शनिवार, 30 अप्रैल 2022

टीएमयू एफओईसीएस ने प्लेसमेंट में मारी हॉफ सेंचुरी

 


नौ सूबों- यूपी, उत्तराखंड, राजस्थान, दिल्ली, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड, असम, बिहार के स्टुडेंट्स ने अपरेक्स्ट सॉल्यूशन्स के लिए भरी उड़ान


ख़ास बातें

चयनित होने वालों में एफओईसीएस के 36 छात्र और 14 छात्राएं शामिल

आकर्षक पैकेज पर कंपनी की ओर से मिला ऑफर लेटर तो मुस्कुराए

बीटेक-सीएस, बीटेक-ईसी प्रोग्राम्स के छात्र-छात्राएं प्लेसमेंट में शुमार

बीएससी ऑनर्स-सीएस, बीसीए और एमसीए के स्टुडेंट्स ने भी मारी बाजी



तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के फैकल्टी ऑफ इंजीनियरिंग एंड कम्प्यूटिंग साइंसेज-एफओईसीएस ने फिर इतिहास रचा है। एफओईसीएस ने अपना ही रिकॉर्ड तोड़ते हुए देश की नामचीन कंपनी अपरेक्स्ट सॉल्यूशन्स में बतौर प्लेसमेंट हॉफ सेंचुरी लगाई है। आपको यह जानकर हैरत के संग-संग खुशी भी होगी, 50 स्टुडेंट्स का एक साथ एक ही कंपनी में सलेक्शन हुआ है। एफओईसीएस के लिए इस सत्र की यह स्वर्णिम उपलब्धि है। चयन होने वालों में यूपी, उत्तराखंड, राजस्थान, दिल्ली, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, झारखंड, असम, बिहार के छात्र-छात्राएं शामिल हैं। एफओईसीएस की इस बड़ी उपलब्धि से गदगद कुलाधिपति श्री सुरेश जैन, जीवीसी श्री मनीष जैन, एमजीबी श्री अक्षत जैन और वीसी प्रो. रघुवीर सिंह कहते हैं, हमें न केवल एफओईसीएस के स्टुडेंट्स बल्कि प्राचार्य एवम् निदेशक प्रो. आरके द्विवेदी पर भी नाज़ है। निदेशक प्रो. द्विवेदी इस पूल ड्राइव का श्रेय टीएमयू के कुलाधिपति, जीवीसी, एमजीबी आदि की डायनामिक लीडरशिप और ग्रेट विजनरी को देते हैं। साथ ही संकल्प दुहराते हैं, हम स्टुडेंट्स के सर्वांगीण विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं।


दिल्ली की कंपनी- अपरेक्स्ट सॉल्यूशन्स में चयनित होने वालों में एफओईसीएस के 36 छात्र और 14 छात्राएं शामिल हैं। इनके चेहरे खिले हैं, क्योंकि  आकर्षक पैकेज पर कंपनी की ओर से इन सभी को ऑफर लेटर भी मिल गए हैं। बीटेक-सीएस, बीटेक-ईसी, बीएससी ऑनर्स-सीएस, बीसीए और एमसीए प्रोग्राम्स के छात्र-छात्राएं इस प्लेसमेंट में शुमार हैं। प्रो. द्विवेदी कहते हैं, हम स्टडी के संग-संग छात्रों को गहन तकनीकी प्रशिक्षण भी देते हैं। इस दौरान देश की जानी-मानी उद्योग जगत की हस्तियां कैंपस का विजिट करती हैं। वैश्विक तकनीकी बदलाव पर हमारी पैनी नजर रहती है। इसी के मुताबिक हम अपने छात्रों को ढालते हैं। असिस्टेंट डायरेक्टर प्लेसमेंट एवम् ट्रेनिंग श्री विक्रम रैना कहते हैं, हमारे छात्रों को कैंपस में ही हमेशा प्रतिस्पर्धी माहौल मिल जाता है। उन्होंने स्मार्ट इंडिया हैकाथॉन, हैकर रैंक, गीक फॉर गीक्स चैलेंज, हैकर अर्थ, किक स्टार्ट गूगल कोडिंग चैलेंज, टॉप कॉडर सरीखी तकनीकी गतिविधियों का जिक्र करते हुए कहा, ये प्रतियोगिताएं स्टुडेंट्स के करियर में मील का पत्थर साबित होती हैं। बीटेक सीएस को-आर्डिनेटर श्री रूपल गुप्ता और ह्यूमैनिटीज् डिपार्टमेंट के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. संदीप वर्मा कहते हैं, प्लेसमेंट के लिए न केवल हम शॉर्ट टर्म कोर्सेज कराते हैं बल्कि टाइम टू टाइम इंडस्ट्रीयल विजिट भी कराते हैं। टीचिंग लर्निंग प्रोसेस को हमने प्रोजेक्ट बेस्ड लर्निंग के साथ डिजाइन किया हुआ है।

प्लेसमेंट में ये सभी स्टेप्स हमारे छात्र-छात्राओं के लिए वरदान साबित हो रहे हैं। डॉ. वर्मा बताते हैं, स्टुडेंट्स की एम्प्लॉयबिलिटी स्किल्स विकसित करने के लिए ह्यूमैनिटीज् की मुकम्मल अनुभवी टीम समर्पित है। यह टीम इंग्लिश कम्युनिकेशन के साथ-साथ स्टुडेंट्स के व्यक्तित्व विकास- प्रेजेंटेशन स्किल्स, इंटरव्यू स्किल्स, जीडी इत्यादि के प्रशिक्षण के प्रति भी संजीदा है।

गुरुवार, 28 अप्रैल 2022

बलिया के पत्रकारों के हौसले के सामने लुटियंस और महानगर के तमाम पत्रकार पस्त

 बलिया के पत्रकारों ने लुटियंस और महानगरीय पत्रकारिता को आईना दिखा दिया..!


० 28 दिन बाद आज जमानत पर रिहा हुए तीनों पत्रकार.बोले- हम लडेंगे.

० 30 अप्रैल को यथावत रहेगा जेल भरो आंदोलन


"ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने,

 लम्हों ने खता की थी सदियों ने सज़ा पाई"


@ डॉ अरविंद सिंह

28 दिन के बाद आज सुबह 10 बजे एक तरफ सूरज सिर पर चढ़ आग उगलते जा रहा था, दूसरी तरफ पूरब की खांटी माटी आजमगढ़ के मंडलीय कारागार का फाटक खुलने का बड़ी शिद्दत से इन्तजार हो रहा था. दो दर्जन से ऊपर आजमगढ़ और बलिया के पत्रकारों का जत्था इटौरा स्थित कारागार के मुख्य द्वार पर अपने जिन नायकों का पलक पांवडे बिछा बेसब्री से इंतजार कर रहा था. 

दरअसल वे पत्रकार, कोई मामूली पत्रकार नहीं थे और हैं बल्कि हमारे दौर की पत्रकारिता के नायकों में अपने हिम्मत और दिलेरी से शुमार हो चुके आंचलिक चेतना के फौलादी किरदार थे(हैं),जिन्हें कलेक्टर बहादुर की नकल विहीन व्यवस्था का सच लिखने की सज़ा मिली थी, और जिन पर सिस्टम को नंगा करने का अपराध चलाया गया था. 

बावजूद बलिया का कलेक्टर बहादुर और कप्तान आज 28 दिन बितते-बितते खुद नंगे हो गयें. सिस्टम बैकफुट पर हो गया और देशभर के पत्रकारों के आंदोलन की तपिश और बागी बलिया के तेवर के आगे बेहद आक्रामक रहा जिला प्रशासन, खुद रक्षात्मक मुद्रा में आ गया. 

योगीराज ने माध्यमिक शिक्षा के निदेशक को निलंबित कर दिया और पत्रकारों के खिलाफ संज्ञेय धाराओं में मुकदमा लिखवाने वाले, भीषण जन आंदोलन और जन दबाव के आगे घुटने टेक दिये और गंभीर धाराओं को स्वयं खत्म कराने में लग गयें. तीन अलग-अलग थानों में पत्रकारों को अपराधी बना मुकदमा पंजीकृत कराने वालों ने, अपनी हेकड़ी भूला, विवेचकों पर इतना दबाव बनाया कि- उन्होंने गंभीर धाराओं 420, 471, 467 आदि को समाप्त कर जमानत की जमीन तैयार कर दी. कल 25 अप्रैल को बलिया के जिला जज ने जमानत मंजूर कर दिया था, जिनकी आज रिहाई थी.

 जिन तीन ख़बरनवीशों दिग्विजय सिंह, अजित ओझा और मनोज गुप्ता को पेपर आउट का समाचार छापने की सज़ा देकर संज्ञेय धाराओं में जेल भेजा गया था , कल न्यायालय ने रिहा करने का फैसला सुना दिया.

  सुबह जेल का फाटक जैसे खुला, एक के बाद एक अदम्य उत्साह और ज़ज्बात से लबरेज़ यह त्रिमूर्ति निकल रही थी. पहली बार जब जेल में इनसे मिलने गया था, तो उनमें से एक नौजवान की आंखों में पानी था, तो दूसरे में बेबसी. लेकिन जिस इस्पाती ख़बरनवीश ने बलिया की नकल विहीन परीक्षा व्यवस्था के दावे को अनावृत कर गिरफ्तारी के समय  नारा दिया था- 

'डीएम एसपी चोर हैं..  कलेक्टर नकलखोर हैं.. !' 

वह पत्रकार पाषाण सा गंभीर बना रहा. मानो आत्मविश्वास और ईमानदारी की ताकत ने जेल की ऊंची दीवारों में भी हिम्मत नहीं खोने दिया हो, 

जिस दिग्विजय सिंह का वीडियो सोशल मीडिया पर इतना तेजी से वायरल हुआ, उनके आत्मविश्वास को नमन करने का मन हुआ.उनकि यह वीडियो देश की बाउड्री क्रास कर लोगों के दिलों दिमाग में नाचने लगा. अभिव्यक्ति की आज़ादी पर खतरा और जनतंत्र की जड़ों में मट्ठा डालने वाले जिला प्रशासन के खिलाफ आक्रोश उबाल मारने लगा, बलिया में अभूतपूर्व बंदी और पूर्वांचल में जनाक्रोश फैलता गया. आजमगढ़, मऊ, गाजीपुर, सोनभद्र, वाराणसी, मिर्जापुर, लखनऊ में गिरफ्तारी के विरोध में ज्ञापनों का अंतहीन सिलसिला चल पड़ा. आजमगढ़ में जर्नलिस्ट क्लब ने पहले दिन ही आपात बैठक बुला मामले को प्रेस कांउसिल आफ इंडिया के सदस्य के संज्ञान में लाया. और इस लड़ाई को लड़ने का प्रण लिया.

जेल से छूटने के बाद इन पत्रकारों का माल्यार्पण कर सम्मान किया गया. किसी नायक के मानिंद उन्हें सम्मान दिया गया, मानों उन्होंने केवल बलिया प्रशासन को घुटने टेकने पर मजबूर नहीं किया बल्कि हमारे समय की पत्रकारिता को भी आईना  दिखा दिया कि पत्रकारिता की लड़ाई बड़े कार्पोरेट मीडिया संस्थान और लुटियंस मीडिया नहीं लड़ सकती है, बल्कि कस्बाई, भाषाई, और आंचलिक पत्रकारिता ही सत्ता के सामने तन कर खड़ी हो सकती है. जिसकी रीढ आज भी लुटियंस मीडिया से ज्यादा मजबूत और फौलादी है. अभी लड़ाई यहीं नहीं खत्म हुई है बल्कि कलेक्टर और कप्तान के विरुद्ध कार्रवाई होने तक जारी रहेगी. इसी क्रम में 30 अप्रैल को जेल भरो आंदोलन का आह्वान बलिया ने किया, तबतक योगीराज कलेक्टर और कप्तान के विरुद्ध कार्रवाई करता है या नहीं यह देखने वाली बात है. फिलहाल बलिया प्रशासन, बलिया के बागीपन  से बैकफुट पर है. अगर अब भी देश की मुख्य धारा की पत्रकारिता नही चेती तो उसका हस्र बहुत बुरा होने वाला.


(लेखक शार्प रिपोर्टर का संपादक और जर्नलिस्ट क्लब का संयोजक है)

अफ़लातून अफलू

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सोमवार, 25 अप्रैल 2022

रवि अरोड़ा की नजर से.......

 बदल रही हैं लड़कियां  / रवि अरोड़ा


यदि मैं आपके कहूं कि देश की लड़कियां बदल रही हैं तो आप यकीनन यही कहेंगे कि बिलकुल बदल रही हैं । यदि मैं फिर कहूं कि उम्मीद से भी अधिक तेजी से लड़कियां बदल रही है तो आप शर्तिया झल्लाएंगे और पूछेंगे कि मैं आखिर कहना क्या चाहता हूं ? अब यदि आपके इस प्रश्न के उत्तर में मैं लड़कियों से संबंधी आंकड़े पेश करने की बजाय अपने एक कारोबारी मित्र की व्यथा आपको सुनाना चाहूं तो क्या आप हैरान नहीं होंगे ? तो चलिए मेरे मित्र की कहानी सुनिए ।


मेरा यह मित्र ( अजी नाम में क्या रखा है ) नोएडा में रेडीमेड गारमेंट्स का कारोबार करता है । फैशन के अनुरूप स्त्री पुरुषों के कपड़े तैयार कर उसे ऑनलाइन बेचना ही उसका व्यापार है । तीन दिन पहले उससे बात हुई तो उनसे अपना अजब दुखड़ा सुनाया । बकौल उसके आजकल एक नया ट्रेंड शुरू हुआ है कि युवा वर्ग और उसमें भी अधिकतर लड़कियां ऑनलाइन ऑर्डर कर मनपसंद कपड़े मंगाती हैं और फिर पार्टी आदि में एक बार पहन कर वापिस कर देती हैं । चूंकि नियमानुसार कपड़ा पसंद न आने पर एक सप्ताह तक उसे निशुल्क वापिस करना उनका अधिकार है सो हम उसमें कुछ नहीं कर पाते और हमें कपड़ा भेजने, वापिस मंगाने व पैकिंग समेत अन्य खर्चों का नुकसान उठाना पड़ता है । कुछ युवा और उनमें भी लगभग 90 फीसदी लड़कियां तो इससे भी आगे निकल जाती हैं और वे नए कपड़े मंगवा कर पुराने फटे कपड़े वापिस भेज देती हैं और हम कुछ नहीं कर पाते । दरअसल घरौंदा आश्रम संबंधी मेरे लेख के बाद मित्र का फोन इस आश्रम का पता पूछने को आया था । बकौल उनके उसकी फैक्ट्री में तैयार माल रखने की जगह कम हो गई है और इस्तेमाल करके वापिस भेजे हुए कपड़ों के बोरे ही सारी जगह घेरे हुए हैं और वे अब इन्हें किसी को देना चाहते हैं । उसकी बात सुन कर पहले तो हंसी आई मगर जब उसने बताया कि हाल ही में लगाए गए हिसाब के अनुसार उसकी साल भर की बिक्री में 23 फीसदी ऐसी फर्जी बिक्री ही थी तो सुन कर बड़ी हैरानी हुई कि ये क्या हो रहा है ? छुईमुई सी हमारी लड़कियां क्या इतनी चंट चालाक हो गई हैं ? क्या सचमुच यह चालाकी भर है या कोई साइबर क्राइम है ? और यदि क्राइम है तो किस ओर जा रही है हमारी लड़कियां ? मित्र की बात की तस्दीक को ऑनलाइन गारमेंट्स सप्लाई करने कुछ और लोगों से बात की । उन्होंने भी यही दुखड़ा रोया । किसी का आंकड़ा इससे थोड़ा कम था तो किसी का और भी ज्यादा । हालांकि इतना नुकसान उठाने के बाद भी वो लोग व्यापार कर रहे हैं तो जाहिर है मुनाफा काफी अच्छा होगा मगर उनकी बैलेंस शीट बनाने की बजाय मेरी रुचि तो लड़कियों के बदलते स्वभाव में है , अतः उसी की बात कर रहा हूं । 


हमारी दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है । जाहिर है लड़कियों के स्वभाव में भी परिवर्तन आना अवश्यंभावी है । पढ़ाई और करियर के मामले में ही नहीं परिवार और समाज के मोर्चे पर भी उन्होंने सफलता के झंडे गाड़े हैं । कई मामलों में तो उन्होंने प्रतिस्पर्धा में पुरुषों को भी पीछे दिया है मगर चालाकी के मामले में भी पुरुषों की बराबरी करने की होड़ उन्हें कहां ले जा रही है ? चलिए बराबरी तक भी रुक जाएं तो गनीमत है मगर ये तो उनसे भी आगे बढ़ रही हैं । फेसबुक और इंस्टाग्राम आदि पर नए नए आउटफिट के साथ तस्वीरें साझा करने को किसी के साथ धोखाधड़ी करना कहां तक जायज है ?  उनके डेट पर जाने और बिला वजह मॉल और बाजारों में सजधज कर घूमने की कीमत कोई बेचारा व्यापारी क्यों भुगते ? स्ट्रीट स्मार्टनेस के नाम पर हम अपनी बच्चियों को क्या संस्कार दे रहे हैं ?

