गुरुवार, 30 सितंबर 2021

एक यूनिक रियलिटी शो "हम हैं गली गाइस बॉयज एंड गर्ल्स" हुआ लॉन्च

मुम्बई के प्रेस क्लब में


एक यूनिक रियलिटी शो "हम हैं गली गाइस बॉयज एंड गर्ल्स" हुआ लांच !


 शो के ऑर्गनाइजर्स  है दो बच्चे शम्स राठौड़ और जयंत बगदा


रियलिटी शोज़ की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए आज मुम्बई में एक अनोखे किस्म का रियलिटी शो "हम हैं गली गाइस बॉयज एंड गर्ल्स" (Hum Hai Gully Guys Boys & Girls) लांच किया गया।


इस टैलेंट हंट शो की खास बात यह है कि इसके ऑर्गनाइजर्स 2 बच्चे शम्स राठौड़ और जयंत बगदा हैं। इस रियलिटी शो की प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन मुम्बई के प्रेस क्लब में किया गया जहां मीडिया की भारी संख्या मौजूद थी। इस टैलेंट हंट इंडिया 2021) आगामी फैशन शो में सभी प्रकार के कलाकारों को मौका मिलेगा। इसमे हिस्सा लेने के लिए फ्री रजिस्ट्रेशन किया जा सकेगा। इस मे भाग लेने के लिए कोई उम्र की सीमा नहीं होगी और इस मे न कोई टेक है, न कोई रीटेक और कोई ऑडिशन नहीं। इस अनोखे फैशन शो में रैंप वॉक, रियलिटी शो, कोरियोग्राफी, फोटोशूट, मेक ओवर, ग्रूमिंग शामिल रहेगी। ऑर्गनाइजर शम्स राठौड़ ने बताया कि ये शो 3 दिन तक चलता रहेगा। तो अगर आप कलाकार हैं तो आप पंजीकरण करें और इस सुनहरे अवसर का लाभ उठाएं। 3 दिनों के होने वाले इस इवेंट में फ्री रजिस्ट्रेशन होगा, ऑडिशन नहीं लिया जाएगा। यह शो मुम्बई के किसी बड़े रिसोर्ट या फाइव स्टार होटल में होगा। सलमान खान द्वारा एंकर किए जा रहे शो बिग बॉस का फैसला 3 महीने बाद होता है जबकि हम हैं गली गाइस का फ़िनाले ग्रूमिंग के साथ 3 दिनों में रखा जाएगा। इस रियलिटी शो के लॉन्च पर इससे जुड़े कई लोग मौजूद रहे। ऑर्गनाइजर्स बच्चे शम्स राठौड़ और जयंत बगदा के अलावा नदीम शेख, प्रिया बगदा, इकबाल वोरा, प्रिया राठौड़, नितिन तायड़े (अध्यक्ष मारिया क्रिकेट अकादमी आज़ाद मैदान), मुश्ताक चनावाला (वाईस प्रेसिडेंट) उपस्थित रहे। यह रियलिटी शो अपने आप मे एक अलग तरह का कॉन्सेप्ट रखता है जहां पहली बार ऐसा हो रहा है कि दो कम उम्र के बच्चे इस तरह के फैशन शो, रैम्प वॉक का आयोजन कर रहे हैं। दोनो बच्चों शम्स और जयंत की बातों में जो कांफिडेंस दिख रहा था उससे लग रहा था कि दोनों ने काफी तैयारी की है। हालांकि उन्होंने कहा कि उनके माता पिता का इस पूरे मामले में काफी सपोर्ट रहेगा, क्योंकि परेंट्स ने उनकी बहुत हौसलाअफजाई की है और हम चाहते हैं कि देश भर की प्रतिभाएं इस प्रतियोगिता में भाग लें, हमारी टीम उनके टैलेंट को तराशेगी निखारेगी और उन्हें परफॉर्म करने के लिए प्लेटफॉर्म मुहय्या करवाएगी। प्रिया बगदा ने बताया कि इस रियलिटी शो के विनर्स को प्रिया फिल्म्स सिने विज़न के बैनर तले बनने वाले म्यूज़िक वीडियो और फिल्मों में अभिनय का चांस भी दिया जाएगा। प्रिया फिल्म्स सिने विज़न प्रेजेंट्स हम हैं गली गाइस में हिस्सा लेने के लिए और इस मामले में अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए आप इस वेबसाइट पर जाकर डीटेल देख सकते हैं। www.priyafilmscinevision.com इस रियलिटी शो में इवेंट मैनेजमेंट एंड पीआर की जिम्मेदारी फेम मीडिया (वसीम सिद्दीकी और नजमा शेख) द्वारा निभाई जा रही है। फेम


 मीडिया

 Wasim Siddique 9892222175

To Promote Indian Languages, NEP-2020Focuses on Translation

 *To Promote Indian Languages, NEP-2020 Focuses on Translation: Professor Aneja*      


  *_Rajdhani College Organised National Seminar on National Consciousness and Translation_*  September 30th, 2021


English Literary Association (ELA) of Rajdhani College under the aegis of IQAC organized the National Webinar on the topic ‘National Consciousness and Translation’ to mark the special occasion of International Translation Day on 30 September 2021. The National Webinar started with Inaugural Session which was followed by Parallel Sessions and Panel Discussion.


The introductory remarks were given by Dr. Ved Mitra Shukla- The Convenor of the English Literary Association. Prof. Rajesh Giri (Principal, Rajdhani College) in his presidential address addressed the audience with his kind words and wished good luck to the organising team for this event.


Guest of Honour, Prof. Anil Kumar Aneja (Department of English, University of Delhi) enlightened everyone present in the session with his valuable and thoughtful words. He also laid stress upon the distinction between Awareness and Consciousness in his speech. He added that to promote our Indian Languages, National Education Policy 2020 mainly focuses on translation. In this regard, we have to establish several translation institutions.


 Keynote speaker, Prof Panchanan Mohanty gave an elaborate and extensive speech wherein he discussed the complexities involved in defining and understanding the meaning of ‘Translation’. Prof. Varsha Gupta concluded the first session with her vote of thanks.



In the next part of the webinar four parallel sessions were held wherein sixteen papers were presented by scholars of various universities. Each session consisted of well-informed and distinguished presenters and it was a mix of research scholars, freelance translators and working professors.


 Panel Discussion was the last and the final section of the webinar. For this, three speakers were invited namely Dr. Umesh Kumar, Dr. Lalit Kumar and Mr. Shafiqul Alam. Dr. Umesh Kumar (Department of English, Benaras Hindu University) offered the insight that teachers can teach translation through pedagogy in the classrooms. Dr. Shafiqul Alam (Department of English, Rajdhani College, University of Delhi) recounted many of his own experiences with classroom teaching and learning related to translation.


This program with its focus on Translation helped students to understand the significance and complexities involved in Translation studies . The webinar was successful in initiating interest amongst the students towards translation and its practices.

 

 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में अनुवाद की भूमिका : प्रो अनिल अनेजा*

* राजधानी कॉलेज में मनाया गया अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस*_



 अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस के अवसर पर “राष्ट्रीय चेतना और अनुवाद” विषय पर दिल्ली विश्वविद्यालय के राजा गार्डन स्थित  राजधानी महाविद्यालय के अंग्रेजी साहित्य परिषद द्वारा एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमीनार का अयोजन किया गया| इसमें दस से अधिक विश्वविद्यालयों से जुड़े चयनित प्राध्यापकों, विद्वानों व अनुवादकों ने अनुवाद से जुड़े अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए| संगोष्ठी के उदघाटन सत्र में मुख्य अतिथि के तौर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में प्रोफ़ेसर अनिल कुमार अनेजा ने कहा कि राष्ट्रीय चेतना में अनुवाद की बहुत बड़ी भूमिका है| यही कारण है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में अनुवाद को बहुत महत्व दिया गया है| आनुवाद से जुड़ा विषय राष्ट्रीय शिक्षा नीति का एक मजबूत आधारस्तंभ है| उन्होंने महाविद्यालयों में अनुवाद प्रकोष्ठ स्थापित किए जाने का भी आवाह्न किया|


बीजवक्ता के रूप में बोल रहे जी एल ए विश्वविद्यालय मथुरा के अंग्रेजी विभाग से विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर पंचानन मोहंती ने अनुवाद को मानवीय सभ्यता और संस्कृति के विकास में एक आवश्यक कारक मानते हुए पश्चिमी सभ्यता ही नहीं भारतीय सभ्यता के भी सतत पुष्पन-पल्लवन के लिए आवश्यक बताया| राष्ट्रीय चेतना और अनुवाद के सहसंबंध विषय पर उनके द्वारा भारत के औपनिवेशिककाल से लेकर आज के समय के अनेक उदाहरण प्रस्तुत किए| सत्र की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य प्रोफ़ेसर राजेश गिरि ने की| उन्होने कहा की शैक्षणिक संस्थानों की अनुवाद विषय की बहुत ही महत्ता है। ज्ञान विज्ञान के हर क्षेत्र में अनुवाद आज बहुत हद तक अध्ययन अध्यापन अनुवाद द्वारा ही संभव हो रहा है। इस दौरान महाविद्यालय की प्रोफेसर वर्षा गुप्ता व संगोष्ठी के संयोजक डॉ वेद मित्र शुक्ल ने भी अपने विचार रखे|



