शनिवार, 24 जुलाई 2021

ज्योतिर्लिंगों के स्थानों पर रेडीएशन

 1 -भारत का रेडियो एक्टिविटी मैप उठा लें, हैरान हो जायेंगे ! भारत सरकार के न्युक्लियर रिएक्टर के अलावा सभी  ज्योतिर्लिंगों के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता हैं।

२-शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि न्युक्लियर रिएक्टर्स ही तो हैं, तभी तो उन पर जल चढ़ाया जाता है, ताकि वो शांत रहें।

3 -महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे कि बिल्व पत्र, आकमद, धतूरा, गुड़हल आदि सभी न्युक्लिअर एनर्जी सोखने वाले हैं।

4 -शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है इसीलिए तो जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता...

5 -भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिवलिंग की तरह ही है।

6 - शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिलकर औषधि का रूप ले लेता है।

7 -तभी तो हमारे पूर्वज हम लोगों से कहते थे कि महादेव शिवशंकर अगर नाराज हो जाएंगे तो प्रलय आ जाएगी।

8 -ध्यान दें कि हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है।

9 -जिस संस्कृति की कोख से हमने जन्म लिया है, वो तो चिर सनातन है। विज्ञान को परम्पराओं का जामा इसलिए पहनाया गया है ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें।..

10 - आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि भारत में ऐसे महत्वपूर्ण शिव मंदिर हैं जो केदारनाथ से लेकर रामेश्वरम तक एक ही सीधी रेखा में बनाये गये हैं। आश्चर्य है कि हमारे पूर्वजों के पास ऐसा कैसा विज्ञान और तकनीक था जिसे हम आज तक समझ ही नहीं पाये? उत्तराखंड का केदारनाथ, तेलंगाना का कालेश्वरम, आंध्रप्रदेश का कालहस्ती, तमिलनाडु का एकंबरेश्वर, चिदंबरम और अंततः रामेश्वरम मंदिरों को 79°E 41’54” Longitude की भौगोलिक सीधी रेखा में बनाया गया है।

11 -यह सारे मंदिर प्रकृति के 5 तत्वों में लिंग की अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसे हम आम भाषा में पंचभूत कहते हैं। पंचभूत यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और अंतरिक्ष। इन्हीं पांच तत्वों के आधार पर इन पांच शिवलिंगों को प्रतिष्टापित किया गया है। जल का प्रतिनिधित्व तिरुवनैकवल मंदिर में है, आग का प्रतिनिधित्व तिरुवन्नमलई में है, हवा का प्रतिनिधित्व कालाहस्ती में है, पृथ्वी का प्रतिनिधित्व कांचीपुरम् में है और अतं में अंतरिक्ष या आकाश का प्रतिनिधित्व चिदंबरम मंदिर में है! वास्तु-विज्ञान-वेद का अद्भुत समागम को दर्शाते हैं ये पांच मंदिर।

12 -भौगोलिक रूप से भी इन मंदिरों में विशेषता पायी जाती है। इन पांच मंदिरों को योग विज्ञान के अनुसार बनाया गया था, और एक दूसरे के साथ एक निश्चित भौगोलिक संरेखण में रखा गया है। इस के पीछे निश्चित ही कोई विज्ञान होगा जो मनुष्य के शरीर पर प्रभाव करता होगा।

13 -इन मंदिरों का करीब पाँच हज़ार वर्ष पूर्व निर्माण किया गया था जब उन स्थानों के अक्षांश और देशांतर को मापने के लिए कोई उपग्रह तकनीक उपलब्ध ही नहीं थी। तो फिर कैसे इतने सटीक रूप से पांच मंदिरों को प्रतिष्टापित किया गया था? उत्तर भगवान ही जानें।

14 -केदारनाथ और रामेश्वरम के बीच 2383 किमी की दूरी है। लेकिन ये सारे मंदिर लगभग एक ही समानांतर रेखा में पड़ते हैं।आखिर हज़ारों वर्ष पूर्व किस तकनीक का उपयोग कर इन मंदिरों को समानांतर रेखा में बनाया गया है, यह आज तक रहस्य ही है। श्रीकालहस्ती मंदिर में टिमटिमाते दीपक से पता चलता है कि वह वायु लिंग है।तिरुवनिक्का मंदिर के अंदरूनी पठार में जल वसंत से पता चलता है कि यह जल लिंग है। अन्नामलाई पहाड़ी पर विशाल दीपक से पता चलता है कि वह अग्नि लिंग है। कंचिपुरम् के रेत के स्वयंभू लिंग से पता चलता है कि वह पृथ्वी लिंग है और चिदंबरम की निराकार अवस्था से भगवान की निराकारता यानी आकाश तत्व का पता लगता है।

