मंगलवार, 31 अगस्त 2021

बीबीसी की शोख चहेती आवाज रजनी कौल क़ो नमन

 रेहान फ़ज़ल


बीबीसी हिन्दी की सबसे चहेती और बीबीसी श्रोताओं की दीदी, रजनी कौल का आज दिल्ली में निधन हो गया है। वे 93 वर्ष की थीं और पिछले दो सालों से फ़रीदाबाद के एक आरोग्य सदन में रहती थीं। रजनी जी को पढ़ने और नई-नई दिलचस्प जानकारियाँ जुटाने का बड़ा शौक़ था। बीबीसी हिन्दी में उन्हें उनकी ख़ुशमिज़ाजी, मिलनसारी और सहयोग तत्परता की वजह से जाना जाता था जो उनके लेखन और इंद्रधनुष जैसे रेडियो कार्यक्रमों में भी झलकती थी। उनके जाने से लगता है मानो बीबीसी हिन्दी की मुस्कराहट चली गई है।


पेशावर के एक संभ्रान्त परिवार में जन्मी रजनी कौल अपने आप को हिंदू पठान कहती थीं। पंजाबी और कश्मीरी के अलावा वे पश्तो बोल सकती थीं और बडे़ चाव से पश्तो लोकगीत गाया करती थीं। रजनी जी ने प्रसारण की शुरुआत आकाशवाणी से की जहाँ उन्होंने पश्तो के साथ-साथ हिंदी में प्रसारणों में भाग लिया। ब्रिटन में हिन्दुस्तानी टीवी कार्यक्रमों का सूत्रपात करने वाले उर्दू और हिन्दी के जाने-माने प्रसारक स्वर्गीय महेन्द्र कौल के साथ विवाह होने के बाद वे अमरीका गईं जहाँ उन्होंने कौल साहब के साथ वॉयस ऑफ़ अमेरिका की हिन्दी सर्विस में काम किया और पुस्तकालय विज्ञान में विशेषज्ञता हासिल की।


वॉयस ऑफ़ अमेरिका में क़रीब आधा दशक काम करने के बाद साठ के दशक में स्वर्गीय महेन्द्र कौल को बीबीसी हिन्दी ने लन्दन बुलाया और उनके साथ रजनी जी ने भी बीबीसी हिन्दी सेवा में काम करना शुरू किया। यहाँ समाचार और सामयिक चर्चाओं के कार्यक्रमों के साथ-साथ बालजगत और इंद्रधनुष जैसे साप्ताहिक कार्यक्रमों के ज़रिए उन्होंने अपनी ख़ास पहचान बनाई जहाँ वे दुनिया भर से जुटाई दिलचस्प जानकारियों को अपने स्वाभाविक चुटीले अंदाज़ में पेश करती थीं। उस ज़माने में इंटरनेट और गूगल जैसे साधन नहीं थे। भारत में टेलीविज़न भी अपने शैशव काल में था। इसलिए रजनी जी के कार्यक्रम श्रोताओं के लिए दिलचस्प जानकारियों की साप्ताहिक ख़ुराक का काम करते थे।


रजनी कौल का जाना रेडियो प्रसारण की दुनिया के लिए एक अपूरणीय क्षति है। आकाशवाणी, वॉयस ऑफ़ अमेरिका और बीबीसी के उनके साथियों और श्रोताओं को उनका हँसमुख व्यक्तित्व, रचनाशीलता और मानवीय संवेदना हमेशा याद रहेगी।

सोमवार, 30 अगस्त 2021

केंद्रीय सांख्यिकी संगठन की ताज़ा रिपोर्ट से खुलासा

 केंद्रीय सांख्यिकी संगठन ने ताजा रिपोर्ट में कहा कि बांग्लादेश प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत से 27 प्रतिशत आगे निकल गया है लेकिन इसी कोरोना काल में अम्बानी और अडानी की संपत्ति में बेहताशा वृद्धि भी हुई है। जजीडीपी, महंगाई, बेरोजगारी पर क्या ही बात करूं फिलहाल देश की एक बड़ी समस्या पर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं। वैसे मोदी समर्थक आंकड़ों में तो विश्वास नहीं करते हैं क्योंकि वे केवल कहते हैं हिन्दू जनसंख्या घट रही है लेकिन कितने हिन्दू देश छोड़कर भाग रहे हैं और क्यों इसपर आप तो कम से कम एक नज़र डालो।