संगोष्ठी के एक अन्य महत्वपूर्ण सत्र में महाविद्यालयी कक्षाओं में अनुवाद की भूमिका को लेकर गहन चिंतन-मनन किया गया| इस दौरान अध्यक्ष के रूप में डॉ बरुन मिश्र और मुख्य वक्ता के रूप में बनारस हिंदु विश्वविद्यालय से डॉ उमेश कुमार, दिल्ली विश्वविद्यालय के दीनदयाल उपाध्याय कोलेज से डॉ ललित कुमार और राजधानी महाविद्यालय से शफीकुल आलम उपस्थित रहे| विभिन्न सत्रों की अध्यक्षता और संयोजक की भूमिका में डॉ रचना सेठी, डॉ दिव्या बाजपेयी झा, डॉ युमी कपाई, डॉ अनुभा अनुश्री, डॉ शेफाली राठोर, डॉ अदिति शर्मा, नेहा राणा, डॉ सच्चिदानन्द झा आदि विद्वान प्राध्यापक़गण मौजूद रहे| एक दिवसीय संगोष्ठी का संचालन महाविद्यालय के विद्यार्थी स्तुति व महिमा द्वारा किया गया| इस दौरान अर्चित, सक्षम, शुभम, पूजा, कामदेव अविनाशी, हर्षिता पाठक, याशिका, ईशा रानी, ध्रुव मल्होत्रा, आशुतोष राज आदि की विशेष सहभागिता रही|  


                 

साहित्य_इतना_केन्द्रीकृत पहले कभी नहीं था , जितना आज है ........ अनूप शुक्ला

 

          #आदिकाल और #भक्तिकाल के कवि बिखरे हुए थे । उनका बिखराव भौगोलिक भी था और वस्तुगत व भाषागत भी था । उनमें समानता के कुछ बिंदु भले खोज लिए जाएँ , लेकिन उनके साहित्य में पर्याप्त विविधता थी । संचारहीनता के उस युग में अपनी #भौगोलिक_विकेंद्रीयता और #भाषागत_विविधता के चलते उन्होंने बहुत बड़े जनसमुदाय को प्रभावित किया और रचनाओं के माध्यम से अपनी बात लोगों तक पहुँचाने में सफलता प्राप्त की .........

           #साहित्य_के_केन्द्र विकसित होने की परंपरा आधुनिक साहित्य में #आधुनिकतावाद के प्रवेश से बनी । कलकत्ता , पटना , बनारस , इलाहाबाद , कानपुर और #अंततः_दिल्ली क्रमशः साहित्य के केन्द्र बनते चले गए । अजमेर , भोपाल , मुंबई , आगरा , लखनऊ जैसे कुछ #उपकेन्द्र भी बने , लेकिन उनका वह जलवा नहीं था , जो साहित्य के  मुख्य केन्द्रों का था । उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में #कलकत्ता , भारतेन्दु युग में #बनारस तथा  द्विवेदी युग और छायावाद युग में #इलाहाबाद को हिन्दी साहित्य में जो केन्द्रीयता मिली , बाद के समय में #दिल्ली ने उस पर कब्जा कर लिया । दिल्ली #देश_की_ही_राजधानी_नहीं बनी , #साहित्य_की_भी_राजधानी बन गई । बड़े प्रकाशन संस्थान , साहित्य की केन्द्रीय अकादमियाँ , केन्द्रीय विश्वविद्यालय , बड़े अखबार समूहों व केन्द्रीय सरकारी विभागों द्वारा निकाली जाने वाली बड़ी पत्र पत्रिकाएं , विदेशी दूतावासों के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ तथा सहायता-अनुदान-सहयोग-विज्ञापन आदि के लुभावने आकर्षण ने दिल्ली को साहित्य-कला-संस्कृति का स्थायी केन्द्र बना दिया .........

          दिल्ली के साहित्यिक , सांस्कृतिक और प्रकाशकीय गतिविधियों के केन्द्र बनने से साहित्य की विकेंद्रीयता पर ही असर नहीं पड़ा , बल्कि कहीं न कहीं साहित्य और भाषा की विविधता भी प्रभावित हुई । पहले जो लेखक रचना में अपनी भाषा और अभिव्यक्ति के #निजीपन से पहचाने जाते थे , उनमें से अधिकांश #भाषा_और_अभिव्यक्ति के #सामान्यीकरण_और_समानीकरण के शिकार हो गए .........

        इससे साहित्य की समृद्धि बढ़ी या उसका नुकसान हुआ , यह आकलन का विषय है ; लेकिन यह जरूर देखा जाना चाहिए कि #साहित्य_के_लोक_से_कटते_जाने , साहित्य के #सामान्य_पाठकों_के_कम_होते_जाने और #लेखकों_के_ही_साहित्य_का_पाठक_रह_जाने के पीछे साहित्य की इस केन्द्रीयता की कोई भूमिका है या नहीं ?


अनूप शुक्ला 


                                          #अनूप_शुक्ल

राजधानी मेरे कितने ग्वालियर औऱ एक सिंधिया

 कहां सिंधिया, कितने ग्वालियर / विवेक शुक्ला


 दिल्ली में सरोजनी नगर से रिंग रोड के जब आप करीब पहुंचते हैं, बस तब ही सड़क के बायीं तरफ एक विशाल प्लाट नजर आता है। इसे बाहर से देखने पर भी चारों तरफ हरियाली ही हरियाली नजर आती है। साउथ दिल्ली की सोने से महंगी जमीन पर यह सिंधिया विला 32 एकड़ में फैला हुआ है। इस प्लाट का दाम हज़ारों करोड़ रुपए से कम होने का तो सवाल ही नहीं होता।


 इस सिंधिया विला को ज्योतिरादित्य सिंधिया के दादा जीवाराजजी राव सिंधिया ने लगभग तब ही लिया था जब वे राजधानी में ग्वालियर हाउस का निर्माण करवा रहे थे।


 ग्वालियर हाउस राजपुर रोड पर है। इसका पूरा पता है 37 राजपुर रोड। इधर जीवाजीराव सिंधिया अपने दिल्ली प्रवास के समय रहा करते थे। इस एरिया में कोल्हापुर हाउस,उदयपुर हाउस और सिरोही हाउस भी थे।


 सिरोही हाउस में बाबा साहेब अंबेडकर केन्द्रीय कैबिनट से इस्तीफा देने के बाद शिफ्ट कर गए थे। उसमें ही उनका 1956 में निधन भी हुआ था।


दरअसल ग्वालियर राज परिवार को इंडिया गेट के ठीक आगे भी एक प्लाट मिला था ग्वालियर हाउस के निर्माण के लिए। पर उसे राज परिवार ने अज्ञात कारणों से नहीं लिया नहीं था। वहां पर प्रिंसेस पार्क बना।


दरअसल दिल्ली सन 1911 में देश की राजधानी बनी तो अनेक रियासतों ने ब्रिटिश सरकार से आग्रह किया कि उन्हें नई दिल्ली में अपना कोई भवन विकसित करने के लिए जमीन आवंटित कर दी जाए। 


गोरी सरकार ने इस आग्रह को मानते हुए 29 रियासतों को राजधानी के प्रमुख क्षेत्रों में भूमि आवंटित की। तब ही ग्वालियर हाउस बना था। दिल्ली कैंट क्षेत्र में भी एक ग्वालियर हाउस हुआ करता था।


चूंकि बात ग्वालियर की हो रही  है, इसलिए यह बताना जरूरी है कि दिल्ली में 40 के दशक में ग्वालियर ट्रांसपोर्ट कंपनी की बसें कुछ रूटों पर चला करती थीं। डीटीसी बसें जब 1974 तक दिल्ली में सिर्फ 69 रूटों पर दौड़ती थी, इसलिए समझा जा सकता है कि 40 के दशक में तो दसेक रूटों पर ही बसें चलती होंगी।


 जाहिर है,तब तक दिल्ली बहुत छोटा सा शहर था। अधिकतर दिल्ली वाले अपनी मंजिल तक टांगों या साइकिलों पर ही चले जाते थे। कारें तो गिनती के लोगों के पास हुआ करती थी।


खैर, डीटीसी का सिंधिया घराने से संबंध बना रहा है। कनॉट प्लेस के सिंधिया हाउस में ही डीटीसी का लंबे समय से महत्वपूर्ण दफ्तर और स्टैंड है।


 कांग्रेस से भाजपा में पहुंचे और अब  मंत्री गए ज्योतिराजे सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया की 30 सितंबर, 2001 में हुए एक विमान  हादसे में मृत्यु हो गई थी। उनके सम्मान और स्मृति में श्रीमहंत माधवराव सिंधिया रोड है।


 कस्तूरबा गांधी मार्ग से  आंध्र भवन की ओर निकलने वाली सड़क का नाम ही महामना माधवराव

सिंधिया मार्ग है। इधर ही पटौदी  हाउस होता था! अब भी उसके कुछ अवशेष हैं. 

 माधवराव सिंधिया की मां विजयराजे सिंधिया के नाम पर एक सड़क सरोजनी नगर में है। Vivekshukladelhi@gmail.com

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बुधवार, 29 सितंबर 2021

कविता से डरे अंग्रेजों ने पिता-पुत्र को शहीद कर दिया / मनोज कुमार


आजादी के अमृत महोत्सव में संदर्भ मध्यप्रदेश


कविता से डरे अंग्रेजों ने पिता-पुत्र को शहीद कर दिया

मनोज कुमार



हिन्दुस्तान में स्वाधीनता संग्राम का बिगुल बज चुका था. 1857 के विद्रोह की चिंगारी हर वर्ग और हर अंचल में सुलगने लगी थी. किसी को अपनी जान की फिक्र नहीं थी और जो फिक्र थी तो अपने वतन की. अंग्रेजी शासन हर स्तर पर विद्रोह को कुचलने के लिए बर्बर कार्यवाही कर रहा था. इतिहास के सुनहरे पन्नों पर जिन बलिदानियों के नाम अंकित हैं, उनमें राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह का नाम सबसे ऊपर है. पिता-पुत्र की कविता से भयभीत अंग्रेजों ने उन्हें तोप से उड़ा दिया था क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि यह विद्रोह का गीत है. पिता-पुत्र के बलिदान के साथ पूरा देश उनकी जयकारा करने लगा और देखते ही देखते अंग्रेजी शासन के खिलाफ बगावत हो गई. आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर ऐसे वीर पुत्रों का स्मरण कर मध्यप्रदेश की माटी सदैव उनकी ऋणी रहेगी. स्वाधीनता संग्राम के इस महान प्रसंग के माध्यम से नयी पीढ़ी को स्वतंत्रता संग्राम के गौरवशाली इतिहास से परिचित कराया जाना है.