15 -अब यह आश्चर्य की बात नहीं तो और क्या है कि ब्रह्मांड के पांच तत्वों का प्रतिनिधित्व करने वाले पांच लिंगों को एक समान रेखा में सदियों पूर्व ही प्रतिष्टापित किया गया है। हमें हमारे पूर्वजों के ज्ञान और बुद्दिमत्ता पर गर्व होना चाहिए कि उनके पास ऐसी विज्ञान और तकनीकी थी जिसे आधुनिक विज्ञान भी नहीं भेद पाया है। माना जाता है कि केवल यह पांच मंदिर ही नहीं अपितु इसी रेखा में अनेक मंदिर होंगे जो केदारनाथ से रामेश्वरम तक सीधी रेखा में पड़ते हैं। इस रेखा को “शिव शक्ति अक्श रेखा” भी कहा जाता है। संभवतया यह सारे मंदिर कैलाश को ध्यान में रखते हुए बनाये गये हों जो 81.3119° E में पड़ता है!?  उत्तर शिवजी ही जाने। ...

16 -कमाल की बात है "महाकाल" से शिव ज्योतिर्लिंगों के बीच कैसा सम्बन्ध है......??

17 - उज्जैन से शेष ज्योतिर्लिंगों की दूरी भी हैं रोचक:- 

उज्जैन से सोमनाथ- 777 किमी

उज्जैन से ओंकारेश्वर- 111 किमी

उज्जैन से भीमाशंकर- 666 किमी

उज्जैन से काशी विश्वनाथ- 999 किमी

उज्जैन से मल्लिकार्जुन- 999 किमी

उज्जैन से केदारनाथ- 888 किमी

उज्जैन से  त्रयंबकेश्वर- 555 किमी

उज्जैन से बैजनाथ- 999 किमी

उज्जैन से रामेश्वरम्- 1999 किमी

उज्जैन से घृष्णेश्वर - 555 किमी

हिन्दू धर्म में कुछ भी बिना कारण के नहीं होता था ।

उज्जैन पृथ्वी का केंद्र माना जाता है, जो सनातन धर्म में हजारों सालों से मानते आ रहे हैं। इसलिए उज्जैन में सूर्य की गणना और ज्योतिष गणना के लिए मानव निर्मित यंत्र भी बनाये गये हैं करीब 2050 वर्ष पहले ।

18 -और जब करीब 100 साल पहले पृथ्वी पर काल्पनिक रेखा (कर्क) अंग्रेज वैज्ञानिक द्वारा बनायी गयी तो उनका मध्य भाग उज्जैन ही निकला। आज भी वैज्ञानिक उज्जैन ही आते हैं सूर्य और अन्तरिक्ष की जानकारी के लिये...

   जय महाकाल ............ममता दुबे मिश्रा

शुक्रवार, 23 जुलाई 2021

अश्वनी, ओलंपिक और कैरों / विवेक शुक्ला

 साउथ दिल्ली के फ्रेंड्स कॉलोनी के सी ब्लाक के उस घर का 1972 के म्युनिख ओलपिंक खेलों में इजराईली खिलाड़ियों के कत्लेआम के बाद रिश्ता बना था। अगर उस कत्लेआम के बाद फिर ओलंपिक खेलों में कभी उस तरह का हादसा नहीं हुआ तो उसका श्रेय उस शख्स को जाता है,जो कभी रहता था उस घर में । उनका नाम था अश्वनी कुमार।


 फिलिस्तनी गुरिल्लाओं ने दिया था उस आतंकी घटना को अंजाम। उसके बाद अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक संघ ने अश्वनी कुमार से गुजारिश की थी कि वे आगामी शीतकालीन और ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों की सुरक्षा व्यवस्था को देखें। अश्वनी कुमार तेज-तर्रार पुलिस अफसर थे। वे तब तक सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक नहीं बने थे। अश्वनी कुमार भारतीय पुलिस सेवा के पंजाब कैडर के अफसर थे।


