पत्रकारिता (मीडिया) का प्रभाव समाज पर लगातार बढ़ रहा है। इसके बावजूद यह पेशा अब संकटों से घिरकर लगातार असुरक्षित हो गया है। मीडिया की चमक दमक से मुग्ध होकर लड़के लड़कियों की फौज इसमें आने के लिए आतुर है। बिना किसी तैयारी के ज्यादातर नवांकुर पत्रकार अपने आर्थिक भविष्य का मूल्याकंन नहीं कर पाते। पत्रकार दोस्तों को मेरा ब्लॉग एक मार्गदर्शक या गाईड की तरह सही रास्ता बता और दिखा सके। ब्लॉग को लेकर मेरी यही धारणा और कोशिश है कि तमाम पत्रकार मित्रों और नवांकुरों को यह ब्लॉग काम का अपना सा उपयोगी लगे।
बुधवार, 31 मई 2023
रविवार, 28 मई 2023
कौन हैं बारह आदित्य🌞/ पवन पांडेय
ऋषि कश्यप की पत्नी अदिति से जन्मे पुत्रों को आदित्य कहा गया है। ये 12 हैं : अंशुमान, अर्यमन, इन्द्र, त्वष्टा, धातु, पर्जन्य, पूषा, भग, मित्र, वरुण, विवस्वान और विष्णु।
1. इन्द्र : यह भगवान सूर्य का प्रथम रूप है। यह देवों के राजा के रूप में आदित्य स्वरूप हैं। इनकी शक्ति असीम है। इन्द्रियों पर इनका अधिकार है। शत्रुओं का दमन और देवों की रक्षा का भार इन्हीं पर है।
2. धाता : धाता हैं दूसरे आदित्य। इन्हें श्रीविग्रह के रूप में जाना जाता है। जो व्यक्ति सामाजिक नियमों का पालन नहीं करता है और जो व्यक्ति धर्म का अपमान करता है उन पर इनकी नजर रहती है। इन्हें सृष्टिकर्ता भी कहा जाता है।
3. पर्जन्य : पर्जन्य तीसरे आदित्य हैं। ये मेघों में निवास करते हैं। इनका मेघों पर नियंत्रण हैं। वर्षा के होने तथा किरणों के प्रभाव से मेघों का जल बरसता है। ये धरती के ताप को शांत करते हैं और फिर से जीवन का संचार करते हैं।
4. त्वष्टा : इनका निवास स्थान वनस्पति में है। पेड़-पौधों में यही व्याप्त हैं। औषधियों में निवास करने वाले हैं।
5. पूषा : इनका निवास अन्न में होता है। समस्त प्रकार के धान्यों में ये विराजमान हैं। इन्हीं के द्वारा अन्न में पौष्टिकता एवं ऊर्जा आती है।
6. अर्यमन : इनको पितरों का देवता भी कहा जाता है। ये वायु रूप में प्राणशक्ति का संचार करते हैं। चराचर जगत की जीवन शक्ति हैं।
7. भग : ये भग देव शरीर में चेतना, ऊर्जा शक्ति, काम शक्ति तथा जीवंतता की अभिव्यक्ति करते हैं।
8. विवस्वान : ये अग्निदेव हैं। इनमें जो तेज व ऊष्मा व्याप्त है वह सूर्य से है। कृषि और फलों का पाचन, प्राणियों द्वारा खाए गए भोजन का पाचन इसी अग्नि द्वारा होता है।
9. विष्णु : देवताओं के शत्रुओं का संहार करने वाले देव विष्णु हैं। वे संसार के समस्त कष्टों से मुक्ति कराने वाले हैं। माना जाता है कि नौवें आदित्य के रूप में विष्णु ने त्रिविक्रम के रूप में जन्म लिया था।
10. अंशुमान : वायु रूप में जो प्राण तत्व बनकर देह में विराजमान है वही अंशुमान हैं। इन्हीं से जीवन सजग और तेज पूर्ण रहता है।
11. वरुण : जल तत्व का प्रतीक हैं वरुण देव। ये मनुष्य में विराजमान हैं जल बनकर। जीवन बनकर समस्त प्रकृति के जीवन का आधार हैं।
12. मित्र : विश्व के कल्याण हेतु तपस्या करने वाले, साधुओं का कल्याण करने की क्षमता रखने वाले मित्र देवता हैं।
