बुधवार, 31 मई 2023

सत्ता और संपत्ति के भार से डगमग पत्रकारिता / अरुण कुमार त्रिपाठी

 Meaning of Hindi Patrakarita Diwas

(30 मई )




हिन्दुस्तानियों के हित हेतु तथा उन्हें परावलंबन से मुक्ति दिलाकर स्वतंत्र दृष्टि प्रदान करने के निमित्त 30 मई 1826 को कलकत्ते के कोलू टोला नामक मुहल्ले के 37 नंबर आमड़ातल्ला गली के पते से युगल किशोर शुक्ल ने हिन्दी का पहला साप्ताहिक पत्र `उदन्तमार्तण्ड’प्रकाशित किया। प्रत्येक मंगलवार को प्रकाशित होने वाला यह पत्र सरकारी सहायता न मिलने के कारण और पर्याप्त ग्राहकों के अभाव में 4 दिसंबर 1827 को सदा के लिए अस्त हो गया। चार दिसंबर के अंतिम अंक में संपादक ने लिखा----

आज दिवस लौ उग चुक्यो मार्तण्ड उदन्त

अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अन्त

इसी पत्र के उदय के उपलक्ष्य में हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। पत्र के बारे में संपादकाचार्य पंडित अंबिका प्रसाद वाजपेयी अपनी पुस्तक `हिन्दी समाचार पत्रों का इतिहास’ में लिखते हैं कि सरकार `जामे जहानुमा’ नामक फारसी पत्र और `समाचार दर्पण’ नाम के बंगला पत्र को आर्थिक सहायता देती थी। इसी के भरोसे युगलकिशोरजी ने भी `उदन्त मार्तण्ड’ निकाल दिया था। परन्तु वह न मिली और किसी धनीमानी के सहायता मिलने की आशा न रही, तब यह मार्तण्ड अस्ताचल को चला गया।’  

पत्र के अवसान पर अपनी टिप्पणी करते हुए हिन्दी पत्रकारिता का प्रामाणिक इतिहास लिखने वाले कृष्ण बिहारी मिश्र लिखते हैं, ` कहना न होगा कि यह पंक्तियां पं. युगल किशोर शुक्ल जी ने बड़ी व्यथा के साथ लिखी होंगी। यह भी कुछ विचित्र संयोग है कि हिन्दी पत्रकारिता के उदय के साथ ही आर्थिक संकट का अशुभ ग्रह उसके साथ लग गया जिसकी कुदृष्टि हिन्दी पत्रकारिता पर सदैव लगी रही।’

लेकिन आज हिन्दी पत्रकारिता के साथ आर्थिक संकट की कुदृष्टि नहीं है बल्कि सत्ता और संपन्नता की कुदृष्टि लगी हुई है। इसी के बारे में सन 1925 में वृन्दावन साहित्य सम्मेलन के अंतर्गत प्रथम संपादक सम्मेलन में संपादकाचार्य बाबूराव विष्णु पराड़कर ने जो बात कही थी वह आज ज्यादा सटीक बैठती है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में अखबार रंगीन होंगे, उनके पास पन्ने ज्यादा होंगे। उनके संपादकों के पास गाड़ियां होंगी। मोटी तनख्वाहें होंगी। लेकिन वह स्वतंत्रता नहीं होगी जो आज उन्हें हासिल है।

पत्रकारिता का दायित्व होता है जनता और सरकार को प्रामाणिक समाचार देना और संतुलित विश्लेषण प्रस्तुत करना। इसके लिए उसके पास इतिहास बोध और एक मूल्यदृष्टि होनी चाहिए। जाहिर सी बात है वह दृष्टि अध्ययन, साधना और संघर्ष से ही आती है। वह न तो मोटी तन्ख्वाह से और न ही सत्ता से निकटता से आती है। पत्रकार प्रभाष जोशी कहते थे कि पत्रकार को ऋषि की तरह से रहना चाहिए। उसे सत्ता से दूर और जनता के मध्य अपने साधनागृह में रहना चाहिए। जैसे ऋषियों की तपोस्थली होती थी। ताकि वह किसी व्यवधान और दबाव से दूर अपने सत्य का अनुसंधान कर सके और जब जरूरत पड़े तो सत्ता के गलियारे में जाकर न सिर्फ उसका हालचाल जाने बल्कि जनता की बात हिम्मत के साथ शासकों के समक्ष कह सके। प्रभाष जोशी ने 1983 में दिल्ली से निकले `जनसत्ता’ अखबार के माध्यम से हिन्दी पत्रकारिता को नया मुहावरा दिया। वे जिस समूह में काम करते थे वह कोई ज्यादा वेतन नहीं देता था। वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करने के लिए पत्रकारों को लंबा संघर्ष भी करना पड़ता था। लेकिन पत्रकारिता के मूल्यों के साथ उन्होंने न्यूनतम समझौता किया। वे सत्ता से लगातार सवाल पूछते रहे। एक दौर में अयोध्या आंदोलन के दौरान वे उस विवाद का कोई समाधान निकालने के लिए समझौता वार्ताओं में लगे थे। लेकिन जब 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरा दी गई तो उन्होंने भारतीय समाज और सत्ता पर सांप्रदायिकता को हावी होते देखा। उन्होंने उसके बाद आजीवन उस प्रवृत्ति का प्रतिकार किया। `हिन्दू होने का धर्म’ जैसी उनकी महत्त्वपूर्ण पुस्तक इसी सिलसिले में लिखे गए लेखों का संकलन है।