राजा शंकर शाह, कुंवर रघुनाथ शाह, दोनों पिता-पुत्र अच्छे कवि होने के कारण अपनी ओजस्वी कविता के माध्यम से जनमानस में क्रांति का संदेश दिया करते थे. जबलपुर की 52वीं पलटन को मेरठ के सिपाहियों के विद्रोह की जानकारी मिल चुकी थी. जबलपुर में भी वहां की जनता ने गोंडवाना साम्राज्य (वर्तमान का जबलपुर मण्डला) राजा शंकर शाह के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का प्रारंभ कर दिया था. कहा जाता है कि राजा शंकर शाह की आर्थिक स्थिति अत्यंत खराब थी, अंग्रेज सरकार उनको अपने पक्ष में रखने के लिए पेंशन भी दिया करती थी. राजा शंकर शाह चाहते तो क्रांतिकारियों एवं क्रांति का दमन करके अपनी पेंशन भी बढ़वा सकते थे और कुछ अन्य प्रकार के लाभ ले सकते थे.  किंतु उन्होंने अभाव में ही जीना पसंद किया. कुछ भी हो जाए, इस क्रांति का साथ देंगे, समर्पण नहीं करेंगे-संघर्ष करेंगे.

सन् 1857 में सितंबर अंग्रेजों पर आक्रमण की योजना बनी क्योंकि उस दिन अत्यधिक भीड़ भाड़ चहल-पहल रहेगी. अंग्रेज सरकार ने खुफिया रूप से अपने एक गुप्तचर को फकीर के रूप में भेजा था, जिससे राजा की योजना की जानकारी उन्हें प्राप्त हो चुकी थी. अंग्रेज सरकार की 52वीं रेजीमेंट के कमांडर क्लार्क के गुप्तचर उसको समय-समय पर सूचना देते थे. क्रांति के दिन से पहले ही 14 सितंबर, 1857 को आधी रात में क्लार्क ने राजमहल घेर लिया. राजा की तैयारी पूरी नहीं हो पाई राजा शंकर शाह, कुंवर रघुनाथ शाह सहित तेरह अन्य लोगों को भी बंदी बना लिया गया. उन्हें जबलपुर रेलवे स्टेशन के पास अस्थाई जेल बनाकर कैद किया गया था, साथ ही पूरे महल में हथियार और क्रांति की सामग्री थी, उन्हें भी ढूंढा गया.

वह कहते हैं ना, युद्धों में कभी नहीं हारे, हम डरते हैं छल छंदों से, हर बार पराजय पायी है अपने घर के जयचंदों से. राजा के राज्य में भी एक जयचंद था. जिसका नाम गिरधारीलाल दास था. वह क्लार्क को राजा के साहित्य की कविताओं का अनुवाद करके अंग्रेजी में बताता था. कविता के आधार पर मुकदमा चलाया गया. ‘देश के इतिहास में पहली बार था, जिसमें किसी लेख, कविता या साहित्य के आधार पर मुकदमा चलाकर उसे मौत की सजा दी.’ उन्हें माफी मांगने को कहा गया, साथ ही साथ धर्म परिवर्तन करने को कहा गया और अंग्रेजों से सहयोग करने को कहा गया, प्रस्ताव को राजा ने नकार दिया. 03 दिन में मुकदमा चलाया गया, निर्णय भी हो गया. 17 सितंबर, 1857 को दोनों पिता-पुत्र को मौत की सजा सुनाते वक्त उनसे कहा था कि यदि वे माफी मांग लें तो सजा माफ कर दी जाएगी. परंतु आजादी के मस्तानों और दीवानों ने क्षमा नहीं मांगी और अपना सिर कटाना मंजूर किया.

18 सितंबर, 1857 को अपना प्रभाव बनाए रखने के लिये अंग्रेज सरकार ने राजा शंकर शाह, रघुनाथ शाह को जबलपुर उच्च न्यायालय के पास खुले आसमान के नीचे तोपों से बांध दिया गया. तोप से बांधते समय राजा और राजकुमार दोनों सीना तानकर निडर खड़े रहे. भारत माता के वीर सपूत ने भारत माता के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए. मृत्यु से पूर्व उन्होंने अपनी प्रजा को एक-एक छन्द सुनाने चाहा। पहला छन्द राजा शंकरशाह ने सुनाया -

मूँद मूख डण्डिन को चुगलों की चबाई खाई

खूब दौड़ दुष्टन को शत्रु संहारिका।

मार अंगरेज रेज कर देई मात चण्डी

बचे नाहिं बैरी बाल बच्चे संहारिका।

संकर की रक्षा कर दास प्रतिपाल कर

वीनती हमारी सुन अब मात पालिका।

खाई लेइ मलेच्छन को झेल नाहिं करो अब

भच्छन ततत्छन कर बैरिन कौ कालिका।।

यह पूरा होते ही दूसरा छन्द पुत्र ने और भी उच्च स्वर में सुनाया, जिससे जनता जोश से भर गई.

कालिका भवानी माय अरज हमारी सुन

डार मुण्डमाल गरे खड्ग कर धर ले।

सत्य के प्रकासन औ असुर बिनासन कौ

भारत समर माँहि चण्डिके संवर ले।

झुण्ड-झुण्ड बैरिन के रुण्ड मुण्ड झारि-झारि

सोनित की धारन ते खप्पर तू भर ले।

कहै रघुनाथ माँ फिरंगिन को काटि-काटि

किलिक-किलिक माँ कलेऊ खूब कर ले।।

अंग्रेजों का इस तरह सरेआम राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह को तोप से बांधकर मृत्युदंड देने का उद्देश्य लोगों और राजाओं में अंग्रजों का डर पैदा करना था. परन्तु अंग्रेजों के इस कदम से क्रांति और ज्यादा भडक़ गई. दूसरे ही दिन से लोगों द्वारा बड़ी संख्या में उस स्थान की पूजा की जाने लगी. 52वीं रेजिमेंट के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया और इनकी टुकड़ी पाटन की ओर कूच कर गई. विद्रोह की आग मंडला, दमोह, नरसिंहपुर, सिवनी और रामगढ़ तक फैल गई. जगह-जगह अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र क्रांति फैल गई. तोप से उड़ाते समय वहां उपस्थित एक अंग्रेज अधिकारी लिखता है कि - ‘मैं अभी-अभी क्रांतिकारी राजा और उनके पुत्र को तोप से उड़ाए जाने का दृश्य देखकर वापस लौटा हूं. जब उन्हें तोप के मुंह पर बांधा जा रहा था तो उन्होंने प्रार्थना की -भगवान उनके बच्चों की रक्षा करें ताकि वे अंग्रेजों को खत्म कर सकें.’ (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति का शंखनाद करने वाले गोंडवाना के अमर बलिदानी राजा शंकर शाह और उनके पुत्र कुंवर रघुनाथ शाह के बलिदान को भुलाया नहीं जा सकता. आज इन महान शहीद पिता-पुत्र का स्मरण कर एक शहर क्या पूरा देश गौरव का अनुभव करता है और यह सीख देता है कि देश से बड़ा कोई नहीं. उन्हें शत-शत प्रणाम.

धार औऱ मांडू रियासतों की भूमिका

 ‘स्वाधीनता संग्राम की गाथा: धार एवं मांडू रियासत’ विषय पर राष्ट्रीय व्याख्यान


अंबेडकर की प्रतिभा  को बडोदरा स्टेट ने पहचाना- महाराज पवार


महू (इंदौर). डॉ. भीमराव अंबेडकर बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे और बड़ोदरा स्टेट से स्कॉलरशिप मिलने के बाद उनकी प्रतिभा का सही आंकलन हुआ.’ बात यह धार रियासत के महाराज हेमेन्द्र सिंह पवार ने कही. महाराज पवार डॉ. बीआर अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय महू एवं हेरिटेज सोसायटी पटना के संयुक्त तत्वावधान में आजादी का अमृत महोत्सव के अवसर पर ‘‘स्वाधीनता संग्राम की गाथा: धार एवं मांडू रियासत’ विषय पर मुख्य अतिथि की आसंदी से संबोधित कर रहे थे. उन्होंने आगे कहा कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास पर नजर डालें तो स्पष्ट हो जाता है कि किस तरह धार और मांडू रियासत ने भूमिका निभायी है. उन्होंने मराठा राज का भी विस्तार से उल्लेख किया. उन्होंने अनादिकाल से अब तक की परमार वंश की संस्कृति और सभ्यता का विस्तार से उल्लेख किया. ऋषि वशिष्ठ का उल्लेख करते हुए कहा कि परमार कुल का गौरव उनसे है. उन्होंने भगवान राम के बारे में कहा कि वे भी ऋषि वशिष्ठ के आश्रम में शिक्षा ली थी और रघुकुल रीति की परम्परा यहीं से पल्लवित होती है.

महाराज पवार ने विक्रमादित्य एवं राजा भोज का उल्लेख करते हुए परम्परागत संस्कृति और इतिहास का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि ‘कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली’ वाली कहावत सुनी होगी. कुछ लोग इसके पीछे का कारण जानते होंगे. उन्होंने बताया कि एक बार एक राजा ने राजा भोज पर आक्रमण किया तो जनता ने यही कहावत कही जो लोक के चलन में आ गयी. 