शनिवार, 27 मई 2023
शब्द *रचे* जाते हैं,
पता नहीं किस रचनाकार की कृति है ,पर उत्तम है।
प्रस्तुति : चंद्र shekhar
शब्द *रचे* जाते हैं,
शब्द *गढ़े* जाते हैं,
शब्द *मढ़े* जाते हैं,
शब्द *लिखे* जाते हैं,
शब्द *पढ़े* जाते हैं,
शब्द *बोले* जाते हैं,
शब्द *तौले* जाते हैं,
शब्द *टटोले* जाते हैं,
शब्द *खंगाले* जाते हैं,
... इस प्रकार
शब्द *बनते* हैं,
शब्द *संवरते* हैं,
शब्द *सुधरते* हैं,
शब्द *निखरते* हैं,
शब्द *हंसाते* हैं,
शब्द *मनाते* हैं,
शब्द *रूलाते* हैं,
शब्द *मुस्कुराते* हैं,
शब्द *खिलखिलाते* हैं,
शब्द *गुदगुदाते* हैं,
शब्द *मुखर* हो जाते हैं
शब्द *प्रखर* हो जाते हैं
शब्द *मधुर* हो जाते हैं
... इतना होने के बाद भी
शब्द *चुभते* हैं,
शब्द *बिकते* हैं,
शब्द *रूठते* हैं,
शब्द *घाव देते* हैं,
शब्द *ताव देते* हैं,
शब्द *लड़ते* हैं,
शब्द *झगड़ते* हैं,
शब्द *बिगड़ते* हैं,
शब्द *बिखरते* हैं
शब्द *सिहरते* हैं
... परन्तु
शब्द कभी *मरते नहीं*
शब्द कभी *थकते नहीं*
शब्द कभी *रुकते नहीं*
शब्द कभी *चुकते नहीं*
... अतएव
शब्दों से *खेले नहीं*
*बिन सोचे बोले नहीं*
शब्दों को *मान दें*
शब्दों को *सम्मान दें*
शब्दों पर *ध्यान दें*
शब्दों को *पहचान दें*
ऊँची लंबी *उड़ान दें*
शब्दों को *आत्मसात करें*
उनसे उनकी बात करें,
शब्दों का *अविष्कार करें*
गहन सार्थक *विचार करें*
... क्योंकि
शब्द *अनमोल* हैं
ज़ुबाँ से *निकले बोल हैं*
शब्दों में *धार होती है*
शब्दों की *महिमा अपार होती* है
शब्दों का *विशाल भंडार* होता है
और
... सच तो यह है कि
*शब्दों*
*का*
*भी*
*अपना*
*एक 🌐 संसार होता है*
🙏🙏
*शब्दों को*
*सहेजें,समेटे और सम्मान दें*
शुक्रवार, 26 मई 2023
मोहब्बत की दुकान
यह बंद दुकान दीनानाथ की है जो इंडिया- पाकिस्तान बटवारे के वक़्त बहुत अफसोस के साथ इस दुकान को पाकिस्तान छोड़कर इंडिया चले आए लेकिन जाते वक्त बहुत रोए और पूरे गांव को भी रुलाया। फिर गाँव के लोगों को यह दिलासा दिलाया कि मैं वापिस आप लोगों के पास लौट कर आऊँगा। पाकिस्तान के बलोचिस्तान प्रोविंस के जिला लोरा लाई में मौजूद इस दुकान पर अभी तक वही ताला लगा है जो दुकानदार दीनानाथ जी जाते वक्त लगाकर चाबी अपने साथ ले गया थे। 73 साल से यह दुकान बंद पड़ी है। पाकिस्तानी मकान मालिक जो अब इस दुनियाँ में नही रहा उसने एक कदम आगे बढाते हुए वसीयत कर दी कि इस दुकान का ताला तोड़ना नही जब तक दुकानदार बापिस नहीं आता। इस दुकान के मालिक के मरने के बाबजूद उसके बच्चों ने भी इसका ताला नहीं तोड़ा। वसीयत में लिखा कि मैंने उस दुकानदार को जबान दी है कि यह दुकान तुम्हारे आने तक बन्द रहेगी। मकान मालिक की औलादों ने आज तक उस ताले को हाथ तक नही लगाया। हालाँकि उन्हें मालूम है कि दुकानदार यानी दीनानाथ जी इस दुनियाँ में नही रहे लेकिन वफ़ा की यादगार के तौर पर अब तक यह दुकान दो इंसानों के बीच यादगार की मिसाल बन गई है। कमाल के बंदे थे दोनों- मकान मालिक ते दुकानदार।इंसानों के बीच इतना प्यार ! फिर नफ़रतें कहाँ से आ गई ? कौन ले आया ?
