शुक्रवार, 29 दिसंबर 2023

गावों के नाम के पीछे ये क्यों?

 आप लोगों ने गांव के नाम के साथ कलां और खुर्द नाम सुना होगा,देखा होगा।हमारे देश मे हज़ारों गांव ऐसे होंगे जिनके साथ यह नाम जुड़ा होता है।


यह क्यों लगता है कभी सोचा है आपने ?


दरअसल यह फ़ारसी भाषा के शब्द हैं।छोटी आबादी वाले गांवों-कस्बों के पीछे खुर्द शब्द लगाया गया। फ़ारसी के इस शब्द का अर्थ होता है छोटा।देश भर में खुर्द धारी गांवों की तादाद हजारों में है। 


इसी तरह कई गांवों के साथ कलां शब्द जुड़ा मिलता है। जिस तरह खुर्द शब्द छोटे या लघु का पर्याय बना उसी तरह कलां शब्द बड़े या विशाल का पर्याय बना।कलां मूलतः फ़ारसी का शब्द है जिसका मतलब होता है वरिष्ठ, बड़ा, दीर्घ या विशाल।


कलां शब्द का प्रयोग सिर्फ स्थानों का रुतबा बताने के लिए ही नहीं होता था बल्कि व्यक्तियों के नाम भी होते थे जैसे मिर्जा कलां या अमीर कलां अल बुखारी जिसका मतलब बुखारा का महान अमीर होता है। जाहिर है यहां कलां शब्द का अर्थ महान है।


कुछ रोडो के गांव जिनके नाम के साथ कलां और खुर्द लगा है जैसे 

भैणी कलां

भैणी खुर्द

दादुपुर कलां

दादुपुर खुर्द

एंचरा खुर्द


प्रस्तुति -आप लोगों ने गांव के नाम के साथ कलां और खुर्द नाम सुना होगा,देखा होगा।हमारे देश मे हज़ारों गांव ऐसे होंगे जिनके साथ यह नाम जुड़ा होता है।


यह क्यों लगता है कभी सोचा है आपने ?


दरअसल यह फ़ारसी भाषा के शब्द हैं।छोटी आबादी वाले गांवों-कस्बों के पीछे खुर्द शब्द लगाया गया। फ़ारसी के इस शब्द का अर्थ होता है छोटा।देश भर में खुर्द धारी गांवों की तादाद हजारों में है। 


इसी तरह कई गांवों के साथ कलां शब्द जुड़ा मिलता है। जिस तरह खुर्द शब्द छोटे या लघु का पर्याय बना उसी तरह कलां शब्द बड़े या विशाल का पर्याय बना।कलां मूलतः फ़ारसी का शब्द है जिसका मतलब होता है वरिष्ठ, बड़ा, दीर्घ या विशाल।


कलां शब्द का प्रयोग सिर्फ स्थानों का रुतबा बताने के लिए ही नहीं होता था बल्कि व्यक्तियों के नाम भी होते थे जैसे मिर्जा कलां या अमीर कलां अल बुखारी जिसका मतलब बुखारा का महान अमीर होता है। जाहिर है यहां कलां शब्द का अर्थ महान है।


कुछ रोडो के गांव जिनके नाम के साथ कलां और खुर्द लगा है जैसे 

भैणी कलां

भैणी खुर्द

दादुपुर कलां

दादुपुर खुर्द

एंचरा खुर्द

नली खुर्द 

रसूलपुर खुर्द आदि

नली खुर्द 

रसूलपुर खुर्द आदि

गुरुवार, 28 दिसंबर 2023

कोरोना से बचना हैं तो स्टीम भांप करे

 .



 *सभी के लिए महत्वपूर्ण संदेश*


 गर्म पानी तुम

      पेय आपके गले के लिए अच्छा है।


 लेकिन ये कोरोना

       के पीछे छिपा है वायरस

       3 से 4 दिनों तक आपकी नाक का परानासल साइनस।


 गर्म पानी हम

       वहां तक ​​पेय नहीं पहुंचता.


 4 से 5 दिन बाद

     ये वायरस वो

     के पीछे छिपा हुआ था

    परानासल साइनस आपके फेफड़ों तक पहुँच जाता है।


  तो आपको सांस लेने में दिक्कत होने लगती है.


 इसलिए भाप लेना बहुत जरूरी है,


 जो पहुंचता है

     आपके परानासल साइनस के पीछे।


  तुम्हें इसे मारना होगा

    भाप के साथ नाक में वायरस.


 50°C पर यह वायरस निष्क्रिय यानी निष्क्रिय हो जाता है।


 60°C पर यह वायरस

     इतना कमजोर हो जाता है कि कोई भी

      मानव प्रतिरक्षा

      सिस्टम इसके खिलाफ लड़ सकता है.