रविवार, 24 अप्रैल 2022

सफर रेल का / रेहान फ़ज़ल



'सफ़र रेल का'


अगर वक्त की कोई पावंदी न हो तो आज भी हम ट्रेन से ही सफ़र करना पसंद करें. ट्रेन का सफ़र हमारा हमेशा से सबसे पसंदीदा सफ़र है. ट् इसके ज़रिए न सिर्फ़ आप हिन्दुस्तान के मुख़्तलिफ़ शहरों, गांव  - देहात का जायज़ा ले सकते हैं बल्कि आम हिंदुस्तानियों के बिहेवियर पैटर्न की भी स्टडी कर सकतें हैं. आम फ़हम की बिहेवियर पैटर्न स्टडी हमारी ख़ास दिलचस्पियों में शामिल है! 

 पब्लिक प्लेस पर आप घंटों बग़ैर बोर हुए अकेले गुज़ार सकते हैं बस एक कोने में बैठे बैठे आम लोगों को आब्ज़र्व करते रहिए.  ऐसे में सोशिओ - इकॉमोमिक स्ट्रक्चर, कास्ट और रिलिजस बेसिस पर बिहेवियर पैटर्न की मज़ेदार स्टडी भी की जा सकती है. और इसके लिए ट्रेन से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती. 

हिन्दी साहित्य के यात्रा वृत्तांतों में ट्रेन के सफ़र का ख़ासा असर रहा है. शिवानी की कहानियां हों, शरद जोशी के व्यंग हों या अज्ञेय के क़िस्से, ये कहीं न कहीं रेल सफ़र के भी हिस्से रहे हैं. प्रख़्यात घुमक्कड़ महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने अपने यात्रा वृतांत ज़रूर ट्रेन के सफ़र के दौरान भी लिखे/प्लान किए होंगे! हिन्दी और ऊर्दू ही नहीं तक़रीबन हर ज़ुबान के अदब में रेल जर्नीज़ का ख़ासा रोल है. 

सही सही याद नहीं कि ट्रेन से पहला पहल सफ़र कब किया था! शायद 4 , सवा 4 साल के रहे होंगे तब जब मुन्नू चाचा की शादी में कानपुर से गोंडा पूरी बोगी में बारात के साथ गए थे. बहुत छोटी छोटी इमेजेज़ हैं लेकिन साफ़ हैं ! मसलन बोगी के पूरे गलियारे में अपने बड़े भाई के साथ दौड़ लगाने की या फिर मुन्नू - चुन्नू चाचा के कूपे में घुसने और वहां से भगाए जाने की! शुरु शुरू की ट्रेन की यादें अपने वालिद के साथ की हैं . फर्स्ट क्लास का कूपे सबसे ऊंचे दर्जे का होता था. कूपे ख़ासा बड़ा होता था जिसमें वुड पैनेलिंग के साथ साथ शायद अटैच्ड वॉशरूम भी होता था. पता नहीं हिन्दुस्तान में तब एसी कोच की ईजाद हुई भी थी कि नहीं लेकिन अगर हो भी गई हो तो हमारे ननिहाल सुल्तानपुर की गाड़ियों में तो एसी कोच नहीं ही होते होंगे. तब ट्रेनों में तीन क्लास ही होते थे. सबसे ऊपर फर्स्ट क्लास उसके बाद सेकेंड जिसमें हरे रंग की रैक्सिन चढ़े मोटे गद्देदार  सीटें होती थीं और सबसे निचला क्लास, लकड़ी के फट्टों की सीटों वाला, थर्ड या जनरल क्लास. अब थर्ड क्लास रिजर्व क्लास है और जनरल अनरिजर्व. पहले फ़र्स्ट को छोड़कर शायद सब अनरिज़र्व होता था. कोई भी टिकट लेकर बैठ सकता था. इतनी भीड़ नहीं थी और टिकट और सीट ट्रेन छूटने के वक्त विंडों से भी मिल जाते थे. 

बचपन में तो शायद ही कभी थर्ड या जनरल क्लास में बैठें होंगे लेकिन जवानी में पूरे पांच छह साल जनरल क्लास में ही सफ़र किया. कभी मूड हुआ तो टिकट लेकर वरना प्लेटफ़ार्म टिकट से ही काम चलाया. जेएनयू में स्टे के दौरान तक़रीबन हर महीने -  डेढ़ महीने में दिल्ली से इलाहाबाद आना होता था. इसके लिए हॉस्टल से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन जल्दी पहुंच कर सीधे गदहइय्या लाइन ( वाशिंग लाइन) पर खड़ी प्रयागराज एक्सप्रेस के जनरल कोच में ऊपर की बर्थ पर,जहां पंखा बेहतर चलता ,हो कब्ज़ा जमा लेते थे. इस ट्रेन में इतना सफ़र किया कि कमोबेश सारे टीटीई पहचानते थे टिकट पूछने की नौबत ही नहीं आती. कुछ टीटी तो दोस्त हो गए थे जो आंख फाड़ फाड़ कर हमसे जेएनयू के सच्चे झूठे क़िस्से सुनते और रास्ते के स्टेशनों से फेरी वालों से पूड़ी सब्ज़ी चाय वगैरह का बाक़ायदा इंतज़ाम भी करते! टीटी से  दोस्ती यारी का सबसे अच्छा तरीक़ा उसके साथ मिल कर बेइंतिहाशा भीड़ भरे डिब्बे में टिकट चेकिंग में मदद का था. कुछ टीटी तो इतने दोस्त हो गए थे कि बर्थ ख़ाली होने पर एसी में लिटा कर भी लाए . एक दफ़ा हमने यूं ही शरारतन एक टीटी से कह दिया कि जाड़ा बहुत है हो सके तो होस्टल तक बस में जाने के लिए चदरे का जुगाड़ कर दो तो उसने कहा , ' चुपचाप कंबल उठा लीजिए और निकल लीजिए. हर जर्नी में एकाध ग़ायब हो ही जाते हैं!' उस टीटी की बातों ने हमारी इतनी हौंसला अफ़जाई की कि कुछ महीनों बाद हमारे हॉस्टल रूम में नादर्न रेलवे के चदरे, तकिए के गिलाफ़ और कंबल नज़र आने लगे! पता नहीं वो कैसी उम्र थी? कैसी ज़हनियत थी कि इस छोटी मोटी चोरी चकारी को अपनी शान मानते थे! हमारे एक मामू ज़ाद भाई हैं. कुछ समय पहले ही कमिश्नर होकर रिटायर हुए हैं. बड़े दिलचस्प और बेहतरीन इंसान हैं. जवानी में अपने मामू की बारात में गए तो ख़ातिरदारी में कोताही उनसे बर्दाश्त न हुई और विदाई के वक्त जनवासे के सारे बल्ब ही निकाल लाए!.

ट्रेन में सफ़र के दौरान सबसे मज़ेदार विज़ुअल्स बीच के स्टेशनों पर चढ़ते लोगों की बदहवासी के होते हैं! उसमें मियां बीवी के झगड़ों से लेकर सवारियों की पुलिटिकल बहस देखने सुनने लायक़ होती हैं. बिहार और गोरखपुर के बाद सबसे ज़्यादा बहसी लोग कानपुर के होते हैं जो हर हालत में अपनी बात मनवा कर ही छोड़ते हैं. 

 एक बार लखनऊ से दिल्ली गोमती एक्सप्रेस से आ रहे थे रास्ते में जब इटावा आया तो एक मुसलमान औरत प्लेटफार्म पर उतर कर गिलास में पानी ले आई और अपने दो ढ़ाई साल के बच्चे को पिलाते हुए बोली, ' लो मुलायम सिंह के शहर का पानी पी लो!' हमें तब ही यक़ीन हो गया कि आने वाले 50 सालों तक मुलायम सिंह से मुस्लिम वोट बैंक कहीं खिसकने वाला नहीं! इस बात को आज 35  - 37 साल हो गए हैं.

सबसे दिलचस्प सफ़र दिल्ली से रायपुर राजधानी एक्सप्रेस का 2005 का रहा. हमें एशियन ब्राडकास्टिंग यूनियन के लिए एक स्पेशल स्टोरी करनी थी. स्टोरी राजनांदगांव की एक ग्रामीण महिला फुलबासिन की भी. फुलबासिन ने गांव की महिलाओं का छोटा समूह बनाकर एक माइक्रो बैंक बनाया था. फुलबासिन पर मेरी स्टोरी टीवी की पहली स्टोरी थी. जिसको चाइनीज़ पब्लिक ब्रॉडकास्टर ने ख़ासा हाईलाइट किया था. उसके कई साल बाद फुलबासिन को पदमश्री से नवाज़ा गया और अमिताभ बच्चन ने केबीसी में बुलाया. बहरहाल इस स्टोरी के लिए हमें रायपुर जाना था. पता नहीं क्यों हमने राजधानी से जाना तय किया जब कि जहाज़ से जा सकते थे. राजधानी में दिल्ली से हमारे साथ रायपुर के एक लोकल पत्रकार चढ़े. वो किसी एमपी के रेलवे टोकन्स पर सफ़र कर रहे थे. उन्होनें हमसे हमारा तार्रफ़ पूछा और राजनांदगांव जाने की वजह.जब हमने बताया कि एशियन ब्राडकास्टिंग यूनियन के लिए माइक्रो फाईनेंस प्रोजेक्ट पर स्पेशल स्टोरी करनी है तो उसके कुछ पल्ले नहीं पड़ा. उसने कहा, ' राजनांदगांव तो पूरी तरह से नक्सल एरिया है. सिक्योरिटी लेकर जाइएगा.' हमें लगा कि कितने अफ़सोसनाक हालात हैं कि एक लोकल पत्रकार भी ग़रीब ट्राइबल एरिया में कुछ अच्छा नहीं देखता. बस उसे नक्सल कह कर ख़ारिज कर देता है. ग़रीब पिछड़े ट्राइबल एरिया के प्रति ये एक आम नज़रिया है जो कभी बदलने वाला नहीं! बहरहाल उस पत्रकार ने हमारे सरकारी स्टेट्स को ताड़ लिया और हमारे साथ साथ रायपुर तक अपने सफ़र का बेहतर जुगाड़ बिठा लिया. एसी टू  की चार बर्थ वाले कूपे में हम दोनों थे उसके अलावा दो और पैसेंजर को आना था. ट्रेन में एसी टू का एक कूपे दो बर्थ वाला भी था. पता नहीं टी टी को क्या वरगला कर उन मौसूफ़ ने दो बर्थ वाले कूपे के पैसेंजर्स को हम लोगों की सीट पर ट्रांसफर करवा दिया और हमारे साथ दो बर्थ वाले कूपे में शिफ़्ट हो लिए. हमने जब उनसे पूछा कि कैसे बर्थ चेंज करवा ली तो बोले, ' बस टीटी से कह दिया जो साहब साथ में ट्रैवेल कर रहें हैं वो नक्सल एरिया का बहुत सीक्रेट डाक्यूमेंट ले जा रहें हैं और हम इनके साथ हैं लिहाज़ा हम लोगों को किसी तरह सेपरेट कूपे में अलग बिठाइए!' 

ट्रेन नई दिल्ली से कुछ दूर ही चली कि वो महाशय ग़ायब हो गए. थोड़ी देर बाद अपने साथ एक अटैंडेंट लेकर अवतरित हुए जिसे उन्होनें कहीं से निकलवा कर हमारी सेवा में लगवा दिया था. शाम होते ही बैरा चाय नाश्ता लेकर आया तो उन्होनें चाय उठाकर गलियारे में फेंक दी. बहुत ज़ोर से चिल्लाते हुए बोले, ' सर प्लाटिक के गिलास में चाय पियेंगे और ये सड़ा नाश्ता करेंगे? जाओ सेट में चाय लाओ और एसी वन वाला नाश्ता सर्व करो!' बैरा भाग गया और काफ़ी देर तक जब नहीं आया तो हमनें कहा,  ' आपने नाहक़ वापस कर दिया.' तो जवाब दिया, ' थोड़ी देर रुक जाइए. सब आएगा!' 

क़रीब 20 मिनट बाद दो टीटी आए उनके पीछे पीछे पैंट्री का एक आदमी था जिसके हाथ में सेट की चाय और नैपकिन से ढंका नाश्ता था. उसने टीटी से कहा, ' सब अच्छे काम की रिपोर्ट रेल मंत्रालय को जाएगी. सर कुछ कहते नहीं लेकिन इनके आदेश पर मैं ही रिपोर्ट भेजता हूं. अटैच्ड जो हूं इनके .साथ . सुबह ब्रेकफास्ट को ज़रा 'डबुल' करवा दीजिएगा. ट्रेन के सफ़र में हिलने से जल्दी पच जाता है!' ये कहते हुए उसने चार पांच बड़ी तेज़ और भद्दी डकार ली. फिर बोला, ' रात के डिनर में क्या है? वेज या नॉन वेज?' पैंट्री वाले ने कहा, ' जैसी आपकी पसंद!' पत्रकार बोता, 'थोड़ा चिकन रसेदार करवाइए और थोड़ा भुना हुआ. बस साथ में रोटी और चावल रहेगा. सब्जियां या दाल नहीं उसकी जगह चिकन बढ़वा दीजिए!' 

मैं सब ख़ामोशी से देख रहा था और थोड़ी उलझन में भी था कि कहीं ये पत्रकार हमें किसी मुसीबत में न डाल दे. 

बीच बीच में उठकर वो कहीं चला जाता और फिर वापस लौट आता. रायपुर तक बीच बीच में पता नहीं किसे किसे पकड़ कर हमसे बस यूं ही मिलवाने ले आता. उन दिनों हिन्दुस्तान में बहुत कम लोग लैपटाप लेकर चलते थे. इस प्रोजेक्ट के लिए हमें एक लैपटॉप मिला था जिसपर हम रास्ते में कुछ काम कर रहे थे. हमारा लैपटॉप देखकर वो काफ़ी ख़ुश था. जिन लोगों को मिलवाने लाता उन सबसे कहता सब इसी में दर्ज हो रहा है. पता नहीं क्या दर्ज हो रहा है? न वो जानता था न उसके लिवाए लोग! 

डिनर के पहले हमसे बोला, ' आइए पैंट्री का एक राउंड ले लेते हैं!' हम जब उसके साथ पैंट्रीकार की तरफ गए तो देखा पैंट्री वाला एक जिंदा मुर्ग़ा इसके पास लाया और बोला, ' सर ये ठीक रहेगा?' इसने लगता है हम दोनों के बीच एक पूरे मुर्ग़ का जुगाड़ कर लिया था. अगली सुबह  ब्रेकफास्ट बेहतरीन और 'डबुल' था साथ में वो ट्रेन के गार्ड को भी हमसे मिलवाने ले आया. हम तीनों ने एक साथ नाश्ता किया. 

ज़िंदग़ी में हमारा कभी इतने बड़े जालिये से पाला नहीं पड़ा था.

रायपुर में हमारा रुकने का इंतज़ाम पूर्व मुख्यमंत्री श्यामा चरण शुक्ल और  विद्या चरण शुक्ल के गेस्ट हाउन में था. पुराने रायपुर के बाहर हाईवे पर श्यामा चरण और विद्या चरण शुक्ल का एक पेट्रोल पंप था उसी के साथ लगीं उनकी कुछ एयर कंडीशंड कॉटेजेज़ थीं. विद्याचरण शुक्ल के स्टाफ़ के दो तीन लोग पता नहीं क्यों फूल माला लेकर प्लेटफ़ार्म पर हमारी अगवानी के लिए खड़े थे. ट्रेन से उतरते जब उसने इन लोगों को देखा और लोकल होने की वजह से पहचाना तो ख़ासा झटके में आ गया.  उसे लगा  कि वो रास्ते भर हमें जिस हौफ़े में लेकर आया कहीं हम वाक़ई वही या उससे बड़े तो नहीं? बाहर निकलते बोला, ' सर अपना कार्ड तो दीजिए. कभी आपसे संपर्क करना पड़े तो!'

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2022

लालमुनी चौबे पर शिवानंद झा

 कल मेरे पुराने मित्र लालमुनि चौबे की बेटी का विवाह हुआ. जहां तक मुझे स्मरण है, 62 या 63 में चौबे जी से पहली मुलाक़ात काशी विश्वविद्यालय में ही हुई थी. उन दिनों मैं आरा जैन कॉलेज का विद्यार्थी था. हमारी मुलाक़ात के माध्यम थे भभुआ के रामगोबिंद तिवारी. पता नहीं कैसे भटकते हुए रामगोबिंद जैन कॉलेज चले आए थे. उन्हीं के माध्यम से बनारस और भभुआ से मेरा संपर्क बना जो आज तक कायम है.

लालमुनि आजीवन जनसंघ और भाजपा से जुड़े रहे. लेकिन स्वभाव से वे जाति और धर्म से हमेशा निरपेक्ष रहे. बनारस से मेरा परिचय लालमुनि चौबे ने ही कराया. 72 में विधायक बनकर पटना आए. अभी जहां जदयू का दफ़्तर है वही उपर वाला फ़्लैट विधायक के रूप मे उनको आवंटित हुआ था. पटना के जनसंघी नेताओं से उनका लगाव बहुत कम था. कैलाश जी या अश्विन जी की वे बहुत इज़्ज़त करते थे.

पटना तो आ गये. लेकिन यह शहर उनके लिए लगभग अपरिचित जैसा ही था. पटना मे उनका पुराना और अनौपचारिक संबंध उस समय तक मेरे ही साथ था. अतः पटना में उनका दूसरा घर श्रीकृष्ण पुरी वाला मेरा फ़्लैट बन गया. मेरी श्रीमती जी यानी बिमला जी उनकी भौजाई नहीं, मालकिन बन गईं. 