अश्वनी कुमार ने बेहद चुनौतीपूर्ण दायित्व को स्वीकार किया। उसके बाद किसी आतंकी संगठन को ओलंपिक खेलों में किसी तरह का व्यवधान डालने का मौका नहीं मिला। अश्वनी कुमार 5 सितंबर 1972 को म्युनिख में ही थे जब उन्हें पता चला कि   आतंकियों ने ओलंपिक गांव पर हमला कर दिया है। उस हमले के बारे में किसी ने ख्वाबों में भी नहीं सोचा था। उस हमले में निशाने पर थी इजराईल की ओलंपिक टीम । आतंकियों ने इजराईल की ओलंपिक टीम के 11 सदस्यों की हत्या कर दी। इस घटना के पीछे 8 आतंकियों का हाथ था।


अश्वनी कुमार ने मांट्रियल (1976), मास्को (1980), लास एजेंल्स (1984), सिओल (1988), बर्सिलोना (1992), अटलांटा (1996) तथा सिडनी (2000) के ओलंपिक खेलों से जुड़े स्टेडियमों, खेल गांवों, मीडिया सेंटरों, वीआईपी और दर्शकों वगैरह की सुरक्षा को खासतौर पर देखा। बहुत कड़क थी उनकी शख्सियत। जैसे ही किसी शहर को ओलपिंक खेल आवंटित होते तो वे वहां पर जाने लगते आयोजन समिति से तालमेल के लिए। फिर वे वहां पर सुरक्षा से जुड़ी व्यवस्थाओं को अंतिम रूप देते।


 वे कहते थे कि ग्रीष्मकालीन खेल खिलाड़ियों और दर्शकों की भागेदारी के लिहाज से शीतकालीन खेलों की तुलना में बहुत व्यापक स्तर पर होते हैं। इसलिए इनकी निगाहबानी करना ही चैलेंज होता था। वे बेखौफ पुलिस अफसर थे। वे रणनीति बनाने से लेकर अपराधी से सीधे दो-दो हाथ करने के लिए तैयार रहते थे। उनका मुख्य फोकस ओलंपिक खेलों के पहले दिन और अंतिम दिन की सुरक्षा व्यवस्थाओं पर रहता था। वे मानते थे कि ये दोनों दिन सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। इन्हीं दोनों दिनों में आतंकी अपने शिकार पर हमला करने की फिराक रहते हैं। खेलों की समाप्ति वाले दिन तो इसलिए क्योंकि उस दिन सब रीलेक्स मूड में होते हैं। यह सामान्य बात तो नहीं है कि जिस देश को बमुश्किल से एक-दो पदक मिलते हों उसके एक इंसान को समूचे खेलों की सिक्युरिटी की जिम्मेदारी ही मिल जाए। वे आईओसी के दो अध्यक्षों क्रमश: लॉर्ड किलिनन और जे.ए. समारांच के विश्वासपात्र थे।


 नेपाल में पकड़ा था कैरों के कातिल को


अश्वनी कुमार को देश ने पहली बार तब जाना था जब उन्होंने पंजाब के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों के हत्यारे सुच्चा सिंह को नेपाल में जाकर पकड़ा था। कैरों राजधानी में कर्जन रोड (कस्तूरबा गांधी मार्ग) में अपने मित्र से मिलकर वापस चडीगढ़ जा रहे थे। रास्ते में सोनीपत के पास राई में उनका सुच्चा सिंह और उनके साथियों ने कत्ल कर दिया था। अश्वनी कुमार नेपाल में सुच्चा सिंह का पीछा करते हुए काफी दूर तक भागे थे। दोनों में हाथापाई हुई। पर अश्वनी कुमार के घूंसों की बौछार ने सुच्चा सिंह को पस्त कर दिया था। इससे पहले, भारत सरकार ने उन्हें 1951 में सौराष्ट्र के खूंखार डाकू भूपत गिरोह को खत्म करने के लिए भेजा था। वहां पर भी वे सफल हुए थे।


 बेटी का नाम हॉकी


हॉकी में तो मानों उनकी जान बसती थी। उन्होंने अपनी एक बेटी का नाम ही हॉकी रख दिया था। पंजाब पुलिस में रहते हुए वे भारतीय हॉकी संघ के अध्यक्ष बने। वहां से वे फिऱ भारतीय ओलंपिक संघ से भी जुड़ गए.


