मंगलवार, 27 दिसंबर 2022

दुबई डायरी -2 / विवेक शुक्ल

 


दुबई के Spice Souk बाजार में आज जाना हुआ.  इसके नाम से ही पता चल जाता है कि य़ह मसालों का बाजार होगा. सारे बाजार में अफगानिस्तान और पाकिस्तान के Khabar के पठान नजर आए.  यहां उन्हीं की दुकानें हैं. दर्जनों तरह के मसाले बेच रहे हैं.  हर किसी का एक सवाल था- हिन्दुस्तान में पठान हैं? क्या वे पश्तो बोल लेते हैं? हमारे य़ह बताने पर कि भारत में पश्तो बोलने वाले पठान भी हैं, तो उनके  चेहरे  खिल जाते.


 एक पठान ने हम से सरहदी O के बारे में पूछा. बादशाह खान को तो जानते होंगे? हमारा उत्तर  था, सारा भारत उन्हें अपना नायक मानता है. वे हर  एक हिन्दुस्तानी के दिल में हैं. य़ह  सुनते  ही उसने हमारे लिए पेप्सी की बोतल अपने मंगवाई . 

 सब भारत आने को उत्सुक. सब की  चाहत मुंबई,  दिल्ली और आगरा को देखने की.  सुबह ही चला गया था. पता चला कि य़ह दिन में एक दो बजे के बाद गुलज़ार होने लगता है. इधर भारतीय नहीं मिले. कोई मलयाली भी नहीं मिला . वर्ना तो दुबई के हर कदम पर भारतीय हैं. यहां से कुछ खरीद दारी भी की. सबने डिस्काउंट दिया. डिस्काउंट के लिए भाव ताव भी नहीं किया  .

यहां से निकलते हुए एक पठान दुकान दार ने कहा कि ये भी ले लो साहब. वह एक पैकेट में बंद मेवों/ मसालों का mixture था.  हमने प्यार से मना किया. उसने धीरे से कहा,  साहब,  जवानी लौट आएगी.  याद करोगे पठान को...! उसके चेहरे पर शरारती मुस्कान थी. हम ने उसे निराश ही किया.  उससे विदा लेते समय वे पठान याद आने लगे जो दिल्ली में मजमा लगा कर ताकत की दवा बेचते थे.  क्या आपको वे पठान याद हैं? 

जारी 

Vivek Shukla

सोमवार, 26 दिसंबर 2022

उर्दू पत्रकारिता के 200 साल

 

वाराणसी। वाराणसी। उर्दू पत्रकारिता ही बेहतर हिन्दुस्तान के निर्माण में सबसे अहम भूमिका निभा सकता है। उर्दू हिन्दुस्तानी जुबान है इसे किसी एक धर्म से जोड़ना गलत है। उर्दू पत्रकारिता के दो सौ साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आज पराड़कर स्मृति भवन मैदागिन में राइज एंड एक्ट के तहत सेंटर फॉर हार्मोनी एंड पीस के तत्वावधान में “उर्दू पत्रकारिता कल और आज” विषय पर आयोजित सेमिनार में ये बातें प्रोफेसर दीपक मलिक ने कहीं। 

उन्होंने कहा कि उर्दू पत्रकारिता आज के दौर में अहम भूमिका निभा सकता है।उसकी वजह ये है कि उस पर किसी तरह का दबाव नहीं है। उन्होंने कहा कि उर्दू -हिन्दी के भेद से ही समाज में टूटन हो रहा है।आजादी से पहले उर्दू सबकी जुबान थ लेकिन बंटवारे के उसे एक खास धर्म की भाषा ज्ञान लिया गया जबकि पाकिस्तान की भाषा उर्दू नहीं है। बीएचयू के प्रोफेसर आर के मंडल ने कहा कि पत्रकारिता भाषा की बंदिशों से स्वतंत्र है।पत्रकारिता की बुनियाद सच्चाई पर है न कि भाषा पर है, इसलिए उर्दू पत्रकारिता को मुसलमानों के साथ जोड़ना सही नहीं है।

बीएचयू के डॉ अफ़ज़ल मिस्बाही ने कहा कि उर्दू साम्प्रदायिकता की नहीं बल्कि इन्किलाब और मोहब्बत की ज़बान है। वरिष्ठ पत्रकार विश्वनाथ गोकरण ने कहा कि उर्दू जनता को जोड़ने वाली और रेशमी एहसास दिलाने वाली ज़बान है। डॉ क़ासिम अंसारी ने कहा कि आज की उर्दू पत्रकारिता में समय के साथ उर्दू के मुश्किल शब्दों के इस्तेमाल को आसान शब्दों में बदलने की ज़रूरत है।

वरिष्ठ पत्रकार उज्जवल भट्टाचार्य ने कहा कि हमें इस बात पर गौर करना चाहिए कि वह कौन से कारण हैं जिससे आजादी के दौरान जो उर्दू अखबार मुख्यधारा के हुआ करते थे आज वह संकट में हैं। वरिष्ठ पत्रकार केडीएन राय ने कहा कि उर्दू न इंकलाब की भाषा न ही बगावत की ,ये मुहब्बत की भाषा है। 

संगोष्ठी का संचालन डॉ.मोहम्मद आरिफ और धन्यवाद तनवीर अहमद एडवोकेट ने किया। संगोष्ठी में सैयद फरमान हैदर, डॉ रियाज अहमद, आगा नेहाल,कुंवर सुरेश सिंह,रणजीत कुमार,हिदायत आज़मी,डॉ सत्यनारायण वर्मा,डॉ अरुण कुमार,धर्मेंद्र गुप्त साहिल,अज़फर बनारसी,अर्शिया खान,फादर फिलिप,कलाम अंसारी, आगा निहाल,जितेंद्र कुमार आदि ने भी विचार व्यक्त किये। ही बेहतर हिन्दुस्तान के निर्माण में सबसे अहम भूमिका निभा सकता है। उर्दू हिन्दुस्तानी जुबान है इसे किसी एक धर्म से जोड़ना गलत है। उर्दू पत्रकारिता के दो सौ साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आज पराड़कर स्मृति भवन मैदागिन में राइज एंड एक्ट के तहत सेंटर फॉर हार्मोनी एंड पीस के तत्वावधान में “उर्दू पत्रकारिता कल और आज” विषय पर आयोजित सेमिनार में ये बातें प्रोफेसर दीपक मलिक ने कहीं। 

उन्होंने कहा कि उर्दू पत्रकारिता आज के दौर में अहम भूमिका निभा सकता है।उसकी वजह ये है कि उस पर किसी तरह का दबाव नहीं है। उन्होंने कहा कि उर्दू -हिन्दी के भेद से ही समाज में टूटन हो रहा है।आजादी से पहले उर्दू सबकी जुबान थी लेकिन बंटवारे के उसे एक खास धर्म की भाषा ज्ञान लिया गया जबकि पाकिस्तान की भाषा उर्दू नहीं है। बीएचयू के प्रोफेसर आर के मंडल ने कहा कि पत्रकारिता भाषा की बंदिशों से स्वतंत्र है।पत्रकारिता की बुनियाद सच्चाई पर है न कि भाषा पर है, इसलिए उर्दू पत्रकारिता को मुसलमानों के साथ जोड़ना सही नहीं है।

बीएचयू के डॉ अफ़ज़ल मिस्बाही ने कहा कि उर्दू साम्प्रदायिकता की नहीं बल्कि इन्किलाब और मोहब्बत की ज़बान है। वरिष्ठ पत्रकार विश्वनाथ गोकरण ने कहा कि उर्दू जनता को जोड़ने वाली और रेशमी एहसास दिलाने वाली ज़बान है। डॉ क़ासिम अंसारी ने कहा कि आज की उर्दू पत्रकारिता में समय के साथ उर्दू के मुश्किल शब्दों के इस्तेमाल को आसान शब्दों में बदलने की ज़रूरत है।

वरिष्ठ पत्रकार उज्जवल भट्टाचार्य ने कहा कि हमें इस बात पर गौर करना चाहिए कि वह कौन से कारण हैं जिससे आजादी के दौरान जो उर्दू अखबार मुख्यधारा के हुआ करते थे आज वह संकट में हैं। वरिष्ठ पत्रकार केडीएन राय ने कहा कि उर्दू न इंकलाब की भाषा न ही बगावत की ,ये मुहब्बत की भाषा है। 

संगोष्ठी का संचालन डॉ.मोहम्मद आरिफ और धन्यवाद तनवीर अहमद एडवोकेट ने किया। संगोष्ठी में सैयद फरमान हैदर, डॉ रियाज अहमद, आगा नेहाल,कुंवर सुरेश सिंह,रणजीत कुमार,हिदायत आज़मी,डॉ सत्यनारायण वर्मा,डॉ अरुण कुमार,धर्मेंद्र गुप्त साहिल,अज़फर बनारसी,अर्शिया खान,फादर फिलिप,कलाम अंसारी, आगा निहाल,जितेंद्र कुमार आदि ने भी विचार व्यक्त किये।

रविवार, 25 दिसंबर 2022

By Dr. Vinod (AIIMS की सलाह

 *By Dr. Vinod (AIIMS) सभी परिवार के सदस्य कृपया ध्यान दें*


1. कोई भी खाली पेट न रहे

2. उपवास न करें।

3. रोज एक घंटे धूप लें।

4. AC का प्रयोग न करें।

5. गरम पानी पिएं, गले को गीला रखें।

6. सरसों का तेल नाक में लगाएं

7. घर में कपूर वह गूगल जलाएं 

आप सुरक्षित रहें। घर पर रहें।

8. आधा चम्मच सोंठ हर सब्जी में पकते हुए डालें..।

9. रात को दही ना खायें

10. बच्चों को और खुद भी रात को एक एक कप दूध हल्दी डाल कर पिएं

11. हो सके तो एक चम्मच च्यवनप्राश खाएं।

12. घर में कपूर और लौंग डाल कर धूनी दें।

13. सुबह की चाय में एक लौंग डाल कर पिएं।

14. फल में सिर्फ संतरा ज्यादा से ज्यादा खाएं।

15. आंवला किसी भी रूप में चाहे अचार, मुरब्बा,चूर्ण इत्यादि खाएं।

यदि Corona  को हराना चाहते हो तो कृप्या ये सब अपनाइए।


हाथ जोड़ कर प्रार्थना है आप सबसे, आगे अपने जानने वालों को भी यह जानकारी भेजें।

दूध में हल्दी आपके शरीर में इम्यूनिटी को बढ़ाएगा।


........ सभी आईटी सेल इस पोस्ट को जमकर शेयर करें  सभी से मेरी अपील है इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें रातों रात हमे यह मैसेज सभी को पहुँचाना है।

                *धन्यवाद*

दुबई डायरी (1) / विवेक शुक्ल

 


आजकल दुबई में हूं. दुबई में आना इसलिए भी पसंद है क्योंकि इधर हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी साथ साथ काम कर करते हैं. कभी-कभी लगता है कि इनके मन में एक दूसरे के ख़िलाफ़ कोई नफ़रत नहीं है. हिन्दुस्तानी बिजनेस में पाकिस्तानियों से बहुत आगे हैं. पाकिस्तानी नौकरियां कर रहे हैं.  भारतीयों के पास भी जॉब कर रहे हैं. नेपाली,  फिलिपींस,  श्रीलंका के नागरिक भी भारतीयों के  Restaurants, Hotels , बैंकिंग/ वित्तीय सेवाओं  से जुड़े बिजनेस में काम कर रहे हैं. बिजनेस में हम किसी से कम नहीं हैं. य़ह भारत से बाहर जाकर समझ आ जाता है. 


 कल एक फ्लोटिंग restaurant में गया था. वहां से दुबई के खूबसूरत नजारे देखे जा सकते  थे. वह एक भारतीय का बताया जा रहा था. उसमें शेफ पाक से थे.  पंजाबी बोल रहे थे.  मेरे साथ पंजाबी बोल कर खुश हो गए.  मेरेI बुजुर्गों के शहर रावलपिंडी से था हेड  शेफ .  मेरे साथ काफी देर तक रहा. नाम है अब्दुल रहमान.   मैंने उसे बताया कि मेरे दादा जी ने UP से रावलपिंडी में रेलवे में  जाकर जॉब की और उस शहर को अपना मान लिया था . य़ह सुनकर वह भावुक हो  गया.  उसकी पत्नी रामपुर से कराची शिफ्ट हो गए परिवार से है.

 दुबई में अफ्रीकी भरे हुए हैं.  पेंटर, ड्राइवर और गार्ड भी हैं. मेहनत कश हैं. 

 तीन दिनों से अखबार पढ़ रहा हूं.  कोई क्राइम की खबर नहीं मिली. क्या क्राइम की डरावनी ख़बरों को पढ़ने- सुनने के लिए हम ही पैदा हुए हैं?

जारी......... 



