पत्रकारिता (मीडिया) का प्रभाव समाज पर लगातार बढ़ रहा है। इसके बावजूद यह पेशा अब संकटों से घिरकर लगातार असुरक्षित हो गया है। मीडिया की चमक दमक से मुग्ध होकर लड़के लड़कियों की फौज इसमें आने के लिए आतुर है। बिना किसी तैयारी के ज्यादातर नवांकुर पत्रकार अपने आर्थिक भविष्य का मूल्याकंन नहीं कर पाते। पत्रकार दोस्तों को मेरा ब्लॉग एक मार्गदर्शक या गाईड की तरह सही रास्ता बता और दिखा सके। ब्लॉग को लेकर मेरी यही धारणा और कोशिश है कि तमाम पत्रकार मित्रों और नवांकुरों को यह ब्लॉग काम का अपना सा उपयोगी लगे।
सोमवार, 27 फ़रवरी 2023
गुरुवार, 23 फ़रवरी 2023
VS कुत्ता
एक बार तेंदुये ने कुत्ते से पूछा: तुमने मनुष्यों को कैसा पाया?
कुत्ते ने उत्तर दिया: जब वे किसी का तिरस्कार करते हैं, तो वे उसे कुत्ता कहते हैं।
तेंदुआ: क्या तुमने उनके बच्चों को खाया?
कुत्ता: नहीं👴
तेंदुआ: क्या तुमने उन्हें धोखा दिया?
कुत्ता: List
तेंदुआ : क्या तुमने उनके मवेशियों को मारा ??
कुत्ता: नहीं
तेंदुआ : क्या तुमने उनका खून पिया ??
कुत्ता: नहीं
तेंदुआ : क्या तुमने उन्हें मेरे वार से बचाया ??
कुत्ता: हाँ
तेंदुआ : लोग बहादुर और होशियार किसे कहते हैं?
कुत्ता: वे उसे तेंदुआ कहते हैं
तेंदुआ: क्या हमने शुरू से ही सलाह नहीं दी थी कि तुम तेंदुआ बनकर हमारे साथ रहो, लेकिन तुमने इंसानों की सुरक्षा के लिए ठेकेदार बनना चुना। मैं उनके बच्चों और मवेशियों को मारता हूं, उनका खून पीता हूं, उनके संसाधनों और श्रम का उपभोग करता हूं, फिर भी वे न केवल मुझसे डरते हैं बल्कि अपने नायकों को मेरे के रूप में वर्णित करते हैं।
तुमको सीखना चाहिए कि “मनुष्य अपने जल्लादों के सामने नतमस्तक हो जाते हैं और अपने वफादार और हमदर्दों का तिरस्कार करते हैं।
बुधवार, 15 फ़रवरी 2023
👍हैप्पी बर्थ डे नई दिल्ली / विवेक शुक्ल
13 फरवरी 1931 को उदघाटन हुआ था
आप दिल्ली वाले हैं तो खुश होइये कि आज आपकी ‘नई दिल्ली’ का हैप्पी बर्थडे है। आज ही के दिन 13 फरवरी, 1931 को नई दिल्ली का उदघाटन हुआ था। भारत की नई राजधानी का नय़ा नाम ‘नई दिल्ली’ रखने के प्रस्ताव पर हरी झंडी सम्राट जॉर्ज पंचम ने 31 दिसंबर, 1926 को ही दिखा दी थी। यानी इसके नाम पर फैसला इसके उदघाटन से काफी पहले हो गया था। यह जानकारी डी जॉनसन तथ रिचर्ड वटसन अपनी किताब'New Delhi: The Last Imperial City में देते हैं।
रायसीना या दिल्ली साउथ वाले
नई दिल्ली नाम पर मोहर लगने से पहले इंपीरियल दिल्ली, रायसीना और दिल्ली साउथ जैसे नामों पर भी विचार हुआ था। पर अंत में नई राजधानी को नया नाम नई दिल्ली मिला। सभी पक्षों की राय थी कि नये नाम में दिल्ली रहे। नए नाम पर फैसले के बाद सरकारी अधिसूचना जारी हुई। तब तक वायसराय आवास ( अब राष्ट्रपति भवन), संसद भवन,साउथ और नॉर्थ ब्लॉक तथा नई दिल्ली की सड़कें लगभग बन चुकी थीं। कनॉट प्लेस बनने ही वाला था। वह 1933 में बना था। अब संसद भवन, साउथ तथा नार्थ ब्लाक को संग्रहालय में तब्दील करने का प्रस्ताव है।
दो विश्व युद्धों के बीच बनी नई राजधानी
दरअसल दिल्ली दरबार में 12 दिसंबर, 1911 को देश की राजधानी कोलकाता से दिल्ली में शिफ्ट करने के फैसले के 20 वर्षों के बाद 13 फरवरी, 1931 को नई दिल्ली का उदघाटन होता है। आप कह सकते हैं कि दो विश्व युद्दों के बीच में भारत की नई राजधानी का निर्माण हुआ। इसे खड़ा करने में हजारों अनाम मजदूरों तथा कारीगरों का खून पसीना भी लगा था। उनके वंशज अब भी करोल बाग में काफी तादाद में रहते हैं। उदघाटन के मौके पर एक औपचारिक कार्यक्रम रायसीना हिल्स पर आयोजित किया गया। उसमें वायसराय लॉर्ड इरविन सपत्नीक उपस्थित थे। कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, आस्ट्रेलिया जैसे कॉमनवेल्थ देशों के नुमाइंदे भी मौजूद थे। पर उदघाटन में दिल्ली वालों की सांकेतिक भागदारी भी नहीं रही थी। लंदन से छपने वाला ‘दि टाइम्स’ लिखता है “ये मानना भूल ही होगी कि इस आयोजन में दिल्ली वालों की भागेदारी रही। इसमें सिर्फ उन्हें ही आने दिया गया जिनके पास निमंत्रण पत्र थे।”
उदघाटन के कार्यक्रम कब से
नई राजधानी के उदघाटन के कार्यक्रम 9 फरवरी, 1931 से ही चालू हो गए थे। इस दौरान डाकतार विभाग ने छह डाक टिकट भी जारी किए थे, जिनमें नई दिल्ली के खास प्रतीक थे। इस बीच,बेशक नई दिल्ली के निर्माण में लार्ड इरविन का एक अहम रोल रहा था। उन्होंने नई राजधानी नई दिल्ली का उदघाटन किया। उन्होंने ही संसद भवन ( पहले वायसराय हाउस) का 18 जनवरी 1927 को उदघाटन किया था। उन्होंने ही गोल डाकखाने पर स्थित सेक्रेड हार्ट कैथडरल चर्च की आधारशिला रखी थी। महात्मा गांधी लार्ड इरविन से भगत सिंह की फांसी की सजा को माफ करवाने के लिए लगातार मिलते थे।
वे 19 मार्च,1931 को भी लार्ड इरविन से मिले थे। उनका लार्ड इरविन से मिलने का एकमात्र मकसद भगत सिंह और उनके दो साथियों को किसी तरह मृत्यु से बचाना था। इस मुलाकात के बाद उन्हें कांग्रेस के कराची में होने वाले सत्र में शिरकत करने के लिए निकलना था। बाबा खड़क सिंह रोड का नाम 1970 के दशक तक इरविन रोड ही था। अब भी यहां के पेट्रोल पंप से पेट्रोल लेने बाद जो बिल आपको मिलता है, इसमें बाबा खड़क सिंह मार्ग के आगे कोष्ठक में इरविन रोड भी लिखा होता है।
इस बीच, लार्ड इरविन की पत्नी लेडी ड्रोथी इरविन के प्रयासों से दिल्ली को एक महिला कॉलेज मिला जो अब भी बेटियों को स्वावलंबी बना रहा। लेडी इरविन के नाम से ही एक स्कूल 1927 से ज्ञान बांट रहा है माधवराव सिंधिया मार्ग पर। लेडी इरविन कॉलेज और स्कूल का अतीत तथा वर्तमान गौरवशाली है।
इंडिया गेट 12 फरवरी, 1931
इंडिया गेट का 12 फरवरी, 1931 को उदघाटन हुआ था। यह सबको पता है कि ये पहले विश्व युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों की याद में बना था। इसके भीतर 1968 तक किंग जॉर्ज पंचम की मूर्ति थी। अब वहां पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आदमकद मूर्ति लग चुकी है। इंडिया गेट को लाल और धूसर रंग के पत्थरों और ग्रेनाइट से मिलकर बनाया गया है। इंडिया गेट के अंदर मौजूद लगभग 300 सीढ़ियों को चढ़कर आप इसके ऊपरी गुंबद तक पहुंचते हैं। इंडिया गेट की सुरक्षा भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के जवान दिन-रात करते हैं। इंडिया गेट की आधारशिला 1921 में डयूक ऑफ कनॉट ने रखी थी। उन्हीं के नाम पर कनॉट प्लेस का नाम रखा गया था। इसे वायसराय लार्ड इर्विन ने राष्ट्र को समर्पित किया था। इंडिया गेट रात को फ्लडलाइट से जगमगाने लगता है। उस समय का मंजर बेहद दिलकश होता है।
Vivekshukladelhi@gmail.com, Navbharattimes
रविवार, 12 फ़रवरी 2023
👌👍आज 13 /02 विश्व रेडियो दिवस है / उमेश जोशी
उमेश जोशी
🙏प्रातः अभिवादन। बेहतर हो आज का दिन। सुखद हो आज सोमवार का दिन। स्वस्थ रहें और प्रसन्न रहें।
आज विश्व रेडियो दिवस है। रेडियो की शक्ति लोगों को एक साथ लाने, सूचित करने और शिक्षित करने, मनोरंजन करने और सामाजिक परिवेश से रूबरू कराने के लिए है। सभी उम्र और पृष्ठभूमि के लोग अपने पसंदीदा रेडियो स्टेशनों के प्रोग्राम सुनते हैं, चाहे वह नवीनतम समाचारों के लिए हो, दिल को छू लेने वाले गीत हों, या बस कुछ हल्के-फुल्के हास्य हों - रेडियो उनके दैनिक जीवन का साउंडट्रैक है। 'विश्व रेडियो दिवस' रेडियो की शक्ति का जश्न मनाता है; यह एक साथी की तरह है जो जोड़ता है, सूचित करता है और एकजुट करता है।
विश्व रेडियो दिवस प्रतिवर्ष 13 फरवरी को लोगों को एक साथ लाने; संचार और समझ को बढ़ावा देने में रेडियो की शक्तिशाली भूमिका को पहचानने के लिए मनाया जाता है। यूनेस्को ने 2011 में यह दिवस आरंभ किया था। इस दिवस के आयोजनों में नए दर्शकों तक पहुंचने, समुदायों को जोड़ने और शांति को बढ़ावा देने के लिए रेडियो का उपयोग करने के कई तरीकों की ओर ध्यान खींचने जैसे कार्य किए जाते है।
*नोट :- ऑल इंडिया रेडियो विश्व रेडियो दिवस के उद्देश्यों के अनुरूप है या नहीं, आप खुद आकलन करें।*
शनिवार, 11 फ़रवरी 2023
क्या टेक्नोलॉजी थी लक्ष्मण रेखा की............. *
सोमतिती विद्या - लक्ष्मण रेखा..
