में चीनी मिल मजदूरों का नेतृत्व किया। आमरण अनशन व जेल यात्राऐं भी की। आप उत्तर प्रदेश, बिहार चीनी मिल मजदूर यूनियन के तीन वर्ष तक सचिव भी रहे। जब राजनीतिक दलों से मन उकता गया तो सन् 1967 में सभी राजनीतिक दलों से संबंध विच्छेद कर पूर्णकालिक पत्रकार बन गए। 

26 जनवरी, 1950 को ‘चिंगारी’ हिन्दी साप्ताहिक का संपादन एवं प्रकाशन करके पत्रकारिता जगत में प्रवेश किया। इसके अलावा आपने ‘मांझी’, ‘अनुशीलन’, ‘अणुव्रत’ (कलकत्ता), ‘नवरंग’ और ‘जनजीवन’ हिन्दी दैनिक भटिंडा (पंजाब) आदि पत्रों एवं पत्रिकाओं का संपादन भी आपने कुशलता पूर्वक किया। बिजनौर से प्रथम दैनिक समाचार-पत्र ‘बिजनौर टाइम्स’ का 14 नवंबर, 1963 को प्रकाशन एवं संपादन प्रारंभ किया। इसी समाचारपत्र में सन् 1964 में ' भूखा मानव क्या करेगा', शीर्षक से समाचार प्रकाशित करने पर तत्कालीन जिला प्रशासन द्वारा डीआईआर में गिरफ्तार कर यातनाएं दी गईं। बिजनौर जनपद का प्रथम सांध्य दैनिक ‘चिंगारी’ 25 अक्टूबर 85 से प्रारंभ। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रथम उर्दू दैनिक ‘रोजाना ख़बर जदीद’ का 22 अगस्त 89 से प्रकाशन किया।

आपने ‘निराले संत’, ‘धर्म दर्शन’, ‘जैन धर्म के चार सिद्धांत’ आदि जैनधर्म साहित्य। ‘मैली चूनर, उजला मन’, ‘हवा के पंख’, ‘पनघट की नीलामी’ उपन्यास। ‘श्रमवीरों के देश में’ (यात्रा संस्मरण) के लेखन पर 1975 में सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार। ‘दर्पण झूठ बोलता है’ (ललित निबंध संग्रह) जिसके संबंध में ब्लिट्ज तथा अन्य समाचार पत्रों एवं समालोचकों ने दूसरे हजारी प्रसाद द्विवेदी की संज्ञा दी थी। ‘उफनती नदियों के सामने’ (ललित निबंध संग्रह)। ‘मकड़जाल में आदमी’ (ललित निबंध संग्रह)। ‘संसार एक नाट्यशाला’ (लघु नाटक संग्रह)। ‘कथा जारी है’ (कहानी संग्रह)। ‘अजगर करे न चाकरीश् य व्यंग्य संग्रह) आदि ग्रंथों की रचना भी की।

आकाशवाणी से अनेक नाटकों, वार्ताओं व रूपकों का प्रसारण। विश्वशांति एवं अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव के लिए रूस, चेकोस्लोवाकिया, बुल्गारिया आदि देशों में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया। 

आप "उ.प्र. श्रमजीवी पत्रकार यूनियन (पंजीकृत)" के प्रांतीय अध्यक्ष एवं "ऑल इंडिया स्माल एवं मीडिया न्यूजपेपर्स फैडरेशन" के उपाध्यक्ष भी रहे।

धर्म निरपेक्षता, लोकतंत्र, समाजवाद, विश्वशांति और साम्प्रदायिक सौहार्द की स्थापना के लिए संघर्ष करते हुए आप 6 अप्रैल 1999 को यह नश्वर संसार छोड़ कर चले गए।

-अमन त्यागी 

पूरा लेख पढ़ें शोधादर्श के बिजनौर विशेषांक में

हिरासत में मौत की तय हो परिभाषा / आलोक यात्री



  हाथरस में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक कार्यकर्ता की पुलिस हिरासत में मौत देश भर में हिरासत में होने वाली मौतों की ओर ध्यान खींचती है। इससे पहले कासगंज में अल्ताफ नाम के एक मुस्लिम युवक की पुलिस कस्टडी में हुई मौत के बाद भी पुलिस कार्रवाई पर तमाम सवाल खड़े हुए थे। इस मौत के बाद पुलिस कस्टडी में मौत को लेकर एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई थी। गृह मंत्रालय के तहत आने वाले नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में पिछले 20 सालों में 1,888 लोगों की पुलिस हिरासत में मौत हुई है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इन मामलों में पुलिसकर्मियों के खिलाफ 893 केस दर्ज किए गए और 358 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई। जिसमें मात्र 26 पुलिस कर्मियों को ही सजा हुई है।

  हाल ही में गुजरात में भी ऐसे ही एक प्रकरण ने उस समय ध्यान खींचा था जब विधायक परेश धनानी के एक सवाल के जवाब में गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने सदन में स्वीकार किया था कि बीते दो सालों में सूबे में पुलिस व न्यायिक हिरासत में 188 लोगों की जान गई है। देश के विभिन्न सूबे में हिरासत में मौत के आंकड़े इसलिए भी ध्यान खींचते हैं क्योंकि गुजरात के मुख्यमंत्री पटेल के पास गृह विभाग की जिम्मेदारी भी है। हिरासत में मौत की बात करें तो बीते तीन साल के आंकड़े इस बात की चुगली करते हैं कि कई मामलों में अव्वल कहा जाने वाला उत्तर प्रदेश हिरासत में मौत के मामले में भी अव्वल है। सूबे में बीते तीन साल में 1318 लोगों की जान गई है। यह आंकड़ा देश भर में हिरासत में हुई मौत का करीब 23 फीसदी है।

  बीते दो दशकों में देश भर में मानवाधिकार आयोग विशेष तौर पर सक्रिय हुआ है। देश में मानवाधिकार आयोग, इससे जुड़े संगठनों और कार्यकर्ताओं की सतर्कता के बावजूद हिरासत में मौत के मामलों पर अंकुश न लग पाना विशेषज्ञों की चिंता का विषय है। जुलाई 2021 में लोकसभा सत्र के दौरान देश भर में हिरासत में हुई मौत पर सवालिया प्रश्न उठाए गए थे। जिसके चलते केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय को देश भर में हिरासत में हुई मौत के आंकड़े सदन के पटल पर रखने पड़े थे। आंकड़ों के अनुसार बीते तीन सालों में देश में पुलिस और न्यायिक हिरासत में 5570 लोगों की मौत हुई है।

  हिरासत में होने वाली मौत के लिए पुलिस के खराब बर्ताव को ही जिम्मेदार माना जाता है। पुलिस हिरासत में मौत के मामले पर विभाग के कई आला अफसर समय-समय पर अपनी तरह से चिंता प्रकट कर चुके हैं। सूबे के चर्चित आईपीएस अधिकारी व वरिष्ठ लेखक विभूति नारायण राय भी पुलिस हिरासत में मौत को जघन्य हत्या ठहरा चुके हैं। अपनी चर्चित पुस्तक 'हाशिमपुर' में श्री राय ने इस बात का खुलासा किया है कि वर्दी की आड़ में पुलिस बल किस जघन्यता से नरसंहार करने से नहीं चूकते। रोंगटे खड़े कर देने वाला यह नरसंहार हिरासत में मौत या हत्या का दुर्लभतम नमूना है। घटनाक्रम के अनुसार 22 मई 1987 को उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर के सीमावर्ती गांव हाशिमपुर में प्रांतीय सशस्त्र कांस्टेबुलरी (पीएसी) के कुछ जवानों ने इलाके से संप्रदाय विशेष के 42 लोगों को हिरासत में लिया। जिन्हें चंद घंटों बाद एक नहर किनारे ले जाकर गोली मार दी गई और उनके शरीर को नहर में फेंक दिया गया।

  राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़े हैरान करने वाले हैं। आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में न्यायिक और पुलिस हिरासत में 17 हजार 140 लोगों की जान जा चुकी है। इस लिहाज से प्रतिदिन औसतन 5 लोगों की जान जाती है। देश के किसी थाने, चौकी या राज्य की पुलिस हिरासत में जब भी कोई बेमौत मरता है तो मानवाधिकारियों से लेकर कई संगठन कराहते दिखाई देते हैं। ऐसे मामलों में कुछ दिन कोहराम मचता है। कार्यवाही की चहलकदमी भी कुछ दूर जाकर सुस्त पड़ जाती है और फिर सब कुछ पहले जैसा ही सामान्य हो जाता है।

  पुलिस या न्यायिक हिरासत में मौत के हजारों मामले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की फाइलों में धूल फांक रहे हैं। आयोग की संसद में पेश अंतिम वार्षिक रिपोर्ट (2017-18) में उल्लिखित है 'देश में हिरासतीय हिंसा और प्रताड़ना अनियंत्रित रूप से जारी है। यह उन लोक सेवकों, जिनके ऊपर कानून को लागू करने की जिम्मेदारी है, के द्वारा की जाने वाली ज्यादती के भयावह रूप को प्रस्तुत करता है। आयोग ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रतिबद्ध है। पीड़ितों अथवा उनके निकट संबंधी को मुआवजे की सिफारिश के अतिरिक्त आयोग का प्रयास उस माहौल को खत्म करने की दिशा में जारी है, जिसमें पुलिस वाले हिरासत एवं जेल की चारदीवारी के अंदर, जहां पीड़ित असहाय होता है को 'यूनिफॉर्म' और 'अधिकार' की आड़ तले मानवाधिकार का उल्लंघन करते हैं।'

  यहां यह सवाल उठना लाजमी है कि आयोग यदि इतना सब लिख, पढ़ रहा है, निरंकुश पुलिस वालों पर अंकुश के लिए आयोग के पास निर्णय लेने की ताकत भी है, तो देश में और पुलिस हिरासत में मौत का आंकड़ा आखिर नीचे आने का नाम क्यों नहीं ले रहा है? दूसरे शब्दों में कहा जाए तो या तो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग कमजोर पड़ रहा है या फिर लोगों को हिरासत में अकाल मौत सुलाने की जिद पर अड़ी बेखौफ 'खाकी' इंसानियत के साथ-साथ आयोग पर भी भारी साबित हो रही है। कई प्रकरणों में तो आयोग के उन निर्देशों की अवहेलना भी की जाती है जिसमें कहा गया है कि ऐसे मामलों में आयोग को 24 घंटों के भीतर अवगत कराना जरूरी है। बावजूद इसके कई मामलों में आयोग के संज्ञान लेने के बाद ही मौत की तफसील आयोग को भेजी गई।

  हिरासत में मौत के बढ़ते मामले निसंदेह देश के नागरिकों और कानूनविदों के लिए चिंता का सबब हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि हिरासत में यातना देना कानून का उल्लंघन होने के बावजूद कई पुलिसकर्मी हिंसा को एक वैध उपकरण मानते हैं। नेशनल कैंपेन अगेंस्ट टॉर्चर (एनसीएटी) की रिपोर्ट बताती है कि साल 2019 में हर दिन लगभग 5 लोगों ने हिरासत में दम तोड़ा। इंडिया जस्टिस रिपोर्ट की संपादक और कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनीशिएटिव की सलाहकार माजा दारूवाला की यह टिप्पणी 'हिरासत में मौत की बढ़ती घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि थानों में जांच के नाम पर सबसे महत्वपूर्ण कार्यवाही अभियुक्त को प्रताड़ित करना है। जिससे यह संकेत मिलता है कि सुरक्षाबलों को जांच की जिम्मेदारी सौंपने के साथ उन्हें अवैध कार्यों की स्वीकृति भी प्रदान की गई है' खासी गौरतलब है।

  पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर) की सचिव राधिका चितकारा ने ऐसी मौतों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था 'इस संवेदनशील विषय पर कोर्ट के आदेश की भी अवहेलना हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरे लगवाने के निर्देश दिए थे। जिन पर आज तक अमल नहीं हो सका।' गौरतलब है कि बीते साल अगस्त में देश के प्रमुख न्यायाधीश एन. वी. रमन ने थानों में मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों पर टिप्पणी करते हुए कहा था 'पुलिस थानों में प्रभावी कानून प्रतिनिधित्व का अभाव, गिरफ्तारी या हिरासत में लिए गए सभी व्यक्तियों के लिए एक बड़ा नुकसान है। हाल की रिपोर्ट में देखें तो पता चलता है कि विशेषाधिकार प्राप्त लोग भी यहां थर्ड डिग्री से बच नहीं पा रहे हैं।' 

  हाशिमपुर का सच उजागर कर सत्ता की नाराज़गी झेल कर प्रकरण को अदालत तक ले जाने वाले और दोषियों को सजा दिलवाने में अग्रणी विभूति नारायण राय का कहना है कि गिरफ्तारी के संबंध में पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बावजूद 'इरादे और प्रोफाइल में क्रूर पुलिसिंग' की वजह से तीन दशक बाद भी कुछ नहीं बदला है।'

  देश में हिरासत में होने वाली मौतों की बढ़ती संख्या, जिसमें पुलिस की कोई जवाबदेही नहीं है, ने प्रणाली की उन खामियों पर प्रकाश डाला है जिन्होंने न्यायप्रणाली को नष्ट कर मानवाधिकारों के उल्लंघन को बढ़ा दिया है। हाथरस के चंदपा थाना क्षेत्र के गांव बिसाना के राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ता राजकुमार उर्फ राजू चौहान की हिरासत में मौत के साथ वह समय आ गया है जब हमारी न्याय और कार्यपालिका को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना होगा कि हिरासत में मौत वास्तव में हादसा है या हत्या? 