शुक्रवार, 23 दिसंबर 2022

बिलावल भुट्टो जरदारी

 अमर उजाला 

बिलावल भुट्टो जरदारी ने कुछ दिन पहले न्यूयार्क में प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी को "गुजरात का कसाई" कहा है।”बिलावल की बयानबाजी पर हैरत करने की आवश्यकता तो नहीं है, क्योंकि उन्हें पता है कि उनके भारत विरोध में ही उनके भविष्य की संभावनाएं छिपी हुई हैं। वे जितना ज्यादा भारत और हिन्दू विरोध करेंगे उतने ही अपने मुल्क में लोकप्रिय होंगे। ये उन्होंने अपने नाना जुल्फिकार अली भुट्टों के भारत को लेकर दिए बीसियों बयानों को पढ़कर सीख लिया होगा ।


जुल्फिकार भुट्टो का कई अर्थों में भारत से करीबी संबंध था। उनके मुम्बई और जूनागढ़ से रिश्तों की जानकारी जगजाहिर है। भुट्टो जब मुम्बई के प्रतिष्ठित कैथडरल स्कूल में पढ़ रहे थे तब उनके परम मित्र थे पीलू मोदी,जो राज्य सभा में भी रहे। पीलू मोदी ने अपनी किताब ‘Zulfi My friend’ में एक जगह लिखा भी है कि हालांकि हम दोनों घनिष्ठ मित्र थे 1946 में, पर जुल्फिकार टू नेशन थ्योरी पर यकीन करते थे। वे जिन्ना के आंदोलन को सही मानते थे। इसके विपरीत उन्हें कभी ये बात समझ नहीं आ रही थी कि भारत धर्म के नाम पर बंटेगा।  पीलू मोदी आर्किटेक्ट थे और उन्होंने ही राजधानी के ओबराय इंटरकांटिनेंटल होटल को डिजाइन किया था।


*Bhutto Family: भुट्टो कुनबे का भारत विरोध, कई सवाल अब भी अनसुलझे*

By Vivek Shukla


https://www.amarujala.com/world/why-bhutto-family-oppose-india-many-questions-still-unresolved

भुट्टो कुनबा- जूनागढ़ से मुंबई- दिल्ली वाया पाकिस्तान / विवेक शुक्ला

 



बिलावल भुट्टो जरदारी ने मुंबई के कैथडेरल स्कूल का नाम संभवत: अपनी मां बेनजीर भुट्टो से सुना होगा। जब पाकिस्तान 1947 में दुनिया के नक्शे में आया तब तक बिलावल के नाना जुल्फिकार अली भुट्टो इस स्कूल से निकल चुके थे। भुट्टो परिवार पाकिस्तान 1947 में नहीं गया था। मुसलमानों के लिए बने पाकिस्तान में भुट्टो खानदान ने 1950 में शिफ्ट किया था। उनके राजनीतिक दुश्मन इस मुद्दे पर उनकी पाकिस्तान को लेकर निष्ठा पर सवाल उठाते रहते हैं। इस निशाने से बचने के लिए भुट्टो कुनबे को एक ही काट नजर आती है। वह है भारत का कसकर विरोध करना।


बिलावल भुट्टो जरदारी ने कुछ दिन पहले न्यूयार्क में प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी को "गुजरात का कसाई" कहा है।”बिलावल की गटर बयानबाजी पर हैरत करने की आवश्यकता तो नहीं है, क्योंकि उन्हें पता है कि उनके भारत विरोध में ही उनके भविष्य की संभावनाएं छिपी हुई हैं। वे जितना ज्यादा भारत और हिन्दू विरोध करेंगे उतने ही अपने मुल्क में लोकप्रिय होंगे। ये उन्होंने अपने नाना जुल्फिकार अली भुट्टों के भारत को लेकर दिए बीसियों बयानों को पढ़कर सीख लिया होगा ।


जुल्फिकार भुट्टो का कई अर्थों में भारत से करीबी संबंध था। उनके मुम्बई और जूनागढ़ से रिश्तों की जानकारी जगजाहिर है। भुट्टो जब मुम्बई के प्रतिष्ठित कैथडरल स्कूल में पढ़ रहे थे तब उनके परम मित्र थे पीलू मोदी,जो राज्य सभा में भी रहे। पीलू मोदी ने अपनी किताब ‘Zulfi My friend’ में एक जगह लिखा भी है कि हालांकि हम दोनों घनिष्ठ मित्र थे 1946 में, पर जुल्फिकार टू नेशन थ्योरी पर यकीन करते थे। वे जिन्ना के आंदोलन को सही मानते थे। इसके विपरीत उन्हें कभी ये बात समझ नहीं आ रही थी कि भारत धर्म के नाम पर बंटेगा।  पीलू मोदी आर्किटेक्ट थे और उन्होंने ही राजधानी के ओबराय इंटरकांटिनेंटल होटल को डिजाइन किया था।


भुट्टो की हिन्दू मां


 भुट्टो के पिता सर शाहनवाज भुट्टो देश के विभाजन से पहले मौजूदा गुजरात की जूनागढ़ रियासत के प्रधानमंत्री थे। भुट्टो की मां हिन्दू थी। उनका निकाह से पहले नाम लक्खीबाई था। बाद में हो गया खुर्शीद बेगम। वो मूलत: राजपूत परिवार से संबंध रखती थी। उन्होंने निकाह करने से पहले ही इस्लाम स्वीकार कर लिया था। कहने वाले कहते हैं कि शाहनवाज और लक्खीबाई के बीच पहली मुलाकात जूनागढ़ के नवाब के किले में हुई। वहां पर लक्खीबाई भुज से आई थी। शाहनवाज भुट्टो जूनागढ़ के प्रधानमंत्री के पद पर 30 मई,1947 से लेकर 8 नवंबर,1947 तक रहे। यानी पाकिस्तान के बनने के कई महीनों के बाद तक। जब बेनजीर भुट्टो की निर्मम हत्या हुई थी तब जूनागढ़ में भी शोक की लहर दौड़ गई थी। यहां के वांशिदें बेनजीर भुट्टो को कहीं न कहीं अपना ही मानते थे। जूनागढ़ शहर की जामा मस्जिद में इमाम मौलाना हाफिज मोहम्मद फारूक की अगुवाई में उनकी आत्मा की शांति के लिए नमाज भी अदा की गई थी।


एक बड़ा सवाल ये भी है कि देश के विभाजन के वक्त भुट्टो और उनका परिवार पाकिस्तान क्यों नहीं चला गया था? जब गांधी जी की 1948 में हत्या हुई तब वे अमेरिका में पढ़ रहे थे। संयोग से वहां पर पीलू मोदी भी थे। वे मोदी को सांत्वना दे रहे थे। वे जिन्ना की 11 सितंबर,1948 को मौत के वक्त भी मुंबई में थे। ये सब जानकारी पीलू मोदी अपनी किताब में देते हैं। भुट्टो कुनबे के विरोधी इस मुद्दे को बार-बार उठाते हैं कि ये देश के बंटवारे के तुरंत बाद पाकिस्तान शिफ्ट नहीं हुए थे। खैर, भुट्टो परिवार  1950 के बाद पाकिस्तान जाकर बसा। भुट्टो ने वहां पर अपनी छवि एक समाजवादी विचारधारा में यकीन रखने वाले इंसान के रूप में विकसित की। हालांकि वे निजी जीवन में कतई समाजवादी नहीं थे।


देश तोड़ने वाला बना पीएम


भुट्टो 1973 से 1977 तक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे। जरा सोचिए कि जिस शख्स का पाकिस्तान के दो फाड़ करवाने में अहम रोल था वह 1973 के पाकिस्तान के आम चुनाव में जीतकर मुल्क का प्रधानमंत्री ही बन गया। बना इसलिए क्योंकि उन्होंने उसी न्यूयार्क शहर में भारत-पाकिस्तान युद्ध की समाप्ति के बाद संयुक्त राष्ट्र सभा को संबोधित करते हुए भारत को अनाप-शनाप बका था। इसके चलते पाकिस्तानी अवाम ने उनकी पाकिस्तान को तोड़ने की खता को माफ कर दिया। 51 सालों के बाद उनके पौत्र ने भारत पर निशाना साधा। मतलब नाना के नक्शे कदम पर चल रहे हैं बिलावल।


 किसे मरवाया था भुट्टो ने


 बहरहाल, भुट्टो 35 साल की उम्र में पाकिस्तान के विदेश मंत्री बन गए थे।  1965 में अयूब खान को उनके विदेश मंत्री भुट्टो द्वारा कश्मीर में घुसपैठियों को भेजने के लिए भड़काया गया था। शास्त्री ने इसका जवाब लाहौर की तरफ अंतरराष्ट्रीय सीमा पार टैंक भेज कर दिया।ये लड़ाई ताशकंद (आज का उजबेकिस्तान) में सोवियत यूनियन की मध्यस्थता से शांति के साथ ख़त्म हुई। लेकिन अय्यूब ख़ान से मतभेद होने के कारण उन्होंने अपनी नई पार्टी (पीपीपी) 1967 में बनाई। 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1965 और 1971 के पाकिस्तान युद्ध, तीनों के समय वे महत्वपूर्ण पदों पर आसीन थे। 1965 के युद्ध के बाद उन्होंने ही पाकिस्तानी परमाणु कार्यक्रम का शुरूआती ढाँचा तैयार किया था। उन्हें चार अप्रैल 1979 को फ़ाँसी पर लटका दिया गया था। भुट्टो को रावलपिंडी की जेल में फांसी पर लटका दिया था।फांसी देने के महज़ दो साल पहले तक वे पाकिस्तान के वज़ीर-ए-आज़म थे। उन पर अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी मोहम्मद अहमद खान कसूरी को मरवाने का इल्ज़ाम था।


ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की मौत के नौ साल के बाद उनकी बेटी बेनज़ीर भुट्टो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनीं। बेनजीर का भारत विरोध अपने पिता जितना तीखा नहीं था। बहरहाल, दो सवालों के जवाब अभी तक नहीं मिल सके कि एक हिन्दू मां का बेटा इतना घोर भारत तथा हिन्दू विरोधी क्यों था और दूसरा भुट्टो खानदान देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान तुरंत क्यों नहीं गया?


 भुट्टो के पिता शाहनवाज भुट्टो की बात किए बगैर बात तो अधूरी ही रहेगी। वे भी कट्टर भरात विरोधी थे। हालांकि जूनागढ़ में 99 से अधिक फीसद आबादी हिन्दुओं की थी पर वहां पर राज मुहम्मद महाबत खनजी का था। शाहनवाज उनकी रियासत में प्रधानमंत्री थे। उन्होंने खनजी कोसलाह दी कि वह जूनागढ़ का पाकिस्तान में विलय कर लें। पर इसका वहां की जनता ने कसकर विरोध किया। जूनागढ़ में जनमत संग्रह भी हुआ। यह 1948 में हुआ था और वहां के 99.95 फीसद लोगों ने भारत के साथ ही रहने का फैसला किया था।


शाहनवाज का दूसरा निकाह किससे


 शाहनवाज भुट्टो ने पाकिस्तान शिफ्ट होने के बाद बिब्बो नामा की एक अदाकरा से निकाह किया कर लिया। वह बला की खूबसूरत और हाजिर जवाब औरत थीं। उसकी आवाज में जादू था। उसे शेरो- शायरी में दिलचस्पी थी। उसे उस्ताद शारों के सैकड़ों शेर याद थे। वह संगीत निर्देशक और हिरोइन भी थी। बिब्बो (1906- 1972) की मां भी अच्छा गाती थीं। वह दिल्ली से थी। बिब्बो महत्वाकांक्षी थी और छोटी उम्र में ही मुंबई चली गई थीं। उसने 1947 तक हिन्दी फिल्मों में खूब नाम कमाया। रेलवे बोर्ड के पूर्व मेंबर और हिन्दी फिल्मों के गहन जानकार डॉ. रविन्द्र कुमार बताते हैं कि वे जब 1990 के दशक में वेस्टर्न रेलवे में नौकरी के दौरान मुंबई में पोस्टेड थे तब उन्हें बिब्बो के बारे में जानकारी मिली। उसके बाद उन्होंने बिब्बो के संबंध में और पता लगाया।


 किसकी समकालीन थी बिब्बो


दरअसल बिब्बो समकालीन थीं देविका रानी, दुर्गा खोटे, सुलोचना, मेहताब, शांता आप्टे और नसीम बानों की। कहते हैं कि उसकी नसीम बानों से खूब पटती थी क्योंकि दोनों दिल्ली से थीं। बिब्बो देश के बंटवारे के बाद पाकिस्तान चली गई। एक तरह से वह अपने ठीक-ठाक करियर को छोड़कर सरहद के उस पार चली गई थी। उसने तब तक करीब तीन दर्जन फिल्मों में काम कर लिया था। बिब्बो ने मास्टर निसार और सुरेन्द्र जैसे कलाकारों के साथ भी काम किया था। उसने सुरेन्द्र के साथ ‘मनमोहन’ (1936), ‘जागीरदार (1937), ग्रामोफोन सिंगर (1938) तथा लेडिज ओनली (1939) जैसी कामयाब फिल्मों में काम किया। पाकिस्तान में उसने शाहनवाज भुट्टो से इशक के बाद निकाह कर लिया। उन्होंने पाकिस्तान में दुपट्टा, गुलनार नजराना, मंडी, कातिल जैसी फिल्मों में अपने अभिनय के जौहर दिखाए। उसे घोड़ों की रेस में पैसा लगाने का शौक था। ” बिब्बो ने शाहनवाज भुट्टो से शादी करने से पहले एक शादी पहले भी की हुई थी। उसका कराची में 1960 के दशक में इंतकाल हो गया था।


  पहली बार कब भुट्टो दिल्ली आए


जुल्फिकार अली भुट्टो 1964 में पंडित जवाहरलाल नेहरु की अंत्येष्टि में शामिल होने के लिए राजधानी में आई पाकिस्तान सरकार की टोली के मेंबर थे। यानी वे उस शहर में आए थे जिधर से उनके पिता की दूसरी पत्नी बिब्बो का संबंध था। बेनजीर भुट्टो दिल्ली में कम से कम दो-तीन बार आईं। वह राजीव गांधी की अत्येष्टि में 1991 में भाग लेने आईं थीं। उसके बाद वह भारतीय उद्योग महासंघ (सीआईआई) के सम्मेलन में शिरकत करने के लिए 2003 में भी दिल्ली आईं थीं। वह तब सीधे दुबई से आईं थीं। बेनजरी भुट्टो तब लाल कृष्ण आडवाणी से मिलने उनके सरकारी आवास पर भी गई थीं। अब यह कहना तो मुश्किल है कि क्या पिता और पुत्री को दिल्ली में आकर बिब्बो का ख्याल आया होगा?


बहरहाल, बिलावल भुट्टो जरदारी सही रास्ते पर चल रहे हैं। आखिर उनका लक्ष्य तो पाकिस्तान का वजीरे आजम ही बनना है। उनके नाना भी विदेश मंत्री के बाद प्रधानमंत्री बने थे। देखिए क्या इतिहास अपने क दोहराता है?