वर्ल्ड वेल्थ की रिपोर्ट के मुताबित 2000 से लेकर 2014 तक कुल 61 हजार केवल करोड़पति लोगों ने देश छोड़ दिया था। जबकि 2015 से 2019 केवल 4 वर्षों में देश छोड़ने वालों में गजब वृद्धि हुई है जिनमे लगभग 25 हजार भारतीय करोड़पति शामिल हैं। यह आंकड़े केवल अरबपति, करोड़पतियों के हैं जबकि अन्य लोगों के देश छोड़ने का आंकड़ा बहुत ज्यादा है लेकिन यह लोग देशद्रोही की श्रेणी में नहीं आते हैं क्योंकि यह अपना काम चुपचाप करते हैं। देशद्रोही उन्हें कहा जायेगा जो देश मे ही अपने हक अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे हैं। 


दुनिया भर में अरबपति पलायन करते हैं। चीन के बाद भारत दूसरे नंबर है जिसके अरबपति नागरिकता छोड़ देते हैं। न्यू वर्ल्ड वेल्थ की रिपोर्ट के अनुसार सबसे अधिक 2017 में 7000 अमीरों ने तथा 2019 में 5000 अमीर भारतीयों ने अबतक प्यारे और स्वर्ग से सुंदर भारत का त्याग कर दिया। सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेस(CBDT) ने  वर्ष 2019 के मार्च महीने में पांच लोगों की एक कमेटी बनाई है। यह देखने के लिए कि अगर इस तरह से अमीर लोग भारत छोड़ेंगे तो उसका असर कर संग्रह पर क्या पड़ेगा। इस तरह का पलायन एक गंभीर जोखिम है। ऐसे लोग टैक्स के मामले में ख़ुद को ग़ैर भारतीय बन जाएंगे जबकि इनके व्यापारिक हित भारत से जुड़े रहेंगे। यह रिपोर्ट इकोनोमिक टाइम्स में छपी है। इकोनोमिक टाइम्स ने इसे मुंबई मिरर के आधार पर लिखा है।  


2015 और 2017 के बीच 17000 अति अमीर भारतीयों ने भारत की नागरिकता छोड़ दी। हम नहीं जानते कि इन्होंने भारत की नागरिकता क्यों छोड़ी, किसी बात से तंग आ गए थे या असहिष्णु थे या दूसरे मुल्क भारत से बेहतर हैं? नौकरी के लिए जाना और दो पैसे कमाने के लिए रूक जाना, यह बात तो समझ आती है मगर जिस देश में आप पैसा कमाते हैं, सुपर अमीर बनते हैं, उसके बाद उसका त्याग कर देते हैं, कम से कम जानना तो चाहिए कि बात क्या हुई? हमारे पास उनका कोई पक्ष नहीं है, पता नहीं अपने दोस्तों के बीच क्या क्या बोलते होंगे? किस बात से फेड अप हो गए? इत्तेफ़ाक़ यह है कि वे ज्यादात्तर अथवा लगभग सभी ऊंची जातियों से ही हैं।


ऐसे समय में जब प्रधानमंत्री दावा कर रहे हैं कि दुनिया में भारत के पासपोर्ट का वज़न बढ़ गया है, ठीक उसी समय में 17000 अमीर भारतीय भारत के पासपोर्ट का त्याग कर देते हैं, सुन कर अच्छा नहीं लगता है। इस बात का खुलासा ही तब हुआ जब मॉर्गन स्टेनली इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट के मुख्य वैश्विक रणनीतिकार रुचिर शर्मा दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में एनडब्ल्यू वेल्थ सर्वे का हवाला देते हुए कहा कि अपना देश छोड़ने वाले करोड़पतियों में सबसे अधिक भारत से हैं। 


गौरतलब है कि कोई लोन न चुका पाने से भागा है तो कोई भ्रष्टाचार से धन जुटाने के बाद भागा है। जबकि वहीं देश के लाखों, करोड़ों मेहनतकश गरीब किसान-मजदूर बेरोजगारी, निर्धनता की मार से जूझ रहे हैं, अपने गांवों से पलायन कर रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि शासक वर्ग को आखिर क्या हुआ है कि पतली गली से धीरे-धीरे लगभग 23,000 भारत छोड़कर विदेशों में जा बसे हैं। क्या यह समझा जाये कि उन्हें हिंदुत्व से अलगाव हो गया है या फिर यह समझा जाये कि इनकी यही रणनीति और नियति है?