दरअसल 72 में ही बाबूजी से अलग होकर श्रीकृष्ण पुरी वाले मकान में मैं आ गया था. एम 3 टाइप का मकान था. जगह की पर्याप्त थी और हमारा वह घर कम्यून बन गया था. जिन मित्र को रहने का कोई ठौर नहीं मिलता था तो वह वहीं आ जाता था.

चौबे, विधायक तो बिहार विधानसभा के बन गये थे. लेकिन उनके मन की राजधानी तो पटना नहीं, बनारस ही थी. पटना में जब भी रहते दस-ग्यारह बजे तक मेरे यहाँ आ जाते थे. उसके बाद तो रसोई घर पर उनका क़ब्ज़ा हो जाता था. बच्चे दाढ़ी चाचा के सहायक बन जाते थे. कभी मुर्ग़ा तो कभी मछली. मछली ज़्यादा. लेकिन सब्ज़ी भी आला दर्ज़े का बनाते थे. उनके रसदार लहसुनसग्गा के साथ भात  खाने का स्वाद याद करके अभी भी मुँह में पानी आ जाता है.

लालमुनि चौबे और मेरे बीच नज़दीकी का एक और आधार था. हम दोनों शास्त्रीय संगीत के प्रेमी थे. एक दिन की बात है. बोरिंग रोड चौराहे के एक कोने पर बनारसी की पान दुकान थी. हम और चौबे साथ ही थे. वहाँ किसी ने बताया कि बनारस के अमुक हॉल में आज रविशंकर और विलायत खाँ की युगलबंदी होने वाली है. उस समय तक हम लोग यही जानते थे कि इन दोनों महान कलाकारों के बीच कभी जुगलबंदी हुई ही नहीं है. बस क्या था ! यह ऐतिहासिक मौक़ा क्यों चूका जाए ! उस समय एकमात्र गाड़ी तूफ़ान एक्सप्रेस ही थी. लगभग बारह बजे रात हम मुगलसराय उतरे. वहाँ से टेम्पो पकड़कर उस हॉल में पहुँचे जहाँ वह कार्यक्रम होने वाला था. पता चला कि हम लोग अफवाह के चक्कर मैं इतना झंझट और परेशानी उठाकर यहाँ पहुँचे हैं. वहाँ पंडित भीमसेन जोशी का कार्यक्रम समाप्त हो रहा था. समापन में वे ‘जो भजे हरि को सदा’ अपना प्रसिद्ध भजन गा रहे थे. उस दिन शायद उनके गले में सरस्वती उतर आईं थीं! वह भजन उन्होंने ऐसा गाया कि हम सब लोग उसमें डूब गए. भले हमलोग पं. रविशंकर और विलायत खां साहब की युगलबंदी नहीं सुन सके लेकिन पं. भीमसेन जोशी के भजन ने हमें तरोताज़ा कर दिया.

चौबे के विधायक बनने के दो वर्ष बाद ही चौहत्तर का आंदोलन शुरू हो गया. आंदोलन के दरम्यान जब जेपी ने आंदोलन समर्थक दलों के विधायकों को विधानसभा से त्यागपत्र देने का निर्देश दिया तो चौबे उन चंद लोगों में थे जिन्होंने जेपी की पहली आवाज़ पर विधानसभा से इस्तीफ़ा दे दिया था.

आंदोलन के दरम्यान मैं बिहार के कार्यक्रमों में व्यस्त हो गया. चौबे भभुआ और बनारस में आंदोलन का अलख जगा रहे थे. इमरजेंसी में वे बनारस जेल में थे और मैं पटना के फुलवारी शरीफ में. हम दोनों के बीच नागी जी कड़ी थे. दोनों की ज़रूरतों को पूरा करने की जवाबदेही नागी जी यानी नागेंद्र सिंह पर थी. वे भी ग़ज़ब के समर्पित मित्र थे.

आपातकाल के बाद हुए चुनाव में चौबे जी पुनः विधायक बने. इस मर्तबा आर ब्लॉक में थोड़ा बड़ा घर मिला. इस बीच पटना में उनका दायरा फैलने लगा था. हमारे सभी मित्र उनके भी मित्र बन गये . उसी चुनाव में अरुण (बसावन) भी लालगंज, वैशाली से विधायक हुआ था. वह भी चौबे से गहरा जुड़ गया. इसी समय कर्पूरी जी की जगह रामसुंदर जी मुख्यमंत्री बन गये. चौबे जी उस मंत्री मंडल में मंत्री बन गए. उसके बाद अभी जो भाजपा का कार्यालय है, वह मकान उनको आवंटित हो गया. वहाँ जिस तरह की बैठकी होने लगी वह चौबे के व्यक्तित्व के विस्तार को ही प्रतिबिंबित करता है. गफ़ूर साहब (अब्दुल गफ़ूर) तो जब भी पटना मे होते थे दो-चार घंटा तो उनका वहाँ बीतता ही था. विख्यात पत्रकार सुरेंद्र प्रताप , कवि आलोक धन्वा और दो एक दफा एम जे अकबर भी वहाँ की बैठकी में शामिल हुए थे. गिरिराज चौबे जी की बैठकी में उस समय ‘अप्रेंटिस’ था. लालमुनि चौबे के सामाजिक सरोकार का दायरा बहुत विस्तृत था. उस दायरे में जनसंघ या भाजपा के लोग कम दिखाई देते थे. समाजवादी या उदारवादी ज़्यादा.

लालमुनि चौबे के साथ मैंने बक्सर लोकसभा का चुनाव दो बार लड़ा. पहला चुनाव 99 में. लालू जी स्वयं मेरा नामांकन कराने गये थे. उस चुनाव में ग्यारह बारह हज़ार वोट से हार गया था. अटल जी की सभा और उसमें उनके भाषण ने मुझे हरा दिया था. दूसरा चुनाव तो मैं बुरी तरह हारा था. राजद का आधार वोट यानी यादव वोट ही मुझे नहीं मिला. लोकतंत्र मे चुनाव कैसे लड़ना चाहिए यह उन दोनों चुनावो से सीखा जा सकता है. हम दोनों ने चुनाव अभियान के अपने भाषण में कभी एक दूसरे का नाम तक नहीं लिया. अभियान के दरम्यान आमना-सामना होने पर रूक कर बतिया लेने में भी कभी हमलोगों ने संकोच नहीं किया. वोट की गिनती के समय हम रिटर्निग अफसर के कमरा में चाय पान साथ ही कर रहे होते थे.

लंबे राजनीतिक जीवन में चौबे जी की ईमानदारी पर कभी उँगली नहीं उठी. चौबे ने ‘लोग’ कमाया है. उनकी बेटी के विवाह में लगभग सभी पार्टी के लोग थे. उनको चाहने वालों ने उनकी कमी का एहसास ही होने नहीं दिया. रविंद्र किशोर बाप की भूमिका में थे. उन्हीं के दरवाज़े पर बारात आई. सारा इंतज़ाम उनका था. स्वभाविक है कि भाजपा के लोगों की उपस्थिति ज़्यादा थी. विधानसभा में विरोधी दल के नेता तेजस्वी यादव भी उपस्थित थे. मनोज सिन्हा कश्मीर मे गवर्नर हैं. इस विवाह के लिए ही वे पटना आए थे. कांग्रेस पार्टी के लोग भी नज़र आए. नीतीश कुमार की पार्टी के लोग भी थे. चौबे जी का बेटा शिशिर उनके छोड़ी जवाबदेही का सबके सहयोग से अच्छी तरह निर्वहन कर रहा है.

चौबे को गये काफ़ी दिन हो गये. कभी उनपर लिखा नहीं था. कल विवाह के समय उनकी बहुत याद आईं. अपने प्यारे और ज़िंदादिल मित्र की स्मृति को प्रणाम करता हूँ.

तस्वीर दीपक की है.

आज विश्व पुस्तक दिवस है !


23 अप्रैल 1564 को एक ऐसे लेखक ने दुनिया को अलविदा कहा था, जिनकी कृतियों का विश्व की समस्त भाषाओं में अनुवाद हुआ। यह लेखक था शेक्सपीयर। जिसने अपने जीवन काल में करीब 35 नाटक और 200 से अधिक कविताएं लिखीं !


साहित्य-जगत में शेक्सपीयर को जो स्थान प्राप्त है उसे देखते हुए यूनेस्को ने 1995 से और भारत सरकार ने 2001 से इस दिन को विश्व पुस्तक दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की !

 

वास्तव में किसी व्यक्ति की किताबों का संकलन देखकर ही आप उसके व्यक्तित्व का अंदाजा लगा सकते हैं। कहते हैं कि किताबें ही आदमी की सच्ची दोस्त होती हैं और दोस्तों से ही आदमी की पहचान भी। किताबों में ही किताबों के बारे में जो लिखा है वह भी बहुत उल्लेखनीय और विचारोत्तेजक है। 


टोनी मोरिसन ने लिखा है- 'कोई ऐसी पुस्तक जो आप दिल से पढ़ना चाहते हैं, लेकिन जो लिखी न गई हो, तो आपको चाहिए कि आप ही इसे जरूर लिखें !

हिन्दू हिंदुत्व और सामूहिक समाजशास्त्रीय सोच / डॉ थानेश्वर शर्मा

 हिंदुत्व का महत्च , कृपया एक बार अवश्य पढें , और अगर इन सभी कार्यो में से कुछ या सभी कार्य नहीं करते तो आज ही से शुरू कर दें , स्तय और सही लगे तो शेयर अवश्य कर दें 🙏


हमें अपनी संस्कृति पर ग़र्व क्यों न हो :—   

हम भारतवासी सनातन धर्मी  तो आदिकाल से क्वारेंटाईन करते हैं, विदेशी पश्चिमी सभ्यता वाले लोगों को अब समझ मे आया*किसी भी पूजा से पहले पवित्रीकरण मंत्र अपवित्रम पवित्रो वा हाथ में जल से हाथ धो कर फिर  तीन बार आचमन करके पूजा प्रारंभ की जाती  है*


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        *आज जब सिर पर घूमता एक वायरस हमारी मौत बनकर बैठ गया तब हम समझें कि हमें क्वारेंटाईन होना चाहिये, मतलब हमें ‘‘सूतक’’ से बचना चाहिये। यह वही ‘सूतक’ है जिसका भारतीय संस्कृति में आदिकाल से पालन किया जा रहा है। जबकि विदेशी संस्कृति के नादान लोग हमारे इसी ‘सूतक’ को समझ नहीं पा रहे थे। वो जानवरों की तरह आपस में चिपकने को उतावले थे ? वो समझ ही नहीं रहे थे कि मृतक के शव में भी दूषित जीवाणु होते हैं ? हाथ मिलाने से भी जीवाणुओं का आदान-प्रदान होता है ? और जब हम समझाते थे तो वो हमें जाहिल बताने पर उतारु हो जाते । हम शवों को जलाकर नहाते रहे और वो नहाने से बचते रहे और हमें कहते रहे कि हम गलत हैं और आज आपको कोरोना का भय यह सब समझा रहा है।*


👉 *हमारे यहॉ बच्चे का जन्म होता है तो जन्म ‘‘सूतक’’ लागू करके मॉ-बेटे को अलग कमरे में रखते हैं, महिने भर तक, मतलब क्वारेंटाईन करते हैं।*


👉 *हमारे यहॉ कोई मृत्यु होने पर परिवार सूतक में रहता है लगभग 12 दिन तक सबसे अलग, मंदिर में पूजा-पाठ भी नहीं। सूतक के घरों का पानी भी नहीं पिया जाता।*


👉 *हमारे यहॉ शव का दाह संस्कार करते है, जो लोग अंतिमयात्रा में जाते हैं उन्हे सबको सूतक लगती है, वह अपने घर जाने के पहले नहाते हैं, फिर घर में प्रवेश मिलता है।*


*हम मल विसर्जन करते हैं तो कम से कम 3 बार साबुन से हाथ धोते हैं, तब शुद्ध होते हैं तब तक क्वारेंटाईन रहते हैं। बल्कि मलविसर्जन के बाद नहाते हैं तब शुद्ध मानते हैं।*


👉 *हम जिस व्यक्ति की मृत्यु होती है उसके उपयोग किये सारे रजाई-गद्दे चादर तक ‘‘सूतक’’ मानकर बाहर फेंक देते हैं।*


*हमने सदैव होम हवन किया, समझाया कि इससे वातावरण शुद्ध होता है, आज विश्व समझ रहा है, हमने वातावरण शुद्ध करने के लिये घी और अन्य हवन सामग्री का उपयोग किया।*


👉 *हमने आरती को कपूर से जोड़ा, हर दिन कपूर जलाने का महत्व समझाया ताकि घर के जीवाणु मर सकें।*


👉 *हमने वातावरण को शुद्ध करने के लिये मंदिरों में शंखनाद किये,*


👉 *हमने मंदिरों में बड़ी-बड़ी घंटियॉ लगाई जिनकी ध्वनि आवर्तन से अनंत सूक्ष्म जीव स्वयं नष्ट हो जाते हैं।*


*हमने भोजन की शुद्धता को महत्व दिया और उन्होने मांस भक्षण किया।*


👉 *हमने भोजन करने के पहले अच्छी तरह हाथ धोये, और उन्होने चम्मच का सहारा लिया।*

**हमने घर में पैर धोकर अंदर जाने को महत्व दिया*


👉 *हम थे जो सुबह से पानी से नहाते हैं, कभी-कभी हल्दी या नीम डालते थे और वो कई दिन नहाते ही नहीं*


 *हमने मेले लगा दिये कुंभ और सिंहस्थ के सिर्फ शुद्ध जल से स्नान करने के लिये।*


 *हमने अमावस्या पर नदियों में स्नान किया, शुद्धता के लिये ताकि कोई भी सूतक हो तो दूर हो जाये।*


*हमने बीमार व्यक्तियों को नीम से नहलाया ।*


👉 *हमने भोजन में हल्दी को अनिवार्य कर दिया, और वो अब हल्दी पर सर्च कर रहे हैं।*


 *हम चन्द्र और सूर्यग्रहण की सूतक मान रहे हैं, ग्रहण में भोजन नहीं कर रहे और वो इसे अब मेडिकली प्रमाणित कर रहे हैं।*


👉 *हम थे जो किसी को भी छूने से बचते थे, हाथ नहीं लगाते थे और वो चिपकते रहे।           *हम थे जिन्होने दूर से हाथ जोडक़र अभिवादन को महत्व दिया और वो हाथ मिलाते रहे।*


👉 *हम तो उत्सव भी मनाते हैं तो मंदिरों में जाकर, सुन्दरकाण्ड का पाठ करके, धूप-दीप हवन करके वातावरण को शुद्ध करके और वो रातभर शराब पी-पीकर।*


👉 *हमने होली जलाई कपूर, पान का पत्ता, लोंग, गोबर के उपले और हविष्य सामग्री सब कुछ सिर्फ वातावरण को शुद्ध करने के लिये।*


👉 *हम नववर्ष व नवरात्री मनायेंगे, 9 दिन घर-घर आहूतिया छोड़ी जायेंगी, वातावरण की शुद्धी के लिये।*


👉 *हम देवी पूजन के नाम पर घर में साफ-सफाई करेंगे और घर को जीवाणुओं से क्वरेंटाईन करेंगे।*


👉 *हमनें गोबर को महत्व दिया, हर जगह लीपा और हजारों जीवाणुओं को नष्ट करते रहे, वो इससे घृणा करते रहे*


👉 *हम हैं जो दीपावली पर घर के कोने-कोने को साफ करते हैं, चूना पोतकर जीवाणुओं को नष्ट करते हैं, पूरे सलीके से विषाणु मुक्त घर बनाते हैं और आपके यहॉ कई सालों तक पुताई भी नहीं होती।*


👉 *अरे हम तो हर दिन कपड़े भी धोकर पहनते हैं और अन्य देशो में तो एक ही कपड़े सप्ताह भर तक पहन लिये जाते हैं।*


👉 *हम अतिसूक्ष्म विज्ञान को समझते हैं आत्मसात करते हैं और वो सिर्फ कोरोना के भय में समझने को तैयार हुए।*


*हम उन जीवाणुओं को भी महत्व देते हैं जो हमारे शरीर पर सूक्ष्म प्रभाव डालते हैं। आज हमें गर्व होना चाहिऐ हम ऐसी देव संस्कृति में जन्में हैं जहॉ ‘‘सूतक’’ याने क्वारेंटाईन का महत्व है। यह हमारी जीवन शैली हैं,*


👉 *हम जाहिल, दकियानूसी, गंवार नहीं*

👉 *हम सुसंस्कृत, समझदार, अतिविकसित महान संस्कृति को मानने वाले हैं। आज हमें गर्व होना चाहिऐ कि पूरा विश्व हमारी संस्कृति को सम्मान से देख रहा है, वो अभिवादन के लिये हाथ जोड़ रहा है, वो शव जला रहा है, वो हमारा अनुसरण कर रहा है।* 


*हमें भी भारतीय संस्कृति के महत्व को, उनकी बारीकियों को और अच्छे से समझने की आवश्यकता है क्योंकि यही जीवन शैली सर्वोत्तम, सर्वश्रेष्ठ   और सबसे उन्नत हैं,*

*गर्व से कहिये हम सबसे उन्नत हैं। सनातन धर्म की जीवन शैली पद्धति संपूर्ण मानव के लिए सुख तथा निरोग प्रदान करने वाली है।

मंगलवार, 19 अप्रैल 2022

सुपर 30 के तर्ज़ पर TMU का सुपर 60

 टीएमयू तराशेगा सुपर 60, खुलेंगे जॉब के स्वर्णिम द्वार 


सेंटर फॉर टीचिंग, लर्निंग एंड डवलपमेंट- सीटीएलडी टीम के हाथों में यह विशिष्ट कैंपेन


ख़ास बातेंः

छात्रों को स्टडी के संग-संग अब हायर पैकेज के लिए विशेष ट्रेनिंग  टीएमयू स्टुडेंट्स रोजगार उन्मुख कैंपेन को संजीदगी से लेंः प्रो. कृष्णिया 

प्रो. आरके द्विवेदी बोले, सीटीएलडी टीम की इस प्रतिबद्धता का कायल हूं 

टीएमयू उत्कृष्ट पैकेज के साथ गुणवत्तापूर्ण प्लेसमेंट को संकल्पित: रैना 

एक्सक्लूसिव कैंपेन का मुख्य मकसद छात्रों को एमएनसी में चयनित कराना 

मास्टर ट्रेनर श्री तरूण अरोड़ा इस एक्सक्लूसिव कैंपेन के चीफ कॉर्डिनेटर





प्रो. श्याम सुंदर भाटिया/ श्री रजनीश तिवारी

मुरादाबाद. 

तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी से डिग्री लेने के बाद अब स्टुडेंट्स को जॉब के लिए इधर-उधर भटकना नहीं पड़ेगा। यूनिवर्सिटी के स्टडी में लीन छात्रों को अब टेक्निकल ट्रेनिंग, वर्बल एबिलिटी, लिखित परीक्षा और इंटरव्यू की बारीकियां भी सिखाई जा रही हैं। स्टुडेंट्स को साक्षात्कार में दक्ष करने के लिए यूनिवर्सिटी में सुपर 60 प्रोग्राम का शंखनाद किया है। इस कैंपेन के पहले चरण में इंजीनियरिंग विभाग के छात्र-छात्राएं एक महीने की ट्रेनिंग ले चुके हैं। टिमिट में भी सुपर 60 का शुभारम्भ हो चुका है, जहां प्रबंधन विभाग के स्टुडेंट्स इंजीनियरिंग के छात्रों की मानिंद प्लेसमेंट की बारीकियों के गुर सीखेंगे। इस विशेष ट्रेनिंग का मुख्य मकसद टीएमयू के छात्रों को हायर पैकेज पर मल्टीनेशनल कंपनियों में चयनित कराना है। यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर टीचिंग, लर्निंग एंड डवलपमेंट- सीटीएलडी ने सुपर 60 की लांचिंग इंजीनियरिंग कॉलेज से की है। 


इस ट्रेनिंग के बाद स्टुडेंट्स जॉब के प्रति आत्मविश्वास से लबरेज हैं, ताकि उन्हें लिखित परीक्षा के दौरान किसी तरह की समस्या का सामना न करना पड़े। यह बात दीगर है, सुपर 60 के लिए चयनित इन छात्रों का सेकेंड फेज होना अभी बाकी है। इस ट्रेनिंग की कमान सीटीएलडी के डायरेक्टर प्रो. आरएन कृष्णिया और उनकी टीम के अनुभवी शिक्षकों ने सभांल रखी है। इस सघन प्रशिक्षण से चयन परीक्षा और साक्षात्कार के दौरान विद्यार्थियों के सामने आने वाली कड़ी चुनौतियों से निपटने में आसानी होगी। साक्षात्कार के समय कई बार विद्यार्थी घबरा जाते हैं। कई सवालों का जवाब जानते हुए भी नहीं दे पाते हैं। इस तरह की विपरीत परिस्थितियों का सामना भविष्य में यूनिवर्सिटी के विद्याथियों को न करना पड़े, सुपर 60 प्रोग्राम के तहत स्टुडेंट्स को दो चरणों में ट्रेंड किया जा रहा है। पहले चरण में एप्टीट्यूड, रीजनिंग एबिलिटी, सॉफ्ट स्किल्स, वर्बल एबिलिटी और टेक्निकल ट्रेनिंग दी जाएगी। आखिर में उन्हें साक्षात्कार के लिए तैयार किया जाएगा।


सीटीएलडी टीम समय-समय पर छात्र-छात्राओं के सर्वांगीण विकास के लिए कम्युनिकेशन स्किल्स, सॉफ्ट स्किल्स, एप्टीट्यूड टेस्ट ट्रेनिंग, बूट कैंप, ब्रेन मंथन और क्रॉस रोड्स जैसे तमाम प्रोग्राम आयोजित करती रहती है। इसके साथ ही यूनिवर्सिटी में प्रसिद्ध उद्योगों के प्रतिनिधियों को प्लेसमेंट के लिए भी बुलाया जाता है। सीटीएलडी के डायरेक्टर प्रो. कृष्णिया जोर देकर कहते हैं, टीएमयू स्टुडेंट्स को इस प्रोग्राम को प्राथमिकता और गंभीरता से लेना चाहिए ताकि प्रशिक्षण के मकसद को मुकम्मल किया जा सके। नतीजतन इस  कैंपेन का बेहतर परिणाम मिले।

 एफओईसीएस के निदेशक प्रो. आरके द्विवेदी कहते हैं, सीटीएलडी छात्रों को रोजगार उन्मुख बनाने को लेकर प्रतिबद्ध है। मैं विशेषकर प्रो. कृष्णिया की इस प्रतिबद्धता का कायल हूं। असिस्टेंट डायरेक्टर प्लेसमेंट श्री विक्रम रैना ने कॉर्पोरेट कंपनियों के मौजूदा हायरिंग ट्रेंड को स्ट्रांग करने की पुरजोर वकालत करते हुए कहा, टीएमयू अपने छात्रों को उत्कृष्ट वेतन पैकेज के साथ गुणवत्तापूर्ण प्लेसमेंट के लिए संकल्पित है। सीटीएलडी के मास्टर ट्रेनर श्री तरूण अरोड़ा इस एक्सक्लूसिव कैंपेन के चीफ कॉर्डिनेटर हैं।

रविवार, 17 अप्रैल 2022

समाज सभ्य जो हो गया हैं ।*

 *समय पुराना था*

तन ढँकने को कपड़े न थे,

फिर भी लोग तन ढँकने का

प्रयास करते थे ।

आज कपड़ों के भंडार हैं, 

फिर भी तन दिखाने का 

प्रयास करते हैं 

समाज सभ्य जो हो गया हैं ।


*समय पुराना था*, आवागमन

के साधन कम थे।

फिर भी लोग परिजनों से 

मिला करते थे।

आज आवागमन के 

साधनों की भरमार है।

फिर भी लोग न मिलने के

बहाने बनाते हैं ।

*समाज सभ्य जो हो गया हैं ।*


*समय पुराना था*, 

घर की बेटी, पूरे गाँव की बेटी होती थी।

आज की बेटी पड़ोसी से ही असुरक्षित हैं ।

*समाज सभ्य जो हो गया हैं ।*


*समय पुराना था*, लोग 

नगर-मोहल्ले के बुजुर्गों का

हालचाल पूछते थे ।

आज माँ-बाप तक को 

वृद्धाश्रम में डाल देते हैं ।

*समाज सभ्य जो हो गया हैं ।*


*समय पुराना था*, 

 खिलौनों की कमी थी ।

फिर भी मोहल्ले भर के बच्चों के

साथ खेला करते थे ।

आज खिलौनों की भरमार है,

पर बच्चे मोबाइल की जकड़ में बंद हैं । 

*समाज सभ्य जो हो गया हैं ।*


*समय पुराना था*, 

गली-मोहल्ले के पशुओं 

तक को रोटी दी जाती थी ।

आज पड़ोसी के बच्चे भी 

भूखे सो जाते हैं ।

*समाज सभ्य जो हो गया हैं ।*


*समय पुराना था*, 

पड़ौसी के घर मे आए 

रिश्तेदार का भी पूरा 

परिचय पूछ लेते थे ।

आज तो पड़ोसी का नाम तक नहीं जानते ।

*समाज सभ्य जो हो गया हैं ।*


*कटु सत्य बुरा लगे तो क्षमा!*🙏

युद्ध में बलात्कार : अपराध या हथियार ? ऋषभ देव sharmav

 

यकीन करने का मन तो नहीं होता, लेकिन युद्ध में सब कुछ संभव है। यह भी कि रूसी महिलाएँ अपने सैनिक पतियों को यूक्रेनी महिलाओं के बलात्कार के लिए प्रेरित करें। यदि ऐसा है, तो मानना होगा कि यह युद्ध न्याय और सत्य के लिए नहीं, घृणा और बर्बरता के ऋणशोधन के लिए लड़ा जा रहा है! देशभक्ति नहीं, मानवद्रोह इसके मूल में है! 


माना कि युद्ध एक अनिवार्य बुराई है, लेकिन जब वह उन्माद बन जाता है, तो मनुष्यता को बचाने के लिए उसे रोकना सारे सभ्य समाज की ज़िम्मेदारी होनी चाहिए। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि रूस-यूक्रेन युद्ध को रोकने की ईमानदार कोशिश किसी ओर से होती दिखाई नहीं दे रही। जो ऐसी कोशिश कर सकते थे, वे आग में घी डालने में लगे हैं! यह रूस और यूक्रेन के हित में तो है ही नहीं, शेष विश्व के हित में भी नहीं है कि दोनों देश न तो झुकने के लिए तैयार हैं, न ही बातचीत के जरिए शांति स्थापना के लिए कोई प्रयास कर रहे हैं। इस बीच युद्ध के दौरान क्रूरता के अलावा यौन हिंसा की जो खबरें आ रही हैं, वे मानव जाति को कलंकित करने वाली हैं। रणनीतिक तटस्थता के बावजूद किसी को भी युद्ध का समर्थन करने वाले 80 प्रतिशत रूसियों की इस बीमार मानसिकता की निंदा ही करनी चाहिए कि वे यूक्रेनी महिलाओं के साथ रूसी सैनिकों के बलात्कार को  जायज़ मानते हैं! भुक्तभोगी महिलाओं का यह आरोप हमलावरों  की बर्बरता का प्रमाण है कि रूसी सैनिक हत्यारे हैं, हमेशा नशे में धुत रहते हैं, उनमें से ज्यादातर बलात्कारी और लुटेरे हैं! 


नफरत और नासमझी भरा यह युद्ध फौरन बंद होना चाहिए। वैसे तो युद्ध में बलात्कार के एक हथियार की तरह इस्तेमाल का अनुमोदन मानव सभ्यता ने कभी नहीं किया। लेकिन तमाम युद्धों में बर्बर फौजें ऐसा करती आई हैं। यह दुनिया का सबसे पुराना और बदनाम युद्ध-अपराध है। वही संभवतः यूक्रेन में भी हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र का गठन दुनिया को ऐसी अमानवीयता से बचाने के लिए ही किया गया था। लेकिन उसके पास भी युद्धोन्माद का कोई तोड़ नहीं है। उसका काम चिंताhh प्रकट करने तक ही सीमित रह गया  लगता है। 


सयाने बता रहे हैं कि यूक्रेन में पिछले छह हफ़्तों से अधिक समय से जारी युद्ध का महिलाओं और लड़कियों पर भीषण असर हुआ है और एक पीढ़ी के बरबाद हो जाने का जोखिम है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार युद्ध शुरू होने के बाद जान बचाकर भागने वाली हर पाँच में से एक महिला या लड़की को यौन हिंसा का सामना करना पड़ा है। महिलाओं और लड़कियों के साथ बीच रास्ते में या शरणार्थी कैंपों में हैवानियत हुई है। बुचा और मारियुपोल में महिलाओं से ज्यादती के मामले सामने आए हैं। युद्ध के कारण दूसरों पर निर्भर रहने वाले लोगों में से 54 प्रतिशत महिलाएँ हैं। संयुक्त राष्ट्र की वरिष्ठ अधिकारी प्रमिला पैटन ने सुरक्षा परिषद में कहा तो ज़रूर है कि महिलाओं के अधिकार मानवाधिकार हैं और युद्ध व शान्ति के समय में समान रूप से सार्वभौमिक हैं। लेकिन इनका उल्लंघन रोकने की कोई शक्ति उनके पास भी नहीं है। उनका काम तो शायद निगाह रखना भर है। सो, उन्होंने राजदूतों से, संघर्ष और युद्ध संबंधी यौन हिंसा के मामलों में जवाबदेही सुनिश्चित करने का आग्रह  किया है। 


सवाल वहीं का वहीं है कि युद्धरत दोनों पक्षों को समझौते की मेज पर लाने के लिए संयुक्त राष्ट्र क्या कुछ भी नहीं कर सकता! क्या एक पक्ष पर आर्थिक प्रतिबंध लगाना और दूसरे पक्ष को हथियार मुहैया कराते रहना वास्तव में किसी भी लिहाज से शांति-प्रयास है? 000

*बुढ़ापा नापने के थर्मामीटर / डॉ 72 साल का बच्चा

 :*

😄😂🤣

*दोस्त बुलाए पर जाने को दिल ना

करे, तो समझ लो कि आप बूढ़े हो रहे हो...*🤭


*बिना वजह अगर मस्ती करते बच्चों पर ग़ुस्सा आ जाए, तो समझ लो कि आप बूढ़े हो रहे हो...*😝


*पड़ोसन की जगह पत्नी पर ज्यादा प्यार आने लगे तो समझ लो कि आप बुढ़ापे की ओर अग्रसर हैं...*😝


*धमाल - मस्ती वाली फ़िल्मों की अगर आलोचना करने लगे हो, तो समझ लो कि आप बूढ़े हो रहे हो...*😪


*अगर मस्त महफ़िल जमी हो और उस दौरान दोस्तों को मशवरा देने लग जाओ, तो समझ लो कि आप बूढ़े हो रहे हो...*🤐


*अगर नए कपड़े ख़रीदने की इच्छा कम हो रही हो, तो समझ लो की आप बूढ़े हो रहे हो...*😧


*हर बात में युवाओं के फैशन पर टिप्पणी करने लगे हो, तो समझ लो कि आप बूढ़े हो रहे हो...*😯


*फूल पर गुनगुनाते भँवरे को देख कर कोई रोमांटिक गाना याद ना आए, तो समझ  लो कि आप बूढ़े हो रहे हो...*🥴


*रेस्टोरेंट में खाते समय अगर घर के खाने की तारीफ़ करने लगो, तो समझ लो कि आप बूढ़े हो रहे हो...*🤕


*बेफिक्री छोड़ कर अगर सर पर चिंता की टोकरी उठा ली हो, तो समझ लो कि आप बूढ़े हो रहे हो...*😵


*बारिश हो रही हो और पकोड़े की जगह छाता याद आए, तो समझ लो कि आप बूढ़े हो रहे हो...*🤒


🙏🏻 *सभी मित्रों को सादर समर्पित* 🙏🏻

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2022

रवि अरोड़ा की नजर से....