विवेक शुक्ला

आतंक, बन्नू, बन्नूवाली मेट्रो में और दादा ध्यानचंद / विवेक शुक्ल

 


आतंक, बन्नू, बन्नूवाली मेट्रो में और दादा ध्यानचंद / विवेक शुक्ल  




पाकिस्‍तान का बन्नू शहर। राजधानी दिल्ली तथा एनसी/ आर में बन्नू से आकर बसे हजारों परिवार रहते हैं। दादा ध्यानचंद भी बन्नू में रहे। बन्नू वाला पाकिस्तान हॉकी का सुपर स्टार अब्दुल रशीद दिल्ली में रहा। बन्नू से आए परिवारों के बुजुर्ग सदस्य बीते दो-तीन दिनों से वहां तहरीक-ए-तालिबान के आतंकियों के आतंक पर नजर रख रहे थे। खैबर पख्‍तूनख्‍वा सूबे के बन्‍नू में स्थित काउंटर टेररिज्‍म डिपार्टमेंट में मिलिट्री इंटेलीजेंस और पुलिस के कुछ अधिकारियों को बंधक बना लिया था। अंत में,दो दर्जन से ज्यादा आंतकी मारे गए।


बहरहाल,  राजधानी और फरीदाबाद में बड़ी तादाद में बन्नू वाले रहते हैं। वहां पर इनका  समाज है। आप कभी मूलचंद मेट्रो स्टेशन से फरीदाबाद के सफर पर निकलिए। आपको रास्ते में पंजाबी से मिलती-जुलती इस जुबान को बोलने वालों की तादाद क्रमश: बढ़ती है। ‘यारा, मौसम ठड्डा थिंदा’( बंधु, मौसम ठंडा हो रहा है) या ‘भ्रा,ठिक इन मुंडा-कुंड़ी’ ( भाई,बेटा-बेटी ठीक है?)। ‘ आप कौन सी जुबान बोल रहे है?’,हम एक सहयात्री से पूछते हैं। कुछ ठहर कर जवाब मिलता है, ‘ये बन्नूवाली है। इसे डेरेवाली भी कहते है’। बन्नू से1947 में विस्थापित लोग दिल्ली और फरीदाबाद में बसाए गए थे।


बन्नू में दादा ध्यानचंदO


आप फरीदाबाद से मेट्रो रेल में वापस दिल्ली वापस आ रहे होते हैं,तो आपको फिर से बन्नूवाली सुनाई देने लगती है। कुछ मुसाफिर बन्नूवाली बोल रहे होते हैं। यानी आपको फरीदाबाद के सफर में बन्नूवाली सुनाई देती रहेगी। इस बीच, दादा ध्यानचंद ने भी अपनी जिंदगी के कुछ साल बन्नू में गुजारे हैं। ये 1940 के दशक के आरंभ की बातें हैं। वे तब सेना में थे और हॉकी की दुनिया में जादूगर का दर्जा हसिल कर चुके थे। पाकिस्तान हॉकी टीम के कप्तान रहे अब्दल रशीद कहते थे कि बन्नू में हॉकी को ले जाने वाले दादा ध्यानचंद ही थे। वे जब वहां के मैदानों में खेला करते थे तब सारा बन्नू शहर उनकी मैदान में लय,गति और ताल देखने के लिए पहुंचता था। सेंटर हॉफ की पोजिशन पर खेलते थे अब्दुल रशीद। वे पाकिस्तान की टीम के क्रमश: 1972 के म्युनिख ओलंपिक खेलों में कप्तान और 1976 के मांट्रियल ओलंपिक में कोच थे। रशीद को सक्रिय हॉकी छोड़ते ही पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस (पीआईए) ने 1980 में अपने दिल्ली के दफ्तर में ट्रांसफर कर दिया। वे यहां कार्गो मैनेजर के पद पर काम करने लगे। रशीद दिल्ली आने के बाद शिवाजी स्टेडियम हॉकी के मैच देखने जाने लगे।


 जब दिल्ली में खेलता था बन्नू वाला


बन्नू वाले अब्दुल रशीद दिल्ली आने के बाद शिवाजी स्टेडियम मैच देखने चले जाते। एक दिन उन्हें मैच देखते हुए दिल्ली हॉकी के दो बेहतरीन खिलाड़ियों कुक्कू वालिया और भूपिंदर सिंह ने पहचान लिया। आखिर रशीद हॉकी की दुनिया का बेहद जाना-पहचाना चेहरा रहे थे। रशीद दर्शक दीर्घा से दिल्ली हॉकी लीग का एक मैच देख रहे थे। रशीद को भी अच्छा लगा कि उन्हें यहां किसी ने पहचाना लिया। उन्होंने दोनों से दिल्ली हॉकी लीग में खेलने की इच्छा जताई। भूपिंदर सिंह ने उन्हें उसी समय खालसा ब्लूज से खेलने की ऑफर दे दी। और देखते ही देखते, पाकिस्तान का पूर्व कप्तान दिल्ली में खेलने लगा। वे दो साल खालसा ब्लूज से  खेले। हालांकि उनमें पहले वाला तो दमखम नहीं रहा था पर वे बीच-बीच में अपने जौहर दिखा देते थे। वे यहां के नौजवान खिलाड़ियों को हॉकी की बारीकियां भी बताने लगे। वे लगभग तीन साल यहां पर रहने के बाद 1983 में वापस चले गए। पर उनका अपने दिल्ली के मित्रों से संबंध बना रहा। वे भी पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के बन्नू शहर से आते थे। रशीद का कुछ समय पहले निधन हो गया था।


उनकी रामलीला में उर्दू 



- इस बीच, फरीदाबाद के बन्नू समाज की रामलीला में संवाद बन्नूवाली तथा उर्दू में होते हैं। एक उर्दू का संवाद राम-रावण के बीच का पेश है।  रावण को ललकारते हुए राम कहते हैं, “रावण,तुम शैतान हो। तुम जुल्म की निशानी हो। तुम्हें जीने का कोई हक नहीं है।” रावण का जवाब। “ राम,मैंने मौत पर फतेह पा ली है। पूरी कायनात में मेरे से ज्यादा बड़ा और ताकतवर शख्स कोई नहीं है। मेरे से फलक भी खौफ खाता है। तू जा अपना काम कर।” उर्दू में रामलीला क्यों? रामलीला की बात हो और हनुमान जी सामने न आएं ये हो नहीं सकता। तो पेश हनुमान जी एक संवाद। वे सीता के पास पहुंचते हैं। सीता कैद में रावण की। वे सीता के सामने नतमस्तक होकर अपना परिचय देने के बाद कहते है- “ मां, मैं आपको बहिफाजत के साथ भगवान राम के पास ले जाऊंगा। आप कतई फिक्र मत करें। मुझे तो अभी भगवान राम का हुक्म नहीं है,अगर होता तो मैं आपको अभी वापस ले जाता इन शैतानों से दूर।”  एक संवाद सीता-रावण का भी। रावण कहता है, ‘अब भूल जा अपने शौहर को। मैं ही हूं तेरा शौहर।’ ये सुनकर गुस्से में सीता कहती हैं- ‘दगा-फरेब से मुझको ले आया तू। जलील शख्स। मनहूस इंसान। तू खाक हो जाएगा।’


विवेक शुक्ला, नवभारत टाइम्स, 22 दिसंबर 2022

Pictures- Dhayan Chand, scene in Banno and Abdul Rashid, former Pakistan hockey captain.

गुरुवार, 22 दिसंबर 2022

कोई अपना होता किताब पर किशोर कुमार कौशल की राय

 


' इस पुस्तक में अनामीशरण बबल ने कई दिग्गज पत्रकारों और कद्दावर नेताओं के साथ ही समाज के उपेक्षित और तिरस्कृत ठिकानों पर जाकर अनेक वेश्याओं से भी बेबाक बातचीत की है।

 इन आलेखों में एक ओर बड़े नेताओं के साथ संवाद कायम करते समय उन्होंने अपने निर्भीक और ईमानदार होने का परिचय दिया है तो दूसरी ओर मजबूरन देह-व्यापार में धकेल दी गई बेबस लड़कियों की कारुणिक दास्तान बयान की है जिसे पढ़कर मेरा मन चीत्कार कर उठा। इन बदनाम गलियों में कोई विरला ही कदम रखता है।

 अनामीशरण ने वहाँ जमाकर पाँव रखे हैं और बिना डगमगाए मंजिल पर पहुँचे हैं। उनकी निष्कंप लेखनी समाज के ऐसे बदरंग कोनों को बेनकाब करती रहेगी, इसी विश्वास के साथ मैं इस अनूठी कृति के सृजन के लिए उन्हें हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ देता हूँ। 

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---- किशोर कुमार कौशल

     बल्लभगढ़(फरीदाबाद). 



बुधवार, 21 दिसंबर 2022

रूपकुंड झील - उत्तराखंड - यह है नरकंकालों वाली झील

   प्रस्तुति-राजेश सिन्हा


यदि आप एडवेचर ट्रैकिंग के शौक़ीन है तो रूपकुंड झील आपके लिए एक बेहतरीन जगह हैं। रूपकुंड झील (Roopkund lake ) हिमालय के ग्लेशियरों के गर्मियों में पिघलने से उत्तराखंड के पहाड़ों मैं बनने वाली छोटी सी झील हैं। 


यह झील 5029 मीटर ( 16499 फीGट )कि ऊचाई पर स्तिथ हैं जिसके चारो और ऊचे ऊचे बर्फ के ग्लेशियर हैं। यहाँ तक पहुचे का रास्ता बेहद दुर्गम हैं इसलिए यह जगह एडवेंचर ट्रैकिंग करने वालों कि पसंदीदा जगह हैं।

यह झील यहाँ पर मिलने वाले नरकंकालों के कारण काफी चर्चित हैं।  यहाँ पर गर्मियों मैं बर्फ पिघलने के साथ ही कही पर भी नरकंकाल दिखाई देना आम बात हैं।  यहाँ तक कि झील के अंदर देखने पर भी तलहटी मैं भी नरकंकाल पड़े दिखाई दे जाते हैं। 


यहाँ पर सबसे पहला नरकंकाल 1942 मैं एक रेंजर H. K. Madhwal द्वारा खोज गया था। तब से अब तक यहाँ पर सैकड़ो नरकंकाल मिल चुके हैं। जिसमे हर उम्र व लिंग के कंकाल शामिल हैं। यहाँ पर National Geographic Team द्वारा भी एक अभियान चलाया गया था जिसमे उन्हें 30 से ज्यादा नरकंकाल मिले थे। 


यहाँ पर इतने सारे नरकंकाल आये कैसे इसके बारे मैं तीन अलग अलग कहानिया प्रचलित हैं।




इस गाँव पर है रहस्यमयी नींद की बीमारी का आतंक:--

 


इस संसार आए दिन कुछ न कुछ ऐसी रहस्यमयी घटनाएं घटित होती रहती है जिसका कारण ढूंढने में वैज्ञानिकों को भी पसीना आ जाता है। ऐसी ही कुछ घटनाएं पिछले 4 साल से उत्तरी कजाकस्तान के कलाची गांव में हो रही है। यह गाँव पिछले 4 सालो से एक रहस्यमयी नींद की बीमारी से पीड़ित है। इस गाँव में कोई भी कभी भी कुछ भी करते हुए अचानक से सो जाता है और उनकी ये नींद कुछ घंटों से लेकर कई महीनो तक जारी रह सकती है।  इस रहस्यमयी नींद की बीमारी के चलते इस गाँव को Sleepy Hollow कहा जाने लगा है।


2010 में हुई थी शुरुआत -


गाँव में इस बीमारी की शुरुआत अप्रैल 2010 में हुई थी। तब से यह बीमारी लगातार बढ़ती जा रही है।  इस गाँव की आबादी 600 है जिसमे से 14 प्रतिशत आबादी इस बीमारी की चपेट में आ चुकी है। इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को कभी भी अचानक से नींद आ जाती है। कभी-कभी यह नींद कुछ घंटो की होती है जबकि कभी-कभी यह नींद महीनो तक चलती है। ऐसी ही एक घटना हाल ही में सितम्बर में घटित हुई, जब 8 बच्चे स्कूल की असेम्बली में इसी बीमारी के कारण गिर गए थे, तभी से ये बच्चे सो रहे है।


कारण है अज्ञात -


यह रहस्यमयी बीमारी क्यों और किस कारण से फ़ैल रही है, इसका वास्तविक कारण अभी तक वैज्ञानिको की पकड़ में नहीं आ सका है। अभी तक की जांच में यह पाया गया है की इस बीमारी से पीड़ित मरीजों के दिमाग में तरल पदार्थ की मात्रा बढ़ जाती है। लेकिन एक सामान्य व्यक्ति के दिमाग में अचानक से यह तरल पदार्थ क्यों बढ़ जाता है इसका कारण अभी तक नहीं समझ आया है। डॉक्टर्स इसका एक मात्र कारण प्रदूषित पानी बताते है।


यूरेनियम खदान के पास है गाँव -


कजाकिस्तान का यह गाँव एक बंद हो चुकी यूरेनियम की खदान के पास स्तिथ है। जिसमे से ज़हरीला रेडिएशन होता रहता है। पर गाँव में रेडिएशन की मात्रा कोई ख़ास ज्यादा नहीं है साथ हो डॉक्टर्स भी रेडिएशन को इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं मानते है। अप्रैल 2010 में पीड़ित प्रथम व्यक्ति को अब तक इस बीमारी का 7 बार अटैक हो चूका है और वो कुछ दिनों से महीनो की नींद सो चूका है।


इस प्रकार चार सालो की अथक कोशिशों के बावजूद वैज्ञानिक इस रहस्यमयी बीमारी का कारण और निदान नहीं खोज सके है।



मंगलवार, 20 दिसंबर 2022

औरंगाबाद जिले की हलचल

 



प्रसारण तिथि - 13 दिसंबर 2022

आलेख एवं प्रस्तुति - कमल किशोर


औरंगाबाद जिले के शहरों में आगामी 18 दिसंबर को होने वाले निकाय चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधि तेज हो गई है । प्रत्याशी जोर - शोर से चुनाव प्रचार में लगे हैं । जिला प्रशासन ने निकाय चुनाव को लेकर अपनी तैयारियों को अंतिम रूप प्रदान करना शुरू कर दिया है ।औरंगाबाद नगर परिषद के अलावा बारून, रफीगंज, नबीनगर और देव नगर पंचायतों के लिए 2 लाख से अधिक मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकेंगे । मतगणना 20 दिसंबर को निर्धारित है । जिलाधिकारी सौरभ जोरवाल ने कहा है कि नगर निकाय का चुनाव हर हाल में स्वच्छ, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराया जाएगा ।

सांसद सुशील कुमार सिंह ने लोकसभा में बिहार की सबसे बड़ी सिंचाई परियोजना उत्तर कोयल नहर के लंबित कार्यों को शीघ्रता से पूरा करने की मांग की और कहा कि .किसानों के लिए वरदान साबित होने वाली इस परियोजना के पूरा नहीं होने से राज्य का अहित हो रहा है । उधर लोकसभा में ही सांसद महाबली सिंह ने अकोढ़ा से अनुग्रह नारायण रोड स्टेशन तक 25 किलोमीटर लंबी सड़क के निर्माण की मांग की ।

कृषि विभाग की ओर से 5 और 6 दिसंबर को कृषि यांत्रिकीकरण सह उपादान मेला का आयोजन  किया गया । इसका उद्घाटन जिलाधिकारी सौरभ जोरवाल ने किया । मेला में 110 किसानों ने कृषि यंत्र खरीदे और उन्हें 31 लाख रुपए से अधिक का अनुदान दिया गया ।