प्रभाष जोशी ही नहीं उस समय के तमाम पत्रकारों और पत्र समूहों ने उदारीकऱण और वैश्वीकरण का तीखा विरोध किया। इनमें मालिकों को लग रहा था कि उनका व्यवसाय बंद हो जाएगा। जबकि पत्रकारों को लग रहा था कि उनकी स्वतंत्रता छिन जाएगी। वह विरोध बिना किसी तार्किक परिणति पर पहुंचे खत्म हो गया और पत्रकारिता को एक ओर पूंजी ने अधिग्रहीत कर लिया तो दूसरी ओर उससे निकली सत्ता ने। तभी राबिन जैफ्री ने `भारत की समाचार पत्र क्रांति’ जैसी पुस्तक लिखकर रंगीन होते भारतीय पत्रों और छपाई की प्रौद्योगिकी में आने वाले परिवर्तनों का सुहाना वर्णन किया। इसी सिलसिले में सेवंती नाइनन ने भी `हेडलाइन्स फ्राम हार्ट लैंड’ से लगातार फैलते हिन्दी पत्रों के संसार का रंगबिरंगा चित्र खींचा है। लेकिन इन दोनों लेखकों ने पत्रकारों की घटती आजादी और उनके संकीर्ण होते मानस का बहुत कम जिक्र किया। 

पहले लगता था कि पूंजीवाद और सांप्रदायिकता दो अलग अलग प्रक्रियाएं हैं। कहीं कहीं पूंजीवाद सांप्रदायिकता से लोहा लेता हुआ भी दिखता था। लेकिन इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में दोनों के बीच चोली दामन का साथ हो गया। अब भारत एक नए रास्ते पर चल निकला है और उसकी हिन्दी पत्रकारिता भी पराड़कर जी या प्रभाष जी द्वारा सुझाए गए दायित्वों का निर्वाह करने को तैयार नहीं है। पराड़कर जी ने कहा था कि पत्रकारिता का काम है समाज का चित्र खींचना और उसे सदुपदेश देना। लेकिन पत्रकारिता जो कि अब मीडिया हो गया है इन दोनों कामों से विमुख हो गया है। उसने उसकी ठकुरसोहाती करने की ठान ली है जो उसके विज्ञापन देता है फैक्ट्री के लिए जमीन देता है और कानून से संरक्षण देता है।

नए संसद भवन के उद्घाटन के मौके पर पत्रकारिता(मीडिया) की चीख चिल्लाहटों के बीच वे सारे स्वर दब गए जो आजादी के लंबे संघर्ष और लोकतंत्र के मूल्यों से निकल रहे थे। कोई पराड़कर जी के योगदान को भूल कर कह रहा था कि `संसद’ शब्द तो सावरकर ने दिया था तो कोई सेंगोल नामक राजदंड पर मुग्ध था। शब्दों के उपयोग की सीमाएं टूट गई थीं और पत्रकारिता इक्कीसवीं सदी के पूंजीवाद के साथ सामंती और राजशाही के मूल्यों का गजब का गठबंधन कर रही थी। वह उन सारे मूल्यों और शब्दों को तिलांजलि दे रही थी जो आजादी के संघर्ष में पत्रकारों, जिनमें महात्मा गांधी, तिलक, मौलाना आजाद, डा आंबेडकर और पंडित नेहरू भी शामिल थे, ने बड़ी मेहनत से सृजित किया था।

