मंगलवार, 30 अगस्त 2022

टीवी पर भविष्य वाणी का sachn

 टीवी पर पूरे भारत के लोगों का भविष्य वाणी करने वाले को केरल में इतनी बड़ी बाढ़ आने आली है यह बात पता नही थी क्या?

फलज्योतिष-कुंडली-शुभअशुभ-ज्योतिष-भविष्यज्ञान-हस्तरेखा ज्ञान- ये 100% 

ग़लत है, अवैज्ञानिक है,अंधविश्वास है, अज्ञान है, शोषण है, धंदा है, मानसिकग़ुलामी का हथियार है.

ज्योतिष १००% ग़लत होता है. 

इधर उधर के तुक्के लगाना, अंदाजी बड़बड करना,तारे तोड़ना, यजमान को ख़ुश करनेवाली बातें करना, ठगी-चालाकी-छल-झुट बोलकर ठगना इन ज्योतिषों का धंदा है..

क्यों १०० % ग़लत है ?

1. किसीभी ज्योतिष ने एक बार भी भूकम्प चक्रवात सुनामी आदि की भविष्यवाणी व्यक्त नहीं की.

2. कोईभी एक सिद्धांत ये ज्योतिष बताते नहीं.

3. सभी ज्योतिषोंने ज्योतिष का वैज्ञानिक आधार, वैज्ञानिक संशोधन व प्रमाण निश्चित करे निर्धारित करे. आज तक ज्योतिष को सिद्ध करनेवाला विज्ञान का एकभी प्रमाण नहीं मिला. कोईभी परीक्षण हुआ नहीं, कोईभी निरीक्षण-प्रयोग हुआ नहीं.

4. मानवजीवन पर,जन्म-मृत्यु पर, जीवन की सुख-दुःख की -प्रियअप्रिय घटनाये निश्चित करना, कोईभी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला.

5. पूरे ज्योतिष में एक भी सही सिद्धांत नहीं है जिससे जीवन की किसी भी घटना के बारे में सटीकता से बताया जा सके .

6.  ग्रहो में ऐसा कोई प्रभाव नहीं होता है जिससे वह करोडो किलोमीटर से किसी व्यक्ति के जीवन में शिक्षा, नौकरी, शादी, बच्चे, धन, व्यवसाय आदि से जुडी हुई घटनाओ को ज्योतिष के सिद्धांत के अनुसार कर सके 

7. ज्योतिष के राशि स्वामी, दृष्टि, मित्र शत्रु, उच्च नीच, मूल त्रिकोण, दशा, राहु केतु, वक्री, अस्त, लग्न, अयनांस जैसे मूल सिद्धांत इन ग्रहो के बारे में आधी अधूरी और गलत जानकारी के आधार पर गलत प्रक्रिया से बनाये गए है. क्योंकि ऋषियों के समय में ब्रह्मांड के केंद्र में स्थित पृथ्वी को स्थिर और चपटी माना जाता था, पृथ्वी के पास सूर्य को माना जाता था, चन्द्रमा को सूर्य से भी दूर माना जाता था, सभी नछत्रो को चद्र्मा और बुध के बीच में माना जाता था .

8. आदिकाल से ऋषि जिस ज्योतिष से जुड़े हुए थे वह आजकल खगोलशास्त्र (Astronomy) के नाम से जाना जाता है - जिसमे विज्ञानं की सहायता से आगे बढ़ा जा रहा है 

9. फलित ज्योतिष के समर्थन में कोई भी ऋषि, शास्त्र आदि कभी नहीं रहे - बल्कि इस कार्य को करने वाले को उन्होंने धिक्कारा है .

10. पराशर के नाम से समाज में भ्रम फैलाया गया है जबकि व्यास जी के पिता ऋषि पराशर ने फलित ज्योतिष पर कुछ नहीं लिखा है - बल्कि उनके नाम से दसवीं सदी में होरा शास्त्र लिखा गया है .

11. आनुवंशिकता (जेनेटिक्स),विकासवाद का सिद्धांत, पृथ्वी की उतपत्ति, ब्रह्माण्ड का विकास, नष्ट हो रही गेलेक्सियां,टेस्ट ट्यूब बेबी, क्लोनिंग,जीव जगत की रचना, असंख्य स्पर्म्स का बनना और रोज नष्ट होना,एक फल में सेंकडो बीजो का होना, अनेक जंतुओं  के शरीर को काटने पर सभी का जीवित रहना , प्रयोगशाला में कृत्रिम तरीके से प्रारम्भिक  जीवन की उतपत्ति,आदि तर्कों और प्रमाणों से  ईश्वर, आत्मा, पुनर्जन्म, मोक्ष,  अध्यात्म , आदि की अवधारणाओं को गलत सिद्ध किया जा सकता है।           

12.  हमारी आकाश गंगा के 40हजार करोड़ तारो अर्थात इतने सौर्य-मण्डल वाली आकाश गंगा के अलावा 20000 करोड़ दूसरी आकाश गंगाये है . ये Galaxies अर्थात आकाशगंगाए दृश्यविश्व की है. ज्योतिष में ज्योतिषी जिन ग्रहो के आधार पर कुंडली बना कर भविष्य बताने की बात करते है वह कितना नगण्य है - पर ठगी का धंधा पूरा है .

13. सूर्यतारा(बड़ा गोला)की तुलना में पृथ्वी का आकार (नीचे डॉट जैसी) साथ ही अन्य ग्रहो का आकार भी देखिये - इसलिए आप सभी ग्रहो के आकार की तुलना कर सकते है .

14. यह तो सभी ज्योतिषी कहते ही है की शनि ग्रह धीरे धीरे चलता है क्योंकि लंगड़ा है - और इस बारे में कथाये भी लिखी गयी है - पर अब हम जानते है की शनि की गति चन्द्रमा से भी तेज है - शनि की गति ९ किलोमीटर प्रति सेकंड से भी अधिक है जब की तेज माने जाने वाले चन्द्रमा की गति मात्र एक किलोमीटर प्रति सेकंड है - तो समझा जा सकता है की कौन सा ग्रह तेज चलता है - पर आदिकालीन गलत मान्यता और गलत जानकारी के कारण बनाये गए ज्योतिष के अन्धविश्वास में पूरा समाज फस गया है - 

15. शनी ग्रह से डरनेवालों जानलो

         Cassini ग्रहयान (Satellite) पृथ्वी से 1997              को छोड़ा गया Saturn planet की ओर.

2017 को satellite CASSINI ने Death dive किया.वैज्ञानिक सूश्म अभ्यास-जाँच कर रहे है.

परंतु जिसकी कुंडली में शनी है वह अपने डर से मुक्त हो जाये. ये शनी ग्रह आपका कुछ बुरा ,अपशकुनि, संकट मृत्यु कोई कुछ भी नहीं कर सकता है.,

ये शनी ग्रह आपके जीवन में अच्छा-बुरा कुछभी प्रभाव डाल/कर सकता नहीं सकता.

ये कामचोर- ठग ज्योतिष अपना धंदा चलाते है.

शनी ग्रह का डर बताने वालों को शनी ग्रह घूमकर आने की सलाह दे. कोई शनी return ज्योतिषी होंगा तो हमें जानकारी दे. शनी return ज्योतिष का हम सत्कार करना चाहते है.

a. शनि १२० करोड़ से लेकर १७० करोड़ kilometre दूर होता है.

b. अगर CASSINI यान को पृथ्वी से शनि तक पहुँचने में ७ साल लगे.

c. यह तारा नहीं है शनि तो ग्रह है. तारे से प्रकाश पृथ्वी तक पहुँच सकता है,जैसे सूर्य तारे का प्रकाश ८.२० मिनट में पृथ्वी पर पहुँचता है. परंतु शनि तारा न होने से प्रकाश पृथ्वी पर पहुँचने का प्रश्न नहीं उठता.

d. सूर्य तारे के गुरुत्वकार्शन में सभी ग्रह सूर्य की कक्षा में घूमते है. शनि ग्रह होनेसे उसके गुरुत्वकर्शन का प्रभाव पृथ्वी पर नहीं पड़ता है.

e. शनि गैस का ग्रह है और उसके कक्षा में कुछचंद्र घूमते है.

f. शनि ग्रह से कोईभी प्रकाश,कोईभी gamma rays, ultraviolet rays पृथ्वी पहुँचने का प्रश्न नहीं है क्योंकि शनि सिर्फ़ ग्रह है कोई तारा(यानी सूर्य समान तारा) नहीं है.

दुनिया का सबसे अमीर गांव हैं गुजरात का माधाaपर

 Madhapar: दुनिया का सबसे अमीर गांव, यहां के 17 बैंकों में जमा हैं लोगों के 5000 करोड़ रुपए ।


गुजरात के कच्छ जिले में माधापर नाम का एक गांव हैं, जोकि देश के दूसरे गांव की तुलना में एकदम अलग हैं. आमतौर पर भारत में गांव के अंदर बैंक की शाखाएं नहीं होती हैं, मगर माधापर में 7600 घरों में रहने वाले 92000 हजार लोगों के लिए 17 बैंक हैं. इन बैंको में गांव वालों के करीब 5000 करोड़ रुपए जमा हैं. यहां के लोग कितने अमीर हैं इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां दूर-दूर से लोग घूमने आते हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस गांव के आधे से अधिक लोग लंदन में रहते हैं. गांव से दूर रहकर भी ये लोग गांव से जुड़े रहें. इसके लिए 1968 में लंदन में यहां के लोगों ने माधापर विलेज एसोसिएशन नाम का एक संगठन बनाया. इसके जरिए समय-समय पर लोग एक-दूसरे से कनेक्ट करते हैं और गांव में मौजूद बैंकों में अपना पैसा जमा करते हैं. खास बात यह कि विदेश जाने के बाद भी लोगों ने अपने खेतों को नहीं बेचा है.

गांव में रहने वाले लोग इन खेतों की देखभाल करते हैं और खेती-बाड़ी करते हैं. गांव में स्कूल, कॉलेज, गौशाला, हेल्थ सेंटर, कम्युनिटी हॉल, और पोस्ट ऑफिस जैसी हर ज़रूरी चीज़ मौजूद है. गांव में मौजूद झीलों, बांधों और कुओं को भी अच्छे ढंग से रखा गया है, जोकि यहां पहुंचने वालों को आकर्षित करते हैं.         

विश्व की भाषाई दुनियाँ

 विश्व में 7151 भाषायें बोली जाती है


प्रस्तुति - संजय कुमार


आधी दुनिया (390 करोड़) सिर्फ 23 भाषा बोलती है.

बुसू भाषा सिर्फ 8 लोग बोलते हैं

1514 भाषाओं के बोलने वाले एक हजार से भी कम हैं

67 देशों की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है


प्रथम + दूसरी भाषा = कुल भाषा भाषी


अंग्रेजी : 37 + 108 = 145 करोड़

मैंडरिन/चीनी : 93 + 20 = 113 करोड़

हिंदी : 34.4 + 25.8 = 60.2 करोड़

स्पैनिश : 47 + 8 = 55 करोड़

बांग्ला : 23.4 + 3.9 = 27.3 करोड़

फ्रेंच : 8 + 19 = 27 करोड़

रशियन: 15 + 11 = 26 करोड़

उर्दू : 7 + 16 = 23 करोड़

जापानीज : 12.5 + 1 लाख = 12.5 करोड़


मराठी : 8.3 + 1.6 = 9.9 करोड़

तेलुगु : 8.2 + 1.3 = 9.5 करोड़

तमिल : 7.8 + 0.8 = 8.6 करोड़

गुजराती : 5.7 + 0.5 = 6.2 करोड़

कन्नड़ : 4.36 + 1.5 = 5.86 करोड़

भोजपुरी : 5.23 + 2 लाख = 5.25 करोड़

पूर्वी पंजाबी : 4.81 + 0.36 = 5.17 करोड़

पश्चिमी पंजाबी : N/A + N/A = 6.6 करोड़


मगही - 2.07 Cr. (मगही की 4 बोलियां - उत्तरी, दक्षिणी, केंद्रीय व कोर्था/पूर्वी).


कोर्था 80 लाख लोग बोलते हैं.


लेखक - श्रीनिवास पनुरी, भुबनेश्वर दत्त शर्मा, विश्वनाथ दसौंधी, विश्वनाथ नागर, शिवनाथ प्रामाणिक, ए के झा, बी एन ओहदर.