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महर्षि श्रृंगी कहते हैं कि एक वेदमन्त्र है--
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सोमंब्रही वृत्तं रत: स्वाहा वेतु सम्भव ब्रहे वाचम प्रवाणम अग्नं ब्रहे रेत: अवस्ति।।
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यह वेदमंत्र कोड है उस सोमना कृतिक यंत्र का,, पृथ्वी और बृहस्पति के मध्य कहीं अंतरिक्ष में वह केंद्र है जहां यंत्र को स्थित किया जाता है। वह यंत्र जल,वायु और अग्नि के परमाणुओं को अपने अंदर सोखता है। कोड को उल्टा कर देने पर एक खास प्रकार से अग्नि और विद्युत के परमाणुओं को वापस बाहर की तरफ धकेलता है।
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जब महर्षि भारद्वाज ऋषिमुनियों के साथ भृमण करते हुए वशिष्ठ आश्रम पहुंचे तो उन्होंने महर्षि वशिष्ठ से पूछा -- राजकुमारों की शिक्षा दीक्षा कहाँ तक पहुंची है ? महर्षि वशिष्ठ ने कहा कि यह जो ब्रह्मचारी राम है - इसने आग्नेयास्त्र वरुणास्त्र ब्रह्मास्त्र का संधान करना सीख लिया है। यह धनुर्वेद में पारंगत हुआ है महर्षि विश्वामित्र के द्वारा, यह जो ब्रह्मचारी लक्ष्मण है यह एक दुर्लभ सोमतिती विद्या सीख रहा है। उस समय पृथ्वी पर चार गुरुकुलों में वह विद्या सिखाई जाती थी।
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महर्षि विश्वामित्र के गुरुकुल में, महर्षि वशिष्ठ के गुरुकुल में, महर्षि भारद्वाज के यहां, और उदालक गोत्र के आचार्य शिकामकेतु के गुरुकुल में इस विद्या की पूर्ण शिक्षा दी जाती थी।
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श्रृंगी ऋषि कहते हैं कि लक्ष्मण उस विद्या में पारंगत था। एक अन्य ब्रह्मचारी वर्णित भी उस विद्या का अच्छा जानने वाला था।
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सोमंब्रहि वृत्तं रत: स्वाहा वेतु सम्भव ब्रहे वाचम प्वाणम अग्नं ब्रहे रेत: अवस्ति।।
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इस मंत्र को सिद्ध करने से उस सोमना कृतिक यंत्र में जिसने अग्नि के वायु के जल के परमाणु सोख लिए हैं उन परमाणुओं में फोरमैन आकाशीय विद्युत मिलाकर उसका पात बनाया जाता है। फिर उस यंत्र को क्रियाशील (एक्टिवेट) करें और उसकी सहायता से एक लेजर बीम जैसी किरणों से उस रेखा को पृथ्वी पर गोलाकार खींच दें।
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उसके अंदर जो भी रहेगा वह सुरक्षित रहेगा, लेकिन बाहर से अंदर अगर कोई जबर्दस्ती प्रवेश करना चाहे तो उसे अग्नि और विद्युत का ऐसा झटका लगेगा कि वहीं राख बनकर उड़ जाएगा जो भी व्यक्ति या वस्तु प्रवेश कर रहा हो, ब्रह्मचारी लक्ष्मण इस विद्या के इतने जानकार हो गए थे कि कालांतर में यह विद्या सोमतिती न कहकर लक्ष्मण रेखा कहलाई जाने लगी।
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महर्षि दधीचि, महर्षि शांडिल्य भी इस विद्या को जानते थे, श्रृंगी ऋषि कहते हैं कि योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण इस विद्या को जानने वाले अंतिम थे, उन्होंने कुरुक्षेत्र के धर्मयुद्ध में मैदान के चारों तरफ यह रेखा खींच दी थी, ताकि युद्ध में जितने भी भयंकर अस्त्र शस्त्र चलें उनकी अग्नि उनका ताप युद्धक्षेत्र से बाहर जाकर दूसरे प्राणियों को संतप्त न करे।
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मुगलों द्वारा करोडों करोड़ो ग्रन्थों के जलाए जाने पर और अंग्रेजों द्वारा महत्वपूर्ण ग्रन्थों को लूट लूटकर ले जाने के कारण कितनी ही अद्भुत विधाएं जो हमारे यशस्वी पूर्वजों ने खोजी थी लुप्त हो गई। जो बचा है उसे संभालने में प्रखर बुद्धि के युवाओं को जुट जाना चाहिए, ईश्वर सद्बुद्धि दे हम सबको.....
👌👍MR. Sunil Kumar, Deputy Inspector General of Police 👍👌
DIG SUNIL KUMAR CONTRIBUTED TREMENDOUSLY IN MAKING 5 WORLD RECORDS FOR CRPF
Shri Sunil Kumar, Deputy Inspector General of Police, posted at Central Sector Headquarters, Central Reserve Police, Gomtinagar, Lucknow, has set a unique milestone with his Devotion, determination, dedication and selfless co-operation in the history of CRPF throughout the world and made the name of not only his city and state but the whole country glorified in the world. According to Mr. Kumar, Jawan of CRPF sacrifices everything, his family, happiness and peace in the name of the country, but this society does not think much for the Jawan. Keeping this in mind, for the all-round development of the Jawans, the International Counselor, Dr. Gaurav Saxena was invited for counseling. With the due efforts of Dr. Gaurav Saxena and Mr. Kumar, counseling session was organized for senior officers, Jawans and their families of CRPF Institutions/Units located in the state of Uttar Pradesh. In this session, the officers, jawans and their families discussed the topics of physical & mental health, morality, family harmony, ways to control the stress of work area, career, drug addiction, prevention of negativity etc based on full scientific, Vedic and social aspects explaining with examples and tried to get rid of all problems/tension .
It is worth mentioning here that, Mr. Kumar's first meeting with Dr. Gaurav Saxena took place on 21st June 2022 at Group Centre CRPF Bijnor on the eve of International Yoga Day, where Dr. Saxrna was invited as the Chief Instructor and Mr. Kumar as the Chief Guest. Mr. Kumar sensed the immense talent and knowledge in Dr. Saxena and both came closer and planed the counselling session. Dr. Gaurav Saxena is brand ambassador of 89 JNVs of Uttar Pradesh and Uttarakhand. Apart from the above, he has made a world record in his name being honored with 231 honorary degrees and has consulted in 55 countries of the world. Under the leadership of Mr. Kumar, this mega programme was successfully organized by establishing contact between Dr. Saxena and CRPF institutions of Uttar Pradesh state. This work was done with a sense of service to the Jawans and 05 world records made for CRPF with the efficient leadership of Mr. Kumar and the knowledge of Dr. Saxena, which are as follows:-
(1) Counseling of 8688 officers/jawans and their family members.
(2) The maximum distance covered was 1881 km.for the counseling session of officers/jawans and family members of the CRPF
(3) Counseling of officers/jawans and family members of maximum 13 institutions/units of the CRPF.
(4) Counseling of institutions/units of CRPF located in maximum 10 Districts.
(5) Counseling of maximum duration i.e. 30 hours.
Mr. Kumar has been brainstorming on this topic for a long time that, motivational and useful workshops should be organized for the Jawans on subjects related to their physical & mental health, family harmony, reduction of Stress & Strain alongwith eradication of drug, alcoholic & tobacco addiction etc. on a large scale with the help of a qualified and well-known expert, so that, stress/strain of the troops can be eased out and cases of Suicide and Fratricide can be minimized/curbed/stopped.
Mr. Kumar has been working seriously on the matters related to the interests/welfare of the Jawans from the Rank of Company Commander i.e. since the year 1996. The Officers and Jawans of the Force actively participated in the counseling session and made the session a mega success due to continuous encouragement of Mr. Kumar.
Patna resident Mr. Sunil Kumar was awarded the "WORLD RECORD APPRECIATION CERTIFICATE" for his unprecedented contribution, which is a matter of great pride for him as well as the entire CRPF.
बुधवार, 8 फ़रवरी 2023
गुड़ खाने से 18 अद्भुत फायदे...*
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कृष्ण मेहता
(1)- गुड़ खाने से नहीं होती गैस की दिक्कत।
(2)- खाना खाने के बाद अक्सर मीठा खाने का मन करता हैं। इसके लिए सबसे बेहतर है कि आप गुड़ खाएं। गुड़ का सेवन करने से आप हेल्दी रह सकते हैं।
(3)- पाचन क्रिया को सही रखना।
(4) - गुड़ शरीर का रक्त साफ करता है और
मेटाबॉल्जिम ठीक करता है। रोज एक गिलास पानी या दूध के साथ गुड़ का सेवन पेट को ठंडक देता है। इससे गैस की दिक्कत नहीं होती। जिन लोगों को गैस की परेशानी है, वो रोज़ लंच या डिनर के बाद थोड़ा गुड़ ज़रुर खाएं।
(5)- गुड़ आयरन का मुख्य स्रोत है।
इसलिए यह एनीमिया के मरीज़ों के लिए बहुत फायदेमंद है खासतौर पर महिलाओं केलिए इसका सेवन बहुत अधिक ज़रुर है।
(6)- त्वचा के लिए
गुड़ ब्लड से खराब टॉक्सिन दूर करता है, जिससे त्वचा दमकती है और मुहांसे की समस्या नहीं होती है।
(7)- गुड़ की तासीर गर्म है, इसलिए इसका सेवन
जुकाम और कफ से आराम दिलाता है। जुकाम के दौरान अगर आप कच्चा गुड़ नहीं खाना चाहते हैं तो चाय या लड्डू में भी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।
(8)- एनर्जी के लिए -
बहुत ज़्यादा थकान और कमजोरी महसूस करने पर गुड़ का सेवन करने से आपका एनर्जी लेवल बढ़ जाता है। गुड़ जल्दी पच जाता है, इससे शुगर का स्तर भी नहीं बढ़ता!