इसके पूर्व वरिष्ठ पत्रकार श्री राजेश जौहरी ने पवार राजवंश के बारे में विस्तार से जानकारी दी.  कार्यक्रम की अध्यक्ष एवं कुलपति प्रो. आशा शुक्ला ने अतिथि वक्ता महाराज श्री हेमेन्द्र सिंह पवार का स्वागत किया और विनम्रता के साथ उनका परिचय दिया. कुलपति महोदया ने विश्वविद्यालय की गतिविधियों के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि यूजीसी द्वारा दो प्रोजेक्ट के लिए ब्राउस को मिलने को गौरव का विषय बताया. वेबीनार का संचालन योगिक साइंस विभाग के डॉ. अजय दुबे किया. कार्यक्रम के सह-संयोजक हेरिटेज सोयायटी के महानिदेशक श्री अनंताशुतोष द्विवेदी ने आभार माना. वेबीनार के सफल संचालन के लिए अकादमिक सन्योजक तथा मानद आचार्य भगवान बुद्ध पीठ एवम प्रशासनिक सन्योजक डॉ. एवं रजिस्ट्रार डा. अजय वर्मा के साथ विश्वविद्यालय परिवार का सहयोग रहा.

सृजन शोध औऱ संस्कार का उतावलापन

 एक जुनून.. एक पागलपन.. सृजन की... 


'मुखराम सिंह स्मृति पत्रकारिता-संग्रहालय

 और लोक-विधा,शोध संस्थान,आज़मगढ़'

की स्थापना का प्रस्तावित मूल उद्देश्य, जो मैंने महसूस किया :-


1-देश और दुनिया के विभिन्न भाषाओं के पत्र-पत्रिकाओं के प्रवेशांक,पुरातन और नई प्रतियों का संकलन कर संग्रहालय बना उसका अध्ययन केन्द्र के रूप में विकास, जिससे पत्रकारिता के मूल चरित्र और आधुनिक उद्देश्य की पहचान हो सके और नई पीढ़ियों तक यह ज्ञान पहुँच सके.


2-भारतीय पत्रकारिता का इतिहास, उसकी परिस्थितियों का अध्ययन, उसकी सहयात्री, सहयोगी पत्रों की कहानी और  विस्तृत अध्ययन.


3- स्वतंत्रता संग्राम में क्रांति पथ पर चलने वाले पत्रों की खोज, पहचान, ब्रिटिश दमन और संघर्ष गाथाओं पर शोधवृत्त तैयार करना, जिससे शोधार्थियों को लाभ मिल सके.


4-भारतीय पत्रकारिता विशेष तौर पर आंचलिक पत्रकारिता की मूल प्रवृत्तिओं, उद्देश्यों, परिस्थितियों, लोक से जुड़ाव और प्रभाव का विषद और विस्तृत अध्ययन.


5- एक ऐसे संग्रहालय की परिकल्पना और स्थापना जिसमें केवल पत्रकारिता से जुड़े प्रतीक- चिह्न और उसका इतिहास ही उपलब्ध न हो बल्कि देशभर की आंचलिक, और लोक विधाओं से जुड़ी संस्कृतियों के प्रतीक- चिन्ह, उसके विकास यात्रा के चिन्ह, विशेष तौर पर पूर्वांचल और पश्चिमी बिहार(पूर्वी-पट्टी) की आंचलिक धरोहरों और लोक- प्रवृत्तियों का संकलन तथा प्रदर्शन के साथ शोधदृष्टि.


6- आंचलिक और लोक विधाओं, लोक कलाओं, लोक साहित्य, लोक संगीत, लोक-संस्कृतियों और उसकी विकास यात्राओं का संकलन, अध्ययन 


7-  लोक विधाओं और आंचलिक पत्रकारिता पर शोधकर्ताओं को रिसर्च फैलोशिप प्रदान करना . 


नोट- यह एक परिकल्पना और ड्रीम प्रोजेक्ट भर है, जो आप के सुझाव, सहयोग- समर्थन और समर्पण से न केवल मूर्त रूप ले सकता है बल्कि नये परिवेश का सृजन भी कर सकता है.

तो देशभर के विद्वानों, शोधकर्ताओं, प्रोफेसरों, चांसलरों, वाइस चांसलरों, लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों, लोक विधाओं के प्रतिनिधियों से अपील है कि इस उद्देश्य में अपने महत्वपूर्ण विचार, सहयोग जरूर दें.. जिससे एक पुरातन और आधुनिक विशेषताओं से युक्त एकेडमी/ संस्थान की परिकल्पना पूर्ण हो सकें. खांका खींचा जा सके. साथ ही इसके स्थापना और संचालन में सहयोग कहाँ से मिल सकता है. इस पर भी मार्गदर्शन करें.


सादर, आप का स्नेहांकाक्षी- डॉ० अरविंद सिंह

पत्रकार और लेखक, मो०-8318012069

Email : contact2editor@gmail.com

शिव लिंग के प्रकार एवं महत्त्व,ॐ नमः शिवाय

 प्रस्तुति - ज्योति अग्रवाल


1. मिश्री(चीनी) से बने शिव लिंग कि पूजा से रोगो का नाश होकर सभी प्रकार से सुखप्रद होती हैं।


2. सोंठ, मिर्च, पीपल के चूर्ण में नमक मिलाकर बने शिवलिंग कि पूजा से वशीकरण और अभिचार कर्म के लिये किया जाता हैं।


3. फूलों से बने शिव लिंग कि पूजा से भूमि-भवन कि प्राप्ति होती हैं।


4. जौं, गेहुं, चावल तीनो का एक समान भाग में मिश्रण कर आटे के बने शिवलिंग कि पूजा से परिवार में सुख समृद्धि एवं संतान का लाभ होकर रोग से रक्षा होती हैं।


5. किसी भी फल को शिवलिंग के समान रखकर उसकी पूजा करने से फलवाटिका में अधिक उत्तम फल होता हैं।


6. यज्ञ कि भस्म से बने शिव लिंग कि पूजा से अभीष्ट सिद्धियां प्राप्त होती हैं।


7. यदि बाँस के अंकुर को शिवलिंग के समान काटकर पूजा करने से वंश वृद्धि होती है।


8. दही को कपडे में बांधकर निचोड़ देने के पश्चात उससे जो शिवलिंग बनता हैं उसका पूजन करने से समस्त सुख एवं धन कि प्राप्ति होती हैं।


9. गुड़ से बने शिवलिंग में अन्न चिपकाकर शिवलिंग बनाकर पूजा करने से कृषि उत्पादन में वृद्धि होती हैं।


10. आंवले से बने शिवलिंग का रुद्राभिषेक करने से मुक्ति प्राप्त होती हैं।


11. कपूर से बने शिवलिंग का पूजन करने से आध्यात्मिक उन्नती प्रदत एवं मुक्ति प्रदत होता हैं।


12. यदि दुर्वा को शिवलिंग के आकार में गूंथकर उसकी पूजा करने से अकाल-मृत्यु का भय दूर हो जाता हैं।


13. स्फटिक के शिवलिंग का पूजन करने से व्यक्ति कि सभी अभीष्ट कामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ हैं।


14. मोती के बने शिवलिंग का पूजन स्त्री के सौभाग्य में वृद्धि करता हैं।


15. स्वर्ण निर्मित शिवलिंग का पूजन करने से समस्त सुख-समृद्धि कि वृद्धि होती हैं।


16. चांदी के बने शिवलिंग का पूजन करने से धन-धान्य बढ़ाता हैं।


17. पीपल कि लकडी से बना शिवलिंग दरिद्रता का निवारण करता हैं।


18. लहसुनिया से बना शिवलिंग शत्रुओं का नाश कर विजय प्रदत होता हैं।


19. बिबर के मिट्टी के बने शिवलिंग का पूजन विषैले प्राणियों से रक्षा करता है।


20. पारद शिवलिंग का अभिषेक सर्वोत्कृष्ट माना गया है।

21.हीरे से निर्मित शिवलिंग पर अभिषेक करने से दीर्घायु की प्राप्ति होती है.


22 मोती के शिवलिंग पर अभिषेक करने से रोगों का नाश होता है.


23. पुखराज के शिवलिंग पर अभिषेक करने से धन-लक्ष्मी की प्राप्ति होती है.


24. नीलम के शिवलिंग पर अभिषेक करने से सम्मान की प्राप्ति होती है.


25. स्फटिक के शिवलिंग पर अभिषेक करने से मनुष्य की सारी कामनाएं पूरी हो जाती हैं.


26. चांदी से बने शिवलिंग पर अभिषेक करने से पितरों की मुक्ति होती है.


27. ताम्बे के शिवलिंग पर अभिषेक करने से लम्बी आयु की प्राप्ति होती है.


28 .पीतल से बने शिवलिंग पर अभिषेक करने से सुखों की प्राप्ति होती है।

What is Luxury?*

Luxury?*


Luxury is not getting treatment from the most expensive hospital in USA.


Luxury is *being healthy.*


Luxury is not going on a cruise and eating food prepared by a renowned chef.


Luxury is *eating fresh organic food grown in your own backyard*.


Luxury is not having an elevator in your house.


Luxury is *the ability to climb 3-4 stories of stairs without difficulty.*


Luxury is not the ability to afford a huge refrigerator.


Luxury is *the ability to eat freshly cooked food 3 times a day.*


Luxury is not having a home theatre system and watching the Himalayan expedition.


Luxury is *physically experiencing the Himalayan expedition*.


In the 60s a Car was a luxury.

In the 70s a Television was a luxury.

In the 80s a Telephone was a luxury.

In tge 90s a Computer was a luxury... 


