सोमवार, 31 मई 2021

अखबारों के संकट / संजय द्विवेदी

 पठनीयता के संकट में खुद को बदल रहे हैं अखबार-/ प्रो. संजय द्विवेदी

       भारत में अखबारों के विकास की कहानी 1780 से प्रारंभ होती है, जब जेम्स आगस्टस हिक्की ने पहला अखबार ‘बंगाल गजट’ निकाला। कोलकाता से निकला यह अखबार हिक्की की जिद, जूनुन और सच के साथ खड़े रहने की बुनियाद पर रखा गया। इसके बाद हिंदी में पहला पत्र या अखबार 30 मई, 1826 में निकला, जिसका नाम था ‘उदंत मार्तण्ड’,जिसे कानपुर निवासी युगुलकिशोर शुक्ल ने कोलकाता से ही निकाला।


इस तरह कोलकाता भारतीय पत्रकारिता का केंद्र बना। अंग्रेजी, बंगला और हिंदी के कई नामी प्रकाशन यहां से निकले और देश भर में पढ़े गए। तबसे लेकर आज तक भारतीय पत्रकारिता ने सिर्फ विकास का दौर ही देखा है। आजादी के बाद वह और विकसित हुई। तकनीक, छाप-छपाई, अखबारी कागज, कंटेट हर तरह की गुणवत्ता का विकास हुआ। प्रिंट मीडिया भी इससे गहरे प्रभावित हुआ। तरह-तरह की अफवाहों ने अखबारों के प्रसार पर असर डाला। लोगों ने अखबार मंगाना बंद किया, कई स्थानों पर कालोनियों में प्रतिबंध लगे, कई स्थानों वितरण व्यवस्था भी सामान्य न हो सकी। बाजार की बंदी ने प्रसार संख्या को प्रभावित किया तो वहीं अखबारों का विज्ञापन व्यवसाय भी प्रभावित हुआ। इससे अखबारों की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई। इसका परिणाम अखबारों के पेज कम हुए, स्टाफ की छंटनी और वेतन कम करने का दौर प्रारंभ हुआ। आज भी तमाम पाठकों को वापस अखबारों की ओर लाने के जतन हो रहे हैं। किंतु इस दौर में आनलाईन माध्यमों का अभ्यस्त हुआ समाज वापस लौटेगा यह कहा नहीं जा सकता।

     कोरोना काल के सवा साल के इस गहरे संकट की व्याख्या करने पर पता चलता है कि प्रिंट मीडिया के लिए आगे की राहें आसान नहीं है। विज्ञापन राजस्व तेजी से टीवी और  डिजीटल माध्यमों पर जा रहा है,क्योंकि लाकडाउन के दिनों में यही प्रमुख मीडिया बन गए हैं। तकनीक में भी परिर्वतन आया है। जिसके लिए शायद अभी हमारे प्रिंट माध्यम उस तरह से तैयार नहीं थे। इस एक सवा साल की कहानियां गजब हैं। मौत से जूझकर भी खबरें लाने वाला मैदानी पत्रकार है, तो घर से ही अखबार चला रहा डेस्क और संपादकों का समूह भी है। किसे भरोसा था कि समूचा न्यूज रूम आपकी मौजूदगी के बिना, घरों से चल सकता है। नामवर एंकर घरों पर बैठे हुए एंकरिंग कर पाएंगें। सारे न्यूज रूम अचानक डिजीटल हो गए। साक्षात्कार ई-माध्यमों पर होने लगे। इसने भाषाई पत्रकारिता के पूरे परिदृश्य को प्रभावित किया है। जो परिवर्तन वर्षों में चार-पांच सालों में घटित होने थे, वे पलों में घटित होते दिखे।

     ई-मीडिया, सोशल मीडिया, यू-ट्यूब और कुल मिलाकर मोबाइल क्रांति ने सबसे बड़ा नुकसान अखबार और पत्रिकाओं का किया है। इस समय का संकट यह है कि अब पढ़ने का वक्त मोबाइल पर जा रहा है। पठनीयता का यह संकट प्रिंट माध्यमों के सामने एक चुनौती की तरह है। सूचना और ज्ञान के लिए ई-माध्यमों और मोबाइल पर बढ़ती निर्भरता ने प्रिंट माध्यमों को बदलने की चुनौती भी दी है। क्योंकि अगर ये बदलते नहीं तो अप्रासंगिक हो जाएंगे। बदलना मजबूरी है, सो अखबार खुद को बदलेंगें और बचे रहेंगे। इस पूरे परिदृश्य को देखें तो अखबार बदल रहे हैं। ज्यादा सरोकारी और ज्यादा संदर्भों के साथ प्रस्तुत हो रहे हैं। उनकी साज-सज्जा और प्रस्तुति भी होड़ करती दिखती है। अब राजनीति ही अखबार का मुख्य समाचार नहीं है। समाज जीवन के विविध संदर्भ यहां जगह पा रहे हैं। अखबार के पृष्ठ बढ़े हैं और यह आवश्यक नहीं प्रधानमंत्री पहले पन्ने पर लीड बनें। प्रधानमंत्री और सत्ताधीशों का पहले पन्ने से गायब होना यह संकेत है कि अखबार अपने को बदल रहे हैं। अब अखबार ‘आपकी जरूरत का’ बन रहा है। वह आपके हिसाब से बनाया जा रहा है। उसे आपके सपनों, आकांक्षाओं, आवश्यक्ताओं के तहत बनाया जा रहा है। वह थोपा नहीं जा रहा है, वह बात कर रहा है। तकनीक की दुनिया ने इसे संभव किया है। हिंदुस्तान जैसे देश की विविधता और बहुलता के हिसाब से अलग-अलग अखबार बनाए जा रहे हैं। स्थानीयता इसमें एक प्रमुख तत्व के रूप में सामने आई है। स्थानीय संस्करणों की अवधारणा और शहरों के पूलआउट इसे व्यक्त रहे हैं। कंटेट के स्तर पर बदलाव हमें चौतरफा दिखता है।

       ई-मीडिया की क्रांति के बाद अखबार अब खबर देने वाले पहले माध्यम नहीं रहे। सूचनाएं कई अन्य माध्यमों से हमें मिल चुकी होती हैं। एक समय में अखबारों से ही जानते थे हमारे देश, प्रदेश और शहर में क्या हुआ। सोशल मीडिया और मोबाइल क्रांति के चलते हर व्यक्ति अब सूचना संपन्न है। उसके पास सारी सूचनाएं आ चुकी हैं। अब वह 24 घंटे में एक बार आने वाले अखबार का क्या करे? जाहिर तौर पर संकट गहरा है।  बावजूद इसके यह माना जा रहा है कि छपे हुए शब्दों पर भरोसा कम नहीं होगा, इसलिए अखबारों की अहमियत कायम रहेगी। अखबार के मूल तत्व मीडिया और सूचना क्रांति के बाद भी नहीं बदलेंगे। सोशल मीडिया का ऊफान आज है कल रहेगा, यह जरूरी नहीं। न्यू मीडिया भी कब तक न्यू रहेगा कहा नहीं जा सकता। हम याद करें तो टीवी क्रांति के समय भी यह माना गया था कि अब प्रिंट मीडिया को गहरा संकट है। किंतु ऐसा नहीं हुआ बल्कि चैनल क्रांति के चलते अखबार संभले, रंगीन हुए, ज्यादा सुदर्शन और आकर्षक प्रस्तुतिजन्य हुए। ऐसे में अखबारों की बेहतर प्रस्तुति और सिटीजन जर्नलिज्म की मांग बढ़ेगी। अखबार की दुनिया में काम करने वाले सभी मीडिया हाउस अब डिजीटल मीडिया पर भी काम कर रहे हैं। उनकी वर्षों में बनी विश्वसनीयता और प्रामणिकता उनके काम आ रही है। अखबार इस तरह बचे रहेगें। एक समय में अखबारों में 40 प्रतिशत भाषण, 20 प्रतिशत प्रेसनोट और 40 प्रतिशत खबरें छपती थीं। अब आपके मन और इच्छा का अखबार तैयार हो रहा है। उसका जोर सूचनाओं पर नहीं, विश्लेषण पर है, व्याख्या पर है। फीचर पर है। घटनाओं पर नहीं इवेंट्स पर है। वह सुंदर दृश्यों का साक्षी बनना चाहता है। अब समस्याएं ही उसका मुख्य स्वर नहीं, अब जीवन या लाइफ स्टाइल भी उसका मुख्य समाचार है। उसकी इच्छा एक साथ आधुनिकता और परंपरा दोनों को साधने की है। भारत की विविधता और उत्सवधर्मिता उसका मूल स्वर है। बाजार भी इसमें उसके साथ खड़ा है। वह अब ईद और दीवाली भर नहीं, करवा चौथ, छठ और गरबा सबका राष्ट्रीयकरण कर रहा है। उसे अक्षय तृतीया की भी याद है और वेलेंटाइन डे की भी। उसे रोज डे भी मनाना है और नया साल भी। नया साल एक जनवरी का भी और गुड़ी पाड़वा, हिंदू नववर्ष का भी।

      इस बदलते अखबार को समझना है तो भारत और उसके समाज को भी समझना होगा। 1991 के बाद जीवन में घुस आई उदारीकरण के पैदा हुई, समझ को भी समझना होगा। यह झोलाछाप पत्रकारिता का समय नहीं है, यह एक कारपोरेट मीडिया है। जिसके केंद्र में सिर्फ गरीब, संघर्ष करते लोग नहीं, खाय-अधाए लोग भी हैं। वह जरुरतों और संसाधनों से भरे पूरे लोगों की भी कहानियां सुना रहा है। उनकी पार्टियां उसके पन्नों पर पेज-3 की तरह परोसी जा रही हैं। सेलेब्रटी होना अब समाचार के लायक होना भी है। सेलेब्रेटी के लिए सामाजिक मूल्य मायने नहीं रखते, वह क्या खाता है, क्या पहनता है, उसकी पार्टियां कितनी रंगीन है, यहां उसी का मूल्य है। अखबारों में अब एक साथ गंभीरता और हल्कापन दोनों है। वे बाजार को भी साधते हैं और कुछ पढ़ने वाले पाठकों को भी। वे अब एक बड़े वृत्त के लिए काम करते हैं। अखबार भी चाहते हैं कि वे भी आदमी की तरह स्मार्ट बनें और स्मार्ट पाठकों के बीच पढ़े जाएं। इसलिए अब पाठक ही नहीं, अखबार भी अपने पाठकों को चुन रहे हैं। अखबार अब सिर्फ प्रसारित नहीं होना चाहते, वे ‘क्लास’ के बीच पढ़े जाना चाहते हैं। वे प्रभुवर्गों के बीच अपनी मौजूदगी चाहते हैं। कई अर्थों में कार्य स्थितियां भी बेहतर हो रही हैं।

       इस नए समय ने डेस्क और फील्ड की दूरी को भी पाट दिया है। नए कंटेंट का विकास और सृजन यहां महत्वपूर्ण है। चलता है, वाला ट्रेंड अब विदाई की ओर है। कहते हैं अखबारों के डिजीटल एडीशन का सूरज नहीं ढलता, अखबार अब चौबीस घंटों के उत्पाद में बदल रहे हैं, वे भले घर में सुबह या शाम को एक बार आ रहे हैं किंतु उनका डिजीटल संस्करण 24X7 है। ऐसे में अपार अवसरों का सृजन भी हो रहा है। एक नए अखबार से मुलाकात हो रही है, जो 1991 के बाद पैदा हुआ है। यह बाजारीकरण, भूमंडलीकरण के मूल्यों से पैदा हुआ अखबार है। परिर्वतन के इसी प्रभाव को रेखांकित करते हुए 1982 में टीवी के कलर होने पर कवि-संपादक रघुवीर सहाय ने कहा था कि ‘अब खून का भी रंग दिखेगा।’ 1991 में भूमंडलीकरण की नीतियों को स्वीकार करने के बाद की मीडिया में अनेक ऐसे रंग दिख रहे हैं, जो हमारे इंद्रधनुष में नहीं थे। यह बिल्कुल नया अखबार है, जिसकी जड़ें स्वतंत्रता आंदोलन के गर्भनाल में नहीं हैं, उसे वहां खोजिएगा भी नहीं। यह बिल्कुल नया अखबार है, जो आकांक्षावान समाज की उम्मीदों को पंख लगाता, उन्हें बड़े सपने दिखाता है और उन सपनों को पूरा करने के लिए वातावरण भी देता। यह अखबार उम्मीदों से भरा है, यह नए भारत का अखबार है, उसके लिए जिंदगी अब लाइफ स्टाइल है और उसके सपने बेहिसाब।