हिन्दी पत्रकारिता के योगदान की चर्चा उसकी प्रखरता और समन्वय भाव के बिना पूरी नहीं होगी। हिन्दी के तमाम बड़े संपादक इसके प्रतीक हैं। तिलक की परंपरा से आए पराड़कर ने गांधी के प्रति सम्मान व्यक्त किया, तो क्रांतिकारियों की परंपरा से आए माखनलाल चतुर्वेदी जी ने गांधी का नेतृत्व स्वीकार किया। इसी तरह भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद को प्रश्रय देने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी ने सांप्रदायिक सौहार्द के लिए अपने को न्योछावर कर दिया तो उनकी मृत्यु पर महात्मा गांधी ने वैसी ही मृत्यु की आकांक्षा व्यक्त की। पराड़कर जी ने गोडसे की फांसी के बाद जो लेख लिखा है वह आज के हिन्दी पत्रकारों को बार बार पढ़ना चाहिए। उन्होंने लिखा कि गोडसे ने हत्या के अलावा जो दूसरा अपराध किया वो यह कि विश्व के सबसे निन्द्य और अमानुषिक कार्य को सिद्धांतवाद का जामा पहनाया। एक हत्यारा आदर्श का ढोंग रचना चाहता था। फिर उन्होंने लिखा, `मृत्यु के समय गोडसे के हाथ में गीता थी। महात्मा गांधी भी गीता के अनन्य भक्त थे। गांधी और गोडसे की गीता में पाठान्तर था। क्या भारतीय इस पाठान्तर को समझेंगे? गोडसे नहीं गांधी की गीता भारतीय राजनीति का मार्गदर्शन करेगी। यह ध्रुवसत्य है।’

तीन साल बाद हिन्दी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पूरे होंगे। तब इस दो सदी की यात्रा का मूल्यांकन होगा। उस समय अगर समाज ने अपने विवेक का संतुलन कायम रखा तो यह सवाल उठेंगे कि किसने सत्ता से कितने संबंध बनाए और कितना धन कमाया और किसने कितने मूल्य और सिद्धांत बचाए और किसने लोकतंत्र को समृद्ध किया।

रविवार, 28 मई 2023

कौन हैं बारह आदित्य🌞/ पवन पांडेय

 


ऋषि कश्यप की पत्नी अदिति से जन्मे पुत्रों को आदित्य कहा गया है। ये 12 हैं : अंशुमान, अर्यमन, इन्द्र, त्वष्टा, धातु, पर्जन्य, पूषा, भग, मित्र, वरुण, विवस्वान और विष्णु।


1. इन्द्र : यह भगवान सूर्य का प्रथम रूप है। यह देवों के राजा के रूप में आदित्य स्वरूप हैं। इनकी शक्ति असीम है। इन्द्रियों पर इनका अधिकार है। शत्रुओं का दमन और देवों की रक्षा का भार इन्हीं पर है। 


2. धाता : धाता हैं दूसरे आदित्य। इन्हें श्रीविग्रह के रूप में जाना जाता है। जो व्यक्ति सामाजिक नियमों का पालन नहीं करता है और जो व्यक्ति धर्म का अपमान करता है उन पर इनकी नजर रहती है। इन्हें सृष्टिकर्ता भी कहा जाता है। 


3. पर्जन्य : पर्जन्य तीसरे आदित्य हैं। ये मेघों में निवास करते हैं। इनका मेघों पर नियंत्रण हैं। वर्षा के होने तथा किरणों के प्रभाव से मेघों का जल बरसता है। ये धरती के ताप को शांत करते हैं और फिर से जीवन का संचार करते हैं। 


4. त्वष्टा : इनका निवास स्थान वनस्पति में है। पेड़-पौधों में यही व्याप्त हैं। औषधियों में निवास करने वाले हैं।


5. पूषा : इनका निवास अन्न में होता है। समस्त प्रकार के धान्यों में ये विराजमान हैं। इन्हीं के द्वारा अन्न में पौष्टिकता एवं ऊर्जा आती है।


6. अर्यमन : इनको पितरों का देवता भी कहा जाता है। ये वायु रूप में प्राणशक्ति का संचार करते हैं। चराचर जगत की जीवन शक्ति हैं।


7. भग : ये भग देव शरीर में चेतना, ऊर्जा शक्ति, काम शक्ति तथा जीवंतता की अभिव्यक्ति करते हैं। 


8. विवस्वान : ये अग्निदेव हैं। इनमें जो तेज व ऊष्मा व्याप्त है वह सूर्य से है। कृषि और फलों का पाचन, प्राणियों द्वारा खाए गए भोजन का पाचन इसी अग्नि द्वारा होता है।


9. विष्णु : देवताओं के शत्रुओं का संहार करने वाले देव विष्णु हैं। वे संसार के समस्त कष्टों से मुक्ति कराने वाले हैं। माना जाता है कि नौवें आदित्य के रूप में विष्णु ने त्रिविक्रम के रूप में जन्म लिया था।


10. अंशुमान : वायु रूप में जो प्राण तत्व बनकर देह में विराजमान है वही अंशुमान हैं। इन्हीं से जीवन सजग और तेज पूर्ण रहता है। 