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रवि अरोड़ा की नजर से.....

 ढाई आखर प्रेम की इप्टा / रवि अरोड़ा



अजब माहौल है । तमाम दुश्वारियों के बीच राजनीतिक दल चुप बैठे हैं और लेखक-कलाकार मुखर हैं । नेता घरों में दुबके हुए हैं और कलाकार सड़कों की खाक छान रहे हैं । जिन्हें जनता के वोट चाहिए वे जनता की ओर पीठ किए हुए हैं और जिन्हें कुछ नहीं चाहिए वे गांव-गांव, कस्बे-कस्बे और शहर- शहर अलख जगा रहे हैं । बात हो रही है भारतीय जन नाट्य संघ यानी इप्टा की जन यात्रा ' ढाई आखर प्रेम ' की , जो विगत 9 अप्रैल को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से शुरू होकर अब 22 मई को इंदौर में जाकर समाप्त हुई है ।

44 दिन तक लगातार चली यह यात्रा छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार , उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश समेत पांच राज्यों के 250 से अधिक गांवों, कस्बों और शहरों से होकर गुजरी और तमाम जगह इप्टा के कलाकारों ने जन सरकारों से जुड़े गीत-संगीत और नाटकों के माध्यम से लोगों के बीच प्यार, भाईचारे और इंसानियत का संदेश पहुंचाया । इस भीषण गर्मी की तपती दुपहरियों में ये रंगकर्मी भला सड़कों की खाक क्यों छान रहे थे, क्या यह सवाल विचारणीय नहीं होगा ?


अस्सी साल पुरानी संस्था इप्टा किसी परिचय की मोहताज़ नहीं है । मुल्क के तमाम बड़े शहरों में ही नहीं सुदूर कस्बों में भी इप्टा की शाखाएं हैं और रंगकर्म के माध्यम से ये रंगकर्मी शोषण और सांप्रदायिकता के खिलाफ अलख जगाते ही रहते हैं । देश की आजादी के 75 साल होने पर इस बार इप्टा ने ढाई आखर प्रेम यात्रा निकाली जिसकी आज सचमुच बहुत जरूरत महसूस की जा रही थी ।

 शायद कबीर के उस काल खंड से भी ज्यादा जब उन्होंने कहा था- ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होई । तभी तो ये रंगकर्मी गांव गांव जाकर यह समझाते नजर आए कि देश भक्ति का मतलब केवल देश के नक्शे और झंडे से प्यार ही नहीं है, देश की जनता से प्यार ही देशभक्ति की बुनियादी शर्त है । रंगकर्मी दुःख व्यक्त करते दिखे कि हमारे नेता बात तो देश प्रेम की करते हैं मगर काम सारे जनता के खिलाफ करते हैं ।

  ये रंगकर्मी अपनी इस यात्रा के दौरान कला के माध्यम से अपना एजेंडा भी स्पष्ट करते रहे कि वे आने वाली पीढ़ी को सुंदर और अधिक मानवीय दुनिया सौंपना चाहते हैं और यही वजह है कि वे बात बार लोगों के बीच दोहराते दिखे कि अपनी संतानों को धार्मिक नहीं मनुष्यता की पहचान दें । पूरी यात्रा के दौरान इप्टा का एक ही नारा रहा-  सच कहना ही प्रतिरोध है और प्रेम करना ही नफरत का विरोध । 


इस पूरी यात्रा का संचालन कर रहे इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रणबीर सिंह, महासचिव राकेश वेदा और राज्यों के महासचिव अरुण कटोठे, उपेंद्र मिश्र, संतोष डे, तनवीर अहमद, अमिताभ पांडे और शिवेंद्र शुक्ला को मैंने नजदीक से जाना है । अधिकांश 65 - 70 की उम्र पार कर चले हैं । बावजूद इसके इस भीषण गर्मी में ये लोग आज चहुओर फैली सांप्रदायिकता की आग से टकराने निकल पड़े ।

वैसे कहना न होगा कि मुल्क के हालात हैं ही कुछ ऐसे कि कुछ कर गुजरने को हर इंसानियत परस्त आदमी बेचैन है । अब ऐसे में पहल की जिम्मेदारी इप्टा जैसी संस्था ही तो ले सकती थी । मुझे फक्र है कि मैंने भी लगभग दस साल तक इप्टा के साथ काम किया है और आज भी मन से इप्टा का ही हूं ।

रविवार, 29 मई 2022

चंद्र शेखर आज़ाद की मुंन्छे

 #पूर्ण_चित्र 


चंद्रशेखर आजाद जी को अपनी फोटो खिंचवाने से बड़ी चिढ़ होती थी लिहाज़ा बार - बार उनकी एकाध फोटो ही हमारे आसपास घुमती रहती हैं । 


आइए जानते हैं उस बेहद लोकप्रिय फोटो के बारे में जिसमें आजाद अपने मूंछों पर ताव देते नजर आते हैं । 


काकोड़ी कांड के बाद अंग्रेज हाथ धोकर इस डाके में संलिप्त क्रांतिकारियों के पीछे पड़ गए थे । आजाद के साथियों की गिरफ्तारी का सिलशिला शुरू हो चुका था । चारों तरफ जासूसों का जाल बिछा हुआ था । 


आजाद जासूसों से बचते - बचते किसी तरह झांसी पहुंचे । वहां उन्होंने रूद्रनारायण सिंह " मास्टर जी " के आवास में शरण ली । मास्टर जी का आवास कला - संस्कृति और व्यायाम का केंद्र हुआ करता था । सरकारी जासूसों और नौकरशाहों का भी आना - जाना वहां लगा रहता था । इसलिए आजाद ने वहां रूकना मुनासिब नहीं समझा । लाख मना करने के बावजूद भी वह पास के जंगल में एक छोटे से हनुमान मंदिर के पुजारी बनकर रहने लगे ।


 फिर एक दिन आजाद को मास्टर जी अपने आवास पर ले आये । कला - प्रेमी होने के साथ - साथ मास्टरजी फोटोग्राफी भी कर लिया करते थे । 


बहुत देर से मास्टरजी आजाद को बिना कुछ बताए ही उनकी तस्वीर अपने कैमरे में कैद करने की कोशिश कर रहे थे लेकिन आजाद थे कि सही पॉजिशन ले ही नहीं रहे थे ।


 बाद में तंग होकर मास्टरजी ने आजाद से एक फोटो खिंचवाने का निवेदन ही कर दिया । पहले तो आजाद तैयार नहीं हो रहे थे लेकिन बाद में फोटो खिंचवाने के लिए खड़े हो गए । 


फिर मास्टरजी ने जैसे ही अपना कैमरा संभाला और बोला , " आज तुम मुझे ऐसे ही तुम्हारा एक फोटो खींच लेने दो 


" आजाद ने कहा , " अच्छा तो ज़रा मेरी मूंछे एंठ लेने दो " और ऐसा कहकर उन्होंने अपनी मूंछे घुमानी शुरू कर दी । इसी बीच मास्टर जी ने उस ऐतिहासिक तस्वीर को अपने कैमरे में कैद कर लिया जो आज राष्ट्र की महान नीधि बन गया । 


आजाद जी को कोटि कोटि नमन

देश के लिए समर्पित ड्राईवर कमल जी का जज्बा

 बात 30 अगस्त 1965 की है। ड्राइवर कमल नयन जी मलेरकोटला पंजाब से ट्रक क्रमांक PNR 5317 में 90 बोरी गेहूं लादकर दिल्ली आ रहे थे।


रास्ते मे सेना के जवानों ने उनके ट्रक को रोका और कहा कि पाकिस्तान से जंग छिड़ गई है। हमें आपके ट्रक और आपकी मदद चाहिए। कमल जी ने ट्रक में लदीं 90 बोरियां सड़क पर ही उतार दीं और ट्रक में गोला-बारूद भरकर सेना की मदद के लिए बॉर्डर की तरफ चल दिए। जंग करते हुए वे पाकिस्तान के सियालकोट सेक्टर पहुंच गए। पाकिस्तानी सैनिकों और तोपों को छकाते सेना का असलहा लेकर ऐसे गुजरते मानो जैसे किसी आम रास्ते से गुजर रहे हों। कई बार तो उन्होंने ट्रक पाकिस्तानी सैनिकों पर फिल्मी स्टाइल में चढ़ा दिए तो कई बार खुद गोला-बारूद चलाने लगे।


सरकार ने ट्रक ड्राइवर कमल नयन जी को सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने के अदम्य साहस पर #अशोक_चक्र देकर सम्मानित किया था। जिसके तहत उन्हें 15 लाख रुपए नगद और 70 हजार रुपए सालाना देने की घोषणा हुई थी। 


गर्व है, हमे हमारे बुजुर्गों पर, उनके संस्कारों पर

जय हिंद जय भारत


https://youtu.be/8McKEVywHTE

#कॉपी

रोड हिप्नोसिस क्या है ?*


किसी भी वाहन की ड्राइविंग करते समय की एक शारिरिक स्थिति है। सामान्यतः लगातार ढाई-तीन घंटे की ड्राइविंग के बाद रोड हिप्नोसिस प्रारम्भ होता है।

ऐंसी सम्मोहन की स्थिति में आँखें खुली होती हैं लेकिन दिमाग अक्रियाशील हो जाता है अतः जो दिख रहा है उसका सही विश्लेषण नहीं हो पाता और नतीजतन सीधी टक्कर वाली दुर्घटना हो जाती है।

इस सम्मोहन की स्थिति में दुर्घटना के 15 मिनिट तक ड्राइवर को न तो सामने के वाहनों का आभास होता है और न ही अपनी स्पीड का। और जब 120-140 स्पीड से टक्कर होती है तो भयानक दुष्परिणाम सामने आते हैं।

उपरोक्त सम्मोहन की स्थिति से बचने के लिए हर ढाई-तीन घंटे ड्राइविंग के पश्चात रुकना चाहिए। चाय-कॉफी पियें, 5-10 मिनिट आराम करें और मन को शांत करें।

ड्राइविंग के दौरान स्थान विशेष और आते कुछ वाहनों को याद करते चलें। अगर आप महसूस करें कि पिछले 15 मिनिट का आपको कुछ याद नहीं है तो इसका मतलब है कि आप खुदको और सहप्रवासियों को मौत के मुँह में ले जा रहे हो।

रोड सम्मोहन ये अचानक रात के समय होता है जब अन्य यात्री सो या ऊँघ रहे होते हैं अतः बेहद गंभीर दुर्घटना हो सकती है।

ड्राइवर को झपकी आ जाए या नींद आ जाए तो दुर्घटना को कोई नहीं रोक सकता लेकिन आँखें खुली हों तो दिमाग का क्रियाशील होना अतिआवश्यक है। ध्यान रखें, सुरक्षित रहें, सुरक्षित ड्राइविंग करें।


लेख सौजन्य : सड़क सुरक्षा अभियान- 19/05/2022 से 31/05/2022

परिवहन विभाग

गुरुवार, 26 मई 2022

जीवनापयोगी अंक

 *सभी को विश्व स्वास्थ्य दिवस की शुभकामनाएं...💐💐* 


याद रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें:

 1. बीपी: 120/80


 2. पल्स: 70 - 100


 3. तापमान: 36.8 - 37


 4. सांस : 12-16


 5. हीमोग्लोबिन: 

     नर -13.50-18

     मादा - 11.50 - 16 


 6. कोलेस्ट्रॉल: 130 - 200


 7. पोटेशियम: 3.50 - 5


 8. सोडियम: 135 - 145


 9. ट्राइग्लिसराइड्स: 220


 10. शरीर में खून की मात्रा :

       पीसीवी 30-40%


 11. शुगर लेवल: 

      बच्चों के लिए (70-130)

      वयस्क: 70 - 115


 12. आयरन: 8-15 मिलीग्राम


 13. श्वेत रक्त कोशिकाएं WBC: 

      4000 - 11000


 14. प्लेटलेट्स: 

      1,50,000 - 4,00,000


 15. लाल रक्त कोशिकाएं RBC:

      4.50 - 6 मिलियन..