#विनय_शर्मा
सुरेन्द्र किशोर जी का आशीर्वाद / परशुराम शर्मा
बात बे बात (1) :
सुरेन्द्र किशोर जी का आशीर्वाद / परशुराम शर्मा
कल मेरे फेसबुक वॉल पर हमारे अजीज पत्रकार दोस्त लव कुमार मिश्र का बधाई संदेश मिला। उसमें साथी सुरेन्द्र किशोर से मेरी पुस्तक पर आशीर्वाद मिलने की बात थी। मैं खुश हुआ।
मैं अपने बेटे आशीष के साथ अपने मित्र सुरेन्द्र किशोर को अपनी एक पुस्तक भेंट करने गया था। तब का फोटो बेटे ने अपने फेसबुक पर डाल दिया था। हमारे ढेरों शुभचिंतक उस पर अपनी भावना व्यक्त कर रहे थे। इसमें मेरे माननीय जाबिर हुसैन साहब के 'प्रणाम' और लव कुमार मिश्र के 'आशीर्वाद' सरीखे संदेश से मैं चौंका। चकित था कि क्या वाकई हम इस लायक हैं?
अपनी सक्रिय राजनीतिक यात्रा पूरी कर चुके साहित्यिक मिजाज वाले भलमानस जाबिर साहब की उदारता व सदाशयता का तो कोई जोड़ नहीं। हम सब पहले से परिचित हैं। उन्हें हम प्रणाम करते हैं। पर, पत्रकारिता में हमारे हमसफर साथी लव कुमार की प्रतिक्रिया से अभिभूत हूं कि वाकई सुरेंद्र जी कितने ऊंचे हो गये हैं। सचमुच किसी बड़े की शुभकामना ही तो उनका आशीर्वाद होता है। लव कुमार ने सही कहा है।
यह मानने में मुझे कोई संकोच नहीं कि साथी सुरेंद्र जी ने पत्रकारिता में एक बड़ी लाइन खींच दी है। वैसे, उम्र के लिहाज से भी वे हमसे दो-ढाई साल तो जरूर बड़े होंगे। भले, हमने आगे-पीछे ही साथ-साथ पत्रकारिता शुरू की हो। भगवान, उन्हें खुब लंबी उम्र दे, ताकि अनेक पुस्तकों के प्रकाशन कराने की उनकी योजना पूरी हो। कल भी इस पर उनसे देर तक बात हुई। पहले भी मैं इसके लिए उन्हें कोंचता रहा हूं।
यह सोच कर किसी को संतोष हो सकता है कि अबतक उनकी कोई पुस्तक छप कर नहीं आयी है। लेकिन, उन्होंने जितना लिखा है, जितने उनके आलेख छपे हैं, वे हमलोगों के बीच सबसे ज़्यादा हैं। वे बड़े लिखाड़ हैं। आज भी निरंतर नियमित लिख रहे हैं और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छप भी रहे हैं। उनकी लाइब्रेरी इस कार्य में बहुत सहायक सिद्ध हुई है। एक बड़े हॉल में बड़े जतन से उन्होंने अपना एक निजी लाइब्रेरी बनाया है। उसमें ढेरों पुस्तकें हैं। संदर्भ सामग्री के रुप में नये- पुराने ढेरों अखबारों व पत्रिकाओं तथा उनके कतरनों का भंडार है। सहेज कर उसकी फाइलें तैयार की गई है। कम से कम इस तुलना में मैं तो एकदम फिसड्डी साबित हुआ हूं। खैर, ना तो पहले उतना लिखा, ना अब लिख पाता हूं। अब शीध्र उनकी किताबें भी हमें पढ़ने को मिलेगी।
बहरहाल, बात हो रही थी मित्र लव कुमार के बधाई संदेश को लेकर, जो मुझे उससे मिला था। चूंकि सुरेन्द्र जी का नया आवास पटना शहर के बाहरी हिस्से में दूर ग्रामीण परिवेश वाले क्षेत्र में पड़ता है। इसलिए कभी-कभार ही वहां जाना संभव हो पाता है। अब पहले की तरह उनसे अक्सर मिलना संभव नहीं होता। यदि कल बेटे की सवारी नहीं मिलती,तो मिलने का मंसूबा ही बनाता रह जाता। वरना, शीत लहर का बहाना तो सामने खड़ा ही था। उस पर सोने में सुहागा आसमान पर छाये बादल एवं बारिश की मौसम विभाग की चेतावनी हमारे जैसे लोगों की हिम्मत तोड़ने के लिए एक सबल आधार था। इधर, मैं महीनों से उन्हें अपनी नई पुस्तक देने जाना चाहता था। चलो, तमाम अवरोधों के बीच यह मंशा कल पूरी हुई।