  70°C पर यह वायरस पूरी तरह से मर जाता है।


 भाप यही करती है.


 सारी जनता

     यह बात स्वास्थ्य विभाग जानता है।


  लेकिन हर कोई लेना चाहता है

     इस महामारी का फायदा.


 इसलिए वे इस जानकारी को खुलकर साझा नहीं करते हैं।


 जो लोग घर पर रहते हैं उन्हें दिन में एक बार भाप लेनी चाहिए।


 अगर आप बाजार में किराने का सामान खरीदने जाते हैं

 सब्जियाँ आदि

  इसे दिन में दो बार लें.


  जो भी मिले

      कुछ लोग या ऑफिस जाते हैं

     दिन में 3 बार भाप लेनी चाहिए।


  *भाप सप्ताह*


    डॉक्टरों के मुताबिक,

 कोविड-19 को मारा जा सकता है

     नाक और मुँह से भाप लेना,

    कोरोना वायरस को ख़त्म करना.


 यदि सभी लोग

    एक सप्ताह के लिए स्टीम ड्राइव अभियान शुरू किया,


 महामारी जल्द ही समाप्त हो जाएगी।


 तो यहाँ एक सुझाव है:


 * एक सप्ताह से प्रक्रिया शुरू करें

 सुबह और शाम, के लिए

   सिर्फ 5 मिनट

     हर बार,

 भाप लेने के लिए.

  

 अगर हम सभी इस प्रथा को एक सप्ताह तक अपना लें तो घातक है


 कोविड-19 मिट जायेगा.


 इस अभ्यास का कोई दुष्प्रभाव नहीं है और इसमें कुछ भी खर्च नहीं होता है।


   तो कृपया यह संदेश अपने सभी प्रियजनों, रिश्तेदारों को भेजें।

     दोस्त और पड़ोसी,

      ताकि हम सब इसे मार सकें

      कोरोना वायरस एक साथ रहें और स्वतंत्र रूप से चलें

     इस खूबसूरत दुनिया में.


           *धन्यवाद*

बुधवार, 27 दिसंबर 2023

औरंगजेब की बीबी का मकबरा औरंगाबाद में


प्रस्तुति - कृति शरण


बीबी का मकबरा महाराष्ट्र के औरंगाबाद में एक मकबरा है, जिसे औरंगजेब ने अपनी पत्नी दिलरास बानू बेगम की याद में बनवाया था।


बीबी का मकबरा 17वीं शताब्दी के अंत में सम्राट औरंगजेब द्वारा महाराष्ट्र के औरंगाबाद में अपनी पहली पत्नी दिलरास बानो बेगम को एक प्रेमपूर्ण श्रद्धांजलि के रूप में बनवाया गया एक मकबरा था। कुछ वृत्तांतों से पता चलता है कि बाद में इसकी देखभाल औरंगजेब के पुत्र आजम शाह ने की थी। यह ताज महल की प्रतिकृति है, और इसे अहमद लाहौरी के बेटे अता-उल्लाह ने डिजाइन किया था, जो ताज महल के प्रमुख डिजाइनर थे।

रविवार, 24 दिसंबर 2023

मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान यथास्थान स्थापित*

 *सुनील कुमार 

          

पुलिस उप महानिरीक्षक, सुनील कुमार की कलम से :-


महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित प्राचीन भारतीय हिन्दू पवित्र आदि महाकाव्य *“रामायण”* के अनुसार ब्रह्मा जी के पुत्र मरीची एवम् मरीचि के पुत्र महर्षि कश्यप ने विवस्वान को जन्म दिया  और विवस्वान से ही सूर्यवंश का उदय हुआ। इसी क्रम में इक्ष्वाकु कुल में  वैवस्वत मन्वंतर के 23 वे चतुर्युग के त्रेता युग में  आज से लगभग 8,80,100 वर्ष पूर्व  महाराज दशरथ और महारानी कौशल्या के सबसे बड़े पुत्र,  सीता माता के पति, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न के भ्राता, लव एवं कुश के पिता  तथा भगवान् विष्णु के 7वें  अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का जन्म भारत के पवित्र सरयू नदी के तट पर बसे अयोध्या नामक नगर जो कि वर्तमान में उत्तर प्रदेश प्रान्त में अवस्थित है में हुआ था। 

 

 **चैत्रे नावमिके तिथौ।।* 

 *नक्षत्रेऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु* ।

 *ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह।।** 


*अर्थात् चैत्र मास की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में, पांच ग्रहों के अपने उच्च स्थान में रहने पर तथा कर्क लग्न में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति के स्थित होने पर (प्रभु श्री राम का जन्म हुआ)।* 