थोमस बैबिंगटन मैकाले

 लॉर्ड थोमस बैबिंगटन मैकाले

लॉर्ड टॉमस बैबिंग्टन मैकॉले (अंग्रेज़ीThomas Babington Macaulay; सटीक उच्चारण: थौमस् बैबिंग्टन् मैकाॅलेऽ) (२५ अक्टूबर १८०० - २८ दिसम्बर १८५९) ब्रिटेन का राजनीतिज्ञ, कवि, इतिहासकार था। निबन्धकार और समीक्षक के रूप मे उनने ब्रिटिश इतिहास पर जमकर लिखा। सन् १८३४ से १८३८ तक वह भारत की सुप्रीम काउंसिल में लॉ मेंबर तथा लॉ कमिशन का प्रधान रहे। प्रसिद्ध दंडविधान ग्रंथ "दी इंडियन पीनल कोड" की पांडुलिपि इन्ही ने तैयार की थी। अंग्रेजी को भारत की सरकारी भाषा तथा शिक्षा का माध्यम और यूरोपीय साहित्य, दर्शन तथा विज्ञान को भारतीय शिक्षा का लक्ष्य बनाने में इनका बड़ा हाथ था। भारत मे नौकर उत्पन्न करने का कारखना खोला जिसे हम school , college , university कहतें हैं ।ये आज भी हमारे समाज हर साल लाखों के संख्या में देश मे नौकर उत्पन्न करता है जिसके कारण देश मे बेरोजगारी की सबसे बड़ी समस्या उत्पन्न हुुुई जो आज पूरे देश मे महामारी की तरह फैल रही है। भारत की बेरोजगारी की बजह भारत की राजनीति को जाता है भारत मे इस समय बेरोजगारी,आर्थिक व्यवस्था चरम सीमा पर पहुंच गयी हैं भारत की समस्या पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है सबसे बड़ी समस्या ये है कि इन्होने भारत की भाषा हिंदी को ही बदल के सरकारी जगहों पर अंग्रेजी को लागू कर दिया जो अब भी हर जगह मौजूद हैं।

थॉमस मैकाले





सुशील शर्मा होने का मतलब 🙏🙏 / विवेक शुक्ला

🙏🙏 सुशील शर्मा होने का मतलब/ विवेक शुक्ला



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यह नामुमकिन था कि आप सुशील शर्मा से मिलें और उनकी शानदार पर्सनेल्टी, ज्ञान और किस्सागोई से प्रभावित ना हों। वे पहली मुलाकात के बाद आपके जीवनभर के दोस्त बन जाते थे। धारा प्रवाह हिन्दी, उड़िया, मारवाड़ी, अंग्रेजी और गुजारे लायक हरियाणवी और पंजाबी बोलने वाले सुशील शर्मा थोड़ी देर से मीडिया की नौकरी करने लगे थे। वे हिन्दुस्तान अखबार से 1986 में जुड़े थे। पर इससे पहले वे आकाशवाणी में समाचारवाचक बन चुके थे। वे तब फरीदाबाद की आयशर कंपनी में काम करते थे।


हिन्दुस्तान टाइम्स हाउस आते ही वे मालकिन शोभना भरतिया और ईपी नरेश मोहन जी के करीबी हो गए थे। दरअसल सुशील शर्मा को हिन्दुस्तान टाइम्स की तरफ से आयोजित एक संगीत संध्या के कार्यक्रम के संचालन का मौका मिला। जिस शख्स को उसे संचालित करना था वह अंतिम समय में नहीं आया तो यह जिम्मेदारी सुशील को मिल गई। उस मौके को उसने छोड़ा नहीं। उसके पास शब्दों का भंडार था। वह उस्ताद जाकिर हुसैन का कार्यक्रम था। पहली बार में ही सुशील ने अपनी छाप छोड़ दी। फिर तो वे लगातार इन संगीत आयोजनों का संचालन करने लगे। यह 1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक के शुरू की बातें हैं।


इसके साथ ही सुशील डेस्क पर बेहतरीन काम करके सबको अपनी तरफ आकर्षित कर ही रहे थे। सिद्दातों पर वे किसी से भी  पंगा ले लेते थे। उनकी सारी शख्सियत कॉफिडेंस से लबरेज थी। डेस्क पर कई वर्षों तक रहने के बाद वे ब्यूरो में आए। यहां पर उन्हें डिफेंस बीट भी मिली। इसने उनके जीवन की धारा ही बदल दी। फिर तो वे सुबह-शाम भारत की रक्षा और समर नीति का गहन अध्ययन करने लगे। इन विषयों की किताबें वे खरीद कर पढ़ते। उनकी निजी लाइब्रेयरी में इन विषयों की सैकडों किताबें हैं। 

सेना के दर्जनों आला अफसर उनके करीबी हो गए। यूपीए दौर के रक्षा मंत्री ए.के.एंटनी बिना सुशील शर्मा के कोई संवाददाता  सम्मेलन नहीं करते। संवाददाता सम्मेल में वे दो-तीन सवाल अवश्य पूछते । उनके सवालों की गहराई स पता चलता था कि सवाल पूछने वाला इंसान गंभीर पत्रकार है। उसे खारिज करना सही नहीं होगा।


हिन्दुस्तान की नौकरी से मुक्त हुए तो उन्होंने  रक्षा मामलों की एक स्तरीय पत्रिका निकालनी शुरू कर दी। उसमें उनके दो-तीन पुराने संपादक भी नौकरी करते थे। वे अनेक मित्रों को काम देते. पत्रिका के कंटेट की खूब चर्चा होने लगी। उसे भरपूर एड भी मिलता।  Sushil Sharma का अब इरादा था डिफेंस सेक्टर का एक टीवी चैनल शुरू करने का। पर इससे पहले कि वे अपना चैनल शुरू कर पाते वे बीते दिनों संसार से विदा हो गए। उनके जैसे जिंदा दिल इंसान अब कहाँ मिलेंगे!

महान संभावनाओं से भरे जीवन को यूं न गवाएं -प्रो. संजय द्विवेदी

 बनिए समाज के कर्मयोगी, / संजय द्विवेदी 


      कर्म की महत्ता अनंत है। हमारी परंपरा इसे ‘कर्मयोग’ कहकर संबोधित करती है। हताश, निराश, अवसाद से घिरे वीरवर अर्जुन को महाभारत के युद्ध में योगेश्वर कृष्ण इसी कर्मयोग का उपदेश देते हैं। इसके बाद अर्जुन में जो सकारात्मक परिर्वतन आते हैं, उसे हम सब जानते हैं। हमारे देश में कर्मयोग की साधना करने वाले अनेक महापुरूष हुए हैं। कम आयु पाकर भी सिद्ध हो जाने वाले जगद्गुरू शंकराचार्य और स्वामी विवेकानंद का कृतित्व भी हमें पता है। संकल्प के धनी, परिस्थितियों को धता बताकर अपने जीवन लक्ष्यों को पाने वाले भी अनेक हैं। गुलाम भारत में भी ऐसी प्रतिभाओं ने अपने सपनों को मरने नहीं दिया और आगे आए। जिंदगी में असंभव स्वप्न देखे और पूरे किए। देश की आजादी का सपना देखने वालों में ऐसे तमाम योद्धा थे, जिन्हें पता नहीं था कि ये जंग कब तक चलेगी, पर वे जीते। भारत से अंग्रेजी राज का सूर्यास्त हो गया।

वे जूझते हैं ताकि हम रहें खुशहालः

       मनुष्य का सारा जीवन इसी कर्मयोग का उदाहरण है। कर्तव्यबोध से भरे हुए लोग ही समाज का नेतृत्व करते हैं। उनकी कर्मठता,समर्पण से ही यह पृथ्वी सुखों का सागर बन जाती है। स्वयं को झोंककर नए-नए अविष्कार करने वाले वैज्ञानिक, सीमा पर डटे जवान, विपरीत स्थितियों में खेतों में जुटे किसान,आर्थिक गतिविधियों में लगे व्यापार उद्योग के लोग, मीडियाकर्मी, मेडिकल और स्वास्थ्य सेवाओं में लगे लोग ऐसे न जाने कितने क्षेत्र हैं, जहां लोगों ने खुद को झोंक रखा है ताकि हमारी जिंदगी खुशहाल रहे। कोई भी व्यक्ति कर्म से अलग होकर नहीं रह सकता। सोते-जागते, उठते बैठते, यहां तक कि सांस लेते हुए वह कर्म करता है। कर्मशील व्यक्ति वर्तमान को पहचानता है। उसका उपयोग करता है। श्रद्धा, आस्था और लगन से किया गया हर कार्य पूजा बन जाता है। जैसे हम कहते हैं कि उन डाक्टर साहब के हाथ में यश है। जादू है। वह कोई जादू नहीं है। उन्होंने लगन और निष्ठा से अपने काम में सिद्धि प्राप्त कर ली है।

सिद्ध कारीगरों से भरे थे हमारे गांवः

    एक समय में हमारे गांव भी ऐसे सिद्धों से भरे हुए थे। गहरी कलात्मकता, आंतरिक गुणों के आधार हमारे गांव कलाकारों, कारीगरों से भरे थे। जो समाज के उपयोग की चीजें बनाते थे, समाज उनका संरक्षण करता था। श्री धर्मपाल ने अपने लेखन में ऐसे समृद्ध गांवों का वर्णन किया है। जो समृध्दि से भरे थे, आत्मनिर्भर भी। इसके पीछे था ग्रामीण भारत में छिपा कर्मयोग। उनके मन में रची-बसी ‘गीता’। इन्हीं जागरूक भारतीय कारीगरों, कर्मठता से भरे कलाकारों ने भारत को विश्वगुरू बनाया था। कबीर अपने समय के लोकप्रिय कवि, समाजसुधारक हैं, पर वे भी कर्मयोगी हैं। वे अपना मूल काम नहीं छोड़ते। झीनी-झीनी चादर भी बीनते रहे। संत रैदास भी सिद्धि प्राप्त कर अपना काम करते रहे। यहां ज्ञान के साथ कर्म संयुक्त था। इसलिए गुरूकुल परंपरा में वहां की सारी व्यवस्थाएं छात्र खुद संभालते हैं। कर्मयोग और ज्ञानयोग की शिक्षा उन्हें साथ मिलती है। उनकी ज्ञान पिपासा उन्हें कर्म से विरत नहीं करती। वहां राजपुत्र भी सन्यासी वेश में रहते हैं और गुरू आज्ञानुसार लकड़ी काटने से लेकर भिक्षा मांगने, खेती-बागवानी का काम करते हुए जीवन युद्ध के लिए तैयार होते हैं। जमीन हकीकतें उन्हें योग्य बनाती हैं,गढ़ती हैं। वहां राजपुत्रों के फाइव स्टार स्कूल नहीं हैं। आश्रम ही हैं। समान व्यवस्था है। गीता में इसीलिए कृष्ण कहते हैं-

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।

मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥

       महात्मा गांधी इसी कर्मयोग को बुनियादी शिक्षा के माध्यम से जोड़ना चाहते थे। लंबे समय के बाद आई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में एक बार फिर कौशल आधारित शिक्षा की बात कही जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कर्मयोग की बात कर रहे हैं और केंद्र सरकार ने मिशन कर्मयोगी के माध्यम से अपने अधिकारियों को और भी अधिक रचनात्मक, सृजनात्मक, विचारशील, नवाचारी, अधिक क्रियाशील, प्रगतिशील, ऊर्जावान, सक्षम, पारदर्शी और प्रौद्योगिकी समर्थ बनाते हुए भविष्य के लिये तैयार करने का लक्ष्य तय किया है। यह लक्ष्य तभी पूरा होगा जब हर भारतवासी अपने कर्मपथ पर आगे बढ़े। सही मायनों में व्यक्ति को कर्मभोगी नहीं, कर्मयोगी बनना चाहिए। इसके मायने हैं कि कोई भी छोटा से छोटा काम भी इतनी गुणवत्ता से किया जाए कि वह उदाहरण बन जाए। खास बन जाए। आपका हर कार्य कर्ता की ईमानदारी का साक्षी बन जाए।