So what is a Luxury now??


*Being healthy, being happy, being in a happy marriage, having a loving family, being with loving friends , living in an unpolluted place* 


All these things have become rare.🤔

And these are the real " *luxury* ".

आज़ादी से पहले :और बाद में

 15 अगस्त, 1947 ही क्यों / विवेक शुक्ला


यह सवाल बार-बार पूछा जाता है कि  ब्रिटिश सरकार ने भारत को 15 अगस्त, 1947 को ही क्यों आजाद किया? क्या इस तारीख को चुनने के पीछे कोई खास वजह थी।


लार्ड माउंटबेटन 3 जून,1947 को भारतीय नेताओं से विभाजन की मंजूरी हासिल कर चुके थे। अब वे जल्दी में थे ताकि भारत की आजादी की कोई तारीख की घोषणा कर दें। उसके बाद एक पत्रकार सम्मेलन  राजधानी में हो रहा था। वहां पर सम्मेलन के लगभग आखिर में एक सवाल माउंटबेटन से पूछा गया कि   ‘क्या सत्ता के हस्तांरण ( Transfer of Power) की तारीख तय हुई?’ माउंटबेटन कुछ पल रूकने के बाद कहते हैं-‘भारतीय हाथों में सत्ता अंतिम रूप से 15 अगस्त, 1947 को सौंपी जाएगी।’  


 तब तक खबरिया चैनल और सोशल मीडिया ने तो दस्तक दी नहीं थी। इसलिए सारे देश को माउंटबेटन की घोषाण की जानकारी अगले दिन अखबारों से मिली।


 इतिहासकार श्री राज खन्ना Raj Khanna  ने अपनी किताब ‘आजादी से पहले,आजादी के बाद’ में लिखा है– ‘मौलाना आजाद ने माउंटबेटन से अपील की कि वे आजादी की तारीख को एक साल के लिए बढ़ा दें। जल्दबाजी में बंटवारे से पैदा हो रही दिक्कतों का मौलाना आजाद ने हवाला दिया।’


 वे अपने 4 किंग एडवर्ड रोड के बंगले में पत्रकारों से मिलकर इस मसले पर विस्तार से बात भी कर रहे थे। उस बंगले को उनकी 1958 में मौत के बाद तोड़कर विज्ञान भवन खड़ा किया गया था। तब ही यह सड़क हो गई थी मौलाना आजाद रोड।   


बहरहाल, माउंटबेटन ने किसी की नहीं सुनी। भारत 15 अगस्त, 1947 को आजाद हो गया। माउंटबेटन ने तो नहीं बताया कि उन्होंने क्यों 15 अगस्त, 1947 की तारीख को चुना था भारत को आजाद करने के लिए ।


 राज खन्ना लिखते हैं- ‘माउंटबेटन के प्रेस सचिव कैम्पवेल जॉनसन ने एक बार खुलासा किया था कि 15 अगस्त का दिन इसलिए चुना गया था,क्योंकि 15 अगस्त, 1945 को जापान की सेनाओं ने मित्र देशों की सेना के सामने आत्म समर्पण किया था। इसी दिन दूसरा विश्व युद्ध खत्म हुआ था।’ 

तो साफ है कि माउंटबेटन चाहते थे कि उस विशेष दिन की याद में भारतीयों को 15 अगस्त, 1947 को सत्ता सौंप दी जाए।   

Vivek Shukla

कितने दिल्ली वाले पंजाब के ये 3 सीएम / विवेक शुक्ला

 

पंजाब के नए मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी आजकल खबरों में छाए हुए हैं। पर हम उनकी बात नहीं करेंगे। हम बात करेंगे पंजाब के उन तीन मुख्यमंत्रियों की जिनका राजधानी दिल्ली से करीबी संबंध रहा। सबसे पहले बात एक उस सियासी शख्सियत की जो यहां 1954 में रहने लगी थी। उनका नाम था लछमन सिंह गिल (  जन्म 1917 – मृत्यु 1969)।  वे आगे चलकर पंजाब के मुख्यमंत्री भी बने।


 गिल साहब ने राजौरी गार्डन में प्लाट खरीद कर अपना आशियाना बनाया था। उनका प्लाट 2200 गज का था। लछमन सिंह 1967 में पंजाब के मुख्यमंत्री बने थे।


 लछमन सिंह गिल के मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल को इसलिए खासातौर पर याद किया जाता है कि उन्होंने ही पंजाबी को राज्य की आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलवाया था। यह 13 अप्रैल 1968 की बात है।  गिल साहब मुख्यमंत्री रहते हुए जब भी दिल्ली आते तो अपने निजी आवास में ही ठहरा करते थे। उनकी अकाल मौत के बाद भी उनके परिवार के पास ही रहा उनका घर।गिल का संबंध अकाली दल से था।


जैल सिंह और वो कौन सी सड़क


ज्ञानी जैल सिंह भारत के 1982-87 के दौरान राष्ट्रपति रहे। वे 1956 में बतौर राज्य सभा सदस्य के रूप में दिल्ली आ गए थे। वे राष्ट्रपति पद से मुक्त होने के बाद राजधानी में ही बस गए थे। सरकार ने उन्हें तीन मूर्ति के करीब सर्कुलर रोड में सरकारी आवास अलॉट कर दिया था। राजधानी में उनके घर के दरवाजे हमेशा आम और खास के लिए खुल रहते थे। वे सच में जननेता थे। उन्होंने सिख धर्म के ग्रंथों की पढ़ाई की थी इसलिए उन्हें ज्ञानी का कहा जाने लगा। वे 1972 में पंजाब के मुख्यमंत्री भी बनाए गए।


आपको बता दें कि  राष्ट्रपति भवन के भीतर की एक सड़क का नाम हुक्मी माई रोड है। अगर आप दारा शिकोह रोड ( पहले डलहौजी रोड) के रास्ते राष्ट्रपति भवन में गेट नंबर 37 से अंदर जाते हैं, तब आपको हुक्मी माई रोड मिलती है। 


ज्ञानी जैल सिंह ने राष्ट्रपति पद पर रहते हुए राष्ट्रपति भवन परिसर की इस सड़क का नाम हुक्मी माई रोड रखवाया था। वो हिन्दू और सिख धर्म की प्रकांड विद्वान थीं। उनका जन्म पंजाब में सन 1870 के आसपास हुआ।


 नामधारी सिखों का एक प्रतिनिधिमंडल ज्ञानी जैल सिंह से मिला। इन्होंने ज्ञानी जैल सिंह से आग्रह किया कि वे हुक्मी माई जी के नाम पर नई दिल्ली की किसी सड़क का नाम रखवा दें। जैल सिंह जी को हुक्मी माई की शख्सियत की जानकारी थी। उन्होंने तुरंत इस बाबत निर्देश दिए। जाहिर है, राष्ट्रपति की इच्छा को लागू करने में देरी नहीं हुई ।


कर्जन रोड से पूसा तक 


पंजाब के लोकप्रिय और धाकड़ मुख्यमंत्री के रूप में प्रताप सिंह कैरो  को याद किया जाता है। वे भारत के आजाद होने के पश्चात राज्य विधान सभा के सदस्य निर्वाचित हुए और फिर पंजाब के मुख्यमंत्री बने। वे जब अपने सियासी करियर के शिखर पर थे तब उनकी हत्या कर दी गई थी। यह 1965 की बात है।


 कैरों राजधानी में कर्जन रोड ( अब कस्तूरबा गांधी मार्ग) में अपने एक मित्र से मिलकर वापस चंडीगढ़ जा रहे थे। रास्ते में सोनीपत के पास राई में उनका सुच्चा सिंह और उनके साथियों ने कत्ल कर दिया था। उनके हत्यारे सुच्चा सिंह को पंजाब पुलिस के प्रमुख अश्वनी कुमार ने नेपाल में पीछा करते हुए पकड़ा था। दोनों में हाथापाई हुई थी। पर अश्वनी कुमार के घूंसों की बौछार ने सुच्चा सिंह को पस्त कर दिया था। 


कैंरों का राजधानी के भारतीय कृषि अनुसंधान,  (पूसा) में भी हरित क्रांति की तैयारियों के दौरान आना-जाना लगा रहता था। वे पूसा में गेंहू की फसल का उत्पादन बढ़ाने के लिए गेंहू के उन्नतशील बीज विकसित करने वाले नोबल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर नारमन बोरलॉग और कृषि वैज्ञानिक डा.एम.एस.स्वामीनाथन की टीम से मिला करते थे। उन्हें  कृषि क्षेत्र की गहरी समझ थी।


 डा.एम.एस.स्वामीनाथन और बोरलॉग साहब उन्हें राजधानी के जोंती गांव के किसानों से भी मिलवाते थे।

दिल्ली मेट्रो के मुंडका स्टेशन से करीब 7-8 किलोमीटर दूर है जोंती गांव। ये हरित क्रांति का गांव है। 


जैसा  कि पहले लिखा कि भारतीय कृषि अनुसंधान, पूसा में गेंहू की फसल का उत्पादन बढ़ाने के लिए गेंहू के उन्नतशील बीज विकसित किए गए थे।इन्हीं बीजों को जोंती में लगाने का फैसला हुआ था। जोंती को  इसलिए चुना गया था क्योंकि यहां पर नहर का पानी आता था। कैंरों जोंती के लोगों से बार बार मिला करते थे। Navbharatimes 23 September 2021

Vivekshukladelhi@gmail.com 


Pictures- PS Kairon with Pt. NEHRU and Lachman Singh

आँख में भर लों पानी.../+विवेक शुक्ला

 ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आंख में भर लो पानी...