वैदिक धर्म के कई त्योहार जैसे दशहरा, राम नवमी और दीपावली श्रीराम की वन-कथा, अधर्म पर धर्म की विजय,  प्रभु राम के अयोध्या आगमन आदि से जुड़े हुए हैं। रामायण भारतीयों के मन में बसता आया है और आज भी उनके हृदय में इसका भाव निहित है। भारत में किसी व्यक्ति को नमस्कार करने के लिए राम राम, जय सियाराम जैसे शब्दों को प्रयोग में लिया जाता है जो कि  भारतीय संस्कृति के आधार हैं।


श्री राम  मंदिर का निर्माण  भगवान राम के भक्तों के लिए एक सपना था जो कि कई शताब्दियों  की बहु प्रतीक्षा के बाद  बन रहा है। इसके पुनर्निर्माण के लिए 1528 से लेकर 2020 तक यानी 492 साल के इतिहास में कई मोड़ आए।  आइए आपको बताते हैं कि सन 1528 में मुगल बादशाह बाबर के सिपहसालार मीर बाकी ने (विवादित जगह पर) एक मस्जिद का निर्माण कराया। इसे लेकर हिंदू समुदाय ने दावा किया कि यह जगह भगवान राम की जन्मभूमि है और यहां एक प्राचीन मंदिर था। हिंदू पक्ष के मुताबिक मुख्य गुंबद के नीचे ही भगवान श्री राम का जन्म स्थान था। बाबरी मस्जिद में तीन गुंबदें थीं। सन 1853-1949 के दौरान 1853 में इस जगह के आसपास पहली बार दंगे हुए। 1859 में अंग्रेजी सरकार ने विवादित जगह के आसपास बाड़ लगा दी। मुसलमानों को ढांचे के अंदर और हिंदुओं को बाहर चबूतरे पर पूजा करने की इजाजत दी गई। इसके बाद 1949 में असली विवाद शुरू हुआ जब  23 दिसंबर 1949 को भगवान श्री राम की मूर्तियां मस्जिद में पाई गईं। हिंदुओं का कहना था कि भगवान श्री राम प्रकट हुए हैं जबकि मुसलमानों ने आरोप लगाया कि किसी ने रात में चुपचाप मूर्तियां वहां रख दीं। तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने मूर्तियां हटाने का आदेश दिया लेकिन उस समय के जिला मैजिस्ट्रेट (डी.एम.) श्री के.के. नायर ने दंगों और हिंदुओं की भावनाओं के भड़कने के डर से इस आदेश को पूरा करने में असमर्थता जताई। सरकार ने इसे विवादित ढांचा मानकर ताला लगवा दिया। वर्ष 1950 में फैजाबाद सिविल कोर्ट में दो अर्जी दाखिल की गई जिनमे से एक  रामलला की पूजा की इजाजत और दूसरे में विवादित ढांचे में भगवान राम की मूर्ति रखे रहने की इजाजत मांगी गई। 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने तीसरी अर्जी दाखिल की। इसके बाद 1961 में यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड ने अर्जी दाखिल कर विवादित जगह के पजेशन और मूर्तियां हटाने की मांग की एवं वर्ष 1984 में विवादित ढांचे की जगह मंदिर बनाने की। 1984 में विश्व हिंदू परिषद ने एक कमेटी गठित की तथा 1986 में श्री यू. सी. पांडे की याचिका पर फैजाबाद के जिला जज श्री के.एम. पांडे ने 1 फरवरी 1986 को हिंदुओं को पूजा करने की इजाजत देते हुए ढांचे पर से ताला हटाने का आदेश दिया। 6 दिसंबर 1992 को वीएचपी और शिवसेना समेत दूसरे हिंदू संगठनों के लाखों कार्यकर्ताओं ने विवादित ढांचे को गिरा दिया। देश भर में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए  जिनमें 2 हजार से ज्यादा लोग मारे गए। वर्ष 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में विवादित स्थल को सुन्नी वक्फ बोर्ड, रामलला विराजमान और निर्मोही अखाड़ा के बीच 3 बराबर-बराबर हिस्सों में बांटने का आदेश दिया एवं 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाई। 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट का आह्वान किया। बीजेपी के शीर्ष नेताओं पर आपराधिक साजिश के आरोप फिर से बहाल किए। 8 मार्च 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले को मध्यस्थता के लिए  पैनल को 8 सप्ताह के अंदर कार्यवाही खत्म करने को कहा। 1 अगस्त 2019 को मध्यस्थता पैनल ने रिपोर्ट प्रस्तुत की तथा 2 अगस्त 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता पैनल मामले का समाधान निकालने में विफल रहा। तत्पश्चात 6 अगस्त 2019 से सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की रोजाना सुनवाई शुरू हुई और 16 अक्टूबर 2019 को  मामले की सुनवाई पूरी हुई  तथा सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा। इस प्रकार 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने राम मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया जिसमें 2.77 एकड़ विवादित जमीन हिंदू पक्ष को मिली तथा मस्जिद के लिए अलग से 5 एकड़ जमीन मुहैया कराने का आदेश दिया गया। इस तरह 25 मार्च 2020 को तकरीबन 28 साल बाद रामलला टेंट से निकल कर फाइबर के मंदिर में शिफ्ट हुए।


भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद दिनांक 5 अगस्त 2020 को  आधिकारिक तौर पर  भारत के यशस्वी  प्रधानमंत्री  श्री नरेन्द्र मोदी जी के  भूमिपूजन अनुष्ठान के उपरांत मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम के  भव्य  मन्दिर का निर्माण अयोध्या में उनके पवित्र जन्म स्थान पर किया जा रहा है।  श्री राम निर्माण की आधारशिला के समारोह से पहले तीन दिवसीय वैदिक अनुष्ठानों का आयोजन किया गया तथा आधारशिला के रूप में 40 किलो चांदी की ईंट स्थापित की गई। श्री राम मंदिर निर्माण समाज की एकता और समर्पण की भावना को  धरातल पर प्रतिष्ठापित करने में सहायक होगा।  श्री राम मंदिर निर्माण मुद्दे ने सम्पूर्ण भारतीय समाज को राष्ट्रीय, सामाजिक और धार्मिक विकास के माध्यम से एक साथ लाने का कार्य किया है।  


भगवान श्री राम मंदिर का निर्माण हम समस्त भारतीयों लिए एक गौरवपूर्ण, ऐतिहासिक एवं स्वर्णिम क्षण है जो भारत ही नहीं अपितु विश्व समाज को एक सशक्त, सामृद्धिक और समर्पित देव भूमि की ओर लाने में मदद कर रहा है।   श्री राम मंदिर जो कि भारतवर्ष  के अयोध्या नगरी में स्थापित किया जा रहा है न केवल एक  पूजा स्थल होगा  बल्कि एक मनमोहक  ऐतिहासिक पर्यटन नगरी के  प्रतीक के रूप में स्थापित होगा। श्री राम मंदिर श्रद्धालुओं के आध्यात्मिक सुख और शांति का मुख्य केंद्र है। इससे पुरानी और नई पीढ़ियों को आध्यात्मिकता, आदर्शवाद और समरसता की मूलभूतता के प्रतीक मान्यता है।

 सर्वग्राही भगवान श्री  राम  का यह  पावन मंदिर न केवल धार्मिक सहमति का प्रतीक है बल्कि सामरिक समृद्धि  के पथ पर एक महत्वपूर्ण कदम है। श्री राम मंदिर का निर्माण एक सांस्कृतिक पुनर्निर्माण का प्रतीक भी है जिसमें समृद्धि, सामाजिक एकता और समर्पण के मूल मंत्र छिपे हैं।  भगवान श्री राम की अद्वितीयता और धर्म के प्रति आत्मसमर्पण का सिद्धांत हमें एक सामर्थ्यपूर्ण और सहानुभूति भरे जीवन की ओर मोड़ने के लिए प्रेरित करता है। 


श्री राम मंदिर का निर्माण केवल इसके शारीरिक स्थल से ज्यादा अधिक महत्वपूर्ण है। इसके माध्यम से हम श्री राम के आदर्शों, गुणों और उपदेशों से प्रभावित होते हैं। हम श्री राम के साथीत्व, धर्म, धैर्य, सहानुभूति और सावधान बनने का प्रयास करते हैं और इससे हमारा जीवन स्वर्गीय बनता है। श्री राम मंदिर भारतीय सभ्यता का गर्व है। यह एक पवित्र और आध्यात्मिक स्थल है जहां हर व्यक्ति को शांति, सुख और आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह मंदिर हमें याद दिलाता है कि हम प्रत्येक के साथ सहयोग और विनम्रता से एकता और समरसता को स्थापित कर सकते हैं। श्री राम मंदिर  वास्तविक अर्थ में हमारी आध्यात्मिक उन्नयन की प्रेरणा और स्थान है।


इस प्रकार यदि हम संक्षेप में कहें तो अयोध्या नगरी जिसे कौशल जनपद के नाम से जाना जाता था में पवित्र सरयू नदी के तट  पर  पराक्रम, सरलता, सहिषुणता एवं नैतिकता के प्रतीक सर्वग्राही परम आराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के जन्म स्थान पर बन रहे भव्य श्री राम मंदिर का निर्माण एक नवीन युग की शुरुआत को दर्शाता है जिसमें देश व समाज के सभी वर्ग, समुदाय और धर्मों के लोग एक साथ मिलकर पूर्ण भाईचारे के साथ रहते हैं और जो सदैव समृद्धि और शांति की दिशा में काम करते हैं।