छोटी शुरूआत के बड़े मायनेः

        हर काम जिंदगी में महान संभावनाएं लेकर आता है। छोटे से बीज से ही विशाल वृक्ष बनते हैं और देते हैं हमें ढेर सी आक्सीजन, छाया और फल। कर्मवीर इसीलिए अपने काम को ही जीवन का आधार मानते हैं। एक संत कहा करते थे-“हे कार्य! तुम्हीं मेरी कामना हो, तुम्हीं मेरी प्रसन्नता हो, तुम्हीं मेरा आनंद हो।” हमारी जिंदगी में कई बार ऐसा लगता है कि यह काम छोटा है, मेरे व्यक्तित्व के अनुकूल नहीं है। हमें सोचना चाहिए कि जब कोई नदी अपने उद्गम से निकलती है तो वह बहुत छोटी होती है। एक पेड़ जो अपनी विशालता से आकर्षित करता है, अनेक पक्षियों का बसेरा होता है, वह भी आरंभ में एक बीज ही रहता है। एक बहुमूल्य मोती अपने प्रारंभ में बालू का कण ही होता है। हमने अनेक महापुरूषों के बारे में सुना है कि उन्होंने जीवन का आरंभ किस काम से किया। छोटी शुरूआत के मायने ठहरना नहीं है,यात्रा का आरंभ है। थामस अल्वा एडीशन वैज्ञानिक बनना चाहते थे, किंतु उनके अध्यापक ने उन्हें घर में झाड़ू लगाने का काम दिया। किंतु जब उन्होंने देखा कि इस बालक में गहरी प्रतिभा है तो उन्होंने उसे विज्ञान की शिक्षा देनी आरंभ की। बाद में थामस एक महान वैज्ञानिक बने। इस बात को याद रखिए सफलतम लोगों का जीवन प्रायः उन कामों से प्रारंभ होता है, जिन्हें हम मामूली समझकर छोड़ देते हैं। कोई भी व्यक्ति जब खुद को कर्म, परिश्रम और पुरूषार्थ की आग में तपाता है तो वह कुंदन(सोने) की तरह चमकने लगता है। उसके आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।बाधाएं उसे सफलता के रहस्य और मार्ग बताती हैं। सूरज, चांद, तारे, नदियां, पेड़-पौधे सब अपना काम नियमित करते हैं। हम एक सचेतन मनुष्य होकर किसकी प्रतीक्षा में हैं। इसी भाव से गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा था-

करम प्रधान विश्व रचि राखा,

जो जस करहि सो तस फल चाखा।

सकल पदारथ है जग मांही

करमहीन नर पावत नाहीं।

    कठिन से कठिन परिस्थितियों में हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। अमरीका के टेनेसी में रहने वाली चार साल की लड़की के पैरों को लकवा मार जाता है। वो हिम्मत से जूझती है। चलने की जगह दौड़ने का अभ्यास करने लगी। ऐसा समय भी आया जब वह ओलंपिक में शामिल होकर तीन पदक जीते।वह लड़की थी गोल्डीन रूलाफ, जो आज भी प्रेरणा देती है।

आत्मविश्वास, आत्मबल और आत्मनिर्भरता हैं मंत्रः

         कर्मयोगी बनना है तो आत्मविश्वास, आत्मबल और आत्मनिर्भरता को साधना होगा। इन तीन मंत्रों को साधकर ही हम जिंदगी की हर जंग जीत सकते हैं। निडर होकर सिद्धांतों पर अडिग रहते हुए, समाजहितों में लगे रहनेवाली दृढ़ता आत्मबल से आती है। सफलता के सबसे जरूरी है आत्मविश्वास। स्वामी विवेकानंद कहते थे- “आत्मविश्वास जैसा कोई मित्र नहीं है। आत्मविश्वास के कारण बाधाएं भी मंजिल पर पहुंचाने वाली सीढ़ियां बन जाती हैं।” हमने राजस्थान के राणा सांगा का नाम जरूर सुना होगा। वे 80 धाव होने पर भी युद्ध में जूझते रहे। ऐसी ही कहानी है इंग्लैंड के वेल्स की । वो बहुत दुबला पर सेना में शामिल हुआ। एक युद्ध में दाहिना हाथ कट गया, दूसरे युद्ध में आंख चली गई। सरकार ने उसे दिव्यांगों की पेंशन देनी चाही किंतु उसने  मना कर दिया। उसके बाद भी उसने कई युध्दों में भाग लिया। हर स्थिति में न झुकने वालों में वेल्स का नाम लिया जाता है। वेल्स कहते थेः “कायर एक बार जीता और बार-बार मरता है, लेकिन जिसके पास आत्मविश्वास है, वो एक बार ही जन्म लेता है और एक बार ही मरता है।” तीसरी खास चीज है आत्मनिर्भरता। मनोविज्ञान हमें बताता है, जब तक आप दूसरों पर निर्भर हैं, आप धोखे में हैं। सच तो यह है कि हर संकट से जूझने की चाबी आपके पास है।जीवन में सफलता पाने के लिए हमें अपने सपनों, आकांक्षाओं के साथ अपनी योग्यताओं में वृध्दि करना प्रारंभ कर देना चाहिए। इससे न सिर्फ हमें सफलता मिलेगी, तनावों से मुक्ति मिलेगी बल्कि शांति, संतोष और सुखद जीवन भी प्राप्त होगा। आइए आज से ही निष्काम कर्मयोग की यात्रा पर निकलते हैं। तय मानिए एक सुंदर दुनिया बनेगी और जिंदगी मुस्कराएगी।

(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के महानिदेशक हैं)

कमलदास की आत्मकथा, जिसने भारत में हंगामा बरपा दिया

 आत्मकथा जिसने भारत भर में हंगामा बरपा दिया


रेहान फ़ज़ल 


"आसान है एक मर्द की तलाश जो तुम्हें प्यार करे,


बस, तुम ईमानदार रहो कि एक औरत के रूप में तुम चाहती क्या हो.


उसे सब सौंप दो,


वह सब जो तुम्हें औरत बनाती है


बड़े बालों की ख़ुशबू,


स्तनों के बीच की कस्तूरी,


और तुम्हारी वो सब स्त्री भूख."


कमला दास ने जब ये कविता लिखी थी तो उन्होंने परंपरागत पुरुष समाज को झकझोर कर रख दिया था और उन्होंने सोचा था कि कोई लेखिका अपनी कविताओं में इतनी बेबाक और ईमानदार कैसे हो सकती है!


भारतीय साहित्य में अगर कमला दास जैसी लेखिकाएं नहीं होतीं तो आधुनिक भारतीय लेखन की वो तस्वीर उभर कर सामने नहीं आती जिस पर आज का समूचा स्त्री विमर्श गर्व करता है.


एक साधारण गृहस्थ महिला जब अपनी भावनाओं को अपनी पूरी ताकत और साहस के साथ कागज़ पर उतारती है तो साहित्य की दुनिया में तहलका मच जाता है. कमला दास के साथ ऐसा ही हुआ था.

उनका जन्म आज़ादी से तेरह साल पहले 1934 में केरल के साहित्यिक परिवार में हुआ था. छह वर्ष की आयु में ही उन्होंने कविताएं लिखना शुरू कर दिया था.


अपनी आत्मकथा, 'माई स्टोरी' में कमला दास लिखती हैं, "एक बार गवर्नर की पत्नी मैविस कैसी हमारे स्कूल आईं. मैंने इस मौके पर एक कविता लिखी लेकिन हमारी प्रिंसिपल ने वो कविता एक अंग्रेज़ लड़की शर्ली से पढ़वाई. इसके बाद गवर्नर की पत्नी ने शर्ली को अपनी गोद में बैठा कर कहा कि तुम कितना अच्छा लिखती हो! मैं दरवाज़े के पीछे खड़ी वो सब सुन रही थी."


"इतना ही नहीं गवर्नर की पत्नी ने शर्ली के दोनों गालों पर चुंबन लिए और उनकी देखादेखी हमारी प्रिंसिपल ने भी मेरी आखों के सामने उसको चूमा. पिछले साल मैंने लंदन के रॉयल फ़ेस्टिवल हॉल में अपनी कविताओं का पाठ किया. आठ बजे से ग्यारह बजे तक मैं मंच पर थी. जब मैं स्टेज से नीचे उतरी तो कई अंग्रेज़ों ने आगे बढ़ कर मेरे गालों को चूम लिया. मेरे मन में आया कि शर्ली, मैंने तुमसे अपना बदला ले लिया."


मात्र 15 वर्ष की आयु में कमला दास का विवाह रिज़र्व बैंक के एक अधिकारी माधव दास से हो गया.


दिलचस्प बात ये थी कि निजी ज़िंदगी में कमला दास की छवि एक परंपरागत महिला के रूप में उभर कर आती है, जबकि उनकी आत्मकथा इसका ठीक विपरीत रूप प्रस्तुत करती है.


उनके छोटे बेटे जयसूर्या दास, जो इस समय पुणे में रहते हैं, बताते हैं, "मेरी मां एक सामान्य इंसान थीं. अक्सर साड़ी पहनती थीं. कभी कभी वो लुंगी भी पहना करती थीं. उनको आभूषण पहनने का बहुत शौक था. वो अपने हाथ में 36 चूडियाँ पहनती थीं-18 दाहिने हाथ में 18 बाएं हाथ में. काफी भावनाप्रधान महिला थीं. दिन में दो बार नहाती थीं और परफ़्यूम की जगह अपनी पानी की बाल्टी में इत्र डालती थीं."


मैंने उनके बड़े बेटे माधव नलपत जो इस समय 'संडे गार्डियन' के संपादकीय निदेशक हैं, से पूछा कि क्या कमला दास आपके लिए एक कड़ी माँ थीं?


नलपत का जवाब था, "बिल्कुल नहीं. एक बार जब मैं 12-13 साल का था तो मैंने उनसे कहा कि मैं सिगरेट पीना चाहता हूँ. माँ ने तुरंत एक सिगरेट का पैकट मुझे पकड़ा दिया. मैंने उस समय तो चार पांच सिगरेटें पी लीं, लेकिन इसके बाद मैंने पूरी ज़िंदगी सिगरेट को कभी हाथ नहीं लगाया. अगर मेरी माँ कहती कि सिगरेट पीना बुरी बात है तो मुझमें उसे चोरी छिपे पीने की इच्छा जागती और हो सकता था कि मुझे उसकी लत लग जाती. लेकिन मेरी माँ ने मुझसे स्पष्ट कहा कि सिगरेट पीने का तुम भी अनुभव करो और अगर ठीक लगता है तो तुम इसे पीना जारी रखो."


अपने इन्हीं बेटे माधव यानि मोनू के किशोर प्रेम का ज़िक्र कमला दास अपनी आत्मकथा 'माई स्टोरी' में करती हैं.


वो लिखती हैं, "एक बार मेरे 15 साल के बेटे ने अचानक मुझसे कहा कि उसे एक लड़की से प्यार हो गया है. वो एक जर्मन लड़की थी जिसका नाम अना था. वो हमारे घर की छत पर फ़्रेंच साहित्य और मार्क्स पर बातें किया करते थे. एक बार जब वो छुट्टियों में कोलकाता गई तो मेरे बेटे ने भी कहा कि वो भी कोलकाता जाना चाहता है. मेरे पति ने कहा कि उनके पास इस तरह के बचकाने प्यार पर बरबाद करने के लिए फ़िज़ूल के पैसे नहीं हैं.


माधव बताते हैं कि ट्रेन के किराये के लिए पैसा जमा करने के लिए उन्होंने अपने सारे पुराने कॉमिक बेच डाले. तब भी वो तीसरे दर्जे का ही टिकट ख़रीद पाए.


उनके पास कोई न तो कोई बिस्तर था और न ही कोई ऊनी कपड़े. रास्ते में एक मज़दूर ने उन पर दया कर उन्हें एक बीड़ी दी ताकि वो थोड़ी गर्मी महसूस कर सकें.


कमला दास लिखती हैं, "उस लड़की के प्रेम में पड़ कर मेरा बेटा बौद्धिक बन गया. वो देर रात तक पढ़ता और भारतीय राजनीति पर लेख लिखता जिसे उस ज़माने की कुछ पत्रिकाएं छापने भी लगी थीं. जब मेरे पति का मुंबई तबादला हुआ तो मेरे बेटे का दिल टूट गया. लेकिन उस लड़की ने उसे परिपक्वता दी वो उसके जीवन का अंग बन गई."