 16. कैल्शियम: 

       8.6 - 10.3 मिलीग्राम/डीएल


 17. विटामिन डी3:

      20 - 50 एनजी/एमएल 


18. विटामिन बी12: 

    200 - 900 पीजी/एमएल


   *वरिष्ठ यानि 40/ 50/ 60 वर्ष  वालों के लिए विशेष सुझाव

   


🚩🕉️1-  *पहला सुझाव:*🕉️🚩

 प्यास न लगे या जरूरत न हो तो भी हमेशा पानी पिएं... सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्याएं और उनमें से ज्यादातर शरीर में पानी की कमी से होती हैं।  2 लीटर न्यूनतम प्रति दिन


2-  *दूसरा सुझाव :*

शरीर से अधिक से अधिक काम ले, शरीर को हिलाना चाहिए, भले ही केवल पैदल चलकर... या तैराकी...या किसी भी प्रकार के खेल से। 


  3- *तीसरा सुझाव:*

 खाना कम करो....

अधिक भोजन की लालसा को छोड़ दें... क्योंकि यह कभी अच्छा नहीं लाता है। अपने आप को वंचित न करें, लेकिन मात्रा कम करें।  प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट आधारित खाद्य पदार्थों का अधिक प्रयोग करें।


 5-  *चौथा सुझाव*

 जितना हो सके वाहन का प्रयोग तब तक न करें जब तक कि अत्यंत आवश्यक न हो... आप कहीं जाते हैं किराना लेने, किसी से मिलने... या किसी काम के लिए अपने पैरों पर चलने की कोशिश करें।  लिफ्ट, स्लाईडर का उपयोग करने के बजाय सीढ़ियां चढ़ें।


 5- *पांचवां सुझाव*

 क्रोध छोड़ो...

 चिंता छोड़ो... चीजों को नज़रअंदाज़ करने की कोशिश करो...

विक्षोभ की स्थितियों में स्वयं को शामिल न करें .... वे सभी स्वास्थ्य को कम करते हैं और आत्मा के वैभव को छीन लेते हैं।  सकारात्मक लोगों से बात करें और उनकी बात सुनें !


6- *छठा सुझाव*

 उम्र के ढलते पडाव में पैसे रकम आदि का मोह छोड़ दे 

अपने आस-पास के लोगो से खूब मिलें जुलें हंसें बोलें!

पैसा जीने के लिए बनाया गया था, जीवन पैसे के लिए नहीं। 


7- *सातवां सुझाव*

 अपने आप के लिए किसी तरह का अफ़सोस महसूस न करें, न ही किसी ऐसी चीज़ पर जिसे आप हासिल नहीं कर सके, और न ही ऐसी किसी चीज़ पर जिसे आप अपना नहीं सकते इन सभी के बारे में अफसोस करने के बजाय हमेशा अनदेखा कर भुल जाए! 

अपनी जरूरत वाली प्राथमिक सुविधाओं के अलावा अन्य किसी भी तरह की सुविधाओं की अपेक्षा नहीं रखें  ! इच्छाओं को सिमित रखें  ! 

 इसे अनदेखा करें और इसे भूल जाएं।


8- *आठवां सुझाव*

पैसा, पद, प्रतिष्ठा, शक्ति, सुन्दरता, जाति की ठसक और प्रभाव ....

ये सभी चीजें हैं जो अहंकार से भर देती हैं.... लेकिन आज है और कल नहीं है अत: उसके पिछे जरूरत से ज्यादा समय व्यर्थ नहीं करें  ! 

विनम्रता को प्राथमिकता दे जो लोगों को प्यार से आपके करीब लाती है। 


9- *नौवां सुझाव*

 अगर आपके बाल सफेद हो गए हैं, तो इसका मतलब जीवन का अंत नहीं है।  यह एक बेहतर जीवन की शुरुआत हो चुकी है। आशावादी बनो, याद के साथ जियो, यात्रा करो, आनंद लो। यादें बनाओ!


10- *दसवां सुझाव*

अपने से छोटों से भी प्रेम, सहानुभूति ओर अपनेपन से मिलें! कोई व्यंग्यात्मक बात न कहें!  चेहरे पर मुस्कुराहट बनाकर रखें !  

अतीत में आप चाहे कितने ही बड़े पद पर रहे हों वर्तमान में उसे भूल जाये और सबसे मिलजुलकर रहें!


  *#विश्व स्वास्थ्य दिवस की शुभकामनाएं ❤️

              🌹🌹🌹🌹🌹

बुधवार, 25 मई 2022

टीएमयू मेडिकल कॉलेज में छात्रों क़ो बताईं रिसर्च की बारीकियां

 

तीर्थंकर महावीर मेडिकल कलेज एंड रिसर्च सेंटर के सत्र 2021-22 पीजी ओरिएंटेशन प्रोग्राम का समापन, 112 नवागत एमडी, एमएस पोस्ट ग्रेजुएट स्टुडेंट्स ने की शिरकत 



ख़ास बातें


प्रो. एसके जैन एथिक्स इन मेडिकल रिसर्च पर बोले

स्टडी डिजाइन की तकनीक प्रो. एसके गुप्ता ने बताई

सैंपल साइज कैसे लेंगे, समझाया डॉ. उम्मे अफीफा ने

डॉ. अनीस प्रभाकर ने बताए रिसर्च क्यूश्चन्स के तरीके



मुरादाबाद.

तीर्थंकर महावीर मेडिकल कॉलेज एंड रिसर्च सेंटर की ओर से पीजी ओरिएंटेशन प्रोग्राम के तहत एमडी, एमएस स्टुडेंट्स के अंतिम दिन रिसर्च थीसिस की बारीकियां समझाई गईं। इसमें मेडिकल के 112 नवागत छात्र-छात्राओं ने शिरकत की।

ओरिएंटेशन प्रोग्राम के अंतिम दिन वाइस प्रिंसिपल एवम् एनाटॉमी के एचओडी प्रो. एसके जैन ने एथिक्स इन मेडिकल रिसर्च, कम्यूनिटी मेडिसिन विभाग के एचओडी प्रो. सुधीर कुमार गुप्ता ने स्टडी डिजाइन, कम्यूनिटी मेडिसिन विभाग की डॉ. उम्मे अफीफा ने सैंपल साइज और कम्यूनिटी मेडिसिन विभाग के ही डॉ. अनीस प्रभाकर ने रिसर्च क्यूश्चन्स, सैम्प्लिंग तकनीक आदि की बारीकियां बताईं। यह जानकारी फार्माकोलॉजी विभाग के एचओडी प्रो. प्रीथपाल सिंह मटरेजा ने दी। उन्होंने बताया, छात्रों को तीन बरस में रिसर्च थीसिस पर भी काम करना होता हैै। फाइनल एग्जाम से छह महीने पहले अपनी थीसिस सब्मिट करनी होती है।


उल्लेखनीय है, बतौर मुख्य अतिथि निदेशक प्रशासन श्री अभिषेक कपूर ने 16 मई को मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित करके पीजी ओरिएंटेशन प्रोग्राम का शंखनाद किया था। श्री कपूर ने इन नवागत स्टुडेंट्स का मार्गदर्शन करते हुए भरोसा दिया, यदि उन्हें भविष्य में किसी भी तरह की कठिनाई आए तो उनके लिए टीएमयू परिवार के द्वार 24 घंटे खुले हैं।

इस प्रोग्राम में तीर्थंकर महावीर मेडिकल कॉलेज एंड रिसर्च सेंटर, मुरादाबाद के सत्र  2021-22 के 112 नवागत एमडी, एमएस पोस्ट ग्रेजुएट विद्यार्थियों ने शिरकत की। प्रोग्राम के फर्स्ट डे छात्र-छात्रओं का बारी-बारी से न केवल अपने करीब डेढ़ दर्जन से अधिक विभागाध्यक्षों एचओडी से इंट्रो हुआ बल्कि स्टडी मैटेरियल, कोर्स नॉलेज, फ्यूचर प्रोस्पैक्ट्स, एग्जाम पैटर्न और कॅरिकुलम की विस्तार से उन्हें जानकारी दी गई।

निदेशक अस्पताल श्री अजय गर्ग और निदेशक अस्पताल पीएंडडी श्री विपिन जैन की भी फर्स्ट डे  मौजूदगी उल्लेखनीय रही । प्रोग्राम के अंतिम दिन रिसर्च थीसिस के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से जानकारी दी गई। 


छह दिनी ओरिएंटेशन प्रोग्राम में प्राचार्या प्रो. श्यामोली दत्ता, मेडिसिन विभाग के एचओडी एवम् पीजी ओरिएंटेशन प्रोग्राम के ऑर्गेनाइजिंग चेयरमैन प्रो. वीके सिंह, आर्थोपैडिक्स के एचओडी एवम् पीजी ओरिएंटेशन प्रोग्राम में ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी प्रो. अमित सर्राफ के अलावा एन्सथिसिया विभाग के एचओडी प्रो. गुरदीप सिंह झीते, बायो केमिस्ट्री विभाग की एचओडी प्रो. संगीता कपूर, फॉरेंसिक मेडिसिन के एचओडी डॉ. प्रणब कुमार, माइक्रोबॉयोलॉजी विभाग के एचओडी उमर फारूख, पैथोलॉजी की एचओडी प्रो. सीमा अवस्थी, पैडिएट्रिक्स विभाग के एचओडी प्रो. रूपा सिंह राज भंडारी, फिजियोलॉजी विभाग के एचओडी प्रो. जयवल्लभ कुमार, साइक्रेटिक्स विभाग के एचओडी प्रो. नागेन्द्रन, रेडियोलॉजी विभाग के सतीश पाठक, सर्जरी विभाग के एचओडी प्रो.एनके सिंह आदि की उल्लेखनीय मौजूदगी रही।


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मेडिकल स्टुडेंट्स के लिए 24 घंटे खुले हैं द्वारः अभिषेक कपूर



तीर्थंकर महावीर मेडिकल कॉलेज एंड रिसर्च सेंटर, मुरादाबाद में एमडी, एमएस  के मेडिकल पोस्ट ग्रेजुएट विद्यार्थियों के ओरिएंटेशन प्रोग्राम का शंखनाद 