जिले में नक्सली गतिविधियों पर पूरी तरह नियंत्रण पाने के लिए चलाए गए विशेष अभियान के तहत पिछले कुछ माह के भीतर 47 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया है । पुलिस अधीक्षक कांतेश कुमार मिश्र ने बताया कि नक्सलियों के ठिकाने से 20 लाख रुपए नगद और भारी मात्रा में विस्फोटक तथा हथियार भी बरामद किया गया । नक्सलियों के खिलाफ अभियान में काफी हद तक सफलता पाने के लिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के महानिदेशक कुलदीप सिंह ने जिलाधिकारी सौरभ जोरवाल और पुलिस अधीक्षक कान्तेश कुमार मिश्र को प्रशस्ति पत्र प्रदान किया । एड्स दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में जिला संचारी रोग पदाधिकारी डॉ रवि रंजन ने कहा कि सजगता , जागरूकता और जानकारी ही एड्स से बचाव का सशक्त माध्यम है । उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य विभाग द्वारा किए गए प्रयासों के फलस्वरूप जिले में एड्स रोग पर नियंत्रण पाया जा रहा है । अपर समाहर्ता आशीष कुमार सिन्हा ने दाखिल खारिज , जमाबंदी एवं भूमि से संबंधित सभी मामलों को त्वरित गति से निष्पादित करने का निर्देश अंचल अधिकारियों को दिया है ।

देशरत्न डॉ राजेंद्र प्रसाद की जयंती के अवसर पर अनुमंडल पदाधिकारी विजयंत ने अनुग्रह मध्य विद्यालय में आयोजित कार्यक्रम का उद्घाटन किया और कहा कि राजेंद्र बाबू की सरलता, विनम्रता से आज सभी को सीख लेने की जरूरत है ।  दिव्यांग दिवस के अवसर पर रफीगंज में आयोजित कार्यक्रम का उद्घाटन लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास के वरिष्ठ नेता प्रमोद कुमार सिंह ने किया और कहा कि दिव्यांगों के हक और अधिकार के लिए सशक्त आंदोलन चलाया जाएगा ।पंजाब नेशनल बैंक ग्राहकों को बेहतर सुविधा प्रदान करने के लिए विशेष प्रयास कर रहा है । मंडल प्रमुख दीपक आचार्या ने बताया कि सभी शाखा प्रबंधकों को ग्राहकों की समस्याओं को प्राथमिकता के तौर पर दूर करने का निर्देश दिया गया है और ग्राहक सुविधाओं में बढ़ोतरी लाने के प्रयास किए जा रहे हैं ।

सहकारिता मंत्री सुरेंद्र प्रसाद यादव ने जिले के कुछ पैक्सों का दौरा कर धान की अधिप्राप्ति में बिचौलियों की भूमिका को पूरी तरह समाप्त करने पर जोर दिया ।  जिले के प्रमुख समाजसेवी अजीत कुमार सिंह को सामाजिक कार्यों के लिए लखनऊ में सम्मानित किया गया ।




सोमवार, 19 दिसंबर 2022

रवि अरोड़ा की नजर से.....


 रंगों का धर्म और कटोरा  /  रवि अरोड़ा  ... 


शाहरुख खान की फिल्में न तो मैं पहले देखता था और न ही अब उसकी आगामी फ़िल्म पठान देखने का अपना कोई इरादा है । यह फिल्म फ्लॉप हो अथवा मोटी कमाई करे, इसका अपनी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। हां इस बात का जरूर पड़ता है कि समाज को भेड़ बकरियों की तरह ठेलने का प्रयास सुबह शाम क्यों किया जा रहा है ? 

जबरन ठेलने की कोशिशें राजनीति तक तो चलो फिर भी समझ आती हैं मगर अब पहनावे, खान पान और मनोरंजन के मामले में भी हांक लगाई जाने लगे तो कोफ्त होना स्वाभाविक है। कौन सी फ़िल्म कौन देखे और कौन नहीं यह खुद दर्शक पर क्यों नहीं छोड़ दिया जाता ?


 पठान फ़िल्म का गाना बेशरम रंग दो कौड़ी का भी नहीं है मगर उसके नाम पर जम कर बवाल किया जा रहा है। मंत्री संत्री जहरीले बयान दे रहे हैं तो उसके चेले चांटे धरने प्रदर्शन कर रहे हैं । कहीं फिल्म के बहिष्कार का अभियान चलाया जा रहा है तो कहीं धमकी दी जा रही है कि यह फ़िल्म लगी तो सिनेमा घर में आग लगा देंगे। पता नहीं कुछ लोगों की धार्मिक भावनाएं उनसे आगे आगे क्यों चलती हैं और गाहे बगाहे किसी न किसी शय से टकरा कर आहत हो ही जाती हैं ? 

माना भगवा रंग उन्हें प्रिय है मगर क्या उसका पेटेंट उनके पास है ? होना तो यह चाहिए रंगों के धर्म पर बात हो मगर इन्होंने तो रंगों को ही धर्म के हिसाब से आपस में बांट लिया है। 


पता नहीं कैसा समाज हम बनाना चाहते हैं जहां भगवाधारी बलात्कार तो कर सकता है मगर कोई फिल्म अभिनेत्री भगवा कपड़े नहीं पहन सकती। देश में संन्यासियों के 13 अखाड़े हैं और लगभग सभी से जुड़े लाखों संन्यासी बाहरी वस्त्र ही नहीं लंगोट भी भगवा पहन सकते हैं मगर कोई फिल्मी हीरोइन इस रंग के छोटे कपड़े पहन ले तो हंगामा हो जाया है। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर 24 घंटे नंगई हो सकती है मगर सिनेमा में हो तो उन्हें तिलमिलाहट होती है।

 राजनीतिक दल पहले केवल युवाओं, महिलाओं, छात्रों, किसानों और मजदूरों के नाम पर सहयोगी संगठन चलाते थे मगर अब सारे काम सोशल मीडिया टीम के हवाले हैं। वहीं नेरेटिव सेट होते हैं और वहीं से उसे आगे बढ़ाया जाता है। यह बॉयकॉट गैंग उसी की कोई शाखा जान पड़ती है। जनता के दुःख सुख की कोई बात नहीं। बात होगी तो केवल धर्म और धार्मिक भावनाओं की । पता नहीं हम किसी देश में रह रहे हैं अथवा मन्दिर मस्जिद में ?


वैसे भगवा रंग तो बहाना है। असली बात तो यह है कि पठान फ़िल्म का विरोध इसलिए हो रहा है कि यह फिल्म शाहरुख खान की है । मुसलमान होने की सजा पहले उसके बेटे को ड्रग केस में फंसा कर देने का प्रयास किया गया और अब कह रहे हैं कि उसके हाथ में कटोरा थमा देंगे। यह गैंग नहीं जानता कि वो जिसका विरोध कर रहे हैं वह बॉलीवुड का ही नहीं दुनिया भर के सिनेमा का बादशाह है।

 दुनिया में ऐसे करोड़ों लोग हैं जो भारत को शाहरुख की वजह से ही जानते हैं। उसकी फिल्म पठान में ढाई सौ करोड़ रूपए लगे हैं तो रिलीज होने से पहले ही इस फिल्म ने अपने राइट्स बेच कर चार सौ करोड़ कमा लिए हैं। बेशक कोई जितनी मर्जी बकवास करे मगर बिना किसी फिल्म के भी शाहरुख खान ढाई सौ करोड़ रुपया सालाना कमाता है और पिछले साल आंकी गई उसकी संपत्ति छः हजार करोड़ से अधिक की थी । वैसे शाहरुख के हाथ में कटोरा पकड़वाने की मंशा रखने वाले यह पता करने का प्रयास क्यों नहीं करते कि देश में एक के बाद एक हो रही बेवकूफियों के चलते अब तक कितने करोड़ लोगों के हाथ में कटोरा आ चुका है ?

शनिवार, 17 दिसंबर 2022

रवि अरोड़ा की नजर से.......

 

खेल के हिस्सेदार  /  रवि अरोड़ा



इस हफ्ते जयपुर जाना हुआ । तीन दिन की यात्रा में तीन बार ही ट्रैफिक पुलिस की आसामी बना । दो जगह दो-दो सौ रूपए की भेंट चढ़ा कर पीछा छुड़ाया तो एक जगह बाकायदा पांच सौ का चालान ही कटवाना पड़ा। मेरा कसूर यह था कि मेरी कार का नंबर उत्तर प्रदेश का था और बाहरी राज्य की गाड़ी देख कर लगभग सभी शहरों में ट्रैफिक पुलिस वाले यूं झपटते हैं जैसे मांस को देख कर चील । जयपुर में पहली बार मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ है, जब भी वहां जाना हुआ हर बार ट्रैफिक पुलिस की अवैध वसूली का शिकार हुआ । मोटर व्हीकल एक्ट में इतने प्रावधान हैं कि यदि पुलिस कर्मी तय कर ले तो आप चाह कर भी अवैध वसूली से बच नहीं सकते । जयपुर ही क्यों चंडीगढ़ भी जब कभी गया, ट्रैफिक पुलिस की मुट्ठी गर्म करनी ही पड़ी। चूंकि मेरी कार पर प्रेस, एडवोकेट अथवा अन्य कोई प्रभावी स्टीकर नहीं होता अतः छोटी से छोटी सी बात पर भी बाहरी राज्य में स्थानीय ट्रैफिक पुलिस रोक लेती है। अब कोई एक दिन में कितने चालान कटवा सकता है और किस किस बात पर कटवा सकता है ? हां अपना ड्राइविंग लाइसेंस ही रद्द करवाने की मंशा हो तो बात कुछ और है।


मैं जिस मुद्दे पर बात कर रहा हूं, उसे वही बेहतर ढंग से समझ सकता है जो अपने वाहन से सुदूर राज्यों में आता जाता रहता है। कमाल की बात देखिए कि दिल्ली एनसीआर में चालीस सालों से मैं कार स्कूटर चला रहा हूं और कभी चालान तो दूर किसी ट्रैफिक पुलिस ने रोका भी नहीं । कारण यह नहीं है कि वे मुझे पहचानते हैं, बल्कि यह है कि मैं ट्रैफिक नियमों का सदैव पालन करता हूं और उससे बढ़कर बात यह है मेरे वाहन का रजिस्ट्रेशन नंबर लोकल है। मगर अपने शहर में रोजाना मैं किसी न किसी बहाने से बाहरी वाहनों को रोका जाना भी देखता हूं। हमारे यहां ही नहीं लगभग हर बड़े शहर में बाहरी वाहन चालकों को ठगने के लिए ट्रैफिक पुलिस ने बाकायदा जाल बिछा रखे हैं। जयपुर में अनेक सड़कों पर छोटा सा बोर्ड स्पीड लिमिट चालीस अथवा साठ लिख कर अथवा कहीं किसी कोने में ' वाहन ठहराना मना है ' का बोर्ड लगा कर इससे अनभिज्ञ बाहरी वाहनों को जाल में फंसा ही लिया जाता है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और बंगलुरू जैसे तमाम बड़े शहरों की भी मिलती जुलती कहानी है। समझ नहीं आता कि एक तरफ तो हम दावा करते हैं कि देश की पूरी सीमा के भीतर एक संविधान और एक कानून है मगर जब उसके पालन की बात आती है तो कहानी स्थानीय बनाम बाहरी का मोड़ ले लेती है।


जब से नया मोटर व्हीकल एक्ट आया है, ट्रैफिक पुलिस की पांचों उंगलियां घी में हैं। नए प्रावधान के अनुरूप पुलिस को पच्चीस हजार तक का जुर्माना करने का अधिकार मिल गया है। पेचीदगी का आलम यह है कि चप्पल अथवा हाफ पेंट पहन कर वाहन चलाने पर भी मोटा जुर्माना है। बच्चा साथ हो तो स्पीड लिमिट चालीस निर्धारित कर दी गई है। जाहिर है कि ऐसे कानूनों के पालन में वाहन चालक से कहीं न कहीं चूक हो ही जाती है, नतीजा देश में कई लाख चालान प्रति दिन हो रहे हैं। जयपुर, चंडीगढ़, दिल्ली, गुरुग्राम में प्रति दिन तीन हजार से अधिक चालान कर राज्य सरकारें अपनी तिजोरी भर रही हैं। एक अनुमान के अनुसार दस हजार करोड़ रुपया सालाना चालानों के द्वारा वसूला जाता है। जबकि ट्रैफिक पुलिस का स्टाफ इससे कई गुना अधिक अपनी जेब के हवाले करता है। नियमानुसार राज्य सरकारों को वसूली का एक हिस्सा ट्रैफिक के नियमों के प्रचार प्रसार में भी खर्च करना होता है मगर ऐसा होता नहीं। न जाने यह खेल क्या है और इसमें कौन कौन हिस्सेदार है ?