कमला दास लिखती हैं, "मैं और मेरा बेटा शाम को मुंबई के समुद्र तट पर टहला करते थे. एक बंगाली परिवार को ये ग़लतफ़हमी हो गई कि हम दोनों प्रेमी हैं. वो लंबा हो गया था और हमें देख कर कोई नहीं कह सकता था कि हम माँ बेटे हैं."


उस ज़माने में कमला दास की कविताएं भारत की मशहूर साप्ताहिक पत्रिका 'इलेस्ट्रेटेड वीकली ऑफ़ इंडिया' में छपा करती थीं.


कवि के नाम के नीचे 'के दास' लिखा रहता था क्योंकि कमला दास को डर था कि उसके संपादक शॉन मैंडी कवयित्रियों के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त होंगे.


कमला दास न सिर्फ़ खुद एक बड़ी कवि थीं, वो कई उभरते हुए कवियों को प्रोत्साहित भी किया करती थीं. उनमें से एक थे रणधीर खरे.


खरे बताते हैं, "उन दिनों मैं 24-25 साल का हुआ करता था और कविताएं लिखता था. मैं कई बड़े कवियों के पास गया कि वो मुझे सलाह दें कि मैं कैसे बेहतर कविताएं लिखूँ. किसी ने मुझे कोई समय नहीं दिया. तभी किसी ने मुझे कमला दास का नाम सुझाया. मैंने जब उन्हें फ़ोन किया तो उन्होंने खुद ही फ़ोन उठाया और मुझे अपनी सारी कविताओं के साथ अपने घर आमंत्रित कर दिया.


"वहाँ उन्होंने एक एक कर मेरी चालीस कविताएं सुनीं. जब मैंने उनसे पूछा कि आपको वो कैसी लगीं तो उनका जवाब था कि मेरे अच्छा लगने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता. वो कविताएं तुम्हें खुद को अच्छी लगनी चाहिए. इसके बाद उन्होंने मुझे अपने घर होने वाली कवियों की साप्ताहिक बैठक में आमंत्रित कर लिया. तब से लेकर जब तक वो जीवित रहीं, मेरी गुरु रहीं."


उन दिनों कमला दास के घर में हर सप्ताह एक गोष्ठी होती थी जिसमें शहर के नामी- गिरामी लेखक, कवि, नर्तक और थिएटर से जुड़े लोग एकत्रित होते थे. रणधीर खरे बताते हैं, "उनका एक बड़ा सा कमरा था जिसके एक कोने में वो चुपचाप बैठी रहती थीं. निसीम इज़कील आते थे, प्रीतीश नंदी मौजूद रहते थे और बहुत बुज़ुर्ग हरेंद्रनाथ चटोपाध्याय भी हाज़िरी लगाते थे. वहाँ कवियों में आपस में झगड़ा भी हो जाता था. ये बैठक दिन में तीन चार बजे से शुरू हो कर देर रात तक चलती थी. जितने लोग भी वहाँ पहुते थे उनको लगता था कि वो अपने घर आ रहे हैं.


कमला दास का मानना था कि पूरी ईमानदारी के साथ आत्मकथा लिखना और कुछ भी नहीं छिपाना, एक प्रकार से एक एक कर अपने कपड़े उतारने जैसा काम है- यानि 'स्ट्रिप्टीज़.'


एक बार उन्होंने लिखा था, "मैं सबसे पहले अपने कपड़े और गहने उतार कर रख दूंगी. फिर मेरी इच्छा है कि मैं इस हल्की भूरी त्वचा के छिलके उतार कर रख दूँ और फिर अपनी अस्थियों को चकनाचूर कर डालूँ. आखिर में आप मेरी बेघर, अनाथ और बहुत ही सुंदर उस आत्मा को देख सकेंगे जो अस्थियों और माँस-मज्जा के कहीं बहुत गहरे भीतर तक धँसी हुई है."


कुछ इसी तरह की भावनाओं को कमला दास ने एक कविता में भी पिरोया था-


जब कभी निराशा की नौका,


तुम्हें ठेल कर अंधेरे कगारों तक ले जाती है.


तो उन कगारों पर तैनात पहरेदार,


पहले तो तुम्हें निर्वसन होने का आदेश देते हैं.


तुम कपड़े उतार देते हो,


तो वो कहते हैं, अपना मांस भी उघाड़ो.


और तुम त्वचा के साथ अपना मांस भी उघाड़ देते हो,


फिर वो कहते हैं कि हड्डियाँ तक उघाड़ दो,


और तब तुम अपना मांस नोच नोच फेंकने लगते हो,


जब तक कि हड्डियाँ पूरी तरह से नंगी नहीं हो जातीं.


उन्माद के इस देश का तो एक मात्र नियम है उन्मुक्तता,


और वो उन्मुक्त हो,


न केवल तुम्हारा शरीर,


बल्कि आत्मा तक कुतर कुतर खा डालते हैं.


कमला दास ने 1999 में अचानक धर्मांतरण कर इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया. बाद में अभिव्यक्ति की मांग को लेकर कट्टर मुल्लाओं से भी उनकी ठनी.


अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले उन्होंने दिल्ली में एक मार्मिक संस्मरण सुनाया था.


उन्होंने बताया कि अपने पति की मौत के बाद अपने तीन बेटों के होने के बावजूद वो लगातार एकाकी होती चली गईं.


उनके दिल में मरने की इच्छा जागी तो वो बुर्का पहन कर एक पेशेवर हत्यारे के पास पहुंच गईं. उन्होंने उससे पूछा कि क्या तुम पैसे लेकर लोगों को ख़त्म करने का काम करते हो?


गुंडे ने पूछा किस को ख़त्म करना है? कमला ने कहा, 'मुझे, क्योंकि मैं जीवन से उकता गई हूँ लेकिन अपने हाथों अपने को मारने की हिम्मत नहीं जुटा पाती.'


गुंडा स्तब्ध हो कर कमला दास को ताकता रहा और फिर उन्हें समझा बुझा कर उन्हें वापस घर छोड़ गया.


जब उनकी आत्मकथा पर बहुत बवाल हुआ तो उन्होंने कह दिया कि वो सच्ची कहानी नहीं है. मैंने कमला दास को नज़दीक से जानने वाले रणधीर खरे से पूछा कि आपकी नज़र में 'माई स्टोरी' एक वास्तविक कहानी थी या सिर्फ़ कल्पना की उड़ान?


रणधीर खरे का जवाब था, "मैं पुणे के वाडिया कालेज में एमए के छात्रों का पढ़ाया करता था. एक बार उन्होंने भी मुझसे वही सवाल पूछा जो आप पूछ रहे हैं. मैं सारे चालीस छात्रों को उनके बेटे जयसूर्या दास के यहाँ ले गया, जहाँ वो ठहरी हुई थीं. इस सवाल के जवाब में कमला दास ने कहा कि जो कुछ भी हम लिखते हैं, उसमें एक रचनात्मकता होती है. कहाँ वास्तिवकता आती है और कहाँ कल्पनाशीलता, इससे आप को कोई फ़र्क नहीं पड़ना चाहिए. ये देखना चाहिए कि वो चीज़ हमें छू रही है या नहीं. हमें इससे प्रेरणा मिल रही है या ये हमें हिला रही है या नहीं. बाकी सब बातें बेमानी हैं."

मोदी- ममता अंतर्विरोध के मायने / उर्मिलेश

 पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री के बीच राजनैतिक कारणों से टकराव या आपसी मतभेद की बात समझी जा सकती है. लेकिन समझ में नही आया कि केंद्र ने बंगाल के मुख्य सचिव Alapan Bandopadyay पर क्यों गाज गिराई?

उनका क्या कसूर था? वैसे भी उनकी सेवा के महज़ तीन महीने बचे हैं और वह भी छह-सात दिनों पहले ही केद्र ने उनके तीन माह के सेवा विस्तार का प्रस्ताव मंजूर किया था. चलिये, ये सब तो प्रशासकीय और तकनीकी मसले हैं. लेकिन इस प्रकरण से कुछ मानवीय पहलू भी जुड़े हुए हैं. 

इसी महीने मुख्य सचिव Alapan Bandopadyay के छोटे भाई Anjan Bandopadyay का कोविड-19 के संक्रमण के चलते दुखद निधन हुआ है. Anjan एक जाने-माने बांग्ला पत्रकार और टीवी एंकर थे. वह कुछ समय दिल्ली मे भी रहे. मुख्य सचिव का पूरा परिवार इस वक़्त शोक-संतप्त है. 

यही नहीं, Mamta Banarjee के छोटे भाई असीम बनर्जी का भी इसी महीने निधन हो गया. पिछले महीने वह कोविड-19 से संक्रमित हुए थे. एक निजी अस्पताल में भर्ती थे. ममता बनर्जी और उनके परिवार के लिए भी बड़ा शोक है.

मुझे लगता है, महामारी और ऊपर से तूफान की मार झेलते बंगाल में ऐसे राजनीतिक टकराव की इस वक्त  बिल्कुल जरुरत नहीं थी. इसके उलट पूरे सूबे के प्रति सदाशयता और राज्य की दोनों बड़ी शख्सियतो के प्रति इस वक़्त तनिक सहानुभूति की अपेक्षा थी. 

केंद्र के मौजूदा राजनीतिक संचालकों को इस बारे में जरूर सोचना चाहिए. हर समय टकराव ठीक नहीं! चुनाव बीत गया, अब शासन-प्रशासन के मामलें में केंद्र और राज्य के बीच अच्छा समन्वय होना चाहिए न कि झगड़ा-रगड़ा!

वक़्त हो तो कमेंट बाक्स में जाकर इस वीडियो पर नज़र डाल सकते हैं:

उर्मिलेश 

रविवार, 30 मई 2021

शोले बनाम जय संतोषी माँ : धन कुबेर सिनेमा

 1975 में आज ही के दिन बॉलीवुड की एक फ़िल्म रिलीज़ हुई थी, नाम था जय संतोषी माँ।


प्रस्तुति - रेणु दत्ता /  आशा सिन्हा 


15 लाख की लागत से बनी इस फ़िल्म नें बॉक्स ऑफिस पर उस वक्त के भारत मे पाँच से छः करोड़ रुपए कमाए थे। अपने समय में ये शोले के बाद सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी। इस फ़िल्म को देखने के लिए लोग सिनेमा हॉल तक बैलगाड़ियों में मीलों की यात्रा करते थे।  


दर्शक हॉल की सिनेमा स्क्रीन पर फूल औऱ सिक्के फेंकते थे। कई सारे थिएटर, जहां ये फ़िल्म लगी थी, मन्दिर कहलाये जाने लगे थे।  फ़िल्म देखने आने वाले लोग थिएटर के बाहर जूते चप्पल उतारते थे। उस वक्त के कई छोटे सिनेमा हॉल के मालिको नें पैसे कमाने के लिए थिएटर के बाहर दान पेटियाँ तक रखवा दी थी।


दिलचस्प बात ये है कि सन 1975 में जब ये फ़िल्म रिलीज़ हुई थी तो उससे पहले ज्यादातर लोगों ने इस देवी के बारे में सुना तक नहीं था। सन्तोषी माता का जिक्र पुराणों में कहीं भी नहीं है। सन्तोषी माता दरअसल भारत के कुछ गांवों में पूजी जाने वाली ग्राम देवी थी जिनकी मान्यता रोगों के उपचार के लिए थी। 


सम्भवतः सन 1960 में भीलवाड़ा में सन्तोषी माता का पहला मन्दिर बना था, जो कुछ हद तक प्रचलित था। इसके अलावा उनके कुछ छोटे छोटे मन्दिर रहे होंगे, पर वो आबादी के बहुत ही छोटे हिस्से तक सीमित थे। 


लेकिन बॉलीवुड ने ग्राम देवी संतोषी माता को देश के हर कोने में घर घर तक पहुंचा दिया। बॉलीवुड ने सन्तोषी माता को पौराणिक देवियों के समकक्ष लाकर खड़ा कर दिया। ये हैं बॉलीवुड की ताकत। ये कहानी उनके लिए है जिन्हें लगता है जिन्हें लगता है बॉलीवुड में कुछ भी होता रहे, इसका समाज पर कोई फर्क नहीं पड़ता। 