गया जिला हिन्दी साहिqत्य सम्मेलlन

सोमवार, 29 अगस्त 2022

ओशो की अमरीका में अवैध जेल यात्रा

 #ओशो 12 दिन अमेरिका की जेल में थे ना कोई आधार ना वारंट ना सबूत कुछ नही फिर भी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने उन्हें जेल भिजवा दिया और कहा कि हम आपको बिना सबूतों के भी अंदर रखेंगे ट्रायल के रूप में और कहेंगे कि आपने देश विदेश से अपने शिष्यों को बिना वीजा के अमेरिका लाकर अमेरिकी कानून का उल्लंघन किया है। आपको ये साबित करने में कि आप निर्दोष हो 10 साल लग जायेंगे और तब तक आपका कम्यून आपके बिना नष्ट हो जायेगा या हम उसे तबाह कर देंगे और फिर हम आपको बाइज्जत आपके मुल्क भारत भेज देंगे।


वह ऐसा इसलिए कर रहा था क्योंकि ओशो का कम्यून 100 एकड़ से ज्यादा में फैला हुआ था उसमें खुद का airport हॉस्पिटल स्कूल कॉलेज सब था और वहाँ कोई भी मुद्रा नही चलती थी  निःशुल्क था सब सभी राजनीति से हटकर अपना सुखी जीवन जी रहे थे लोगों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही थी जिससे रोनाल्ड रीगन डर गया।

 

ओशो के शिष्यों को जब यह पता चला तो उन्होंने फूल भेजे जेल में भी और राष्ट्रपति भवन में भी जिस जेल में ओशो बंद थे वहाँ के जेलर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मैंने पहली बार देखा जब किसी असंवैधानिक गिरफ्तारी का विरोध बिना हिंसा या उग्र प्रदर्शन के हुआ हो उसने लिखा है कि वो 12 दिन मेरी जेल चर्च में बदल गई थी अमेरिका के कोने कोने से ढेरों फूल गुलदस्ते गमले आ रहे थे जब भी ओशो जेल से कोर्ट जाते लोग उन्हें फूल भेंट करते पूरा न्यायालय परिसर फूलों से भर गया था जज हैरान थे पूरे पुलिस कर्मी हैरान थे।


तब जजों ने ओशो से कहा हम सभी असामान्य रूप से चकित हैं हमने स्पेशल फोर्सेस बुलवा कर रखी थीं क्योंकि आपके शिष्य लाखों में हैं प्रदर्शन उग्र हो सकता था पर यहाँ तो सब उम्मीद के विपरीत हो रहा है यह कैसा विरोध है? तब ओशो ने कहा यही मेरी दी हुई शिक्षा है वो जैसा प्रदर्शन करेंगे असल में वह मुझे मेरे आचरण और मेरी शिक्षा को ही व्यक्त करेंगे।


ओशो ने भारत में रहते हुए इंदिरा नेहरू हिन्दू मुस्लिम ईसाई एवं अन्य सभी धर्मों में व्याप्त कुरीतियों का खुलेआम विरोध किया पर ना इंदिरा ने उन्हें जेल भेजा नाजे मोरारजी ने ना चरण सिंह ना नेहरू ना अन्य किसी ने क्योंकि सभी ये बात जानते थे कि ये आदमी इतना तर्कपूर्ण और अर्थपूर्ण है कि ये हमारे राजनैतिक शिकंजों में ना आ सकेगा ना हम इसका कभी विरोध कर सकेंगे क्योंकि हम आधारहीन हैं। और अंततः CIA ने थैलियम नाम का धीमा ज़हर देकर उन्हें मार दिया 1985 में देना देना शुरू किया और 5 सालों में 1990 में उनकी मृत्यु हो गई।


क्योंकि जिसका तुम जवाब नही दे सकते उसे मारना ही बेहतर लगता है लेकिन शिष्यों ने तो फिर भी कोई विरोध नही किया नाच गाकर नृत्य में डूबकर ओशो को विदा किया कोई रोया नही ना किसी ने किसी पर दोषारोपण किया ना कोई विरोध ना चक्काजाम ना लोग मरे ना शहर जलाए गए। एक गुरु को इससे अधिक क्या चाहिए शिष्य ही गुरु का प्रतिबिंब होते हैं जैसा शिष्य करेंगे दरअसल वही गुरु की दी हुई शिक्षा होगी


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रवि अरोड़ा की नजर से......

 हैप्पी एंड  / रवि अरोड़ा



लीजिए तमाशा खत्म हुआ । नोएडा के ट्विन टॉवर जमींदोज हो गए । खूब तालियां बजीं। वीडियो बने, सेल्फियाँ ली गईं। कुछ ने आमने सामने से तो कुछ ने अपने घरों की छतों पर चढ़ कर नज़ारा देखा । कुछ कुछ वैसा ही जैसे धू धू कर रावण जलता देखते हैं। दोनो तमाशों में विध्वंस है। दोनो में विस्फोटक है, उत्तेजना व आशंकाएं हैं। बच्चे इस बार भी पिता के कंधों पर चढ़े थे और पिता इस बार भी जोश में चिल्लाए थे- वो देख वो देख । सब खुश थे ।

  एथॉरिटी वाले सबसे ज्यादा। बनवाने में मुंह भरा और अब गिरवाने में भी शाबाशी मिली । सरकार खुश कि उसे कहने का मौका मिला, देखो हम कितने ईमानदार हैं , भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस है हमारी । जज साहब खुश हैं कि देश में अब तक की सबसे बड़ी इमारत गिरवाने पर इतिहास में नाम हो जायेगा उनका । जिस कंपनी ने बीस करोड़ में दोनो टॉवर गिराए उसे तो डबल फायदा हुआ ।

 मुनाफे के साथ साथ आगे और काम मिलने का अवसर मिलेगा । अवैध इमारतों की कोई कमी है क्या देश में ? बिल्डर भी शायद खुश हो कि चलो इसी बहाने बैंकों के पैसे दबा लेगा । बैंक वालों का भी क्या, उनके कौन से बाप का पैसा था । लाखों करोड़ डूब चुके हैं तो दो चार हज़ार करोड़ और सही। 


आपका तो पता नहीं मगर मुझे पक्का विश्वास है कि हमारा मुल्क तमाशबीनों का मुल्क है। यूं भी जीवन बोरियत से भरा होता है हम लोगों का । उत्तेजना के लिए ढूंढते हैं हम तमाशे। नगर निगम गड्ढा खोद रहा हो अथवा कहीं कोई बुलडोजर चल रहा हो, सौ पचास लोग तो यूं ही जुट जाते हैं। ये तो फिर भी बहुत बड़ा इवेंट था। दशकों बाद होता है ऐसा इवेंट ।

 कसम से विध्वंस में जो आनंद हमें मिलता है, वह सृजन में कतई नहीं मिलता। यह ट्विन टॉवर जब बन रहे थे तब हमें दिखे ही नहीं और अब उसकी तस्वीरें खींच खींच कर हम उसके साक्षी होने की गवाही दे रहे हैं। वैसे ही जैसे ऐतिहासिक इमारतों पर अपना नाम कुरेद कर देते हैं। किसी अजूबे से कम नहीं है नैतिकता हमारी। पैसे के पीछे हम सब दौड़ रहे हैं और रूपये कमाने को हर उल्टा सीधा काम करने को तैयार हैं मगर साथ ही साथ हमें पैसे वालों से नफरत भी खूब है। जो जितना फक्कड़ है, उसकी नफ़रत उतनी ही बड़ी है। शायद यही कारण है कि गरीब आदमी को इस विध्वंस में सबसे अधिक आनंद आया । उसके कलेजे को सबसे ज्यादा ठंड पड़ी। 


पता नहीं क्यों मगर मुझे इमारतों से अधिक यह दिमागों का विध्वंस लगता है। बिल्डर को दंडित करने के इससे भी अच्छे तरीके हो सकते थे । बेशक ऐसी अवैध इमारतें खड़ी नहीं होने देने चाहिए मगर जब हो गईं तो उसे जब्त करके उसका बेहतर और सार्वजनिक इस्तेमाल भी हो सकता था । 

क्या ही अच्छा होता कि बारह सौ करोड़ रूपए की इन इमारतों में रैन बसेरे बना दिए जाते । नॉएडा में यूं भी हजारों लोग खुले आसमान के नीचे रोज़ सोते हैं।  इन इमारतों से जन जीवन और राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई खतरा जब नहीं था तब क्या इन्हें गिराने के अतिरिक्त अन्य उपायों पर विचार नहीं किया जाना चाहिए था ? बेशक नॉएडा की यह इमारतें भ्रष्टाचार का प्रतीक थीं और इन्हें गिरा कर हम रावण दहन जैसा आनंद उठा लें मगर मजा तो तब है ना कि जब कोई नया रावण सिर न उठाए ।

अगले साल जब फिर रावण का नया और पुराने से भी बड़ा पुतला फूंकना पड़ा तो फिर इस तमाशे का क्या अर्थ रह गया ?चलिए फूंक दिया तो फूंक दिया रावण का पुतला मगर उन असली रावणों यानि अफसरों और नेताओं का क्या जिन्होंने नौ साल सिर पर खड़े होकर यह रावण खड़ा करवाया और अब इसके दहन पर एक दूसरे को बधाई दे रहे हैं। क्या इसे ही कहेंगे हैप्पी एंड ?

शिक्षक का दर्द

शिक्षक हूँ, पर ये मत सोचो,

बच्चों को  सिखाने  पढ़ाने बैठा हूँ 

मैं   तो अभी डाक   बनाने  बैठा  हूँ ,  

       

     मैं  कहाँ  पढ़ाने  बैठा  हूँ ...


कितने एस.सी. कितने एस. टी. कितने ओ. बी.सी. 

कितने जनरल  दाखिले हुए

कितने आधार बने अब तक 

कितनों  के  खाते  खुले हुए

बस यहाँ कागजों में उलझा 

   निज साख बचाने बैठा हूँ 

               मैं  कहाँ  पढ़ाने  बैठा  हूँ ...


कभी एस.एम.सी कभी पी.टी.ए 

की मीटिंग बुलाया करता हूँ

सौ - सौ भांति के रजिस्टर हैं 

उनको   भी   पूरा  करता हूँ 

सरकारी  अभियानों में  मैं 

            

 ड्यूटियाँ  निभाने बैठा हूँ 

             मैं  कहाँ  पढ़ाने  बैठा  हूँ ...


लोगों की गिनती करने को 

घर - घर में  मैं ही जाता हूँ 

जब जब चुनाव के दिन आते 

मैं  ही  मतदान  कराता  हूँ

कभी जनगणना कभी मतगणना

             

कभी वोट बनाने बैठा हूँ 

              मैं  कहाँ  पढ़ाने  बैठा हूँ ...


रोजाना  न  जाने  कितनी 

यूँ  डाक  बनानी पड़ती है 

बच्चों को पढ़ाने की इच्छा 

मन ही में दबानी पड़ती है 

केवल  शिक्षण  को छोड़ यहाँ

                

हर फर्ज निभाने बैठा हूँ 

                 मैं कहाँ पढ़ाने बैठा हूँ ...


इतने  पर भी  दुनियां वाले 

मेरी   ही  कमी   बताते  हैं

अच्छे परिणाम न आने पर 

मुझको   दोषी   ठहराते हैं 

बहरे  हैं  लोग  यहाँ  

          

  मैं  किसे  सुनाने बैठा  हूँ 

             मैं कहाँ  पढ़ाने  बैठा  हूँ ..

             मैं  नहीं  पढ़ाने  बैठा  हूँ..


          👤👤👥 समस्त सरकारी शिक्षक एवं शिक्षिकाओं को समर्पित👥👤👤

रविवार, 28 अगस्त 2022

रवि अरोड़ा की नजर से

 सूरत हराम /  रवि अरोड़ा 



नजदीकि मित्र की पुत्र वधू को हाल ही में सुंदर सी बेटी प्राप्त हुई है। डिलीवरी के लिए पुत्र वधू को अस्पताल वालों ने 19 अगस्त की सुबह बुलाया था । मगर वहां पहुंच कर मित्र के परिजन हैरान ही हो गए । अस्पताल के जच्चा बच्चा वार्ड में बहुत अधिक भीड़ और गहमागहमी थी। पूछने पर पता चला कि आज जन्माष्टमी है और अधिकांश लोग इस इच्छा से आए हैं कि उनकी गर्भवती महिलाओं का आज ही के दिन बच्चा हो जाए । मित्र के परिवार वाले चूंकि सिख धर्म के अनुयाई हैं, अतः डॉक्टर ने उन्हें समझाया कि आपको तो आज और कल में कोई फर्क नहीं पड़ता सो आपके स्थान पर आज हम किसी अन्य इच्छुक की डिलिवरी करवा रहे हैं। आप लोग कल सुबह आ जाइए।  हैरान परेशान मित्र ने अन्य महिला डॉक्टरों, नर्सिंग होम और अस्पतालों में पता किया तो वहां भी यही रेलमपेल दिखी और अन्य नियत तारीख के बावजूद बहुत से लोग जन्माष्टमी पर ही डिलिवरी करवाना चाहते थे । यह सब देख सुन कर मुझे बहुत अच्छा लगा । जान कर खुशी भी हुई कि हमारे लोग अपने इष्ट से कितना प्रेम करते हैं मगर अगले ही दिन जब ख़बर सुनी कि जन्माष्टमी पर ही वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में मंगला आरती के समय दम घुटने से दो लोगों की मौत हो गई और पचास लोग बेहोश हो गए तो कसम से बड़ी कोफ्त हुई । 