   राम मंदिर निर्माण से अनंत ऋषि मुनियों और संत महात्माओं की सदियों से चली आ रही तपस्या सफल होती नजर आ रही है।


   राम मंदिर निर्माण के साथ - साथ भारत ही नहीं अपितु विश्व के अधिकांश देशों के राम भक्तों के लिए राम लला के दर्शनार्थ वायु सेवा के शुरुआत हेतु श्री राम नगरी अयोध्या में हवाई अड्डे का निर्माण कार्य युद्ध स्तर पर चल रहा है जिसका पहला चरण बनकर लगभग तैयार है। प्रथम चरण में घरेलू उड़ान जनवरी 2024  के प्रथम या द्वितीय सप्ताह में शुरू होने की प्रबल संभावना है तथा द्वितीय चरण में अंतराष्ट्रीय उड़ान भी शीघ्र ही शुरू की जाएगी। इस हवाई अड्डे का नाम "मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम हवाई अड्डा" रखा जायेगा जहां भक्तों के प्रवेश करते ही भगवान श्री राम के बचपन से लेकर उनके सभी स्वरूपों का अलौकिक दर्शन किया जा सकता है ताकि भक्तों के अंदर  हवाई जहाज से उतरते ही उनका तन एवम् मन राममय हो जाए। 


   *सुनील कुमार* 

  *उप महानिरीक्षक* 

       *मध्य क्षेत्र* 

    *सीआरपीएफ*   

       *लखनऊ*

अटल रहे सदा अटल 🙏/ विजय केसरी

 (25 दिसंबर,पूर्व प्रधानमंत्री, भारत रत्न अटल बिहारी बाजपेई की 99 वी जयंती पर विशेष)


 पृथक झारखंड प्रांत के अवदान को सदा याद रखेगा JK 





विजय केसरी 



झारखंडवासी पूर्व प्रधानमंत्री, भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेई के पृथक झारखंड प्रांत गठन के  अवदान को कभी विस्मृत नहीं कर सकते हैं। पृथक झारखंड के लिए 1956 में बाबू राम नारायण सिंह ने लोकसभा में पहली बार उसके औचित्य पर अपनी बात प्रस्तुत किया था।  तभी वाजपेई जी को यह बात समझ में आ गई थी कि झारखंड अलग प्रांत का गठन क्यों जरूरी है ? झारखंड अलग प्रांत निर्माण से पूर्व झारखंड के विभिन्न जिलों में उनका दौरा बराबर होता रहता था। वाजपेई जी की जनसभाओं में अपार जनसमूह उन्हें सुनने के लिए एकत्रित होते रहे थे। वाजपेई जी झारखंड आंदोलन से जुड़े स्वर्गीय जयपाल सिंह,   शिबू सोरेन, स्वर्गीय निर्मल महतो, स्वर्गीय विनोद बिहारी महतो आदि नेताओं के संघर्ष को बखूबी समझते थे। उनका पूर्ण मत था कि भाषा, रीति रिवाज, परंपरा आदि के कारण झारखंड अलग प्रांत का गठन होना ही चाहिए । इस संबंध में झारखंड के कई नेताओं से उनकी  निजी तौर पर बातचीत होती रहती थी।  

  हजारीबाग के स्वर्गीय शत्रुघ्न प्रसाद अधिवक्ता, स्व  राम अवतार अग्रवाल, स्व काशी लाल अग्रवाल, स्व सुरेश केसरी,स्व सीताराम केसरी, स्व काली साव, लालजी ठाकुर आदि जनसंघ जमाने  से जुड़े नेताओं को वे  निजी तौर पर नाम से पुकारा करते थे। जब  झारखंड आंदोलन अपने परवान पर था, तभी बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव में यह कहकर इस आंदोलन को पीछे ढकेलने की कोशिश की थी  कि 'झारखंड मेरी लाश पर बनेगा'।  अटल बिहारी वाजपेई के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही झारखंड अलग प्रांत गठन की शासकीय और राजनीतिक पहल शुरू हो गई थी। अटल बिहारी वाजपेई के प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने झारखंड अलग प्रांत गठन में निजी तौर पर अहम भूमिका निभाई थी। तब जाकर 15 नवंबर 2000 में अलग झारखंड प्रांत का गठन संभव हो पाया था।