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2022

डॉक्टर हर्ष वर्धन / उमेश जोशी

 


समय है, शब्द भी हैं फिर भी लिख नहीं पा रहा हूँ क्योंकि शख्सियत बहुत बड़ी हैं और सारे शब्द इस महान शख्सियत के सामने बहुत बौने हैं। मैं इस लाचारी में लिखने का प्रयास तो कर रहा हूँ लेकिन डरा हुआ हूँ कि जो उद्गार (Udgaar) व्यक्त करना चाहता हूँ, उसमें कामयाबी मिलेगी या नहीं। कहीं भी कोई भी शब्द मेरी भावनाओं का भार ढोने में असमर्थ दिखे और हाँफता नज़र आए हो मुझे माफ़ कर दें। 

    सच कहूँ, इस महान व्यक्तित्व पर लिखने की मेरी हैसियत भी नहीं है। लेकिन साल में एक बार तो लिखने का साहस जुटा ही लेता हूँ। आज उनके जन्मदिन पर अपने लेखन के सामर्थ्य की फिर परीक्षा ले रहा हूँ। 

   सादगी और सरलता के प्रतिरूप डॉक्टर Harsh Vardhan जी के व्यक्तित्व पर पूरा ग्रंथ लिखा जा सकता है। मृदुभाषी डॉक्टर साहब की कार्यशैली, कर्मठता, जनसेवा की भावना, मेहनत, लगन, ईमानदारी, प्रबंधन और नेतृत्व प्रतिभा बेजोड़ और बेमिसाल है; अनुकरणीय है। 

   सर्वविदित है कि डॉक्टर साहब के प्रयासों से ही देश से पोलियो का अंत हुआ है। जब उन्होंने पोलियो ख़त्म करने की पहल की थी तब लोग आशंका भी व्यक्त करते थे- भला एक व्यक्ति ऐसी भयानक बीमारी को कैसे भगा सकता है क्योंकि बच्चों के लिए 10 सर्वाधिक घातक बीमारियों में से एक बीमारी पोलियो थी। लेकिन डॉक्टर साहब ने उनकी आशंकाओं को निर्मूल साबित किया और हम गर्व से कह सकते हैं कि हमारा देश पूर्णतः पोलियो मुक्त है। 

   1994 में दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री के रूप में डॉक्टर हर्ष वर्धन जी ने पल्स पोलियो कार्यक्रम की पायलट परियोजना लागू की थी जिसमें दिल्ली में तीन वर्ष की आयु तक के 10 लाख बच्चों का सामूहिक टीकाकरण किया गया था। 1995 में इस कार्यक्रम को देशभर में शुरू किया गया जिससे 8 करोड़ 80 लाख बच्चों का टीकाकरण कर उन्हें इस बीमारी से बचाया गया। 28 मार्च 2014 को  WHO ने भारत को पोलियो मुक्त घोषित किया था क्योंकि तीन वर्षों से पोलियो का कोई भी मामला सामने नहीं आया था।

 डॉक्टर साहब ने A Tale Of Two Drops नाम से एक पुस्तक लिखी है। उसमें बताया है कि पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम 3000 साल बाद स्वास्थ्य के क्षेत्र में अब तक की सबसे बड़ी पहल थी।  

 वे अच्छे अभिनेता भी हैं। उनका यह पक्ष शायद कम लोग जानते होंगे। 2018 में पर्यावरण मंत्री रहते दिल्ली की सबसे लोकप्रिय राम लीला 'लव कुश' में उन्होंने मिथिला के राजा जनक की भूमिका निभाई थी। उस रोल को निभाते समय भी अपने पर्यावरण मंत्री का रोल नहीं भूले और मंच से सफाई का संदेश जनता तक पहुँचाया।

डॉक्टर साहब की एक सबसे बड़ी खूबी है जिसकी हर कोई राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठ कर तारीफ करता है। मै यह बात प्रामाणिक जानकारी के आधार पर कह रहा हूँ। मेरे एक क़रीबी ने एक रोचक क़िस्सा सुनाया- हमारी सोसाइटी में एक 'आप' पार्टी की कार्यकर्ता हैं। उनसे अभी इलेक्शन के दिनों में बात हो रही थी तो यह कह रही थीं कि मैं  'आप' पार्टी के लिए काम करती हूँ लेकिन डॉक्टर हर्षवर्धन जी इतने अच्छे इंसान हैं कि मेरी कोई भी समस्या होती है तो फौरन हल कर देते हैं। कभी यह नहीं सोचते कि मैं आम आदमी पार्टी की कार्यकर्ता हूँ।

    मैने स्वयं देखा है कि असीम उदारता से काम करने वाले डॉक्टर साहब जनसेवा करते समय पार्टी और राजनीतिक विचारधारा की सीमाओं से बाहर निकल कर हर किसी का काम करते हैं। उनकी अपने नाम से बनी ऐप पर कोई अपनी समस्या बताता है तो उसे हल करने का भरसक प्रयास करते हैं; कभी यह नहीं देखते की समस्या बताने वाला किस पार्टी का है। 

 उनके योगदान की फहरिस्त बहुत लंबी है। ऐसे ही अवसरों पर किस्तों में उनके योगदान को याद करता रहूँगा। फ़िलहाल उन्हें जन्मदिन की अशेष, अनंत और असीम हार्दिक शुभकामनाएँ। दुनिया में जितने फूल खिले हैं उतनी ही हार्दिक बधाई। उन फूलों की खुशबू की मानिंद उत्तम स्वास्थ्य और खुशियों से उनका जीवन महकता रहे और समाज उनकी सेवाओं का लाभ उठाता रहे। उनकी हज़ारी उम्र हो, ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ



गुरुवार, 15 दिसंबर 2022

सेवा समर्पण और त्याग में मदर टेरेसा की भी माँ हैं अम्माँ

 

मदर टैरेसा से कई गुना बढ़कर हैं अम्मा कि सेवा*




एक मित्र ने मुझसे पूछा था क्या भारत में मदर टैरेसा जैसी सेवा भावी, वर्तमान में कोई हिंदू नारी हैं ?


तब मेरी आँखों के सामने करुणा की सागर ,प्रेमरूपी अध्यात्म के रसातल से भिगोने वाली निश्वार्थी माता अमृतानंदमयी देवी "अम्मा " का हंसमुख चेहरा सामने आ गया ...! 


मदर टैरेसा जैसी ईसाई मिशनिरी जो धर्मान्तरण के बल पर सेवा कार्य करते हैं आज भारतीय उनका गुणगान करते थकते नही लेकिन भारत भूमी पर योगी, सन्यासी,संत,साधू के सेवा शिक्षा परोपकार के कार्यो को भूल गए हैं आज भी वर्तमान में कई संतकुल के लोग निश्वार्थ सेवा करते आए हैं आज का मॉडर्न टाइप का जीव जो आज भी अंग्रेजीयत की गुलामी से उबर नही पाया इनको अपने ही राष्ट्र-धर्म से जुड़े महापुरुषो की सुध लेने की फुरसत नही लेकिन जो विदेशी संस्कृति जो हमारे राष्ट्र कि जड़ो को अंदर से खोखला कर रहे उनके लिए तारीफ पुल बांधते थकते नही हैं !


"अम्मा " यह एक ऐसा शब्द है जिसे लेते ही आँखों में प्यार दिल में सेवा की भावना जाग उठती है ! 

अम्मा ने विगत कई वर्षो से संपूर्ण विश्व में हिंदुत्व के शिक्षाओ का परचम फहराकर ,सनातन कथन वासुदेवः कुटुम्बकम् को सार्थक कर रही हैं !


अम्मा के विश्वव्यापी धर्मार्थ मिशन में बेघर लोगों के लिए 100,000 घर, 3 अनाथ आश्रम बनाने का कार्यक्रम और 2004 में भारतीय सागर में सुनामी जैसी आपदाओं से सामना होने की अवस्था में राहत-और-पुनर्वास, मुफ्त चिकित्सकीय देखभाल, विधवाओं और असमर्थ व्यक्तियों के लिए पेंशन, पर्यावरणीय सुरक्षा समूह, मलिन बस्तियों का नवीनीकरण, वृद्धों के लिए देखभाल केंद्र और गरीबों के लिए मुफ्त वस्त्र और भोजन आदि कार्यक्रम सम्मिलित हैं। 

यह परियोजनाएं अनेकों संगठनों द्वारा संचालित की जाती हैं जिसमे माता अमृतानंदमयी मठ (भारत), माता अमृतानंदमयी सेंटर (संयुक्त राज्य अमेरिका), अम्मा-यूरोप, अम्मा-जापान, अम्मा-केन्या, अम्मा-ऑस्ट्रेलिया आदि शामिल हैं। यह सभी संगठन संयुक्त रूप से एम्ब्रेसिंग द वर्ल्ड (विश्व को गले लगाने वाले) के रूप में जाने जाते हैं।


जब 2004 में उनसे यह पूछा गया कि उनके धर्मार्थ मिशन का विकास कैसा चल रहा है तो अम्मा ने कहा, ॐ लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु, यह सनातन धर्मं के प्रमुख मन्त्रों में से एक है, जिसका अर्थ होता है, 'इस संसार के सभी प्राणी प्रसन्न और शांतिपूर्ण रहें.' इस मंत्र की भावना को ही कर्म का माध्यम बनाया गया है।"


माता अमृतानंदमयी मठ द्वारा संचालित सेवा कार्य~ 

*16 ब्राह्मस्थानम् मन्दिरों की स्थापना, जहां केवल महिला पुरोहित ही हैं।

*50 के लगभग अमृत विद्यालय।


*70 करोड़ रुपए की लागत से 800 रोगियों के लिए आधुनिकतम अमृत चिकित्सा विज्ञान संस्थान।


*अमृत कुटीरम्' के नाम से देश के 12 राज्यों में निर्धनों के लिए 25,000 घरों का निर्माण। अगले एक दशक में एक लाख "अमृत कुटीरम्' और बनाने का लक्ष्य।


*निर्धन परिवार की कन्याओं हेतु सामूहिक विवाह का आयोजन।


*नि:शुल्क कानूनी सहायता हेतु "अमृत कृपा नीति प्रतिष्ठान' की स्थापना। माता अमृतानंदमयी मठ द्वारा कोच्चि में संचालित अमृत चिकित्सा विज्ञान संस्थान (अमृत इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज) 70 करोड़ रुपए की लागत से बना आधुनिक स्वास्थ्य केन्द्र है। यहां एक साथ 800 रोगियों की चिकित्सा की जा सकती है। गत पांच वर्ष में इस संस्थान द्वारा 20,000 से अधिक रोगियों की नि:शुल्क चिकित्सा की गई है। मठ द्वारा तकनीकी संस्थान, कम्प्यूटर शिक्षा केन्द्र, प्रबंधन संस्थान, वृद्धाश्रम, अनाथालय आदि भी चलाए जा रहे हैं। अम्मा ने 16 ब्राह्मस्थानम् मन्दिर भी स्थापित किए हैं, जिनमें महिला पुजारी हैं। मठ द्वारा संचालित ये संस्थान मुख्यत: "मानव सेवा, माधव सेवा' के भाव से प्रेरित हैं।


*इस मठ ने भारत के 12 राज्यों में निर्धनों के लिए 25,000 घर बनाए हैं और इस दशक में एक लाख और घर बनाने की योजना है। प्रारंभिक दिनों में जब यह मठ ही कुछ झोपड़ियों में था, अम्मा ने अपने शिष्यों को निर्धनों के लिए घर बनाने का निर्देश दिया। आज तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, प. बंगाल और दिल्ली में "अमृत कुटीर' के नाम से ये घर बनाए गए हैं। मठ ने भूकम्प पीड़ित गुजरात के तीन गांवों का पुनर्निर्माण किया। यह मठ 50,000 बेसहारा महिलाओं को मासिक आर्थिक सहायता भी देता है।


*आश्रम प्रारंभ से ही निर्धन परिवारों को उनकी पुत्रियों के विवाह हेतु सहायता देता रहा है। समाज के निर्धन वर्ग को नि:शुल्क न्याय-सहायता प्रदान करने के लिए आश्रम द्वारा "अमृत कृपा नीति प्रतिष्ठान' चलाया जा रहा है। यह प्रतिष्ठान देश के अधिवक्ताओं को "न्याय के प्रति आग्रह' के द्वारा पीड़ित मानवता की सेवा का एक अवसर उपलब्ध कराता है। इस प्रतिष्ठान से 600 से अधिक अधिवक्ता जुड़े हुए हैं। मठ ने एड्स रोगियों हेतु एक अस्पताल भी प्रारंभ किया है। इस प्रकार सेवा के अनेकानेक प्रकल्प इस मठ द्वारा चलाए जा रहे हैं।


एकमात्र अम्मा हैं जो पुरे विश्व में 29 मिलियन से ज्यादा लोगो गले लगाया हैं ...!


धन्य है भारत भूमि  जहां अम्मा जैसे सच्चे संत सेवकों का जन्म हुआ !


अब आप सभी कि जिम्मेदारी बनती है धर्मान्तरण के लिए सेवा करनेवाले मिशिनिरियो का पर्दाफास करे एवं अम्मा जैसे सच्चे निश्वार्थ हिंदू संतो का प्रचार प्रसार करे !


बुधवार, 14 दिसंबर 2022

Detoxification यानी विषहरण

  

Detoxification  यानी विषहरण 


 जैसा कि मैंने इस समूह की शुरुआत में ही उल्लेख किया था कि detoxification स्वास्थ्य का दूसरा स्तंभ है।

 पहले हमारे शरीर की कोशिकीय संरचना के बारे में कुछ चर्चा करते हैं।

 कोशिकाएं सभी जीवों के fundamental building blocks हैं। मानव शरीर 10 ट्रिलियन से अधिक कोशिकाओं से बना है।  एक कोशिका में एक कोशिका झिल्ली, नाभिक और कोशिका द्रव्य होता है।  झिल्ली साइटोप्लाज्म और नाभिक को उसके बाहरी वातावरण से अलग करती है जिसमें पोषक तत्व होते हैं।  पोषक तत्व कोशिका झिल्ली में प्रवेश करने के बाद, उन्हें चयापचय किया जाता है और ऊर्जा में बदल दिया जाता है जो कोशिका के जीवन कार्यों को बढ़ावा देता है।  इस चयापचय गतिविधि के उप-उत्पाद waste  होते हैं जिन्हें उसी कोशिका झिल्ली के माध्यम से कोशिका से निकालने की आवश्यकता होती है।  पोषक तत्वों को अंदर जाने देने या कचरे को बाहर जाने देने की कोशिकाओं की क्षमता में कोई कमी starvation या toxicity से मृत्यु की ओर ले जाती है।  (योग में इस अवधारणा को प्राण और अपान कहा जाता है।)

 जैसा कि आप इस चर्चा से देख सकते हैं कि detoxification उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि पोषण।  अच्छे स्वास्थ्य के लिए यह न केवल आवश्यक है

 (1) हमारे खाद्य पदार्थों और पर्यावरण में विषाक्त पदार्थों के स्रोतों से बचकर हमारे शरीर में विषाक्त पदार्थों के अवशोषण से बचें, जैसा कि कल सूचीबद्ध है,

 (2) लेकिन उन गतिविधियों में शामिल होना जो उनके उन्मूलन (elimination)की सुविधा प्रदान करती हैं।


 स्पष्ट रूप से हमारा लक्ष्य हमारे द्वारा अवशोषित विषाक्त पदार्थों के स्तर को कम करना होना चाहिए और नियमित रूप से हमारे शरीर को डिटॉक्सीफाई करने के तरीकों में संलग्न होना चाहिए।

 हम जो भोजन करते हैं वह विषाक्त पदार्थों का एक प्रमुख स्रोत है।  भोजन के अलावा अन्य स्रोत हैं हवा हम सांस लेते हैं, जो पानी हम पीते हैं (विशेष रूप से भारत में), क्रीम और लोशन जो हम अपने शरीर पर लगाते हैं, सफाई रसायन जो हम घरेलू सतहों पर लगाते हैं आदि। हमारा शरीर विषाक्त पदार्थ भी बनाता है जो उत्सर्जित होते हैं।  breadth पसीना, पेशाब और शौच के माध्यम से।

  अब सवाल आता है कि इन विषाक्त पदार्थों को हमारे शरीर से कैसे निकाला जाए।  निम्नलिखित सूची विभिन्न विषहरण (detoxification)तकनीकों को संक्षेप में प्रस्तुत करने का एक प्रयास है।