मेरे इर्द गिर्द के लगभग सभी लोग धर्मभीरू हैं। हालांकि कुछ लोग ईश्वर से सच्चा प्रेम भी करते हैं मगर अधिकांश उससे डरते हैं। अपनी तमाम सफलताओं की मुख्य वजह उन्हें यही लगती है कि उनकी भक्ति से ईश्वर खुश है और इसी के चलते वे अपने जीवन में भक्ति के डोज लगातार बढ़ाते चले जाते हैं।

मैं ऐसे भी बहुत लोगों को जानता हूं जो ईश्वर से बाकायदा डील करते हैं। जैसे कि आप मेरा यह काम कराओ बदले में मैं आपके मन्दिर में इतनी बार आऊंगा अथवा यह भेंट चढ़ाऊंगा। ऐसे लोग भी बहुत हैं जो भगवान को अपना पार्टनर ही बना लेते हैं और अपने व्यापार में विधिवत ईश्वर की हिस्सेदारी रखते हैं और तय तारीख पर पूरी ईमानदारी से किश्त अथवा हिस्सा देने अपने इष्ट के मन्दिर भी जाते रहते हैं। नकली दूध, घी और मसाले बनाने वाले और चोरी का माल खरीदने वाले भी पुलिस और अन्य सरकारी विभागों के भय से ईश्वर की पत्ती अपने अवैध व्यापार में रख लेते हैं।

हेराफेरी में माहिर इन लोगों की धार्मिक स्थलों पर भी जबरदस्त सेटिंग होती है और पंडे पुजारी इन्हें वीआईपी दर्शन कराने को ही सच्चे भक्तों को धकियाते हुए अपने ग्राहक को आगे ले जाते हैं। नेताओं और अधिकारियों से भी सौ काम पड़ते हैं सो पंडे पुजारी इन्हें मुफ्त में ये सुविधा उपलब्ध कराते हैं।

मोटी आसामी, नेताओं और अफसरों की नजरों में अपने नम्बर बढ़ाने को इन पंडों पुजारियों में आए दिन जूतम पैजार भी होती रहती है। सामाजिक कारणों से आजकल धर्म कर्म का दिखावा चूंकि बढ़ा है तथा धार्मिक पर्यटन भी खूब परवान चढ़ रहा है सो तीज त्यौहारों पर अधिकांश धार्मिक स्थलों पर भगदड़ मच जाती है और अनेक श्रद्धालुओं को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ता है। धर्म के नाम पर अज्ञानता की इससे बड़ी प्रकाष्ठा क्या होगी कि अपने किसी संबंधी की इस तरह हुई मौत को भी लोगबाग धर्म का हिस्सा मान बैठते हैं और कहते नहीं थकते कि साक्षात ईश्वर की मौजूदगी में उनकी मृत्यु हुई है सो वे सीधा स्वर्ग में ही जाएंगे।

अब जब मरने वालों को ही कोई गम नहीं तो भला सरकार भी क्यों बीच में कूदे, अतः तमाम धार्मिक स्थलों पर अव्यवस्था का यही बोलबाला है। इस पूरे खेल में किसी ताकतवर का कुछ नहीं बिगड़ता मगर हलकान वह होता है जो सच्ची श्रद्धा से धार्मिक स्थलों को जाता है और अपने कपड़े लत्ते फड़वा कर ही घर लौटता है। बुरा ना मानें तो कहूं, कई बार तो अपने धार्मिक स्थलों पर फारसी का शब्द सूरत हराम सटीक ही लगता है जिसमें ऊपर से तो सब कुछ भला चंगा है मगर अंदर सब कुछ पोला ही पोला है।

कुछ....मन की बात / वीरेंद्र सेंगर

 प्रिय विनोद!

तुम्हारी उदारता गजब की है ।तुम दोस्ती में में आंख ही बंद कर लेते हो।हर किसी बढ़िया रहे भूत को गले लगा लेते हो।न कोई गिला न कोई शिकवा।कौन न मर जाए तुम्हारे इस शंकर पन पर!भूत-पिशाच सब सिर पर मृदंग करते रहें,उनसे वही अपनापा। चाहे वो दिखावे का ही व्यवहारिक अपनापा हो।कहां से लाते हो इतना  सदा नीरा शहद?सब में मिठास ढूंढ़ लेते हो?     

                     

 तुमने बहुत मेहनत और दक्षता से आंदोलनजीवी किताब लिखी है।तुम्हें बार-बधाई/शुभकामनाएं दे चुका हूं।देता रहूंगा।लेकिन इतनी भी क्या आफत आ गई कि हर पापी-पाखंडी को किताब भेंटकर लोट-पोट नजर आते हो?      तुम्हारी किताब का भव्य विमोचन उत्सव हो चुका है।इसके पहले तुमने क ई   भगवा पुरूषों को किताब भेंट की थी।इन तस्वीरों को खुशी-खुशी अपनी सोशल मीडिया की वाल पर स्थापित भी कर चुके हो।इस पर हम दोनों के साझा अग्रज पत्रकार आनंद स्वरूप वर्माजी जी ने सख्त एतराज सोशल मीडिया में उठाया था।चलिए, आदरणीय वर्मा जी, तो खांटी 24कैरेट वाले धुर वामपंथी विचार धारा के हैं।उन्होंने अपना पूरा जीवन  प्रचंड ईमानदारी और कट्टर सिद्धांत वादिता से जिया है।वे क्षुब्ध रहे थे।                   

कल तुमने एक पोस्ट में अपनी किताब राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश से भेंट की चंस्पा की।हरिवंश की तारीफ में कुछ कसीदा भी चेंपा।ये मुझे भी अखरा।बहुत अखरा !                    

माना कि हरिवंश जी तुम्हारे पुराने मित्र हैं।सच तो ये है कि वे हम सभी जन पक्षधर पत्रकारों के चहेते रहे हैं।मेरे भी आदरणीय रहे हैं।कुछ महीने उनके अखबार के लिए दिल्ली से रिपोर्टिंग भी कर चुका हूं।वे इंसान के रूप में भी बहुत उम्दा रहे हैं।लेकिन उप सभापति के रूप में वे अपना भ्रष्टतम रूप भी दिखा चुके हैं।राजनीतिक आकाआओं को खुश करने के लिए महाशय ने जबरन बहु चर्चित किसानों से जुड़ा विधेयक पास घोषित किया था।ये सर्वथा गलत था।संसद की गरिमा के साथ बलात्कार था।मैंने उसी दौर में बड़ी पीड़ा के साथ जमकर आलोचना की थी।उनको बुरा भी लगा।लेकिन मुझे कोई अफसोस नहीं है।अब तुम इसी घोर अवसरवादी को सार्वजनिक तौर पर गदगद होकर गले लगाते फोटो चिपका रहे हो,तो विनोद !बहुत पीड़ा हुई।तुम मेरे करीबी बेहतरीन मित्र हो।मुझसे ज्यादा उम्दा जन पक्षधरता वाले रहे हो,लेकिन इस उम्र में अचानक शंकर भोले बनने की क्या सूझी?जब कि जानते हो,हम-तुम शंकर नहीं बन सकते।सामाजिक भूत-प्रेतों को गले लगाकर उनकी मुक्ति नहीं करा सकते, तो फिर अपनी संजोई हुई जन पक्षधर छवि को क्यों  तार-होने दिया जाए?बोलो!विनोद!

शुक्रवार, 26 अगस्त 2022

रवि अरोड़ा की नजर से.......

 बिलकिस बानो हाज़िर हो / रवि अरोड़ा



सईद अख्तर मिर्जा समानांतर सिनेमा का चर्चित नाम हैं। उनके निर्देशन में बनी सलीम लंगड़े पे मत रो, अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है और नसीम जैसी फिल्मों को कई महत्वपूर्ण पुरस्कार मिल चुके हैं । हाल ही में चर्चित संस्था सहमत के एक कार्यक्रम में उनसे पुनः मुलाकात हुई। दरअसल सहमत द्वारा स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव के उपलक्ष्य में हिन्दी की अधिकांश कलात्मक फिल्मों का प्रदर्शन दिल्ली में किया गया था । दो हफ्ते तक चले इन महोत्सव की विशेषता यह थी कि फिल्मों के निर्देशकों और पारखी दर्शकों के बीच सार्थक संवाद का भी एक सत्र रखा गया था । शायद आयोजकों की मंशा विगत 75 सालों में अपने लोकतन्त्र की सतत यात्रा पर एक नज़र डालना ही रहा होगा । सईद अख्तर मिर्जा की फिल्मों के प्रदर्शन में आखरी दिन उनकी फिल्म मोहन जोशी हाज़िर हो दिखाई गई । नसीरुद्दीन शाह, अमजद खान, दीप्ति नवल और प्रसिद्ध लेखक भीष्म साहनी समेत अनेक मंझे हुए कलाकारों द्वारा अभिनीत इस फिल्म में बड़ी खूबसूरती से यह दिखाया गया है कि अदालतों में मुकदमें किस तरह सालों तक लटकाए जाते हैं और वकीलों के अदालती दांवपेच के चलते वादकारियों की कैसे फजीयत होती है। इस कार्यक्रम का जिक्र करने का मंतव्य आपको यह बताना भर है कि फिल्म समाप्त होने पर सईद अख्तर मिर्ज़ा जब दर्शकों से संवाद करने मंच पर आए तो अधिकांश दर्शकों ने फिल्म के बाबत कम और देश की अदालतों की उठापटक पर अधिक चर्चा की। अघोषित रूप से यह आयोजन इस नतीजे पर पहुंचता दिखा कि आज के अदालती हालात उस साल 1984 से भी गए बीते हैं, जब यह फिल्म देश भर में प्रदर्शित हुई थी । 


साल 1984 का जिक्र हो रहा है तो यह भला कैसे याद नहीं आयेगा कि उस साल हुई सिख विरोधी हिंसा के मामले आज तक अदालतों में लटके पड़े हैं। राम मन्दिर का मामला 134 साल तक अदालतों में इधर से उधर घूमा। प्रधान मंत्री और पूर्व प्रधान मंत्री की हत्याओं के मामले भी हमारी अदालतों में खूब भटके हैं। दंगों के मामले तो जैसे अनिर्णय के लिए ही अदालत में भेजे जाते हैं। बदनुमा सूरते हाल को खुद सरकार ने संसद में स्वीकार किया और बताया कि इस समय देश की अदालतों में 4 करोड़ 70 लाख मामले लंबित हैं। चलिए अदालतों के बाबत ज्यादा न कहें और अवमानना का खौफ करें मगर अब ये नया खेल क्या शुरू हो गया है ?  वोटों की अपनी फसल काटने को सरकारें अदालती फैसलों को अपनी जरूरत के हिसाब से परिभाषित कर न्याय व्यवस्था का उपहास क्यों उड़ा रही हैं ? जी हां मैं बिलकिस बानो केस की ही बात कर रहा हूं। छह साल तक अदालतों के चक्कर काट काट कर जिन खूंखार अपराधियों को उसने सजा करवाई, वे कानूनी पेचीदगियों का फायदा उठा कर फिर बाहर हैं। सुप्रीम कोर्ट इस मामले में फिर सुनवाई कर रहा है  यानी बिलकिस के लिए अदालतों की परिक्रमा इस जन्म में खत्म नहीं होगी । सात हत्याओं और गैंग रेप के दोषियों को गुजरात सरकार ने जिस बेशर्मी से स्वतन्त्रता दिवस पर रिहा किया है, बेशक उसकी निंदा अधिकांश सेवानिवृत जज भी कर रहे हैं मगर अदालती दांव पेंच का तो इस मुल्क में कोई तोड़ ही नहीं है ना। चलिए इंतज़ार कीजिए , सईद अख़्तर मिर्ज़ा की फिल्म मोहन जोशी हाज़िर हो कि तर्ज़ पर एक बार फिर अदालत में पुकार होनी है- बिलकिस बानो हाज़िर हो ।

जगत विजेता सिकंदर को हराने वाली वीरांगना राजकुमारी कार्विका के बारे में

 जो जीता वो सिकंदर के बारे में नहीं जिसने सिकंदर पर विजय प्राप्त की थी वो कठगणराज्य की अद्भुत वीरांगना राजकुमारी कार्विका के बारे में रोचक दास्तां ।