राजधानी दिल्ली 27 जनवरी 1963 को कड़ाके की सर्दी से दो- चार हो रही थी। इसके बावजूद नेशनल स्टेडियम ( अब दादा ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम) में हजारों लोग एकत्र थे।  उस दिन नेशनल स्टेडियम में चीन के साथ हुई जंग में शहीद हुए जवानों की याद में एक संगीत का कार्यक्रम आयोजित किया गया था।  उस जंग में  उन्नीस रहने के  कारण  देश हताश-निराश था। 


शाम करीब 5 बजे  जब  लता मंगेशकर ने कवि प्रदीप का लिखा अमर गीत ' ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आंख में भर लो पानी...

' गया तो वहां उपस्थित अपार जन समूह के साथ-साथ प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु की आँखें भी नम हो गयीं थीं। दिल्ली ने इससे पहले लता मंगेशकर को किसी कार्यक्रम में गाता हुआ नहीं देखा था। लता जी ने सी.रामचंद्र के संगीत पर जैसे ही गाना शुरू किया था, तो स्टेडियम का मंजर देखने लायक था। दिल्ली वालों की आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बहने लगी थी। कुछ पलों तक के लिए तो स्टेडियम में शांति छा गई थी। फिर वहां पर देश भक्ति के कुछ देर तक नारे लगे और दिल्ली वाले अपने घरों की तरफ निकलने लगे।


दिल्ली में कहां रहती थीं लता मंगेशकर

भारत की सबसे लोकप्रिय और आदरणीय गायिका लता मंगेशकर का आज 28 सितंबर को जन्मदिन है। उनका जन्म 1929 में  इंदौर में हुआ था। लता मंगेशकर ने राजधानी में राज्यसभा के नामित सदस्य के रूप में सरकार से मिले सरकारी बंगले को लेने से इंकार कर दिया था। 


उनके पास विकल्प था कि वे फिरोजशाह रोड या कोपरनिक्स मार्ग में से किसी एक जगह पर बंगला ले लें। इसके अलावा, भारत रत्न से सम्मानित लता मंगेशकर ने 6 साल तक सांसद रहने के दौरान वेतन-भत्तों के चेक भी नहीं लिए। वह साल 1999 से 2005 तक राज्यसभा की मनोनीत संसद सदस्य रही थीं। इस दौरान उन्होंने न तो वेतन लिया और न ही भत्ते। जब उन्हें चेक भेजे गए तो वहां से वापस आ गए। 


लता मंगेशकर ने कभी भी सांसद पेंशन के लिए भी आवेदन नहीं किया है। जानकारों ने बताया कि लता मंगेशकर अपने दिल्ली प्रवास के दौरान डोगरी की लेखिका पदमा सचदेव के बंगाली मार्केट स्थित घर में भी रहीं। दोनों में बहुत घनिष्ठ संबंध थे।


लता मंगेशकर का एहसान दिल्ली पर


लता मंगेशकर दिल्ली में गुजरे साठ सालों से आ रही हैं।  लता मंगेशकर ने 1983 में राजधानी के इंद्रप्रस्थ स्टेडियम में अपने पसंदीदा गीत सुनाकर दिल्ली को कृतज्ञ  किया था। उस कार्यक्रम का आयोजन भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने किया था ताकि कपिल देव के नेतृत्व में वर्ल्ड कप क्रिकेट चैंपियन बनी भारतीय टीम के खिलाड़ियों को पुरस्कृत किया जा सके। तब तक बोर्ड की माली हालत कोई बहुत बेहतर नहीं थी।


 लता जी ने यहां कार्यक्रम पेश करने के बदले में एक पैसा भी नहीं लिया था। वह बोर्ड के उस वक्त के अध्यक्ष एन.के.पी. साल्वे के आग्रह पर आईं थीं। साल्वे साहब सुप्रीम कोर्ट के मशहूर वकील हरीश साल्वे के पिता थे।


इस बीच,जब से उनका राज्यसभा का कार्यकाल समाप्त हुआ तो फिर वह संभवत: इधर नहीं आईं। वह जब राज्यसभा सदस्य थीं तब ही उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया था। यह बात साल 2001 की है। उन्हें पदमा भूषण 1969 में, पदमा विभूषण 1999 में और दादा साहेब फाल्के पुरस्कार 1989 में मिल गया था। जाहिर है, वह इन सब पुरस्कारों को लेने के लिए भी राजधानी आती रहीं।


आप कह सकते हैं कि लता जी के आजाद भारत के सभी प्रधानमंत्रियों से व्यक्तिगत संबंध रहे। वे इनसे कभी ना कभी दिल्ली में अवश्य मिलीं। सब प्रधानमंत्री भी उनसे मिलकर उपकृत हुए। Navbharatimes 

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PICTURE :LATA JI IN NATIONAL STADIUM

मंगलवार, 28 सितंबर 2021

भगत सिंह की वो कौन थीं / विवेक शुक्ला

 शहीद भगत सिंह को आज सारा देश उनके जन्म दिवस पर याद कर रहा है। वे देश के सबसे आदरणीय आइकन में से एक माने जाते हैं। आज उनके साथियों जैसे सुखदेव, राज गुरु और बी.के.दत्त का भी जिक्र लाजिमी तौर पर हो रहा है। लेकिन,एक उस महिला को लगभग देश भूल सा गया जो भगत सिंह की परम सहयोगी थीं।


 राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद शहर में एक सड़क का नाम दुर्गा भाभी मार्ग है। हो सकता है कि नौजवान पीढ़ी को दुर्गाभाभी के संबंध में कम या कतई जानकारी न हो। दुर्गा भाभी, जिनका पूरा नाम दुर्गा देवी वोहरा था, ने एक बार भगत सिंह को उनकी पत्नी बनकर उन्हें पुलिस से बचाया था। वो मशहूर हुईं दुर्गा भाभी के रूप में।

 

इसलिए वह बनीं भगत सिंह की पत्नी


कैसे और क्यों बनना पड़ा था दुर्गा भाभी को भगत सिंह की पत्नी?भगत सिंह ने अपने क्रांतिकारी साथी राजगुरु के साथ मिलकर 17 दिसंबर, 1927 को लाहौर में गोरे पुलिस अफसर जे.पी. सांडर्स की हत्या की। उसके बाद वे मौका-ए-वारदात से फरार हो गए। पंजाब पुलिस उनकी गिरफ्तारी के लिए दबिश मारने लगी। सारे लाहौर को घेर लिया गया। चप्पे-चप्पे पर पुलिस। तब भगत सिंह के साथियों ने तय किया कि दुर्गा भाभी को भगत सिंह की पत्नी बनाया जाए। 


दुर्गा भाभी ने इस मिशन को पूरा करने की जिम्मेदारी उठाई। दुर्गा भाभी तय जगह पर पहुंची। वहां पर भगत सिंह थे। तब उनकी गोद में उनका तीन साल का पुत्र साची भी था। तब भगत सिंह एंग्लो इंडियन लूक में दुर्गा भाभी के साथ लाहौर से रेल निकले थे। वे पुलिस की पैनी नजरों से बचने के लिए विवाहित इंसान बनने की कोशिश में सफल रहे। दुर्गा भाभी इस दौरान उनकी पत्नी बनने का रोल कर रही थीं। उनके साथ राज गुरु भी थे।  कुछेक जगहों पर पुलिस ने उन्हें रोका भी। लेकिन, फिऱ जाने दिया। वे लाहौर  रेलवे स्टेशन से निकल गए।दुर्गा भाभी असली जिंदगी में पत्नी थी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपबलिकन एसोसिएशन (एचएसआरए) के सदस्य भगवती चरण वोहरा की। इसी संगठन के सदस्य भगत सिंह भी थे। वोहरा की बम का टेस्ट करते वक्त 1930 में विस्फोट में जान चली गई थी।


 विख्यात लेखक कुलदीप नैयर ने अपनी किताब Without Fear : Life And Trial Of Bhagat Singh में  साफ तौर पर लिखा है कि भगत सिंह के दुर्गा देवी से संबंधों पर उनके साथी सुखदेव ने एक बार तंज करते हुए कहा भी था "तुम्हारी क्रांति में कोई भूमिका नहीं होगी क्योंकि तुम एक महिला के मोह में फंस चुके हो।" सुखदेव का इशारा दुर्गा देवी की तरफ ही था।


कौन थीं दुर्गा भाभी


दुर्गा भाभी का जन्म सात अक्टूबर 1907 को पंडित बांके बिहारी के यहां हुआ। इनके पिता इलाहाबाद कलेक्ट्रेट में काम करते थे। उनका अल्प आयु में ही विवाह लाहौर के भगवती चरण बोहरा के साथ हो गया। इनके ससुर शिवचरण जी रेलवे में ऊंचे पद पर तैनात थे। भगवती चरण बोहरा राय साहब का पुत्र होने के बावजूद अंग्रेजों की दासता से देश को मुक्त कराना चाहते थे। वर्ष 1920 में पिता जी की मृत्यु के पश्चात भगवती चरण वोहरा खुलकर क्रांति में आ गए और उनकी पत्‌नी दुर्गा भाभी ने भी पूर्ण रूप से सहयोग किया।


मार्च 1926 में भगवती चरण वोहरा व भगत सिंह ने संयुक्त रूप से नौजवान भारत सभा का प्रारूप तैयार किया और रामचंद्र कपूर के साथ मिलकर इसकी स्थापना की। कहते हैं कि दुर्गा भाभी का काम साथी क्रांतिकारियों के लिए राजस्थान से पिस्तौल लाना व ले जाना था। चंद्रशेखर आजाद ने अंग्रेजों से लड़ते वक्त जिस पिस्तौल से खुद को गोली मारी थी उसे दुर्गा भाभी ने ही लाकर उनको दी थी।