भारत में दैवीय कथाएँ और कहानियां मौजूद है जो कभी भी इतिहास भूगोल या समय के बंधन में बंधी हुई नहीं रही हैं।यहाँ एकमात्र सच लोगों का विश्वास है। विश्वास को ही सच माना जाता है औऱ इसके लिए किसी सबूत या गवाह की आवश्यकता नहीं पड़ती। 


अपनस्टैंडअप कॉमेडी, रैप बैटल औऱ बुध्दिजीवी बनने की होड़ में अपने ही धर्म, धर्म ग्रंथों  देवी देवताओं का मजाक उड़ाने वाली युवा हिन्दू कूलडुडों की एक बडी फौज जो हम आज देख रहे हैं वो बॉलीवुड ने ही पिछले 20-30 सालों में खड़ी की है। आज बच्चे वो फिल्में और वेबसीरीज़ देखकर बड़े हो रहे है जिनमें बहुत ही शातिर तरीके से इनमें देवी देवताओं को निशाना बनाया जाता है।


इनमें भद्दी पंक्तियों औऱ हास्य से भरे फूहड़ डॉयलॉग्स की भरमार है लेकिन फिर भी ये फिल्में, ये वेबसीरीज़ हिट होती हैं। आप जितना विरोध करेंगे, उतना ही इनको फायदा होगा। आप विरोध नहीं करेंगे तो तो आपके बच्चे अपनी जड़ों से दूर होते चले जाएंगे। दरअसल ये मकड़जाल है, जितना आप हाथ पैर हिलायेंगे, आपके बच्चे उतना ही ज्यादा इसमें फंसते चले जाएँगे।


अचानक से फिल्मों में नास्तिक हीरो की इंट्री औऱ गुलशन कुमार की हत्या असल मे लोगों के भीतर से इसी विश्वास को नष्ट करने की मुहिम थी। चर्च पोषित बॉलीवुड अपनी मुहीम में काफी हद तक सफल हुआ है। 30 साल से कम उम्र के युवाओं को अपने धर्म, अपने देवी-देवताओं, उनसे जुड़ी कहानियों औऱ अपने गुमनाम मंदिरों को जानने की कोई उत्सुकता नहीं है।


बॉलीवुड ने ही आज की युवा पीढ़ी के मन से वो विश्वास ही खत्म कर दिया है जो विश्वास सन 1975 में एक ग्राम देवी को पौराणिक देवियों के समानांतर लाकर खड़ा कर देता है ।

सामने की बालकनी के कुछ नोट्स / रवीश कुमार

 सामने की बालकनी के कुछ नोट्स / रवीश कुमार



वह बालकनी में एक ही बार आती है। बड़ी सी बाल्टी लेकर जिसमें उसके संसार के धुले कपड़े हैं। उसने पसारने का समय तय कर लिया है। उसी के बीच उसे कपड़े पसारने हैं। वह खड़े खड़े दौड़ रही है। बाल्टी की तरफ इस आस में झुकती है कि हल्के कपड़े ही निकलेंगे। बच्चे के छोटे कपड़े हाथ लगते ही खिल जाती है। उन्हें इस तरह झाड़ कर पसारती है जैसे कोई उस्ताद संगीत की साधना में खो जाने से पहले अपनी उंगलियों को वाद्य यंत्र पर यूं ही दौड़ा देता है और श्रोता झूम उठते हैं। इस बार कोई भारी कपड़ा हाथ लगा है। उसकी चाल बदल गई है। उसने अपने पूरे शरीर को जुटा लिया है। हर कोने से शक्ति मंगा कर दोनों हाथों में फैला दी गई है। ज़ोर से उस भारी कपड़े को झटकती है। पसारने के बाद अपने ललाट को पोंछ रही है। भारी कपड़े को पसारना कई कामों के बीच एक बड़ा काम पूरा करने जैसा है। हल्के कपड़े उसे ब्रेक की तरह लगते हैं। अब उसने सारे कपड़ों को पसार दिया है। इस बीच पास खेलते बच्चे पर भी नज़र है। उसे भी पकड़ते रहती है। यह काम ख़त्म हो चुका है। उसने एक बार भी अपनी बालकनी में खड़े होकर आसमान की तरफ नहीं देखा है। वहां से गुज़रती हवा को महसूस करने की कोशिश नहीं की है। दिन या रात को देखने की कोशिश नहीं की है। अब वह जा रही है। जाते-जाते एसी साफ करने लगती है। एक काम से निकल कर दूसरे काम में खो जाती है। फिर नहीं आती है। शाम को उसका पति आता है।


इस बालकनी को कई साल से देख रहा हूं। हमेशा एक स्त्री ही कपड़े पसारने आती रही है। पहली बार किसी बालकनी में पुरुष को चादर फैलाते देख रहा हूं। अपनी ताकत से चादर को हवा में उड़ा रहा है और धम से पटक दे रहा है। वह काम को एक बला की तरह ख़त्म कर रहा है। जबकि उसके पहले जो स्त्री आती थी वह हर कपड़े को अपने जिगर के हिस्से की तरह पसारती थी। वह अपने किए हुए काम को पसारने के आख़िरी चरण में जैसे-तैसे ख़त्म नहीं करना चाहती है। लेकिन यह पुरुष जैसे फेंक कर चला गया हो। मैं दुआ कर रहा हूं कि वह स्त्री ठीक होगी। बीमार नहीं होगी। कोरना के समय में उसके लिए यह प्रार्थना ज़रूरी है। 


एक बहुत ऊंची बालकनी में पहली बार एक जोड़ा कुर्सी पर बैठा दिखा। उत्साह से देखने लगा कि कोई है जो कपडे पसारने के अलावा बालकनी का दूसरा इस्तमाल कर रहा है। अब दोनों एक दूसरे के साथ समय बिताएंगे। थोड़ी देर में ही एक कुर्सी ख़ाली हो जाती है। स्त्री की कुर्सी। पुरुष अपनी कुर्सी पर बैठा है। अब वह स्त्री आने-जाने लगी है। काम करने लगी है। कुर्सी पर बैठने का सुख पुरुष को हासिल है। 


कुछ बालकनी में स्त्रियां दिन में दो बार आती हैं। एक बार कपड़े पसारने और दूसरी बार पौधों में पानी देने। सामने ऐसी बालकनी कम है। वह पर्यावरण को बचाने में योगदान दे रही है या अपने काम को दोहरा कर रही है, इस पर आप बहस कीजिए ही। मैं क्वारिंटिन के दिनों में सामने की बालकनी निहारता रहा कि कोई स्त्री आकर बैठेगी। देर तक कुछ सोचेगी। किसी से बात करती रहेगी। ऐसा एक बार भी नहीं हुआ। 


इस बालकनी में स्त्री आधी दिखती है। दीवार ऊँची है। उसका आधा शरीर पोछा लगाते दिख रहा है। कभी उसे अपने ही साफ की हुई जगह पर तफरीह करते नहीं देखा। इस बालकनी की स्त्री तो डंडे में ही सारी ताकत लगा देती है। फर्श को ऐसे रगड़ती रहती है जैसे उसने तय कर लिया है कि जवानी से लेकर बुढ़ापे तक इस फर्श को सोना बना देना है। उसके जाने के बाद उसका पति आता है। ठाठ से। धुआं छोड़ता है। अपने कमाए पैसे से खरीदे गए फ्लैट को गर्व से देखता है। कुछ फोन-वोन करता है। फिर संतुष्ट होकर भीतर चला जाता है। बालकनी स्त्रियों के लिए कार्य-क्षेत्र है। पुरुषों के लिए आराम की जगह। 


किसी अनिवार्य काम के सिलसिले में एक सोसायटी में जाना हुआ। वहां कई सौ फ्लैट हैं। किसी बालकनी में एक इंसान नहीं दिखा। सब बंद। कपड़े भी दिखाई नहीं दिए। एक बालकनी आधी खुली थी। उससे एक स्त्री झांक रही थी। जबकि उसके देखने के लिए कुछ नहीं था। सन्नाटा था।

आधार कार्ड और श्मशान घाट- कुछ नोट्स / रवीश कुमार

 आधार कार्ड और श्मशान घाट- कुछ नोट्स / रवीश कुमार 

 

हिंडन श्मशान से निकलने पर रास्ता भटक गया। गूगल मैप की अनाउंसर की बात समझने के लिए कार धीमी कर ली। ठहर सी गई है। हिंडन नदी के उस पर श्मशान में जलती चिताएं नज़र आ रही हैं। मैं नदी के दूसरी तरफ हूं। झुरमुट में पति-पत्नी अपने बेटे के साथ किसी चिता को प्रणाम कर रहे हैं और हाथों को हल्का सा हिलाते हुए गुडबाय। उनका छोटा सा बेटा भी साथ में है। वे श्मशान तक आए हैं लेकिन चिता के करीब नहीं जा सके हैं। मैंने ठीक उनके पीछे अपनी कार रोक दी है और उस पार जलती चिताओं को देखने लगा हूं। इतनी चिताएं हैं कि कोई कैसे जान गया है कि कौन सी चिता उसके परिजन की है। शायद श्मशान के भीतर से किसी ने फोन पर बताया है। कोरोना के संक्रमण के ख़तरे ने इस परिवार को यहां तक ले आया है। कितना प्यार रहा होगा जाने वाले के प्रति। तमाम भय के बाद भी तीनों ख़ुद को यहां तक लाने से रोक नहीं सके हैं। यह दृश्य ऐसे दर्ज हो गई है कि जब तब याद आती रहती है। दर्ज तो यही होगा कि कोविड के पार्थिव शरीर के अंतिम संस्कार में दस लोग से अधिक नहीं आए हैं। यह तीन लोग मरने वालों की तरह सरकारी आंकड़ों से बाहर हैं। अलविदा कहने का फर्ज़ अदा कर रहे हैं। 


थोड़ी देर पहले श्मशान वाले ने बताया है कि एक दिन एक लड़की आई। अपनी मां का शव लेकर। अकेले। यहां तक लाकर हाथ जोड़ लिया। बोली कि नौकरी चली गई है। जो पैसा था इलाज में लगा दिया। अब इसके बाद के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैंं। मेरे पिता भी इस दुनिया में नहीं है। श्मशान वाले लड़के ने कहा कि हमने एक पैसा नहीं लिया। कुछ लोग स्कूटी से आए हैं। पी पी ई किट पहन कर। दो औरतें आई हैं, जो चिता से दूर खड़ी की गई हैं। श्मशान वाले से मैं बात करने लगता हूं। उसकी पहली ही लाइन छाती में धंस गई।” दस साल में जितनी बॉडी नहीं जलाई उतनी एक महीने में जला दी है।” यह कह कर वह अपनी दो हथेलियां दिखाने लगता है। सैनिटाइज़र से हाथ धोते-धोते खराब हो गया। परिवार के लोग इतने सदमे में हैं कि लकड़ी रखने का होश नहीं रहता। हमीं लोग रखने लग जाते हैं।


श्मशान में भी कोविड के नियम हैं। मैं जिनके अंतिम संस्कार में गया हूं, उन्हें कोविड हुआ था लेकिन वेंटिलेटर पर इतने दिन रहीं कि उस दौरान कोविड खत्म हो गया। कोविड की मार ख़त्म नहीं हुई। श्मशान में बताया गया कि इनका संस्कार ग़ैर कोविड घाट पर होगा। विद्युत शवदाह गृह में केवल कोविड के मरीज़ों के ही पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार होगा। समझ आता है कि कोविड और नॉन कोविड मरीज़ों की गिनती में कितना झोल है। जो मरा तो है कोविड के होने से लेकिन मरने के एक दिन पहले निगेटिव हो गया तो नॉन कोविड में गिना जा रहा है। 


श्मशान में जिसे पर्ची देने का काम दिया गया है वह इस वक्त ख़ुद को कलक्टर समझ रहा है। किसी से ठीक से बात नहीं कर रहा है। इस बात पर स्पष्टीकरण लेने के लिए वहां मौजूद पुलिस अधिकारियों की तरफ बढ़ता हूं तो ऊंची आवाज़ में रोक देता है। कुर्सी पर बैठे पुलिस के लोग देखते तक नहीं कि कोई नज़दीक आकर क्या कहना चाहता है। शायद उस जगह पर बैठे बैठे उनका भी दिमाग़ सुन्न हो गया है। वर्दी के भीतर वे इंसान ही तो हैं। बिना वर्दी के मैं भी तो इंसान हूं और वो बच्चा जिसकी मां नहीं रही है। प्रशासन के किसी अधिकारी से फोन पर बात होती है। काफी अच्छे से बात करते हैं। इस बात का ख़्याल रखते हुए कि ठेस न पहुंचे। मगर वहां मौजूूद कर्मचारी अधिकारी मुद्रा में है। पीछे से आवाज़ देता रहा कि आपका ही नाम फलाना है। मुड़ कर नहीं देखता है। 