आपको बताते चलें कि बदलते भारत की इस दोहरी तस्वीर ने मूलनिवासी बनाम शासक वर्ग के बीच ऐसी चुगली की है कि बीते डेढ़ दशक के भीतर लगभग 21 फीसदी शासक जाति के लोग दौलतमंद हुए हैं, बाकी 79 फीसदी मूलनिवासी भुखमरी का दंश झेल रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की एक रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ है कि निकट भविष्य में आर्थिक गैरबराबरी काफी भयावह रूप लेने वाली है। स्विटजरलैंड की ज्यूरिख स्थित संस्था क्रेडिट सुईस तो बता रही है कि भारत में 53 फीसदी दौलत एक फीसदी शासक वर्ग धनकुबेरों के पास इकट्ठी हो चुकी है। 


देश की सबसे गरीब आबादी को सिर्फ 4.1 फीसदी संपत्ति का हिस्सा ही नसीब हुआ है। बताया गया है कि बीते दशक में वर्ष 2010 से 2015 के बीच देश की गरीब आबादी के हिस्से के संसाधन 5.3 फीसदी से घटकर 4.1 फीसदी रह गए, जबकि इसी दौरान देश की दौलत में लगभग 2.28 खरब डॉलर का इजाफा हुआ है। इस बढ़ोतरी का 61 फीसदी हिस्सा देश के एक प्रतिशत अमीरों के तिजोरी में चला गया है और 10 प्रतिशत हासिल कर लेने के साथ ये आंकड़ा 81 प्रतिशत पहुंच चुका है। आर्थिक असमानता के इस बेखौफ आंकड़े में भारत, अमेरिका से भी आगे निकल चुका है। 


ताजा आंकड़े उपलब्ध नहीं है लेकिन इतना जरूर है कि विदेशों में बसने की इच्छा जाहिर करने वालों में 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। कोरोना काल खत्म होते ही यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि भारतीय अमीर बड़ी संख्या में देश छोड़ सकते हैं। नेताओं और उधोगपतियों के बच्चे पहले ही विदेशों में सेटल है जबकि उनके व्यापार और राजनीति देश मे चलती रहती है। यह भी बड़ी वजह है कि मीडिया या समाज में राजनीतिक अव्यवस्था  को लेकर बड़ा हाहाकार नहीं दिखाई पड़ता है। बाकि आरोपित केवल वही होते रहेंगे जो व्यवस्था को सुदृढ बनाने की बातें करेंगे। #आर_पी_विशाल ।

अपने घुटने कभी मत बदलिये*

 🔴 *अपने घुटने कभी मत बदलिये* 

🙏🏻डॉ अशोक कुचेरिया🙏🏻

🔴50 साल के बाद धीरे-धीरे शरीर के जोडों मे से लुब्रीकेन्ट्स एवं केल्शियम बनना कम हो जाता है। 


🔴जिसके कारण जोडों का दर्द ,गैप, केल्शियम की कमी, वगैरा प्रोब्लेम्स सामने आते है, 


🔴जिसके चलते आधुनिक चिकित्सा आपको जोइन्ट्स रिप्लेस करने की सलाह देते है, 


🔴तो कई आर्थिक रुप से सधन लोग यह मानते है की हमारे पास तो बहुत पैसे है 


🔴तो घुटनां चेंज करवा लेते है।


🔴 किंतु क्या आपको पता है जो चीज कुदरत ने हमे दी है, 


🔴वो आधुनिक विज्ञान या तो कोई भी साइंस नही बनां सकती। 


🔴आप कृत्रिम जॉइन्ट फिट करवा कर थोडे समय २-४ साल तक ठीक हो सकते है। 


🔴लेकिन बाद मे आपको बहुत ही तकलीफ होगी। 


🔴जॉइन्ट रिप्लेसमेंट का सटीक इलाज आज मे आपको बता रहा हूँ ।


🔴वो आप नोट कर लीजिये और हां ऐसे हजारो जरुरतमंद लोगो तक पहुचाये जो रिप्लेसमेंट के लाखो रुपये खर्च करने मे असमर्थ है।  