शिक्षका से सेवानिवृत्त हुई उनकी पत्नी ने हमेशा की तरह हमारे आवभगत में कोई कोताही नहीं की। नाश्ते में तले हुए ताजे मटर के दाने दिये। वह देख मन हरा हो गया। बड़े चाव से खाया। बचपन से ही इस मौसम का यह हमारा प्रिय नाश्ता रहा है। आजकल सुबह में इसे नियमित लेता हूं। इसके बाद हरा चना का मौसम आने वाला है। वह भी मेरा नियमित नाश्ता होगा। इस मौसम का मेरा मनचाहा हरा मटर मिल गया। यह मेरे लिए उनका स्नेह एवं आशीर्वाद ही तो था। हम आप दोनों के दीर्घायु की कामना करते हैं।
- परशुराम शर्मा
29.12.2021
दिल्ली से सबसे पहले किसने क्लीयर किया यूपीएससी /
दिल्ली से सबसे पहले किसने क्लीयर किया यूपीएससी इम्तिहान को / विवेक शुक्ल
संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) परीक्षा के नतीजे आ गए हैं। पहले चार स्थानों पर रहे सफल कैंडिट्टेंस में से तीन दिल्ली यूनिवर्सिटी से हैं। पर हमें तलाश है दिल्ली से सबसे पहले इस इम्तिहान को क्रैक करने वालों की। हालांकि यूपीएससी की तरफ से इस तरह की कोई सूची तो तैयार की गई है। पर माना जाता है कि दिल्ली पुलिस के कमिश्नर रहे वेद मारवाह ने 1956 में यूपीएससी की परीक्षा को क्लीयर किया था। वे संभवत: खाटी दिल्ली वाले पहले अभ्यार्थी जिसने यूपीएससी परीक्षा को क्लीयर किया था। वे खान मार्केट से सेंट स्टीफंस कॉलेज साइकिल पर ही जाते थे। वेद मारवाह का परिवार देश के बंटवारे के समय पेशावर से दिल्ली आकर बसा था। उन्हें 1989 में भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार, पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।
इस बीच,जेएन दीक्षित भी पक्के दिल्ली वाले थे। उन्होंने यूपीएससी परीक्षा को 1958 में क्रैक किया था। वे हरकोर्ट बटलर स्कूल, मंदिर मार्ग तथा दिल्ली जाकिर हुसैन कॉलेज के स्टुडेंट रहे थे। जेएन दीक्षित भारत के विदेश सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी रहे। दिल्ली क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान वेंकट सुंदरम की बहन की शादी दीक्षित जी से हुई थी। दीक्षित जी का बचपन गोल मार्केट में बीता था।
नटवर सिंह से शुरू हुआ सिलसिलाK
अगर बात दिल्ली यूनिवर्सिटी की करें तो यहां से सबसे पहले यूपीएससी के इम्तिहान को क्लीयर करने वालों में कंवर नटवर सिंह थे। उन्होंने 1953 में यूपीएससी की परीक्षा को पास करके भारतीय विदेश सेवा को ज्वाइन किया था। वे केन्द्रीय मंत्री भी रहे। वे सेंट स्टीफंस कॉलेज से थे। हालांकि वे दिल्ली से तो नहीं थे। वे यहां पढ़ाई करने के लिए आ गए थे। उनके बाद 1960 और 1970 के दशकों में मणिशंकर अय्यर, अमिताभ पांडे, राज भार्गव, हरदीप पुरी (अब केन्द्रीय मंत्री), नवीन चावला, एस.वाई.कुरैशी ( पूर्व चुनाव आयुक्त), नजीब जंग ( दिल्ली के पूर्व उप राज्यपाल), मीरा कुमार वगैरह ने यूपीएससी परीक्षा में सफलता हासिल की। मीरा कुमार विदेश सेवा में रहीं। वो मिरांडा हाउस से थीं। बाबू जगजीवन राम की पुत्री मीरा कुमार की स्कूली शिक्षा भी दिल्ली में हुई थी। कुरैशी साहब के भाई अजीज कुरैशी को दिल्ली में कौन नहीं जानता। बेहद हैंडसम अजीज भाई भारत की फुटबॉल टीम से खेले। वे रंगकर्मी भी हैं। उन्हें आप शंकर मार्केट में यारों के साथ गप शप करते हुए देख सकते हैं। हरदीप पुरी सेंट एंथनी स्कूल से थे और अमिताभ पांडे मॉडर्न स्कूल में।