 ठरक के नाम पर / रवि अरोड़ा



उत्तर प्रदेश विधान परिषद के चुनावों में हुई भाजपा की प्रचंड जीत पर चर्चा के लिए हाल ही में एक चैनल पर मैं भी आमंत्रित था । हालांकि मैंने कोई गैरसंवैधानिक बात नहीं कही थी मगर पता नहीं ऐसा क्या हुआ कि एक नेता जी प्रवक्ता भड़क गए । पैनल में भक्त किस्म के एक राजनीतिक विश्लेषक भी थे और वे भी पाला खींच कर बैठ गए । मेरा कसूर इतना सा था कि मैं यह मानने को तैयार नहीं था कि विधान परिषद की जीत का किसी पार्टी के जनाधार बढ़ने घटने से कोई ताल्लुक है । मेरा पक्ष यह था कि विधान परिषद का चुनाव सत्ताबल, बाहुबल और धनबल का चुनाव होता है और जिसकी सरकार होती है , हर सूरत जीतता ही है और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है । यह चर्चा इतनी गर्मागर्म थी कि मुझे लगा बात को और आगे बढ़ाना चाहिए और ताज़ा तरीन राजनीतिक बहसों में इस मुद्दे को भी शामिल कराने की कोशिश करनी चाहिए । 


हाल ही में संपन्न हुए इस चुनावों में भाजपा को 36 में से 33 सीटें हासिल हुईं । सौ सीटों वाली विधान परिषद में अब भाजपा का बहुमत हो गया है । ऐसा 42 वर्ष के बाद हुआ है कि किसी पार्टी का विधान परिषद में बहुमत हो । अब इसी बहुमत को लेकर तमाम दावे किए जा रहे हैं मगर उसके तथ्यों पर चर्चा कोई नहीं कर रहा । एमएलसी के छः साल के कार्यकाल के लिए दो दो साल बाद तीन किश्तों में चुनाव होते हैं । अब ऐसे में लगातार दो बार सरकार बनाने वाली किसी भी पार्टी को बहुमत मिलना सामान्य सा गणित है और प्रदेश में चूंकि योगी सरकार पुनः सत्ता में आई है अतः भाजपा का विधान परिषद में भी बहुमत हो गया । 


वैसे यह समझना भी कोई राकेट साइंस नहीं है कि मात्र एक महीने पहले जिस समाजवादी पार्टी को प्रदेश भर से 32 फीसदी वोट मिले थे उसे परिषद के चुनाव में एक भी सीट क्यों नहीं मिली ?  बसपा को भी विधानसभा चुनावों में 12 फीसदी वोट पड़े थे मगर उसकी झोली भी इस बार खाली रही । दरअसल सब जानते हैं कि इन चुनावों में सत्ता की भूमिका कितनी होती है । साल 2004 में सपा की जब सरकार थी उसे 36 में से 24 सीटें मिली थीं और उसके भी थोक के भाव प्रत्याशी निर्विरोध चुने गए थे जबकि बसपा का खाता भी नहीं खुला था । मगर  2010 में जब बसपा की सरकार थी तो उसे 36 में से 34 सीटें मिल गईं और सपा की झोली खाली हो गई । निर्विरोध जीतने वालों की संख्या इस बार और बढ़ गई मगर 2016 में जब सपा की सरकार दोबारा आई तो उसने 36 में 31 सदस्य अपने चुनवा लिए । दुनिया जानती है कि विरोधी प्रत्याशियों को प्रशासन के बल पर घर बैठाने का खेल हर बार होता है और इसी के बल पर अपना प्रत्याशी निर्विरोध चुनवा लिया जाता है । 


समझ नहीं आता कि जब विधान परिषद के पास कोई विशेष अधिकार ही नहीं है, किसी बिल को वह रोक नहीं सकता तो क्यों जनता कि गाढ़ी कमाई उस पर खर्च की जा रही है ?  हर माह वेतन और भत्ते आदि मिला कर एक एक एमएलसी पर सालाना पचास लाख रुपए से अधिक खर्च होता है । विधायक निधि के नाम पर वे कहां कितना पैसा खर्च करेंगे , इसका भी कोई हिसाब किताब नहीं । उनका कार्यकाल समाप्त होने पर पेंशन और तमाम अन्य सुविधाएं अलग से देय होती हैं । वैसे सवाल तो यह भी बनता है कि विधान परिषद यदि इतनी ही महत्वपूर्ण है तो देश भर में यूपी, बिहार, महाराष्ट्र, आंध्र, तेलंगाना और कर्नाटक के अतिरिक्त अन्य राज्यों में यह क्यों नहीं है ? विद्वान भी मानते हैं कि विधान परिषद बिना दांत के किसी जीव जैसा है और चबा नहीं सकता , उसे केवल निगलना होता है ।


यह भी सर्वमान्य है कि यह अब अपने गठन की मूल भावना यानि हाऊस ऑफ एल्डर्स की भावना से विमुख हो चुका है । तमाम दल इस ऊंचे सदन में अपने वफादार कार्यकर्ताओं को ही एडजेस्ट करते हैं और कई दलों ने तो इसके टिकिट बेच पर पैसा कमाने का धंधा भी इसे बना लिया है । अब बताइए कि उत्तर प्रदेश जैसे गरीब प्रदेश में कुछ लोगों की नेतागिरी की ठरक पूरी करने के लिए इतनी बड़ी फजूलखर्ची करनी चाहिए क्या ?



गुरुवार, 14 अप्रैल 2022

जानना जरूरी है / डॉ. भावना

 यदि आप इसे पूरी तरह से नहीं पढ़ते हैं तो आप अपने जीवन रक्षक को जानने का सबसे बड़ा अवसर खो देंगे ...

 प्रिय मित्रों!


 मैं डॉ भावना हूं मैं बाल चिकित्सा सर्जरी (पीजीआई) के लिए पार्षद के रूप में काम कर रहा हूं।

 मैं आपसे एक छोटा सा निवेदन करना चाहता हूं।

 इससे पहले, मैं आपके साथ एक छोटी सी जानकारी साझा करना चाहता हूं।

 आप में से कई लोगों ने आज के अखबार पढ़े होंगे कि

 ईएमआरआई के नतीजे बताते हैं कि हार्ट अटैक वाले ज्यादातर लोगों की उम्र 50 साल से कम होती है।

 *आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि अपराधी पाम ऑयल है।  यह अल्कोहल और धूम्रपान को मिलाकर रखने से कहीं अधिक खतरनाक है।*

 *भारत दुनिया में पाम तेल का सबसे बड़ा आयातक है।*

 ताड़ के तेल का माफिया बहुत बड़ा है।

 *हमारे बच्चे, जो भविष्य हैं, एक बड़ा जोखिम है।*

 इस देश में ताड़ के तेल के बिना कोई फास्ट फूड उपलब्ध नहीं है।

 यदि आप *हमारे किराने की दुकान पर जाते हैं, तो ताड़ के तेल के बिना बच्चों का खाद्य पदार्थ लेने की कोशिश करें - आप सफल नहीं होंगे।*

 आपको यह जानने में दिलचस्पी होगी कि *बड़ी कंपनियों के बिस्कुट भी इसी से बनते हैं, और इसी तरह सभी चॉकलेट*।  हमें विश्वास दिलाया जाता है कि वे स्वस्थ हैं, लेकिन हम *हत्यारा पाम तेल या पामिटिक एसिड* के बारे में कभी नहीं जानते थे।

 लेज़ जैसी बड़ी कंपनियां पश्चिमी देशों में अलग-अलग तेल और भारत में पाम तेल का उपयोग केवल इसलिए करती हैं क्योंकि यह सस्ता है।

 जब भी हमारा बच्चा ताड़ के तेल के साथ कोई उत्पाद खाता है, तो मस्तिष्क अनुपयुक्त व्यवहार करता है और हृदय के आसपास और हृदय में वसा स्रावित करने का संकेत देता है *इससे बहुत कम उम्र में मधुमेह हो जाता है।*

 वर्ल्ड इकोनॉमिक फॉर्म ने अनुमान लगाया है कि कम उम्र में मरने वाले 50 प्रतिशत लोग मधुमेह और हृदय रोग से मरेंगे।

 *ताड़ के तेल माफिया ने फलों और सब्जियों को छोड़कर हमारे बच्चों को जंक फूड का आदी बना दिया है, जो हृदय की सुरक्षा करते हैं।*

 अगली बार जब आप अपने बच्चे के लिए कुछ खरीदें, तो उत्पाद का लेबल देखें।  अगर इसमें ताड़ का तेल या पामोलिनिक तेल या पामिटिक एसिड है, तो इसे खरीदने से बचें!

 हमने, अपने माननीय प्रधान मंत्री को लिखा है और अपनी आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित करने के लिए कुछ कार्रवाई करने के लिए भारत भर के 1 लाख डॉक्टरों से इसी तरह के पत्र बनाने की प्रक्रिया में हैं।

 एक बार फिर मैं अपने बच्चों के लिए आसन्न खतरे पर जोर देना चाहता हूं।


 कृपया हमारे बच्चों की रक्षा करें।  वे हमारे देश का भविष्य हैं!  कृपया इस संदेश को फॉरवर्ड करें।


 इसे अपने करीबी दोस्तों और परिवार के सदस्यों को फॉरवर्ड करना न भूलें।  भेजने के लिए कृपया ध्यान दें।  जितना संभव हो उतने व्यक्ति।

 🙏🙏

बुधवार, 13 अप्रैल 2022

ममता की निर्ममता / ऋषभ देव शर्मा

 

#डेलीहिंदीमिलाप


पश्चिम बंगाल के हंसखली (नदिया) में नाबालिग लड़की के कथित बलात्कार और हत्या की घटना अशोभनीय और निंदनीय तो है ही; लेकिन उस पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अनावश्यक टिप्पणी बेहद चौंकाने वाली है। मानवीय संवेदना को झकझोरने वाले ऐसे दुष्कृत्य पर इतनी असंवेदनशीलता के प्रदर्शन से तो यही लगता है कि वे केवल और केवल राजनीति में जीती हैं। ऐसी निर्मम राजनीति जिसमें मनुष्य मनुष्य नहीं होता, केवल वोट होता है! थोड़ी देर को मान भी लें कि मारी गई नाबालिग लड़की किसी प्रेम प्रसंग की दुर्भाग्यपूर्ण परिणति का शिकार हुई, तो भी क्या उस राज्य की मुख्यमंत्री का जनसभा में यह फ़तवा जारी करना शोभनीय और उचित हो सकता है कि यह एक लव अफेयर था और लड़की के परिवार को भी इसकी जानकारी थी?  मुख्यमंत्री ने अपने चिर-परिचित आक्रामक अंदाज़ में कहा  है कि “मीडिया में दिखाया जा रहा कि कथित रेप के कारण एक नाबालिग की मौत हो गई। यह रेप था, या वह प्रेग्नेंट थी, या लव अफेयर था, किसी ने जाँच की है?" उन्हें कौन बताए कि जाँच आपकी खुद की ज़िम्मेदारी है? पर उनका बयान तो जाँच के बिना ही फैसले पर पहुँचने का सूचक है। ऐसे में उनके नियंत्रित तंत्र से किसी निष्पक्ष जाँच की उम्मीद नहीं की जा सकती। 


सहज सवाल है कि ममता बनर्जी इस मसले पर इतनी बौखलाई हुई क्यों हैं कि उन्हें न दुष्कर्म दीख रहा है, न मृत्यु? ऐसा इसलिए कि इस कथित सामूहिक दुष्कर्म और हत्या के मामले में मुख्यमंत्री की अपनी पार्टी तृण मूल कांग्रेस के एक नेता के बेटे को गिरफ्तार किया गया है। नेतापुत्र का नाम आ जाने से मुद्दा राजनीतिक बन गया है। विपक्ष का हमलावर होना भी स्वभाविक है। लेकिन इस पर ममता बनर्जी का यह रुख पूर्णतः स्त्रीद्रोही और दुर्भाग्यपूर्ण है।


मुख्यमंत्री महोदया को लगता है कि इस मामले को उछाल कर  भाजपा बंगाल की छवि को  खराब कर रही है। उन्होंने किसी घाघ राजनीतिबाज की तरह यह भी कहा है कि  जान देकर भी वे बंगाल की छवि की रक्षा करेंगी। लेकिन उन्हें बंगाल की छवि की नहीं, तृण मूल कांग्रेस के उस नेता-पुत्र की रक्षा की चिंता शायद ज़्यादा सता रही है! उन्होंने अपने राज्य की तुलना दूसरे राज्यों से करते हुए उनका भी मजाक उड़ाया है। लेकिन खुद उनका बयान  उन पुरुषवादी नेताओं से कहीं अधिक अभद्र और अपमानजनक है जो कहते रहे हैं कि लड़कों से गलती हो ही जाती है! ममता बनर्जी कह रही हैं कि "अगर एक कपल रिलेशनशिप में है, तो हम  कर ही क्या सकते हैं? यह उत्तर प्रदेश नहीं है कि मैं लव जिहाद के खिलाफ अभियान चलाऊँगी। यह उनकी निजी स्वतंत्रता है। लेकिन अगर कुछ गलत हुआ है तो पुलिस गिरफ्तारी करेगी. उन्होंने गिरफ्तारी की भी है। पुलिस इसमें कोई भेदभाव नहीं करेगी।" पुलिस के करने को तो आपने कुछ छोड़ा ही नहीं, महोदया! इस बयान के रूप में  आपने उन्हें एक गढ़ी-गढ़ाई थ्योरी पकड़ा दी है न? पुलिस कुछ हाथ-पाँव मारती भी, तो आपने उसकी भी संभावना यह कह कर समाप्त कर दी कि 'मुझे बताया गया है, लड़की का लड़के के साथ अफेयर था। लड़की की मौत 5 अप्रैल को हुई और पुलिस को इसके बारे में 10 तारीख को पता चला। अगर 5 अप्रैल को उसकी मौत हुई तो परिवार वाले उसी दिन पुलिस के पास क्यों नहीं गए? उन्होंने शव का अंतिम संस्कार कर दिया। वे कहाँ से सबूत जुटाएँगे?” अब भला पुलिस क्यों कुछ करेगी? उसकी तरफ से आपने तो फाइनल रिपोर्ट लगा कर एक तरह से फ़ाइल ही बंद कर दी है न! दुष्कर्म-पीड़िता पर दोषारोपण का ऐसा उदाहरण आप ही प्रस्तुत कर सकती हैं! 


वह तो भला हो कलकत्ता उच्च न्यायालय का जिसने इस मामले की सीबीआई जाँच के आदेश दे दिए हैं और पुलिस से मामले को केंद्रीय एजेंसी को सौंपने को कहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि मामले की निष्पक्ष जाँच    पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के साथ ही राज्य के लोगों में विश्वास भी पैदा कर सकेगी। 000

ब्रजकिशोर प्रसाद जी के बारे में / मुकेश प्रत्यूष

 ब्रजकिशोर प्रसाद अपने समय के महत्वपूर्ण वकील तथा    बंगाल, बिहार और उड़ीसा संयुक्त प्रांत  विधान परिषद के पहले  मनोनीत सदस्य  और  इम्पीरियल काउंसिल के एकमात्र गैर-सरकारी सदस्य थे। 


1920 में महात्मा गांधी के आह्वान पर  वकालत छोड़ कर वे सत्याग्रह आंदोलन में शामिल हो गए। सदाकत आश्रम और बिहार विद्यापीठ का संचालन किया। असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने 1921 में  बिहार विद्यापीठ को  राष्ट्रीय महाविद्यालय के रूप में स्थापित करवाया और बृज किशोर बाबू को उप कुलपति नियुक्त किया था। 


ब्रजकिशोर प्रसाद की दो पुत्रियां थीं -  प्रभावती और विद्यावती।  प्रभावतीजी का विवाह लोकनायक जयप्रकाश नारायण से हुआ था और विद्यापतिजी का भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के जेष्ठ पुत्र मृत्युंजय प्रसाद  से। 


बृज किशोर बाबू के निधन के बाद  सामाजिक, सांस्कृतिक,  आर्थिक और राजनीतिक पहलुओं पर विशेष रूप से बिहार के ग्रामीण विकास की समस्याओं का अध्ययन और प्रकाशन हो सके इस उद्देश्य से जयप्रकाश नारायण ने बृजकिशोर भवन का निर्माण करवाया।    6 मई 1955 को डॉ राजेंद्र प्रसाद ने ब्रजकिशोर स्मारक भवन की नींव रखी  और 14 जनवरी 1974 को आचार्य जे. बी. कृपलानी ने इसका उद्घाटन किया था।  


इस प्रतिष्ठान के द्वारा  प्रतिवर्ष  सामाजिक, सांस्कृतिक,  आर्थिक और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में सक्रिय दो व्यक्तियों को ब्रजकिशोर सम्मान प्रदान किया जाता है । 


इस वर्ष ब्रजकिशोर स्मारक समिति ने यह सम्मान मुझे देने का निर्णय लिया है। मैं इसके लिए  समिति के प्रति आभार  प्रकट  करता हूं। 


यह मेरे लिए  खुशी की बात  है लेकिन  पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों  के कारण सम्मान समारोह  के दिन मेरा  पटना पहुंच पाना संभव नहीं हो पा रहा। उस दिन  मैं  देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों में रहूंगा।   स्वयं उपस्थित होकर इस सम्मान को ग्रहण नहीं कर पाने का  दुख मुझे रहेगा।

मंगलवार, 12 अप्रैल 2022

टी एम यू द्वारा E H R कॉन्क्लेव आयोजित

 

 तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी की ओर से  ई-एचआर कॉन्क्लेव

 : देश और दुनिया के पांच एचआर दिग्गजों ने साझा किए अपने अनुभव



K

ख़ास बातें


फ्यूचर में हर कंपनी को क्लाउड कम्प्यूटिंग का उपयोग करना होगाः साह


आर्किटेक्टिंग द फ्यूचर ऑफ वर्क लैंड्सकैप पर बोले एल्विन डेविड

सिग्निफिकेन्स ऑफ क्लाउड कम्प्यूटिंग इन डाटा मैनेजमेंट पर भी चर्चा


मीनाक्षी खेरा का टेलेंट मैनेजमेंट ट्रेंड्स इन चेंजिंग बिजनेस पर व्याख्यान 

दिव्या बोलीं रीबिल्डिंग ऑर्गेनाइजेशन्स- फ्रॉम हाइअरार्की टु नेटवर्क्स पर 


टीएमयू के वीसी प्रो. रघुवीर सिंह क्लाउड कम्प्यूटिंग के महत्व क़ो रेखांकित किया


कॉन्क्लेव का मकसद स्टुडेंट्स में जॉब के प्रति अवेयरनेसः डॉ. आदित्य


प्रो. कृष्णिया ने कहा, स्टुडेंट्स में डवलप करनी होंगी नई स्किल्स

एसोसिएट डीन प्रो. मंजुला जैन ने अंत में  सबो के प्रति आभार जताया 




श्याम सुंदर भाटिया


मुरादाबाद.


तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी ने एक और इतिहास रचा है। यूनिवर्सिटी में देश और दुनिया के हयूमन रिसोर्स के दिग्गजों ने ऑनलाइन अपने अनुभव साझा किए। तीन घंटे चली ई-एचआर कॉन्क्लेव- एस ऑफ इंडस्ट्रीज इन रैपिडली चेंजिंग बिजनेस इंवायरमेंट में इन हस्तियों ने कहा, हयूमन रिसोर्स किसी भी ऑर्गेनाइजेशन का अति महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह अब ऑप्शन नहीं, बल्कि वरदान है। दुनिया का कोई भी ऑर्गेनाइजेशन हयूमन रिसार्स की अनदेखी नहीं कर सकता है, क्योंकि यह संस्थान की वर्थ की मानिंद है।


इससे पूर्व की-नोट स्पीकर्स- टीम कम्प्यूटर के चीफ हयूमन रिसोर्स ऑफिसर श्री अमूल्य साह, न्यूजेन सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी लिमिटेड में एचआरडी के जीएम श्री एल्विन डेविड, मर्केन्टाइल इंफॉरमेशन एंड टेलीकम्यूनिकेशन टेक्नोलॉजी के बिजनेस हेड एंड जीएम श्री सुजीथ कुमार वी, क्रीडेक्स टेक्नोलॉजी की जीएम एचआर मिस मीनाक्षी खेरा, क्लाउड एनालॉजी की एचआर हेड मिस दिव्या डंग के अलावा तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के वीसी प्रो. रघुवीर सिंह, रजिस्ट्रार डॉ. आदित्य शर्मा, एसोसिएट डीन प्रो. मंजुला जैन, निदेशक सीटीएलडी प्रो. आरएन कृष्णिया, डायरेक्टर सीआरसी श्री विनीत नहरा, असिस्टेंट डायरेक्टर्स- श्री विक्रम रैना, श्री आकाश भटनागर की भी गरिमामयी मौजूदगी रही। संचालन सीटीएलडी की मास्टर ट्रेनर जैस्मिन स्टीफन ने किया। 


की-नोट स्पीकर श्री अमूल्य साह ने फ्यूचर ऑफ क्लाउड एंड रिमोट प्रोसेस ऑटोमेशन के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा, भविष्य में प्रत्येक कंपनी को क्लाउड कम्प्यूटिंग का उपयोग करना ही पड़ेगा। उन्होंने क्लाउड कम्प्यूटिंग के विभिन्न प्रकार जैसे- प्राइवेट क्लाउड, पब्लिक क्लाउड, हाइब्रिड क्लाउड आदि के फायदे की भी जानकारी दी।  श्री एल्विन डेविड ने बतौर की-नोट स्पीकर आर्किटेक्टिंग द फ्यूचर ऑफ वर्क लैंड्सकैप पर बोलते हुए हाइब्रिड वर्कप्लेस, गिग इकॉनामी और कोलैबोरेशन पर गहनता से प्रकाश डाला। श्री डेविड ने स्टुडेंट्स से क्रिएटिविटी, एम्पैथी, कोलैबोरेशन, कम्पैशन, क्यूरोसिटी, इमोशनल कान्सेंट और गुड कम्युनिकेशन स्किल्स पर ध्यान देने की पुरजोर वकालत की।


थर्ड की-नोट स्पीकर श्री सुजीथ कुमार वी ने सिग्निफिकेन्स ऑफ क्लाउड कम्प्यूटिंग इन डाटा मैनेजमेंट पर विस्तार से चर्चा की और क्लाउड कम्प्यूटिंग के महत्व को इन आंकड़ों के संग कहा, वर्तमान में क्लाउड कम्प्यूटिंग का बाजार 371 बिलियन डॉलर का है। 2025 तक यह बाजार 832 बिलियन डॉलर का होने की उम्मीद है।


मिस मीनाक्षी खेरा ने बतौर मुख्य वक्ता टेलेंट मैनेजमेंट ट्रेंड्स इन चेंजिंग बिजनेस पर अपना व्याख्यान दिया। मिस खेरा ने एम्पलॉयी एजुकेशन इन लेटेस्ट टेक्नोलॉजी, डाइवर्सिटी, इक्विटी, इंक्लूश़न, एम्पैथी फ्लेक्सिविटी, एम्पलॉयी एक्सपीरियंस आदि के बारे में अपने अनुभव साझा किए। साथ ही उन्होंने एम्पलॉयी बॉडी और हैल्थ एंड वैल बींग पर भी जोर दिया।


मिस दिव्या डंग ने मुख्य वक्ता की हैसियत से रीबिल्डिंग ऑर्गेनाइजेशन्स- फ्रॉम हाइअरार्की टु नेटवर्क्स पर बोलते हुए ऑर्गेनाइजेशन के स्ट्रक्चर पर विस्तार से बताया। उन्होंने कहा, वर्तमान समय में ऑर्गेनाइजेशन के स्ट्रक्चर में फ्लैक्सिबिलिटी होनी चाहिए। मिस दिव्या ने कंपनियों के हाइब्रिड ऑर्गेनाइजेशन स्ट्रक्चर पर भी जोर दिया।


कॉन्क्लेव का शंखनाद करते हुए टीएमयू के वीसी प्रो. रघुवीर सिंह ने क्लाउड कम्प्यूटिंग के संग-संग रीमोट प्रोसेस ऑटेमेशन, वर्कप्लेस लैंड्सकैप, डेटा मैनेजमेंट, टेलैंट मैनेजमेंट आदि शब्दों की भी तर्कसंगत व्याख्या की। रजिस्ट्रार डॉ. आदित्य शर्मा बोले, यह कॉन्क्लेव यूनिवर्सिटी के स्टुडेंट्स के लिए न केवल पॉजिटिव इंवायरमेंट तैयार करेगा, बल्कि उनके भविष्य के स्वर्णिम द्वार भी खोलेगा। निदेशक सीटीएलडी प्रो. आरएन कृष्णिया ने सारगर्भित संबोधन में कहा, 21वीं सदी की चुनौतियों का सामना करने के लिए यूनिवर्सिटी के स्टुडेंट्स को क्रिएटिविटी, कम्पैशन, क्यूरोसिटी, इमोशनल कान्सेंट और गुड कम्युनिकेशन स्किल्स से लबरेज होना होगा।


अंत में सभी मेहमानों का आभार व्यक्त करते हुए एसोसिएट डीन प्रो. मंजुला जैन बोलीं, यह हमारे लिए गर्व का विषय है, टीएमयू के ई-एचआर कॉन्क्लेव में नामचीन इंडस्ट्रीज के स्टॉलवर्टस एक मंच पर जुटे। अपने अनमोल अनुभवों को साझा किया।


बदलते कारोबारी माहौल में किस तरह ऑर्गेनाइजेशन्स के फंक्शनिंग में आमूल-चूल परिवर्तन आया है। इस कॉन्क्लेव में डायरेक्टर सीआरसी श्री विनीत नहरा, असिस्टेंट डायरेक्टर्स- श्री विक्रम रैना, श्री आकाश भटनागर की उल्लेखनीय भूमिका रही।

सोमवार, 11 अप्रैल 2022

रवि अरोड़ा की नजर से........

 इमरजेंसी तब थी या अब है !/ रवि अरोड़ा



जाने माने संपादक पद्मश्री आलोक मेहता जी के साथ लंबे अरसे तक विभिन्न अखबारों में काम किया । वे बताया करते थे कि आपातकाल के दौर में उन्होंने नवभारत टाइम्स में उत्तर प्रदेश के एक घोटाले की खबर छाप दी । प्रैस सेंसरशिप के दौर में सरकारी घोटाले की खबर छापना बड़ी हिमाकत थी सो उनके इर्दगिर्द के लोगों ने डराया कि अब आपकी गिरफ्तारी को कोई नहीं रोक सकता । आलोक जी भी चिंतित हुए मगर उन्होंने इस बाबत तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलकर अपनी बात कहने का निर्णय लिया । उन्होंने सोचा कि जब गिरफ्तारी होनी ही है तो कम से कम अपना पक्ष तो रख ही दें । इंदिरा जी से मुलाकात हुई मगर आशंका के विपरीत उन्होंने आलोक जी का इस बात के लिए धन्यवाद किया कि यह मामला उनके संज्ञान में लाए । यही नहीं इंदिरा जी ने तुरंत उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी को फोन कर मामले पर सख्त कार्रवाई करने के निर्देश भी दे दिए । उधर, पत्रकारिता के क्षेत्र में मील का पत्थर कहे जाने वाले और आपातकाल के नायक स्वर्गीय कुलदीप नैयर साहब भी बताया करते थे कि इमरजेंसी के दौर में ऐसा कोई अधिकारी देश में नहीं था जो उनके साथ एक कप चाय पीने का साहस कर सके । किसी अधिकारी से वे यदि बात भी कर लेते थे तो उसकी नौकरी खतरे में पड़ जाती थी । बावजूद इसके सरकार उनपर हाथ डालने से हमेशा बचती थी । एक और किस्सा , कथित तौर पर इंदिरा गांधी के ही जीवन पर बनी फिल्म आंधी से तूफान खड़ा कर देने वाले लेखक स्वर्गीय कमलेश्वर भी बताया करते थे कि कटु आलोचक होने के बावजूद स्वयं इंदिरा जी ने उन्हे बुला कर दूरदर्शन की बड़ी जिम्मेदारी यह कह कर सौंपी थी कि लोकतंत्र में सहमति और असहमति दोनो महत्वपूर्ण हैं ।


अब आप पूछ सकते हैं कि मैं आज इमरजेंसी कथा और इंदिरा पुराण क्यों बांच रहा हूं । दरअसल मैं ऐसा कुछ नहीं कर रहा । मैं तो आपको बस उस दौर की पत्रकारिता के चंद किस्से सुना रहा हूं जब देश में सचमुच इमरजेंसी और प्रैस सेंसरशिप का दौर था । ताकि आप आज के दौर में हो रहे पत्रकारों के उत्पीड़न का उस काल से तुलनात्मक अध्ययन कर सकें जब सचमुच सरकार विरोधी खबर लिखने की कानूनी मनाही थी । परीक्षा का पर्चा लीक कराने वालों की बजाय इसकी खबर छापने वाले पत्रकारों को जेल भेजने और भाजपा विधायक के खिलाफ खबर दिखाने पर पत्रकारों को थाने में नंगा करने की खबरों के बीच आपका पीछे मुड़ कर देखना बहुत जरूरी है । आपको यह जानना भी अति आवश्यक है कि हमारे मुल्क में सच्ची खबरें लिखने पर 2014 से अब तक 29 पत्रकारों की हत्या भी हो चुकी है। पत्रकारों की हत्या के मामले में अफगानिस्तान और मैक्सिको के बाद हमारा देश तीसरे नंबर पर है । यहां तक कि पाकिस्तान और सीरिया जैसे मुल्कों का रिकॉर्ड भी हमसे बेहतर है । पत्रकारों के खिलाफ मुकदमे दर्ज करने और उन्हें जेल भेजे जाने का तो आंकड़ा ही कभी तैयार नहीं किया जाता । उधर ऐसी खबरें भी मिलती रहती हैं कि तलुवे चाटने वाले पत्रकार मौज काट रहे हैं । पता चलता रहता है कि फलां ने इतने करोड़ छाप लिए और फलां ने इतनी बड़ी संपत्ति इकट्ठी कर ली । अजब दौर है, जो नंगे होकर पत्रकारिता कर रहे हैं उन पर लक्ष्मी जी छप्पर फाड़ कर बरस रही हैं और जो सच्चे सरस्वती पुत्र हैं और सच्ची खबरें लिखने का साहस कर रहे हैं , उन्हें मारा जा रहा, जेल भेजा जा रहा है अथवा नंगा किया जा रहा है ।

यानी जो खेमे में है उसे ईनाम इकराम और जो खेमे से बाहर है उसका उत्पीड़न ? समझ ही नहीं आ रहा कि इमरजेंसी और प्रैस सेंसरशिप तब थी या अब है ?

रविवार, 10 अप्रैल 2022

बटवारा

 19 ऊंटों की कहानी


प्रस्तुति - सतनारायण प्रसाद अनंत 

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एक गाँव में एक व्यक्ति के पास 19 ऊंट थे। 


एक दिन उस व्यक्ति की मृत्यु हो गयी। 


मृत्यु के पश्चात वसीयत पढ़ी गयी। जिसमें लिखा था कि:


मेरे 19 ऊंटों में से आधे मेरे बेटे को,19 ऊंटों में से एक चौथाई मेरी बेटी को, और 19 ऊंटों में से पांचवाँ हिस्सा मेरे नौकर को दे दिए जाएँ।


सब लोग चक्कर में पड़ गए कि ये बँटवारा कैसे हो ?


19 ऊंटों का आधा अर्थात एक ऊँट काटना पड़ेगा, फिर तो ऊँट ही मर जायेगा। चलो एक को काट दिया तो बचे 18 उनका एक चौथाई साढ़े चार- साढ़े चार. फिर?


सब बड़ी उलझन में थे। फिर पड़ोस के गांव से एक बुद्धिमान व्यक्ति को बुलाया गया।


वह बुद्धिमान व्यक्ति अपने ऊँट पर चढ़ कर आया, समस्या सुनी, थोडा दिमाग लगाया, फिर बोला इन 19 ऊंटों में मेरा भी ऊँट मिलाकर बाँट दो।


सबने सोचा कि एक तो मरने वाला पागल था, जो ऐसी वसीयत कर के चला गया, और अब ये दूसरा पागल आ गया जो बोलता है कि उनमें मेरा भी ऊँट मिलाकर बाँट दो। फिर भी सब ने सोचा बात मान लेने में क्या हर्ज है।


19+1=20 हुए।


20 का आधा 10, बेटे को दे दिए।


20 का चौथाई 5, बेटी को दे दिए।


20 का पांचवाँ हिस्सा 4, नौकर को दे दिए।


10+5+4=19 


बच गया एक ऊँट, जो बुद्धिमान व्यक्ति का था...


वो उसे लेकर अपने गॉंव लौट गया।


इस तरह 1 उंट मिलाने से, बाकी 19 उंटो का बंटवारा सुख, शांति, संतोष व आनंद से हो गया।


सो हम सब के जीवन में भी 19 ऊंट होते हैं।


5 ज्ञानेंद्रियाँ

(आँख, नाक, जीभ, कान, त्वचा)


5 कर्मेन्द्रियाँ

(हाथ, पैर, जीभ, मूत्र द्वार, मलद्वार)


5 प्राण

(प्राण, अपान, समान, व्यान, उदान)


और


4 अंतःकरण

(मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार)


कुल 19 ऊँट होते हैं। 


सारा जीवन मनुष्य इन्हीं 19 ऊँटो के बँटवारे में उलझा रहता है।


और जब तक उसमें मित्र रूपी ऊँट नहीं मिलाया जाता यानी के दोस्तों के साथ.... सगे-संबंधियों के साथ जीवन नहीं जिया जाता, तब तक सुख, शांति, संतोष व आनंद की प्राप्ति नहीं हो सकती।


यह है 19 ऊंट की कहानी...सभी मित्रों को समर्पित😌🙏🏽


      🌷🌱🌱🌷

🌹जय श्री राधे कृष्णा जी🌹🙏🙏🙏🙏

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

फेसबुक पर ना लिखो फ्री

 फेसबुक पर मुफ्त में लिखना हो बंद 


हमने फेसबुक की जिन गलियों में रहते हुए लिखना सीखा और धीरे-धीरे मीडिया, सिनेमा,संस्कृति के मसले पर अकादमिक और रिसर्च की दुनिया में गुम होते जा रहे हैं, सच पूछिए तो हम आख़िर-आख़िर तक अपनी इस बदनाम बस्ती में बने रहना चाहते हैं. यह जानते हुए कि ये दुनिया बेहद चाट, नकली और कई बार मन को तार-तार कर देनेवाली हो गयी है.


शुरु-शुरु में ब्लॉगिंग करते हुए जब हम यहां आए तो तेजी से हमारा लोगों से परिचय बढ़ा, कुछ से मिलना-जुलना भी हुआ. अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी में रह रहे प्रवासी भारतीय जब भारत आते तो वो हमारे लिए चॉकलेट लेकर आते और हम चॉकलेट से कई गुना ज़्यादा पैसे लगाकर एयरपोर्ट पर उनसे मिलने और लेने चले जाते. हम एक-दूसरे को बिल्कुल नहीं जान रहे होते, न ही वो हमारे रिश्तेदार होते. बस हमारे बीच एक तार होती कि हम देवनागरी में लिख रहे होते. बनारस, इलाहाबाद, पटना,जयपुर चेन्नई...जैसे शहरों में जाते और अपडेट करते कि यहां आया हूं तो उसके बाद से होटल का खाना खाने की ज़रूरत ही न पड़ती. कई बार तो होटल का कमरा तक छोड़ देते और उनके ही साथ हो लेते. बस वही एक तार कि हम हिन्दी में, देवनागरी में लिखनेवाले लोग हैं. हमें अच्छा लगता. घर छोड़कर आए हुए हम जैसे लोग पूरे देश में किस्तों में, टुकड़े-टुकड़े में घर को महसूस करते.


वक़्त बदला. धारदार लेखन का पर्याय बनी ये दुनिया देखते-देखते खेमेबाजी, दोहरेपन और ख़ुश करने, चाटुकारिता की हद तक उतर आने का अड्डा बनता गया. लिखने और जीने का अन्तराल साफ दिखने लगा. देशभर के शैक्षणिक-अकादमिक संस्थानों से जुड़े लोगों ने इसे गुरुजी को ख़ुश करने का पीठ बनाने में लग गए. कारोबारी मीडिया ने इसे पैसे झोंककर जिस तरह से इसे राजस्व का नया ठिकाना बनाया, सालों से पहचानी जानेवाली आंखें नज़र चुराने लग गए. मैंने ग़ौर किया जब उनकी नौकरी छूटती तो पोस्ट लाइक करते, कमेंट करते, नौकरी लगने पर एकदम से ग़ायब कि कहीं बॉस नाराज़ न हो जाय. खुली दिखनेवाली दुनिया बंधी-फंसी सी होती गयी और तब हम जैसे हजारों लोग यहां होकर भी मन और आत्मा से इससे अलग होते चले गए.