  अटल बिहारी वाजपेई अपने उत्कृष्ट कार्यों के लिए सदा याद किए जाते रहेंगे। भारतीय राजनीति में उनका प्रवेश कुछ विशेष कार्यों को करने के लिए हुआ था। अपने लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने भारतीय राजनीति को जो दिशा दी, सदा लोगों को प्रेरित करता रहेगा।  उनका संपूर्ण जीवन भारतीय राजनीति के इर्द-गिर्द ही बीता था । उनका जन्म 25 दिसंबर 19 24 को हुआ था। अर्थात भारत की आजादी से मात्र 23 वर्ष पूर्व उनका इस धरा पर आना हुआ था। उन्होंने  युवावस्था में प्रवेश करते ही देश की आजादी के एक  सेनानी के रूप में अपना नाम दर्ज करवा लिया था।  उन्हें छात्र जीवन से ही  राजनीति बहुत पसंद थी।  उन्होंने  देश की एकता और अखंडता को मजबूती प्रदान करने के लिए  ही भारतीय राजनीति में दस्तक दी थी। उन्होंने कहा कि 'राजनीति कोई व्यवसाय नहीं बल्कि राष्ट्र की सेवा ही इसका लक्ष्य होना चाहिए'। 

  अटल बिहारी वाजपेई भी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर की तरह समाज के अंतिम व्यक्ति तक सत्ता का लाभ पहुंचाना चाहते थे। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उनका राजनीति में आना हुआ था। वे इस धरा पर 94 वर्षों तक रहे।  वे सदा समाज के सभी वर्गों के लोगों के कल्याण के लिए अग्रसर रहे थे । वे देश के तीन बार प्रधानमंत्री बने थे । दो बार उनका प्रधानमंत्री बनना और पद से हट जाना  भारतीय राजनीति के लिए उदाहरण बन गया। उन्होंने सत्ता  पर बने रहने के लिए कोई भी सौदा बड़ी नहीं की थी । तीसरी बार 1999 में जब वे प्रधानमंत्री बने, तब उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया था । वे एक राजनेता के साथ कवि और पत्रकार भी थे।  राजनीति में रहकर वे देश के कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में कई आलेख लिखा करते थे। बाद के कालखंड में उन्होंने राष्ट्रधर्म, पांचजन्य, वीर अर्जुन जैसे प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का संपादन भी किया । 

अटल बिहारी वाजपेई भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में एक थे। वे 1968 से 1973 तक भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे।  भारतीय जनसंघ का अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने संपूर्ण देश में पार्टी को मजबूत आधार प्रदान किया । अब अटल बिहारी वाजपेई एक बड़े नेता के रूप में देशभर में जाने लगे थे । 

जब पहली बार अटल बिहारी वाजपेई लोकसभा में पहुंचे थे,तब वे बिल्कुल युवा थे। लोकसभा में अपने पहले ही वक्तव्य  से उपस्थित सांसदों को अपनी ओर आकृष्ट कर लिया था । उनकी बातों में दम होता था। वे लोकसभा में अपना वक्तव्य देने से पूर्व गहराई से अध्ययन मनन करते थे । लोकसभा में सांसद गण उनकी बातों को बहुत ही शांति पूर्वक सुना करते थे। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने भी अटल बिहारी बाजपाई के वक्तव्य की सराहना की थी । जबकि अटल बिहारी वाजपेई ,जवाहरलाल नेहरू की नीतियों की जमकर आलोचना किया करते थे। 

    1975 में जब देश के पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लागू की थी।  अटल बिहारी बाजपेई ने आपातकाल का जमकर विरोध किया था। फलत: अटल बिहारी वाजपेई को जेल में डाल दिया गया था। इसी दरमियान लोकनायक  जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में कई राजनीतिक दलों का विलय कर जनता पार्टी का गठन किया गया था। तब अटल बिहारी वाजपेई ने एक ऐतिहासिक फैसला लेकर भारतीय जनसंघ पार्टी का जनता पार्टी में विलय कर दिया था।  अटल बिहारी वाजपेई के इस निर्णय का उनके ही पार्टी के कई नेताओं ने जमकर विरोध किया था। लेकिन उन्होंने इंदिरा गांधी  की तानाशाही के विरुद्ध में इस निर्णय को उचित बताया। उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए  इसे एक उचित कदम बताया।