एस जयशंकर और उनके पिता
केन्द्रीय विदेश मंत्री एस. जय़शंकर धौला कुआं के एयर फोर्स स्कूल से हैं। उन्होंने 1977 में यूपीएससी के इम्तिहान को क्लीयर किया था। उनके पिता एस. सुब्रमण्यम 1950 बैच के आईएएस अफसर थे। पर उन्होंने चेन्नै में रहते हुए उपर्युक्त परीक्षा को दिया थे। वे तब मात्र 21 साल के थे। वे ज्ञान के सागर थे। वे विदेश और रक्षा मामलों के विशेषज्ञ थे।
अशोक वाजपेयी दयाल सिंह कॉलेज से आईएएस
प्रख्यात कवि श्री अशोक वाजपेयी ने 1965 में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की परीक्षा को क्लीयर किया था। उन्होंने सेंट स्टीफंस कॉलेज से अंग्रेजी में एमए की ड्रिगी ली और उसके बाद दयाल सिंह कॉलेज में पढ़ाने लगे थे। अशोक वाजपेयी जी ने अध्यापन के दौरान यूपीएससी की परीक्षा क्रैक किया। इस बीच, पूर्व केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने 1968 में इस परीक्षा को पास करने के बाद तय किया कि वे वकालत के पेशे में रहेंगे। वे भी सेंट स्टीफंस कॉलेज में थे। सेंट स्टीफंस कॉलेज की श्रुति शर्मा ने पिछले साल यूपीएससी परीक्षा में टॉप किया था। इस तरह से वह सेंट स्टीफंस कॉलेज के उन अनगिनत स्टुडेंट्स की सूची में शामिल हो गईं थीं जिन्होंने इस बेहद प्रतिष्ठित परीक्षा को क्रेक किया।आजकल रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास भी सेंट स्टीफंस कॉलेज से ही हैं। सेंट स्टीफंस कॉलेज में दशकों इतिहास पढ़ाते रहे मोहम्मद अमीन कहते थे कि यहां का अनुशासन से भरपूर माहौल यूपीएससी परीक्षा को क्लीयर करने क लिएहाज से बहुत आदर्श है।
धौलपुर हाउस की रौनक
देश को आजादी मिलने के बाद भारत सरकार ने यूपीएससी का दफ्तर गोलाकार धौलपुर हाउस में बनाने का निर्णय लिया। पहले शाहजहां रोड पर स्थित धौलपुर हाउस राजस्थान के राजघराने का आवास हुआ करता था। आजादी के फौरन बाद सरकार ने धौलपुर हाउस को टेकओवर कर लिया था। इसकी दीवार से सटा है प्रभु चाट भंडार। यहां पर कहा जाने लगा है कि जो अभ्यार्थी प्रभु की चाट का आनंद लेने से चूक जाते हैं, वे इंटरव्यू में भी सफल नहीं होते। शाहजहां रोड पर बीसेक साल पहले तक आज की तरह भारी ट्रैफिक नहीं चलता था। पहले प्रतियोगी परीक्षाओं के परिणाम ऑनलाइन भी नहीं उपलब्ध नहीं रहते थे,इसलिए धौलपुर हाउस पर अभ्यर्थियों का सुबह-शाम मेला लगा रहता था। धौलपुर हाउस से पहले सिविल लाइंस स्थित मेटकाफ हाउस में आईसीएस की लिखित परीक्षा को पास करने वाले अभ्यार्थी इंटरव्यू के लिए बुलाए जाते थे।
धौलपुर हाउस से पहले मेटकाफ हाउस