🔴 *बबूल* नामके वृक्ष को आपने जरुर देखा होगा। 


🔴यह भारतमे हर जगह बिना लगाये ही अपने आप खडा़ हो जाता है, 


🔴अगर यह बबूल नामका वृक्ष अमेरिका या तो विदेशाें मे इतनी मात्रा मे होता तो आज वही लोग इनकी दवाई बनाकर हमसे हजारों रुपये लूटते । 


🔴लेकिन भारत के लोगों को जो चीज मुफ्त मे मिलती है उनकी कोइ कदर नही है। 


🔴प्रयोग इस प्रकार करना है 


🔴 *बबूल* के पेड पर जो *फली ( फल)* आती है उसको तोड़कर लाये, 


🔴अथवा तो आपको शहर मे नही मिल रहे तो किसी गांव जाये वहा जितने चाहिये उतने मिल जायेगें, उसको सुखाकर पाउडर बनाले। 


🔴और *सुबह १ चम्मच* की मात्रा में गुनगुने पानी से खाने के बाद, केवल 2-3 महिने सेवन करने से आपके घुटने का दर्द बिल्कुल ठीक हो जायेगा। 


🔴आपको घुटने बदलने की जरुरत नही पडेगी। 

🔴🙏🏻डॉ अशोक कुचेरिया🙏🏻                मो 9422913770       8237004503        

🔴इस मेसेज को हर एक भारतीय एवं हर एक घुटने के दर्द से पीड़ित व्यक्ती तक पहुचाये ताकि किसी गरीब के लाखों रुपये बच जाये।


विशेषज्ञों का कहना है कि इस संदेश को पढ़ने वाला प्रत्येक व्यक्ति इसे १० लोगों/ग्रुप तक भेज दे तो वह कम से कम एक व्यक्ति का जीवन रोगमुक्त कर सके🙏🏻🔴

रविवार, 29 अगस्त 2021

निबंधों की पुस्तक 'जाग मछन्दर जाग' से एक लेख / सुभाष चंदर


कृष्ण को कैद से निकालें / सुभाष चंदर 





हम अपने नायकों की शक्ति और क्षमता को पहचान नहीं पाते इसीलिए उनकी बातें भी नहीं समझ पाते। हम उनकी मानवीय छवि को विस्मृत कर उन्हें मानवेतर बना देते हैं, कभी-कभी अतिमानव का रूप दे देते हैं और उनकी पूजा करने लगते हैं। इसी के साथ उनके संदेशों को समझ पाने, उन्हें जीवन में उतार पाने की सारी संभावना से अपने-आप को वंचित कर देते हैं। जीवन के युद्ध में नायक का, उसके विचार का साथ रहना जरूरी होता है। किसी भी समाज का नायक कुछ खास मूल्यों, प्रतिबद्धताओं और आदर्शों का प्रतिनिधित्व करता है। उसका साथ रहना इसलिए जरूरी है कि हम लगातार उसके व्यवहार से, उसके आचरण से सीख सकें, उसकी शिक्षाओं से, उसकी कूटनय से, उसके राजनय से और उसके युद्ध कौशल से अपने को लैस कर सकें। यह तभी हो सकेगा, जब नायक सबके बीच होगा, सबके पास होगा, सबसे बात कर सकेगा, सबकी समस्याएं सुन सकेगा। अगर वह शरीर से नहीं भी है तो भी उसके विचारों को समझने के लिए सबसे जरूरी है कि हम उसे मनुष्येतर सत्ता न दें। क्योंकि ऐसा करते ही वह हमसे दूर हो जाता है, कभी-कभी निराकार और निस्संग भी। ऐसी हालत में कोई भी उससे क्या सीख सकता है, कैसे उसकी मदद हासिल कर सकता है। यहीं से उसे पूजने की परिपाटी आरंभ हो जाती है। हमारे देश में यह गलती बार-बार दुहरायी गयी। यहां राम, कृष्ण, बुद्ध और कबीर के जीवन और शिक्षाओं को समझने की जगह उन्हें महामानव बना दिया गया, उनकी पूजा की जाने लगी, कतिपय स्थितियों में उन्हें भगवान का दर्जा देकर समाज और देश के लिए अनुपयोगी बना दिया गया।