अश्वनी कुमार सीमा सुरक्षा बल ( बीएसएफ) के दूसरे महानिदेशक थे और उन्होंने इस बल को खड़ा किया। उन्होंने पंजाब पुलिस और बीएसएफ में दर्जनों खिलाड़ियों को नौकरी दी। उनमें बलबीर सिंह सीनियर,अजीतपाल सिंह, उधम सिंह आदि शामिल हैं। राजधानी के ओलंपिक भवन में जाकर या फ्रैंड्स कॉलोनी में उनके घर के आगे से गुजरते हुए अश्वनी कुमार की याद आ जाती है। उनका साल 2015 में निधन हो गया था। 

Vivekshukladelhi@gmail.com 

Navbharatimes और Haribhoomi में छपे लेखों के अंश  


 Pictures- Ashwani Kumar and PRATAP SINGH KAIRON

LATEST 100 भड़ास

 भास्कर ग्रुप के शेयरों में भयंकर गिरावट

गुरुवार, 22 जुलाई 2021

*किसने स्कूल चलाए थे?*

 बच्चों की  शिक्षा  पर जब  

संकट  के  बादल  छाये थे

मास्टर जी ने मजे किये तो

किसने   स्कूल  चलाए  थे?


            शुरू हुआ था लॉकडाउन तो 

            इम्तिहान     की    बारी   थी।

            वार्षिक परिणामों की खातिर 

            पैपर    चैकिंग   जारी   थी।।

            जारी    जो    परिणाम   हुए  

            क्या   ऊपर  से  मंगवाए थे?

            मास्टर जी  ने  मजे किए  तो 

            किसने    स्कूल   चलाए  थे?


अगलै   सैशन  की  तैयारी   

बच्चों   से    करवानी   थी।

कुकिंग कोस्ट और किताबें 

सही   वक़्त  पहुँचानी  थी।।

बच्चों  तक  राशन पहुँचाने 

कौन    फरिश्ते   आए  थे?

मास्टर जी ने  मजे किए तो 

किसने   स्कूल   चलाए  थे?


            बच्चों  के  भावी जीवन  को 

            लेकर     सबसे    आगे   थे।

            "हर-घर-स्कूल" बनाने  वाले 

            अध्यापक   सब   जागे   थे।।

            ऑनलाईन कक्षा में  हर दिन  

            किसने     पाठ   पढ़ाए   थे?

            मास्टर  जी  ने  मजे किए तो 

            किसने   स्कूल   चलाए   थे?


खतरे का माहौल था फिर भी

अपना    फर्ज   निभाना   था।

हर   हालत   में   पंचायत  के 

हर   स्टेशन  तक  जाना  था।।

जन- प्रतिनिधियों   के  चुनाव 

किसने    सम्पन्न   कराए   थे?

मास्टर  जी  ने  मजे  किए  तो 

किसने     स्कूल    चलाए   थे?


            स्वेच्छा से  हर  अध्यापक ने 

            जनसेवा   के   काम   किए।

            सरकारी   आदेश   हुए   तो  

            ऑक्सीमकटर   थाम  लिए।।

            बॉर्डर   पर  टूरिस्टों  ने  फिर 

            किसको  पास   दिखाए  थे?

            मास्टर जी ने  मजे किए तो 

            किसने    स्कूल   चलाए  थे?


डाटा- एन्ट्री   फोटो- ग्राफी  

टीकाकरण  में  शामिल थे।

कर  डाला  हर काम, सभी 

अध्यापक इतने काबिल थे।।

अध्यापक    ने   कब  कोई  

आदेश   कहीं   ठुकराए  थे?

मास्टर जी  ने मजे किए तो 

किसने    स्कूल   चलाए  थे? 


            खेल-कूद, विज्ञान, गणित में 

            नाम     कमाने      वाले   हैं। 

            विद्यार्थी  जो   शत -प्रतिशत 

            अंकों   को   लाने   वाले  हैं।।

            देश  के  ये  अनमोल  नगीने 

            बोलो -   कहाँ    बनाए   थे ?

            मास्टर  जी  ने मजे  किए तो 

            किसने   स्कूल    चलाए  थे? 


ब्रह्म     और    महेश्वर    की  

संज्ञा  से   जिसे  नवाज़ा  है।

गुरु   नहीं   वह   मात्र,  कई 

बच्चों  के  दिल का  राजा है।।

विद्या,  आदर  व  अनुशासन 

किसने    तुम्हें   सिखाए   थे?

अध्यापक  ने  मजे  किए  तो 

किसने    स्कूल   चलाए   थे?