11. वरुण : जल तत्व का प्रतीक हैं वरुण देव। ये मनुष्य में विराजमान हैं जल बनकर। जीवन बनकर समस्त प्रकृति के जीवन का आधार हैं।


12. मित्र : विश्व के कल्याण हेतु तपस्या करने वाले, साधुओं का कल्याण करने की क्षमता रखने वाले मित्र देवता हैं।




शनिवार, 27 मई 2023

शब्द *रचे* जाते हैं,

 पता नहीं किस रचनाकार की कृति है ,पर उत्तम है। 


प्रस्तुति : चंद्र shekhar 

 

शब्द *रचे* जाते हैं,

 शब्द *गढ़े* जाते हैं,

  शब्द *मढ़े* जाते हैं,

   शब्द *लिखे* जाते हैं,

    शब्द *पढ़े* जाते हैं,

     शब्द *बोले* जाते हैं,

      शब्द *तौले* जाते हैं,

       शब्द *टटोले* जाते हैं,

        शब्द *खंगाले* जाते हैं,


               ... इस प्रकार


शब्द *बनते* हैं,

 शब्द *संवरते* हैं,

  शब्द *सुधरते* हैं,

   शब्द *निखरते* हैं,

    शब्द *हंसाते* हैं,

     शब्द *मनाते* हैं,

      शब्द *रूलाते* हैं,

       शब्द *मुस्कुराते* हैं,

        शब्द *खिलखिलाते* हैं,

         शब्द *गुदगुदाते* हैं, 

          शब्द *मुखर* हो जाते हैं

           शब्द *प्रखर* हो जाते हैं

            शब्द *मधुर* हो जाते हैं


               ... इतना होने के बाद भी


शब्द *चुभते* हैं,

 शब्द *बिकते* हैं,

  शब्द *रूठते* हैं,

   शब्द *घाव देते* हैं,

    शब्द *ताव देते* हैं,

     शब्द *लड़ते* हैं,

      शब्द *झगड़ते* हैं,

       शब्द *बिगड़ते* हैं,

        शब्द *बिखरते* हैं

         शब्द *सिहरते* हैं


               ... परन्तु


शब्द कभी *मरते नहीं*

 शब्द कभी *थकते नहीं*

  शब्द कभी *रुकते नहीं*

   शब्द कभी *चुकते नहीं*


               ... अतएव


शब्दों से *खेले नहीं*

 *बिन सोचे बोले नहीं*

  शब्दों को *मान दें*

  शब्दों को *सम्मान दें*

   शब्दों पर *ध्यान दें*

    शब्दों को *पहचान दें*

     ऊँची लंबी *उड़ान दें*

      शब्दों को *आत्मसात करें*

       उनसे उनकी बात करें,

        शब्दों का *अविष्कार करें*

          गहन सार्थक *विचार करें*


               ... क्योंकि


शब्द *अनमोल* हैं

 ज़ुबाँ से *निकले बोल हैं*

  शब्दों में *धार होती है*

   शब्दों की *महिमा अपार होती* है

    शब्दों का *विशाल भंडार* होता है


और 


               ... सच तो यह है कि


*शब्दों*

  *का*

    *भी*

      *अपना*

         *एक 🌐 संसार होता है*


                   🙏🙏

                     *शब्दों को*

                     *सहेजें,समेटे और सम्मान दें*

शुक्रवार, 26 मई 2023

मोहब्बत की दुकान

 


यह बंद दुकान दीनानाथ की है जो इंडिया- पाकिस्तान बटवारे के वक़्त बहुत अफसोस के साथ इस दुकान को पाकिस्तान छोड़कर इंडिया चले आए लेकिन जाते वक्त बहुत रोए और पूरे गांव को भी रुलाया। फिर गाँव के लोगों को यह दिलासा दिलाया कि मैं वापिस आप लोगों के पास लौट कर आऊँगा। पाकिस्तान के बलोचिस्तान प्रोविंस के जिला लोरा लाई में मौजूद इस दुकान पर अभी तक वही ताला लगा है जो दुकानदार दीनानाथ जी जाते वक्त लगाकर चाबी अपने साथ ले गया थे। 73 साल से यह दुकान बंद पड़ी है। पाकिस्तानी मकान मालिक जो अब इस दुनियाँ में नही रहा उसने एक कदम आगे बढाते हुए वसीयत कर दी कि इस दुकान का ताला तोड़ना नही जब तक दुकानदार बापिस नहीं आता। इस दुकान के मालिक के मरने के बाबजूद उसके बच्चों ने भी इसका ताला नहीं तोड़ा। वसीयत में लिखा कि मैंने उस दुकानदार को जबान दी है कि यह दुकान तुम्हारे आने तक बन्द रहेगी। मकान मालिक की औलादों ने आज तक उस ताले को हाथ तक नही लगाया। हालाँकि उन्हें मालूम है कि दुकानदार यानी दीनानाथ जी इस दुनियाँ में नही रहे लेकिन वफ़ा की यादगार के तौर पर अब तक यह दुकान दो इंसानों के बीच यादगार की मिसाल बन गई है। कमाल के बंदे थे दोनों- मकान मालिक ते दुकानदार।इंसानों के बीच इतना प्यार ! फिर नफ़रतें कहाँ से आ गई ? कौन ले आया ?