 1977 में इमरजेंसी के समापन की घोषणा के बाद जब देश में आम चुनाव हुआ, इस चुनाव में जनता पार्टी को देशभर में जीत हासिल हुई।  केंद्र में जनता पार्टी के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हुआ।  मोरारजी देसाई को देश का प्रधानमंत्री बनाया गया।  अटल बिहारी वाजपेई, जनता पार्टी की सरकार में विदेश मंत्री बने। उनका विदेश मंत्री बनने के साथ ही पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में सुधार हुआ । उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में भाषण देकर हिंदी के गौरव को बढ़ाया। उनका संयुक्त राष्ट्र संघ में दिया गया भाषण आज भी याद किया जाता है । उनके विदेश मंत्री के कार्यकाल में अमेरिका सहित कई यूरोपियों देशों के संबंधों में व्यापक सुधार हुए। भारत की विदेश नीति की चर्चा विश्व भर में होने लगी थी। अब अटल बिहारी वाजपेई  एक अंतरराष्ट्रीय नेता के रूप में जाने लगे थे।  मोरारजी देसाई की सरकार 27 महीने से अधिक  चल नहीं पाई।  जनता पार्टी टूट गई। तब उन्होंने अपनी मूल पार्टी को जनता पार्टी से अलग कर दिया। अपनी पार्टी के मूल विचारधारा के साथ उन्होंने एक नई पार्टी का गठन किया गया, जिसका नामकरण भारतीय जनता पार्टी किया गया। भारतीय जनता पार्टी को देशभर में जन जन तक पहुंचाने के लिए अटल बिहारी वाजपेई और लालकृष्ण आडवाणी सहित कई नेताओं ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी थी । फलत: भारतीय जनता पार्टी एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में स्थापित हो गई।  भारतीय जनता पार्टी अपने पहले लोकसभा चुनाव में मात्र  2 सीटें ही जीत पाई थी । धीरे धीरे कर 1996 तक उनकी पार्टी देशभर में एक बड़ी पार्टी के रूप में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज की। 

  अटल बिहारी वाजपेई ने संपूर्ण देश को जोड़ने वाला चतुर्भुज मार्ग का निर्माण किया।  कई बड़े-बड़े नहरों का निर्माण किया। उन्होंने देश को आणविक रूप से मजबूत करने के लिए पोखरण परीक्षण किया। कई नए मिसाइलों का परीक्षण किया। उन्होंने देश की रक्षा सेवा को  बहुत ही मजबूत किया। 2014 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की हार हुई। इस पराजय को उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया । लेकिन उन्होंने अपने नैतिक मूल्यों के साथ कोई समझौता नहीं किया।अटल बिहारी वाजपेई देश के एक सर्वमान्य नेता के रूप में अपनी पहचान बनाने में सफल हुए। विरोधी भी उनकी सराहना करते नहीं थकते थे। अटल बिहारी वाजपेई सच्चे अर्थों में लोकतंत्र के एक सजग प्रहरी थे।



विजय केसरी,


( कथाकार स्तंभकार),


 पंच मंदिर चौक, हजारीबाग - 825 301,


 मोबाइल नंबर - 92347 99550,

शनिवार, 23 दिसंबर 2023

इतिहास क्या हैं / विकिपीडिया

 


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अतीत का अध्ययन



प्रस्तुति - डॉ. ममता शरण 

इतिहास का प्रयोग विशेषतः दो अर्थों में किया जाता है।जैसे एक है प्राचीन अथवा विगत काल की घटनाएँ और दूसरा उन घटनाओं के विषय में धारणा भारतीय संस्कृति में इतिहास शब्द (इति + ह + आस ; अस् धातु, लिट् लकार अन्य पुरुष तथा एक वचन) का तात्पर्य है "ऐसा वस्तुत: हुआ है "। यूनान के लोग इतिहास के लिए Ιστορία (अंग्रेज़ी: history) शब्द का प्रयोग करते थे। "हिस्टरी" का शाब्दिक अर्थ "बुनना" था। अनुमान होता है कि ज्ञात घटनाओं को व्यवस्थित ढंग से बुनकर ऐसा चित्र उपस्थित करने की कोशिश की जाती थी जो सार्थक और सुसंबद्ध हो। भारतीय इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली है।

बोधिसत्व पद्मपाणि, अजन्ता, भारत।

भारतीय संस्कृति में किसी भी अनुष्ठान से पहले जम्बू द्वीपे भारतखंडे आर्याव्रत देशांतर्गते अमुक। बोलते हैं, इसका अर्थ क्या है?