दिनभर काम करने के बाद जब भी आपको थकान हो, तुरंत गुड़ खाएं।
(9)- गुड़ शरीर के टेंपरेचर को नियंत्रित रखता है।इसमें एंटी एलर्जिक तत्व हैं, इसलिए दमा के मरीज़ों के लिए इसका सेवन काफी फायदेमंद होता है।
(10)- जोड़ों के दर्द में आराम रोज़ गुड़ के एक टुकड़े के साथ अदरक का सेवन करें, इससे जोड़ों के दर्द की दिक्कत नहीं होगी।
(11)- गुड़ के साथ पके चावल खाने से बैठा हुआ गला व आवाज खुल जाती है।
(12)- गुड़ और काले तिल के लड्डू खाने से सर्दी में अस्थमा की परेशानी नहीं होती है।
(13)- जुकाम जम गया हो, तो गुड़ पिघलाकर उसकी
पपड़ी बनाकर खिलाएं।
(14)- गुड़ और घी मिलाकर खाने से कान का दर्द ठीक हो जाता है।
(15)- भोजन के बाद गुड़ खा लेने से पेट में गैस नहीं
बनती।
(16) पांच ग्राम सौंठ दस ग्राम गुड़ के साथ लेने से
पीलिया रोग में लाभ होता है।
(17) गुड़ का हलवा खाने से स्मरण शक्ति बढती है।
(18)- पांच ग्राम गुड़ को इतने ही सरसों के तेल में मिलाकर खानेसे श्वास रोग से छुटकारा मिलता है
मंगलवार, 7 फ़रवरी 2023
हम सब एक साथ साथ साथ aj तक
क्या भूलूं, क्या याद करूं
दिनेश तिवारी, हरीश पाठक, विवेक सक्सेना, मुकुल गर्ग, सुभाष अखिल, सुभाष भारद्वाज और मैं- इन सबमें एक बात कॉमन है। हम सब अपने-अपने करियर के लगभग शुरुआती दिनों में दिल्ली प्रेस में थे। पर अब एक बात कॉमन नहीं है। दिनेश तिवारी हमारे बीच अब नहीं हैं।
हम सब सहकर्मी कम, दोस्त ज्यादा थे। कल जब सबकी आपस में बात हुई तो घंटे-घंटे भर चली फ़ोन कॉल में न किसी ने दुआ-सलाम की, न एकदूसरे का हाल-चाल पूछा। दिनेश के नाम से बात शुरू हुई थी, उन्हीं के नाम के साथ संवाद खत्म हो गया। अतीत के जितने भी पन्ने पलटे, सब पर दिनेश का नाम लिखा था।
दिल्ली प्रेस में कदम रखने के बाद कुछ ही दिनों बाद मुझे स्तम्भ विभाग का प्रभारी बना दिया गया था। दिनेश तिवारी मेरे विभाग में आए तो मानो हवा का एक खुशनुमा झोका आया। हर समय कभी मुस्कराता तो कभी खिलखिलाता चेहरा। पर काम करते समय पूरी गंभीरता।
लंच टाइम होता तो हम सब दोस्त बाहर निकल जाते। तब दिल्ली प्रेस के सामने सड़क पार इमारतों का बसेरा नहीं था। दूर-दूर तक खाली ज़मीन पड़ी थी और उसके बीचोंबीच एक ढाबे का एकछत्र साम्राज्य था। उसकी बेंचों पर हमारी महफ़िल जमती थी। उस दौरान न दफ़्तर की राजनीति पर कोई बात होती, न देश की। सिर्फ़ और सिर्फ़ हंसी और ठहाकों का दौर चलता।
हरीश पाठक और दिनेश तिवारी का अपना अलग-अलग अंदाज़ था। दोनों नॉन स्टॉप हंसाते रहते। ढाबे वाले की नज़र चूल्हे पर कम, हमारी ओर ज़्यादा रहती। हंसते-मुस्कराते उसकी दाल फ़्राई अमूमन स्पेशल दाल फ़्राई बन जाती। हर डिश में स्पेशल इफ़ेक्ट्स नज़र आते। ऑर्डर पर ऑर्डर होते रहते और घड़ी की छोटी सूई कब एक से दो पर पहुंच जाती, पता न चलता। यह समय सबके लिए एनर्जी के डोज़ जैसा होता था।
कुछ समय बाद दिनेश का ट्रांसफ़र मुक्ता में हो गया, पर एकदूसरे के लिए लगाव और सम्मान ज्यों का त्यों बना रहा। मेरा मानना है कि रिश्ता कोई भी हो, अगर हम किसी का सम्मान नहीं करते तो हम उसे प्यार भी नहीं कर सकते। हम सब दोस्तों ने हमेशा इस बात का ध्यान रखा। दोनों भावनाएं समानांतर चलती रहीं।
कुछेक कैलेंडर ही बदले होंगे कि हम सब अलग-अलग संस्थानों में चले गए। कोई टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप गया तो कोई इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप। स्तम्भ विभाग के बाद दिल्ली प्रेस में मुझे एक साथ दो पत्रिकाओं का प्रभारी बना दिया गया था, जिसका अनुभव लिए मैं भी अपनी अगली पारी खेलने हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप आ गया। बाद में दिनेश भी वहीं आ गए। विभाग अलग थे। मैं फ़ीचर में था, वे न्यूज़ में। पर स्नेह वही था, मस्ती वही थी। आते-जाते होने वाली मुलाकातों की शुरुआत मुस्कराहट से होती, अंत खिलखिलाहट के साथ। हमने वहां भी कभी दफ़्तर की राजनीति पर बात नहीं की।
पर्यटन मेरा प्रिय विषय था, दिनेश का भी। कई लेख मैंने उनसे लिखवाए और उन्होंने बखूबी लिखे। उनके लेखों में स्थलों के इतिहास और भूगोल का अद्भुत ताना-बाना होता था। तब हंसी-मज़ाक से परे एक गंभीर पत्रकार का रूप शब्दों में नज़र आता। शिक्षा से जुड़े विषयों पर उनकी खासी पकड़ थी। मैंने कई बार उनसे कहा था कि उन्हें विधिवत् रूप से करियर काउंसलिंग का काम शुरू कर देना चाहिए।
फिर कुछ साल बाद वे संस्थानों में पढ़ाने की तीसरी पारी खेलने चले गए। मैं गेस्ट फैकल्टी के तौर पर जाता तो उनसे मुलाकात होती। मैं कई साल से आईपी यूनिवर्सिटी के कॉलेजों में बतौर एक्सटर्नल एग्ज़ामिनर जाता रहा हूं। एक बार परीक्षा लेकर कमरे से बाहर निकला तो साथ वाले कमरे से दिनेश की आवाज़ सुनाई दी। मैंने अंदर झांका तो वे छात्रों को कुछ समझा रहे थे। उनकी नज़र मुझ पर पड़ी तो मैं हाथ हिला कर जाने लगा। दो ही कदम चला था कि वे तेज़ी से आए और हाथ पकड़ कर अंदर ले गए। फिर छात्रों को मेरा नाम बता कर बोले- ये मेरे वरिष्ठ हैं। मैंने इनसे बहुत कुछ सीखा है। और फिर मेरे परदादा, मेरे दादा, मेरे पिताजी तक का ऐसा परिचय दिया कि मैं दंग रह गया। जो खुद एक वरिष्ठ पत्रकार हो, वो दूसरे पत्रकार का ऐसा परिचय दे, वो भी अपने छात्रों के सामने, ये उनके लिए शायद छोटी बात हो, मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी।
अपने उस दोस्त के बड़प्पन पर मुझे बहुत गर्व हुआ। परिचय कराने का यह उनका अद्भुत अंदाज़ था। प्रेस क्लब के किसी साथी से मिलवाते या अपने किसी खास दोस्त से, यह अंदाज़ कभी न बदलता। ये बड़प्पन आज बहुत कम लोगों में नज़र आता है। मुझे आज भी गर्व हो रहा है, जब उन पर लिखी गई हर पोस्ट में उनके बड़प्पन का ज़िक्र ज़रूर है।
जिस समय मोबाइल का क्रेज़ बढ़ रहा था, तब कई साल दिनेश ने मोबाइल नहीं खरीदा था। एक बार मिले तो मैंने डांटने के अंदाज़ में कहा, ‘तुम मोबाइल क्यों नहीं खरीदते? कभी कोई ज़रूरी बात करनी होती है तो पता है कितनी मुश्किल होती है!’ वे मुस्कराए- ‘मोबाइल खरीद लिया होता तो आप मिलने नहीं आते।‘ और मैं चुप हो गया। मेरे जैसे कई दोस्तों की डांट पड़ी होगी, तब एक दिन अपना नंबर लिखवाने के लिए फ़ोन आया। फिर कभी फ़ोन पर हमारी बात होती, कभी वॉट्स ऐप पर।
जैसे ही मैंने उनके जाने की खबर सुनी, मैंने तुरंत उनका फ़ोन मिलाया। मुझे पूरा विश्वास था कि दूसरी ओर से दिनेश की आवाज़ आएगी, पर नहीं आई। मैंने कई बार ऐसा किया। तब जाकर यकीन हुआ कि खबर सच है और दिनेश अब फिर बिना मोबाइल वाले हो गए हैं।
हम सब दोस्तों के जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहे। दिनेश के जीवन में भी आए, पर मुझे याद नहीं कि मैंने कभी उनके चेहरे पर चिंता के भाव या माथे पर बल देखे हों। न कभी किसी को कुछ बताया, न अपने दुख का साया दूसरे पर पड़ने दिया।
किसी शायर ने कहा है-
जो डूबना है तो इतने सुकून से डूबो
कि आस-पास की लहरों को भी पता न लगे
तभी ज़िंदगी की धारा में उनकी अंतिम डुबकी का हम आस-पास की लहरों को भी पता न चला।
सोमवार, 6 फ़रवरी 2023
रवि अरोड़ा की नजर से....
बुड़बक का धन और गुणवान
किस्सा आंखों देखा नहीं वरन मौके पर मौजूद एक दोस्त की जुबानी है। शहर में लगभग डेढ़ दर्जन सेठ लोगों की एक मित्र मंडली सुबह सुबह एक साथ सैर पर निकलती है। अधिकांश सेठ शेयर मार्केट के भी बड़े खिलाड़ी हैं मगर शेयरों की बात करते करते ही आज सुबह दो सेठ आपस में लड़ पड़े और बाकायदा गुत्थमगुत्था भी हो गए । हालांकि सेठों की परंपरा के अनुरूप अधिकांश भक्तमंडली के सदस्य हैं मगर फिर भी एक दो सेठ बागी किस्म के भी हैं। इन्हीं में से एक बागी सेठ आज पूरा बागी हो गया । दरअसल उसके पास अडानी एंटरप्राइज के काफी शेयर हैं और हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद इन शेयरों के दाम एक चौथाई रह गए और सेठ जी करोड़ों के नीचे आ गए । भक्त सेठ से यह गलती हो गई कि उसने कह दिया कि तुम्हे भी देख कर इन्वेस्ट करना चाहिए था । बस फिर क्या था बागी सेठ मां बहन के संबोधनों पर उतर आया । उसका एक ही तर्क था कि मैंने पैसा अडानी पर नहीं वरन तुम्हारे नेता नरेंद्र मोदी पर लगाया था । तुम्हारा नेता जब उसे दुनिया भर में ले लेकर घूमा और हवाई अड्डे, रेलवे, माइनिंग और बंदरगाह समेत सब कुछ उसके हवाले कर रहा था तो मुझे कोई आकाशवाणी होती कि सब कुछ हवा हवाई है ? बागी सेठ का तर्क था कि मैं तो इसी भुलेखे में रहा कि अडानी प्रधानमंत्री का दोस्त है और पहले की तरह आगे भी इसकी गुड्डी आसमान में रहेगी । उधर, देखना मुझे चाहिए था या नरेन्द्र मोदी को ? बागी के इस सवाल से भक्त सेठ भी तिलमिलाया हुआ था ।