 #विनय_शर्मा

सुरेन्द्र किशोर जी का आशीर्वाद / परशुराम शर्मा

 बात बे बात (1) : 


सुरेन्द्र किशोर जी का आशीर्वाद / परशुराम शर्मा 



कल मेरे फेसबुक वॉल पर हमारे अजीज पत्रकार दोस्त लव कुमार मिश्र का बधाई संदेश मिला। उसमें साथी सुरेन्द्र किशोर  से मेरी पुस्तक पर आशीर्वाद मिलने की बात थी। मैं खुश हुआ। 


मैं अपने बेटे आशीष के साथ अपने मित्र सुरेन्द्र किशोर को अपनी एक पुस्तक भेंट करने गया था। तब का फोटो बेटे ने अपने फेसबुक पर डाल दिया था। हमारे ढेरों शुभचिंतक उस पर अपनी भावना व्यक्त कर रहे थे। इसमें मेरे माननीय जाबिर हुसैन साहब के 'प्रणाम' और लव कुमार मिश्र के 'आशीर्वाद' सरीखे संदेश से मैं चौंका। चकित था कि क्या वाकई हम इस लायक हैं? 


अपनी सक्रिय राजनीतिक यात्रा पूरी कर चुके साहित्यिक मिजाज वाले भलमानस जाबिर साहब की उदारता व सदाशयता का तो कोई जोड़ नहीं। हम सब पहले से परिचित हैं। उन्हें हम प्रणाम करते हैं। पर, पत्रकारिता में हमारे हमसफर साथी लव कुमार की प्रतिक्रिया से अभिभूत हूं कि वाकई सुरेंद्र जी कितने ऊंचे हो गये हैं। सचमुच किसी बड़े की शुभकामना ही तो उनका आशीर्वाद होता है। लव कुमार ने सही कहा है। 


यह मानने में मुझे कोई संकोच नहीं कि साथी सुरेंद्र जी ने पत्रकारिता में एक बड़ी लाइन खींच दी है। वैसे, उम्र के लिहाज से भी वे हमसे दो-ढाई साल तो जरूर बड़े होंगे। भले, हमने आगे-पीछे ही साथ-साथ पत्रकारिता शुरू की हो। भगवान, उन्हें खुब लंबी उम्र दे, ताकि अनेक पुस्तकों के प्रकाशन कराने की उनकी योजना पूरी हो। कल भी इस पर उनसे देर तक बात हुई। पहले भी मैं इसके लिए उन्हें कोंचता रहा हूं।


यह सोच कर किसी को संतोष हो सकता है कि अबतक उनकी कोई पुस्तक छप कर नहीं आयी है। लेकिन, उन्होंने जितना लिखा है, जितने उनके आलेख छपे हैं, वे हमलोगों के बीच सबसे ज़्यादा हैं। वे बड़े लिखाड़ हैं। आज भी निरंतर नियमित लिख रहे हैं और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में  छप भी रहे हैं। उनकी लाइब्रेरी इस कार्य में बहुत सहायक सिद्ध हुई है। एक बड़े हॉल में बड़े जतन से उन्होंने अपना एक निजी लाइब्रेरी बनाया है। उसमें ढेरों पुस्तकें हैं। संदर्भ सामग्री के रुप में नये- पुराने ढेरों अखबारों व पत्रिकाओं तथा उनके कतरनों का भंडार है। सहेज कर उसकी फाइलें तैयार की गई है। कम से कम इस तुलना में मैं तो एकदम फिसड्डी साबित हुआ हूं। खैर, ना तो पहले उतना लिखा, ना अब लिख पाता हूं। अब शीध्र उनकी किताबें भी हमें पढ़ने को मिलेगी।