हर साल कृष्ण जन्माष्टमी मनायी जाती है। लाखों लोग कृष्ण मंदिरों में जुटते हैं, ढोल-मजीरा बजाते हैं, कृष्ण के जन्म का उल्लास मनाते हैं। हर साल कंस मारा जाता है, दुर्योधन पराजित होता है, जरासंध और शिशुपाल का वध हो जाता है, पूतना और बकासुर मारे जाते हैं, पर यह सब सिर्फ नाटकों में होता है, असली जीवन में न कंस मरता है, न दुर्योधन, न जरासंध। बल्कि हर जन्माष्टमी के बाद इनकी संख्या बढ़ जाती है। आये दिन हर शहर चीरहरण का साक्षी बनता रहता है। आज के पांडुपुत्रों की बांहें नहीं फड़कती, वे दुर्योधन के विनाश की शपथ नहीं लेते। सच तो ये है कि द्रोपदियों के अपमान से उन्हें कोई मतलब नहीं। वह न उनकी रुचि का विषय रह गया है, न उनकी जिम्मेदारी। जो पांडुपुत्रों की तरह बहादुर, सत्यनिष्ठ और अपने अधिकार के लिए लड़ने का दिखावा करते हैं, उनमें से ज्यादातर दुर्योधनों के साथ गोपनीय दुरभिसंधि रखते हैं, उसका लाभ उठाते हैं। आज के हालात बहुत विकट हैं। कृष्ण को भगवान बनाकर कुछ चालाक लोग बिचौलियों की भूमिका में आ खड़े हुए हैं। कोई भी सीधे कृष्ण तक नहीं पहुंच सकता। वे महासमर के मैदान से निकलकर मंदिरों में पहुंच गये हैं। वहां पुजारियों ने उन्हें घेर रखा है। उन पर इतनी फूल-मालाएं डाल दी हैं कि वे उससे बाहर देख ही नहीं सकते। कुछ कथाकारों ने कृष्ण तक पहुंचाने का ठेका ले लिया है और गाजे-बाजे के साथ मंच हथिया लिया है। इस तरह जैसे उन्होंने कृष्ण के नायकत्व और ईश्वरत्व की समझ का पेटेंट अपने नाम करा लिया है। भगवान होते ही कृष्ण ने अपना जननायकत्व खो दिया है। अब वे सबको नहीं मिल सकते, केवल भक्तों को ही उपलब्ध हो सकते हैं, वह भी बिचौलियों के माध्यम से।

कृष्ण का नायकत्व बहुत सोची-समझी रणनीति के तहत हजारों वर्षों के प्रयास से छीना गया है। हर प्रकार की अनीति, अन्याय, शोषण और ज्यादती के खिलाफ युद्ध को तत्पर एक जननेता को अनगिनत चमत्कार कथाओं से महिमामंडित करके पहले उसे उसके प्रियजनों से अलग किया गया और फिर हजारों गोपियों के रास-रंग मंडल में नचाकर उसे एक बिगलित रसनायक की तरह प्रस्तुत कर दिया गया। इसका औचित्य और इसकी महिमा बताने के लिए तमाम रहस्यमय तिलस्मी कथाएं गढ़ डाली गयीं। इस तरह बड़े ही सधे षडयंत्र के तहत सुदामाओं को कृष्ण के अनुग्रह से और उच्च वर्ग के मनमानेपन से त्रस्त द्रोपदियों को शक्तिसंपन्न सामाजिक नेतृत्व के संरक्षण से वंचित कर दिया गया। इस साजिश में पुजारियों, कथावाचकों और शासक वर्ग की संलिप्तता स्पष्ट दिखायी पड़ती है। इन सबने मिलकर कुछ ऐसा इंद्रजाल रचा कि पीढ़ियां दर पीढ़ियां उसके सम्मोहन का शिकार होती गयी। परिणाम यह हुआ कि कृष्ण अपनी सत्ता और अपने विचार के साथ आम भारतवासी से दूर होते चले गये और कुछ खास लोगों के फायदे के औजार बन गये। ऐसे लोग अब भी भाग्य और भगवान की आड़ में कृष्ण कीर्तन की कमाई से आलीशान जिंदगी जी रहे हैं। कृष्ण को इस कैद से निकालने की जरूरत है। वह भौतिक रूप से भले हमारे बीच न हों पर इतिहास के एक लोकनायक के रूप में, आततायियों द्वारा सताये जा रहे लोगों की लड़ाई के लिए एक विचारपुंज के रूप में उन्हें फिर से खोज निकालने की जरूरत है।