            🙏🏻  .... *"अध्यापक"*

.....कारवां गुजर गया / परशुराम शर्मा

 निर्झर बहते नीरज के गीत


बात बे बात (४९) : अमर गीतकार कवि नीरज से हम कभी नहीं मिले। लेकिन हम उनके गीतों के दीवाने रहे हैं। अपने गीतों के जरिये वे हमेशा हम पर छाये रहें। आगे भी छाये रहेंगे। क्योंकि उनके कुछ खास गीत मन में रच बस गये हैं।


वे गीत किशोरावस्था से हमारे दिल-दिमाग में गूंज रहे हैं। कारवां गुजर गया..गीत तो उनके नाम के संग गूंथा हुआ था। वह अमर हैं। पूरे राजकीय सम्मान के साथ  शनिवार को अलीगढ़ में उनकी अंतिम विदाई  दी गई। वे पंचतत्व में विलीन हो गये। गुरुवार को दिल्ली एम्स में उनका देहावसान हुआ था।


किशोरावस्था के बाद भी फिल्म 'मेरा नाम जोकर'  का यह गीत मुझे हमेशा स्मरण रहा.. ' ए भाई जरा देख के चलो। आगे ही नहीं,पीछे भी। उपर ही नहीं, नीचे भी।..' यह जीवन जीने  का एक संदेश था। मेरे जीवन में यह एक गाइड की तरह जुड़ा रहा। यह सन् १९७४ के जेपी छात्र आंदोलन में मेरे घुस कर निकलने का दौर था। पटना वि.वि. से एम.ए. की पढ़ाई पूरी कर मैं पूरी तरह पत्रकारिता में रम गया।


मैं कभी साहित्य का विद्यार्थी नहीं रहा। मुझे सिर्फ पढ़ने का शौक था। गंभीर और मनोरंजक दोनों तरह की पुस्तकें इधर-उधर और पुस्तकालय से लेकर पढ़ता था। यह शौक आजतक कायम है। अब पुस्तकें खरीद कर ही ज्यादा पढ़ना होता है। पढ़ने की शुरुआत परी-कथाओं से हुई। बचपन में कॉमिक जम कर पढ़ा। चंदामामा वैगरह पढ़ने में खुब मन लगता था। किशोरावस्था की ओर कदम बढ़े, तो बाजार में चल रहे ओम प्रकाश शर्मा के जासूसी उपन्यास और प्रेम रस वाले प्यारेलाल आवारा एवं गुलशन नंदा जैसे लेखकों के रुमानी उपन्यास हाथ लगे। इन्हें खोज-खोज कर पढ़ा। दोस्तों के प्रेम पत्र लिखने में ये काफी काम के साबित हुए। बदले में मुझे मान मिला। साथ ही दोस्तों से मुफ़्त में सिनेमा देखने का चस्का लगा। शायद उम्र के उसी दौर में देखे एक फ़िल्म- नयी उमर की नयी फसल- में एक गीत बहुत पसंद आया। उसके कुछ बोल ऐसे थे, जो सीधे मेरे दिल में उतर गये। जैसे, 'स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से...और हम खड़े खड़े बहार देखते रहे। कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे।'  


वैसे तो यह पूरा गीत सिनेमाघर में सबको अच्छा लगा था। पर, मेरे कच्चे मन को इतना भाया कि हम केवल यह गीत सुनने के लिए कई बार वह फ़िल्म देखने गये। उन दिनों फिल्मी गानों की किताबें बिका करती थी। इस गाने की किताब को फुटपाथ की दुकान से खोज कर खरीदा। उसे बार-बार पढ़ा, उसको याद किया और अपने बेसुरे राग से कई बार गाने का प्रयास किया।   


उसी गाने की किताब से गीतकार के नाम का पता चला कि यह नीरज का लिखा गीत है। गोपाल दास नीरज नहीं, केवल नीरज से मेरा प्रथम परिचय इस प्रकार हुआ। बाकी उनके बारे में कुछ और नहीं जानता था। पर उस अनजान नीरज से एक गहरा रिश्ता जरुर जुड़ गया। बेसब्री से उनके गीतों की प्रतीक्षा करता था। फिल्म के उनके गीत मन में गहरे उतरते चले गये। उनके बाकी चीज़ों से मेरा कोई विशेष वास्ता नहीं रहा। बस फिल्मी दुनिया के वे मेरे सबसे पसंदीदा गीतकार बन गये।