तीर्थंकर महावीर मेडिकल कॉलेज एंड रिसर्च सेंटर, मुरादाबाद की ओर से सत्र  2021-22 के एमडी, एमएस पोस्ट ग्रेजुएट विद्यार्थियों के लिए ओरिएंटेशन प्रोग्राम में 112 नवागत छात्र-छात्रओं का बारी-बारी से न केवल उनका एचओडी से इंट्रो हुआ बल्कि स्टडी मैटेरियल, कोर्स नॉलेज, फ्यूचर प्रोस्पैक्ट्स, एग्जाम पैटर्न और कॅरिकुलम की विस्तार से उन्हें जानकारी दी गई।

ओरिएंटेशन प्रोग्राम में प्रशासन निदेशक श्री अभिषेक कपूर बतौर मुख्य अतिथि, प्राचार्या प्रो. श्यामोली दत्ता, निदेशक अस्पताल श्री अजय गर्ग, निदेशक अस्पताल पीएंडडी श्री विपिन जैन, वाइस प्रिंसिपल एवम् एनाटॉमी के एचओडी प्रो. एसके जैन के अलावा करीब डेढ़ दर्जन से अधिक विभागाध्यक्षों ने शिरकत की। ओरिएंटेशन प्रोग्राम निदेशक अस्पताल पीएंडडी श्री विपिन जैन ने ओरिएंटेशन में मौजूद छात्र-छात्राओं को मेडिकल कॉलेज और प्रबंधंन समेत सभी का परिचय कराया।

इससे पूर्व प्रशासन निदेशक श्री अभिषेक कपूर बतौर मुख्य अतिथि मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित करके ओरिएंटेशन प्रोग्राम का शंखनाद किया। यह कार्यक्रम 20 मई तक चलेगा। इस मौके पर मुख्य अतिथि समेत तमाम मेहमानों का बुके देकर गर्मजोशी से स्वागत किया गया। पीजी ओरिएंटेशन प्रोग्राम के ऑर्गेनाइजिंग चेयरमैन प्रो. वीके सिंह ने सभी मेहमानों और पीजी के न्यू स्टुडेंट्स का वार्म वेलकम किया। संचालन डॉ. अंकिता मित्तल ने किया।



मेडिकल के इस प्रोग्राम में मुख्य अतिथि श्री अभिषेक कपूर के अलावा प्राचार्या प्रो. श्यामोली दत्ता, वाइस प्रिंसिपल एवम् एनाटॉमी के एचओडी प्रो. एसके जैन, मेडिसिन विभाग के एचओडी प्रो. वीके सिंह, पैथोलॉजी की एचओडी प्रो. सीमा अवस्थी आदि ने अपने आशीर्वचन से इन नवागत स्टुडेंट्स का मार्गदर्शन करते हुए भरोसा दिया, यदि उन्हें भविष्य में किसी भी तरह की कठिनाई आए तो उनके  लिए टीएमयू परिवार के द्वार 24 घंटे खुले हैं।

ओरिएंटेशन प्रोग्राम में मेडिसिन विभाग के एचओडी प्रो. वीके सिंह, एन्सथिसिया विभाग के एचओडी प्रो. गुरदीप सिंह झीते, बायो केमिस्ट्री विभाग की एचओडी प्रो. संगीता कपूर, कम्यूनिटी मेडिसिन विभाग के एचओडी प्रो. सुधीर कुमार गुप्ता, फॉरेंसिक मेडिसिन के एचओडी डॉ. प्रणब कुमार, माइक्रोबॉयोलॉजी विभाग के एचओडी उमर फारूख, पैथोलॉजी की एचओडी प्रो. सीमा अवस्थी, आर्थोपैडिक्स के एचओडी प्रो. अमित सर्राफ, पैडिएट्रिक्स विभाग के एचओडी प्रो. रूपा सिंह राज भंडारी, फार्माकोलॉजी विभाग के एचओडी प्रो. प्रीथपाल सिंह मटरेजा, फिजियोलॉजी विभाग के एचओडी प्रो. जयवल्लभ कुमार, साइक्रेटिक्स विभाग के एचओडी प्रो. नागेन्द्रन, रेडियोलॉजी विभाग के सतीश पाठक, सर्जरी विभाग के एचओडी प्रो.एनके सिंह आदि की उल्लेखनीय मौजूदगी रही।

अंत में पीजी ओरिएंटेशन प्रोग्राम में ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी प्रो. अमित सर्राफ और डॉ. रोहित वार्ष्णेय ने सभी मेहमानों, एचओडी के संग-संग एमडी/एमएस के नवागत स्टुडेंट्स का आभार व्यक्त किया।

मंगलवार, 24 मई 2022

टीवी9भारतवर्ष के नम्बर एक क्यों बना?

 टीआरपी में टीवी9भारतवर्ष के नम्बर एक बने रहने पर अभिषेक तिवारी ने एक आर्टकिल भड़ास को मेल किया है, देखें-


अभिषेक तिवारी



आज TV9 भारतवर्ष बीते तीन महीने से लगातार नंबर वन है। इसकी तीन सबसे बड़ी वजह है:

पहली – संत प्रसाद राय
दूसरी – संत प्रसाद राय की टीम
तीसरी – संत की सोच, विचार और व्यवहार
TV9 भारतवर्ष के लोग से आप जब भी बात करेंगे, आपको एक चीज जरूर सुनने को मिलेगी कि यार यहां गाली गलौच नहीं है। आपमें से किसी की भी जब इच्छा करे, आइए और स्वतः इसकी पुष्टि दो चार लोगों से बात करके कर लीजिए। हर एक जुबान पर यही जवाब था कि आइए कभी इस ठईया पर वक्त गुजारिए और खुद महसूस कीजिए। TV9 भारतवर्ष अगर आज देश का नंबर 1 चैनल है तो उसकी एकमात्र सबसे बड़ी वजह जो समझ आएगी, वो ये कि यहीं हर एक शख्स तनाव मुक्त होकर काम करता है। सभी के सम्मान की रक्षा होती है। खुशियां सिर्फ मालिक या मालिक टाइप के लोग नहीं मना सकते, बल्कि वहां खुशियों में भी केक एक बटलर से कटवाई जाती है जो चाय पानी सबको खुशी खुशी पिलाता है। अब ऐसे खुशनुमा माहौल में चैनल को नंबर वन होने से भला कौन रोक सकता है।

आप सभी को एक बात जानकर थोड़ी हैरानी जरूर होगी कि संत प्रसाद राय जो कि TV9 भारतवर्ष के मैनेजिंग एडिटर हैं, वो न्यूज़ रूम तक बहुत कम आते हैं। तभी आते हैं, जब अचानक से कोई बड़ी घटना होती है। मगर उससे पहले भी संत की तूफानी ब्रिगेड मोर्चा उन्हीं के मुताबिक संभाल चुकी होती है। संत सिर्फ अपनी सोच का तड़का और तरीका उसमें लगाते हैं, ताकी 22 साल वाले भी पीछे पीछे 15-20 मिनट बाद खबर पर आएं और बाद में डंके की चोट पर अपने दर्शकों को बेवकूफ बनाएं कि “देखा, अमेरिका में अटैक पर सबसे पहले हमने खबर दिखाई”। TV9 भारतवर्ष में संत प्रसाद राय की टीम में जोश और जुनून है। यहां कभी किसी भी काम के लिए आज तक दबाव नहीं बनाया गया। कभी किसी को आज तक ऊंची आवाज में नहीं बोला गया। कभी किसी को उसकी औकात नहीं दिखाई गई। इस संस्थान की चारदीवारी के भीतर संत के आने के बाद हर एक के सम्मान को शीर्ष पर रखा गया।

TV9 भारतवर्ष देश का नंबर 1 चैनल है तो अपनी खबरों के बदौलत। आज तक कभी भी चैनल पर सास बहू के झगड़े, सांप बिच्छू की कहानियां, बंदर का डांस, फर्जी भविष्यवाणियां नहीं चली। इस चैनल को वाकई फिक्र देश की है, क्योंकि इसकी माने तो देश से बड़ा कुछ नहीं है और देश तभी सुरक्षित रहेगा जब पड़ोसी दुश्मन चीन और पाकिस्तान की कारवाइयों से देश के नेतागण रू ब रू होते रहेंगे। लिहाजा हर अंतरराष्ट्रीय खबर पर गजब की पकड़ है।

3 साल में ये इकलौता ऐसा चैनल है जो नंबर वन है। अपनी काबिलियत, अपनी टीम और अपनी सोच के कारण। इससे पहले भी कई चैनल आए, कई हैं और कई चले भी गए। मगर संत प्रसाद ने वो कमाल कर दिखाया है, जो कोई संपादक सोच भी नहीं सकता। यहां आइए और कुछ लोगों से बात कीजिए तो आपको एक लाइन में जवाब मिलेगा “HithaiBoss”। एक संपादक के लिए ऐसी सोच रखने वाली टीम भी मीडिया जगत में “Hithai”

कुतुब मीनार को 'वेधशाला/सूर्य स्तंभ' साबित करते तथ्य

 *वो 20 प्रमाण जो कुतुब मीनार को 'वेधशाला/सूर्य स्तंभ' साबित करते हैं* 


 _पूर्व क्षेत्रीय निदेशक धर्मवीर शर्मा के तहलका मचाने वाले 20 दावे_ 


1- इसका निर्माण खगोल विज्ञान पर आधारित है।


2- इसे कर्क रेखा के ऊपर बनाया गया।


3- इसे सूर्य की गतिविधि की गणना करने के लिए बनाया गया था


4- इस मीनार की छाया 21 जून को 12 बजे जमीन पर नहीं पड़ती है।


5- यह कर्क रेखा से पांच डिग्री उत्तर में है।


6- विक्रमादित्य ने सूर्य स्तंभ के नाम से विष्णुपद पहाड़ी पर यह वेधशाला बनाई थी।


7- इस मीनार के ऊपर बेल बूटे घंटियां आदि बनी हैं, जो हिंदुओं से संबंधित निर्माण में होती हैं


8- इसे 100 प्रतिशत हिंदुओं ने बनाया, इसे बनाने वालों के इसके ऊपर जो नाम लिखे हैं उनमें एक भी मुसलमान नहीं था।


9- इसे खगोलविज्ञानी वराह मिहिर के नेतृत्व में बनाया गया था।


10- इस वेधशाला में कोई छत नहीं है।


11- इसका मुख्य द्वार ध्रुव तारे की दिशा की ओर खुलता है।


12- 968 तक कुतुबमीनार के मुख्य द्वार के सामने एक पत्थर लगा था, जो ऊपर से यू आकार में कटा हुआ था,उसके ऊपर ठोड़ी रखने पर सामने ध्रुव तारा दिखता था।


13- इस निर्माण में 27 आले हैं, जिनके ऊपर पल और घटी जैसे शब्द देवनागरी में लिखे हैं।


14- आलों के बाहर के छेद दूरबीन रखने के बराबर के हैं, जबकि इनमें अंदर की ओर तीन लोग बैठ सकते हैं


15- कुतुबमीनार के अंदर के भाग में देवनागरी में लिखे हुए कई अभिलेख हैं जो सातवीं और आठवीं शताब्दी के हैं।


16- इसका मुख्य द्वार छोड़कर सभी द्वार पूर्व की ओर खुलते हैं, जहां से उगते हुए सूर्य को निहारा जा सकता है


17- इस मीनार को अजान देने के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता है, अंदर से शोर मचाने या चिल्लाने की आवाज बाहर नहीं आती है। (यह लेख आप जरूर सबको शेयर करना)


18- यह कहना गलत है कि इसे कई बार में बनाया गया, इसे एक बार में ही बनाया गया है।


19- मीनार में बाहरी ओर लिखावट में फारसी का इस्तेमाल किया गया है। जो कि बाद में मुस्लिम शासकों ने चालबाजी के तहत इस्तेमाल किया 


20- इस मीनार के चारों ओर 27 नक्षत्रों के सहायक मंदिर थे, जिन्हें तोड़ दिया गया है । इन्हीं मंदिरों के मलबे से एक मस्जिद बनाई गई कुव्वत उल इस्लाम... जिसका पूरा ढांचा मंदिर जैसा ही प्रतीत होता है ।





- ये सारे दावे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) के पूर्व निदेशक धर्मवीर शर्मा के हैं ।  उनके अनुसार, यह कुतुबमीनार नहीं, बल्कि यह एक सूर्य स्तंभ है ।


- एएसआइ के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक धर्मवीर शर्मा का यह भी कहना है कि यह मीनार एक वेधशाला है जिसमें नक्षत्रों की गणना की जाती थी। 27 नक्षत्रों की गणना के लिए इस स्तंभ में दूरबीन वाले 27 स्थान हैं। 

- धर्मवीर शर्मा का यह भी दावा है कि इस स्तंभ की तीसरी मंजिल पर सूर्य स्तंभ के बारे में जिक्र भी है।


- यहां बता दें कि धर्मवीर शर्मा देश के विख्यात पुरातत्वविदों में शामिल हैं, जो एएसआइ के दिल्ली मंडल में 3 बार अधीक्षण पुरातत्वविद रहे ।


-उन्होंने यहां रहते हुए कुतुबमीनार में कई बार संरक्षण कार्य कराया है, अनेक बार इसके अंदर गए हैं। उस देवनागरी लिखावट को देखा है, जो इसके अंदर के भागों में है । ये खगोलविज्ञानियों को लेकर हर साल 21 जून को कुतुबमीनार परिसर में जाते हैं।



गुरुवार, 19 मई 2022

यदि ऐसा हो जाय कभी तो

 जरा कुछ पल निकाल कर पढ़िए इसको🙏🏻🙏🏻


#यदि 02 सेकंड के लिए धरती से ऑक्सीजन केवल  2 सेकेंड के लिए गायब हो जाए तो क्या होगा??