 कैसे गुजरी जिंदगी दुर्गा भाभी की


भगत सिंह को 23 मार्च, 1931 को राज गुरु और सुखदेव के साथ फांसी हो जाती है। उनका संगठन बिखर सा गया। उसके बाद दुर्गा भाभी ने 1940 में लखनऊ के कैंट इलाके में एक बच्चों का स्कूल खोला। उसे वह दशकों तक चलाती रहीं। 70 के दशक तक दुर्गा भाभी लखनऊ में ही रहीं। फिर उन्होंने अपने परिवार के कुछ सदस्यों के साथ गाजियाबाद में शिफ्ट कर लिया। उनसे इस लेखक और सोशल वर्कर Jitender Singh Shunty को 1996 में मुलाकात करने का मौका मिला। काफी वृद्ध हो चुकी थी दुर्गा भाभी तब तक। गुजरे दौर की यादें धुंधली पड़ने लगी थीं। पर, भगत सिंह का जिक्र आते ही फिर वह उन्हीं दिनों में वापस चली गईं थी । उन्होंने उस सारे घटनाक्रम को सुनाया जब वह बनीं थी भगत सिंह की पत्नी। तब उनके पुत्र साची ही उनकी सेवा करते थे। उनसे मिलने दिल्ली के तब तक के मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना भी गाजियाबाद गए थे।


खैर,दुर्गाभाभी का 15 अक्तूबर 1999 को गाजियाबाद में निधन हो गया था। उनकी मृत्यु पर तब कोई खास प्रतिक्रिया भी नहीं हुई थी। गाजियाबाद शहर और देश को कुछ दिनों के बाद मालूम चला था कि जिस बुजुर्ग महिला का निधन हुआ है भगत सिंह की साथी थी। उनकी मृत्यु के बाद उनका पुत्र साची और परिवार के  शेष सदस्य कनाडा शिफ्ट कर गए थे।


आपको याद होगा कि रंग दे बसंती फिल्म में में सोहा अली खान ने निभाया था दुर्गा भाभी का किरदार। अब आप गाजियाबाद के राज नगर में किसी से दुर्गा भाभी के घर के रास्ता पूछें तो शायद ही कोई आपकी मदद करे। अफसोस कि हमने एक आदरणीय क्रांतिकारी को भुला दिया. 

Vivekshukladelhi@gmail.com 

प्रभात खबर में छपे लेख के अंश.

रविवार, 26 सितंबर 2021

विविध आयामी व्यक्तित्व के सुरेश्वर त्रिपाठी

 #शख्सियत ( प्रेरक व्यक्तित्व ) / डॉ. सुरेश्वर त्रिपाठी

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25 सितंबर 2021- शनिवार की शाम दिल्ली से अपनी स्कूटी द्वारा मेरे अग्रज व अभिन्न मित्र ,काशी हिंदू विश्वविद्यालय ,वाराणसी के  डॉ. सुरेश्वर त्रिपाठी जी का आगरा मेरे आवास पर आना हुआ । मित्रों और जनमानस में अपनी यायावरी प्रवृत्ति के कारण अत्यंत लोकप्रिय डॉ. त्रिपाठी लगभग चार दशक से प्रकृति ,ग्रामीण जीवन एवं वन्य जीवन (विशेषकर पक्षियों का छायांकन) पर काम करते हुए अपनी विशिष्ट पहचान बना चुके हैं । बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी मोहल्ला अस्सी ,वाराणसी के सुप्रसिद्ध प्रत्रकार ,लेखक ,पर्यावरण के सजग प्रहरी एवं उत्कृष्ट छायाकार से एक लंबी अवधि के बाद मिलना मेरे लिए अत्यंत हर्षदायक व आह्लादकारी रहा । 

★ सृजन मूल्यांकन का छठा अंक  डॉ. सुरेश्वर त्रिपाठी पर ही केंद्रित है । जिसका शीर्षक  है :-  एक उपेक्षित नायक 

उन्होंने मुझे भेंट किया ।

★ मैंने #भावक पत्रिका के "कुंभ विशेषांक" के दोनों अंकों और सौरत्न माला श्रृंखला के अंतर्गत प्रकाशित पं.विद्यानिवास मिश्र पुस्तक भी उन्हें भेंट किया । कुंभ विशेषांक में आपका एक आलेख भी प्रकाशित हुआ है ।

★  डॉ. सुरेश्वर के चार कथा- संग्रह हैं:-

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1- गीली रेत का घरौंदा

2- बंद होठों की चित्कार

3- मैं सावित्री नहीं

4- रतनपुरा की बसंती 

★ कविता संग्रह :-

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1- लहरें सुनाती हैं लोरी

★ यात्रा वृत्तांत :-

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1- मैं हवा हूँ - भाग 1

★ आपकी रचनाओं व प्रकाशित साहित्य के ऊपर एक एम.फिल. उपाधि भी दी जा चुकी है ।

★ भ्रष्ट पत्रकारिता एवं

 साहित्य के ख़िलाफ़ 1993 से "काशी प्रतिमान" नामक पाक्षिक पत्रिका का प्रकाशन करके पीत पत्रकारिता के ख़िलाफ़ आंदोलन की शुरुआत भी किया ।

आपकी कविताएं ,कहानियाँ एवं विविध विषयों पर आलेख भी प्रकाशित होते रहते हैं ।

मैं आराध्य बाबा विश्वनाथ जी से आपके उत्तम स्वास्थ्य एवं दीर्घायुष्य हेतु प्रार्थना करता हूँ । !! महादेव !! 🌹🙏🌹

रवि अरोड़ा की नजर सेव......

 देखो एक नदी जा रही है  / रवि अरोड़ा



सोशल मीडिया पर सुबह से डॉटर्स डे के मैसेज छाए हुए हैं । इन मैसेज के बीच हौले से किसी ने नदी दिवस का भी मैसेज भेज दिया । याद आया अरे आज तो नदी दिवस भी है । हालांकि ये दिवस विवस अपने समझ में नहीं आते और मुझे अच्छी तरह पता है कि ये बाजार के टोटके भर होते हैं । पश्चिम से आई इस संस्कृति को पश्चिम ने ही नाम दिया है हॉलमार्क डे । माना जाता है कि ग्रीटिंग कार्ड बेचने वाली कंपनी हॉलमार्क ने ही ऐसे दिवसों की इजाद की थी । इस दिन कार्ड खरीदने की फुर्सत भी लोगों के पास हो इसलिए ही इतवार को ही अधिकांश ऐसे दिवस मनाए जाते हैं । इसी कड़ी में डॉटर्स डे और रिवर डे सितंबर के चौथे रविवार को मनाए जाते हैं । हो सकता है दिवसों के इन बाजारी टोटकों के आप हिमायती न हों मगर पता नहीं क्यों मुझे इनमें कोई खास खराबी नज़र नहीं आती । धर्म और सस्कृति के नाम पर यूं भी तो हजार खुराफातें हम करते ही हैं , ऐसे में दो चार दिन और ये पाखंड कर लिया तो क्या फर्क पड़ता है । 


खैर , बेटी और नदी के संदेश मिले तो न जाने क्यों मन उनके बीच तुलना सी करने लगा । हैरानी हुई कि इन दोनों के बीच समानताएं ही समानताएं हैं । सच कहूं तो एक में ऐसा कुछ भी नहीं जो दूसरी में न हो । दुनिया की तमाम संस्कृतियां नदियों के इर्द गिर्द जन्मी तो वे महिलाएं यानी बेटियां ही थीं जिन्होंने उन्हें सुरक्षित रखा । हमारी अपनी भारतीय संस्कृति में तो नदी को मां का ही दर्जा दिया गया जो स्वयं एक बेटी भी है । हम नदियों को पूजते हैं तो कन्याओं के भी पांव बघारते हैं । दोनो ही हमारे जीवन को संवारती हैं और फिर भी अनुशासित रहते हुए  युग युगांतर से अपने लक्ष्य की ओर बिना रुके बढ़ती रहती हैं । बेशक हम लोग इन दोनों के मार्ग में रोड़े अटकाते रहते हैं और उनके अस्तित्व को तरह तरह के बांध बनाकर चुनौतियां देते रहते हैं मगर फिर भी उनके प्रवाह को हम स्थाई तौर पर कभी  बाधित नही कर पाते । हां हमारी खुआफातें बढ़ें तो अपने तट तोड़ना दोनो को आता है । अब उनकी अठखेलियों को हम उनकी जीवंतता न मान कर यदि कुछ और कहने लगें तो यह उनके प्रति ज्यादती न होगी तो और क्या होगी ? दुर्भाग्य ही है कि आज के हालात दोनों के लिए अच्छे नहीं हैं । नदियां खतरे में हैं तो बेटियां भी कहां सुरक्षित हैं । अखबार रंगे रहते हैं बेटियों के प्रति अत्याचार की खबरों से । नदी भी कोई साफ सुथरी अब कहां बची ? दोनो के लिए खतरा हैं वे लोग जो उन्हें अपनी संपत्ति समझते हैं ।  दोनो के लिए उनके अपने ही खतरा हैं । वही दुश्मन हैं जो सुरक्षा का दावा करते हैं । क्या विडंबना है कि हमारी बेटियों और हमारी नदियों दोनो का भाग्य भी हूबहू एक जैसा ही है । 


बैठा हिसाब लगा रहा हूं कि कुदरत ने भी बेटियों और नदियों को एक ही पाले में क्यों रखा है ? जिन संस्कृतियों ने बेटियों की कद्र नहीं की उनको कुदरत ने नदियां भी तो नहीं दीं । जिन्होंने अपनी बेटियों का सम्मान नहीं किया उनके हिस्से नदियां भी तो मैली ही आईं । जहां जहां बेटियों के रास्ते रोक गए उन मुल्कों और संस्कृतियों के हिस्से की नदियां भी अपने महासागर तक कहां पहुंची और किसी खारे पानी की झील अथवा रेत में खुद को गर्क करती नज़र आईं ? वैसे अगर मेरी बात आपको भाषण जैसी न लगे तो आप एक प्रयोग करना । कोई नदी दिखे तो समझना किसी की बेटी है और कोई बेटी दिखे तो मन ही मन कहना देखो एक नदी जा रही है । इससे दोनो का भला होगा ।