बहरहाल, बात हो रही थी मित्र लव कुमार  के बधाई संदेश को लेकर, जो मुझे उससे मिला था। चूंकि सुरेन्द्र जी का नया आवास पटना शहर के बाहरी हिस्से में दूर ग्रामीण परिवेश वाले क्षेत्र में पड़ता है। इसलिए कभी-कभार ही वहां जाना संभव हो पाता है। अब पहले की तरह उनसे अक्सर मिलना संभव नहीं होता। यदि कल बेटे की सवारी नहीं मिलती,तो मिलने का मंसूबा ही बनाता रह जाता। वरना, शीत लहर का बहाना तो सामने खड़ा ही था। उस पर सोने में सुहागा आसमान पर छाये बादल एवं बारिश की मौसम विभाग की चेतावनी हमारे जैसे लोगों की हिम्मत तोड़ने के लिए एक सबल आधार था। इधर, मैं महीनों से उन्हें अपनी नई पुस्तक देने जाना चाहता था। चलो,  तमाम अवरोधों के बीच यह मंशा कल पूरी हुई।


शिक्षका से सेवानिवृत्त हुई उनकी पत्नी ने हमेशा की तरह हमारे आवभगत में कोई कोताही नहीं की। नाश्ते में तले हुए ताजे मटर के दाने दिये। वह देख मन हरा हो गया। बड़े चाव से खाया। बचपन से ही इस मौसम का यह हमारा प्रिय नाश्ता रहा है। आजकल सुबह में इसे नियमित लेता हूं। इसके बाद हरा चना का मौसम आने वाला है। वह भी मेरा नियमित नाश्ता होगा। इस मौसम का मेरा मनचाहा हरा मटर मिल गया। यह मेरे लिए उनका स्नेह एवं आशीर्वाद ही तो था। हम आप दोनों के दीर्घायु की कामना करते हैं। 


- परशुराम शर्मा 

           29.12.2021

दिल्ली से सबसे पहले किसने क्लीयर किया यूपीएससी /

 दिल्ली से सबसे पहले किसने क्लीयर किया यूपीएससी इम्तिहान को / विवेक शुक्ल 

संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) परीक्षा के नतीजे आ गए हैं। पहले चार स्थानों पर रहे सफल कैंडिट्टेंस में से तीन दिल्ली यूनिवर्सिटी से हैं। पर हमें तलाश है दिल्ली से सबसे पहले इस इम्तिहान को क्रैक करने वालों की। हालांकि यूपीएससी की तरफ से इस तरह की कोई सूची तो तैयार की गई है। पर माना जाता है कि दिल्ली पुलिस के कमिश्नर रहे वेद मारवाह ने 1956 में यूपीएससी की परीक्षा को क्लीयर किया था। वे संभवत: खाटी दिल्ली वाले पहले अभ्यार्थी  जिसने यूपीएससी परीक्षा को क्लीयर किया था। वे खान मार्केट से सेंट स्टीफंस कॉलेज साइकिल पर ही  जाते थे। वेद मारवाह का परिवार देश के बंटवारे के समय पेशावर से दिल्ली आकर बसा था। उन्हें 1989 में भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार, पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।


 इस बीच,जेएन दीक्षित भी पक्के दिल्ली वाले थे। उन्होंने  यूपीएससी परीक्षा को 1958 में क्रैक किया था। वे हरकोर्ट बटलर स्कूल, मंदिर मार्ग तथा दिल्ली जाकिर हुसैन कॉलेज के स्टुडेंट रहे थे। जेएन दीक्षित भारत के विदेश सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी रहे। दिल्ली क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान वेंकट सुंदरम की बहन की शादी दीक्षित जी से हुई थी। दीक्षित जी का बचपन गोल मार्केट में बीता था।


नटवर सिंह से शुरू हुआ सिलसिलाK


 अगर बात दिल्ली यूनिवर्सिटी की करें तो यहां से सबसे पहले यूपीएससी के इम्तिहान को क्लीयर करने वालों में कंवर नटवर सिंह थे। उन्होंने 1953 में यूपीएससी की परीक्षा को पास करके भारतीय विदेश सेवा को ज्वाइन किया था। वे केन्द्रीय मंत्री भी रहे। वे सेंट स्टीफंस कॉलेज से थे। हालांकि वे दिल्ली से तो नहीं थे। वे यहां पढ़ाई करने के लिए आ गए थे। उनके बाद 1960 और 1970 के दशकों में मणिशंकर अय्यर, अमिताभ पांडे, राज भार्गव, हरदीप पुरी (अब केन्द्रीय मंत्री), नवीन चावला, एस.वाई.कुरैशी ( पूर्व चुनाव आयुक्त), नजीब जंग ( दिल्ली के पूर्व उप राज्यपाल), मीरा कुमार वगैरह ने यूपीएससी परीक्षा में सफलता हासिल की। मीरा कुमार विदेश सेवा में रहीं। वो मिरांडा हाउस से थीं। बाबू जगजीवन राम की पुत्री मीरा कुमार की स्कूली शिक्षा भी दिल्ली में हुई थी। कुरैशी साहब के भाई अजीज कुरैशी को दिल्ली में कौन नहीं जानता। बेहद हैंडसम अजीज भाई भारत की फुटबॉल टीम से खेले। वे रंगकर्मी भी हैं। उन्हें आप शंकर मार्केट में यारों के साथ गप शप करते हुए देख सकते हैं। हरदीप पुरी सेंट एंथनी स्कूल से थे और अमिताभ पांडे मॉडर्न स्कूल में।