राजकुमारी कार्विका सिंधु नदी के उत्तर में कठगणराज्य की राजकुमारी थी । राजकुमारी कार्विका बहुत ही कुशल योद्धा थी। रणनीति और दुश्मनों के युद्ध चक्रव्यूह को तोड़ने में पारंगत थी। राजकुमारी कार्विका ने अपने बचपन की सहेलियों के साथ फ़ौज बनाई थी। इनका बचपन के खेल में भी शत्रुओं से देश को मुक्त करवाना और फिर शत्रुओं को दण्ड प्रदान करना यही सब होते थे। राजकुमारी में वीरता और देशभक्ति बचपन से ही थी। जिस उम्र में लड़कियाँ गुड्डे गुड्डी का शादी रचना इत्यादि खेल खेलते थे उस उम्र में कार्विका राजकुमारी को शत्रु सेना का दमन कर के देश को मुक्त करवाना शिकार करना इत्यादि ऐसे खेल खेलना पसंद थे। राजकुमारी धनुर्विद्या के सारे कलाओं में निपुर्ण थी , तलवारबाजी जब करने उतरती थी दोनों हाथो में तलवार लिये लड़ती थी और एक तलवार कमर पे लटकी हुई रहती थी। अपने गुरु से जीत कर राजकुमारी कार्विका ने सबसे सुरवीर शिष्यों में अपना नामदर्ज करवा लिया था। दोनों हाथो में तलवार लिए जब अभ्यास करने उतरती थी साक्षात् माँ काली का स्वरुप लगती थी। भाला फेकने में अचूक निशानची थी , राजकुमारी कार्विका गुरुकुल शिक्षा पूर्ण कर के एक निर्भीक और शूरवीरों के शूरवीर बन कर लौटी अपने राज्य में।


कुछ साल बीतने के साथ साथ यह ख़बर मिला राजदरबार से सिकंदर लूटपाट करते हुए कठगणराज्य की और बढ़ रहा हैं भयंकर तबाही मचाते हुए सिकंदर की सेना नारियों के साथ दुष्कर्म करते हुए हर राज्य को लूटते हुए आगे बढ़ रही थी, इसी खबर के साथ वह अपनी महिला सेना जिसका नाम राजकुमारी कार्विका ने चंडी सेना रखी थी जो कि 8000 से 8500 नारियों की सेना थी। कठगणराज्य की यह इतिहास की पहली सेना रही जिसमे महज 8000 से 8500 विदुषी नारियाँ थी। कठगणराज्य जो की एक छोटी सा राज्य था। इसलिए अत्यधिक सैन्यबल की इस राज्य को कभी आवश्यकता ही नहीं पड़ी थी।


325 (इ.पूर्व) में सिकन्दर  के अचानक आक्रमण से राज्य को थोडा बहुत नुकसान हुआ पर राजकुमारी कार्विका पहली योद्धा थी जिन्होंने सिकंदर से युद्ध किया था। सिकन्दर की सेना लगभग 1,50,000 थी और कठगणराज्य की राजकुमारी कार्विका के साथ आठ हज़ार वीरांगनाओं की सेना थी यह एक ऐतिहासिक लड़ाई थी जिसमे कोई पुरुष नहीं था सेना में सिर्फ विदुषी वीरांगनाएँ थी। राजकुमारी और उनकी सेना अदम्य वीरता का परिचय देते हुए सिकंदर की सेना पर टूट पड़ी, युद्धनीति बनाने में जो कुशल होता हैं युद्ध में जीत उसी की होती हैं रण कौशल का परिचय देते हुए राजकुमारी ने सिकंदर से युद्ध की थी।


सिकंदर ने पहले सोचा "सिर्फ नारी की फ़ौज है मुट्ठीभर सैनिक काफी होंगे” पहले 25,000 की सेना का दस्ता भेजा गया उनमे से एक भी ज़िन्दा वापस नहीं आ पाया , और राजकुमारी कार्विका की सेना को मानो स्वयं माँ भवानी का वरदान प्राप्त हुआ हो बिना रुके देखते ही देखते सिकंदर की 25,000 सेना दस्ता को गाजर मूली की तरह काटती चली गयी। राजकुमारी की सेना में 50 से भी कम वीरांगनाएँ घायल हुई थी पर मृत्यु किसी को छु भी नहीं पायी थी। सिकंदर की सेना में शायद ही कोई ज़िन्दा वापस लौट पाया थे।


दूसरी युद्धनीति के अनुसार अब सिकंदर ने 40,000 का दूसरा दस्ता भेजा उत्तर पूरब पश्चिम तीनों और से घेराबन्दी बना दिया परंतु राजकुमारी सिकंदर जैसा कायर नहीं थी खुद सैन्यसंचालन कर रही थी उनके निर्देशानुसार सेना तीन भागो में बंट कर लड़ाई किया राजकुमारी के हाथों बुरी तरह से पस्त हो गयी सिकंदर की सेना।


तीसरी और अंतिम 85,000 दस्ताँ का मोर्चा लिए खुद सिकंदर आया सिकंदर के सेना में मार काट मचा दिया नंगी तलवार लिये राजकुमारी कार्विका ने अपनी सेना के साथ सिकंदर को अपनी सेना लेकर सिंध के पार भागने पर मजबूर कर दिया इतनी भयंकर तवाही से पूरी तरह से डर कर सैन्य के साथ पीछे हटने पर सिकंदर मजबूर होगया। इस महाप्रलयंकारी अंतिम युद्ध में कठगणराज्य के 8500 में से 2750 साहसी वीरांगनाओं ने भारत माता को अपना रक्ताभिषेक चढ़ा कर वीरगति को प्राप्त कर लिया जिसमे से नाम कुछ ही मिलते हैं। इतिहास के दस्ताबेजों में गरिण्या, मृदुला, सौरायमिनि, जया यह कुछ नाम मिलते हैं। इस युद्ध में जिन्होंने प्राणों की बलिदानी देकर सिकंदर को सिंध के पार खदेड़ दिया था।  सिकंदर की 1,50,000 की सेना में से 25,000 के लगभग सेना शेष बची थी , हार मान कर प्राणों की भीख मांग लिया और कठगणराज्य में दोबारा आक्रमण नहीं करने का लिखित संधि पत्र दिया राजकुमारी कार्विका को ।


संदर्भ :-

१) कुछ दस्ताबेज से लिया गया हैं पुराणी लेख नामक दस्ताबेज

२) राय चौधरी- 'पोलिटिकल हिस्ट्री आव एशेंट इंडिया'- पृ. 220)

३) ग्रीस के दस्ताबेज मसेडोनिया का इतिहास ,

Hellenistic Babylon नामक दस्ताबेज में इस युद्ध की जिक्र किया गया हैं।


राजकुमारी कार्विका की समूल इतिहास को नष्ठ कर दिया गया था। इस वीरांगना के  इतिहास को बहुत ढूंढने पर केवल दो ही जगह पर दो ही पन्नों में ही खत्म कर दिया गया था। यह पहली योद्धा थी जिन्होंने सिकंदर को परास्त किया था 325(ई.पूर्व) में। समय के साथ साथ इन इतिहासों को नष्ट कर दिया गया था और भारत का इतिहास वामपंथी और इक्कसवीं सदी के नवीनतम इतिहासकार जैसे रोमिला थाप्पर और भी बहुत सारे इतिहासकार ने भारतीय वीरांगनाओं के नाम कोई दस्तावेज़ नहीं लिखा था।


यह भी कह सकते हैं भारतीय नारियों को राजनीति से दूर करने के लिए सनातन धर्म में नारियों को हमेशा घूँघट धारी और अबला दिखाया हैं। इतिहासकारों ने भारत को ऋषिमुनि का एवं सनातन धर्म को पुरुषप्रधान एवं नारी विरोधी संकुचित विचारधारा वाला धर्म साबित करने के लिये इन इतिहासो को मिटा दिया था। कुछ कतिपय इतिहासकारो का बस चलता तो रानी लक्ष्मीबाई का भी इतिहास गायब करवा देते पर ऐसा नहीं कर पाये क्यों की 1857 की ऐतिहासिक लड़ाई को हर कोई जानता हैं ।


लव जिहाद तब रुकेगा जब इतिहासकार ग़ुलामी और धर्मनिरपेक्षता का चादर फ़ेंक कर असली इतिहास रखेंगे। राजकुमारी कार्विका जैसी वीरांगनाओं ने सिर्फ सनातन धर्म में ही जन्म लिए हैं। ऐसी वीरांगनाओं का जन्म केवल सनातन धर्म में ही संभव हैं। जिस सदी में इन वीरांगनाओं ने  देश पर राज करना शुरू किया था उस समय शायद ही किसी दूसरे मजहब या रिलिजन में नारियों को इतनी स्वतंत्रता होगी । सनातन धर्म का सर है नारी और धड़ पुरुष हैं। जिस प्रकार  सर के बिना धड़  बेकार हैं उसी प्रकार सनातन धर्म नारी के बिना अपूर्ण है।

जितना भी हो पाया इस वीरांगना का खोया हुआ इतिहास आप सबके सामने प्रस्तुत है।

संभोग से समाधि की ओर- / ओशो

 

संभोग से संभोग की  मुक्ति का सूत्र



एक बात, पहली बात स्‍पष्‍ट कर लेनी जरूरी है वह  हैं कि यह भ्रम छोड़ देना चाहिए कि हम पैदा हो गये है, इसलिए हमें पता है—क्‍या है काम, क्‍या है संभोग। नहीं पता नहीं है। और नहीं पता होने के कारण जीवन पूरे समय काम और सेक्‍स में उलझा रहता है और व्‍यतीत होता है।

      मैंने आपसे कहा, पशुओं का बंधा हुआ समय है। उनकी ऋतु है। उनके मौसम है। आदमी का कोई बंधा हुआ समय नहीं है। क्‍यों? पशु शायद मनुष्‍य से ज्‍यादा संभोग की गहराई में उतरने में समर्थ है और मनुष्‍य उतना भी समर्थ नहीं रह गया है।

      जिन लोगों ने जीवन के इन तलों पर बहुत खोज की है और गहराइयों में गये है और  जिन लोगों ने जीवन के बहुत से अनुभव संग्रहीत किये है। उनको यह जानना, यह सुत्र उपलब्‍ध हुआ है कि अगर संभोग एक मिनट तक रुकेगा तो आदमी दूसरे दिन फिर संभोग के लिए लालायित हो जायेगा। अगर तीन मिनट तक रूक सके तो यह सप्‍ताह तक उसे सेक्‍स की वह याद भी नहीं आयेगी। और अगर साम मिनट तक रूक सके तो तीन महीने के लिए सेक्‍स से इस तरह मुक्‍त हो जायेगा कि उसकी कल्‍पना में भी विचार प्रविष्‍ट नहीं होगा। और अगर तीन घंटे तक रूक सके तो जीवन भर के लिए मुक्‍त हो जायेगा। जीवन में उसको कल्‍पना भी नहीं उठेगी।

      लेकिन सामान्‍यत: क्षण भर का अनुभव है मनुष्‍य का। तीन घंटे की कल्‍पना करनी भी मुश्‍किल है। लेकिन मैं आपसे कहता हूं के तीन घंटे अगर संभोग की स्‍थिति में, उस समाधि की दशा में व्‍यक्‍ति रूक जाये तो एक संभोग पूरे जीवन के लिए सेक्‍स से मुक्‍त करने के लिए पर्याप्‍त है। इतनी तृप्‍ति पीछे छोड़ जाता है—इतनी अनुभव,इतनी बोध छोड़ जाता है कि जीवन भर के लिए पर्याप्‍त हो जाता है। एक संभोग के बाद व्‍यक्‍ति ब्रह्मचर्य को अपलब्‍ध हो सकता है।

      लेकिन हम तो जीवन भी संभोग के बाद भी उपलब्‍ध नहीं होते। क्‍या है? बूढ़ा हो जाता है आदमी मरने के करीब पहुंच जाता है और संभोग की कामना से मुक्‍त नहीं होता। संभोग की कला और संभोग के शास्‍त्र को उसने समझा नहीं है। और न कभी किसी ने समझाया है,न विचार किया है। न सोचा है, न बात की है। कोई संवाद भी नहीं हुआ जीवन में—कि अनुभवी लोग उस पर संवाद करते और विचार करते हम बिलकुल पशुओं से भी बदतर हालत पर है। उस स्‍थिति में है। आप कहेंगे कि एक क्षण से तीन घंटे तक संभोग की दशा ठहर सकती है, लेकिन कैसे?