श्मशान में आधार कार्ड की एक फोटी कॉपी मांगी गई है। अस्पताल से डिस्चार्ज समरी की फोटो कॉपी भी मांगी गई है, जिस पर मौत की सूचना छपी है। जिनकी मौत घर पर हुई होगी उनके लिए अलग नियम होगा। मुझे जानकारी नहीं है। श्मशान के लोग उस डिस्चार्ज समरी का क्या करेंगे जिसमें मौत की तारीख़ लिखी है। क्या कभी कोई उसे पढ़ेगा या कुछ समय के बाद उन काग़ज़ों को जला दिया जाएगा?  अंतिम संस्कार के लिए गंगा जल और चंदन की छोटी लकड़ी के अलावा आधार कार्ड अनिवार्य हो गया है। आधार नंबर लेकर भी इंसान निराधार हो चुका है।


श्मशान वाले ने पहले ही कह दिया है कि आधार कार्ड की कॉपी चाहिए। मेरा प्रिंटर ख़राब है। मेरे पड़ोस की एक लड़की को आधार कार्ड फार्वड किया जा रहा है। वह अपने प्रिंटर निकाल कर दरवाज़े के बाहर आधार कार्ड की कापी छोड़ गई। उसे प्रिंट आउट लेते वक्त कैसा लगा होगा, इस पर बात ही नहीं हुई। जो सरकार मरने का सही आंकड़ा नहीं देती है वह मरने वालों का आधार कार्ड की फोटोकॉपी श्मशान में जमा करवा रही है। एक दिन सरकार हर किसी के शरीर में आधार नंबर गोदवा देगी ताकि मरने पर फोटो कॉपी लेने की ज़रूरत न पड़े। मैं सोच रहा हूं कि जिस घर में किसी की मौत हुई हो, उसे अगर आधार कार्ड न मिल पाए तो क्या होगा। ऐसे हालात में आधार कार्ड खोजना क्या आसान होगा? 


बहुत दिनों से सोच रहा था कि इसे लिखूं या न लिखूं। लोग अपने करीबी के मर जाने पर श्रद्धांजलियों में बेईमानी कर रहे हैं। पूरी सूचना ग़ायब कर दे रहे हैं कि जो मरा है क्या तड़पा तड़पा कर मारा गया है, आक्सीज़न मिला कि नहीं, डॉक्टर देखने आया कि नहीं, सरकारी अस्पताल में ज़मीन पर रख दिया था या कहां रखा था, क्या उसे इलाज मिला था, क्या समय पर दवा मिली थी? बहुत कम श्रद्धांजलियों में इस तरह की सूचना दिखाई देती है।बीते दिनों की एक हंसती तस्वीर लगा कर लोग जाने वालो को मिस कर रहे हैं। कैसे गया है, उसे ग़ायब कर दे रहे हैं। बेईमान लोग। क्या इस दौर में इन सूचनाओं के बग़ैर श्रद्धांजलियां पूरी हो सकती हैं?

ये मुलाक़ात इक बहाना है…./ रवीश कुमार

ये मुलाक़ात इक बहाना है…./ रवीश कुमार 


ज़ूम मीटिंग शुरु हो गई है। कुछ लोग समय से पहले आ चुके हैं। कुछ लोग अभी भी आए जा रहे हैं। इस बीच जो आईं थीं वो थोड़ी देर के लिए चली गई हैं। मीटिंग में बैठने वालों ने बैकग्राउंड का ध्यान रखा है। कोई अपने सुसज्जित घर को दिखाना चाहता है तो कोई सोफे पर ऐसे धंस के बैठा है उसके अलावा कुछ न दिखे। कोई इसी वजह से तिरछा बैठा है कि घर न दिखे। ऑन लाइन क्लास हो या मीटिंग हो, सबसे बड़ा संघर्ष बैकग्राउंड का है। घर का वो छोटा सा हिस्सा कैसा दिखे। जिस मुल्क में सब कुछ बेपर्दा हो चुका हो, अस्पताल के बाहर लोग तड़प कर मर गए हों, उस मुल्क के लोग एक वर्चुअल मुलाकात के लिए अपने घर के किसी ख़ास एंगल को लेकर जद्दो जहद है। ज़ूम ने बैकग्राउंड की सुविधा दे दी है। आप चुन सकते हैं। बैकग्राउंड चीट कर सकते हैं। सबको पता है। जैसे सरकार आपसे चीट कर लेती है और आपको पता होता है।


हर किसी के घर का कोना वैसा नहीं होता है जैसा फ़ेसबुक पोस्ट में कुछ लोगों के घर का कोना दिखता है। इस कोने के दबाव में कई लोग आ जाते हैं। अब ज़ूम मीटिंग के लिए तो आप पेंटिग्स और गमलों की सज़ावट नहीं कर सकते। इसलिए उस एंगल पर बैठना है जिससे पूरा घर एक्सपोज़ न हो। दफ़्तरों की मीटिंग और ऑनलाइन क्लास की कहानी तो और भी जानलेवा है। इसे रहने देते हैं। ज़ूम के बैकग्राउंड की मदद से वेनिस की सेटिंग कर दी गई है। जबकि है वहां जहां सुबह से पानी नहीं आया है।नीचे से आवाज़ आ रही है। धनिया ले लो। आलू ले लो। महीनों धुलाई से घिस कर मुलायम हो चुके पुराने चादर का अपना ही सुख है। लेकिन मीटिंग के कारण खटक रहा है। अनवरत कार्यरत होस्ट ने बिस्तर की अपनी चादर बदल दी है। पीछे का सारा खदर-बदर हटा कर साफ कर दिया है। ठीक वैसे ही जैसे सरकार आंकड़ों से मरने वालों को साफ कर देती है। जैसे हैं वैसे दिखने का साहस हम खो चुके हैं। जो नहीं हैं वही होने का जुगाड़ करते रहते हैं। सब ऐसे नहीं हैं। संतुलन के लिए ऐसा कहना ज़रूरी है। हाफ पैंट के दिखने का तो कोई चांस ही नहीं है।हम सभी ज़ूम के कैमरे से अपने घर को बचाने के लिए कोने का सहारा ले रहे हैं। इन्हीं कोने न जाने कितने घरों को एकसपोज़ होने से बचाया है। 


तरह-तरह के एंगल से घर को दिखाने और छिपाने के बाद चेहरे के एंगल की फिक्र रह गई है। साइड और फ्रंट लुक को लेकर मारा-मारी है। कैमरे के कितना करीब रहें या कितना दूर जाएं इसका हिसाब लगाया जा रहा है। जाने कब ज़ूम का कैमरा सर के बाल का टेलिकास्ट करने लगा है। तभी दूसरे का चेहरा देख कर तीसरा ख़ुद को कैमरा से दूर हटाता है ताकि केवल चेहरा ही दिखे और ठीक से दिखे। किसी ने कुर्ता खींच कर सेट किया है। किसी ने रीढ़ सीधी की है। सहज दिखने की इस मीटिंग में कोई सहज नहीं है। परिचित अपरिचित हैं। सब एक दूसरे को कैमरे के फ्रेम से देख रहे हैं। जैसे फोटो सेशन के समय हम सतर्क हो जाते हैं। भीतर से महसूस करते हैं कि हंस रहे हैं लेकिन चेहरे पर हंसी उभर नहीं पाती है। ज़ूम मीटिंग में हंसते समय ध्यान रखना होता है। दांत के पीछे का भी क्लोज़ अप आ जाता है। किसी ने किसी को हफ्तों बाद देखा है। लंबे बालों से लेकर दाढ़ी पर बात होने लगती है।


ख़ूबसूरती की चर्चा संक्षिप्त है। शुरू होते ही ख़त्म हो जाती है। बहुत कम लोग हैं जो बिना असहज हुए सामने से किसी के चेहरे का बयान कर सकते हैं। बहुत कम लोग हैं जो इस बयान से असहज नहीं होते हैं। मतलब निकाले जाने का ख़तरा होता है। तो बात फूलों की सुंदरता पर होने लगती है। ऐसा लगता है कि सुंदरता की तारीफ़ ख़ास के लिए रिज़र्व है। या फिर जेंडर्ड है। एक लड़की दूसरी लड़की की तारीफ़ कर रही है।बाक़ी चुप हैं। कैसे बोलें। क्या बोलें। एक लड़का दूसरे लड़के की तारीफ़ कर रहा है। कभी कभी जेंडर्ड लाइन टूट भी जाती है। मुमकिन है यह सही न हो, लेकिन ग़लत है, यह मुमकिन नहीं है। तो सुरक्षित मार्ग है कि कपड़े की तारीफ़ की जाए। आसमान का रंग नीला है और बाहर हवा अच्छी है। किसी के पास सामने से तारीफ़ करने के न तो शब्द हैं और न ही सलीक़ा।मान लेने में क्या बुराई है। अच्छा दिखने का अहसास कितना व्यक्तिगत हो चुका है। जबकि इसमें देखे जाने वाले भी शामिल हैं लेकिन उनके पास न तो इसकी ज़ुबान और न साफ़ नज़र।ख़ूबसूरती के वर्णन पर अघोषित तालाबंदी है।ज़ूम मीटिंग में बहुत कम लोग होते हैं जो ठीक से तैयार होकर आते हैं। इसी मुल्क में एक ख़बूसूरत ग़ज़ल लिखी गई है...देख लो आज हमको जी भर के…. इसमें भी ज़ोर देखने पर है। कहने पर नहीं है। 


बहुत दिनों बाद किसी दोस्त को देखकर सदमा जैसा लगता है। व्हाट्स एप के इनबॉक्स में लिख कर बात करते करते उसका चेहरा ग़ायब हो चुका है। नज़र के सामने उसे लिखे हुए शब्द है जिससे कई बार उसकी आवाज़ भी आती है मगर चेहरा नहीं आता। चेहरा दिखा है। कुछ बदलने की बात होती है। फिर अचानक बात वज़न पर शिफ्ट हो जाती है। देखने की ख़ुशी कम देर के लिए ठहर पाती है। वज़न की बात से उन्हें बुरा लगता है जिन्होंने वज़न छुपाने के लिए थोड़ा तिरछा बैठने का जुगाड़ लगाया है।तभी सिग्नल सिग्नल फ्रीज़ हो जाता है। चेहरे की आख़िरी मुद्रा उस टाइम फ्रेम की तरह जमी रह जाती है जैसे कर्फ्यू और तालाबंदी से पहले ज़हन में शहर और जीवन की अंतिम छवि बची रह गई हो। अचानक सिग्नल आ जाता है। चेहरे में जान आ जाती है। जैसे तालाबंदी के समाप्त हो जाने का एलान हो गया हो। मुलाकात का यह विकल्प मुलाकात के जैसा है। मुलाकात है नहीं। बस मुलाकात का बहाना है।

पत्रकारिता दिवस पर रवीश कुमार

 पत्रकारिता दिवस पर अपनी  अयोग्यताओं पर रवीश कुमार का नजरिया 


पत्रकारिता एक पेशेवर काम है। यह एक पेशा नहीं है। बल्कि कई पेशों को समझने और व्यक्त करने का पेशा है। इसलिए पत्रकारिता के भीतर अलग-अलग पेशों को समझने वाले रिपोर्टर और संपादक की व्यवस्था बनाई गई थी जो ध्वस्त हो चुकी है। इस तरह की व्यवस्था समाप्त होने से पहले पाठक और दर्शक किसी मीडिया संस्थान के न्यूज़ रूम में अलग अलग लोगों से संपर्क करता था। अब बच गया है एक एंकर। जिसे देखते देखते आपने मान लिया है कि यह सर्वशक्तिमान है और यही पत्रकारिता है। आपकी भी ट्रेनिंग ऐसी हो गई है कि किसी घटना को कोई संवाददाता कवर कर रहा है, अच्छा कवर कर रहा है लेकिन लेकिन मुझे लिखेंगे कि आपको फील्ड में जाना चाहिए। यह कमी संस्थान ने कई कारणों से पैदा की है। कुछ चैनल के सामने वाकई में बजट की समस्या होती है लेकिन जो नंबर एक दो तीन चार हैं उन्होंने भी पैसा होते हुए इस सिस्टम को खत्म कर दिया है। पत्रकारिता दिवस पर मैं अपनी कुछ कमियों की बात करना चाहता हूं लेकिन पहले सिस्टम की कमियों पर बात करूंगा क्योंकि मेरी कमियों का संबंध सिस्टम की कमियों से भी है।