 एस जयशंकर और उनके पिता


केन्द्रीय विदेश मंत्री एस. जय़शंकर धौला कुआं के एयर फोर्स स्कूल से हैं। उन्होंने 1977 में यूपीएससी के इम्तिहान को क्लीयर किया था। उनके पिता एस. सुब्रमण्यम 1950 बैच के आईएएस अफसर थे। पर  उन्होंने चेन्नै में रहते हुए उपर्युक्त परीक्षा को दिया थे। वे तब मात्र 21 साल के थे। वे ज्ञान के सागर थे। वे विदेश और रक्षा मामलों के विशेषज्ञ थे।


अशोक वाजपेयी दयाल सिंह कॉलेज से आईएएस


प्रख्यात कवि श्री अशोक वाजपेयी ने 1965 में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की परीक्षा को क्लीयर किया था। उन्होंने सेंट स्टीफंस कॉलेज से अंग्रेजी में एमए की ड्रिगी ली और उसके बाद दयाल सिंह कॉलेज में पढ़ाने लगे थे। अशोक वाजपेयी जी ने अध्यापन के दौरान यूपीएससी की परीक्षा क्रैक किया। इस बीच, पूर्व केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने 1968 में इस परीक्षा को पास करने के बाद तय किया कि वे वकालत के पेशे में रहेंगे। वे भी सेंट स्टीफंस कॉलेज में थे।   सेंट स्टीफंस कॉलेज की श्रुति शर्मा ने पिछले साल यूपीएससी परीक्षा में टॉप किया था। इस तरह से वह सेंट स्टीफंस कॉलेज के उन अनगिनत स्टुडेंट्स की सूची में शामिल हो गईं थीं जिन्होंने इस बेहद प्रतिष्ठित परीक्षा को क्रेक किया।आजकल रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास  भी सेंट स्टीफंस कॉलेज से ही हैं। सेंट स्टीफंस कॉलेज में दशकों इतिहास पढ़ाते रहे मोहम्मद अमीन कहते थे कि यहां का अनुशासन से भरपूर माहौल यूपीएससी परीक्षा को क्लीयर करने क लिएहाज से बहुत आदर्श है।  


 धौलपुर हाउस की रौनक


 देश को आजादी मिलने के बाद भारत सरकार ने यूपीएससी का दफ्तर गोलाकार धौलपुर हाउस में बनाने का निर्णय लिया। पहले शाहजहां रोड पर स्थित धौलपुर हाउस राजस्थान के राजघराने का आवास हुआ करता था। आजादी के फौरन  बाद सरकार ने धौलपुर हाउस को टेकओवर कर लिया था। इसकी दीवार से सटा है प्रभु चाट भंडार। यहां पर कहा जाने लगा है कि जो अभ्यार्थी प्रभु की चाट का आनंद लेने से चूक जाते हैं, वे इंटरव्यू में भी सफल नहीं होते। शाहजहां रोड पर बीसेक साल पहले तक आज की तरह भारी ट्रैफिक नहीं चलता था। पहले प्रतियोगी परीक्षाओं के परिणाम ऑनलाइन भी नहीं उपलब्ध नहीं रहते थे,इसलिए धौलपुर हाउस पर अभ्यर्थियों का सुबह-शाम मेला लगा रहता था। धौलपुर हाउस से पहले सिविल लाइंस स्थित मेटकाफ हाउस में आईसीएस की लिखित परीक्षा को पास करने वाले  अभ्यार्थी इंटरव्यू के लिए बुलाए जाते थे।