 1. शरीर की प्राकृतिक प्रतिक्रियाएं

 2. शरीर की सफाई

 3.वाटर थेरेपी

 4. उपवास

 5.योग (क्रिया) तकनीक

 6. कोलन सिंचाई

 7. प्राणायाम

 8.योग (आसन)

 9.चलना


 1. शरीर की प्राकृतिक प्रतिक्रियाएं

 सांस लेना, पसीना आना, पेशाब करना और बाउल मूवमेंट शरीर की प्राकृतिक प्रतिक्रिया है जिसके द्वारा विषाक्त पदार्थों को नियमित रूप से बाहर निकाला जाता है।  जब हम ऐसे भोजन का सेवन करते हैं जिसे हमारा शरीर विषाक्त के रूप में पहचानता है, तो शरीर की प्राकृतिक प्रतिक्रिया उसे उल्टी करने या कोलन के माध्यम से दस्त के रूप में पारित करने की होती है।


 2. दांतों को ब्रश करना, नहाना और नहाना हमारी सामान्य दिनचर्या का हिस्सा है।  स्टीम शावर और सौना भी डिटॉक्स करने के अच्छे अभ्यास हैं।


 3. जल चिकित्सा करने की कई तकनीकें हैं।

 3.1 रोज सुबह सबसे पहले 2-3 गिलास गर्म पानी पीना डिटॉक्स करने की एक अच्छी आदत है।  पानी में नींबू का रस और/या अदरक का रस और/या एलोवेरा का अर्क/आंवला का अर्क या हल्दी या सेब का सिरका मिला सकते हैं।

 3.2 जापानी जल चिकित्सा में वे सलाह देते हैं कि एक व्यक्ति 2-3 गिलास के बजाय एक लीटर पानी पीता है।  मैं इसकी सिफारिश करने के लिए पर्याप्त नहीं जानता, लेकिन सहजता से, यदि बिल्कुल भी, इसे सप्ताह में एक बार से अधिक बार नहीं किया जाना चाहिए।

 3.3 धोती (वरिसरा धोती उर्फ ​​शंखप्रक्षालन) के रूप में नीचे सूचीबद्ध योग तकनीकों में से एक जल चिकित्सा भी है।


 4. उपवास:

 उपवास एक प्राचीन प्रथा है जो कई संस्कृतियों में विभिन्न रूपों में आम है।  यह कोई संयोग नहीं है कि पिछले चार वर्षों में फिजियोलॉजी में दो नोबेल पुरस्कार इस विषय पर शोध के लिए गए हैं।  मैंने पहले आंतरायिक उपवास के बारे में चर्चा की है।  डॉ. जेसन फंग अपने सभी मधुमेह रोगियों के इलाज के लिए आंतरायिक उपवास का उपयोग करते हैं।  सांता रोजा कैलिफोर्निया में ट्रू नॉर्थ हेल्थ सेंटर गंभीर रूप से बीमार रोगियों के इलाज के लिए 40 दिनों तक लगातार उपवास का उपयोग करता है।

 मैं सभी को सलाह देता हूं कि हर साल दो 3-5 दिन जल उपवास करें।  मैं भी दृढ़ता से 16:8 इंटरमिटेंट फास्टिंग की सलाह देता हूं।  अन्य दृष्टिकोण सप्ताह में एक बार या हर दो सप्ताह या मासिक जल उपवास हैं।

 हम इस विषय पर अलग से अधिक चर्चा करेंगे।


5.योग तकनीक:

 प्राचीन भारतीय योग प्रथाओं में उन्होंने आंतरिक सफाई के लिए छह तकनीकों को निर्धारित किया है।  इन्हें सामूहिक रूप से षट्कर्म के रूप में जाना जाता है और इसमें निम्नलिखित शामिल हैं:

 5.1 धौती

 5.2 बस्ती

 5.3 नेति

 5.4 त्राटक

 5.5 नौलि

 5.6 कपालभाती

 कपालभाति और नेति को छोड़कर अन्य सभी को विशेषज्ञ की देखरेख में ही करना चाहिए।


 6. कोलन सफाई:

 यहां मुख्य लक्ष्य बड़ी मात्रा में स्थिर, माना जाता है कि कोलन की दीवारों पर निहित जहरीले कचरे के बृहदान्त्र को साफ करना है।  ऐसा करने से शरीर की जीवन शक्ति में वृद्धि होगी।  यह भी दावा किया जाता है कि इससे प्रतिरक्षा प्रणाली में सुधार होता है।  धोती (वरिसारा) और बस्ती नामक दो षट्कर्म तकनीकों में भी एक ही लक्ष्य प्राप्त होता है।


 7.नादिशोधन प्राणायाम:

 प्राणायाम सांस लेने की तकनीक है जो विषाक्त पदार्थों को दूर करने में मदद करती है।  विभिन्न तकनीकों में नादिशोधन विशेष रूप से सबसे प्रभावी है और हर सुबह 15-20 मिनट इसका अभ्यास करने से शरीर को काफी मदद मिल सकती है।  कपालभाती एक और अच्छी तकनीक है, जो वास्तव में एक क्रिया है, जिसे धारा 5.6 के तहत सूचीबद्ध किया गया है।


 8.योग आसन:

 हठ योग अभ्यास हमारे एंडोक्राइन सिस्टम को डिटॉक्सीफाई करने का एक अच्छा तरीका है।  यह लसीका प्रणाली को डिटॉक्सीफाई करने में भी मदद करता है।


 9.चलना:

 चलना हमारे लसीका तंत्र को डिटॉक्सीफाई करने का एक बहुत अच्छा तरीका है।  हमारे शरीर की हर कोशिका अपशिष्ट को समाप्त करती है और यह या तो हमारे लसीका तंत्र में या रक्त संचार प्रणाली में चली जाती है।  लसीका प्रणाली में रक्त परिसंचरण तंत्र जैसा पंप नहीं होता है।  इसके काम करने का एकमात्र तरीका शरीर की गति है।  इसलिए मैं कहता हूं कि एक्टिव लाइफस्टाइल बहुत जरूरी है।  यह हर दिन 10,000 कदमों की मेरी सिफारिश का कारण बताता है।  चलने के एक हिस्से के रूप में कुछ हाथ उठाना भी महत्वपूर्ण है।

मंगलवार, 13 दिसंबर 2022

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी होंगे मुख्य अतिथि


11वीं इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस स्मार्ट-2022 का 16 दिसंबर को ब्लेंडेड मोड में होगा शुभारम्भ: 


जुटेंगे 11 देशों के आईटी विशेषज्ञ,

 दो दिनी इस कॉन्फ्रेंस के 24 तकनीकी सत्रों में प्रस्तुत होंगे 291 रिसर्च पेपर्स



ख़ास बातें 

रिसर्चर्स के लिए स्मार्ट मील का पत्थर साबित होगीः कुलाधिपति

दुनिया के नामचीन आईटी विशेषज्ञ करेंगे अपने अनुभव साझा

कॉन्फ्रेंस जनरल चेयर प्रो. आरके द्विवेदी करेंगे थीम प्रस्तुत 

देश-विदेश के अतिथि करेंगे कॉन्फ्रेंस प्रोसीडिंग का भी विमोचन

वीसी, रजिस्ट्रार और एसोसिएट डीन भी रखेंगे अपने विचार





तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के कॉलेज ऑफ कंप्यूटिंग साइंसेज़ एंड इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी-सीसीएसआईटी में सिस्टम मॉडलिंग एंड एडवांसमेंट इन रिसर्च ट्रेंड्स-स्मार्ट 2022 पर दो दिनी 11वीं अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस का आगाज़ 16 दिसंबर को होगा। इस कॉन्फ्रेंस को सीसीएसआईटी, टीएमयू और आईईईई यूपी अनुभाग संयुक्त रूप से कर रहे हैं। स्मार्ट कॉन्फ्रेंस ऑनलाइन और ऑफलाइन मोड में होगी। कॉन्फ्रेंस का ऑनलाइन शंखनाद केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री श्री नितिन जयराम गडकरी बतौर मुख्य अतिथि करेंगे।


 टीएमयू के कुलाधिपति श्री सुरेश जैन की भी गरिमामयी मौजूदगी रहेगी। चौधरी बंसीलाल यूनिवर्सिटी, भिवानी (हरियाणा) के कुलपति प्रो. आरके मित्तल एवम् भारती विद्यापीठ के कंप्यूटर अनुप्रयोग और प्रबंधन संस्थान- बीवीआईसीएएम, नई दिल्ली के निदेशक प्रो. एमएन हुडा गेस्ट ऑफ ऑनर के रूप में शिरकत करेंगे। 


कॉन्फ्रेंस के दूसरे दिन अटल बिहारी वाजपेयी- भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी और प्रबंधन संस्थान- एबीवी-आईआईआईटीएम, ग्वालियर के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के निदेशक प्रो. एसएन सिंह मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहेंगे। एमएनएनआईटी, इलाहाबाद के आईईईई कॉन्फ्रेंस कमेटी ईई विभाग के प्रो. आशीष कुमार सिंह एवम् एमजेपीआरयू, बरेली के सीएसई डिपार्टमेंट के हेड डॉ. रावेंद्र सिंह गेस्ट ऑफ ऑनर के रूप में शिरकत करेंगे। 

दूसरी ओर टीएमयू के कुलाधिपति श्री सुरेश जैन, ग्रुप वाइस चेयरमैन श्री मनीष जैन और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर श्री अक्षत जैन ने उम्मीद जताते हुए कहा, स्मार्ट- 2022 कॉन्फ्रेंस की शोधकर्ताओं के लिए नए विचारों और अनुभवों के आदान-प्रदान करने को हमेशा एक अंतर्राष्ट्रीय मंच के रूप में पहचान रही है। यह कॉन्फ्रेंस कंप्यूटर विज्ञान और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में शोध परिणामों और नवाचारों के लिए मील का पत्थर साबित होगी। 



कॉन्फ्रेंस के दौरान भारत समेत बांग्लादेश, हंगरी, आइसलैंड, मलेशिया, नॉर्वे, ओमान, रोमानिया, सऊदी अरब, यूनाइटेड स्टेट, उज़्बेकिस्तान के कुल 11 देशों के आईटी विशेषज्ञ अपने-अपने विचार साझा करेंगे। कॉन्फ्रेंस के 24 तकनीकी सत्रों में 13 ट्रैक के देश-विदेश के शोधार्थियों की ओर से उभरती हुई प्रौद्योगिकियां, आईओटी और वायरलेस संचार, संचार और नेटवर्क प्रसारण, सिग्नल इमेज एंड कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी, शासन, जोखिम और अनुपालन, ब्लॉक चेन टेक्नोलॉजी, उद्योग 4.0, शिक्षा 4.0, सिस्टम मॉडलिंग और डिजाइन कार्यान्वयन, रोबोटिक्स, कंट्रोल, इंस्ट्रूमेंटेशन और ऑटोमेशन, बायोमेडिकल इंजीनियरिंग और हेल्थकेयर टेक्नोलॉजीज, डिजिटल इमेज प्रोसेसिंग, सूचना सुरक्षा और इंजीनियरिंग जैसे विभिन्न विषयों पर कुल 291 शोध पत्र पढ़े जाएंगे।



उद्घाटन सत्र के दौरान कॉन्फ्रेंस जनरल चेयर एवं एफओई एंड सीसीएसआईटी के निदेशक एवम् प्राचार्य प्रो. राकेश कुमार द्विवेदी स्वागत भाषण और कॉन्फ्रेंस की थीम प्रस्तुत करेंगे। टीएमयू की एसोसिएट डीन डॉ. मंजुला जैन स्मार्ट-2022 इवेंट का परिचय प्रस्तुत करेंगी। टीएमयू के कुलाधिपति श्री सुरेश जैन अपना नजरिया रखेंगे, जबकि वाइस चांसलर प्रो. रघुवीर सिंह का भी संबोधन होगा। 


वोट ऑफ थैंक्स टीएमयू के रजिस्ट्रार डॉ. आदित्य शर्मा प्रस्तुत करेंगे। कॉन्फ्रेंस चेयर एवं एफओईसीएस के विभागाध्यक्ष प्रो. अशेन्द्र कुमार सक्सेना की गरिमामयी मौजूदगी रहेगी। कॉन्फ्रेंस प्रोसीडिंग का विमोचन भी किया जाएगा। सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह और सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र भी प्रदान किया जाएगा।



कॉन्फ्रेंस के पहले दिन वोल्गोग्राड राज्य तकनीकी यूनिवर्सिटी, रूस के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. डेनिला पैरिगिन, यूएसआईसी एंड टी, जीजीएसआईपीयू के प्रोफ़ेसर डॉ. नवीन राजपाल, आईआईटी, कानपुर के सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर डॉ. वीके जैन और एमजेपीआरयू, बरेली के सीएस एंड आईटी विभाग के हेड और प्रोफेसर डॉ. एसएस बेदी और कॉन्फ्रेंस के दूसरे दिन एमएमएमयूटी, गोरखपुर के ईई विभाग (आईईईई कॉन्फ्रेंस कमेटी) के प्रोफेसर डॉ. प्रभाकर तिवारी, आईआईटी, कानपुर के एमई विभाग (आईईईई सलाहकार) के प्रो. जे रामकुमार, एमिटी यूनिवर्सिटी, ताशकंद आईटी विभाग और इंजीनियरिंग के डॉ. गौरव अग्रवाल और राष्ट्रीय अनुसंधान एवं विकास, आईसीएसआई, रामनिकु वाल्सिया, रोमानिया की मिस मारिया सिमोना राबोका मुख्य वक्ता के रूप में शिरकत करेंगे।

सोमवार, 12 दिसंबर 2022

वशिष्ठ नारायण सिंह नमन /

 वशिष्ठ नारायण सिंह आपको नमन .. 

विकास सिंह 


सौभाग्यशाली हूं कि आप जैसे महान व्यक्ति से एक बार मिलने का मौका मिला..दुर्भाग्य तो उस राज्य का है जो आप जैसे प्रतिभावान को संजो भी ना सका..2009 में इनका इंटरव्यू लिया और चैनल पर स्टोरी चलाई  ..भोजपूरी में खुब बोले ...John L. Kelley की वह किताब भी दिखाई जिसमें उनके सिद्धांत का वर्णन है जिसे आज भी अमेरिकन विश्वविध्यालय में पढ़ाया जा रहा है...उनकी मां बोली बोउआ केकरो से ऐतना न बतिअईलन जेतना तोहरा से बात कईलन... उनकी हालात देख कर मन बहुत व्यथित हुआ...अंत में मैने उनसे कुछ लिखने का अनुरोध किया तो..दो तीन शब्द लिखे और अपना हस्ताक्षर किया....जिसे मैने धरोहर की तरह संभाल रखा है......लौटते हुए मन में समाज के लोगों को जोड़कर उनके नाम से स्कॉलरशिप शुरु करने का प्रण किया था...पता नहीं कर पाऊगां की नही लेकिन..बिहार सरकार चाहे तो यह नेक काम कर सकती है... 