चूंकि बागी सेठ से अपने भी अच्छे संबंध हैं अतः हालचाल जानने को मैंने उन्हें फोन कर डाला । मेरे सामने भी उन्होंने वही सब तर्क दोहराए । बकौल उनके विदेश में प्रधानमंत्री जिस होटल में ठहरते, गौतम अडानी भी उसी में ठहरता था । दोनो एक ही जहाज में घूमते थे और जिस जिस देश में प्रधान मंत्री गए वहीं अडानी ने साथ जाकर व्यापारिक सौदे किए । देश के भी तमाम क्षेत्रों में भी टाटा, बिरला और अंबानी जैसों धुरंधरों को छोड़कर अडानी को ही आगे बढ़ाया जा रहा था । साल 2013 में मोदी जी को प्रधान मंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करते समय अडानी की नेट वर्थ 51 हजार करोड़ थी मगर उनके प्रधान मंत्री बनने तक ही उनके इस परम मित्र की वर्थ सवा लाख करोड़ हो गई । साल 2019 में यह बढ़ कर दो लाख करोड़ हो गई और 2021 में आठ लाख करोड़ तक पहुंच गई । ताजा घटनाक्रम होने से पहले उनकी वर्थ बीस लाख करोड़ को भी पार कर गई और जिस अडानी को 2014 से पहले कोई जानता भी नहीं था, वह दुनिया का तीसरा बड़ा रईस बन गया । चौंकाने वाली बात यह भी थी कि कोरोना काल में जब दुनिया के सभी दस बडे़ रईस अपनी सम्पत्ति का बड़ा हिस्सा खो रहे थे उस समय भी अडानी की वर्थ कुलांचें भर रही थी। दुनिया की सभी कंपनियां खरामा खरामा चल रही थीं मगर अडानी ने आठ साल में ही अपनी वर्थ 49 गुना बढ़ा ली। बकौल सेठ हम इन्वेस्टर हैं और हमें तेज दौड़ने वाले घोड़े पर ही पैसा लगाना पड़ता है मगर घोड़े की हारी बीमारी देखना हमारा नहीं सरकार का काम होता है। सेठ अडानी का अर्थशास्त्र और मोदी जी का राजनीति शास्त्र बांच रहा था और मैं चुपचाप सुन रहा था । अपना पूरा दुखड़ा रोने के बाद सेठ ने मुझसे भी पूछ डाला कि बताओ अडानी की कम्पनी में इन्वेस्ट करके मैंने क्या गलती की ? बकौल उसके हम लोग तो सरकार व सेबी, ईडी जैसे उसके विभागों पर भरोसा करके चलते हैं। हमें कैसे पता चलता कि प्रधानमंत्री का खासम खास धोखाधड़ी कर रहा है और हमारा खाया पिया सब वापिस निकाल लिया जायेगा ? पैसे गंवाने से अधिक सेठ को इस बात का दुख था कि प्रधानमंत्री अब क्यों मुंह में दही जमा कर बैठे हैं और कुछ बोलते क्यों नहीं ? सेठ की दारुण गाथा सुन कर इच्छा हुई कि उसे मश्हूर बिहारी कहावत सुना दूं मगर कह नहीं पाया । चलिए आप ही सुन लीजिए- बुड़बक के धन में गुणवान का हिस्सा ।
रविवार, 5 फ़रवरी 2023
मुगल गार्डन हुआ अमृत उद्यान,फिर छिड़ी बात फूलों की / विवेक शुक्ल
अब मुगल गार्डन को बोलिए अमृत उद्यान। यानी जिस मुगल गार्डन को देश की कई पीढ़ियों ने मुगल गार्डन के नाम से जाना था उसे नया नाम मिल गया। केन्द्र सरकार ने शनिवार को मुगल गार्डन का नाम बदलकर अमृत उद्यान कर दिया है। मुगल गार्डन को नया नाम राष्ट्रपति भवन दिवस से ठीक पहले मिला है। हर साल 1 फरवरी को राष्ट्रपति भवन दिवस मनाया जाता है।
दरअसल 1 फरवरी 1950 को देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद यहां रहने के लिए आए थे। तो सरकार ने राष्ट्रपति भवन दिवस से ठीक पहले एक बड़ा फैसला लिया। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने ही मुगल गार्डन में आम जान के प्रवेश को खोला था। यह हर साल जनता के लिए फरवरी में खुलता है। अब जब यहां लोग गुलों को निहारने आएंगे तो उन्हें अमृत उद्यान नाम पढ़ने को मिलेगा।
किसकी प्राण और आत्मा
बेशक,राष्ट्रति भवन की प्राण और आत्मा रहा है 15 एकड़ में फैला फूलों से लदा महकता मुगल गार्डन। मुगल गार्डन 1928-29 तक बन कर तैयार हो गया था। कह सकते हैं राष्ट्रपति भवन में रहे पहले वायसराय लार्ड इरविन के आने से पहले तक यह सुगंध बिखरेने लगा था। लॉर्ड इरविन यहां 6 फरवरी 1929 को रहने के लिए आए थे। मुगल गार्डन का डिजाइन राष्ट्रपति भवन के चीफ आर्किटेक्ट एडविन लुटियंस ने 1917 तक बना लिया था। मुगल गार्डन की लैंड स्केपिंग हार्टिक्लचर विभाग में निदेशक डब्ल्यू आर.मुस्टो ने की थी एडविन लुटियंस की सरपरस्ती में। इसमें ब्रिटिश और मुगलकाली उद्यान शैली का अप्रतिम मिश्रण दिखाई देता है।
कहां मदर टेरेसा और कैनेडी
संसार के शायद ही किसी उद्यान में मगल गार्डन से अधिक गुलाब की प्रजातियां हों। यहां 150 प्रजातियों के गुलाब हैं। इसमें बोन्न नुइट तथा ओलाहोमा जैसे गुलाब भी हैं जो कि कालेपन के नजदीक होते हैं। नीले रंगों में यहां पैराडाइज, ब्लू मून, लेडी एक्स हैं। यहां पर दुर्लभ हरा गुलाब भी हे। गुलाबों के कुछ बहुत ही रोचक नाम हैं। जैसे जॉन कैनेडी, अब्राहम लिंकन,मदर टेरेसा, अर्जुन, भीम, राजाराम मोहन राय, डॉ. बी.पी. पाल आदि। कैनेडी की हत्या के बाद मुगल गार्डन के मालियों ने उनकी याद में गुलाब की एक प्रजाति विकसित की थी। अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के नाम पर गुलाब की प्रजाति भी मुगल गार्डन में पेश है। मतलब अमेरिका के दो महान राष्ट्रपति भारत के राष्ट्रपति भवन में स्थायी रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे हैं।
मुगल गार्डन चार भागों में बंटा हुआ है और चारों एक दूसरे से भिन्न एवं अनुपम हैं। यहां कई छोटे-बड़े बगीHचे हैं। बटरफ्लाई गार्डन में फूलों के पौधों की बहुत सी पंक्तियां लगी हुई हैं। तितलियों को देखने के लिए यह जगह सर्वोत्तम है। मुगल गार्डन में फूलों के साथ-साथ जड़ी-बूटियां और औषधियां भी उगाई जाती हैं। इनके लिये एक अलग भाग बना हुआ है, जिसे औषधि उद्यान कहते हैं।
फूल-पौधों पर कौन करता जान निसार
मुगल गार्डन में आने वाले अतिथि गुलाब की अनगिनत प्रजातियों को देखने भर से अपने को तृप्त महसूस कर रहे हैं। लेकिन, शायद ही कोई उन मालियों से मिलता हो जो मुगल गार्डन को देखते-संवारते हैं। मुगल गार्डन के मालियों के लिए यहां का हरेक पत्ता, बूटा, फूल अपने बच्चों की तरह प्रिय होता है। वे इन पर जान निसार करते हैं। इन्हें उसी तरह से पालते-पोसते हैं जैसे कोई माता-पिता अपने बच्चों को जन्म के बाद लाड- प्यार से खड़ा-बड़ा करते हैं। मुगल गार्डन को विशिष्ट बनाता है यहां पर गुलाब की 150 से अधिक प्रजातियां। इन्हें खड़ा करने का श्रेय जाता है इधर के दर्जनों मालियों को। ये पीढ़ी दर पीढ़ी से हैं।
अभी तक रहे देश सभी राष्ट्रपति मुगल गार्डन के मालियों से लगातार मिलते-जुलते रहे। उन्हें सलाह देते रहे कि व किस तरह से मुगल गार्डन को और बेहतर बना सकते हैं। अमिता बविसकर ने अपनी किताब फर्स्ट गार्डन आफ दि रिपब्लिक में लिखा है- “ मुगल गार्डन के मालियों का संबंध मुख्य रूप से सैनी समाज से रहा है। ये राजस्थान से संबंध रखते हैं।” आप कह सकते हैं कि ये व्यवस्था शुरू से ही चल रही है। गुजरे कुछ दशकों से उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ और फैजाबाद के भी माली आने लगे हैं। ये सब केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग यानी सीपीड्ब्लूडी से जुड़े होते हैं और इनकी किसी अन्य जगह पर ट्रांसफर भी प्राय: नहीं होती। ये अधिकतर राष्ट्रपति भवन परिसर में ही रहते हैं। ये सब यहां पर पीढ़ी दर पीढ़ी से हैं। कुछ के पिता और दादा भी यही काम करते रहे हैं। इनका सारा संसाऱ राष्ट्रपति भवन के अंदर ही गुजर जाता है।
ये माली हर साल सितंबर के महीने से इस अनूठे उद्यान को नए सिरे से तैयार करने में जुट जाते हैं। यहां पर माली के रूप में काम करने वालों को अलग से कोई ट्रेनिंग वगैरह तो नहीं मिलती। वह अपने सीनियर्स से सीख-सीख कर अनुभव प्राप्त कर लेते हैं। हां, ये सब बीच-बीच में पूसा में लगने वाले कृषि मेलों में जाते हैं ताकि खेती की नई किस्मों और उपकरणों के बारे में जान सकें।
बहरहाल, मुगल गार्डन नाम अब इतिहास के पन्नों में जा रहा है। यही प्रकृति का नियम भी है। यहां कुछ भी तो स्थायी नहीं है।
Vivekshukladelhi@gmail.com, 29 01.23 Navbharattimes
राजघाट बापू और मार्टिन लूथर किंग जूनियर / विवेक शुक्ल
राजघाट बापू और मार्टिन लूथर किंग जूनियर / विवेक शुक्ल
11 फरवरी, 1959। दिल्ली में उस दिन ठंडी हवाएं चल रही थी। आजकल की तरह सर्दी से ठिठुरन हो रही थी। पर राजघाट में कुछ हलचल अवश्य थी। महात्मा गांधी की समाधि राजघाट पर फूल चढ़ाने मार्टिन लूथर किंग जूनियर आ रहे थे। वे तब तक सारे संसार में अश्वेतों के सबसे आदरणीय नेता के रूप में अपने को स्थापित कर चुके थे। उनके साथ उनकी पत्नी कोरेटा किंग भी थीं। राजघाट पर बापू को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए उनकी आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी। वे कुछ संभले तो वहां पर उपस्थित लोगों ने उनसे पूछा कि ‘आपकी आंखें नम क्यों हो रही हैं?’ मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने आसमान की ओर देखते हुए उत्तर दिया – ‘गांधी से मुझे शक्ति मिलती है। वे मेरे मार्गदर्शक हैं। मैं गांधी के दिखाए सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर ही अमेरिका में दबे-कुचले अश्वेतों के पक्ष में संघर्ष करने के लिए प्रेरित होते हैं। गांधी के कारण भारत लिए तीर्थ स्थान की तरह है।’ वे जब यहां पधारे थे उससे करीब चार-पांच साल पहले राजघाट परिसर और समाधि बनाई गई थी। उनसे पहले और बाद में राजघाट में लाखों लोग आए हैं। आज बलिदान दिवस पर भी यहां पर राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री से लेकर तमाम लोग उपस्थित रहेंगे।
राजघाट में समाधि का डिजाइन
गांधी जी की हत्या के कई सालों के बाद तक राजघाट उसी स्थिति में था जैसा वह गांधी जी की अंत्येष्टि के दिन यानी 31 जनवरी 1948 को था। हालांकि सरकार इसे विकसित करने की योजना तो बना ही रही थी। प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि राजघाट का डिजाइन कोई विदेशी डिजाइनर तैयार कर ले। इस लिहाज से अमेरिका के महान आर्किटेक्ट फ्रेंक लायड राइट से भी संपर्क किया गया था। पर इस प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ाया गया क्योंकि संसद में विपक्ष ने तगड़ा बवाल किया था। विपक्ष की मांग थी कि बापू की समाधि का डिजाइन कोई भारत का ही डिजाइनर तैयार करे। इसके बाद ये महत्वपूर्ण दायित्व वानू जी. भूपा को सौंपा गया। पर इससे पहले देश के चोटी के डिजाइनरों से संपर्क किया गया। उन्होंने भी राजघाट में समाधि स्थल का डिजाइन तैयार करने में अपनी दिचलस्पी दिखाई थी। लगभग दो दर्जन डिजाइनरों ने सरकार को अपने पहले किए गए काम और उनकी राजघाट के डिजाइन करने संबंधी योजना की रिपोर्ट सौंपी थीं। इन सबके कामों और राजघाट के संभावित डिजाइनों का गहराई से अध्ययन किया था केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग ( सीपीडब्लूडी) के चीफ आर्किटेक्ट हबीब रहमान और इसी विभाग के चीफ इंजीनियर टीएस वेदागिरी ने। पंडित नेहरू ने इन दोनों को निर्देश दिए थे वे डिजाइनरों के राजघाट के डिजाइन के लिए प्रोजेक्ट कॉस्ट पर भी नजर रखें। नेहरू जी इस सारी प्रक्रिया पर नजर बनाए हुए थे। हबीब साहब और वेदागिरी को मिले विभिन्न डिजाइनों में राजघाट का एक डिजाइन दक्षिण भारतीय मंदिर की वास्तुकला से मिलता-जुलता भी था। एक-दो में बापू चरखे के साथ या चरखे के बगैर भी बैठे हैं। खैऱ, अंत में भूपा के डिजाइन पर मुहर लगी। अमेरिका में शिक्षित थे भूपा जी। उन्होंने बापू की सादगी के प्रति निष्ठा को ध्यान में रखते हुए सारे परिसर का डिजाइन को तड़-भड़क से दूर 'सीधा-सरल' रखा गया है। यहां पर ज्योति सदैव प्रज्जवलित रहती है। वह संदेश देती है कि बापू के संदेश और शिक्षाएं सदैव संसार के लिए प्रासंगिक और महत्वपूर्ण रहेंगे।