      कुछ थोड़े से सूत्र आपको कहता हूं। उन्‍हें थोड़ा ख्‍याल में रखेंगे तो ब्रह्मचर्य की तरफ जाने में बड़ी यात्रा सरल हो जायेगी। संभोग करते क्षणों में क्षणों श्वास जितनी तेज होगी। संभोग का काल उतना ही छोटा होगा। श्वास जितनी शांत और शिथिल होगी। संभोग का काल उतना ही लंबा हो जायेगा। अगर श्वास को बिलकुल शिथिल करने का थोड़ा अभ्‍यास किया जाये, तो संभोग के क्षणों को कितना ही लंबा किया जा सकता है। और संभोग के क्षण जितने लंबे होंगे, उतने ही संभोग के भीतर से समाधि का जो सूत्र मैंने आपसे कहा है—निरहंकार भाव, इगोलेसनेस और टाइमलेसनेस का अनुभव शुरू हो जायेगा। श्वास अत्‍यंत शिथिल होनी चाहिए। श्वास के शिथिल होते ही संभोग की गहराई अर्थ और उदघाटन शुरू हो जायेंगे।

      और दुसरी बात, संभोग के क्षण में ध्‍यान दोनों आंखों के बीच, जहां योग आज्ञा चक्र को बताता है। वहां अगर ध्‍यान हो तो संभोग की सीमा और समय तीन घंटे तक बढ़ाया जा सकता है। और एक संभोग व्‍यक्‍ति को सदा के लिए ब्रह्मचर्य में प्रतिष्‍ठित कर देगा—न केवल एक जन्‍म के लिए, बल्‍कि अगले जन्‍म के लिए भी।

      किन्‍हीं एक बहन ने पत्र लिखा है और मुझे पूछा है कि विनोबा तो बाल ब्रह्मचारी है, क्‍या उन्‍हें समाधि का अनुभव नहीं हुआ होगा। मेरे बाबत पूछा है कि मैंने तो विवाह नहीं किया, मैं तो बाल ब्रह्मचारी हूं मुझे समाधि का अनुभव नहीं हुआ होगा।

      उस बहन को अगर वह यहां मौजूद हों तो मैं कहना चाहता हूं। विनोबा को या मुझे या किसी को भी बिना अनुभव के ब्रह्मचर्य उपलब्‍ध नहीं होता। वह अनुभव चाहे इस जन्‍म का हो, चाहे पिछले जन्‍म का हो—जो इस जन्‍म में ब्रह्मचर्य को उपलब्‍ध होता है, वह पिछले जन्‍मों के गहरे संभोग के अनुभव के आधार पर और किसी आधार पर नहीं। कोई और रास्‍ता नहीं है।

      लेकिन अगर पिछले जन्‍म में किसी को गहरे संभोग की अनुभूति हुई हो तो इस जन्‍म के साथ ही वह सेक्‍स से मुक्‍त पैदा होगा। उसकी कल्‍पना के मार्ग पर सेक्‍स कभी भी खड़ा नहीं होगा और उसे हैरानी दूसरे लोगों को देखकर कि यह क्‍या बात है। लोग क्‍यों पागल हैं,क्‍यों दीवाने है?  उसे कठिनाई होगी यह जांच करने में कि कौन स्‍त्री है, कौन पुरूष है?इसका भी हिसाब रखने में और फासला रखने में कठिनाई होगी।

      लेकिन कोई अगर सोचता हो कि बिना गहरे अनुभव के कोई बाल ब्रह्मचारी हो सकता है। तो बाल ब्रह्मचारी नहीं होगा, सिर्फ पागल हो जायेगा। जो लोग जबरदस्‍ती ब्रह्मचर्य थोपने की कोशिश करते है, वह विक्षिप्‍त होते है और कहीं भी नहीं पहुंचते।

      ब्रह्मचर्य थोपा नहीं जाता। वह अनुभव की निष्‍पति है। वह किसी गहरे अनुभव का फल है। और वह अनुभव संभोग का ही अनुभव है। अगर वह अनुभव एक बार भी हो जाए तो अनंत जीवन की यात्रा के लिए सेक्‍स से मुक्‍ति हो जाती है।

      तो दो बातें मैंने कहीं, उस गहराई के लिए—श्वास शिथिल हो इतनी शिथिल हो कि जैसे चलती ही नहीं और ध्‍यान, सारी अटैंशन आज्ञा चक्र के पास हो। दोनों आंखों के बीच के बिन्‍दु पर हो। जितना ध्‍यान मस्‍तिष्‍क के पास होगा, उतनी ही संभोग की गहराई अपने आप बढ़ जायेगी। और जितनी श्राव शिथिल होगी, उतनी लम्‍बाई बढ़ जायेगी। और आपको पहली दफा अनुभव होगा कि संभोग का आकर्षण नहीं है मनुष्‍य के मन में। मनुष्‍य के मन में समाधि का आकर्षण है। और एक बार उसकी झलक मिल जाए, एक बार बिजली चमक जाये और हमें दिखाई पड़ जाये अंधेरे में कि रास्‍ता क्‍या है फिर हम रास्‍ते पर आगे निकल सकते है।

      एक आदमी एक गंदे घर में बैठा है। दीवालें अंधेरी है ओर धुएँ से पूती हुई है। घर बदबू से भरा हुआ है। लेकिन खिड़की खोल सकता है। उस गंदे घर की खिड़की में खड़े होकर वह देख सकता है दूर आकाश को तारों को सूरज को, उड़ते हुए पक्षियों को। और तब उसे उस घर के बहार निकलने में कठिनाई नहीं रह जायेगी।

      जिस दिन आदमी को संभोग के भीतर समाधि का पहली थोड़ी सह भी अनुभूति होती है उसी दिन सेक्‍स का गंदा मकान सेक्‍स की दीवालें अंधेरे से भरी हुई व्‍यर्थ हो जाती है आदमी बाहर निकल जाता है।

      लेकिन यह जानना जरूरी है कि साधारणतया हम उस मकान के भीतर पैदा होते है। जिसकी दीवालें बंद है। जो अंधेरे से पूती है। जहां बदबू है जहां दुर्गंध है और इस मकान के भीतर ही पहली दफ़ा मकान के बाहर का अनुभव करना जरूरी है, तभी हम बहार जा सकते है। और इस मकान को छोड़ सकते है। जिस आदमी ने खिड़की नहीं खोली उस मकान की और उसी मकान के कोने में आँख बंद करके बैठ गया है कि मैं इस गंदे मकान को नहीं देखूँगा, वह चाहे देखे और चाहे न देखे। वह गंदे मकान के भीतर ही है और भीतर ही रहेगा।

      जिसको हम ब्रह्मचारी कहते है। तथाकथित जबर दस्‍ती थोपे हुए ब्रह्मचारी, वे सेक्‍स के मकान के भीतर उतने ही है जितना की कोई भी साधारण आदमी है। आँख बंद किये बैठे है,आप आँख खोले हुए बैठे है, इतना ही फर्क है। जो आप आँख खोलकर कर रहे है, वह आँख बंद कर के भीतर कर रहे है। जो आप शरीर से कर रहे है। वे मन से कर रहे है। और कोई फर्क नहीं है।

      इसलिए मैं कहता हूं कि संभोग के प्रति दुर्भाव छोड़ दे। समझने की चेष्‍टा,प्रयोग करने की चेष्‍टा करें और संभोग को एक पवित्रता की स्‍थिति दे।

      मैंने दो सूत्र कहे। तीसरी एक भाव दशा चाहिए संभोग के पास जाते समय। वैसा भाव-दशा जैसे कोई मंदिर के पास जा रहा है। क्‍योंकि संभोग के क्षण में हम परमात्‍मा के निकटतम होते है। इसीलिए तो संभोग में परमात्‍मा सृजन का काम करता है। और नये जीवन को जन्‍म देता है। हम क्रिएटर के निकटतम होते है।

      संभोग की अनुभूति में हम सृष्‍टा के निकटतम होते है।

      इसीलिए तो हम मार्ग बन जाते है। और एक नया जीवन हमसे उतरता है। और गतिमान हो जाता है। हम जन्‍मदाता बन जाते है।

      क्‍यों?

      सृष्‍टा के निकटतम है वह स्‍थिति। अगर हम पवित्रता से प्रार्थना से सेक्‍स के पास जायें तो हम परमात्‍मा की झलक को अनुभव कर सकते है। लेकिन हम तो सेक्‍स के पास घृणा एक दुर्भाव एक कंडेमनेशन के साथ जाते है। इसलिए दीवाल खड़ी हो जाती है। और परमात्‍मा का यहां कोई अनुभव नहीं हो पाता है।  

      सेक्‍स के पास ऐसे जाऐं, जैसे की मंदिर के पास जा रहे है। पत्‍नी को ऐसा समझें, जैसे की वह प्रभु है। पति को ऐसा समझें कि जैसे कि वह परमात्‍मा है। और गंदगी में क्रोध में कठोरता में द्वेष में, ईर्ष्‍या में, जलन में चिन्‍ता के क्षणों में कभी भी सेक्‍स के पास न जायें। होता उलटा है। जितना आदमी चिन्‍तित होता है। जितना परेशान होता है। जितना क्रोध से भरा होता है। जितना घबराया होता है, जितना एंग्‍विश में होता है। उतना ही ज्‍यादा वह सेक्‍स के पास जाता है।

      आनंदित आदमी सेक्‍स के पास नहीं जाता। देखी आदमी सेक्‍स की तरफ जाता है। क्‍योंकि दुख को भुलाने के लिए इसको एक मौका दिखाई पड़ता है।

      लेकिन स्मरण रखें कि जब आप दुःख में जायेंगे, चिंता में जायेंगे, उदास हारे हुए जायेगे, क्रोध में लड़े हुए जायेंगे। तब आप कभी भी सेक्‍स की उस गहरी अनुभूति को उपलब्‍ध नहीं कर पायेंगे। जिसका की प्राणों में प्यास  है। वह समाधि की झलक वहां नहीं मिलेगी। लेकिन यहां उलटा होता है।

      मेरी प्रार्थना है जब आनंद में हों, जब प्रेम में हों, जब प्रफुल्‍लित हों और जब प्राण ‘प्रेयर फुल’ हों। जब ऐसा मालुम पड़े कि आज ह्रदय शांति से और आनंद से कृतज्ञता से भरा हुआ है, तभी क्षण है—तभी क्षण है संभोग के निकट जाने का। और वैसा व्‍यक्‍ति संभोग से समाधि को उपलब्‍ध होता है। और एक बार भी समाधि की एक किरण मिल जाये। तो संभोग से सदा के लिए मुक्‍त हो जाता है। और समाधि में गतिमान हो जाता है।

      स्‍त्री और पुरूष का मिलन एक बहुत गहरा अर्थ रखता है। स्‍त्री और पुरूष के मिलन में पहली बार अहंकार टूटता है और हम किसी से मिलते है।

      मां के पेट से बच्‍चा निकलता है और दिन रात उसके प्राणों में एक ही बात लगी रहती है जैसे की हमने किसी वृक्ष को उखाड़ लिया जमीन से। उस पूरे वृक्ष के प्राण तड़पते है कि जमीन से कैसे जुड़ जाये। क्‍योंकि जमीन से जुड़ा हुआ होकर ही उसे प्राण मिलता था। रस मिलता था जीवन  मिलता था। व्‍हाइटालिटी मिलती थी। जमीन से उखड गया तो उसकी सारी जड़ें चिल्लाये गी कि मुझे जमीन में वापस भेज दो। उसका सारा प्राण चिल्लाये गा कि मुझे जमीन में वापस भेज दो। वह उखड  गया टूट गया। अपरूटेड हो गया।

      आदमी जैसे ही मां के पेट से बाहर निकलता है, अपरूटेड हो जाता है। वह सारे जीवन और जगत से एक अर्थ में टूट गया। अलग हो गया। अब उसकी सारी पुकार और सारे प्राण की आकांशा जगत और जीवन और अस्‍तित्‍व से, एग्ज़िसटैंस से वापस जुड़ जाने की है। उसी पुकार का नाम प्रेम और प्‍यास है।

      प्रेम का और अर्थ क्‍या है? हर आदमी चाह रहा है कि मैं प्रेम पाऊँ और प्रेम करूं। प्रेम का मतलब क्‍या है?