02 सेकंड के लिए धरती बहुत ठंडी हो जाएगी.


जितने भी लोग समुद्र किनारे लेटे हैं...उन्हें तुरंत सनबर्न होने लगेगा.


दिन में भी अँधेरा छा जाएगा.


हर वह इंजन रूक जाएगा जिनमें आंतरिक दहन होता है. 


रनवे पर टेक ऑफ कर चुका प्लेन वहीं क्रैश हो जाएगा.


धातुओ के टुकड़े बिना वेल्डिंग के ही आपस में जुड़ जाएंगे.

.

ऑक्सीजन न होने का यह बहुत भयानक साइड इफेक्ट होगा......


पूरी दुनिया में सबके कानों के पर्दे फट जाएंगे....क्योंकि 21% ऑक्सीज़न के अचानक लुप्त होने से हवा का दबाव घट जाएगा.


सभी का बहरा होना पक्का है.


कंक्रीट से बनी हर बिल्डिंग ढेर हो जाएगी.


हर जीवित कोशिका फूलकर फूट जाएगी. 

.

पानी में 88.8% ऑक्सीज़न होती है. 

ऑक्सीजन न होने पर हाइड्रोजन गैसीय अवस्था में आ जाएगी और इसका वाॅल्यूम बढ़ जाएगा. 

हमारी साँसे बाद में रूकेंगी, हम फूलकर पहले ही फट जाएंगे.


समुद्रों का सारा पानी भाप बनकर उड़ जाएगा.....क्योंकि बिना ऑक्सीजन पानी हाइड्रोजन गैस में बदल जाएगा और यह सबसे हल्की गैस होती है तो इसका अंतरिक्ष में उड़ना लाज़िमी है.


ऑक्सीजन के अचानक गुम होने से हमारे पैरों तले की जमीन खिसककर 10-15 किलोमीटर नीचे चली जाएगी.


........रूह कांप गई क्या??? 


पेड़ लगाना जरूरी है जीवन बचाना जरूरी है  वो तब बचेगा जब पर्यावरण बचेगा।


इसलिए अपने जीवनकाल में कुछ वृक्ष जरूर लगाएं.🌲🌲🌳🌳🌲🌲🌳🌳🌲🌲🌳🌳🌲🌲


प्रकृति में सभी कुछ जो भी बनाया है वो इस जींवन चक्र को चलाने के लिए बहुत जरूरी है

अगर कुछ भी अनबेलेंस होगा तो जींवन का अंत निश्चित हे

सोमवार, 16 मई 2022

रवि अरोड़ा की नजर से...........

 किसान आंदोलन की वापसी / रवि अरोड़ा



हवाओं में अब एक नए सवाल की आमद हो गई है । सवाल यह है कि क्या एक बार फिर देश के किसान कोई बड़ा आंदोलन करेंगे ? किसान नेता राकेश टिकैत की मानें तो अब से तेरह महीने बाद ऐसा होने वाला है और इस बार आंदोलन फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर होगा । हालांकि आंदोलन की रूप रेखा की घोषणा उन्होंने नहीं की मगर आंदोलन का एलान तो सार्वजनिक रूप से कर ही दिया है । बेशक भारतीय किसान यूनियन में एक बार फिर टूट हो गई है मगर इस ग्यारहवीं फूट से भी किसानों पर टिकैत परिवार की पकड़ कमजोर नहीं होने वाली । खैर, राकेश टिकैत की इस घोषणा के बाद अब यह जरूरी हो चला है कि दिल्ली की सीमाओं पर चले एक साल से अधिक लंबे किसानों के आंदोलन की समीक्षा की जाए और इस बात की भी पड़ताल की जाए कि क्या आंदोलन के बिना किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता ? यह भी समझना होगा कि कृषि संबंधी तीनों विवादित कानून वापिस लेने के बाद केंद्र सरकार ने किसानों की अभी तक सुध क्यों नहीं ली ? 


दरअसल शनिवार को दिल्ली स्थित गांधी शान्ति प्रतिष्ठान में किसान आंदोलन के विभिन्न पहलुओं को समेटती पुस्तक ' संकट में खेती : आंदोलन पर किसान ' का विमोचन हुआ था । जनपक्षीय लेखकों और पत्रकारों के लेखों से सुसज्जित इस किताब का संपादन किया है जाने माने पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी ने । इस किताब में मेरा लेख ' किसान आंदोलन का पंजाब कनेक्शन ' भी शामिल किया गया है । पुस्तक का विमोचन संयुक्त किसान मोर्चा के समन्वयक डाक्टर दर्शन पाल, किसान नेता राकेश टिकैत और प्रोफेसर अभय कुमार दुबे ने संयुक्त रूप से किया था । कार्यक्रम में जहां अन्य किसान नेताओं ने अपने 378 दिन लंबे आंदोलन पर विस्तार से प्रकाश डाला वहीं राकेश टिकैत ने तेरह महीने बाद पुनः आंदोलन की घोषणा कर सबको चौंका दिया । 


जिस न्यूनतम समर्थन मूल्य यानि एमएसपी को लेकर आंदोलन की घोषणा की गई है वह कोई नया मुद्दा नहीं है । पिछले आंदोलन की मांगों में भी यह शामिल था और किसान चाहते थे कि इस पर कानून बने । सरकार ने तब घोषणा की थी की एक कमेटी बना कर उसकी संस्तुति को वह लागू करेगी मगर पांच महीने हो गए मगर अभी तक कमेटी का ही गठन नहीं किया गया । किसान नेता छोटे किसानों को कर्ज के बोझ से निकालने की भी मांग कर रहे थे मगर उस पर भी चर्चा अभी तक नहीं हुई । किसान इस बात से भी कुपित हैं कि सड़कों से दस साल से अधिक पुराने डीजल वाहनों को हटाने की मुहिम में ट्रैक्टर को क्यों शामिल किया गया ? बिजली के दाम और पानी की आपूर्ति भी मुद्दा है मगर सरकार की ओर से धरना समाप्त होने के बाद इस ओर भी अभी तक विचार नहीं किया गया । 


बेशक धरने और आंदोलन किसी के हित में नहीं हैं । पिछले आंदोलन में सात सौ से अधिक किसानों की मौत हुई थी और लाखों लोग सड़कें बाधित होने से हलकान हुए थे । देश का आर्थिक चक्का धीमा हुआ था सो अलग । मगर ऐसा क्यों है कि सरकार बिना धरने प्रदर्शन के सुनती ही नहीं ? क्यों उसकी चिंताओं में किसान आखिरी पायदान पर खड़े नज़र आते हैं ? जबकि देश की सबसे बड़ी आबादी खेती किसानी के बल पर ही जिंदा है । कोरोना और आर्थिक मंदी में भी देश की अर्थव्यवस्था किसानी के दम पर ही टिकी रही । पता नहीं क्यों सरकार को हवाई डींगे मारने से ही फुर्सत नही है । बीस फीसदी पैदावार कम होने ने बावजूद प्रधान मंत्री कुछ दिन पहले विश्व पटल पर डींग मारते हैं कि भारत पूरी दुनिया का पेट भरने में सक्षम है और फिर अचानक गेंहू का निर्यात बंद कर देते हैं । रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध के कारण गेंहू के दाम अंतराष्ट्रीय बाजार में यूं भी चढ़े हुए हैं मगर भारतीय किसान को उसका फायदा ही नहीं मिल रहा । विचारणीय है कि क्या किसी बड़े औद्योगिक घरानों के हाथ में खेती होती , तब भी क्या सरकार ऐसा ही करती ? क्या तब रातों रात उनके पक्ष में फैसले नहीं हो जाते ?

शनिवार, 14 मई 2022

भारतीयता का मूल हैं हमारे परिवार / संजय द्विवेदी

 विश्व परिवार दिवस(15 मई) पर विशेष

#कुटुम्बप्रबोधन 

भारतीयता का मूल हैं हमारे परिवार


जहां मिलती है सुरक्षा, संरक्षण और आत्मविश्वास

-प्रो.संजय द्विवेदी

 

    भारत में ऐसा क्या है जो उसे खास बनाता है? वह कौन सी बात है जिसने सदियों से उसे दुनिया की नजरों में आदर का पात्र बनाया और मूल्यों को सहेजकर रखने के लिए उसे सराहा। निश्चय ही हमारी परिवार व्यवस्था वह मूल तत्व है, जिसने भारत को भारत बनाया। हमारे सारे नायक परिवार की इसी शक्ति को पहचानते हैं। रिश्तों में हमारे प्राण बसते हैं, उनसे ही हम पूर्ण होते हैं। आज कोरोना की महामारी ने जब हमारे सामने गहरे संकट खड़े किए हैं तो हमें सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संबल हमारे परिवार ही दे रहे हैं। व्यक्ति कितना भी बड़ा हो जाए उसका गांव, घर, गली, मोहल्ला, रिश्ते-नाते और दोस्त उसकी स्मृतियां का स्थायी संसार बनाते हैं। कहा जाता है जिस समाज स्मृति जितनी सघन होती है, जितनी लंबी होती है, वह उतना ही श्रेष्ठ समाज होता है।

    परिवार नाम की संस्था दुनिया के हर समाज में मौजूद हैं। किंतु परिवार जब मूल्यों की स्थापना, बीजारोपण का केंद्र बनता है, तो वह संस्कारशाला हो जाता है। खास हो जाता है। अपने मूल्यों, परंपराओं को निभाकर समूचे समाज को साझेदार मानकर ही भारतीय परिवारों ने अपनी विरासत बनाई है। पारिवारिक मूल्यों को आदर देकर ही श्री राम इस देश के सबसे लाड़ले पुत्र बन जाते हैं। उन्हें यह आदर शायद इसलिए मिल पाया, क्योंकि उन्होंने हर रिश्ते को मान दिया, धैर्य से संबंध निभाए। वे रावण की तरह प्रकांड विद्वान और विविध कलाओं के ज्ञाता होने का दावा नहीं करते, किंतु मूल्याधारित जीवन के नाते वे सबके पूज्य बन जाते हैं, एक परंपरा बनाते हैं। अगर हम अपनी परिवार परंपरा को निभा पाते तो आज के भारत में वृद्धाश्रम न बन रहे होते। पहले बच्चे अनाथ होते थे आज के दौर में माता-पिता भी अनाथ होने लगे हैं। यह बिखरती भारतीयता है, बिखरता मूल्यबोध है। जिसने हमारी आंखों से प्रेम, संवेदना, रिश्तों की महक कम कर भौतिकतावादी मूल्यों को आगे किया है।