वह कृष्ण कहां गये, जिन्होंने हमेशा न्याय का साथ दिया? उनका खुद का संघर्ष अन्यायी और उत्पीड़क सत्ता के विरुद्ध था। उनमें अद्भुत संगठन कौशल था और वे स्वयं किसी भी संघर्ष में अपने लड़ाकू दस्ते का नेतृत्व करने में, सबसे आगे रहने में यकीन करते थे। उनमें शौर्य, साहस और आगे बढ़कर हर चुनौती से टकराने का हौसला था। अपने वर्गशत्रु को किसी   भी तरह पराजित करना उनकी रणनीति का अनिवार्य तत्व हुआ करता था। ताकतवर दुश्मन को ढेर करने के लिए दो कदम आगे बढ़कर एक कदम पीछे लौटने में उन्हें कभी परेशानी नहीं होती थी। अगर न्याय के पक्ष में कभी छल की जरूरत पड़ी तो उन्होंने न संकोच किया, न विलम्ब। उनके पराक्रम में कोई चमत्कार नहीं दिखता, शक्ति और साहस जरूर दिखता है। दुश्मन को घेरकर मारने में उन्हें कतई कोई कठिनाई नहीं आती थी। नैराश्य के क्षणों  में किस तरह अपने सेनानियों में आशा का संचार किया जाना चाहिए, गीता में अर्जुन को दिये गये उनके संदेश से समझा जा सकता है। एक नायक की यह मनोवैज्ञानिक भूमिका मुग्धकारी है। सेना को लगातार अपने नायक के संकेतों की समझ होनी चाहिए। युद्ध में उसकी सुरक्षा भी जरूरी है क्योंकि सेनापति अगर संकट में पड़ता है तो सेना बिखर सकती है। कृष्ण इस रणकौशल को समझते थे, इसीलिए उन्होंने कहा-मामनुस्मर युद्ध च। मतलब युद्ध करो पर मुझे भूलो नहीं, मेरा स्मरण करते रहो। इसका अर्थ यह है कि लड़ते समय भी अपने नेता की, अपने सेनापति की, अपने नायक की चिंता बनी रहनी चाहिए क्योंकि उसी की समर-नीति से विजय हासिल होगी।

इस कृष्ण को हमें फिर से पाना होगा। चाहे उसके विचारों को समझकर या अपने भीतर उसे जगाकर। कृष्ण नाम है किसी भी जुल्म के विरुद्ध पहल का, दमनकारी ताकतों के खिलाफ संगठित प्रतिरोध का, शोषक और निष्क्रिय व्यवस्था के खिलाफ युद्ध के श्रीगणेश का, इमानदारी और मेहनत से अपना जीवन चलाने वाले आमजन की पक्षधरता का और सकारात्मक जनकल्याण की दिशा में परिवर्तन का। अपने में इस कृष्ण को धारण करना ही ज्ञान है। आज हम जिस अराजक, भ्रष्ट, स्वार्थांध और छल-कपट भरी छुद्रता का सामना कर रहे हैं, उसके प्रति तटस्थता ही अज्ञान है। समाज और देश की दुरवस्था और इसके कारक तत्वों की पहचान ही ज्ञान है। इस ज्ञान से भक्ति प्रकट होती है। भक्ति के मायने हैं प्रतिकूल परिस्थितियों को समाप्त करके समाज में नैतिक और मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिए दिल और  दिमाग से पूरी दृढ़ता और संकल्प के साथ खुद को तैयार करना। फिर कर्म की बारी आती है। वांछित और जनप्रिय व्यवस्था की वापसी के लिए संघर्ष ही कर्म है। गीता के ज्ञान, भक्ति और कर्म के त्रिमार्ग को आज के परिप्रेक्ष्य में समझना होगा, तभी कृष्ण की सार्थकता होगी और तभी उनकी प्रासंगिकता भी।

ऑनलाइन बनाम स्टेज ?