सच कहूं तो यह फ़िल्मी परिचय कभी साहित्यिक परिचय का रूप नहीं धारण कर पाया। मैं इसे अपनी कमजोरी ही  मानता हूं। मैं इसी में मगन था कि कोई मेरा ऐसा आदमी इस दुनिया में मौजूद है, जो बार-बार मेरे मन के तार को छेड़ जाता है। कभी राजकपूर के फिल्मों में तो कभी देवानंद के फिल्मों में उनके ऐसे गीत डाले जाते रहे। जिसे सुन कर दिल का कोई न कोई कोना छू जाता था। मैं उसमें गहरे डूब जाया करता हूं। तबतक मुझे फिल्में देखने की लत लग चुकी थी। अब भी देखता हूं। मैं वैसी फिल्मों की प्रतीक्षा करता रहता हूँ। उनमें नीरज टाइप के गाने ढूंढता हूं। इस तरह कहा जाये तो फ़िल्मी दुनिया के रंगीन पर्दे के माध्यम से ही हमारी पक्की दोस्ती नीरज जैसे महान गीतकार कवि से बनी रही। जबकि उनसे ना कभी मिला और न ही उनके अन्य किसी साहित्यिक गुणों एवं गतिविधियों से अवगत होने का संयोग बना। 


वैसे तो नीरज के सारे गाने मनमोहक हैं। इनमें कुछ उल्लेखनीय हैं -

. फूलों के रंग से, दिल की कलम से..

. रंगीला रे, तेरे रंग में..

. मेघा छायी आधी रात..

. लिखे जो खत तुझे...

. बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं..

. शोखियों में घोला जाए...

. धीरे से आना खटमल खटियन में..

. देखती ही रहो आज ना दर्पण तुम..

उनके लिखे सभी गाने सराहे गये। इसके लिए उन्हें तीन बार फिल्म फेयर एवार्ड मिला। १९७० में चंदा और बिजली फिल्म के गीत : काल का पहिया घूमे रे भइया, १९७१ में फिल्म पहचान का गाना: बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं और १९७२ में मेरा नाम जोकर फिल्म के सदा बहार गीत: ए भाई ! जरा देख के चलो.. के लिए उन्हें लगातार पुरस्कार दिये गये। देवानंद के साथ उनके अंतरंग संबंध आखिर तक कायम रहे। 


वहां से जी भर गया तो नीरज ने बंबई फिल्मी दुनिया को अलविदा कर दिया। स्थायी तौर पर अलीगढ़ में अपना डेरा जमाया। कवि सम्मेलनों में उन्होंने खुब नाम कमाया। चारों तरफ़ उनकी वाह-वाही हुई। भारत सरकार की ओर से उन्हें दो-दो बार पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें १९९१ में पद्मश्री और २००७ में पद्म भूषण से अलंकृत किया गया। साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें उ.प्र.सरकार से १९९४ में ही यश भारती पुरस्कार से नवाज़ा जा चुका था।


पर उनके जाने की खबर से मैं बहुत मर्माहत हुआ। कहा जाय तो वे मुझ जैसे आम आदमी से भीतर तक जुड़े व्यक्ति थे। इनके जाने का दु:ख मेरे जैसे करोड़ों करोड़ आम लोगों को हुआ होगा। ऐसी लोक श्रद्धांजलि एक महान व्यक्ति को ही मिला करती है। सचमुच, नीरज एक विराट कद के आम आदमी थे, पूरी तरह आम आदमी से जुड़े हुए। साहित्य जगत में उनकी भले जो ऊंची पहचान हो, पर उनकी सही पहचान एक आम आदमी वाली ही ज्यादा होगी। आगे भी संभवतः यही बनी रहेगी। दूर दराज के इलाके तक आम लोगों के बीच के वे एकबेहद लोकप्रिय गीतकार के रूप में अमर रहेंगे। यही उनकी सही पहचान है।


इटावा के पास एक गांव में सन् १९२५ में जन्मे गोपाल दास सक्सेना नीरज भी यही चाहते थे। अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि 'अगर दुनिया से रुखसती के वक्त आपके गीत और कविताएं लोगों की जुबां और दिल में हों तो यही आपकी सबसे बड़ी पहचान होगी।' सच है कि एक रचनाकार की इससे बड़ी पहचान क्या हो सकती है। नाम और दाम के साथ नीरज को सब कुछ मिला। भले हम चाहे जितने दु:खी हों। कभी न भूलने वाले हमारे नीरज सबके प्रिय थे और सदा रहेंगे।


-- परशुराम शर्मा ।

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