न बढ़ाएं फासले, रहिए कनेक्टः

    आज के भारत की चुनौतियां बहुत अलग हैं। अब भारत के संयुक्त परिवार आर्थिक, सामाजिक कारणों से एकल परिवारों में बदल रहे हैं। एकल परिवार अपने आप में कई संकट लेकर आते हैं। जैसा कि हम देख रहे हैं कि इन दिनों कई दंपती कोरोना से ग्रस्त हैं, तो उनके बच्चे एकांत भोगने के साथ गहरी असुरक्षा के शिकार हैं। इनमें माता या पिता, या दोनों की मृत्यु होने पर अलग तरह के सामाजिक संकट खड़े हो रहे हैं। संयुक्त परिवार हमें इस तरह के संकटों से सुरक्षा देता था और ऐसे संकटों को आसानी से झेल जाता था। बावजूद इसके समय के चक्र को पीछे नहीं घुमाया जा सकता। ऐसे में यह जरूरी है कि हम अपने परिजनों से निरंतर संपर्क में रहें। उनसे आभासी माध्यमों, फोन आदि से संवाद करते रहें, क्योंकि सही मायने में परिवार ही हमारा सुरक्षा कवच है।

   आमतौर सोशल मीडिया के आने के बाद हम और ‘अनसोशल’ हो गए हैं। संवाद के बजाए कुछ ट्वीट करके ही बधाई दे देते हैं। होना यह चाहिए कि हम फोन उठाएं और कानोंकान बात करें। उससे जो खुशी और स्पंदन होगा, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। परिजन और मित्र इससे बहुत प्रसन्न अनुभव करेगें और सारा दिन आपको भी सकारात्मकता का अनुभव होगा। संपर्क बनाए रखना और एक-दूसरे के काम आना हमें अतिरिक्त उर्जा से भर देता है। संचार के आधुनिक साधनों ने संपर्क, संवाद बहुत आसान कर दिया है। हम पूरे परिवार की आनलाईन मीटिंग कर सकते हैं, जिसमें दुनिया के किसी भी हिस्से से परिजन हिस्सा ले सकते हैं। दिल में चाह हो तो राहें निकल ही आती हैं। प्राथमिकताए तय करें तो व्यस्तता के बहाने भी कम होते नजर आते हैं।

जरूरी है एकजुटता और सकारात्मकताः

    सबसे जरूरी है कि हम सकारात्मक रहें और एकजुट रहें। एक-दूसरे के बारे में भ्रम पैदा न होने दें। गलतफहमियां पैदा होने से पहले उनका आमने-सामने बैठकर या फोन पर ही निदान कर लें। क्योंकि दूरियां धीरे-धीरे बढ़ती हैं और एक दिन सब खत्म हो जाता है। खून के रिश्तों का इस तरह बिखरना खतरनाक है क्योंकि रिश्ते टूटने के बाद जुड़ते जरूर हैं, लेकिन उनमें गांठ पड़ जाती है। सामान्य दिनों में तो सारा कुछ ठीक लगता है। आप जीवन की दौड़ में आगे बढ़ते जाते हैं, आर्थिक समृद्धि हासिल करते जाते हैं। लेकिन अपने पीछे छूटते जाते हैं। किसी दिन आप अस्पताल में होते हैं, तो आसपास देखते हैं कि कोई अपना आपकी चिंता करने वाला नहीं है। यह छोटा सा उदाहरण बताता है कि हम कितने कमजोर और अकेले हैं। देखा जाए तो यह एकांत हमने खुद रचा है और इसके जिम्मेदार हम ही हैं। संयुक्त परिवारों की परिपाटी लौटाई नहीं जा सकती, किंतु रिश्ते बचाए और बनाए रखने से हमें पीछे नहीं हटना चाहिए। इसके साथ ही सकारात्मक सोच बहुत जरूरी है। जरा-जरा सी बातों पर धीरज खोना ठीक नहीं है। हमें क्षमा करना  और भूल जाना आना ही चाहिए। तुरंत प्रतिक्रिया कई बार घातक होती है। इसलिए आवश्यक है कि हम धीरज रखें। देश का सबसे बड़ा सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ऐसे ही पारिवारिक मूल्यों की जागृति के कुटुंब प्रबोधन के कार्यक्रम चलाता है। पूर्व आईएएस अधिकारी विवेक अत्रे भी लोगों को पारिवारिक मूल्यों से जुड़े रहने प्रेरित कर रहे हैं। वे साफ कहते हैं ‘भारत में परिवार ही समाज को संभालता है।’

जुड़ने के खोजिए बहानेः

  हमें संवाद और एकजुटता के अवसर बनाते रहने चाहिए। बात से बात निकलती है और रिश्तों में जमी बर्फ पिधल जाती है। परिवार के मायने सिर्फ परिवार ही नहीं हैं, रिश्तेदार ही नहीं हैं। वे सब हैं जो हमारी जिंदगी में शामिल हैं। उसमें हमें सुबह अखबार पहुंचाने वाले हाकर से लेकर, दूध लाकर हमें देने वाले, हमारे कपड़े प्रेस करने वाले, हमारे घरों और सोसायटी की सुरक्षा, सफाई करने वाले और हमारी जिंदगी में मदद देने वाला हर व्यक्ति शामिल है। अपने सुख-दुख में इस महापरिवार को शामिल करना जरूरी है। इससे हमारा भावनात्मक आधार मजूबूत होता है और हम कभी भी अपने आपको अकेला महसूस नहीं करते। कोरोना के संकट ने हमें सोचने के लिए आधार दिया है, एक मौका दिया है। हम सबने खुद के जीवन और परिवार में न सही, किंतु पूरे समाज में मृत्यु को निकट से देखा है। आदमी की लाचारगी और बेबसी के ऐसे दिन शायद भी कभी देखे गए हों। इससे सबक लेकर हमें न सिर्फ सकारात्मकता के साथ जीना सीखना है बल्कि लोगों की मदद के लिए हाथ बढ़ाना है। बड़ों का आदर और अपने से छोटों का सम्मान करते हुए सबको भावनात्मक रिश्तों की डोर में बांधना है।  एक दूसरे को प्रोत्साहित करना, घर के कामों में हाथ बांटना, गुस्सा कम करना जरूरी आदतें हैं, जो डालनी होंगीं। एक बेहतर दुनिया रिश्तों में ताजगी, गर्माहट,दिनायतदारी और भावनात्मक संस्पर्श से ही बनती है। क्या हम और आप इसके लिए तैयार हैं?



शुक्रवार, 13 मई 2022

रवि अरोड़ा की नजर से........

 नंबर किस किस का / 


नैनीताल जाते हुए हर बार रामपुर से होकर गुजरना ही पड़ता है । दो दशक पहले तक तो रामपुर पार करना ही सबसे बड़ी आफत लगती थी । फिर धीरे धीरे रामपुर की काया पलट होने लग गई । पुल बन गए, सड़कें चौड़ी हो गईं और शहर का ऐसा सौंदर्यीकरण हुआ जैसे प्रदेश के कम ही शहरों को नसीब हुआ था । अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की तर्ज़ पर जौहर यूनिवर्सिटी भी देखते देखते खड़ी हो गई । नतीजा रामपुर से गुजरते हुए अच्छा लगने लगा और मन स्थानीय नेता आजम खान को साधुवाद देने को मचलने लगता । इसी बीच आजम खान के अक्खड़पन और सत्ता के दुरूपयोग की खबरें मिलने लगीं तो दुःख भी होता था कि अपने क्षेत्र के लिए आदर्श कार्य करने वाला व्यक्ति निजी आचरण में इतना टुच्चा क्यों है ? सपा सरकार में अपनी चोरी हो गई भैंसों के लिए जब उन्होंने पूरी प्रदेश की पुलिस को ही लगा दिया तो मन नफरत से ही भर उठा । उन्हीं दिनों एक पुलिस कर्मी ने बताया कि लखनऊ से रामपुर आते-जाते समय आजम खान का काफिला सड़क पर कहीं नहीं रुकता और उनकी सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों को पेशाब करने के लिए बोतल अपने साथ जीप में रखनी पड़ती थी । शायद इसी का बदला अब पुलिस कर्मी उनसे लेते हैं और एक खबर के अनुसार सीतापुर जेल से लखनऊ अथवा इलाहाबाद अदालत आते जाते समय काफिला कहीं नहीं रोकते , चाहे आजम खान जितना भी अनुरोध करें । यह सब पढ़ कर हो सकता है कि आपने भी आजम खान के प्रति कोई राय बनाई होगी । या यह भी हो सकता है कि आप उनके बारे में पहले से ही कोई अच्छी अथवा बुरी राय रखते हों मगर पता नहीं क्यों मैं अपने समेत अधिकांश लोगों को आजकल फिर आजम खान के पक्ष में खड़ा देखता हूं । 


बेशक अपने पाले में लाने की गरज से आज राहुल गांधी, मायावती, औवेसी और शिवपाल यादव जैसे विपक्षी नेता आजम खान के साथ खड़े दिख रहे हों मगर सच्चाई यही है कि प्रदेश में मुस्लिमों के इस सबसे बड़े नेता की सवा दो साल की जेल के दौरान किसी ने भी उनका साथ नहीं दिया । स्वयं उनकी पार्टी सपा ने भी न जाने क्या सोच कर उनसे किनारा किए रखा और उसी का नतीजा यह हुआ कि जैसे ही उन्हें पुराने किसी मामले में अदालत से जमानत मिलती है , सरकार नया मुकदमा ठोक देती है । अब तक उनके खिलाफ 88 मुकदमे दर्ज हुए हैं और 87 में जमानत मिलने के बावजूद वे जेल से बाहर नहीं आ सके हैं । यह सब देख कर हैरानी होती है कि कानून, न्याय और व्यवस्था के नाम पर यह क्या मज़ाक हो रहा है ? क्या उनका असली कसूर मुस्लिम होना ही है ?  चाहे कुछ भी हो जमानत मिलना आजम खान का कानूनी हक है और कोई कैसे उन्हें इससे महरूम रख सकता है ? यकीनन उनके बाबत हाई कोर्ट की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है कि उन्होंने सत्ता का दुरुपयोग किया और अच्छे कामों के बावजूद साधनों की पवित्रता का ध्यान नहीं रखा मगर सुप्रीम कोर्ट का यह सवाल भी तो बहुत अहम है कि ऐसा हर बार कैसे हो जाता है कि जमानत मिलते ही आजम खान के खिलाफ अगले दिन नया मामला दर्ज कर लिया जाता है ? सुप्रीम कोर्ट की इस तल्ख टिप्पणी के बाद बेशक अब आजम खान जेल से बाहर आ जाएं मगर यह तो विचारणीय है ही कि इन सवा दो सालों में उन्होंने जो यातनाएं भुगतीं , क्या उनसे कोई नया अध्याय खुलेगा ? 