Anand Kaushal  #cmbihar #nitishkumar #govtbihar

रविवार, 11 दिसंबर 2022

मैनपुरी ने किया शिवपाल- अखिलेश के रिश्तों को सजीव ( जीवंत ) / अरविंद सिंह


समाजवादी चाचा और भतीजे के रिश्तों के बीच जमीं बर्फ मैनपुरी से पिघलने लगी है..?


@ डॉ अरविन्द सिंह  

(#त्वरित_टिप्पणी )

क्या चाचा और भतीजे के सियासी रिश्तों के बीच जमीं बर्फ, अब मैनपुरी से पिघलने लगीं हैं। तो क्या जिस धरतीपुत्र ने अपने जीते-जी, समाजवादी कुनबे में मचे सत्ता-संघर्ष और शक्ति संतुलन को लेकर चाचा-भतीजे के रिश्तों के बीच जमीं बर्फ और कड़वाहट को दूर नहीं कर पाए, वह काम मुलायम सिंह यादव की आखिरी यात्रा ने कर दिखाया।

        कहते हैं कि दुख का भी अपना समाजशास्त्र और मनोविज्ञान होता है, दुख में अपने और पराए का बोध नजदीक से होता है, वहीं दु:ख रिश्तों को तोड़ता भी और जोड़ता भी। मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद समाजवादी कुनबे और सैफई परिवार को जहां भीतर तक हिला दिया, वही अखिलेश को बाप के साए से अचानक से महरूम, और रिश्तों के मनोविज्ञान को महसूसना सिखा दिया।  

मुलायम सिंह यादव सरीखे राजनेता को गढ़ने में जिन भी तत्वों और परिस्थितियों का समावेश हो, लेकिन उनके बनने में शिवपाल सरीखे भाई का त्याग और समर्पण कम नहीं था और नहीं है। इस बात को मुलायम ने हमेशा ही समझा और अपने अनुज को लक्ष्मण सरीखे मान दिया। यही कारण था कि बेटे और भाई के बीच- सियासी संघर्ष के बीच भी, दोनों के शक्ति के स्रोत भी 'नेताजी' ही बने रहे।

जीवन पर्यन्त उन्होंने समाजवादी आंदोलन को आगे बढ़ाया, मरने के बाद उनकी सियासी हड्डियां भी, उनके विरासत की सियासत के लिए दधिचि की हड्डी बन गयी। जिसने चाचा और भतीजे को न केवल उनकी सियासी जमीन मैनपुरी में एक साथ उतारकार उनके अहम् और रिश्तों के दरम्यान जमीं बर्फ को पिघला दिया, बल्कि उनकी बहु डिंपल की ऐतिहासिक जीत ने चाचा और भतीजे के दिल को भी एकाकार कर दिया। इस सफलता के मूल में भी दुख से उपजी एकता और सियासी विवशता है। अखिलेश ने बड़ा दिल दिखाया और चाचा शिवपाल की प्रसपा को समाजवादी पार्टी में विलय कर पुनः उन्हें सायकिल पर चढ़ा दिया।  यह विपक्ष की एक नई सियासी दौर की शुरुआत होगी,जो समाजवादी मुलायम के अंत से.. प्रारंभ होती नज़र आ रही है।



शुक्रवार, 9 दिसंबर 2022

गांधी जीना सिखाते हैं, रजनीश मरना!

 सुशोभित-

पुणे गांधी तीर्थ भी है। आगा खां पैलेस यहां है, जहां गांधी १९४२-४३ में २१ महीने नज़रबंद रहे। यहीं पर कस्तूरबा और महादेव भाई देसाई का देहान्त हुआ। यरवदा जेल भी पुणे में ही है।

गांधी और रजनीश दोनों मेरे गुरु हैं। आप कहेंगे दोनों तो परस्पर विपरीत थे, फिर दोनों गुरु कैसे? मैं कहूंगा सामंजस्य और संश्लेष की दृष्टि से देखें तो पाएंगे दोनों पूरक हैं। गांधी के यहां धर्म है, रजनीश के यहां अध्यात्म। गांधी के यहां नीति है, रजनीश के यहां रीति। गांधी जीना सिखाते हैं, रजनीश मरना। इस पर भी कोई मित्र आपत्ति ले सकता है कि भला गांधी जीना कैसे सिखाते हैं? जीना तो रजनीश सिखाते हैं, वहां पर आनंद और उत्सव है।

मैं कहूंगा वह केवल जीवन का बहिरंग है, जीवन नहीं है। और अगर आप साधक हैं और निष्कलुष हैं, कुंठित नहीं हैं, तो मितव्ययिता, दीनता, शील, नैतिकता, अहिंसा और सत्यता आपके लिए अधिक उपयोगी है, बनिस्बत राग-रंग के। गांधी देह और मन को साधना सिखाएंगे, रजनीश देह और मन के परे जाना। मित्रगण गांधी से दमन सीखते हैं और रजनीश से भोग। दोनों ही गलत सबक हैं। किससे क्या सीखना है, यह भी एक कला है, दृष्टि है।

और रजनीश मरना कैसे सिखाते हैं? रजनीश के पूरे उद्यम का सार है, साक्षी होकर जीना ताकि साक्षी होकर मर सको। जो साक्षी होकर मर गया वह फिर लौटकर नहीं आयेगा। ‘मरो हे जोगी मरो’ और ‘मैं मृत्यु सिखाता हूं’, रजनीश ने यों ही नहीं कहा था।

अष्टांग योग में पहले पांच चरण बहिरंग हैं, बाद के तीन अंतरंग। पहले पांच चरण शील के हैं, बाद के तीन साधना के। बुद्ध के आठ मार्ग और महावीर के पांच महाव्रत भी शील के हैं। स्वयं रजनीश ने अपनी पुस्तक ‘ध्यान सूत्र’ में देह शुद्धि, भाव शुद्धि आदि की बात कही है। मैं कहूंगा गांधी से शील सीख लो, रजनीश से साधना, इसमें कोई विरोध नहीं है। अभी उल्टा हो रहा है। गांधी के चेले पाखंड सीख रहे हैं और रजनीश के चेले स्वच्छंदता। जीवन-सत्य दोनों से दूर हुआ मालूम होता है।

इन अर्थों में पुणे यात्रा संश्लेष की यात्रा रही। गांधी तीर्थ और रजनीश धाम दोनों यहां मिल गए। अब घर लौटने का समय है। यात्रा अब पूर्ण हो रही है।


पुणे के दिनों में यानी १९७४ से १९८१ के दरमियान दिए गए रजनीश के प्रातःकालीन प्रवचनों में अकसर पृष्ठभूमि से आती रेलगाड़ी की सीटी सुनाई देती। भाप के इंजिन की कूक जिसमें पुराने दिनों की पुकार। उसको सुनकर मैं सोचता, हो न हो कोरेगांव पार्क के पास ही कहीं रेलवे टेसन है।

फिर बहुत सालों के बाद नक्शा देखा तो पाया कि सच में ही रजनीश आश्रम के समीप पुणे जंक्शन का स्टेशन था। वहां उसको देखकर मैं मुस्करा दिया और कहा, दोस्त, तुम्हें ख़बर नहीं पर मैंने तुम्हारी हलचलों को सुना है। वो आवाज़ें एक ध्वनि मुद्रिका पर दर्ज़ हो गई हैं। तुम्हारी डाक, पुकार, हूक को बांध लेने के लिए वो जुगत नहीं लगाई थी, उसका मनसूबा कुछ और था, पर तुम भी उसमें अनमने शामिल हो गए।

संसार अपने पूरेपन में ही घटता है। आप लाओत्से के सूत्रों को सुन रहे होते हैं और सहसा दूर कोई लोकोमोटिव चिंघाड़ उठता है। वह भी उस ताओ सत्य का हिस्सा बन जाता है।

जैसे वो चिड़ियाएं, जिनकी आवाज़ें भी जब तब प्रवचनों के साथ सुनाई पड़ती थीं। जाने वो चिड़ियाएं आज कहां होंगी, किस आत्मा में गीत बनकर गूंज रही होंगी। जाने वो भाप के इंजिन आज कहां जंग खा रहे होंगे। उस दिन की धूप कहां होगी, उस दिन की हवा कहां।

और तब, आज का दिन है, जब चिड़ियों जैसा नश्वर, धूप सरीखा पारदर्शी, हवा जैसा विरल मैं रेलगाड़ी से इस पूना स्टेशन पर उतरा हूं, और उसको पहचान गया हूं, अलबत्ता उससे पहले कभी मिला नहीं।

मिला तो बुद्धा हॉल से भी नहीं, च्वांगत्सू दीर्घा और झेन गार्डन से नहीं, बांस कुंज में रजनीश की मूरत तक से नहीं, पर उन सबको कितने वर्षों से जानता हूं।

यह पूना है। ये शहर मेरे लिए अजनबी नहीं। यों तो हम सब ही इस जगत में अजनबी हैं, सुदूर से भटक आए, धूप की तरह, चिड़ियों जैसे– विकलता की टेर! पर यह महाराष्ट्र की परिचित मध्यान्ह है!





गुरुवार, 8 दिसंबर 2022

रविश कुमार मेरे मार्ग दर्शक / रवीश शुक्ला-

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कल रात इस्तीफे के बाद से रवीश कुमार सर के बारे में इतनी बातें दिमाग के फ्लैशबैक में चल रही हैं कि सबकुछ कई बार गड्डमगड् हो जा रहा है। अब तक जो कुछ भी मीडिया कैरियर में किया या करने की कोशिश कर रहा हूं उसमें उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है।

एक बॉस से बढ़कर वो मेरे लिए एक मार्गदर्शक हैं कई बार उनसे डांट खाई बहुत से मौके पर सराहना भी। हर बार जब कंधे पर हाथ रखते तो अपने आप को बहुत जिम्मेदार होने का अहसास बस ऐसे ही हो जाता था। रवीश कुमार के विचारों से आप सहमत या असहमत हो सकते हैं। उनको प्यार करने वालों की भी बहुत बड़ी तादात है और नफ़रत करने वालों की भी।

लेकिन लोकप्रियता के शिखर पर होने के बावजूद उनकी ईमानदार, उनकी लेखनशैली, बोलने का अंदाज, उनकी समझदारी और उनका साफ शफ्फाक चरित्र पर किसी को रंच मात्र भी शक नहीं होना चाहिए। ये बात 20 साल से जान पहचान के आधार पर पूरी जिम्मेदारी से लिख रहा हूं।

खैर कभी सोचा नहीं था कि NDTV और रवीश कुमार अलग होंगे…कभी सोचा नहीं था कि उनके इस्तीफे पर लिखना पड़ेगा, कभी सोचा नहीं था कि हमारी पीढ़ी इस पल का भी गवाह बनेगी। लेकिन जिंदगी यही है… रवीश कुमार सर जहां रहेंगे चमक बिखेरते रहेंगे। गांव गिंराव और अभावों में पले गरीब युवाओं को प्रभावित करते रहेंगे।

फिर मिलेंगे संघर्ष के तूफानों में…

सोमवार, 5 दिसंबर 2022

चम्मच नहीं हाथ से भोजन करें ...

 


मित्रों अधिकतर भारतीय अपने हाथों से खाना खाते हैं। लेकिन आजकल हमने पाश्चात्य संस्कृति का अनुसरण करते हुए चम्मच और कांटे से खाना शुरू कर दिया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अपने हाथों से खाना खाने के स्वास्थ्य से संबंधित कई फायदे हैं।


यह आपके प्राणाधार की एनर्जी को संतुलित रखता है:


आयुर्वेद में कहा गया है की हम सब पांच तत्वों से बने हैं जिन्हें जीवन ऊर्जा भी कहते हैं, और ये पाँचों तत्व हमारे हाथ में मौजूद हैं ( आपका अंगूठा अग्नि का प्रतीक है, तर्जनी अंगुली हवा की प्रतीक है, मध्यमा अंगुली आकाश की प्रतीक है, अनामिका अंगुली पृथ्वी की प्रतीक है और सबसे छोटी अंगुली जल की प्रतीक है)। इनमे से किसी भी एक तत्व का असंतुलन बीमारी का कारण बन सकता है।


जब हम हाथ से खाना खाते हैं तो हम अँगुलियों और अंगूठे को मिलाकर खाना खाते हैं और यह जो मुद्रा है यह मुद्रा विज्ञान है, यह मुद्रा का ज्ञान है और इसमें शरीर को निरोग रखने की क्षमता निहित है। इसलिए जब हम खाना खाते हैं तो इन सारे तत्वों को एक जुट करते हैं जिससे भोजन ज्यादा ऊर्जादायक बन जाता है और यह स्वास्थ्यप्रद बनकर हमारे प्राणाधार की एनर्जी को संतुलित रखता है। भोजन में हरी मिर्च खाने से होते हैं अचूक स्‍वास्‍थ लाभ


इससे पाचन में सुधार होता है:


टच हमारे शरीर का सबसे मजबूत अक्सर इस्तेमाल होने वाला अनुभव है। जब हम हाथों से खाना खाते हैं तो हमारा मस्तिष्क हमारे पेट को यह संकेत देता है कि हम खाना खाने वाले हैं। इससे हमारा पेट इस भोजन को पचाने के लिए तैयार हो जाता है जिससे पाचन क्रिया सुधरती है।


इससे खाने पे दिमाग लगता है:


हाथ से खाना खाने में आपको खाने पर ध्यान देना पड़ता है। इसमें आपको खाने को देखना पड़ता है और जो आपके मुह में जा रहा है उस पर ध्यान केंद्रित करना पड़ता है। इसे माइंडफुल ईटिंग भी कहते है और यह मशीन कि भांति चम्मच और कांटे से खाना खाने से ज्यादा स्वास्थयप्रद है। माइंडफुल ईटिंग के कई फायदे हैं इनमे से सबसे महत्वपूर्ण फायदा यह है कि इससे खाने के पोषक तत्व बढ़ जाते हैं जिससे पाचन क्रिया सुधरती है और यह आपको स्वस्थ रखता है।


यह आपके मुह को जलने से बचाता है:


आपके हाथ एक अच्छे तापमान संवेदक का काम भी करते हैं। जब आप भोजन को छूते हैं तो आपको अंदाजा लग जाता है कि यह कितना गर्म है और यदि यह ज्यादा गर्म होता है तो आप इसे मुह में नहीं लेते हैं। इस प्रकार यह आपकी जीभ को जलने से बचाता है।

शनिवार, 3 दिसंबर 2022

रवि अरोड़ा की नजर से.....