रवि अरोड़ा की नजर से

 

उसका भी खाना खराब / रवि अरोड़ा


उर्दू के मशहूर शायर अब्दुल हमीद अदम मेरे पसंदीदा शायर हैं । उनका मुरीद मैं तीन वजह से हूं । पहली वजह है कि वे उस कस्बे तलवंडी में पैदा हुए जहां के बाबा नानक थे । दूसरी वजह यह है कि वे मेरे आदर्श प्रगतिशील आंदोलन से तपे शायर थे और तीसरी वजह है उनका यह कालजई शेर -  दिल खुश हुआ मस्जिद ए वीरां को देख कर , मेरी तरह खुदा का भी खाना खराब है । अब इस मुए कोरोना ने मुझ जैसे लाखों करोड़ों का खाना खराब तो  किया ही है । किसी ने अपनों को खोया तो किसी ने सेहत गंवाई । किसी का काम धंधा चौपट हुआ तो किसी का रोज़गार गया । अपनी सामाजिक,धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं के चलते हमें हर बात के लिए ईश्वर को जिम्मेदार मानते का युगों से अभ्यास रहा है सो अब इस दौरे खाना खराबी में अपने इष्ट को बरी भी लोग बाग कैसे कर पा रहे हो होंगे । जाहिर है कि ऐसे में जब ईश्वर की भी खाना खराबी की कोई खबर मिले तो वहां ध्यान जाना स्वाभाविक ही है ।


 वैसे सकता हो कि यह मेरी दिमागी खलिश हो मगर इसे सिरे से खारिज तो शायद आप भी न कर सकें । खलिश यह है कि देश दुनिया में धर्म की दुकानें अब खतरे में हैं । हालांकि खतरे में तो धर्म भी है मगर अपनी बात के केंद्र मे इसे रख कर मैं आपको नाराज नहीं करना चाहता । पिछले डेढ़ साल से जब से कोरोना की आमद हुई है , अधिकांश धार्मिक स्थलों पर ताले लटक रहे हैं । दुर्गा पूजा, गणेश प्रतिमा विसर्जन, रामलीलाएं, कुंभ मेले, कांवड़ , अमरनाथ , चारधाम और जगन्नाथ रथयात्राओं पर तो ग्रहण लग ही गया है मजार और उर्स भी वीरान हो चले हैं।  हैरानी की बात यह है कि जिन धार्मिक स्थलों पर जाने की कोई पाबंदी नहीं है , वहां भी उतने लोग नही जा रहे जितने पहले जाते थे । नतीजा बड़े बड़े धार्मिक स्थल घाटे में हैं और उन्हें अपना खर्च निकालना भारी पड़ रहा है । और तो और देश का सबसे अमीर पद्मनाभ स्वामी मंदिर भी नुकसान में है । कल ही खबर आई है कि तिरुवंतपुरम स्थित इस मंदिर में रोजाना का चढ़ावा खर्च के लगभग आधा है । हो सकता है केरल में कोरोना के भारी प्रकोप के चलते यह मंदिर खाली पड़ा हो मगर उत्तराखंड में तो कोरोना नहीं है , वहां की चार धाम यात्रा क्यों पहले ही दिन वीरान रही ? अन्य धार्मिक स्थल भी अभी तक क्यों सूने हैं ? 


हमारे मुल्क में सभ्यता की शुरुआत से ही धर्म एक बड़ा बिजनेस मॉड्यूल रहा है । अगर इसे हम अपना सबसे पहला व्यवसाय कहें तो शायद अतिशोक्ति नही होगी । खेती, टेक्सटाइल और आई टी सेक्टर के बाद सबसे बड़ा रोजगार का साधन भी धर्म, उसके केंद्र और उन पर आश्रित व्यवसाय ही हैं । कहना न होगा कि कोरोना ने सब की हवा खराब कर दी है । खास बात यह कि महामारी ने कोई भेदभाव नहीं किया । आस्तिकों को भी उतना लपेटा जितना नास्तिकों को । अब आक्सीजन अथवा इलाज के बिना अपनों को मरते देख कर किसी आस्तिक का भक्ति भाव और मजबूत हुआ होगा, ऐसा नहीं हो सकता । बेशक लोग बाग हरि इच्छा को स्वीकार किए बैठे हों मगर उसके समक्ष नतमस्तक तो वे कदापि नहीं हुए होंगे । अपनो के लिए मांगी गई मन्नतें भी जब स्वीकार नहीं हुईं तो वह भी अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई होंगी । जाहिर है ऐसे में धार्मिक स्थलों में भीड़ कम होने की वजह लोगों की डगमगाई आस्था भी थोड़ी बहुत जरूर होगी ।


मैं कतई उम्मीद नहीं कर रहा कि आप मेरी बात से सहमत हों । आपकी तरह मुझे भी पूरी उम्मीद है कि धार्मिक स्थानों पर कोरोना के खत्म होने के बाद पुनः भीड़ भाड़ होने लगेगी और तमाम धार्मिक स्थल फिर से गुलज़ार होंगे मगर फिर भी आज के हालात को देखते हुए तो आप भी अदम साहब को दाद देने से अपने कैसे रोक पाएंगे जिन्होंने दशकों पहले ही मस्जिद की वीरांनगी में खुदा की खाना खराबी पहचान ली थी ।

आगे कुछ नहीं आता है / रवि अरोड़ा

 कल ही प्रयागराज यानि इलाहाबाद से बाई रोड गाजियाबाद लौटा हूं । इस बार आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे से न होकर वाया कानपुर इटावा होते हुए घर वापिस आने का फैसला लिया था ।  बताया भी गया था कि स्टेट हाई वे बहुत अच्छा है और आप इससे जल्दी आगरा तक पहुंच जाओगे । मगर हुआ इसके विपरीत । गऊ माता की ऐसी कृपा हुई कि सुबह का निकला हुआ देर रात ही घर पहुंच सका । फतेहपुर से लेकर इटावा तक जहां देखो वहीं सड़क के बीचों बीच गौ वंश पसरा हुआ मिला । कानपुर से लेकर इटावा तक के  सफर में तो शायद ही कोई ऐसा पल गुजरा हो जिसमें गायों और सांडों के झुंड नज़र न आए हों । खास बात यह कि ये सभी गाय केवल हाई वे पर ही दिखीं । पता नहीं अपने खेतों को गौ वंश से बचाने के लिए किसानों ने उन्हें हाई वे पर छोड़ा था अथवा स्वयं गौ पालकों ने मगर गौ वंश का घर सा ही लगा स्टेट हाई वे । अगर मै कहूं कि जीवन में पहली बार इतनी गाय मैने अब देखीँ तो यह अतिश्योक्ति न होगी । सच कहूं तो दो सौ तीस किलोमीटर का यह सफर राम राम करते ही बीता । सोच कर भी डर लगा कि यदि गलती से भी किसी गाय को मेरी कार ने टक्कर मार दी तो गौ भक्त जनता न जाने मेरा क्या हाल करेगी । हालांकि हजारों हजार इन गायों का ट्रैफिक सेंस भी गजब का था और इंसानों से बेहतर तरीके से वे सड़क का इस्तेमाल करती दिखीं मगर फिर भी पांच घंटे के इस सफर में डर तो बना ही रहा । घर लौट कर अब हिसाब लगा रहा हूं कि न जाने क्या सोच कर इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज साहब ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की सलाह दी होगी ? 


प्रदेश की योगी सरकार की गायों को बचाने की योजना गायों पर ही भारी पड़ती नजर आ रही है । लोगबाग गाय पालने के लिए सरकार से नौ सो रुपया प्रति माह का अनुदान तो ले रहे हैं मगर चरने के लिए उन्हें खुले में ही छोड़ रहे हैं । कहना न होगा कि दो साल पहले शुरू हुई योगी सरकार की बेसहारा गौ वंश सहभागिता योजना और 109 करोड़ का शुरुआती बजट गायों को ही ले डूबा । आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में लगभग दो करोड़ पशु हैं और उनमें से बारह लाख आवारा हैं । इसके विपरीत गौ शाला केवल पांच सौ तेईस हैं । गाय की हत्या पर चूंकि प्रदेश में दस साल की सजा का अब प्रावधान है अतः हत्या तो उसकी आसानी से नही होती मगर जीते जी मारने की कोई मनाही नहीं है । गाय को प्रताड़ित करने पर तो सज़ा हो सकती है मगर किसी स्कूल में बंद भूखी मारने की पूरी छूट है । 


दुनिया में हर तरह के सर्वे होते हैं । कौन सा देश अथवा समाज सबसे अधिक सुखी है अथवा कौन से देश में शिक्षा अथवा औसत उम्र कितनी है । पता नहीं पाखंड पर कोई सर्वे क्यों नहीं होता । यकीनन ऐसा कोई सर्वे हुआ तो हमारा देश और हमारा समाज सबसे आगे खड़ा मिलेगा । स्कूली दिनों में पढ़ाया जाता था गाय हमारी माता है । बच्चे लोग इससे आगे की तुकबंदी करते हुए कहते थे आगे कुछ नहीं आता है । लगता है बचपन की पैरोडी ठीक थी।  वाकई हमें इतना तो पता है कि गाय हमारी माता है और मगर सच में आगे कुछ नही आता है ।

शनिवार, 25 सितंबर 2021

B4M/ news -100

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