 आज बात ऑनलाइन बनाम स्टेज  कार्यक्रमों की ।

  ऑनलाइन और स्टेज कार्यक्रम दोनों में बड़ा फर्क है।स्टेज कार्यक्रम में आप सीधे श्रोताओं से संवाद करते हैं। उनके चेहरे तत्काल प्रतिक्रिया भी दे देते हैं कि आपकी प्रस्तुति कैसी है। उसी हिसाब से आप अपने वक्तव्य की सीमा भी नियत कर लेते हैं। ऑनलाइन कार्यक्रमों में ऐसा कम ही संभव हो पाता है।पहला डर तो यही रहता है कि हमारी शक्ल और आवाज़ श्रोताओं तक पहुंच भी रही है या नहीं। अधिकांशत: शुरुआत ही यहीं से होती है ' मेरी आवाज़ आ रही है ना ' । हमारे जैसे कमजोर तकनीक वाले लोगों के साथ ये बात और ज्यादा है जिनका आधा दिमाग मोबाइल को सहेजने और चेहरे को मोबाइल के केंद्र में रखने में ही लगा रहता है। कम से कम मैं तो कतई निश्चिंत होकर नहीं बोल पाता।  पूरे ऑनलाइन कार्यक्रम के दौरान टेंशन में रहता हूं। यही कारण है कि मैं   कुछ खास मित्रों के कारण या व्यंग्य के गंभीर कार्यक्रमों के कारण ही  हां कहता हूं। वरना यथासंभव ऑनलाइन आने से बचता हूं , गला खराब होने से लेकर  काम की अधिकता तक के सारे बहाने बना लेता हूं। जबकि आयोजक लोग समझते हैं कि मुझे घमंड  नाम की बीमारी लग गई है। पर असलियत तो वह है जो मैं आज बयान कर रहा हूं।सच तो यह है कि हमारे जैसे अधिकांश पुराने लोगों की यही स्थिति है। हम बस यही पूछते रह जाते हैं आवाज़ आ रही है या नहीं ? :)

दलित पुजारियों का नवजागरण दौर / रवि parashar

 कभी मंदिरों में जाने पर रोक थी, लेकिन अब बाक़ायदा करा रहे हैं पूजा-अर्चना!


रवि पाराशर



देश भर में जातीय आधारों में सिमटी दिखाई दे रही राजनीति के मौजूदा दौर में क्या आपको इस बात पर भरोसा होगा कि बहुत से हिंदू मंदिरों में अब वंचित दलित वर्ग के पुजारी भी पूजा-अर्चना करा रहे हैं? आपको विश्वास होना चाहिए कि ऐसा वास्तव में हो रहा है। असल में आप तक ऐसे सकारात्मक समाचार कम ही पहुंचते हैं। जातियों में बंटे सामाजिक ढांचे की दरारें पाटने की ख़बरों पर मीडिया का ध्यान कम जाता है, लेकिन जातीय आधार पर जनगणना की मांग पर बहस सुर्ख़ियों में है, क्योंकि यह सामाजिक उत्थान का नहीं, बल्कि राजनैतिक मसला या मसाला है। बहुत सी राजनैतिक पार्टियां इसका समर्थन कर रही हैं, जिनमें भारतीय जनता पार्टी की बिहार इकाई भी शामिल है। बिहार में बीजेपी जनता दल यूनाइटेड के साथ सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल है और केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व में गठबंधन की सरकार है। ऐसे में जातीय जनगणना के मुद्दे पर उसकी राजनैतिक विवशता या कशमकश को समझा जा सकता है। 