 एनडीटीवी का मर्सिया /  रवि अरोड़ा .... 



बात छह साल पुरानी है। मोदी सरकार ने अचानक नोटबंदी लागू कर दी थी। इस फैसले का उद्योग धंधों पर क्या प्रभाव पड़ा इस पर एक स्टोरी करने एनडीटीवी के स्टार एंकर रवीश कुमार गाज़ियाबाद आए थे । उन्होंने जिस भी परिचित उद्योगपति से बात की उसी की फैक्ट्री थोड़ी बहुत चल ही रही थी मगर बेहतर विजुअल के लिए रवीश को तलाश थी एक ऐसी फैक्ट्री की जो पूरी तरह बंद हो । 

दरअसल उनकी स्टोरी ही यही थी कि नोटबंदी से आम जन जीवन ही नहीं काम धंधे भी पूरी तरह ठप हो गए हैं, जबकि जमीनी स्तर पर ऐसा उन्हें दिख नहीं रहा था । दोपहर बाद जाकर उनकी तलाश पूरी हुई और उन्हें धागा बनाने वाली एक फैक्ट्री पूरी तरह बंद मिल गई और फिर उसके परिसर में घूम घूम कर उन्होंने मोदी सरकार और नोटबंदी पर अपनी स्टोरी की और तय शुदा स्क्रिप्ट के अनुरूप सरकार को जम कर गरियाया। बस वही दिन था जब मैंने रवीश कुमार का कोई कार्यक्रम नियमित रूप से देखना छोड़ दिया । बेशक मुझे भी मोदी सरकार का आलोचक माना जाता है मगर टोटल पहले लिख कर ऊपर की संख्याएं बाद में तय करने को मैं पत्रकारिता नहीं मानता। 

यकीनन रवीश कुमार जुझारू, सत्ता की आंख से आंख मिला कर बात करने का साहस रखने वाले और करोड़ों लोगों के दिलों पर राज करने वाले लोकप्रिय पत्रकार हैं मगर उन्हें पसंद करने के बावजूद मैं खुद को उनका फैन कहने से हिचकता ही हूं । हालांकि एनडीटीवी के मालिकान बदलने और रवीश कुमार के इस्तीफे पर मैं भी उतना ही दुःखी हूं जितना उनके अन्य करोड़ों चाहने वाले। 


एक बात तो रवीश कुमार से नफरत करने वाले भी मानते हैं कि इनका रिसर्च वर्क बहुत उम्दा होता था । बेशक वे टोटल पहले तय करने में विश्वास करते हों मगर उनकी टीम के द्वारा जुटाए गए तथ्यों को कोई चुनौती नहीं दे सकता । यही बात थी कि वे सत्ता की आंख में कांटे की तरह चुभते थे ।

 रवीश कुमार ही क्यों तमाम सत्तानशीं लोग पूरे एनडीटीवी समूह से ही नफरत करते थे। स्वयं मोदी जी को एनडीटीवी के मालिक प्रणय रॉय फूटी आंख नहीं सुहाते। गुजरात दंगों के बाद रॉय कई बार मोदी जी को सार्वजनिक रूप से अपने सवालों से रुसवा कर चुके थे। रवीश कुमार आज यदि रवीश कुमार हैं तो उसकी तमाम सफलताओं के पीछे यही रॉय ही खड़े हैं। दशकों तक विभिन्न अखबारों में कलम घसीटने के कारण मैं भली भांति जानता हूं कि मैनेजमेंट की स्वीकृति के बिना पत्रकार एक शब्द नहीं लिख सकता, इलैक्ट्रोनिक मीडिया में भी यह संभव नहीं है ।

 किसकी खाट के नीचे आग लगानी है और किसे बक्शना है, यह मैनेजमेंट ही तो तय करता है। आज जिन्हें गोदी पत्रकार कहा जा रहा है, वह भी उसी तरह मालिकों के इशारे पर नाच रहे हैं, जैसे रवीश कुमार नाच रहे थे । साफ साफ कहूं तो तो न उधर पत्रकारिता हो रही है और न इधर । सबके अपने अपने एजेंडे हैं। अपने अपने दोस्त हैं और अपने अपने दुश्मन। 


वैसे इसमें कोई संदेह नहीं कि रवीश कुमार ने जो मुकाम हासिल किया है वैसा बिरले ही कर पाते हैं। उन्हें देश के सबसे प्रभाव शाली सौ लोगों में शुमार किया जाता है। देश विदेश के अनेक प्रतिष्ठित सम्मान उनके नाम हैं। उनकी यह ताकत निकट भविष्य में भी कम होने वाली नहीं है। यह भी हो सकता है कि सोशल मीडिया से वे अपने आप को और अधिक निखार लें। एक तरह से यह अच्छा भी होगा । 

एनडीटीवी के अवसान के बाद यूं भी इलैक्ट्रोनिक मीडिया अब लगभग अप्रासंगिक ही हो गया है और सच्ची व खरी खबरों के लिए अन्य किसी मंच की दरकार तो अब होगी ही । इसी लिए मुझे लगता है कि बेशक यह एनडीटीवी का मर्सिया पढ़ने का वक्त है मगर रवीश कुमार की झोली से तो अभी और बहुत कुछ निकलना बाकी ही है।

आधुनिक भारतीय फुटबाल का जनक - सैय्यद अब्दुल रहीम

 

आजकल क़तर में फुटबॉल का वर्ल्ड कप FIFA 2022 चल रहा है, रोज़ाना उससे जुड़ी ख़बरें न्यूज़ चैनल्स, अख़बार और सोशल मीडिया पर दिखाई जा रही हैं, वर्ल्ड कप की इस गहमागहमी के बीच कुछ ज़िक्र भारतीय फुटबाल का भी कर लिया जाए, भारतीय फुटबॉल टीम का FIFA रैंकिंग में 106th स्थान है, एक समय ऐसा था जब भारतीय टीम एशिया के बेहतरीन टीमों से एक समझी जाती थी, वो दौर भारतीय फुटबॉल का स्वर्णिम युग कहा जाता है, ये स्वर्णिम युग उस वक्त था जब भारतीय टीम के कोच सैय्यद अब्दुल रहीम साहब थे,


आइए जानते हैं भारतीय फुटबॉल के उस महान खिलाड़ी, कोच और मैनेजर के बारे में जिनके समय को भारतीय फुटबॉल का स्वर्णिम युग कहा जाता है, जो आधुनिक भारतीय फुटबॉल के आर्किटेक्ट के नाम से जाने जाते हैं,


उनका नाम है सैय्यद अब्दुल रहीम, उनकी पैदाइश निज़ाम के हैदराबाद में 17 अगस्त 1909 को हुई, प्रोफ़ेशन से टीचर थे, और फुटबॉल के खिलाड़ी थे, 1950 से मृत्यु तक यानी 1963 तक वो भारतीय फुटबाल टीम के कोच रहे, इनके कोच का कार्यकाल भारतीय फुटबॉल के स्वर्णिम युग के तौर पर जाना जाता है,

इनकी सरपरस्ती में भारतीय टीम एशिया के सबसे बेहतरीन टीमों में से एक बन गई, और 1951 में पहली बार एशिया कप हासिल किया, इस मैच में भारत ने ईरान को हरा कर गोल्ड मेडल हासिल किया था,


1951 से 1963 के बीच सैय्यद अब्दुल रहीम साहब के कार्यकाल के दौरान इंडियन फुटबॉल टीम ने नई बुलंदियों को छुआ, शुरुआत 1951 में एशियन गेम्स की जीत से हुई, जिसमें भारत ने गोल्ड मेडल हासिल किया, उसके बाद 1952 में quadrangular cup में भारत ने जीत दर्ज की और लगातार चार साल तक 1953, 1954, और 1955 में quadrangular Cup जीतता रहा, 1958 के एशियन गेम्स में भारत चौथे स्थान पर रहा, और 1959 के मेंड्रेका कप में दूसरा स्थान पर रहा, 1962 के एशियन गेम्स में फिर से गोल्ड मेडल हासिल किया, 1956 के मेलबॉर्न ओलंपिक में भारत सेमीफाइनल तक पहुंचा, इस पोजीशन तक पहुंचने वाली एशिया की पहली टीम थी, भारत से पहले कोई भी एशियन फुटबॉल टीम उस स्तर तक नहीं पहुंच पाई थी, ये भारतीय टीम के आजतक की सबसे बड़ी कामयाबी समझी जाती है,


अब्दुल रहीम साहब बेहतरीन टैक्टिक और इनोवेशन के लिए भी याद किए जाते हैं, जब दुनिया की ज़्यादातर फुटबॉल टीम 2-3-2-3 या 3-3-4 फॉर्मेशन के साथ खेलती थी, अब्दूल रहीम साहब ने 4-2-4 फॉर्मेशन को भारतीय टीम में इंट्रोड्यूस किया, उनके द्वारा भारतीय टीम में इस फॉर्मेशन को इंट्रोड्यूस करने के कुछ सालों बाद 1958 के वर्ल्ड कप में ब्राज़ील की जीत ने इस फॉर्मेशन को दुनिया भर में मशहूर बना दिया, और बहुत सी यूरोपियन टीमों ने भी इसे कॉपी किया, 


अब्दुल रहीम साहब 1943 से लेकर अपने इंतकाल तक हैदराबाद फुटबॉल एसोसिएशन के सेक्रेटरी रहे, उन्होंने देश में फुटबॉल का ऐसा इको सिस्टम डेवलप किया जिसने भारतीय टीम को सालों तक बेहतरीन खिलाड़ी दिए,


कैंसर की वजह से 1963 में इनका इंतकाल हो गया, 


इनके जीवन पर एक biopic ' मैदान ' नाम से बन रही है, जिसमें अजय देवगन इनके किरदार में नज़र आएंगे,


#FIFAWorldCup #FIFA #football #footballnews 


वाया Md Iqbal भाई

डीमापुर ना का ‘सुपर मार्केट’

 

नागालैंड की राजधानी कोहिमा है, लेकिन डीमापुर राज्य का सबसे बड़ा शहर और प्रमुख वाणिज्यिक केंद्र है। यह शहर देश के अन्य भागों से रेल और हवाई मार्ग से जुड़ा है। यही वजह है कि यह शहर असम के बड़े शहरों सा ही प्रतीत होता है जहां देश के सभी राज्यों के लोग देखने को मिल जाएंगे।  

अपने नागालैंड यात्रा के दौरान 3 दिन डीमापुर में भी रही। एक दिन लिया (जिस फार्म हाउस में रुकी, वहां की केयरटेकर) के 11 वर्षीय बेटे के साथ ऑटो से शहर घूमने का मन बनाया। न्यू मार्केट और हांगकांग मार्केट की ओर जाते वक्त एक पुराना मार्केट नजर आया तो वहां रुके। दुकानदारों से पता चला कि इस मार्केट का नाम ‘सुपर मार्केट’ है। वैसे तो यह काफी पुराना डेली मार्केट है लेकिन प्रत्येक बुधवार को इसी स्थान पर साप्ताहिक बाजार भी लगता है जिसमें दूरदराज के ग्रामीण अपने जैविक उत्पाद, पौधे और तरह तरह के जीव-जंतु ब्रिकी करने आते हैं। सुबह-सवेरे ही यह मार्केट सज जाता है जो देर शाम तक खुला रहता है।

इस मार्केट में एक स्टॉल देखा जो डोनट की तरह पूड़ी का था। पूछने पर पता चला कि उसे लोग नागा रोटी या नागा पूड़ी भी कहते हैं। यह आटे या मैदे के बजाय चिपचिपे चावल के आटे से बनी होती हैं जिसके बीच में छेद किया जाता है। स्टॉलों में अनाज, फल-सब्जियां भले ही कम थीं, लेकिन सभी ने बड़े ही करीने से अपनी दुकानें सजा रखी थीं। वहीं, यह बात भी समझ आई कि यहां के लोग जीवित जीव-जंतु खरीदना ज्यादा पसंद करते हैं। खास बात यह भी रही कि ज्यादातर लोग हिन्दी समझ रहे थे। और असमिया भाषा से मिलती जुलती भाषा होने के कारण ‘नागालिम’ मैं भी समझ पा रही थी।

नागा लोगों का मुख्य आहार चावल, दालें, बीन्स, उबली हरी पत्तेदार सब्जियां, दुनिया की सबसे तीखी मिर्च ‘नागा चिली’ की चटनी, सूखी और नमकीन मछली, मुर्गियां, सूअर यानी पोर्क आदि हैं। कुल मिलाकर यदि आप शाकाहारी हैं तो भी आपको सभी छोटे-बड़े होटलों में नॉन वेज आइटम के साथ दाल, चावल, चटनी तो कम से कम खाने को मिल ही जाएगी। फिर भी यदि आपको शुद्ध शाकाहारी भोजन ही चाहिए तो तमाम बड़े होटल और रिसोर्ट हैं जहां आप निःसकोच बुकिंग करा सकते हैं। या अपने टूर ऑपरेटर्स से कंसल्ट कर सकते हैं। वैसे सुपर मार्केट से सटा होटल सारामति यहां के अच्छे होटलों में से एक है। 

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शुक्रवार, 2 दिसंबर 2022

नागालैंड : द लैंड ऑफ फेस्टिवल्स

 

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हॉर्नबिल महोत्सव का आगाज (1 से 10 दिसंबर तक )

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नागालैंड राज्य की टैगलाइन ही है नागालैंड : द लैंड ऑफ फेस्टिवल्स। इस राज्य में हर महीने कोई न कोई उत्सव मनाया जाता है। लेकिन इन सब उत्सवों में खास है हॉर्नबिल उत्सव। हर साल नागालैंड के स्थापना दिवस यानी एक दिसम्बर से राजधानी कोहिमा से सटे नागा विरासत गांव किसामा में हॉर्नबिल उत्सव शुरू हो जाता है। यह नागालैंड का सबसे बड़ा उत्सव है। 


नागालैंड के लोगों को सामूहिक रूप से नागा कहा जाता है। लेकिन गारो जनजाति के अलावा नागालैंड में कुल 16 नागा जनजातियां रहती हैं। जिनकी अपनी एक अलग पहचान, परंपरा, रीति-रिवाज, पहनावा और बोलियां हैं। खास बात ये है कि यहां के जनजातीय समूह आज भी अपने उत्सवों को धूमधाम से मनाते हैं!

साभार: लोक सभा टेलीविजन

प्रसारण तिथि: 03.12.2017 #mamtasinghmedia 

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