हमें सोशल मीडिया की ये बस्ती बहुत अपनी सी लगती रही है. सबकुछ बदल जाने के बावज़ूद यहां बने रहने का मन होता है. लिहाजा व्यस्त होने के बावज़ूद कतर-ब्यौत करके समय निकालते हैं. लिखने-बोलने के पैसे नहीं मिलते लेकिन बने रहने की कोशिश करते हैं. हम बेवक़ूफ लोग नहीं हैं. हम जानते हैं कि हमारे घर का चूल्हा क्या करने से जलता है ? हम यहां कॉमिक रिलीफ के लिए आते हैं.


दिल्ली जैसे शहर में सतरह-अठारह घंटे काम करते रहने के बीच मन में बहुत कुछ जमता चला जाता है, हम उसे लिख-बोलकर निकाल देना चाहते हैं. मैं तो यहां लिखते हुए भी बोल ही रहा होता हूं. एक बार लिख लेने के बाद हल्का सा लगता है. उसके बाद हमें कुछ नहीं चाहिए होते हैं.


सोशल मीडिया पर जिस इरादे से सक्रिय होने की हमें सलाहियत दी जाती हैं, वो हमें नहीं चाहिए होते हैं. सभा-संगोष्ठी के लिए बुलाया जाना, चर्चा में बने रहना, छिटपुट लाभ हासिल कर लेना, ये सब हमें थकानेवाली चीज़ लगती है. सच पूछिए तो लोगों से मिलने-जुलने में सबसे ज़्यादा थकान होती है. ये वर्चुअल स्पेस है, हम वर्चुअली ही जुड़े रहना चाहते हैं. हमारी ख़ुद की ज़िंदगी ऐसी है नहीं कि उसे असल ज़िंदगी में शामिल कर सकें. ऐसे में कई बार हम इस घबराहट से भी डिजिटल डिटॉक्स के नाम पर दूर चले जाते हैं कि हम इसे निभा ही नहीं सकते.


आज कई दिनों बाद एक पोस्ट लिखी. लिखने के बाद इनबॉक्स में कई मैसेज आए. उनमें से एक पत्रिका के संपादक का भी संदेश आया. आग्रह यह कि मैं पोस्ट में लगायी गयी तस्वीर की मूल प्रति उन्हें मेल करूं जिसे कि वो पत्रिका का आवरण चित्र बना सकें. साथ ही वो मेरी पोस्ट प्रकाशित कर सकें. मैंने उन्हें लिखा- ये सब करने के लिए हमें कितना मानदेय( ऑनरेरियम ) मिलेगा ? 

आप चाहें तो मुझे कह सकते हैं कि मैंने लिहाज छोड़ दिया है और बेशर्म हो चला हूं लेकिन आप जब कॉमिक रिलीफ, लीजर पीरियड का मतलब समझने के लिए तैयार ही नहीं है तो फिर मुझमें लिहाज कैसे रह जाएगा.


थियोडॉर एडोर्नों की एक किताब है- The Culture Industry. ये किताब दरअसल मास कल्चर पर उनके लिखे गए निबंधों का संग्रह है. इसी में उनका एक लेख है- Free Time. मौक़ा मिले तो कभी पढ़िएगा. एडोर्नो बहुत स्पष्टता के साथ बताते हैं कि ख़ाली समय में कैसे सांस्कृतिक उत्पाद बनाए जाते हैं जो कि पारंपरिक पूंजी से कहीं ज़्यादा बड़ी पूंजी तैयार करते हैं.


हम जैसे लोग ख़ाली समय को पैसे में बदलना जानते हैं.

आप जिसे सरोकार और मानवीय सहयोग के नाम पर हमसे जो झटकना चाहते हैं, बाज़ार की भाषा में उसे कन्सलटेंसी कहते हैं. बाज़ार जहां हर दूसरी चीज़ बेची-खरीदी जा सकती है. हमने अभी अपने इस समय को बेचना शुरु नहीं किया है.

जिस दिन बेचना शुरु करेंगे, अपनी शर्तों पर क़ीमत तय करेंगे. जब तक यूं ही लिख-बोल रहे हैं, एन्ज्वॉय कीजिए. आग्रह बस इतना है कि बेवक़ूफ मत समझिए और न यह कि समाज के नाम पर अपनी दूकान सजायी जा सकती है. 

 H

यह सोच बहुत पीछे छूट गयी है. पढ़िएगा न कभी एडोर्नो को और उससे पहले वेब्लेन की The Theory of Leisure Class, आपको मेरी बात और ठीक से समझ आएगी.

रवि अरोड़ा की नजर से.....

 आओ कुछ और बात करें /  रवि अरोड़ा



पिछले कई दिनों से सोशल मीडिया पर 19 लाख ईवीएम गुम होने की खबर छाई हुई है मगर पता नहीं क्या वजह है कि यह खबर अखबारों और न्यूज चैनल से गायब है । पहले पहल तो मुझे भी लगा कि सोशल मीडिया की तमाम अन्य खबरों की तरह यह खबर भी चंडूखाने की होगी मगर खोजबीन करने बैठा तो मामला बेहद गंभीर निकला । हैरानी की बात है कि जिस खबर से हमारी पूरी चुनावी व्यवस्था की चूलें हिल जानी चाहिए थीं और इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन से पड़े वोटों से सत्ता में आई तमाम सरकारों की वैधता पर सवाल उठ जाना चाहिए था, उस पर ठंडी खामोशी है । सत्ता पक्ष तो खैर क्या बोलेगा, विपक्ष भी मुंह में दही जमाए बैठा है । तमाम क्षेत्रीय पार्टियों में भी हताशा का यह आलम है कि कोई भी इतनी बड़ी खबर पर बयान तक नहीं दे रहा । अपनी कार्यशैली की ओर उठी इस उंगली की बाबत चुनाव आयोग तो खैर कुछ कह ही नहीं रहा । पता नहीं कैसा लोकतंत्र हम जी रहे हैं ? 


कर्नाटक के कांग्रेसी विधायक और पूर्व मंत्री एचके पाटिल को एक आरटीआई के मार्फत वर्ष 2016 से 2018 के बीच 19 लाख वोटिंग मशीनों के गायब होने का पता चला । उन्होंने इस मामले को विधान सभा में उठाया और इसके बाद ही इससे संबंधित छुटपुट खबरें सामने आईं । राज्य के विधानसभा अध्यक्ष ने अब इस मामले में चुनाव आयोग को तलब करने की बात की है तो मुख्यमंत्री भी स्वीकार कर रहे हैं कि पूरा सिस्टम बिगड़ा हुआ है । बता दूं कि इसी आरटीआई से पता चला कि ईवीएम बनाने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों बीईएल की नौ लाख साठ हजार और ईसीआईएल की नौ लाख तीस हजार मशीनें गुम हैं । इन कंपनियों का दावा है कि उन्होंने ये मशीनें चुनाव आयोग को सप्लाई की थीं मगर चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में ये हैं ही नहीं । ये मशीनें कहां गईं , क्या यह कोई हिसाब किताब की भूल है अथवा ये मशीनें चुनावों में गड़बड़ी करने में इस्तेमाल हुईं ? यह इतना बड़ा सवाल है कि इस पर तमाम विधानसभाएं और संसद हिल जानी चाहिए थीं मगर कमाल है कि एक पत्ता तक नहीं खड़का । हैरान करने वाली सबसे बड़ी बात है मीडिया जगत की चुप्पी । टाइम्स ऑफ इंडिया और इसी ग्रुप के हिंदी अखबार नवभारत टाइम्स के अतिरिक्त प्रिंट मीडिया से यह खबर गायब है । न्यूज चैनल्स में केवल एनडीटीवी ने इस खबर को दिखाया और बाकी सब पाकिस्तान और श्रीलंका का रोना रोते रहे । वैसे आज के माहौल में पत्रकारों से अब ज्यादा उम्मीद करें भी तो कैसे, वे बेचारे तो खुद सच्ची खबर छापने पर जेल भेजे जा रहे हैं । थाने में उन्हें नंगा किया जा रहा है । अब इस माहौल में कोई हिम्मत करे भी तो क्यों ? चहुंओर ऐसी बेशर्मी छाई है कि सवाल करने पर रामदेव जैसे लोग खुलेआम कहते हैं कि पूछ पाड़ ले । शायद यही वजह हो कि मीडिया जगत को अब जनता को यह बताने की जरूरत महसूस नहीं हो रही कि मध्य प्रदेश से भी तीन साल पहले बीस लाख ईवीएम गायब होने की खबर सामने आई थी । साल 2014 में जब मोदी सरकार बनी तब भी ऐसी छुटपुट खबरें लीक हुई थीं । मुझे नहीं मालूम कि ईवीएम से मतदान में गड़बड़ी हो सकती है अथवा नहीं मगर इतना जरूर पता है कि इस बार उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में ईवीएम में गड़बड़ी के अनेक वीडियो और खबरें सामने आईं थीं । समाजवादी पार्टी ने लगभग हर जिले में गड़बड़ी की शिकायत ट्वीट के मार्फत की थी । वैसे यह भी अजब कहानी है कि जो पार्टी सत्ता में होती है वह ईवीएम की पक्षधर हो जाती है और जो सत्ता में नहीं होते वही उसकी शिकायत करते हैं और मतदान बैलेट पेपर पर मुहर लगा कर करने की मांग करते हैं । शायद आपको भी याद हो कि हमारे मोदी जी को भी एक जमाने में ईवीएम पर विश्वास नहीं था मगर अब स्थितियां पूरी तरह उलट हैं । चलिए जाने दीजिए , हमें क्या , आइए हम तो कश्मीर फाइल्स की बात करते हैं ।

गुरुवार, 7 अप्रैल 2022

निमाड़ के सपूत भगवान टंट्या मामा

 निमाड़ के वीर सपूत रॉबिनहुड भगवान टंटया मामा जन्म उत्सव की कोटि कोटि शुभकामनाएं

सम्पूर्ण जनमानस पर आपका आशीर्वाद बना रहे 

ज्ञात हो कि प्रतिवर्ष हम सभी देशवासी देश के विभिन्न स्थानों पर एकत्रित होकर मामा का जन्मोत्सव मनाते आये है

परन्तु देश में ओर लगभग पूरे विश्व मे कोरोना महामारी का प्रकोप लगातार बढ़ता जा रहा है  इस महामारी के कारण हम इस वर्ष आज के दिन सभी अपने अपने घरों में रहकर अपने परिवारों के साथ मामा का जन्मदिन मनाए ओर अपनो को ओर अपने परिवार को सुरक्षित रखें

जय टंटया मामा

जय ओमकारजी की

अमर शहीद रघुनाथ महतो / विशद कुमार

 चुआड़ विद्रोह के महानायक,प्रथम शहीद क्रांतिकारी #रघुनाथ_महतो के पूण्यतिथि पर शत् शत् नमन जोहार


जब झारखंड के नायकों की अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ बगावत की चर्चा होती है, तो इस सूची में


•1769 का रघुनाथ महतो के नेतृत्व में ‘चुहाड़ विद्रोह

•1771 का तिलका मांझी से शुरू हुआ ‘हूल’, 

 •1820-21 का पोटो हो के नेतृत्व में ‘हो विद्रोह’,

 •1831-32 में बुधु भगत, जोआ भगत और मदारा महतो के नेतृत्व में ‘कोल विद्रोह’, 

•1855 में सिदो-कान्हू के नेतृत्व में ‘संताल विद्रोह’ और

 •1895 में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुए ‘उलगुलान’ ने अंग्रजों को ‘नाको चने चबवा’ दिये थे।


रघुनाथ महतो का जन्म 21 मार्च 1738 को तत्कालीन बंगाल के छोटानागपुर के जंगलमहल (मानभूम) जिला अंतर्गत नीमडीह प्रखंड के एक छोटे से गाव घुंटियाडीह में हुआ था।


बता दें कि 1769 में रघुनाथ महतो के नेतृत्व में आदिवासियों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ जंगल, जमीन के बचाव एवं नाना प्रकार के शोषण से मुक्ति के लिए विद्रोह किया, जिसे चुहाड़ विद्रोह कहा गया। चुहाड़ का शाब्दिक अर्थ लुटेरा अथवा उत्पाती होता है। यह विद्रोह 1769 से 1805 तक चला।


स्थानीय आदिवासी लोगों को उत्पाती या लुटेरा के अर्थ में सामूहिक रूप से ब्रिटिशों द्वारा चुआड़ कह कर बुलाया गया। हाल के कुछ आंदोलनों में इसे आपत्तिजनक मानते हुए इस घटना को चुआड़ विद्रोह के बजाय ‘जंगल महाल स्वतंत्रता आन्दोलन’ के नाम से बुलाये जाने का प्रस्ताव भी किया गया है। चुहाड़ का शाब्दिक अर्थ लुटेरा अथवा उत्पाती होता है।


1765 ई. में जब ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा तत्कालीन बंगाल के छोटानागपुर के जंगलमहल जिले में सर्वप्रथम मालगुजारी वसूलना शुरू किया, तब अंग्रेजों के इस शोषण का विरोध शुरू हुआ। क्योंकि लोगों को लगा कि अंग्रेजों द्वारा यह उनकी स्वतंत्रता और उनके जल, जंगल, जमीन को हड़पने तैयारी है। अत: 1769 ई. में कुड़मी समाज के लोगों द्वारा रघुनाथ महतो के नेतृत्व में सबसे पहला विरोध किया गया और ब्रिटिश शासकों के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंका गया। अंग्रेजों को इसकी कतई आशा नहीं थी। उन्होंने अपने करिंदों (उनके पिट्ठू जमींदारों) से पूछा- ये लोग कौन हैं? तो पिट्ठू जमींदारों ने इन विद्रोहियों को नीचा दिखाने के लिए उन्हें ‘चुहाड़’ (लुटेरा, नीच व उत्पाती) कहकर संबोधित किया। ऐसे में यह विद्रोह ‘चुहाड़ विद्रोह’ हो गया। यह विद्रोह कोई जाति विशेष पर केंद्रित नहीं था। इसमें मांझी, कुड़मी, संथाल, भुमिज, मुंडा, भुंईया आदि सभी समुदाय के लोग शामिल थे।


बता दें कि 1764 में बक्सर युद्ध की जीत के बाद अंग्रेजों का मनोबल बढ़ गया। अंग्रेज कारीगरों के साथ किसानों को भी लूटने लगे। 12 अगस्त 1765 को शाह आलम द्वितीय से अंगरेजों को बंगाल, बिहार, उड़िसा व छोटानागपुर की दीवानी मिल गयी। उसके बाद अंगरेजों ने किसानों से लगान वसूलना शुरू कर दिया।


1766 में अंग्रेजों ने राजस्व के लिए जमींदारों पर दबाव बनाया, लेकिन कुछ जमींदारों ने उनकी अधीनता स्वीकार नहीं की, तो कुछ अपनी शर्तों पर उनसे जा मिले। नतीजा यह हुआ कि किसान अंग्रेजी जुल्म के शिकार होने लगे। स्थिति अनियंत्रित होने लगी, तब चुहाड़ आंदोलन की स्थिति बनी।


रघुनाथ महतो बचपन से ही देशभक्त व क्रांतिकारी स्वभाव के थे।


1769 में फाल्गुन पूर्णिमा के दिन उन्होंने नीमडीह गांव के एक मैदान में सभा की। यही स्थान रघुनाथपुर के नाम से जाना गया। रघुनाथ महतो के समर्थक 1773 तक सभी इलाके में फैल चुके थे। चुहाड़ आंदोलन का फैलाव नीमडीह, पातकुम, बड़ाभूम, धालभूम, मेदनीपुर, किंचुग परगना (वर्तमान सरायकेला खरसांवा) राजनगर, गम्हरिया आदि तक हो गया। उन्होंने अंगरेजों के नाक में दम कर रखा था।


चुहाड़ आंदोलन की अक्रामकता को देखते हुए अंग्रेजों ने छोटानागपुर को पटना से हटा कर बंगाल प्रेसीडेंसी के अधीन कर दिया। 1774 में विद्रोहियों ने किंचुग परगना के मुख्यालय में पुलिस फोर्स को घेर कर मार डाला।


इस घटना के बाद अंगरेजों ने किंचुग परगना पर अधिकार करने का विचार छोड़ दिया। 10 अप्रैल 1774 को सिडनी स्मिथ ने बंगाल के रेजीमेंट को विद्रोहियों के खिलाफ फौजी कार्रवाई करने का आदेश दे दिया।


सन 1776 में आंदोलन का केंद्र रांची जिले का सिल्ली बना। पांच अप्रैल 1778 को जब रघुनाथ महतो जंगलों में अपने साथियों के साथ सभा कर रहे थे। सिल्ली प्रखंड के लोटा पहाड़ किनारे अंग्रेजों की रामगढ़ छावनी से हथियार लूटने की योजना को लेकर बैठक चल रही थी। इसी बीच गुप्त सूचना पर अंग्रेजी सेना ने रघुनाथ महतो एवं उनके सहयोगियों को चारों ओर से घेर लिया। दोनों ओर से काफी देर तक घमासान युद्ध हुआ। रघुनाथ महतो को भी गोली लगी। यहां सैकड़ों विद्रोहियों को गिरफ्तार कर लिया गया, रघुनाथ महतो और उनके कई साथी मारे गये।