गरिमामय सादगी
बेशक, भूपा के डिजाइन में एक तरह की गरिमामय सादगी थी। उन्होंने राजघाट परिसर के बीचों-बीच एक वर्गाकार स्पेस में समाधि बनाई। उस पर बापू के बोले अंतिम शब्द ‘हे राम’ रखे। भूपा ने समाधि के चारों तरफ बड़ा सा स्पेस हरियाली के लिए छोड़ा। अगर बात राजघाट से हटकर करें तो भूपा जी ने इसके अलावा शायद ही राजधानी में कोई अन्य प्रोजेक्ट पर काम किया। इस बीच,राजघाट परिसर की लैंड स्केपिंग की थी मेरठ में जन्में एंग्लो इंडियन एलिश पर्सी लैंकस्टेर ने। वे भारत सरकार के बागवानी विभाग से जुड़े रहे थे।
वहां के पेड़-पौधे
राजघाट में वर्ष 1950 से विशिष्ट विदेशी मेहमान पौधा लगा रहे हैं। अब तक राजघाट पर 200 पौधे लगाए जा चुके हैं। अंतिम पौधा 11 फरवरी 2016 को अबू धाबी के युवराज व संयुक्त अरब अमीरात के सर्वोच्च उपसेनाध्यक्ष मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान द्वारा मोलश्री का पौधा लगाया था। दुर्भाग्यवश देखभाल में लापरवाही के चलते विशिष्ट विदेशी अतिथियों द्वारा लगाए गए पेड़ सूखते भी रहे हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री कृष्णा प्रसाद भट्टाराई द्वारा 9 जून 1990 को लगाया गया कदंब का पेड़ सूख गया है। इसी तरह 21 जनवरी 1961 को ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय द्वारा राजघाट पर लगाए गए पाइनस लोंजीफोलिया के पेड़ का अब अस्तित्व नहीं है।
कब-कब आए ओबामा
अमेरिकी के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा राजघाट पर बापू को श्रद्धांजलि देने दो बार आए। ओबामा अक्सर अपने जीवन पर महात्मा गांधी के प्रभाव का जिक्र करते रहे हैं। वे क्रमश: 2012 और 2015 में अपनी भारत यात्रा के समय राजघाट आए थे। उन्हें 20 फरवरी, 2015 को राजघाट यात्रा के समय
गांधी के प्रसिद्ध ‘चरखा’ की प्रतिकृति भेंट की गई थी। ओबामा ने यहां पर पीपल का पौधा भी लगाया और विजिटर्स बुक पर लिखा था। उन्होंने लिखा था- ‘मुझे राजघाट पर आकर अपार आनंद की अनुभूति हो रही है। गांधी जी मेरे नायक रहेंगे।’ओबामा ने 2009 में नोबेल शांति पुरस्कार स्वीकार करने के दौरान भी गांधी जी को याद किया था। यह पूछे जाने पर कि ‘जीवित या मृत शख्सियतों में से कौन उनके पसंदीदा हैं,’ तब उन्होंने बापू का नाम लिया था। दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला यहां 1995 में आए। वे जब यहां पर आए तो उन्होंने प्रोटोकॉल को नजरअंदाज करते हुए राजघाट के तमाम कर्मियों से हाथ मिलाए थे।
कब आए मुशर्रफ़
परवेज मुर्शरफ संभवत: पाकिस्तान की पहली बड़ी शख्सियत थे, जो राजघाट में पहुंचे थे। उस दिन राजधानी में कसकर बारिश हो रही थी। हालांकि वे जब राजघाट पहुंचे तो बूंदा-बांदी ही हो रही थी। वे 17 जुलाई,2001 को राजघाट गए थे। खबरिय़ा चैनलों से दिखाई जाने वाली तस्वीरों से साफ लग रहा था कि वे राजघाट पर पहुंचने के बाद से ही बेहद तनाव में थे। उन्होंने वहां पर विजिटर्स बुक में बापू की शख्सियत के बारे में कुछ लिखा भी था। तब कुछ ग्राफोलोजिस्ट ( हैंड राइटिंग के विशेषज्ञ) ने उनकी हैंड राइटिंग का अध्ययन करने के बाद दावा किया था कि मुशर्रफ राजघाट पर विजिटर्स बुक पर लिखते वक्त भी तनाव में थे। मुशर्रफ राजघाट से फारिग होने के बाद अपने ननिहाल दरियागंज गए थे। राजघाट और दरियागंज को आप पैदल ही नाप सकते हो।
कौन देर तक रहा राजघाट
राजधानी दिल्ली की मुख्य सड़कों पर उस दिन की सुबह ट्रैफिक बढ़ना शुरू ही हुआ था कि उसे पुलिस ने रोक दिया। पूछने पर पता चला कि ब्राजील के राष्ट्रपति लुइस इनासियो लूला डिसिल्वा राजघाट पहुंच रहे हैं महात्मा गांधी की समाधि पर फूल चढ़ाने के लिए। उम्मीद थी कि लूला राजघाट से 15-20 मिनट में वापस चले जायेंगे, पर यह नहीं हुआ। वे राजघाट में करीब 35 मिनट तक रहे। समाधि पर फूल चढ़ाने के बाद वे राजघाट में उनके स्वागत के लिए खड़ी गांधीवादी निर्मला देशपांडे जी से गांधी जी के जीवन संघर्षों के बारे में सवाल पर सवाल करने लगे। राजघाट से विदा होने से पहले उन्होंने विजिटर्स बुक में लिखा कि ‘मैं शांति के दूत महात्मा गांधी की समाधि पर आकर अपने को बहुत बेहतर महसूस कर रहा हूं। गांधी के जीवन का मेरे ऊपर गहरा प्रभाव रहा।’ लुला राजघाट में 4 जून, 2007 को आये थे। ये जानकारियां राजघाट के तत्कालीन प्रभारी रजनीश कुमार देते हैं। वे भी उस समय राजघाट में थे जब लुला उधर आये थे।
30 जनवरी, 1948 की रात
अगर हम गुजरे दौर के पन्नों को खंगाले तो 30 जनवरी,1948 को रात के करीब 9 बजे प्रधानमंत्री जवाहर नेहरू, गृह मंत्री सरदार पटेल और भारत सरकार के कई आला अफसर राजघाट पहुंचे। उस वक्त ओस और घने कोहरे ने दिल्ली को अपने आगोश में ले लिया था। दिल्ली और देश बापू की मौत से स्तब्ध थी। सारा देश शोकाकुल था। नेहरू जी जब राजघाट पहुंचे तब तक वहां
केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग के अफसर मजदूरों के साथ उस चबूतरे के निर्माण के कार्य में जुटे हुए थे, जहां पर बापू की अगले दिन अंत्येष्टि होनी थी। अंत्येष्टि की तैयारी नेहरू जी खुद देख रहे थे। 30 जनवरी 1948 के उस मनहूस दिन नेहरू कैबिनेट की बैठक में बापू की अंत्येष्टि स्थल पर चर्चा हुई। उसमें तय हुआ कि राजघाट सबसे बेहतर जगह रहेगी अंत्येष्टि के लिए। एक तो ये यमुना नदी के किनारे है और फिर ये राजधानी के मध्य में भी है। उसके बाद संबंधित सरकारी अफसरों और विभागों को अंत्येष्टि स्थल की सारी व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए थे। दिल्ली के इंस्पेक्टर जनरल पुलिस डब्ल्यू.वी. संजीवी को अंत्येष्टि वाले दिन कानून-व्यवस्था बनाए रखने के निर्देश मिल चुके थे। वे बीते कई दिनों से बीमार थे।
तीस जनवरी मार्ग से राजघाट
31 जनवरी,1948। महात्मा गांधी की शवयात्रा अलबुर्कर रोड (अब तीस जनवरी मार्ग) स्थित बिड़ला हाऊस से दोपहर में निकलनी चालू हुई। उससे पहले ही वहां पर दिल्ली और आसपास के शहरों से हजारों शोकाकुल लोग पहुंच चुके थे। शवयात्रा जनपथ,इंडिया गेट,आईटीओ वगैरह से होते हुए राजघाट पहुंची। जिस वाहन में बापू का पार्थिव शरीर रखा हुआ था, उसमें नेहरू जी, सरदार पटेल और बापू के दो पुत्र रामदास और देवदास बैठे थे। बापू के दूसरे पुत्र मणिलाल गांधी अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पाए थे। वे दक्षिण अफ्रीका में रहते थे। शव यात्रा के सारे रास्ते में अपार जनसमूह बापू के अंतिम दर्शन कर रहा था। सैकड़ों लोग अपने घरों से देसी घी के डिब्बे लेकर आए थे अंत्येष्टि के लिए। राजघाट पर पहले से ही लार्ड माउंटबेटन, उनकी पत्नी पामेला माउंटबेटन, भारतीय सेना के ब्रिटिश कमांडर इन –चीफ राय बाउचर वगैरह मौजूद थे। राजघाट पर बापू के दोनों पुत्रों ने पिता को मुखाग्नि दी थी। क्या बापू के ज्येष्ठ पुत्र हरिलाल उस दिन वहां हाजिर थे? कुछ जानकार दावा करते हैं कि वे वहां पर नशे की हालत में प्रकट हो गए थे। उधर, मणिलाल गांधी की पौत्री उमा धूपेलिया मेस्ट्री अपनी किताब गांधीज प्रीस्नर में दावा करती हैं कि हरिलाल गांधी बापू की अंत्येष्टि के चार दिनों के बाद अपने छोटे भाई देवदास के घर (कनॉट प्लेस ) में आए थे।
‘दूसरा’ गांधी राजघाट पर
साल था 1951। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू योजना आयोग की बैठकों में शामिल हो रहे थे। देश की पंचवर्षीय योजना का खाका तैयार हो रहा था। उस दौरान आचार्य विनोबा भावे तेलंगाना में थे। ये जुलाई का महीना था। भूदान आंदोलन चल रहा था। उसे अभूतपूर्व सफलता मिल रही थी। ये बात नेहरू जी को पता चलीं तो उन्होंने विनोबा भावे से तुरंत दिल्ली आने का आग्रह किया ताकि गांवों के विकास और उन्हें स्वावलंबी बनाने पर विस्तार से चर्चा हो सके। उनके लिए विशेष विमान की व्यवस्था हुई। पर विनोबा भावे ने विनम्रता से कह दिया कि वे पदयात्रा करके दिल्ली पहुंच रहे हैं।
अब विनोबा भावे सड़क मार्ग से दिल्ली के लिए निकल पड़े अपने करीब 75 साथियों के साथ। वे जिधर भी पहुंचते तो उनका स्वागत होता। वे ठहरते किसी झोपड़ी में ही। वे वहां पर प्रार्थना के बाद भूदान आंदोलन के बारे में स्थानीय लोगों को बताते-समझाते। विनोबा भावे नवंबर के महीने में दिल्ली में आ गए। वे राजघाट परिसर में ठहरे। सरकार की चाहत थी कि वे किसी सरकारी गेस्ट हाउस में ठहरें। लेकिन वे नहीं माने। उनके राजघाट आने से पहले ही वहां पर लकड़ी से झोपड़ियां बना दी गईं। वे अपने साथियों के साथ लगभग 793 किलोमीटर की पदयात्रा करके दिल्ली आए थे। तब तक राजघाट आजकल की तरह नहीं बना था। वह एक बंजर स्थान से अधिक कुछ नहीं था। विनोबा भावे गांधी जी के अंत्येष्टि स्थल के ठीक सामने बनी झोपड़ी में रूके।
राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद उनसे खुद राजघाट में मिलने आए। उनके साथ उनकी पत्नी राजवंशी देवी जी भी थीं। कहते हैं कि राजवंशी जी राजेन्द्र बाबू के साथ पहली बार दिल्ली में किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में देखी गईं थीं। राजेन्द्र बाबू ने विनोबा भावे से कहा कि वे बिहार में उनकी जितनी चाहें भूमि ले लें। वे विनोबा भावे और उनके साथियों के लिए फल आदि लेकर आए थे। नेहरू जी दो बार आए राजघाट। दोनों ने लंबी बातचीत की गांवों और किसानों से जुड़े मसलों पर। गांधी जी ने जब 1940 में अहिंसक असहयोग आंदोलन की नींव सत्याग्रह को बनाया था, तो विनोबा भावे पहले सत्याग्रही बने थे। नेहरू जी को ये सम्मान नहीं मिला था। दरअसल बापू के जीवन का एक अंग राजनीति थाऔर दूसरा आध्यात्म ।जिससे सत्याग्रह का विचार संसार को मिला । निश्चित रूप से बापू की इस विरासत के वारिस विनोबा भावे ही माने जाएंगे। विनोबा भावे के राजघाट पर होने से वहां पर सैकड़ों दिल्ली वाले रोज उनसे मिलने आ रहे थे। वे उन्हें गांधी की प्रतिमूर्ति के रूप में देख रहे थे। इसके साथ ही योजना आयोग के सदस्य बार-बार विनोबा भावे से मुलाकातें कर रहे थे। कम्युनिस्ट पार्टी के नेता अजय बोस भी विनोबा भावे से शिष्टाचार मुलाकात करने के लिए आए। विनोबा भावे राजघाट में 12-23 नवंबर 1951तक रूके। इस दौरान राजघाट में दिल्ली के गांवों के भी सैकड़ों लोग उनसे मिलने के लिए आते रहे। राजघाट में सारी व्यवस्था को देख रहे थे चौधरी ब्रहम प्रकाश, सुशीला नैयर और दिल्ली के गांवों के गांधी कहे जाने वाले मलयाली सज्जन सी.के. नायर। चौधरी ब्रहम प्रकाश दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री बने। डॉ. सुशीला नैयर तो गांधी जी की निजी चिकित्सक रही थीं।
Vivekshukladelhi@gmail.com Navbharattimes 29 January 2023
खुशवंत सिंह के बारे मेरी अच्छी नहीं थी Aa
उर्मिलेश-
विख्यात लेखक-संपादक खुशवंत सिंह का आज (2 फरवरी) जन्म दिन है. अचानक उनकी याद आई जब पता चला, 1915 में आज ही के दिन उनका जन्म हुआ था..उनका निधन 2014 में 20 मार्च को हुआ..

लेखक, संपादक, इतिहासकार, राजनयिक और सांसद के रूप में उनको ख्याति मिली. शुरू में मेरी उनके बारे में बहुत अच्छी राय नहीं थी. यह तब की बात है जब मैं इलाहाबाद में बी ए का छात्र था और देश में इमर्जेंसी लगी हुई थी. खुशवंत उन बड़े पत्रकारों/संपादकों में थे जिन्होंने इमर्जेंसी का समर्थन किया था. इसी वजह से उनके बारे में लंबे समय तक मेरी राय अच्छी नहीं रही.
उन दिनों मै सिर्फ उनके लेख और कॉलम ही पढता था. मुझे यह भी नहीं मालूम था कि वह A Train to Pakistan के लेखक भी हैं, जबकि यह किताब मेरे जन्म-वर्ष(1956 )ही प्रकाशित होकर देश और विदेश में बहुत लोकप्रिय हो चुकी थी. सन् 1978 में जब दिल्ली आकर JNU का छात्र बना तो कमल कॉम्प्लेक्स स्थित गीता बुक सेंटर से वह किताब खरीदी. पढ़ने के बाद खुशवंत सिंह नामक ‘इमर्जेंसी-समर्थक संपादक’ से जो भी गिला-शिकवा था, वह ख़त्म हो गया.
बाद के दिनों में उन्हें कई मौकों पर देखा और सुना भी. पर वन-टू-वन मिलने का मौका तब मिला, जब मैं राज्यसभा टेलीविजन का कार्यकारी संपादक था. मुलाकात बहुत दिलचस्प और खुशनुमा रही.
निजी जीवन में भी वह बिंदास, निडर, हंसमुख और मस्तमौला थे. खुशवंत के चुटीले हास्य-व्यंग्य आधारित अखबारी कॉलम भी खूब लोकप्रिय हुए.
बेहद अमीर घर में पैदा हुए खुशवंत सिंह की शिक्षा-दीक्षा दिल्ली, लाहौर और लंदन हुई. अपनी पृष्ठभूमि के चलते वह बेहद कुलीन तो थे लेकिन ज्यादातर भारतीय कुलीनों की तरह उनमें सामंती ऐंठ और दंभ-भरी अशिष्टता नहीं थी. उनकी कुलीनता काफी कुछ यूरोप के उदार पूंजीवादी समाजों के अमीरों जैसी थी. एक बात जरूर कहनी होगी कि रहन-सहन की शैली भले यूरोपीय अमीरों जैसी थी पर उनके जीवन-मूल्य पूरी तरह देसी थे. पेड़ों-पौधों, पर्वतीय इलाकों की वनस्पतियों और पक्षियों के बारे में उनकी गहरी रुचि थी.
भारतीय समाज और इतिहास की उनकी समझ बहुत अच्छी थी. अंग्रेजी के वह उन इक्का-दुक्का बड़े भारतीय संपादकों में थे, जो भारतीय समाज और शासकीय प्रतिष्ठानों पर ब्राह्मणवादी वर्चस्व की आलोचना से परहेज नहीं करते थे. उनके अंग्रेजी पाठक तो निश्चय ही इस बात से अच्छी तरह परिचित होंगे लेकिन हिंदी जगत में यह बात उतनी ज्ञात नहीं है.
हिन्दुत्ववादी राजनीति, मंदिर मस्जिद विवाद, मस्जिद ध्वंस और अन्य सांप्रदायिक विवादों व दंगों को उन्होंने सिरे से खारिज किया. गुजरात से केंद्रीय राजनीति की तरफ मुखातिब होते भाजपा नेता नरेंद्र मोदी के भी वह मुखर आलोचक थे. उनका निधन 2014 में मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने से पहले ही हो गया था. उनकी आखिरी किताब का शीर्षक स्वयं ही उसकी कथा कसता है: The End of India. खुशवंत सिंह ने सिख हिस्ट्री लिखकर इतिहास-लेखन के क्षेत्र में बडा योगदान दिया. उनकी किताब History of The Sikh दो खंडों में प्रकाशित है. इन दोनों में उन्होंने सन् 1469 से 1988 तक का सिख इतिहास लिखा है.
बहुत सारे लोग समझते रहे कि वह इंदिरा गांधी या कांग्रेस के खासमखास या कि चाटुकार थे पर यह सच नहीं है. हां, लंबे समय तक उनके समर्थक जरूर रहे. वैचारिक स्तर पर वह अपने आपको लिबरल और डेमोक्रेटिक विचारों का व्यक्ति मानते थे. शायद, इस नाते कांग्रेस और ऐसे अन्य दलों के नेताओं के साथ उनका संवाद और उठना-बैठना चलता रहता था. लेकिन सांप्रदायिकता जिसकी तरफ से हो, उस पर उन्होंने कभी समझौता नहीं किया. स्वर्ण मंदिर में सैन्य कार्रवाई-ऑपरेशन ब्लू स्टार के खिलाफ उन्होंने अपना पद्मभूषण का सरकारी सम्मान तक वापस कर दिया था.
आज के दौर में खुशवंत सिंह जैसी शख्सियत को निश्चय ही आदर और प्यार के साथ याद किया जाना चाहिए.
चतरा नरसंहार या बलिदान
इतिहास
चतरा जिले का इतिहास
प्रस्तुति - ज्ञान प्रकाश
चतरा , झारखंड के प्रवेशद्वार, विशेष रूप से छोटानागपुIर के पास, एक शानदार अतीत है जिसमें एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक विरासत है। यह भूमि मानवीय नाटक की ऐतिहासिक प्रगति के विचित्र असंतोष का मूक दर्शक है।
प्राचीन काल
यह कहा गया है कि अशोक के शासनकाल के दौरान 232 बीसी। “अतावी” या वन राज्यों ने भी मगध साम्राज्य की अतिमौजूदता को स्वीकार किया| ऐसा कहा जाता है कि समुद्रगुप्त ने छोटानागपुर के माध्यम से चलते हुए महानद की घाटी में दक्षिण कौशल के राज्य के खिलाफ पहला हमला करने का निर्देश दिया।
मध्यकालीन काल
तुगलक के शासनकाल के दौरान, छत्र दिल्ली सल्तनत के संपर्क में आया। औरंगजेब के शासनकाल में बिहार के मुगल गवर्नर दाऊद खान ने 5 मई 1660 को कोठी किले पर कब्जा कर लिया था और बहुत विरोध किए बिना वह कुंडे के किले की तरफ चले गए, जिसकी एक मजबूत तटस्थता थी क्योंकि यह एक पहाड़ी तट पर स्थित था। यह किला अंततः उनके द्वारा कब्जा कर लिया गया था और 2 जून, 1660 ईस्वी पर पूरी तरह से नष्ट हो गया था। 17 वीं सदी में रामदास राजा के कब्जे में कुंदा किला था। अलीवर्गी खान 1734 ई डी में कुंदा की ओर अग्रसर थे, टिकारी (गया) के विद्रोही जमींदारों को पराजित करने के बाद और फिर उन्होंने चतरा किला पर हमला किया और इसे ध्वस्त कर दिया।
आधुनिक काल
1769 ईसवी में पहली बार ब्रिटिश, इन क्षेत्रों के संपर्क में आया। यह ध्यान रखना दिलचस्प है कि राजा राम मोहन रॉय, प्रमुख सामाजिक सुधारक, 1805-06 में चतरा में ‘सिरिश्द्दर’ के रूप में काम करते थे एवं दोनों चतरा में रहते थे |
बिहार में राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में चतरा एक और आकर्षक अध्याय प्रदान करता है। 1857 के विद्रोह के दौरान छोटानागपुर में विद्रोहियों और ब्रिटिशों के बीच लड़ा जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई ‘चतरा की लड़ाई’ थी। यह निर्णायक लड़ाई 2 अक्टूबर 1857 को ‘फांसी तालाब के पास लड़ी गई थी यह एक घंटे तक चला था जिसमें विद्रोहियों को पूरी तरह हराया गया था। 56 यूरोपियन सैनिकों और अधिकारियों की मौत हुई जबकि 150 क्रांतिकारियों की मौत हो गई और 77 लोगों को एक गड्ढे में दफनाया गया। सूबेदार जय मंगल पांडे और नादिर अली खान को 4 अक्टूबर 1857 ए.डी.को उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। यूरोपीय और सिख सैनिकों को उनके हथियारों और गोला-बारूद के साथ अच्छी तरह से दफनाया गया। एक इंस्क्रिप्वर पट्टिका अभी भी मौजूद है।
वह शिलालेख सूचित करता है: “रामगढ़ बटालियन के विद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई में 2 अक्टूबर 1857 को हर महामहिम की 53 वीं रेजिमेंट पैर और सिपाही की एक पार्टी मारे गए थे। 53 वीं रेजिमेंट के 70 वें बंगाल मूल इंफैंट्री और सर्गेन्ट डी। डायन की लेफ्टिनेंट जे.सी.सी. डुन को युद्ध में विशिष्ट वीरता के लिए विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया था, जिसमें विद्रोहियों को पूरी तरह हराया गया था और उनके सभी चार बंदूकों और गोला-बारूद को खो दिया था।
दूसरी तरफ फांसी तालाब के तट पर शिलालेख दो क्रांतिकारी उपकारों को यहां के रूप में लाता है:-
“जय मंगल पांडे नादिर अली,
दोनो सूबेदार रे ,
दोनों मिलकर फांसी चढ़े ,
हरिजीवन तालाब रे । “
शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2023
रवि अरोड़ा की नजर से......