न्यूज़ चैनल तरह तरह के प्रोग्राम बना रहे हैं ताकि ट्विटर से टॉपिक उठाकर न्यूज़ एंकर उस पर डिबेट कर ले। अब दर्शक भी न्यूज़ की जगह डिबेट का इस्तमाल करने लगा है। कहता है कि डिबेट करा दीजिए। जबकि वह देख रहा है कि डिबेट में समस्या से संबंधित विभाग का अधिकारी नहीं है। जैसे जब कोरोना की दूसरी लहर में नरसंहार हुआ तो आपने नहीं देखा होगा कि स्वास्थ्य विभाग के लव अग्रवाल और कोविड टास्क फोर्स के डॉ वी के पॉल किसी डिबेट में बैठे हों और सवाल का जवाब दे रहे हों। उनकी जगह सत्ताधारी राजनीतिक दल का प्रवक्ता आएगा। विपक्ष के हर सवाल को इधर उधर से भटका जाएगा। अगर सत्ताधारी दल का प्रवक्ता किसी सवाल के जवाब में फंस भी जाता है तो इससे आपका मनोरंजन होता है। सरकार और भीतर काम करने वाले लोग जवाबदेही से बच जाते हैं। एंकर को बस इतना करना होता है कि टॉपिक का एंगल तय करना होता है। अब तो तय भी नहीं करता। कोई और तय कर देता है या ट्विटर से खोज लाता है। फिर बोलेगा पूछता है भारत। पूछता है इंडिया।


जिस तरह का सतहीपन स्टुडियो के डिबेट में होता है उसी तरह का सतहीपन एंकरों के कवरेज में होता है। अब इसे सतहीपन कहना ठीक नहीं है क्योंकि इसी को पत्रकारिता का स्वर्ण मानक कहा जाता है। अंग्रेज़ी में गोल्ड स्टैंडर्ड कहते हैं। जैसे ही कोई बड़ी घटना होती है, चुनाव होता है या उनका प्रिय नेता बनारस के दौरे पर चला जाता है, एंकरों को स्टुडियो से बाहर भेजा जाता है। एंकर के जाते ही कवरेज़ की बारीकियां पीछे चली जाती हैं। उसका वहां होना एक और घटना बन जाती है। यानी घटना के भीतर चैनल अपने लिए घटना पैदा कर लेता है कि उसने अपना एंकर वहां भेज दिया है। एक दर्शक के नाते आप भी उस एंकर के वहां होने को महत्व देते हैं और राहत महसूस करते हैं। वैसे आप यह बात नहीं जानते, लेकिन न्यूज़ चैनल वाले यह बात ठीक से जानते हैं। 


जिसे आप बड़ा एंकर कहते हैं वह केवल घटना स्थल का वर्णन कर रहा होता है। घटना स्थल के अलावा वह भीतर की जानकारी खोज कर नहीं लाता है क्योंकि उसे लाइव खड़ा होना है। नहीं भी होना है तो ज़्यादातर कमरे में ही आराम करते हैं या जानकारी जुटाने के नाम पर दिखावे भर की मेहनत करते हैं। एंकर को सावधानी भी बरतनी होती है कि सरकार की जूती का रंग उसके कुर्ते पर ख़राब न हो जाए।क्योंकि दिन भर तो वह मोदी मोदी करता रहता है। सरकार के बचाव में तर्क गढ़ता रहता है। जैसे ही एंकर अपने घर से निकलता है, माहौल बनाने लगता है। एयरपोर्ट की तस्वीर ट्वीट करेगा। वहां पहुंच कर एक फोटो ट्वीट करेगा। नाश्ता खाना का फोटो ट्विट करेगा। जहां तीन घंटे से खड़े हैं वहां का फोटो ट्विट कर दिया जाएगा ताकि आप घटनास्थल पर मरने वालों के साथ साथ तीन घंटे से खड़े रिपोर्टर के दर्द को ज़्यादा महसूस कर सकें। चैनल भी तुरंत प्रोमो बनाकर ट्वीट कर देगा। यह लिखते हुए गुज़ारिश है कि एक दर्शक के नाते आप हमेशा यह देखें कि आप क्या देख रहे हैं, क्या कोई अतिरिक्त जानकारी या समझ मिल रही है या केवल आप किसी के किसी जगह पर होने को ही देख रहे हैं और उसे ही पत्रकारिता समझ रहे हैं।


जबकि रिपोर्टर की प्रवृत्ति दूसरी होती है। वह ख़बर खोजता है। अपनी जानकारी को लेकर दूसरे रिपोर्टर से होड़ करता है। एंकर केवल अपने वाक्यों को एंगल देता है। प्रभावशाली बनाता है। रिपोर्टर सूचना से अपनी रिपोर्टिंग को प्रभावशाली बनाएगा। घटना स्थल के वर्णन के अलावा कुछ गुप्त जानकारियां उसमें जोड़ेगा। सूत्र भी रिपोर्टर को बताना सही समझते हैं क्योंकि वह रिपोर्टर को लंबे समय से जानता है। पता है कि रिपोर्टर उसकी सूचना को किस तरह से पेश करेगा ताकि उस पर आंच न आए। सूत्र को एंकर पर कम भरोसा है। वह एंकर से दोस्ती करेगा मगर ख़बर नहीं देगा। रिपोर्टरों की फौज ग़ायब होने से सूचनाओं का सिस्टम ख़त्म हो गया है। सिस्टम के भीतर के सूत्रों को पता है कि यहां मामला ख़त्म है। भरोसा करने का मतलब है सौ समस्याएं मोल लेना। एंकर और रिपोर्टर की भाषा अलग होती है। रिपोर्टर इस तरह से सूचना को पेश करेगा कि बात भी हो जाए और बात बताने वाला भी मुक्त हो जाए। साथ ही सूचनाओं के लेन-देन की व्यवस्था भी बनी रहे।सबको पता है कि गोदी मीडिया के एंकर सरकार की गोद में हैं। उनका उठना-बैठना सरकार के लोगों के बीच ज़्यादा है। दिन भर ट्विटर पर सरकार का प्रचार करते देख रहा है तो वह भरोसा नहीं करेगा। क्या पता उसक ऑफ-रिकार्ड की जानकारी एंकर नेता को ऑफ-रिकार्ड बता दे और बाद में नेता उस अधिकारी की हालत ख़राब कर दे। सूत्र पत्रकार से बात करना चाहेगा। दलाल से नहीं। नौकरशाही के पास धंधे के लिए अपने दलाल होते हैं तो वह एक और दलाल से फ्री में क्यों डील करे। है कि नहीं।


पत्रकारिता ख़त्म हो चुकी है। आप अगर इस बात को अपवाद के नाम से नकारना चाहते हैं तो बेशक ऐसा कर सकते हैं।यह बात भी सही है कि कुछ लोग पत्रकारिता कर रहे हैं। काफी अच्छी कर रहे हैं लेकिन आप अपनी जेब से तो पूरे अखबार की कीमत देते हैं न। उस अपवाद वाले पत्रकार को तो अलग से नहीं देते। लौटते हैं विषय पर। रिपोर्टर नहीं है। एंकर ही एंकर है। हर विषय पर बहस करता हुआ एंकर। जो विशेषज्ञ पहले रिपोर्टर से आराम से बात करता था अब सीधे एंकर के डिबेट में आता है। विशेषज्ञ को पांच मिनट का समय मिलता है जो बोला सो बोला वह भी दिखने से संतुष्ट हो जाता है। उसे पता है कि रिपोर्टर बात करता था तो समय लेकर बात करता था लेकिन एंकर के पास ‘हापडिप’(फोकसबाज़ी) के अलावा किसी और चीज़ के लिए टाइम नहीं होता है। विशेषज्ञ या किसी विषय के स्टेक होल्डर की निर्भरता भी उसी एंकर पर बन जाती है। वह उसी को फोन करेगा। मुझे एक दिन में बीस विषयों के विशेषज्ञ मैसेज करते हैं और अपराध बोध से भर देते हैं कि आपको यह भी देखना चाहिए। ज़ाहिर है मैं बीस विषय नहीं कर सकता। वह तो फोन कर फिल्म देखने लगता है लेकिन मैं न कर पाने के अपराध बोध में डूबा रहता हूं। 


यही चीज़ पाठक और दर्शक के साथ होती है। मुझे बैंक डकैती से लेकर ज़मीन कब्ज़ा, हत्या, बिजली-पानी की समस्या और न जाने कितनी समस्याओं के लिए लिखित संदेश आते हैं। मोहल्ले में तीन दिन से बिजली नहीं है तो रवीश कुमार को अपनी पत्रकारिता साबित करनी है और गुंडों ने ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया तो रवीश कुमार को अपनी पत्रकारिता साबित करनी होती है। दिन भर में इस तरह से सैंकड़ों मैसेज आते हैं जिसमें रवीश कुमार को साबित करने की चुनौती दी जाती है। हर समय फोन ऐसे बजता है जैसे अग्निशमन विभाग के कॉल सेंटर में बैठा हूं। यही कारण है कि कितने महीनों से फोन उठाना बंद कर चुका हूं। क्या आप दिन में एक हज़ार फोन उठा सकते हैं? मैं नरेंद्र मोदी नहीं हूं कि सिर्फ मेरे ट्वीट को रि-ट्वीट करने के लिए दस मंत्री ख़ाली बैठे हैं। मेरे पास न सचिवालय है और न बजट है। 


ध्यान रहे इसमें नागरिक की ग़लती नहीं है। मुझसे आपका निराश होना जायज़ है।अपने फेसबुक पेज पर और शो में मैंने कई बार संसाधनों की कमी की बात की है। कल किसी जगह से एक महिला का फोन आया। बातचीत से लगा कि उन्हें ऐसा भ्रम है कि हर जगह हमारे संवाददाता हैं। उनके पास गाड़ी है। गाड़ी में सौ रुपये लीटर वाला पेट्रोल है। मेरे फोन करते ही वहां पहुंच जाएंगे। संवाददाता के भेजे गए वीडियो को प्राप्त करने के लिए न्यूज़ रुम में पांच लोग इंतज़ार कर रहे हैं।उसे देखकर खबर लिखने वाले दस बीस लोगों की टीम है और फिर उसे एडिट करने के लिए वीडियो एडिटर की भरमार है। पता होना चाहिए कि इसके लिए काफी पैसे की ज़रूरत है। मुझे लगा कि समझाऊं लेकिन बहुत वक्त चला जाता।


इतना ज़रूर होता है कि ऐसे लिखित संदेश से मुझे पता चलता है कि आम लोगों के जीवन में क्या घट रहा है। उस फीडबैक का मैं अपने कार्यक्रम में इस्तमाल करता हूं लेकिन कई बार नहीं कर पाता। लोग बार बार मैसेज करते रहते हैं। लगातार फोन करते हैं। मेरे दिलो-दिमाग़ पर गहरा असर पड़ता है। मैं हर समय इन्हीं चीज़ों से जुड़ा रहता हूं। लगातार इन दुखद दास्तानों से गुज़रते हुए आप कैसे हंस सकते हैं। एक मैसेज से निकलता हूं तो दूसरा आ जा जाता है। काम ही ऐसा है कि मैं फोन को उठाकर दूर नहीं रख सकता। यह विकल्प मेरे पास नहीं है। मैंने कई बार अपने काम का हिसाब दिया है। मैं एक शो के लिए उठते ही काम शुरू कर देता हूं। छह बजे से लेकर चार बजे तक लिखते मिटाते रहना आसान नहीं है। पिछले ही शुक्रवार को एक पूरा शो तैयार करने के बाद बदलना पड़ा और नया शो लिखना पड़ा। एक मिनट का भी अंतर नहीं था। मेरी उंगलियां कराह रही थीं। उंगलियों के पोर में ऐसा दर्द उठा कि अगर मेरे पास पेंशन की व्यवस्था होती तो उसी वक्त यह काम छोड़ देता। बाकी एंकर इतना काम करते हैं या नहीं आप उनके कार्यक्रम को देखकर अंदाज़ा लगा सकते हैं। ख़ैर मैं यहां तक सिर्फ अपनी बात नहीं कर रहा। यहां तक मैं एक पेशे के रूप में पत्रकारिता के खत्म होने, संस्थान और संसाधनों की कमी की बात कर रहा हूं। 