राजनीति में बदले की कार्रवाई का कोई स्थान नहीं होना चाहिए मगर दुर्भाग्य से यह कार्य नेहरू काल से ही मुल्क में चला आ रहा है । इंदिरा गांधी ने इसे और गति प्रदान की तो भाजपा शासन में यह सरपट ही दौड़ रहा है । पी चितंबरम द्वारा अमित शाह को जेल भिजवाने और बाद में अमित शाह द्वारा उन्हें जेल की रोटी खिलवाने जैसे पचासों उदाहरण हम लोग देख चुके हैं । तमाम राज्यों में भी यह तमाशा हो रहा है तो उधर उत्तर प्रदेश में अब सारे रिकॉर्ड ही टूट रहे हैं । पता नहीं कहां थमेगा यह सिलसिला । मुझे ज्यादा कुछ तो नहीं पता मगर इस बात का गवाह जरूर हूं कि इस देश की जनता रोटी जलने से बचाने के लिए उलटती पलटती है । आने वक्त में उसने फिर रोटी पलटी तो फिर पता नहीं किस किस बड़े आदमी का नंबर आयेगा ।

मंगलवार, 10 मई 2022

बिसलरी नहीं केवल सेना जल की मांग करें

 🙏छोटा सा अनुरोध


प्रस्तुति -  प्रदीप कुमार 


सेना जल पिओ और पिलाओ  शहीदों की विधवा वीरांगनाओ क़ो आत्म निर्भर बनाओ 


 कृपया अपने ग्रुप में फॉरवर्ड करें। आपका यह छोटा सा कदम हमारी सेना की मदद के लिए एक मील का पत्थर साबित हो सकता  है।🙏


 बिसलेरी और एक्वाफिना विदेशी कंपनियां हैं। 

 इस पानी को खरीदने में जो पैसा खर्च होता है वह भारत से दूसरे देशों में जाता है।


 भारतीय सेना के जवानों का एक छोटा सा अनुरोध है:


 यात्रा करते समय या खरीदारी करते समय "सेना जल" (सेना जल) की मांग कीजिये।

 यह सेना जल (सेना का पानी) लगभग सभी जगहों पर (थोक में भी) उपलब्ध है।


 आर्मी वाईव्स वेलफेयर एसोसिएशन ऑफ इंडियन आर्मी ने सेना जल की शुरुआत की है।  इसकी शुरुआत स्वर्गीय जनरल विपिन रावत की पत्नी मधुलिका रावत ने की थी।  यह पैक आधा लीटर और एक लीटर के पैक में उपलब्ध है।

 आधा लीटर की कीमत ₹6/-

 एक लीटर ₹10/- मात्र।

 अन्य कंपनियां 20 रुपये प्रति लीटर पर पानी बेच रही हैं!

 सेना जल की बिक्री से अर्जित लाभ को सैन्य कल्याण समिति को भेजा जाता है।

 शहीद सैनिकों के परिवारों और उनके बच्चों की शिक्षा पर पैसा खर्च किया जाता है!


 सेना जल (सेना का पानी) भारतीय सेना द्वारा निर्मित है। इस उपक्रम में सभी सैनिक पत्नियां ही कार्य करती हैं। इसलिए टेलीविजन या किसी भी मीडिया द्वारा कोई समाचार या प्रचार नहीं किया जाता है।  सेना के पानी को कम दर पर बेचने का यह एक कारण है।  इसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं क्योंकि कोई प्रचार-प्रसार पर व्यय नहीं होता है!


 जब भी पैक्ड पेयजल खरीदना हो, तो दुकानदार/ विक्रेता से सेना जल (सेना का पानी) मांगें।


 यदि आपको अपनी सेना और अपने राष्ट्र पर गर्व है तो कृपया इस संदेश को हर जगह फैलाने के लिए व्यापक रूप से साझा करें!


🇮🇳🇮🇳🇮🇳  जय हिंद 🇮🇳🇮🇳🇮🇳

https://www.amarujala.com/india-news/army-wives-welfare-association-brings-packaged-water-bottle-sena-jal-at-rs-6-each

दाता राम नागर की कहानी

 


Saturday, 19 March 2016

इतिहास की एक विस्मृत प्रेम कहानी : दाताराम नागर और नारघाट की पगली

"कालापानी कहाँ है...?" सुंदर हर आने जाने वाले से यह सवाल पूछा करती थी। यही एक सवाल था जिसे मिर्जापुर की गलियों, सड़कों, मुहल्लों से पूछती हुई सुंदर शाम होते होते नारघाट की सीढ़ियों पर गंगा मे पाँव लटकाकर बैठ जाती थी।

"दूर, बहुत दूर कोई टापू है, जहां से लौटकर कोई नही आता।''

इतना सुनकर तो सुंदर का हृदय ही भर आता और उसके होंठ हिलने लगते। वह गुनगुनाने लगती-

सबकर नइया जाला रामा कासी हो बिसेसर रामा,

नागर नईया जाला कालेपनियां रे हरी...!

उसका स्वर धीरे धीरे ऊंचा होता जाता। इधर निस्तब्ध घाट और उधर जनरव का कोलाहल इन दोनों की छाती चिरती चली जाती। आकाश मे गूँजती करुण ध्वनि सूने पाषाण तटों, चंचल तरंगो और थपेड़ती हवाओं मे क्रंदन मचाती, कजरी पर कान धरे लोगों के कानों के पार हो जाती---

घरवा मे रोवे नागर माई और बहिनियाँ रामा,
सेजिया पे रोवे बारी धनियाँ रे हरी...!
खूँटियाँ पर रोवे नागर ढाल तरवरिया रामा,
कोनवा मे रोवे कड़ाबिनियाँ रे हरी...!

घाट से गूँजता यह गीत सुनकर लहरों पर नाचती नौकाएँ घाट की ओर सरकने लगती--

रहिया मे रोवे तोर संगी और साथी रामा,
नारघाट पर रोवे कसबिनियाँ रे हरी...!

इतने मे हवाएँ रो पड़ती, लहरें कराह उठतीं, आँखें नदी हो उठती, पतवारे टकराने लगतीं और सुनने वाले फूट फूट कर रोने लगते। बहुत दिन बीते यह कजरी गाते और आँखों से गंगा जमुना बहाते सुंदर एक दिन पागल हो गयी। दिन के दिन और रात के रात बावली-सी फिरती और सुदूर दक्खिन को देखा करती। किसी दीवाने ने बताया था वो उधर दक्खिन मे समुंदर के बीचोबीच है कालापानी। बस यही एक कजरी थी, जिसे सीने मे समाये समाये सुंदर पहले दीवानी हुई और एक दिन पागल हो गयी। उसके अंतिम दिनों मे मिर्जापुर के लोग नारघाट की पगली को पैसे दे दे कर उससे यही कजरी गवाते और करुणा खरीदते रहे। सुनने वालों की आँखों मे नदी बाढ़ बन कर उतर आती, जब वह कलेजे का सारा दर्द निचोड़कर गाती --

जौ मै जनती नागर जाइबा कालेपनियाँ रामा,
हमहूँ चली अवतिन बिनु गवनवा रे हरी...!

यह काशी के इतिहास का एक विस्मृत पन्ना है, जिसे ठीक से पढ़ा नही गया। सन 1772 की काशी अपने गुंडो के प्रसिद्ध थी। हिंदुस्तान मे पाँव पसारते अंग्रेजों का दिया काशी के आसमान मे जलने लगा था। वारेन हैस्टिंग्स द्वारा काशी राज्य की लूट के बाद महाराज चेतसिंह दुर्दशा को प्राप्त हो चुके थे। यद्यपि राजमाता पन्ना की कूटनीतिक चतुराइयों ने वारेन हैस्टिंग्स को काशी से भागकर चुनार मे शरण लेने पर मजबूर कर दिया था लेकिन वह अलग कहानी है। पराभूत हुए राजा की लुटी हुई काशी लगभग अचेत हो चली थी। विदेशी शासन के आतंक ने जब राज्य वीरों की तलवारें म्यान मे रखवा दीं तब काशी के वे नालायक बेटे सचेत हुए और तलवार उठा ली, जो तब के गुंडे कहलाते थे। ये वे गुंडे थे, जिनकी आँखों से निकली चिनगारियाँ लोकमन मे क्रांति के बीज बो रही थी, विद्रोह की पटकथा लिख रही थी और विदेशी गुलामी के साथ-साथ भारत मे आज़ादी के आंदोलन की नींव रख रही थी। ऐसे लोगों मे दाताराम नागर और भंगड़ भिक्षुक प्रमुख थे। अलईपुर मे वाराणसी सिटी स्टेशन के पास जहां आज टीवी अस्पताल है, वहीं भंगड़ भिक्षुक का बगीचा था। बगीचा तो अब नही रहा लेकिन वह कुआं अभी मौजूद है। वहीं ये गुंडे इकट्ठा होते और फिरंगियों को नुकसान पहुंचाने की योजनाएँ बनाया करते थे। एक तरफ ये लोग थे जो कहलाते तो गुंडे थे, लेकिन यह गुंडई मातृभूमि पर कुर्बान थी तो दूसरी तरफ शंभूराम पंडित,बेनीराम पंडित, मौलवी अलीउद्दीन, मुंशी फ़ैयाज़ अली और मिर्जापुर मे अंग्रेजों के ठेकेदार बनकट मिसिर अंग्रेजों की ठकुरसुहाती और सहायता करते थे। इनमे से अधिकतर तो अक्सर इन गुंडो के भय से छुप के ही रहते थे लेकिन मुंशी फ़ैयाज़ अली बनारस के नायब और बनकट मिसिर बनारस से दूर मिर्जापुर मे रहने के कारण अपने को खतरे से बाहर समझते थे। नागर के शागिर्दों ने तय किया कि पहले मिसिर से ही निपट लिया जाय। नागर ने मिसिर को सनेसा भेजकर कहलाया कि अगली पूर्णिमा को ओझला नाले पर भांग छानने का न्योता है। मिसिर ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया। उसने भी कहला भेजा कि भोजन पानी का प्रबंध मेरी ओर से होगा। खुल्ली लड़ाई का खुल्ला न्योता था।

बनकट मिसिर अपने साथ सौ लठैतों को लेकर आया था। नागर भी अपने भाइयों,मित्रों और शागिर्दों की पलटन के साथ पहुंचा था। एक ओर पच्चीसों सिलबट्टे खटक रहे थे,तो दूसरी ओर कड़ाहियों मे पूड़ियाँ छन रही थी। भांग बूटी छानने और खाना पानी हो जाने के बाद दोनों दलों मे जमकर भिड़ंत हुई । और अंत आते आते दोनों दलप्रमुख एक दूसरे के सामने आ खड़े हुए। नागर ने खांडा चलाया और मिसिर ने अपनी लाठी पर वार रोका। लेकिन खाँड़े की धार मे लाठी तिनके की तरह बह गयी। मिसिर पीछे हटा। नागर की तलवार मे दुर्गा बसती थी। इस मार से मिसिर लड़खड़ाया और अचानक पीछे घूमकर भाग चला। अजोरिया रात होने के कारण मिसिर नागर की नजर से ओझल नही हो पाता था। लेकिन मर्दों की जात के साथ जैसा होता है वैसा ही हुआ। सहसा नागर ने सोचा भागते हुए निहत्थे शत्रु का पीछा करना अधर्म है और वह ठिठक गया। नागर मिसिर का पीछा छोडकर लौट पड़ा। रात लगभग आधी बीत चुकी थी, चाँदनी सोलहों कलाओं मे खिली हुई, दूर-दूर तक फैला बालू रेत का इलाका चाँदनी मे चमक रहा है। निस्तब्ध रजनी मे धप धप चलते नागर के पैरों के स्वर उठ रहे हैं। सात फुट का नागर.....यूं लगे कि जैसे नाहर ही चला आता हो कोई। अचानक उसकी नज़र ठिठकी। देखा तो दूर सामने टीले से सटकर एक सफ़ेद गठरी-सी कोई वस्तु पड़ी है। उसका हृदय संदेह से भर उठा। शत्रु की कोई चाल तो नही है। उसने निगाह जमाये रखी। ज़रा करीब आया तो समझ मे आया कोई स्त्री है शायद। नागर की देह पर रोएँ भरभरा उठे, पूरा शरीर कांप गया। वीर हृदय मे जरा देर को भय-सा व्याप्त हुआ कि इस निचाट वन प्रदेश मे कोई भूत प्रेत तो नही...! पूरे वातावरण की गोलाई मे घूमती हुई उसकी नज़र अपने हाथ की तलवार पर पड़ी। तलवार की चमक आँखों मे उतरी तो मन ज़रा मजबूत हुआ। लोहे के सामने प्रेत नही ठहरते। तलवार की मूठ पर हाथ धरे नागर आगे बढ़ा। उसे पास आते देखकर नारी-मूर्ति उठ खड़ी हुई। लज्जा, संकोच, भय और दुविधा भरी एक दृष्टि उसने नागर पर डाली। नागर ने भी उसे भरी आँख से देखा। गौरवर्ण सौंदर्य की अद्वितीय निर्मिति। अत्यंत मनोहर एक युवा स्त्री का सामीप्य और निरभ्र, निस्तब्ध आधी रात। इस अनपेक्षित किन्तु प्रिय-सी लगी उपस्थिति से आलोड़ित पुरुष सिंह ने आँखों ही आँखों मे स्त्री का मूक परिचय मांगा। इस सिंह सदृश पुरुष मूर्ति को अपने सामने खड़े देखकर स्त्री कुछ आश्वस्त हुई।

नागर की मरोड़ी हुई नोकदार मूंछें, कमर मे खोंसी हुई कटार, लंबा छरहरा कमाया हुआ शरीर, पट्टेदार घुँघराले बाल और डोरा पड़ी रतनार आँखें। स्त्री का संकोच जाता रहा। अत्यंत प्रगल्भा की तरह वह धीरे से हंसी और आगे बढ़कर नागर का हाथ थाम लिया। नागर के शरीर मे बिजली दौड़ गयी और मांसपेशियाँ सनसना उठीं। स्त्री सौंदर्य का स्नेहिल साहचर्य पाकर पुरुष मन भी स्नेहार्द्र प्रलुब्ध हो उठा। झनझनाए हुए हाथों ने स्त्री को अपनी ओर खींचा। यह जो हो रहा था, अभी आगे भी होता और न जाने किस सीमा तक होता ही जाता, आगे नही हुआ। वह उसे खींच रहा था। वह उसमे खिंची आती थी....कि अकस्मात नागर की रतनारी आँखों के सामने स्वर्गीय पिता की मूरत नाच उठी। पिता के बोल कान मे कौंधे--''बेटा, वीर-व्रत मे दीक्षित पुरुष परस्त्री को माता समझता है।''

नागर तड़पकर पीछे हटा और कड़कती हुई आवाज मे पूछा--'तू कौन है स्त्री...?"