धौलपुर से 10-12 किलोमीटर दूर सिविल लाइंस पर स्थित है मेटकाफ हाउस। भारत की नौकरशाही के लिए मेटकाफ हाउस का विशेष स्थान है। इसी इमारत में आयोजित होती थी आईसीएस परीक्षा और फिर उसमें उतीर्ण अभ्यर्थियों के इंटरव्यू। ये बातें देश की आजादी से पहले की है। अंग्रेजों ने 1854 में भारत के लिए फेडरेल पब्लिक सर्विस कमीशन की स्थापना की। पहले आईसीएस की परीक्षाएं लंदन में ही आयोजित होती थीं। पर पहले विश्व युद्ध के बाद गोरों को कुछ अक्ल आई। उन्होंने 1922 से आईसीएस की परीक्षाएं दिल्ली और इलाहाबादमें भी आयोजित करनी शुरू कीं। एक बार पंजाब कैडर के आईसीएस अफसर बदरूद्दीन तैयबजी ने बताया था कि वे अपना इंटरव्यू देने दरियागंज से मेटकाफ हाउस टांगे में बैठकर गए थे। उन दिनों दिल्ली में टांगे पर ही यहां से वहां जाते थे दिल्ली वाले। मेटकाफ हाउस में अब डिफेंस रिसर्च एंड डवलपमेंट आर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ),स्टेट बैंक और कुछ अन्य सरकारी दफ्तर हैं।
सरदार पटेल ने 21 अप्रैल, 1947 इसी मेटकाफ हाउस में आजाद होने जा रहे देश के पहले बैच के आईएएस और आईपीएस अफसरों को संबोधित करते हुए कहा था कि “उन्हें स्वतंत्र भारत में जनता के सवालों को लेकर गंभीरता और सहानुभूति का भाव रखना होगा।”
विवेक शुक्ला, 25 और 26 मई, 2023, नवभारत टाइम्स
मंगलवार, 23 मई 2023
नीलगिरि पर्वतीय रेल
नीलगिरि पर्वतीय रेल (अंग्रेजी:Nilgiri Mountain Railway; तमिल: நீலகிரி மலை ரயில்), भारत के राज्य तमिलनाडु में स्थित एक रेल प्रणाली है, जिसे 1908 में ब्रिटिश राज के दौरान बनाया गया था।[1] शुरूआत में इसका संचालन मद्रास रेलवे द्वारा किया जाता था। इस रेलवे का परिचालन आज भी भाप इंजनों द्वारा किया जाता है।[2] नीलगिरि पर्वतीय रेल, नवगठित सलेम मण्डल के अधिकार क्षेत्र में आता है। जुलाई 2005 में यूनेस्को ने नीलगिरि पर्वतीय रेल को दार्जिलिंग हिमालयी रेल के विश्व धरोहर स्थल के एक विस्तार के रूप में मान्यता दी थी और तब से इन्हें संयुक्त रूप से "भारत की पर्वतीय रेल" के नाम से जाना जाता है।[3] इसे यह मान्यता मिलने के बाद इसकी आधुनिकीकरण की योजना का परित्याग कर दिया गया। पिछले कई वर्षों से कुन्नूर और उदगमंडलम के बीच के खंड पर भाप के इंजनों के स्थान पर लिए डीजल इंजनों का प्रयोग किया जा रहा है। स्थानीय लोगों और पर्यटकों ने इस खंड पर एक बार फिर से भाप इंजनों द्वारा रेलगाड़ी चलाने की मांग की है।[2]
| भारत की पर्वतीय रेल | |
|---|---|
| विश्व धरोहर सूची में अंकित नाम | |
| देश | भारत |
| प्रकार | सांस्कृतिक |
| मानदंड | ii, iv |
| सन्दर्भ | 944 |
| युनेस्को क्षेत्र | एशिया-प्रशान्त |
| शिलालेखित इतिहास | |
| शिलालेख | 1999 (23 वां सत्र) |
| विस्तार | 2005; 2008 |
शाहरुख खान द्वारा अभिनीत हिंदी फिल्म "दिल से" के प्रसिद्ध हिंदी गीत छैंया छैंया का फिल्मांकन इसी रेलवे की रेलगाड़ी की छत पर किया गया है।
| नीलगिरि पर्वतीय रेल | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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सन्दर्भ
भारत
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