डराती है टिहरी झील / रवि अरोड़ा
न तो मैं भू वैज्ञानिक हूं और कायदे से न ही पर्यावरणविद मगर फिर भी इस बार जब टिहरी बांध के निकट गया तो माथे पर चिंता की लकीरें थीं। ऐसा होना स्वाभाविक भी था क्योंकि जोशीमठ की खबरों ने भीतर तक हिला जो रखा है । ऐतिहासिक जोशीमठ शहर के छह सौ मकानों में अब तक दरारें आ ही चुकी हैं और बेशक मीडिया में इसकी चर्चा बंद करवा दी गई है मगर यह सिलसिला अभी थमा नहीं है। बताया गया है कि तीन हज़ार घर अभी और खतरे में हैं । हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि जोशीमठ की यह हालत क्यों हुई मगर एक अनुमान यह भी तो है कि शायद टिहरी डैम के कारण ही यह शहर धंस रहा है। सच्चाई क्या है सरकार ने इसका खुलासा अभी तक नहीं किया है मगर इस डैम के करीब जाकर तमाम आशंकाएं तो सिर उठाती ही हैं । वैसे यह सवाल भी तो दशकों से अनुत्तरीण ही खड़ा है तमाम बड़े खतरों के बावजूद आख़िर इतने बड़े बांध की जरूरत ही क्या थी ?
टिहरी झील में नौका विहार करते समय मुझे पूरा एहसास था कि मेरे पांवों के नीचे एक पूरा शहर जलमग्न पड़ा है। कुछ लोगों ने बताया कि कभी कभी जलमग्न मंदिर और किले आदि की चोटी पानी में दिखती भी है। उधर, झील के किनारे खड़े होने पर साफ नजर आया कि उसमें पानी का भंडार आजकल बेहद कम है। नौकायन कराने वाले ठेकेदार ने बताया कि मात्र डेढ़ दो महीने ही झील में पूरा पानी रहता है और बाकी दिन झील लगभग आधी ही भरती है। घर लौटकर एक स्थानीय पत्रकार से फोन पर बात की तो यह रोचक जानकारी मिली कि भागीरथी नदी पर बनी देश की सबसे बड़ी यह जल विद्युत परियोजना बेशक साल 2006 से कार्य कर रही है मगर इतने वर्षों में बस एक बार ही इसमें पूरी क्षमता यानि 830 मीटर तक का जल भराव किया गया है। और वह भी मात्र डेढ़ साल पहले 24 सितंबर 2021 को । अब जब बांध में पूरा पानी ही नहीं होता तो बिजली का पूरा उत्पादन भी कैसे हो । नतीजा 25 मिलियन यूनिट की क्षमता वाली यह परियोजना मात्र 8 - 9 मिलियन यूनिट बिजली ही प्रतिदिन बना पाती है। यही नहीं इसके टरबाइन केवल सुबह शाम तब ही चलते हैं जब पीक आवर्स में नॉर्दन ग्रिड को अतिरिक्त बिजली की आवश्यकता होती है और बाकी समय यह प्रोजेक्ट बंद पड़ा रहता है।
समझ नहीं आया कि जब इस्तेमाल एक तिहाई क्षमता का ही करना था तो आखिर इतना बड़ा डैम क्यों बनाया ? क्यों करोड़ों लोगों का जीवन खतरे में डाला और हजारों को विस्थापित किया ? क्यों 8392 करोड़ रुपए इसमें झोंक दिए और पर्यावरण पर पड़ने वाले कुप्रभाव की भी परवाह नहीं की ? चलिए पूर्व की सरकारों ने जो कर दिया सो कर दिया मगर वर्तमान सरकार अब क्या कर रही है ? जोशीमठ में जो हो रहा है उसके मद्देनजर इसकी फिर से कड़ी समीक्षा क्यों नहीं कर रही ? खबरें आ रही हैं कि टिहरी डैम के आसपास के कुछ गांवों से भी आजकल दीवारें दरक रही हैं। पर्यावरणविद तो पहले ही इसकी आशंका जता चुके हैं। संसदीय समिति ने भी इस पर अपनी चिंता जताई है। क्या केन्द्र और राज्य सरकार को अब इस बांध से जुड़े खतरों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए ? ऐसे में जब कहा जाता रहा है कि डैम टूटा तो हरिद्वार और ऋषिकेश पूरी तरह डूब जायेंगे और बांध का पानी मेरठ तक आ जायेगा, मुझ जैसे कमजोर दिल वाले का तो उसके पास जाकर घबराना स्वाभाविक ही है। वैसे उक्त पंक्तियां पढ़ कर चिंतित तो आप भी हो रहे होंगे।
गुरुवार, 2 फ़रवरी 2023
बेकर, बजट, संसद और नार्थ ब्लाक / विवेक शुक्ला
विवेक शुक्ला
निर्मला सीतारमण ने सन 1921 में बने संसद भवन में देश के साल 2023-24 का बजट पेश कर दिया। इसके साथ ही अब तय माना जा रहा है कि हरबर्ट बेकर के डिजाइन की गई इस अप्रतिम इमारत में अंतिम बार देश का आम बजट पेश हो गया है। संसद भवन (पहले काउंसिल हाउस) का डिजाइन तैयार करते हुए बेकर को नई दिल्ली के चीफ आर्किटेक्ट एडविन लुटियंस का सहयोग मिलता रहा था। अब अगला आम बजट नई संसद भवन में ही पेश होगा। बेशक, मौजूदा संसद भवन की चर्चा किए बगैर स्वतंत्र भारत का इतिहास लिखा नहीं जा सकता है। इसी संसद भवन में शहीद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल,1929 को बम फेंका था। तब इसे काउंसिल हाउस कहते थे। यहां ही पंडित नेहरू के नेतृत्व में बनी अंतरिम सरकार में वित्त मंत्री लियाकत अली खान ने 2 फरवरी,1946 को अंतरिम बजट पेश किया। वे बजट पेपर अपने राजधानी के हार्डिंग लेन (अब तिलक लेन) के आवास से लेकर संसद भवन गए थे।
लियाकत खान ने अपने बजट प्रस्तावों को सोशलिस्ट बजट बताया। पर उनके बजट से व्यापारी वर्ग ने काफी नाराजगी जताई थी। उन पर आरोप लगे थे कि उन्होंने हिन्दू विरोधी बजट पेश किया। उन्होंने व्यापारियों पर एक लाख रुपये के कुल मुनाफे पर 25 प्रतिशत कर लगाने का प्रस्ताव रखा। कोरपोरेट टैक्स को दो गुना कर दिया। चाय के निर्यात पर भी एक्सपोर्ट ड्यूटी को दो गुना कर दिया। यहां पर ही पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 14-15 अगस्त, 1947 की रात को आयोजित एक गरिमामय कार्यक्रम में स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी।
- खुशवंत सिंह ‘रोमास ऑफ दिल्ली’ में संसद भवन के ठेकेदार लछमन दास के बार में लिखते हैं, ‘लछमन दास सच्चाई और नेक नीयती की मिसाल थे। उन्होंने संसद भवन के निर्माण में कभी घटिया सामग्री का इस्तेमाल नहीं किया। वे अपने मुलाजिमों को वक्त पर वेतन देते थे।’
इसके साथ ही,1931 में बने नार्थ ब्लाक का भी केन्द्रीय बजट से संबंध अब लंबा चलता नजर नहीं आ रहा है। सरकार सेंट्रल विस्टा को नए सिरे से री-डवलप करने के क्रम में नार्थ और साउथ ब्लाक को संग्रहालय के रूप में तब्दील करने का मन बना चुकी है। यानी आने वाले सालों में बजट किसी अन्य़ इमारत में तैयार होगा।
- केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट भाषण को केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी संसद भवन में सुन रहे थे। वे उसी 6-ए कृष्ण मेनन मार्ग ( पहले किंग जॉर्ज एवेन्यू) के बंगले में रहते हैं जो कभी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तथा हरबर्ट बेकर का सरकारी आवास हुआ करता था।
दरअसल संसद भवन से आप चाहें तो नार्थ ब्लाक की इमारत को आराम से देख सकते हैं। भारत के केन्द्रीय बजट का इन दोनों इमारतों से अटूट रिश्ता रहा है। नार्थ ब्लाक में बजट को तैयार किया जाता है। यहां पर वित्त मंत्री अपने सहयोगियों के साथ दिन-रात मेहनत करके बजट को अंतिम रूप देते हैं। इससे पहले, इनसे अलग-अलग क्षेत्रों के नुमाइंदे तथा जानकार मिलते हैं। ये सरकार से गुजारिश करते हैं कि उनके क्षेत्रों को बजट प्रस्तावों में लाभ मिले। नार्थ ब्लाक की बेसमेंट में स्थित प्रिटिंग प्रेस में वित्त मंत्री का बजट भाषण छपता है। उसे संसद में पढ़े जाने से पहले वित्त मंत्री की कोर टीम के कुछ सदस्य ही देख पाते हैं। इस सारी प्रकिया के बाद बजट को वित्त मंत्री की तरफ से संसद भवन में पेश किया जाता है। यह मोटा-मोटी सबको पता है।
पर यह सबको नहीं पता कि नार्थ ब्लाक तथा संसद भवन का डिजाइन बनाने में प्रख्यात आर्किटेक्ट हरबर्ट बेकर का अहम रोल था। वे चोटी के आर्किटेक्ट थे और नई दिल्ली के चीफ आर्किटेक्ट एडविन लुटियंस के सहयोगी थे।हरबर्ट बेकर ने भारत आने से पहले 1892 से 1912 तक दक्षिण अफ्रीका और केन्या में अनेक सरकारी भवनों और चर्चों के भी डिजाइन बनाए थे। पर उन्होंने यहां किसी चर्च का डिजाइन नहीं तैयार किया। बेकर ने नार्थ ब्लाक के साथ-साथ साउथ ब्लाक,जयपुर हाउस हैदराबाद हाउस, बडौदा हाउस वगैरह को भी डिजाइन किया था। उन्होंने और लुटियंस ने मिलकर संसद भवन ( तब काउंसिल हाउस) को डिजाइन किया था। लुटियंस के आग्रह पर बेकर साल 1912 में भारत आए। दोनों पहले से मित्र और एक आर्किटेक्ट फर्म में सहयोगी रहे थे। हालांकि बाद के दौर में लुटियंस भी बेकर की अदभुत क्षमताओं से आतंकित रहने लगे थे। संसद भवन का डिजाइन बनाते वक्त दोनों में लगातार मतभेद रहने लगे थे। उन्होंने गंभीर रूख ले लिया था। बेकर चाहते थे कि संसद भवन का डिजाइन त्रिभुजाकार हो। पर लुटियंस गोलाकार इमारत खड़ी करने के हक में थे। जाहिर है, अंत में लुटियंस के हिसाब से ही संसद भवन का निर्माण हुआ। आखिर उनकी सरपरस्ती में नई दिल्ली की सब सरकारी इमारतें बन रही थीं।
मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में स्थित चौसठ योगिनी मंदिर से भारतीय संसद की वास्तुकला प्रेरित बताई जाती है। माना जाता है कि देश के संसद भवन की डिजाइन इसी मंदिर से प्रेरित होकर बनाया गया है। बेकर-लुटियंस ने इस मंदिर को आधार मानकर संसद भवन का निर्माण किया था।
बेकर राष्ट्रपति भवन ( पहले वायसराय हाउस) के निर्माण के समय लुटियंस को सहयोग कर रहे थे।यह कहना होगा कि इतनी आइकॉनिक इमारतों का डिजाइन करने वाले शख्स को पर्याप्त पहचान नहीं मिली। वे इस लिहाज से बदनसीब ही रहे।बेकर की इमारतों में जालियां और छज्जे अवश्य मिलते हैं।
ब्रिटेन के शहर कैंट में 9 जून 1862 को जन्में बेकर बेकर बार-बार राजस्थान निकल लेते थे। वहां की पुरानी हवेलियों से लेकर किलों का अध्ययन करते। इसलिए ही उनके काम में ब्रिटिश तथा भारतीय वास्तुकला का अद्भुत संगम दिखाई देता है।उनकी डिजाइन की हुई इमारतों में भव्यता है। वे हरियाली के लिए स्पेस चाहते थे। बेकर किसी बिल्डिंग का डिजाइन तैयार करते वक्त आगे के 75-80 वर्षों के बारे में सोचते थे। संसद भवन तथा नार्थ ब्लाक को देखकर यह बात साबित हो जाती है। ये दोनों अब भी नई-समकालीन इमारतें ही लगती हैं।
Vivek Shukla Navbharattimes 2 February 2023
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बुधवार, 1 फ़रवरी 2023
आईआईएमसी के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी को 'हिंदी गौरव अलंकरण' सम्मान*
19 फरवरी को इंदौर में होगा अलंकरण समारोह
*नई दिल्ली,. *भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी), नई दिल्ली के महानिदेशक प्रो. (डॉ.) संजय द्विवेदी* को वर्ष 2023 का *'हिंदी गौरव अलंकरण'* सम्मान देने की घोषणा की गई है। प्रो. द्विवेदी के साथ प्रख्यात साहित्यकार एवं इतिहासविद् *डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित* को भी 'हिंदी गौरव अलंकरण' से सम्मानित किया जाएगा। *मातृभाषा उन्नयन संस्थान* द्वारा *19 फरवरी* को *इंदौर* में आयोजित समारोह में अनेक महत्वपूर्ण साहित्यकार हिस्सा लेंगे।
मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष *डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'* ने बताया कि अलंकरण का यह चौथा वर्ष है। हिंदी के प्रचार और विस्तार के लिए 'मातृभाषा उन्नयन संस्थान' द्वारा प्रतिवर्ष दो हिंदी साधकों को 'हिंदी गौरव अलंकरण' से विभूषित किया जाता है। इस अलंकरण में चयनित विभूतियों की दो श्रेणी है, एक हिंदी साहित्य और दूसरी हिंदी पत्रकारिता। चयन समिति द्वारा वर्ष 2023 के लिए डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित के हिंदी साहित्य एवं प्रो. संजय द्विवेदी के हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में दिये गए योगदान को रेखांकित करते हुए 'हिंदी गौरव अलंकरण' प्रदान किये जाने की घोषणा की गई है।
प्रो. संजय द्विवेदी देश के प्रख्यात पत्रकार, मीडिया प्राध्यापक, अकादमिक प्रबंधक एवं संचार विशेषज्ञ हैं। डेढ़ दशक से अधिक के अपने पत्रकारिता करियर के दौरान वह विभिन्न मीडिया संगठनों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का निर्वहन कर चुके हैं। प्रो. द्विवेदी माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के प्रभारी कुलपति भी रहे हैं। वह कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर में पत्रकारिता विभाग के संस्थापक अध्यक्ष भी रह चुके हैं।
प्रो. द्विवेदी वर्तमान में भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई), पुणे की सोसायटी एवं गवर्निंग काउंसिल के सदस्य हैं। वह महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा; विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन; मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद एवं असम विश्वविद्यालय, सिलचर के 'बोर्ड ऑफ स्टडीज' के सदस्य हैं।
राजनीतिक, सामाजिक और मीडिया के मुद्दों पर उनके 3000 से ज्यादा लेख विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होंने 32 पुस्तकों का लेखन एवं संपादन किया है। वह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा अनुमोदित शोध पत्रिकाओं 'कम्युनिकेटर' एवं 'संचार माध्यम' के प्रधान संपादक हैं। प्रो. द्विवेदी 'राजभाषा विमर्श' एवं 'संचार सृजन' के प्रधान संपादक तथा 'मीडिया विमर्श (त्रैमासिक)' के मानद सलाहकार संपादक भी हैं। मीडिया क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।
रवि अरोड़ा की नजर से.........
ताड़ने वालों की दुनिया / रवि अरोड़ा~
धीरेंद्र शास्त्री यानि बागेश्वर धाम सरकार का खेल समझने के लिए कई बार उसके वीडियो देखने की कोशिश की मगर हरबार पांच मिनट से ज्यादा झेल नहीं पाया। बाबा की फैंसी वेशभूषा, बात बात पर ताली बजाना और तरह तरह के खेल तमाशे तो जैसे तैसे बर्दाश्त कर भी लेता था मगर ज़हर में डूबी उसकी बातें कतई सहन नहीं हो पाती थीं। माना कि हम भारतीय हैं ही इस लायक कि कमअक्ल और हल्के वकार के लोग हमारे दिलों पर राज करें मगर फिर भी हमारी कमअक्ली की कोई परीक्षा ले, यह भी तो ठीक नहीं। वैसे मुझे यह बात पूरी तरह स्वीकार है कि समाज की कई सतह होती हैं और यहां हर तरह के विचार की पूरी गुंजाइश है। इसी का लाभ शास्त्री जैसे लोग लें तो क्या हैरानी है। गए ज़माने में नज़ीर अकबराबादी अपने आदमीनामा में समझा भी गए थे कि हर तरह का आदमी है यहां। इबादत करने वाला, उसकी जूती चुराने वाला और यहां तक कि उसको ताड़ने वाला सब आदमी ही तो हैं।
देखकर हैरानी हुई कि मात्र बारहवीं पास 26 साल के एक नए नए बाबा धीरेंद्र शास्त्री के यूट्यूब पर 37 लाख फालोअर हैं और फेसबुक पर भी 40 लाख लोग उससे जुड़े हुए हैं। बडे़ बड़े मंत्री संत्री बाबा के मुरीद हैं और बाबा के जिले छतरपुर का पूरा जिला प्रशासन बाबा की उंगलियों पर नाच रहा है। गांव के तालाब और श्मशान पर बाबा के लोगों का कब्जा है और इलाके में प्रॉपर्टी का खेल शुरू हो गया है। कुछ अरसा पहले साइकिल पर चलने वाला बाबा अब चार्टेड प्लेन और लंबी लंबी गाड़ियों के काफ़िले के साथ चलता है। बाबा भी प्रसिद्धि के सारे टोटके सीख गया है और सोशल मीडिया के सहारे घर घर पहुंच रहा है । उसके वीडियो तकनीकि रूप से समृद्ध लोग तैयार और पोस्ट कर रहे हैं। गूगल पर अपनी पहुंच बढ़ाने के सही कीवर्ड का इस्तेमाल और आकर्षक थंबनेल का भी भरपूर खयाल रखा जा रहा है। बाबा किसी कानूनी दांवपेंच में न फंसे इसकी भी निश्चित रूप से ट्रेनिग हो रही होगी और तमाम तरह की साम्प्रदायिक बातें अपनी प्रवचनों में करने के बावजूद बाबा को पता है कि क्या क्या स्पष्ट कहना है और क्या क्या इशारे इशारे में। बाबा की राजनीतिक समझ की भी दाद देनी पड़ेगी कि कांग्रेस से शुरू कर उसने बाद में भाजपा से अपनी पींगे बढ़ा लीं। बाबा को पता है कि केन्द्र और उसके कार्य क्षेत्र वाले राज्यों में जिस पार्टी की सरकार है, उसके साथ कदम ताल करने में ही भलाई है। यूं भी तमाम बाबाओं के लिए आज की तारीख में भाजपा से बेहतर भला और कौन सा राजनीतिक दल होगा ?
आपकी जानकारी के लिए मैं स्पष्ट कर दूं कि मुझे इस बाबा की बढ़त से कतई कोई दिक्कत नहीं है। मैंने तो पहले ही मान लिया है कि समाज की कई सतह होती ही हैं। मुझे तो परेशानी इस बात से है कि समाज की तमाम सतहों में अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के श्याम मानव जैसे लोग इतनी निचले पायदान पर क्यों हैं ? श्याम मानव वही हैं जिन्होंने बाबा के चमत्कारों को चुनौती दी थी और उन्हीं के डर कर बाबा नागपुर छोड़ कर भाग गया था। श्याम मानव पिछले चालीस साल से तार्किकता और विज्ञान की अलख दुनियाभर में जगा रहे हैं अब तक सैंकड़ों फर्जी बाबाओं का पर्दाफाश कर चुके हैं। देख कर हैरानी हुई कि श्याम मानव के फेसबुक मात्र 12 हज़ार फालोअर हैं और उनके यूट्यूब चैनल को भी मात्र 15 हजार लोगों ने अभी तक सबस्क्राइब किया है। श्याम मानव इकलौते ऐसे इंसान नहीं हैं। जादू टोने और चमत्कारों के नाम पर भोली भाली जनता को ठगने वाले फर्जी बाबाओं का पर्दाफाश करने वाले नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एमएम कलबुर्गी और गौरी लंकेश जैसे लोगों को भी हम भला उनकी हत्या से पहले कहां जानते थे । जनाब! इबादत करने वाले और उनकी जूतियां चुराने वालों को तो देख ही रहे हो मगर कुछ निगाहे करम श्याम मानव जैसे ताड़ने वालों पर भी हो जाए । आज के दौर में इनकी ज्यादा जरूरत है।
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