''ऐसे ही पूछते हैं क्या...?'' स्त्री ने प्रश्न के जवाब मे प्रश्न ही उछाला।

नागर कुछ कदम पीछे हटकर खड़ा हुआ। जो किसी नारी के सामने कभी पुरुष हुआ ही नही, उस नागर का हृदय पहले व्यथा से भरा फिर स्निग्ध हो आया। वह हताश होकर बोला--"अच्छा भई, तुम कौन हो...?''

स्त्री हंसकर बोली--'' पहले एक प्रतिष्ठित ठाकुर की कन्या थी, अब किसी की रखैल, कसबिन हूँ।''

''ऐसा कैसे हुआ...?'' नागर ने पूछा।
"वैसे ही जैसे यहाँ आते आते तो तुम मर्द थे, पर यहाँ आते ही देवता बन गए।''
"तुम्हें कसबिन किसने बनाया...?"
"सब बनकट मिसिर की किरपा है। सालभर हुआ। मै अपनी बारी मे आम बीन रही थी। वहीं से मिसिर ने मुझे उठवा लिया और कसबिन से भी बदतर बनाकर रख छोड़ा। "
"इस बखत यहाँ कैसे...?"
"सुना था आज मिसिर से किसी की ठनी बदी है। देखने आई थी कि मिसिर का गला कटे और मेरी छाती ठंडी हो। लेकिन भागते हुए मिसिर ने मुझे यहाँ देख लिया है। अब बड़ी दुर्दशा है मेरी। तुम्हारी सरन हूँ। राच्छा करो।"
नागर ने दो मिनट कुछ सोचकर कहा- "तुम नारघाट चलो। मै वहीं तुमसे मिलता हूँ।"

नागर ने वहीं उसी क्षण तय किया कि अब आज मिसिर का अंतिम दिन है। वह फिर उसी ओर को चला जिधर उसे भागता छोडकर वह लौटा था। नागर की आहट मिली पर मिसिर ने पीछे घूमकर नही देखा। नागर चिल्लाया- "ठहरो मिसिर। किसी भरम मे मत रहना। काट के फेंक दूंगा आज।'' मिसिर ठठाकर हंसा--" मालूम है नागर, तुम्हारा शागिर्द भी निहत्थे पर वार नही करता।"

"लेकिन मिसिर, तुमने काम बहुत खराब किया है। एक तो देश फिरंगियों के हाथ मे बेच दिया। तिसपर एक कुँवारी कन्या की इज्जत भी उतार ली। तुम्हें तो आज काटना ही पड़ेगा" गुमशुदा इतिहास के इन पन्नो मे दर्ज है कि नागर ने निरस्त्र शत्रु को अपनी कटार दे दी और खुद अपना बिछुआ संभाला। लेकिन यह लड़ाई दो मिनट भी नही ठहरी और देखते ही देखते देश और देश की स्त्री का गद्दार बनकट मिसिर गंगा की घाटी मे बालू पर पड़ा तड़प रहा था। नागर की खुखरी उसके सीने मे थी और नागर गहरी साँसे ले रहा था। इसी तड़प मे तड़पता नागर नारघाट की ओर चला। समाज से बहिष्कृत सुंदर को उसने निःस्वार्थ भाव से आश्रय दिया और नारघाट मे ही किराये का एक घर लेकर उसे वहाँ टिकाया। उसके खाने पीने की व्यवस्था की और उसे नृत्य तथा गीत संगीत की शिक्षा दिलाने लगा। बनारस से जब कभी भी वह मिर्जापुर जाता तो उसकी सारी परेशानियाँ सुलझाता, सारी व्यवस्था देखता और खास बात ये कि दिन रहते रहते उसके यहाँ से वापस चला आता। रात उसने उसके घर पर कभी नही गुजारी। उसे वह सुंदर कहकर बुलाता था। वह उसे सुंदर लगती थी।

एक दिन मिर्जापुर मे ही उसे खबर मिली कि बनारस के गद्दार और बनकट मिसिर के साथी नायब फ़ैयाज़ अली इस बार फिर मुहर्रमी जुलूस के दुलदुल घोड़े को ठठेरी बाजार की ओर से निकलवाने की कोशिश कर रहे हैं। जब से कंपनी का राज हुआ था, नायब साहब की शामें फिरंगी अफसरों के साथ गुजरने लगी थीं। पिछले दो सालों से नायब फ़ैयाज़ अली मुहर्रमी जुलूस के लिए नए नए रास्ते निकालने की कोशिश कर रहे थे। नागर फिरंगियों की चाल समझता था और दोनों ही बार उसने नए रास्तों से जुलूस न जाने दिया था। इस बार उसने सुना कि फ़ैयाज़ अली जुलूस के साथ फिरंगी पलटन भी भेजेंगे। नागर का खून खौल उठा। वह मिर्जापुर से सीधे बनारस आया और ठठेरी बाज़ार मे उस समय पहुंचा जब दुलदुल का घोडा उसके ठीक सामने से गुजर रहा था। नागर ने पूरी ताक़त से तलवार घोड़े पर चला दी। घोडा दो टुकड़े होकर गिर गया। फिरंगी पलटन नागर पर टूट पड़ी। लेकिन गोरों की संगीनों का सामना भी नागर की तलवार से था। अंततः संगीनें झुक गईं और तलवार रास्ता चीरती आगे बढ़ गयी। इस घटना के बाद ब्रहमनाल मे उमरावगिरि की बावड़ी के एक नाले मे नागर दो दिन छिपा रहा। यहाँ कुछ असुरक्षित महसूस करके वह एक रात राजघाट निकल आया और रातभर किले की खोह मे छिपा रहा। फिरंगी पागल कुत्ते की तरह खोज रहे थे नागर को। एक दिन पड़ाव से होते हुए रामनगर मार्ग पर कटेसर गाँव के नजदीक लोटे मे पानी लेकर निपटने जाते समय सटीक मुखबिरी पर गोरी पलटन ने नागर को सुबह सुबह निहत्थे घेर लिया। खाली हाथ होते हुए भी केवल लोटे से दो चार सिपाहियों की खोपड़ी तोड़ने के बाद नागर आखिर गिरफ्तार हो गया। अंग्रेजों ने राहत की सांस ली। फ़ैयाज़ अली का जी जुड़ाया और बनारस का मान मस्तक झुका। डरे हुए अंग्रेजों ने नागर को बीस साल कालापानी की सजा सुनाई। कालापानी की सजा सुनकर नागर के संगी साथी और शागिर्द रो पड़े। उन बहादुरों का पत्थर जैसा कलेजा भी हिल गया और हिचकियाँ बंध गईं। लेकिन हथकड़ियों और जंजीरों मे जकड़ा हुआ शेर बिलकुल लाठी की तरह सीधा तनकर खड़ा हो गया। आँखों के डोरे और लाल हो गए। उसके पतले होंठों पर घृणा मुस्कान बनकर फैल गयी। उसने जज की तरफ आँखें तरेरकर देखा। नागर की आँखों की आग सहन नही हुई तो जज ने आँखें नीची कर लीं और होंठों ही मे बुदबुदाया- "बहादुर आदमी है...!" नागर की जलती हुई आँखें साथियों की ओर घूम गईं। आँखों मे क्रोध भरा था, जुबान गरजकर बोली--"ये नामर्दों की तरह रोते क्यो हो रे...? बीस बरस कोई ब्रह्मा के दिन नही हैं। चुटकियों मे उड़ जाएँगे। जाओ गुरु जी से कह देना कि सुंदर की खोज खबर लेते रहेंगे। नागर के चेले भारी मन से अदालत से बाहर निकले। " नागर एक बार पैर के पंजों पर जरा सा उठा तो सारी नसें कड़कड़ाकर बोल उठीं। अपना शरीर जरा दाहिने बाएँ हिलाया तो भुजदंडो पर मछलियाँ उभर आयीं। बेड़ियाँ झनझनाईं और बंधे हुए शेर की मानिंद नागर झूमता हुआ जब चला तो गिरते पड़ते फिरंगी सिपाही उसके पीछे हो लिए।
भंगड़वा फिरंगी को उसकी जात बताएगा और जयरामगिरि गोसाईं सुंदर को खाने पीने का कष्ट नही होने देंगे। जेल की कालकोठरी मे पड़ा पड़ा दाताराम नागर अक्सर ये दो बातें सोचा करता था। सुंदर का ध्यान आते ही उसने करवट बदली और मन पंछी ने उड़ान भर ली। सावन की मेघभरी काली रात है। आकाश के एक कोने मे एक चमकदार तारा झिलमिला रहा है। नागर का साथी भंगड़, शागिर्द बिरजू और गुरु गोसाईं जी मिर्जापुर के चील्ह गाँव मे इक्के से उतरे हैं और नारघाट के लिए नाव मे सवारी की है। इनमे से किसी को नही मालूम कि सुंदर को नागर के कालेपानी जाने की खबर मिल चुकी है। उन्हे यह भी नही मालूम कि सुंदर इस भयावन रात मे भी नारघाट की सीढ़ियों पर बैठी बूढ़ी गंगा के पानी मे पैर झुलाए आकाश की ओर एकटक निहार रही है। किसी को कुछ नही मालूम कि सुंदर ऊपर आसमान मे क्या देख रही है। क्या सोच रही है। सुंदर का मन नीले आकाश के पार तक चला जाता है। क्या वहाँ भी कोई नागर है...? क्या वहाँ भी कोई सुंदर है...? क्या वहाँ भी ऐसे ही तृप्तिहीन, आश्रयहीन घर हैं...? क्या वहाँ भी ऐसी ही लांछना है, ऐसा ही अविचार है...? सुंदर सोचती है कि उससे कितना कम परिचय था...! लेकिन वह तो जन्म जन्मांतर का हो गया। कैसी प्यारी टीस देकर वह कालापानी चला गया....! बीच धारे मे डोलती नौका आधी रात मे कजरी सुन रही है-
सबकर नइया जाला रामा कासी हो बिसेसर रामा,
नागर नईया जाला कालेपनियां रे हरी...
रहिया मे रोवे तोर संगी और साथी रामा,
नार घाट पर रोवे कसबिनियाँ रे हरी।
(ये कहानी एक उपन्यास का हिस्सा है, जिसे 1967 मे लिखा था रूद्र काशिकेय ने और आज हमने अपने शब्दों मे कहने की कोशिश की है। )

2 comments:

  1. बहुत दिलकश है सर ।।

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