विज्ञान और अन्वेषण से पता चला है कि कोई 500 लाख साल पहले भारतीय उपमहाद्वीप , एशिया से अलग एक पृथक महादीप था जो कालांतर में आकर एशिया से जुड़ गया । इसी कारण हिमालय पर्वत का निर्माण हुआ जो दो महाद्वीप के टकराव से एक कृत्रिम पर्वत है।

भारतीय कालगणना के हिसाब से 2023 में,कल्प के आरंभ से 197,29,49,123 वर्ष , सृष्टि के आरंभ से 195,58,85,123 वर्ष, कलियुग 5123 वर्ष और विक्रम संवत से 2079 वर्ष बीत चुके हैं । यह गणना भारतीय पंचाग से लिया गया है । भारत वर्ष का प्राचीन काल में एक सुनियोजित और क्रमानुसार इतिहास था जो सत्य घटनाओं पर आधारित था । इसे पुराण के नाम से जाना जाता है। विदेशी आक्रांताओं ने उन सारी पुस्तकों को जला दिया या नष्ट कर दिया जिसमे भारत का इतिहास दर्ज था । नालंदा विश्वविद्यालय, तक्षशीला विश्वविद्यालय में लूटपाट कर इस्लामिक लुटेरों ने मानव विकास की क्रमानुकुल इतिहास सहित कई ज्ञान विज्ञान की पुस्तकों को नष्ट कर दिया है । आज का इतिहास अंग्रेजों द्वारा रचित इतिहास है जो मानवता के विकास को क्रमानुकूल नही दिखाता।

इसलिए आज के इतिहास शब्द का अर्थ है - परम्परा से प्राप्त उपाख्यान समूह (जैसे कि लोक कथाएँ), वीरगाथा (जैसे कि महाभारत) या ऐतिहासिक साक्ष्य।[1] इतिहास के अंतर्गत हम जिस विषय का अध्ययन करते हैं उसमें अब तक घटित घटनाओं या उससे संबंध रखनेवाली घटनाओं का कालक्रमानुसार वर्णन होता है।[2] दूसरे शब्दों में मानव की विशिष्ट घटनाओं का नाम ही इतिहास है।[3] या फिर प्राचीनता से नवीनता की ओर आने वाली, मानवजाति से संबंधित घटनाओं का वर्णन इतिहास है।[4] इन घटनाओं व ऐतिहासिक साक्ष्यों को तथ्य के आधार पर प्रमाणित किया जाता है।

आम तौर पर यह समझा जाता है कि इतिहास की परंपरा सूत व चारण परंपरा से विकसित हुई, जिनके स्तुति काव्य स्वाभाविक रूप से राजाओं और उनके पूर्वजों के वीरता के कृत्यों, विजय और धार्मिकता की कहानियों पर केंद्रित था। इस तरह के पाठ और, बाद में, शिलालेख और साहित्यिक रचनाएँ, सम्राट की महानता और अक्सर उसके दिव्य-वंश की पुष्टि करने का काम करते। यह है एक शैली है जिसमें अतिशयोक्ति को किसी भी प्रकार से दोष नहीं माना जाता। परिणामस्वरूप, रघुवंश और भरत वंश के राजवंशों की यशकाव्य की यह रचनाएं हैं एकत्र होकर अंततः रामायण और महाभारत के स्मारकीय इतिहास-काव्यों में विकसित हुईं।[5]

इतिहास के मुख्य आधार युगविशेष और घटनास्थल के वे अवशेष हैं जो किसी न किसी रूप में प्राप्त होते हैं। जीवन की बहुमुखी व्यापकता के कारण स्वल्प सामग्री के सहारे विगत युग अथवा समाज का चित्रनिर्माण करना दुःसाध्य है। सामग्री जितनी ही अधिक होती जाती है उसी अनुपात से बीते युग तथा समाज की रूपरेखा प्रस्तुत करना साध्य होता जाता है। पर्याप्त साधनों के होते हुए भी यह नहीं कहा जा सकता कि कल्पनामिश्रित चित्र निश्चित रूप से शुद्ध या सत्य ही होगा। इसलिए उपयुक्त कमी का ध्यान रखकर कुछ विद्वान् कहते हैं कि इतिहास की संपूर्णता असाध्य सी है, फिर भी यदि हमारा अनुभव और ज्ञान प्रचुर हो, ऐतिहासिक सामग्री की जाँच-पड़ताल को हमारी कला तर्कप्रतिष्ठत हो तथा कल्पना संयत और विकसित हो तो अतीत का हमारा चित्र अधिक मानवीय और प्रामाणिक हो सकता है। सारांश यह है कि इतिहास की रचना में पर्याप्त सामग्री, वैज्ञानिक ढंग से उसकी जाँच, उससे प्राप्त ज्ञान का महत्त्व समझने के विवेक के साथ ही साथ ऐतिहासक कल्पना की शक्ति तथा सजीव चित्रण की क्षमता की आवश्यकता है। स्मरण रखना चाहिए कि इतिहास न तो साधारण परिभाषा के अनुसार विज्ञान है और न केवल काल्पनिक दर्शन अथवा साहित्यिक रचना है। इन सबके यथोचित संमिश्रण से इतिहास का स्वरूप रचा जाता है।

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