      प्रेम का मतलब है कि मैं टुट गया हूं, आइसोलेट हो गया हूं। अलग हो गया हूं। मैं वापस जुड़ जाऊँ जीवन से। लेकिन इस जुड़ने का गहरे से गहरा अनुभव मनुष्‍य को सेक्‍स के अनुभव में होता है। स्‍त्री और पुरूष को होता है। वह पहला अनुभव है जुड़ जाने का। और जो व्‍यक्‍ति इस जुड़ जाने के अनुभव को—प्रेम की प्‍यास, जुड़ने की आकांशा के अर्थ में समझेगा,वह आदमी एक दूसरे अनुभव को भी शीध्र उपलब्‍ध हो सकता है।

      योगी जुड़ता है, साधु भी जुड़ता है। संत भी जुड़ता है, समाधिस्‍थ व्‍यक्‍ति भी जुड़ता है। संभोगी भी जुड़ता है।

      संभोग करने में दो व्‍यक्‍ति जुड़ते है। एक व्‍यक्‍ति दूसरे से जुड़ता है और एक हो जाता है।

      समाधि में एक व्‍यक्‍ति समष्‍टि से जुड़ता है और एक हो जाता है।

      संभोग दो व्‍यक्‍तियों के बीच मिलन है।

      समाधि एक व्‍यक्‍ति और अनंत के बीच मिलन है।

      स्‍वभावत: दो व्‍यक्‍ति का मिलन क्षण भर को हो सकता है। एक व्‍यक्‍ति और अनंत का मिलन अनंत के लिए हो सकता है। दोनों व्‍यक्‍ति सीमित है। उनका मिलन असीम नहीं हो सकता। यही पीड़ा है, यहीं कष्‍ट है, सारे दांपत्‍य का, सारे प्रेम का कि जिससे हम जुड़ना चाहते है। उससे भी सदा के लिए नहीं जुड़ पाते। क्षण भर को जुड़ते है और फिर फासले हो जात है। फासले पीड़ा देते है। फासले कष्ट देते है। और निरंतर दो प्रेमी इसी पीड़ा में परेशान रहते है। कि फासला क्‍यों है। और हर चीज फिर धीरे-धीरे ऐसी मालूम पड़ने लगती है कि दूसरा फासला बना रहा है। इसीलिए दूसरे पर क्रोध पैदा होना शुरू हो जाता है।

संभोग से समाधि की ओर -ओशो👏

आज़ाद कौन? गुलाम या कांग्रेस ?? / रमेश शर्मा

 कांग्रेस से आजाद होते गुलाम  /  रमेश शर्मा


अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी का जो सम्मुख हश्र है, जो सूरतेहाल बेहाल है वह यकीनन बीजेपी और उसके समर्थकों के लिए तो बांछें खिला देने वाला है। जो 50 साल से गुलाम थे वह भी पार्टी को नमस्ते करके किनारा कर लिए हैं। कांग्रेस की स्थिति उस हिचकोले खाते समुद्री जहाज की तरह हो गई है जिसका कभी त्रिपाल उड़ जाता है कभी डूबती उतराती उसकी नैया के मजबूत स्तंभ उखड़ जाते हैं। सवाल सिर्फ एक है कॉन्ग्रेस क्या कभी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के अपने पैटर्न से बाहर आ पाएगी? जवाब है बिल्कुल नहीं कभी नहीं, इस युग में तो शायद नहीं ही नहीं... थोड़ा पीछे जाएं तो उस गांधी परिवार में और इस गांधी परिवार में बुनियादी फर्क यही है कि नेहरू जी इंदिरा गांधी के नाम पर पूरे देश में एकजुट थोक के भाव में वोट पड़ते थे। यह सिलसिला राजीव गांधी के समय तक भी रहा मगर उसके बाद कांग्रेस लगातार अपनी भूमिका से इतर होती गई और हाशिए की तरफ खिसकती चली गई।

अब चमत्कार तभी हो सकता है जब या तो पार्टी नेतृत्व में पूरी तरह से आमूलचूल परिवर्तन हो या पार्टी उन लोगों से छुटकारा पाए जिन लोगों में वोट लेने की तो कोई कुव्वत ही नहीं है लेकिन पार्टी पर वह पूरा अपना साम्राज्य बिछाए रखना चाहते हैं ।

साफ लफ्जो में कहें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से देश भर में सीधे भिड़ जाने वाली क्षमता का कोई नेता जुटा सकती है कांग्रेस? फिलहाल तो ऐसा कुछ नजर नहीं आता है। याद आता है जब इंदिरा गांधी के खिलाफ सारे विपक्षी बोलते थे मगर इंदिरा गांधी को जब भी मौका लगता था वह किसी का नाम नहीं लेती थी। आज स्थिति यह है कि राहुल गांधी मंच पर नाम ले कर बार-बार चिल्लाते हैं चोर है चोर है चोर है। इसी असमंजस उहापोह में जूझती कांग्रेस में लगातार जमीन दरक रही है। कई बड़े पुराने नेता जो सपने में भी कांग्रेस पार्टी या गांधी परिवार के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोलते थे उनकी जुबानों के ताले टूट चुके हैं। 

 राज्य में जब चुनाव होते हैं तो पार्टी बेशक चुनाव जीत जाती है लेकिन क्या हकीकत में उस में केंद्रीय नेतृत्व का योगदान होता है या उन क्षेत्रीय क्षत्रपों का योगदान होता है जो मेहनत करते हैं। जैसे पंजाब में राजा कैप्टन अमरिंदर सिंह और छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल।

कौन अछूत / अजीत शाही


कल मध्यप्रदेश में एक दलित लड़की की पिटाई इसलिए कर दी गई क्योंकि वो जन्माष्टमी के पंडाल के आसपास खड़ी थी. पीटने वाले लोग माली जाति के हैं. मतलब ये है कि मालियों के लिए दलित अछूत है. अगर कोई माली जाति की लड़की यादवों की जन्माष्टमी पंडाल पर भटक कर पहुँच जाए तो यादव भी उसको पीट ही देंगे. हमारे जैसे कायस्थ तो ख़ैर क्या यादव और क्या माली, सभी को छोटी जाति का ही मानते रहे हैं और घर में आने वाले इन जाति के लोगों को चुपके से अलग गिलास में पानी पिलाते रहे हैं.


कायस्थों के मेरे ख़ानदान में मैंने पूरी उम्र एक इंसान नहीं देखा जिसको ये बुरा लगता हो कि हम ब्राह्मणों, ठाकुरों और बनियों से नीचे की पायदान पर हैं. बल्कि बचपन से यही देखा है कि पंडीजी के पैर छूकर आशीर्वाद लेने की होड़ में हर कोई एक दूसरे से आगे है. हम कायस्थ इसी से ख़ुश हैं कि ब्राह्मणों ने हमको अपने एक एक्सक्लूज़िव भगवान दिए हैं. और फिर, अगर बांभन-ठाकुर हमसे ऊपर है तो ये क्यों भूल जाते हो कि कितने सारे हमसे नीचे भी तो हैं? अगर मैं अपने किसी रिश्तेदार को कह भर दूँ कि, भाई, हमको अपने आप को हिंदू समाज में किसी से नीचे नहीं समझना चाहिए और हमें ऐसे समाज से बग़ावत करनी चाहिए जो हम को ब्राह्मण से कम लगाता है तो उलटा मुझे ही लतिया दिया जाएगा.


दरअसल हिंदू धर्म और समाज की ख़ूबी यही है कि हर जाति को ये मालूम है कि उसके ऊपर कौन है और उसके नीचे कौन है. हमारे धर्म-ग्रंथों में, पौराणिक कहानियों में पात्रों की  जाति अमूमन सामने ही रहती है जिससे कि ये सामाजिक ज्ञान सबको रहता है कि भगवानों के बीच भी हमारी जाति का क्या स्टेटस है. ये ज्ञान उदासी या हताशा का नहीं, इत्मीनान का स्रोत है. वो हिंदू ही क्या जिसे ये न मालूम हो किसको हड़काया जा सकता है और किसके सामने हाथ जोड़कर कमर झुकानी है? दिल्ली के चौदह-पंद्रह अंबेडकरवादियों को छोड़ कर मुझे आज तक कोई जाटव, वाल्मीकि, मल्लाह, पासी, खटिक नहीं मिला जिसने अपना परिचय देते हुए कहा हो कि मैं दलित हूँ. कोई ब्राह्मण नहीं देखा जो जातिवादी हो कर भी हंसते हंसते अपनी बेटी की शादी अपनी जाति से नीचे वाली जाति के लड़के से कर दे.


आज से पैंतीस-चालीस साल पहले जब मेरी पीढ़ी के नौजवानों में अंतर्जातीय विवाह होने शुरू हुए तो मजबूरी में लिबरल ढले जा रहे माँ-बाप सबसे पहले ये देखते थे लड़की कहीं हमसे नीचे की जाति में तो नहीं जा रही है? जिस लड़के की प्रेमिका थोड़ी बहुत भी ऊँची जाति की होती थी उस लड़के के माँ-बाप राहत की साँस लेकर हामी भर देते थे. मसलन अगर लड़का ब्राह्मण था और लड़की बनिया तो लड़के के परिवार वालों की कच्ची हो जाती थी. लेकिन लड़की वाले मन ही मन इत्मीनान कर लेते थे कि चलो कम से कम यादव से तो शादी नहीं कर रही है.


चार किताबें पढ़-लिख कर और फ़ेसबुक पर जय भीम लिख देने वाले सोचने लगे हैं कि बस अगले साल नीची जातियाँ बग़ावत करके भारत में फ़्रेंच रेवोल्यूशन का रीमेक बनाने वाली हैं. असलियत ये है कि खटिक भी पंडितजी को मोटा रोकड़ा देकर संडे को सत्यनारायण की कथा करवा रहा है और मंडे को मालियों की जन्माष्टमी पंडाल के बाहर पिट रहा है.

गौतम अडानी की दौलत पर आर्थिक तापमान / कृष्णन अय्यर

 कृष्णन अय्यर-



Fitch नामक अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी ने अडानी ग्रुप की सफलता की पोल खोल दी है..अडानी के कर्ज़ और इनकम की असमानता की बखिया उधेड़ दी है..मैं Fitch के डेटा लिख रहा हूँ जो Fitch ने अडानी की बैलेंसशीट से लिए है..(आंकड़ों की ज़िम्मेदारी Fitch की है..पर आंकड़े 100% ऑथेंटिक हैं)।

  1. Fitch ने अडानी के “ग्रॉस कर्ज़” को “ग्रॉस कमाई” से तुलना की है..(ग्रॉस कर्ज़ ÷ ग्रॉस कमाई) = कर्ज़ कमाई का कितना गुना है..

  1. कर्ज़ कमाई का जितना ज़्यादा होगा कंपनी उतनी ज़्यादा ख़तरनाक होगी..जनरली कर्ज़ कमाई का 1.5 – 2.5 गुना होने पर ठीकठाक माना जाता है..(कर्ज़ करोड़ रुपयों में है)

कंपनी कर्ज़ ग्रॉस कमाई का
===== ==== ==========
अडानी Ent 41,600 10.4 गुना
अडानी ग्रीन 52,800 15.1 गुना
अडानी पोर्ट 47,400 4.80 गुना
अडानी पॉवर 58,200 5.90 गुना
अडानी गैस 1,000 1.30 गुना
अडानी ट्रांस 29,900 7.10 गुना

ऊपर के आंकड़ों से एक उदाहरण : अडानी Ent की ग्रॉस कमाई 4160 करोड़ है और कर्ज़ 41,600 करोड़ है..ऐसा खेल कैसिनो में होता है..(अडानी ग्रुप को कैसिनो नहीं बोला है)

इसका सीधा सा अर्थ है : अगर अडानी की कमाई ज़रा सी भी गिरती है तो कर्ज़ का दबाव इतना बढ़ेगा कि कर्ज़ का डूबना तय है..कर्ज़ चुकाना दूर की बात है, अडानी कर्ज़ का ब्याज भी नहीं चुका पाएगा..अडानी देश की इकॉनमी को ले कर डूबेगा..

अब मुझे बताने में कोई संकोच नहीं है मैंने भी कुछ इसी तरह के 15 पैरामीटर पर अडानी को परखा था और पोस्ट लिखी थी..पर वो मेरा व्यक्तिगत रिसर्च था और मेरी कंपनी का कोई लेनादेना नही था..(Fitch की रिपोर्ट आने एकदिन पहले लिखा था..पोस्ट को 24 घन्टे ही हुए है)

ख़ैर, एक बात साफ़ है इस वक़्त हम रिस्क को समझ तो रहे हैं पर मान नहीं रहे हैं…जब तक मानेंगे तबतक कुछ नहीं बचेगा..देश के भविष्य की शुभकामनाएं देने से भी डर लगने लगा है…

श्याम सिंह रावत-

मियां की जूती मियां के सिर!

देश के बैंकों में जमा धन जनता की अमानत है जिसे एक व्यक्ति को दुनिया का सबसे बड़ा धनवान बनाने के लिए उस पर लुटाया जा रहा है। उसे अरबों-खरबों रुपए के कर्जे न सिर्फ यों ही दे दिये जा रहे हैं बल्कि उसका एक बड़ा हिस्सा माफ भी कर दिया गया है। जिसकी भरपाई जनता पर विभिन्न प्रकार के टैक्स लगाकर की जा रही है।

इस तरह मियां की जूती मियां के सिर पर ही बजाते हुए राष्ट्रवाद का भजन-कीर्तन जारी है।

अडाणी समूह की लगातार ऐसी ‘स्पून फीडिंग’ कर उसे बैंकों में जमा जनता के 2.30 लाख करोड़ रुपए का कर्ज़ा देने पर देश के जागरूक नागरिक चिंता जताते रहे हैं क्योंकि बैंकों का कर्ज डूबने की स्थिति में आम नागरिकों को नुकसान होगा।

लेकिन खुद को इस देश का शहंशाह समझने वाले सनकी मुहम्मद तुगलक के दिमाग में जनता की अमानत (पूंजी) अपने इस दोस्त को सौंपकर उसका एहसान चुकाने की ज़िद सवार हो गई है।

मणिशंकर अय्यर साहब, आप सौ फीसदी सही थे।




 




NDTV की क्रांति के पीछे कौन? / दिलीप मंडल

दिलीप मंडल-

(B4M)

एनडीटीवी सर्वहारा का चैनल कभी नहीं था।अंबानी से लोन लिया था। ओसवाल की इसमें 14% हिस्सेदारी थी। अब अडानी समूह ने 29 परसेंट ले लिया है। सारी दुनिया में कॉरपोरेट ही मीडिया को चलाता है। सीएनएन, फ़ॉक्स, स्टार, स्काई सब। पब्लिक ब्रॉडकास्टर बीबीसी को छोड़ सभी। इसलिए कृपया चिंतित न हों। एनडीटीवी में कोई बदलाव नहीं होगा।

एनडीटीवी 2009 के बाद से अंबानी के करीबी नाहटा के दिए ₹403 करोड़ से चल रहा था। एनडीटीवी की सारी क्रांति और सेक्युलरिज्म का खर्चा नाहटा उठा रहा था। नाहटा ने वह लोन अडानी को बेच दिया। बस इतना सा फ़र्क़ आया है!