 धौलपुर हाउस से पहले मेटकाफ हाउस


धौलपुर से 10-12 किलोमीटर दूर सिविल लाइंस पर स्थित है मेटकाफ हाउस। भारत की नौकरशाही के लिए मेटकाफ हाउस का विशेष स्थान है। इसी इमारत में आयोजित होती थी आईसीएस परीक्षा और फिर उसमें उतीर्ण अभ्यर्थियों के इंटरव्यू। ये बातें देश की आजादी से पहले की है। अंग्रेजों ने 1854 में भारत के लिए फेडरेल पब्लिक सर्विस कमीशन की स्थापना की। पहले आईसीएस की परीक्षाएं लंदन में ही आयोजित होती थीं। पर पहले विश्व युद्ध के बाद गोरों को कुछ अक्ल आई। उन्होंने 1922 से आईसीएस की परीक्षाएं दिल्ली और इलाहाबादमें भी आयोजित करनी शुरू कीं। एक बार पंजाब कैडर के आईसीएस अफसर बदरूद्दीन तैयबजी ने बताया था कि वे अपना इंटरव्यू देने दरियागंज से मेटकाफ हाउस टांगे में बैठकर गए थे। उन दिनों दिल्ली में टांगे पर ही यहां से वहां जाते थे दिल्ली वाले। मेटकाफ हाउस में अब डिफेंस रिसर्च एंड डवलपमेंट आर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ),स्टेट बैंक और कुछ अन्य सरकारी दफ्तर हैं।


सरदार पटेल ने 21 अप्रैल, 1947 इसी मेटकाफ हाउस में आजाद होने जा रहे देश के पहले बैच के आईएएस और आईपीएस अफसरों को संबोधित करते हुए कहा था कि “उन्हें स्वतंत्र भारत में जनता के सवालों को लेकर गंभीरता और सहानुभूति का भाव रखना होगा।”


विवेक शुक्ला, 25 और 26 मई, 2023, नवभारत टाइम्स

मंगलवार, 23 मई 2023

नीलगिरि पर्वतीय रेल

 नीलगिरि पर्वतीय रेल (अंग्रेजी:Nilgiri Mountain Railway; तमिल: நீலகிரி மலை ரயில்), भारत के राज्य तमिलनाडु में स्थित एक रेल प्रणाली है, जिसे 1908 में ब्रिटिश राज के दौरान बनाया गया था।[1] शुरूआत में इसका संचालन मद्रास रेलवे द्वारा किया जाता था। इस रेलवे का परिचालन आज भी भाप इंजनों द्वारा किया जाता है।[2] नीलगिरि पर्वतीय रेल, नवगठित सलेम मण्डल के अधिकार क्षेत्र में आता है। जुलाई 2005 में यूनेस्को ने नीलगिरि पर्वतीय रेल को दार्जिलिंग हिमालयी रेल के विश्व धरोहर स्थल के एक विस्तार के रूप में मान्यता दी थी और तब से इन्हें संयुक्त रूप से "भारत की पर्वतीय रेल" के नाम से जाना जाता है।[3] इसे यह मान्यता मिलने के बाद इसकी आधुनिकीकरण की योजना का परित्याग कर दिया गया। पिछले कई वर्षों से कुन्नूर और उदगमंडलम के बीच के खंड पर भाप के इंजनों के स्थान पर लिए डीजल इंजनों का प्रयोग किया जा रहा है। स्थानीय लोगों और पर्यटकों ने इस खंड पर एक बार फिर से भाप इंजनों द्वारा रेलगाड़ी चलाने की मांग की है।[2]

युनेस्को विश्व धरोहर स्थल
भारत की पर्वतीय रेल
विश्व धरोहर सूची में अंकित नाम
नीलगिरि पर्वतीय रेल से यात्रा करने पर नीलगिरि के शानदार दृश्य देखने को मिलते हैं।
देशभारत
प्रकारसांस्कृतिक
मानदंडii, iv
सन्दर्भ944
युनेस्को क्षेत्रएशिया-प्रशान्त
शिलालेखित इतिहास
शिलालेख1999 (23 वां सत्र)
विस्तार2005; 2008

शाहरुख खान द्वारा अभिनीत हिंदी फिल्म "दिल से" के प्रसिद्ध हिंदी गीत छैंया छैंया का फिल्मांकन इसी रेलवे की रेलगाड़ी की छत पर किया गया है।

नीलगिरि पर्वतीय रेल
Head station
0 kmमेट्टुपालयम(कोयंबटूर)
Stop on track
8 kmकालर
Station on track
13 kmएडर्ली
Stop on track
18 kmहिलग्रोव
Stop on track
21 kmरनीमीड
Stop on track
25 kmकटेरी रोड
Station on track
28 kmकुन्नूर
Station on track
29 kmवेलिंग्टन
Stop on track
32 kmअरुवंकाडु
Stop on track
38 kmकेत्ति
Station on track
42 kmलवडेल
End station
46 kmउदगमंडलम

भारत

  लेख संवाद पढ़ें अपुनरीक्षित बदलाव सम्पादित करें इतिहास देखें देखा गया भारत गणराज्य Republic of India ( अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में देखें) ध...