अब मैं अपनी कमी की बात करना चाहता हूं। संसाधन की कमी के अलावा मैं बहुत सी ख़बरें अपनी अयोग्यता के कारण कवर पाता हूं। आज की पत्रकारिता बदल गई है। एक तो वह है नहीं लेकिन जो है उसे समझने और पेश करने के लिए कुछ योग्यताएं मुझमें नहीं हैं। मैं समय की कमी की बात नहीं करना चाहता। 


इस महामारी में आपने देखा होगा कि कई विश्वविद्यालय आंकड़ों का विश्लेषण कर रहे हैं। हर दिन आने वाले मामलों की संख्या और मरने वालों की संख्या का विश्लेषण कर रहे हैं। आपने देखा होगा कि एक ग्राफ या चार्ट पेश किया जाता है।कुछ चार्ट बेहद बारीक और ज़रूरी होते हैं। इनकी समझ हासिल करने में मुझे बहुत दिक्कत होती है। अगर मुझे डेटा देकर कोई ग्राफ बनाने के लिए दिया जाए तो मैं नहीं बना सकूंगा। आज की पत्रकारिता में डेटा का बड़ा रोल है। आप जानते हैं कि सरकार और कंपनी दोनों आपकी हर आदत का डेटा जमा कर रहे हैं। इसे पकड़ने के लिए डेटा साइंस की समझ बहुत ज़रूरी है। 


पहले यह मेरी कमी नहीं थी क्योंकि न्यूज़ रूम में इस काम को करने वाले दूसरे योग्य लोग थे। अब उनका काम भी मुझी को करना है तो यह मेरी कमी बन गई है। आप उम्मीद भी मुझी से करते हैं। बेशक मैं इस कमी को दूर करने के लिए अपने कुछ योग्य मित्रों की मदद लेता हूं। उनसे काफी समय लेकर समझता हूं। तब भी कई चीज़ों को साफ साफ अपनी भाषा में लिखने में दिक्कत आती है। आज के दौर में पत्रकार के लिए डेटा साइंस में दक्ष होना बहुत ज़रूरी है। महामारी ही नहीं, अर्थव्यवस्था को समझे के लिए भी। आपने देखा होगा कि सरकार भी डेटा मेंं ही बात करती है। इसे समझने के लिए आप डेटा साइंस में जितना दक्ष होंगे, उतना अच्छा होगा। आप जानते हैं कि मैं गणित में भी कमज़ोर हूं। अंग्रेज़ी की कमी अब कभी-कभार ही सताती है जब किसी ख़ास जटिल वाक्य को सही से नहीं लिख पाता लेकिन बाकी ख़ास दिक्कत नहीं होती। 

बहुत से लोगों से पूछ लेता हूं और ख़ुद भी समझ लेता हूं। बोल नहीं पाता तो कोई बात नहीं। लॉकडाउन में इसकी ज़रूरत खत्म हो गई है क्योंकि रहता ग़ाजियाबाद में हूं, वाशिंगटन में नहीं। एनि वे। 


अब मैं अपनी दूसरी कमी की बात करना चाहता हूं।मैं अक्सर मेडिकल साइंस से जुड़ी ख़बरों को कवर करने में ख़ुद को अयोग्य पाता हूं। अस्पतालों की व्यवस्था से जुड़े पहलुओं को कवर कर लेता हूं लेकिन जब बात इलाज और मेडिकल साइंस की तकनीक की आती है तो मैं अपनी कमियों से घिर जाता हूं। जैसे पीएम केयर्स के वेंटिलेटर घटियां हैं। अदालत कहती है। डॉक्टर भी ऑफ रिकार्ड कहते हैं कि पीएम केयर्स वाले वेंटिलेटर में आक्सीजन का दबाव कम हो जाता है जिससे मरीज़ की जान जा सकती है। यह वेंटिलेटर नहीं है। लेकिन इस वेंटिलेटर पर कौन कौन भर्ती हुआ था, उसके परिजनों को ढूंढना, रिपोर्ट देखना, डाक्टर से बात करने की योग्यता मुझमें नहीं है। संसाधान तो है ही नहीं। इसे कवर करने के लिए वेंटिलेटर के एक्सपर्ट की ज़रूरत है। लेकिन कोई सामने आने के लिए तैयार नहीं है जो वेंटिलेटर के पास लेकर विस्तार से बताए कि देखिए ये पुर्ज़ा नहीं है। इसकी पाइप खराब है। एनिस्थिसिया का ही कोई बंदा इस मशीन की बेहतर पोल खोल सकता है। लिहाज़ा आपूर्ति, वितरण, खराबी और स्टाफ की कमी तक ही खुद को सीमित करना पड़ता है। 


आपने देखा होगा कि  मैंने फेसबुक पेज पर पोस्ट किया था कि जिन लोगों के मृत्यु प्रमाण पत्र में कोविड नहीं लिखा है लेकिन मौत कोविड से हुई है, ऐसे लोग मोबाइल फोन से वीडियो बनाकर भेजें। उस वीडियो में दोनों ही प्रमाण पत्र दिखाएं और अपनी तकलीफ बताएं कि मृत्यु प्रमाण पत्र को लेकर क्या क्या सहना पड़ा है। कई लोगों ने कहा कि उनके अपने गुज़र गए और उसके दस दिन बाद कोविड पोज़िटिव रिपोर्ट आई। लेकिन क्या तब मृत्यु प्रमाण पत्र में कोविड जोड़ा गया। कई कारणों से लोग वीडियो बना कर भेजने का साहस नहीं जुटा पाए। मैं समझता हूं लेकिन अगर इसका कारण डर है तो दुख की बात है। लेकिन इसी क्रम में कई मैसेज ऐसे भी आए कि फलां अस्पताल ने ग़लत इलाज किया। पूरी रिपोर्ट भेज दी। उसमें एक्स रे रिपोर्ट है। कई तरह की जांच रिपोर्ट है। डॉक्टर की पर्ची है। 


अब ऐसे मामलों को कवर करने की योग्यता मुझमें नहीं है।मैं मेडिकल रिपोर्ट देखने और समझने की क्षमता नहीं रखता हूं।न ही मेरे पास डाक्टरों की टीम है जो इसका मूल्यांकन करें। इसके लिए डाक्टर को भी हमपेशा डॉक्टर की ख़राब डॉक्टरी पर उंगली उठाने का साहस दिखाना होगा। संदेह का लाभ हमेशा डॉक्टर को ही मिलेगा और मरीज़ की लाश उसके परिजन को। एक पत्रकार के तौर पर मैं साबित नहीं कर सकता कि इलाज ग़लत हुआ है। जिस अस्पताल में गलत इलाज हुआ है वह दस डॉक्टर को खड़ा कर देगा जो मेडिकल शब्दावलियों का इस्तमाल कर आपको घुमा देंगे। हो सकता है वो सही ही बोल रहे हों लेकिन उनकी बात पर सवाल उठाने की योग्यता मुझमें नहीं है। आप कभी किडनी तो कभी हार्ट का रिपोर्ट लेकर आ जाएंगे तो मुझे एंकर के साथ साथ अस्पताल बनना पड़ेगा और अस्पताल के हर विभाग का डॉक्टर बनना पड़ेगा।मैं नहीं तय कर सकता कि किस चरण में कौन सी दवा दी जानी चाहिए थी और कौन सी दवा दी गई। 


काश ऐसा न होता। अस्पताल के भीतर भी ऐसे लोग होते तो ग़लत इलाज को ग़लत बोलते या बाहर ऐसी कोई संस्था होती जो ग़लत इलाज को स्थापित करती। जब तक डॉक्टर आगे नहीं आएंगे ऐसी शिकायतों का कोई भविष्य नहीं है। कुछ लोगों ने मुकदमा जीता है तो ऐसे में उन मुकदमों का अध्ययन करना चाहिए और फिर परिजन को कोर्ट में केस करना चाहिए। उसे यह लड़ाई अपने धीरज से लड़नी होगी, ख़बर से नहीं। एक चुनौती यह भी आती है कि दूसरा डॉक्टर ही सही है इसे एक पत्रकार कैसे तय करेगा, जिसका मेडिकल साइंस से कोई वास्ता नहीं है। एक बीमारी के इलाज को लेकर चार डॉक्टर चार ओपनियन देते हैं। कई बार सही इलाज करते हुए भी मरीज़ का बिगड़ जाता है। बहुत से कारण होते हैं। मैं नहीं कह रहा कि ग़लत इलाज नहीं होता। बिल्कुल होता है लेकिन इसे एक विश्वसनीय तरीके से करने की योग्यता मुझमें नहीं है।


 

इस महामारी के सामने भारत की पत्रकारिता फेल हो गई। उसके संस्थानों में एक भी ऐसा नहीं है जो मेडिकल साइंस का जानकार हो और जिसकी विश्वसनीयता हो। जो आई सी एम की गाइडलाइन को चैलेंज करता। जो बताता कि नौ महीने तक गाइडलाइन नहीं बदली गई। क्या इस गाइडलाइन के कारण इलाज को लेकर भ्रम फैला और लोगों की जान गई? पूछता कि कोविड का इलाज कर रहे डाक्टरों के साथ इस गाइडलाइन को लेकर किस तरह का संपर्क किया गया है। जो बताता कि इस अस्पताल का डाक्टर इस तरह से इलाज कर लोगों की जान बचा रहा है या उसका रिज़ल्ट बेहतर है। जो मेडिकल जर्नल के रिसर्च को पढ़कर आपके लिए पेश करता। मेरी तो कमी है ही पत्रकारिता की भी कमी है। विशेषज्ञ के नाम पर जो लोग वैचारिक लेख लिख रहे थे उनमें भी ज़्यादातर बेईमानी थी। वो उपाचर की पद्धति और उसकी कमज़ोरी उजागर नहीं कर रहे थे। कुछ बातें तो कह रहे थे लेकिन बहुत बातें नहीं कह रहे थे। पेशे को बचा रहे थे। जैसे मान लीजिए, कि कोई बताता है कि उसके गांव में चार लोगों की मौत टीका लगाने के तुरंत बाद हो गई। ऐसी सूचना को धड़ाक से प्रसारित करने से कई तरह की भ्रांतियां फैल सकती हैं लेकिन क्या इस सूचना को समझने, टीका से होने वाली मौत के बाद की प्रक्रियाओं को समझने की योग्यता है? नहीं है। 


 हमें अपनी कमियों की सूची बनाती रहनी चाहिए। याद रखना चाहिए कि पत्रकारिता सिर्फ एक पेशा नहीं है बल्कि यह अलग-अलग पेशों को व्यक्त करने वाला पेशा है। इसके लिए सिर्फ एक एंकर नहीं, पूरा सिस्टम चाहिए। आप अगर मेसैज भेज कर मुझे कोसना चाहते हैं तो मुझे बुरा नहीं लगेगा। प्लीज़ कीजिए। कम से कम आपका दुख तो साझा कर ही रहा हूं।मैं आपको सुन रहा हूं। सुनना चाहता हूं। बस कुछ न कर पाने का अफसोस उतना ही है जितना आपको है। 


मुझे अच्छा लगेगा कि आप इस पोस्ट के बाद पत्रकारिता दिवस की बधाई न दें। दिवसों की बधाई से अब घुटन होने लगी है। राजनीतिक और सामाजिक पहचान के लिए हर दिन एक नया दिवस खोजा रहा है। फ़ोटो में अपना फ़ोटो लगाकर बधाई मैसेज ठेल दिया जाता है। यहाँ लोग नरसंहार को चार दिन में भूल गए और आप किसी का फ़ोटो। ठेल कर उम्मीद करते हैं कि महापुरुष जी याद रखे जाएँ। वो भी एक लाइन के बधाई संदेश और फ़ोटो से। है कि नहीं।

फ़िल्मी पोस्टर / राजा बुंदेला

 वक्त बड़ा बेरहम होता है। कभी किसी को नहीं बख्शता यह नामुराद! जिस साम्राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता था, इसने उसे भी डुबो दिया।  इस दौर में टॉ...