उल्लेखनीय हैं कि चुआड़ विद्रोह का प्रथम इतिहास जे॰ सी॰ प्राइस ने लिखा, “दि चुआड़ रेबेलियन ऑफ़ 1799” के नाम से। जबकि परवर्ती इतिहासकारों में ए॰ गुहा और उनके हवाले से एडवर्ड सईद का नाम आता है।


यह बताना लजिमी होगा कि वर्तमान सरायकेला खरसावां जिले का चांडिल इलाका अंतर्गत नीमडीह प्रखंड का रघुनाथ महतो का गाव घुंटियाडीह आज भी है, लेकिन रघुनाथ महतो के वंशज का कोई पता नहीं है। शायद रघुनाथ महतो पर जितना काम होना चाहिए था, नहीं हो पाया है।


विशद कुमार, स्वतंत्र पत्रकार

मंगलवार, 5 अप्रैल 2022

विक्रमशिला विश्वविद्यालय का मुख्य स्तूप।

 

स्तूप एक पवित्र ठोस संरचना है जो शरीर के अवशेषों या बुद्ध या एक प्रतिष्ठित भिक्षु के सामान के ऊपर उठाई जाती है; या उनसे जुड़ी किसी घटना को मनाने के लिए। लेकिन कुछ स्तूप भिक्षुओं द्वारा पूजा के लिए बनाए गए प्रतीकात्मक मात्र हैं। एक मन्नत स्तूप एक छोटा स्तूप है जिसे एक भक्त द्वारा अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए कृतज्ञता में बनाया जाता है।

पूजा के उद्देश्य से बनाया गया विक्रमशिला स्तूप एक ईंट की संरचना है जिसे मिट्टी के गारे में रखा गया है और यह वर्ग मठ के केंद्र में स्थित है। यह दो सीढ़ीदार स्तूप योजना के अनुसार क्रूस के समान है और जमीनी स्तर से लगभग 15 मीटर ऊंचा है। निचली छत जमीनी स्तर से लगभग 2.25 मीटर ऊंची है और ऊपरी छत निचली तरफ से समान ऊंचाई पर है। दोनों छतों पर एक परिक्रमा पथ है, निचला लगभग 4.5 मीटर चौड़ा और ऊपरी लगभग 3 मीटर चौड़ा है। 

ऊपरी छत पर रखा गया मुख्य स्तूप चार मुख्य दिशाओं में से प्रत्येक पर उत्तर की ओर सीढ़ियों की उड़ान के माध्यम से पहुँचा जा सकता है। एक उभरे हुए कक्ष के साथ एक स्तंभित पूर्व कक्ष और सामने एक अलग खंभों वाला मंडप है, जो परिक्रमा मार्ग से परे रखा गया है। स्तूप के चार कक्षों में बैठे बुद्ध के विशाल प्लास्टर चित्र रखे गए थे, जिनमें से तीन सीटू में पाए गए थे, लेकिन उत्तर की ओर के शेष भाग को संभवतः एक पत्थर की छवि से बदल दिया गया था क्योंकि मिट्टी की छवि किसी तरह क्षतिग्रस्त हो गई थी। सभी प्लास्टर चित्र दुर्भाग्य से कमर के ऊपर टूट गए हैं। छवियों को एक ईंट पेडस्टल पर रखा गया है जिसमें लाल और काले रंग के रंगों में पेंटिंग के निशान हैं। कक्ष और एंटेचैम्बर की दीवारों और फर्शों पर चूने का प्लास्टर किया गया था ।

विभिन्न देवताओं की दीवार नक्काशी

दोनों छतों की दीवारों को मोल्डिंग और टेराकोटा पट्टिकाओं से सजाया गया है जो पाल काल (8वीं से 12वीं शताब्दी) के दौरान इस क्षेत्र में पनप रही टेराकोटा कला की उच्च उत्कृष्टता की गवाही देते हैं। पट्टिकाएँ बुद्ध , अवलोकितेश्वर , मंजुश्री , मैत्रेय , जंबाला , मारीचि और तारा जैसे कई बौद्ध देवताओं, बौद्ध धर्म से संबंधित दृश्यों, कुछ सामाजिक और शिकार दृश्यों और विष्णु , पार्वती , अर्धनारीश्वर और हनुमान जैसे कुछ हिंदू देवताओं को दर्शाती हैं।. कई मानव आकृतियाँ, जैसे तपस्वी, योगी, उपदेशक, ढोलक, योद्धा, धनुर्धर, सपेरा, आदि, और जानवरों की आकृतियाँ जैसे बंदर, हाथी, घोड़े, हिरण, सूअर, तेंदुआ, शेर, भेड़िये और पक्षी भी चित्रित है। #sarhancinema #historicaindia #vikramshilauniversity

धरोहरों की महत्ता को कब समझेंगे

 आखिरकार अपने धरोहरों की महत्ता को कब समझेंगे आप???

       अब #कोठरा_डीह और #धरौत_पुरास्थल 😭😭

दरभंगा जिला के बहेड़ी प्रखंड अंतर्गत "कोठरा डीह" बिहार के प्रमुख नदियों में से एक #करेह_नदी के उत्तर किनारे पर स्थित है, जिसको मिट्टी काटकर बर्बाद किया जा रहा है।


       कुछ ही दिन पूर्व मधुबनी जिला के #इसहपुर_पुरास्थल से की जा रही मिट्टी कटाई को #मधुबनी_प्रशासन और #मीडिया बंधुओं के संज्ञान में लेने के कारण रोक दिया गया, जिसके लिए इन सबों के प्रति आभार🙏।


      अब #जहानाबाद जिला के #मखदुमपुर प्रखंड अंतर्गत #धरौत_पुरास्थल और दरभंगा जिला के #कोठरा_पुरास्थल को मिट्टी काटकर बर्बाद किया जा रहा है। इस पर कोठरा के मुखिया श्री अजीत मंडल को खास ध्यान देनी चाहिए।


     बताते चलें कि #धरौत_पुरास्थल का व्याख्या प्रसिद्ध पुराविद् #कनिंघम महोदय भी कर चुके हैं। "कोठरा पुरास्थल" में दिख रहे #रिंग_वेल एवं अन्य पुरावशेषों को देखकर पुराविद् जलज कुमार तिवारी सर ने कुषाण काल के होने की संभावना जताई है।


        अतः जहानाबाद और दरभंगा प्रशासन से निवेदन है, कि उपरोक्त पुरास्थलों की मिट्टी कटाई को जितना जल्द हो सके प्रतिबंधित करवाएं। और #बिहार_सरकार इसे राज्यकीय #धरोहर_सूची में शामिल करें।


                           🙏सादर🙏 


                                       :-मुरारी कुमार झा(पुरातत्व)

पिता का गोत्र पुत्री को आखिर क्यों प्राप्त नही होता?

 *पिता का गोत्र पुत्री को प्राप्त नही होता | आइए जाने क्यों*

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अब एक बात ध्यान दें की स्त्री में गुणसूत्र xx होते है और पुरुष में xy होते है । 

इनकी सन्तति में माना की पुत्र हुआ (xy गुणसूत्र). इस पुत्र में y गुणसूत्र पिता से ही आया यह तो निश्चित ही है क्यू की माता में तो y गुणसूत्र होता ही नही !

और यदि पुत्री हुई तो (xx गुणसूत्र). यह गुण सूत्र पुत्री में माता व् पिता दोनों से आते है ।

१. xx गुणसूत्र ;-

xx गुणसूत्र अर्थात पुत्री . xx गुणसूत्र के जोड़े में एक x गुणसूत्र पिता से तथा दूसरा x गुणसूत्र माता से आता है . तथा इन दोनों गुणसूत्रों का संयोग एक गांठ सी रचना बना लेता है जिसे Crossover कहा जाता है ।

२. xy गुणसूत्र ;- 

xy गुणसूत्र अर्थात पुत्र . पुत्र में y गुणसूत्र केवल पिता से ही आना संभव है क्यू की माता में y गुणसूत्र है ही नही । और दोनों गुणसूत्र असमान होने के कारन पूर्ण Crossover नही होता केवल ५ % तक ही होता है । और ९ ५ % y गुणसूत्र ज्यों का त्यों (intact) ही रहता है ।

तो महत्त्वपूर्ण y गुणसूत्र हुआ । क्यू की y गुणसूत्र के विषय में हम निश्चिंत है की यह पुत्र में केवल पिता से ही आया है ।

बस इसी y गुणसूत्र का पता लगाना ही गौत्र प्रणाली का एकमात्र उदेश्य है जो हजारों/लाखों वर्षों पूर्व हमारे ऋषियों ने जान लिया था ।

वैदिक गोत्र प्रणाली और y गुणसूत्र । Y Chromosome and the Vedic Gotra System

अब तक हम यह समझ चुके है की वैदिक गोत्र प्रणाली य गुणसूत्र पर आधारित है अथवा y गुणसूत्र को ट्रेस करने का एक माध्यम है । 

उदहारण के लिए यदि किसी व्यक्ति का गोत्र कश्यप है तो उस व्यक्ति में विधमान y गुणसूत्र कश्यप ऋषि से आया है या कश्यप ऋषि उस y गुणसूत्र के मूल है । 

चूँकि y गुणसूत्र स्त्रियों में नही होता यही कारन है की विवाह के पश्चात स्त्रियों को उसके पति के गोत्र से जोड़ दिया जाता है ।

वैदिक/ हिन्दू संस्कृति में एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होने का मुख्य कारन यह है की एक ही गोत्र से होने के कारन वह पुरुष व् स्त्री भाई बहिन कहलाये क्यू की उनका पूर्वज एक ही है । 

परन्तु ये थोड़ी अजीब बात नही? की जिन स्त्री व् पुरुष ने एक दुसरे को कभी देखा तक नही और दोनों अलग अलग देशों में परन्तु एक ही गोत्र में जन्मे , तो वे भाई बहिन हो गये .?

इसका एक मुख्य कारन एक ही गोत्र होने के कारन गुणसूत्रों में समानता का भी है । आज की आनुवंशिक विज्ञान के अनुसार यदि सामान गुणसूत्रों वाले दो व्यक्तियों में विवाह हो तो उनकी सन्तति आनुवंशिक विकारों का साथ उत्पन्न होगी ।


ऐसे दंपत्तियों की संतान में एक सी विचारधारा, पसंद, व्यवहार आदि में कोई नयापन नहीं होता। ऐसे बच्चों में रचनात्मकता का अभाव होता है। विज्ञान द्वारा भी इस संबंध में यही बात कही गई है कि सगौत्र शादी करने पर अधिकांश ऐसे दंपत्ति की संतानों में अनुवांशिक दोष अर्थात् मानसिक विकलांगता, अपंगता, गंभीर रोग आदि जन्मजात ही पाए जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार इन्हीं कारणों से सगौत्र विवाह पर प्रतिबंध लगाया था।

इस गोत्र का संवहन यानी उत्तराधिकार पुत्री को एक पिता प्रेषित न कर सके, इसलिये विवाह से पहले #कन्यादान कराया जाता है और गोत्र मुक्त कन्या का पाणिग्रहण कर भावी वर अपने कुल गोत्र में उस कन्या को स्थान देता है, यही कारण था कि विधवा विवाह भी स्वीकार्य नहीं था। क्योंकि, कुल गोत्र प्रदान करने वाला पति तो मृत्यु को प्राप्त कर चुका है।

इसीलिये, कुंडली मिलान के समय वैधव्य पर खास ध्यान दिया जाता और मांगलिक कन्या होने से ज्यादा सावधानी बरती जाती है।

आत्मज़् या आत्मजा का सन्धिविच्छेद तो कीजिये।

आत्म+ज या आत्म+जा ।

आत्म=मैं, ज या जा =जन्मा या जन्मी। यानी जो मैं ही जन्मा या जन्मी हूँ।

यदि पुत्र है तो 95% पिता और 5% माता का सम्मिलन है। यदि पुत्री है तो 50% पिता और 50% माता का सम्मिलन है। फिर यदि पुत्री की पुत्री हुई तो वह डीएनए 50% का 50% रह जायेगा, फिर यदि उसके भी पुत्री हुई तो उस 25% का 50% डीएनए रह जायेगा, इस तरह से सातवीं पीढ़ी मेंपुत्री जन्म में यह % घटकर 1% रह जायेगा।

अर्थात, एक पति-पत्नी का ही डीएनए सातवीं पीढ़ी तक पुनः पुनः जन्म लेता रहता है, और यही है सात जन्मों का साथ।

लेकिन, जब पुत्र होता है तो पुत्र का गुणसूत्र पिता के गुणसूत्रों का 95% गुणों को अनुवांशिकी में ग्रहण करता है और माता का 5% (जो कि किन्हीं परिस्थितियों में एक % से कम भी हो सकता है) डीएनए ग्रहण करता है, और यही क्रम अनवरत चलता रहता है, जिस कारण पति और पत्नी के गुणों युक्त डीएनए बारम्बार जन्म लेते रहते हैं, अर्थात यह जन्म जन्मांतर का साथ हो जाता है।

इसीलिये, अपने ही अंश को पित्तर जन्मों जन्म तक आशीर्वाद देते रहते हैं और हम भी अमूर्त रूप से उनके प्रति श्रधेय भाव रखते हुए आशीर्वाद आशीर्वाद ग्रहण करते रहते हैं, और यही सोच हमें जन्मों तक स्वार्थी होने से बचाती है, और सन्तानों की उन्नति के लिये समर्पित होने का सम्बल देती है।


एक बात और, माता पिता यदि कन्यादान करते हैं, तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वे कन्या को कोई वस्तु समकक्ष समझते हैं, बल्कि इस दान का विधान इस निमित किया गया है कि दूसरे कुल की कुलवधू बनने के लिये और उस कुल की कुल धात्री बनने के लिये, उसे गोत्र मुक्त होना चाहिये। डीएनए मुक्त हो नहीं सकती क्योंकि भौतिक शरीर में वे डीएनए रहेंगे ही, इसलिये मायका अर्थात माता का रिश्ता बना रहता है, गोत्र यानी पिता के गोत्र का त्याग किया जाता है। तभी वह भावी वर को यह वचन दे पाती है कि उसके कुल की मर्यादा का पालन करेगी यानी उसके गोत्र और डीएनए को करप्ट नहीं करेगी, वर्णसंकर नहीं करेगी, क्योंकि कन्या विवाह बाद कुल वंश के लिये #रज् का रजदान करती है और मातृत्व को प्राप्त करती है। यही कारण है कि हर विवाहित स्त्री माता समान पूज्यनीय हो जाती है।

यह रजदान भी कन्यादान की तरह उत्तम दान है जो पति को किया जाता है।

यह सुचिता अन्य किसी सभ्यता में दृश्य ही नहीं है।

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सोमवार, 4 अप्रैल 2022

मौत की घाटी डेथ वैली

 उत्तरी अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया में स्थित पृथ्वी का सबसे गर्म स्थान है। इसकी लंबाई 225 किमी है। अलग-अलग स्थानों पर इसकी चौड़ाई अलग-अलग है और यह 8 से 24 किमी के बीच में है। यहाँ गर्मियों के दिनों में तापमान 54 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है और सर्दियों में रात में तापमान जमाव बिंदु से भी नीचे चला जाता है। चारों ओर से पर्वतों द्वारा घिरे रहने के कारण यह स्थान अत्यंत गर्म हो जाता है। अधिकांश लोगों की जान लेने और अपनी विषम परिस्थितियों के कारण ही इस क्षेत्र को 'डेथ वैली' कहा जाता है।

वर्षा की स्थिति

डेथ वैली उत्तरी अमेरिका का सबसे गर्म और सूखा स्थान है। इसकी तली सबसे नीची है। तली का सबसे नीचा स्थान समुद्र तल से 86 मीटर[1] नीचे है। इस वैली का तापमान 49 से 54 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है। यहाँ वर्षा केवल नाम मात्र के लिए ही होती है। साल में औसत वर्षा केवल 5 सेमी. के लगभग होती है। घाटी में पानी का निशान तक नहीं है। यदि कहीं-कहीं पानी है भी, तो बहुत ही खारा है। यहाँ की मिट्टी के द्वारा जल की पर्याप्त मात्रा को अवशोषित न करने के कारण भारी बारिश होने पर यहाँ बाढ़ का आ जाना एक सामान्य घटना है। इस रेगिस्तान में 'अभारगोसा नदी' तथा 'फ़र्नेस क्रीट', जो समुद्र से कटाव के रूप में निकली हैं, जल धाराएँ भी हैं, किंतु यह जल्द ही इस घाटी की रेतीली सतह में समा जाती हैं।

मौत की घाटी

डेथ वैली

शुरुआत में अमेरिका आने वाले लोगों को यह घाटी पार करके ही आना पड़ता था। इसके उच्च तापमान और सूखेपन के कारण बहुत से लोग घाटी को पार करने से पहले ही मर जाते थे। कैलिफ़ोर्निया के आस-पास के क्षेत्रों में सोने के भण्डारों का पता लगाने के लिए जाने वाले बहुत से लोग इस घाटी को पार करते समय मर गए। इन भयानक परिस्थितियों के कारण ही इस घाटी का नाम 'डेथ वैली' यानी 'मौत की घाटी' पड़ गया। सन 1870 में जब घाटी का अध्ययन किया गया तो इसमें हज़ारों जानवरों और मनुष्यों की हड्डियों के ढांचे मिले।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1.  282 फूट

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