सारे बड़े अख़बार बनियों के हैं जो अच्छा है क्योंकि भारत में संपादक और एंकर आम तौर पर ब्राह्मण हैं। ये बैलेंस ज़रूरी है।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया, जागरण, भास्कर, अमर उजाला, हिंदुस्तान टाइम्स, एक्सप्रेस आदि बनियों के हैं। सिर्फ द हिंदू ब्राह्मणों का है। चैनलों की बात करें तो एनडीटीवी और इंडिया टीवी ही ब्राह्मणों का है। एनडीटीवी अब बनियों के पास जा रहा है। ₹403 करोड़ क़र्ज़ा लिया था। चुका नहीं पाए। अडानी ने क़र्ज़ देने वाले को ही ख़रीद लिया।

NDTV ने ICICI से क़र्ज़ लिया था। नहीं चुका पाए तो 2009 में अंबानी की करीबी कंपनी VPCL से ₹403 करोड़ क़र्ज़ लेकर चुकाया। ये रक़म NDTV की 30% हिस्सेदारी है। NDTV ने क़र्ज़ चुकाया नहीं। अब अडानी ने VPCL को ख़रीद लिया।

ये है NDTV की कहानी। इस बीच कंपनी के मालिक अपनी सेलरी लेते रहे।

एक बनिए से क़र्ज़ लिया। बनिए ने वह क़र्ज़ दूसरे बनिए को बेच दिया। इसमें कोई क्रांतिकारी कहानी नहीं है।

क़र्ज़ लेने वाले को खर्च घटना चाहिए था। पैसे का इंतज़ाम करना चाहिए था। एनडीटीवी को 13 साल मिले थे क़र्ज़ चुकाने के लिए।

किसे किसे पहले से पता था कि NDTV बिकने वाला है? जुलाई अगस्त के बीच शेयर डबल हो गए। आज भी लगभग 5% चढ़ा हुआ है।

सबसे बड़े शेयर होल्डर होने के नाते सबसे बड़े लाभार्थी एनडीटीवी के मालिक प्रणय रॉय और राधिका रॉय रहे। बधाई।

एनडीटीवी जैसा चल रहा था, वैसा चलता रहेगा। उसकी ब्रांडिंग नहीं बदलेगी। वह सेक्युलर बना रहेगा।

इसलिए दुखी आत्माएँ, कृपया चिंतित न हों।

एनडीटीवी में कोई बदलाव नहीं होगा। वे मूर्ख हैं जो सोच रहे हैं कि अडानी एनडीटीवी की ब्रांड इमेज को मार डालेंगे। वे बिज़नेस का चरित्र नहीं जानते।


गुरुवार, 25 अगस्त 2022

हरियाणा के बंशीलाल / रेहान फ़ज़ल

 आज बंसी लाल की 95वीं जयंती है...


बंसी लाल  अपने बेटे सुरिंदर सिंह की शादी में खुद नहीं गए थे क्योंकि वो कट्टर आर्य समाजी थे और सादगी भरी जिंदगी जीने में यकीन रखते थे. शादी के बाद उन्होंने एक प्रीति भोज ज़रूर दिया था जिसमें उन्होंने उस समय भिवानी में डिप्टी कमिश्नर के पद पर काम कर रहे और बाद में हरियाणा के मुख्य सचिव बने राम वर्मा को भी बुलाया था. राम वर्मा बताते हैं, 'मैं और मेरी पत्नी सावित्री उस भोज में उनके यहां गए. मेरी पत्नी ने कांजीवरम की साड़ी पहन रखी थी और उनके कानों में सोने के छोटे से बुंदे थे. बंसी लाल की पत्नी विद्यावती मेहमानों का स्वागत कर रही थीं. जब उन्होंने मेरी पत्नी को बिना जेवरों के देखा तो वो आश्चर्यचकित रह गईं. उनके मुंह से निकला, 'अरे छोरी तू तो नागी बूची आ गई'. वो मेरी पत्नी को घर के अंदर ले गईं और अपने हाथों से एक पेंडेंट के साथ सोने की एक चेन पहना दी. मेरी पत्नी जब बाहर आई तो थोड़ा नाराज़ थी. मैंने उसे समझाया कि इनके बोलने का यही तरीका है. अगर इनकी बेटी भी इसी तरह आती तो उन्होंने उसके साथ भी यही किया होता. दावत के बाद मैं और मेरी पत्नी सोने की वो चेन लौटाने विद्यावती के पास गए तो उन्होंने उसे वापस लेने से साफ़ इंकार कर दिया. इस तरह शादी में तोहफ़ा देने के बजाय हम तोहफ़ा ले कर वापस लौटे....'

Manmohan Sharma Ram Varma Shashi Kant Misra Raman Hitkari

बुधवार, 24 अगस्त 2022

पोस्टकार्ड आंदोलन ❤️


गांधीजी के पहले भी बहुत से स्वतंत्रता सेनानी थे, फिर गांधीजी अकेले हीरो कैसे बन गए? 🤔🤔

कहीं इसीलिए तो कवि ने नहीं लिखा था कि साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल!


17 अगस्त 1909 : इंग्लैंड की पेंटोविल्ले जेल के बाहर वीर सावरकर एक 25 वर्ष के नवयुवक के शव को लेने की प्रतीक्षा कर रहे थे, 


फांसी पर लटकाने के बाद वह शव ब्रिटिश सरकार ने किसी को नही सौंपा था। ये शव था महान क्रांतिकारी मदन लाल ढींगरा का..


एक धनी और सम्पन्न परिवार का वह बेटा जिसे उसके ब्रिटिश सरकार मे कार्यरत सिविल सर्जन पिता ने इंग्लैंड पढ़ने भेजा था। पर क्रांति की ज्वाला ऐसी थी की वीर सावरकर के साथ मिल कर मदन लाल जी ने 1901 मे भारत पर अत्याचार कर के इंग्लैंड लौटे एक ब्रिटिश आर्मी ऑफिसर कर्ज़न वाईली को सबक सीखने की सोची।


1 जुलाई 1909 को मदन लाल ढींगरा ने इंपेरियाल इंस्टीट्यूट इंग्लैंड मे हो रही एक सभा मे कर्ज़न वाईली को गोलियो से भून दिया, जिसके बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हे गिरफ्तार कर के 17 अगस्त 1909 को फांसी दे दी।


मदन लाल में हौंसला और निडरता इतनी थी की जब अदालत मे इन पर कारवाई हुई तो इन्होने साफ कह दिया की ब्रिटिश सरकार को कोई हक़ नही है मुझ पर मुकदमा चलाने का...


जो ब्रिटिश सरकार भारत मे लाखो बेगुनाह देशभक्तों को मार रही है और हर साल 10 करोड़ पाउंड भारत से इंग्लैंड ला रही है,उस सरकार के कानून को वो कुछ नही मानते, इसलिए इस कोर्ट में वह अपनी सफाई भी नही देंगे, जिसे जो करना है कर लो...


और जब उन्हे मृत्यु दंड देकर ले जाने लगे तो उन्होने जज को शुक्रिया अदा करते हुए कहा था “शुक्रिया आपने मुझे मेरी मातृभूमि के लिए जान नियोछावर करने का मौका दिया”।

ऐसे महान क्रांतिकारी मदनलाल ढींगरा की  पुण्यतिथी है 17 अगस्त।

(चित्र:- लंदन में वीर सावरकर तथा मदन लाल ढींगरा)

मंगलवार, 23 अगस्त 2022

चक्रासन के लाभ* / चित्रा फूलोरिया


*चक्रासन के लाभ* 


 *पेट की चर्बी कम करे :  पेट की चर्बी को कम करने का एक बेहतरीन योगाभ्यास है। इस आसन में इतनी क्षमता है कि  पेट की चर्बी को कम करते हुए इसे सामान्य कर दे। एक सप्ताह के अंदर ही अंतर आने लगेगा।

 *बुढ़ापे को रोके : चक्रासन की नियमित प्रक्रिया युवावस्था को बरकरार रखती है। बुढ़ापे में कमर नहीं झुकती अर्थात उम्र बढ़ने की प्रक्रिया के दुष्प्रभावों को यह अभ्यास धीमा कर देता है।

 *त्वचा की सुंदरता के लिए:* इस आसन में जब हम अपने सिर को नीचे लटकाते हैं तो खून का प्रवाह अधिक होता है जो चेहरे में निखार लाता है।

 *रीढ़ की हड्डी की समस्या में रामबाण:* आज की जीवन शैली में अक्सर लोग स्पाइन की समस्याओं से जूझ रहे हैं।  लेकिन चक्रासन का अभ्यास मेरुदंड से जुड़ी परेशानियों को दूर कर सकता है। यह रीढ़ की हड्डी को लचीला एवं मजबूत बनाता है। सर्वाइकल की समस्या को दूर करने के लिए यह रामबाण उपाय है।

 *कमर पतली करने के लिए :  मोटी कमर को कमरा से वापस पतली कमर बनाने में चक्रासन का अभ्यास महत्वपूर्ण सिद्ध होता है।

 *छाती और फेफड़ों के लिए : इससे छाती चौड़ी होती है और फेफड़ों से सम्बंधित विकारों को दूर करता है।

 *कंधों के लिए : यह कंधों, हाथों एवं घुटनों को मजबूत बनाता है।

 *पाचन तंत्र के लिए : हमारे शरीर को स्वस्थ रखने में पाचन तंत्र की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। चक्रासन का नियमित अभ्यास पाचन संबंधी गड़बड़ियों  को दूर करता है।

 *स्वस्थ हृदय :*  यह हृदय को स्वस्थ व सक्रिय रखता है।

 *मानसिक तनाव को दूर भगाए : डिप्रेशन, चिंता और तनाव जैसी मानसिक समस्याओं को कम करने में चक्रासन कारगर सिद्ध होता  है।  

*थायरॉइड : थायरॉयड की समस्या को कम करता है और उसके लक्षणों को बढ़ने नहीं देता। 

 *रोग प्रतिरोधक क्षमतावर्धक : चक्रासन करने से हमारे शरीर में रक्त संचरण कुछ इस प्रकार होता है कि शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास होने लगता है जिससे इंफेक्शन होने का खतरा कम हो जाता है।

 *शरीर में स्फूर्ति : चक्रासन हमारे शरीर को संपूर्ण स्फूर्ति से भर देता है। 

 *पुष्ट मांसपेशियां : चक्रासन करने से मांसपेशियां मजबूत होती हैं जिसके कारण हाथ, पैर और कंधे चुस्त दुरुस्त होते है |

 *शक्ति वर्धक : चक्रासन करने से लकवा, शारीरिक थकान, सिरदर्द, कमर दर्द तथा आंतरिक अंगों में होने वाले दर्द से मुक्ति मिलती है। 

 *अन्य लाभ : 

चक्रासन से रक्त का प्रवाह तेजी से होता है| मेरुदंड तथा शरीर की समस्त नाड़ियों का शुद्धीकरण होकर यौगिक चक्र जाग्रत होते हैं|

 *चक्रासन करने में सावधानियां* 

यह आसन थोड़ा कठिन है कभी  भी इसे जबरदस्ती नहीं करना चाहिए, धीरे-धीरे अभ्यास के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

उच्च रक्तचाप, हृदय की समस्याओं और चक्कर आने की स्थिति में इसे न करें। 

पेट में सूजन आने तथा हर्निया से पीड़ित व्यक्तियों को यह आसन नहीं करना चाहिए।

अधिक कमर दर्द में भी इसका अभ्यास न करें।


 Chitra Phuloria. Certified A label Yoga Trainer,  Ministry of Skill Development and Entrepreneurship, Government of India & Patnjali Haridwar

सोमवार, 22 अगस्त 2022

इन्कलाब जिन्दाबाद क्या है ? /

 

इन्कलाब जिन्दाबाद क्या है ? /

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श्री सम्पादक जी, माडर्न रिव्यू ।


आपने अपने सम्मानित पत्र के दिसम्बर, 1929 के अंक में एक टिप्पणी ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ शीर्षक से लिखी है और  इस नारे को निरर्थक ठहराने की चेष्टा की है। आप सरीखे परिपक्व विचारक तथा अनुभवी और यशस्वी सम्पादक की रचना में दोष निकालना तथा उसका प्रतिवाद करना, जिसे प्रत्येक भारतीय सम्मान की दृष्टि से देखता है, हमारे लिए एक बड़ी धृष्टता होगी। तो भी इस प्रश्न का उत्तर देना हम अपना कर्तव्य  समझते हैं कि इस नारे से हमार क्या अभिप्राय है।


यह आवश्यक है,क्योंकि इस देश में इस समय इस नारे को सब लोगों तक पहुंचाने का कार्य हमारे हिस्से में आया है। इस नारे कि रचना हमने नहीं की है। यह नारा रूस के क्रांतिकारी आन्दोलन में प्रयोग किया गया है। प्रसिद्ध समाजवादी लेखक अप्टन सिंक्लेयर ने अपने उपन्यासों  ‘बोस्टन’ और ‘आईल’ में यही नारा कुछ अराजकतावादी क्रांतिकारी पात्रों के मुख से प्रयोग कराया है। इसका अर्थ क्या है ? इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि सशस्त्र संघर्ष सदैव जारी रहे और कोई भी व्यवस्था अल्प समय के लिए भी स्थाई न रह सके। दूसरे शब्दों में, देश और समाज में अराजकता फैली रहे।


दीर्घकाल से प्रयोग में आने के कारण इस नारे को एक ऐसी विशेष भावना प्राप्त हो चुकी है, जो सम्भव है भाषा के नियमों एवं कोष के आधार पर इसके शब्दों से उचित तर्कसम्मत रूप में सिद्ध न हो पाए, परन्तु इसके साथ ही इस नारे से उन विचारों को पृथक नहीं किया जा सकता, जो इसके साथ जुड़े हुए हैं। ऐसे समस्त नारे एक ऐसे स्वीकृत अर्थ के द्योतक हैं, जो एक सीमा तक उनमें उत्पन्न हो गए हैं तथा एक सीमा तक उनमें निहित हैं।


उदाहरण के लिए हम यतीन्द्रनाथ जिन्दाबाद का नारा लगाते हैं। इससे हमारा तात्पर्य यह होता है कि उनके जीवन के महान आदर्शों तथा उस अथक उत्साह को सदा-सदा के लिए बनाए रखें, जिसने इस महानतम बलिदानी को उस आदर्श के लिए अकथनीय कष्ट झेलने एवं असीम बलिदान  करने की प्रेरणा दी। यह नारा लगाने से हमारी यह लालसा प्रकट होती है कि हम भी अपने आदर्शों के लिए अचूक उत्साह को अपनाएं। यह वह भावना है, जिसकी हम प्रशंसा करते हैं। इसी प्रकार हमें ‘इन्कलाब’ शब्द का अर्थ भी कोरे शाब्दिक रूप में नहीं लगाना चाहिए। इस शब्द का उचित एवं अनुचित प्रयोग करने वाले लोगों के हितों के आधार पर इसके साथ विभिन्न अर्थ एवं विभिन्न विशेषताएं जोड़ी जाती हैं। क्रांतिकारी की दृष्टि में यह एक पवित्र वाक्य है। हमने इस बात को ट्रिब्यूनल के सम्मुख अपने वक्तव्य में स्पष्ट करने का प्रयास किया था।


इस वक्तव्य में हमने कहा था कि क्रांति (इन्कलाब) का अर्थ अनिवार्य रूप में सशस्त्र आन्दोलन नहीं होता। बम और पिस्तौल कभी-कभी क्रांति को सफल बनाने के साधन मात्र हो सकते हैं। इसमें भी सन्देह नहीं है कि कुछ आन्दोलनों में बम एवं पिस्तौल एक महत्वपूर्ण साधन सिद्ध होते हैं, परन्तु केवल इसी कारण से बम एवं पिस्तौल क्रांति के पर्यायवाची नहीं हो जाते। विद्रोह को क्रांति नहीं कहा जा सकता, यद्यपि यह हो सकता है कि विद्रोह का अन्तिम परिणाम क्रांति हो।


इस वाक्य में क्रांति शब्द का अर्थ ‘प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना एवं आकांक्षा’ है। लोग साधारणतया जीवन की परम्परागत दशाओं के साथ चिपक जाते हैं और परिवर्तन के विचार मात्र से ही कांपने लगते हैं। यही एक अकर्मण्यता की भावना है, जिसके स्थान पर क्रांतिकारी भावना जाग्रत करने की आवश्यक्ता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अकर्मण्यता का वातावरणत्र निर्मित हो जाता है और रूढ़िवादी शक्तियां मानव समाज को कुमार्ग पर ले जाती हैं। ये परिस्थितियां मानव समाज की उन्नति में गतिरोध का कारण बन जाती हैं।


क्रांति की इस भावना से मनुष्य जाति की आत्मा स्थाई तौर पर ओतप्रोत रहनी चाहिए, जिससे कि रूढ़िवादी शक्तियां मानव समाज की प्रगति  की दौड़ में बाधा डालने के लिए संगठित न हो सकें। यह आवश्यक है कि पुरानी व्यवस्था सदैव न रहे और वह नयी व्यवस्था के लिए स्थान रिक्त करती रहे, जिससे कि एक आदर्श व्यवस्था संसार को बिगड़े  शक्तियां से रोक सके। यह है हमारा वह अभिप्राय जिसको हृदय में रखकर हम इन्कलाब जिन्दाबाद का नारा ऊँचा करते है।


- भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त

22 सितम्बर 1929

शनिवार, 20 अगस्त 2022

दिल्ली में एक बंगला सलमान रुशदी का / विवेक shukl

 इक बंगला सलमान रुश्दी का दिल्ली में


सलमान रूश्दी पर जानलेवा हमले से दुनिया स्तब्ध है। भारतीय मूल के लेखक के स्वस्थ होने की सारी दुनिया कामना कर रही है। इस बीच, यह सवाल भी बना हुआ है कि मिडनाइट चिल्ड्रन और सेटेनिक वर्सेज के लेखक सलमान रूश्दी कभी उस दिल्ली में रहेंगे जिससे उनके पिता का संबंध था। वे अपने पिता के राजधानी के पॉश फ्लैग स्टाफ रोड पर स्थित 4 नंबर के बंगले को लेने के लिये कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।


दरअसल राजधानी के सिविल लाइंस मेट्रो स्टेशन से कुछ ही दूर है  फ्लैग स्टाफ रोड। सिविल लाइंस के ही एक घर में बाबा साहेब अँबेडकर ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष गुजारे थे।  घने पेड़ों की हरियाली से लबरेज फ्लैग स्टाफ रोड  के बंगले कई-कई एकड़ में फैले हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का सरकारी आवास भी फ्लैग स्टाफ रोड पर ही हैं। पर इधर का 4 नंबर का बंगला अपने आप में खास है। यह बंगला सलमान रुश्दी के पिता अनीस अहमद का रहा है।


 कौन थे सलमान रुशदी के पिता


सलमान रुश्दी के पिता अनीस अहमद  दिल्ली के मशहूर वकील थे। वे दीवानी के मामलों में जिरह करना पसंद करते थे। वे तीस हजारी कोर्ट में प्रेक्टिस किया करते थे। उन्होंने सन 1946 फ्लैग स्टाफ रोड का बंगला खरीदा था। वे पहले सपरिवार बल्लीमरान में ही रहते थे। चचा गालिब के बल्लीमरान में। दिल्ली जाकिर हुसैन कॉलेज के लंबे समय तक प्रिसिंपल रहे प्रो. रियाज उमर बताते हैं कि पैसा आया तो अनीस अहमद ने सुंदर सा बंगला खरीद लिया। वे एंग्लो एराबिक स्कूल के मैनेजमेंट से भी जुड़े  हुए थे।  अनीस अहमद हमेशा वेल ड्रेस रहना पसंद करते थे। अनीस अहमद दिन भर की मारामारी के बाद  शामें कनॉट प्लेस के मरीना होटल ( अब रेडिसन ब्लू होटल) में ही गुजारना पसंद करते थे । इसी होटल में गांधी जी का हत्यारा नाथूराम गोडसे भी ठहरा था।


 कहते हैं, अनीस अहमद 1960 के दशक में लंदन चले गए। वे देश के बंटवारे के समय भी  पाकिस्तान नहीं गए थे। लंदन से कभी-कभार ही दिल्ली आते। वे 1970 में दिल्ली आए। यहां उनका कुनबा और तमाम दोस्त थे ही।  तब उन्होंने राजपुर रोड के एक प्रॉपर्टी डीलर लज्जा राmम कपूर की मध्यस्थता से अपना बंगला स्वाधीनता सेनानी और कारोबारी भीखूराम जैन  को 300 रुपए मासिक रेंट पर दे दिया।


  बंगले पर बवाल


 भीखू राम जैन का परिवार बढ़ रहा था। इसलिए उन्होंने 4 फ्लैग स्टाफ रोड के बंगले को तुरंत किराए पर ले लिया ताकि परिवार के कुछ मेंबर वहां पर शिफ्ट कर लें। पर इस डील के चंदेक दिनों के बाद अनीस अहमद फिर से भीखूराम जैन से मिले। उनके साथ लज्जा राम कपूर भी थे। उन्होंने जैन से अपने बंगले को खरीदने की पेशकश की।  भीखूऱाम जैन  अनीस अहमद के बंगले को खरीदने के लिए  राजी हो गए। तय हुआ कि वे 3. 75 लाख रुपए में बंगला खरीद लेंगें। उन्होंने 50 हजार रुपए बयाना अनीस अहमद को दे दिया। शेष रकम 15 महीने में दी जानी थी। अनीस अहमद बयाना लेकर एक बार जो लंदन गए तो वे फिर कभी नहीं लौटे। वहां पर ही उनकी  मृत्यु हो गई। भीखूऱाम जैन ने करीब 25 साल पहले  इस लेखक को अपने 49 राजपुर रोड   वाले  घर  में बताया था कि उन्होंने अनीस अहमद को बार-बार भारत बुलाया ताकि डील को अंतिम रूप दिया जा सके। पर वे नहीं आए।


ताजा सूरते हाल यह है कि 4 फ्लैग स्टाफ रोड के बंगले के स्वामित्व को लेकर विवाद जारी है। अब भीखूराम जैन, अनीस अहमद और लज्जाराम कपूर को गुजरे हुए भी एक जमाना हो गया।  4 फ्लैग स्टाफ रोड  बंगले के मालिकाना हक के लिए आधी सदी से केस चल रहा है।  जैन साहब के  बाद उनके पुत्र नरेन केस को लड रहे हैं । वे ही उस बंगले में रहते हैं।  वे सलमान रुश्दी पर हुए हमले से आहत हैं।  कहते हैं, ये गलत हुआ है।


 बतादें कि सलमान रुश्दी का हिमाचल प्रदेश के सोलन में शिल्ली रोड़ पर उपायुक्त रेजिडेंस के पास एक बंगला भी है, जिसमें करीब 11 कमरे, हॉल, बेड रूम, किचन वगैरह है।  वे यहां साल 2002 में आखिरी बार आये थे।  इस बंगले को एक केयरटेकर देखता है। 


इस बीच,हो सकता है कि नौजवान पीढ़ी भीखूराम जैन से पूरी तरह से परिचित ना हो। उनके जीवन काल में ही उनका घर लैंडमार्क बन गया था।  वे गांधी जी के आहवान पर स्वाधीनता आंदोलन में कूदे थे। उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में भी भाग लिया। वे 1980 में चांदनी चौक लोकसभा सीट से कांग्रेस की टिकट पर निर्वाचित हुए। वे जीवनभर समाज सेवा और शिक्षा के प्रसार-प्रचार के लिए सक्रिय रहे। वे दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रतिष्ठित हिन्दू कॉलेज मैनेजिग कमेटी से दशकों जुड़े रहे। भीखूराम जैन दिल्ली नगर निगम के भी लंबे समय तक मेंबर रहे। उनके नाम पर राजपुर रोड की एक स़ड़क का नाम 2008 में भीखूराम जैन रोड रखा गया था। भीखूराम जैन दावा करते थे कि अगर अनीस अहमद ने मान लिया होता कि वे उनके साथ इसलिये डील नहीं कर रहे क्योंकि उन्हें किसी अन्य से बेहतर पैसा मिल रहा है, तो वे उनके ऊपर केस नहीं करते। हालांकि वे कभी सलमान रुश्दी से नहीं मिले थे।


  भीखूराम जैन दिल्ली का परिवार मूल रूप से हरियाणा के  झज्जर से था। वहां से करीब दो सौ साल पहले दिल्ली आये तो पहाड़ी धीरज में रहने लगे। इसे जैन समाज का गढ़ माना जा सकता है। यहां पर सैकड़ों जैन परिवार रहते हैं। हां, यहां से बहुत से जैन परिवार राजधानी के अन्य भागों में शिफ्ट भी होते रहे। उदाहरण के रूप में भीखूराम जैन 1960 में राजपुर रोड में शिफ्ट कर गए थे। 


Vivekshukladelhi@gmail.com,  Navbharattimes and Dainik Tribune

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