अब यह बात भी किसी से छुपी नहीं है कि जो लोग जातीय जनगणना के पक्ष में हैं, उनकी सियासत का मुख्य आधार अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी ही है। यह बात भी सब जानते हैं कि मंडल आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर देश में ओबीसी की औसत आबादी 52 प्रतिशत मान कर ही सारी पार्टियां चुनावी रणनीति बनाती हैं। केंद्र सरकार ने हंगामेदार मॉनसून सत्र में 127वें संविधान संशोधन विधेयक के माध्यम से ओबीसी आरक्षण की गेंद राज्यों के पाले में डाल दी है। अब राज्य इस बारे में सियासत करने का आरोप केंद्र पर नहीं लगा सकते। बहरहाल, लगता तो नहीं, फिर भी अगर केंद्र सरकार 1931 के बाद पहली बार जातीय जनगणना पर सहमत होती है, तो समाज में विभाजन की कुछ आभासी रेखाओं को पुष्ट आधार मिल जाएगा, इसमें कोई संदेह किसी को नहीं होना चाहिए। प्रश्न यह भी है कि ऐसे में सिर्फ़ हिंदू समाज के जातीय आंकड़े ही सामाजिक बंटवारे की असहिष्णु रेखाओं को गहरा करेंगे या फिर मुस्लिम समुदाय समेत सभी धर्मों के समाजों में विभाजन की अंतर्धाराएं ज़्यादा ज़हरीली और तेज़ाबी हो जाएंगी? जो भी हो, स्वतंत्रता प्राप्ति का अमृत महोत्सव मनाए जाने के दौर में किसी संवेदनशील भारतीय नागरिक को समाज को और अधिक बांटने वाली जातीय जनगणना का समर्थन नहीं करना चाहिए।   

जातीय आधार पर जनगणना की मांग के मुहाने पर बैठे उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव, 2021 को लेकर सरगर्मियां ज़ोरों पर हैं। बीजेपी की बिहार इकाई जातीय जनगणना की मांग में भले शामिल हो, लेकिन पार्टी में मोटे तौर पर इसे लेकर कोई सकारात्मक हलचल नहीं है। वंचित वर्ग के आर्थिक, सामाजिक उत्थान की राजनीति का दम भरने वाली बहुजन समाज पार्टी 2007 की तरह फिर से ब्राह्मण वर्ग पर डोरे डालने में जुटी है, तो नाम भर को समाजवादी रह गई अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी भी ब्राह्मणों के सहारे चुनावी वैतरिणी पार करने की फिराक में है। कुल मिलाकर लगता ऐसा है कि लोकतंत्र में अब चुनाव सिर्फ़ और सिर्फ़ जातीय आधारों पर ही लड़े जाने लगे हैं। विकास और दूसरे तमाम सकारात्मक मुद्दे कहीं पीछे छूटते जा रहे हैं और लोकतंत्र भी मोटे तौर पर जातितंत्र में बदलता जा रहा है? ऐसे में जातीय जनगणना का समर्थन नहीं किया जा सकता।

ऐसे माहौल में यदि समाचार आता है कि हिंदुओं की आस्था के केंद्र देश के बहुत से मंदिरों में अब वंचित समुदाय के पुजारी पूजा-अर्चना करा रहे हैं, तो महसूस होता है कि विषमता के तपते रिगिस्तान में समरसता के अमृत की बहुत सी बूंदें निर्बाध बरसने लगी हैं। विश्व हिंदू परिषद और उसकी सहयोगी संस्थाओं को हालांकि इस दिशा में अभी बहुत काम करना है, लेकिन सनातन समाज में समरसता क़ायम करने के उनके प्रयासों का स्वागत किया जाना चाहिए। वर्ष 1964 में वीएचपी अस्तित्व में आई और 29 अगस्त को उसका स्थापना दिवस होता है। इस वर्ष परिषद 58वां स्थापना दिवस मना रही है। आमतौर पर वीएचपी को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण आंदोलन से ही जोड़कर देखा जाता है, लेकिन संस्था भारत और विश्व में सनातन समाज की बेहतरी और ख़ुशहाली के लिए बहुत से स्तरों पर काम कर रही है। भेदभाव मिटाने के लिए संस्था का मुख्य मोटो है- एक मंदिर, एक कुआं, एक श्मशान – तभी बनेगा भारत महान। अपने इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए वीएचपी पुजारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रही है, जिसमें सभी जातियों के सुपात्र हिस्सा ले सकते हैं।

वीएचपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल बताते हैं कि अभी देश के दक्षिणी राज्यों में दलित-वंचित पुजारियों की संख्या अपेक्षाकृत रूप से अधिक है। अकेले तमिलनाडु में दलित समुदाय के पुजारियों की संख्या ढाई हज़ार से अधिक है। साथ ही आंध्र प्रदेश में भी वीएचपी ने वंचित वर्गों के बहुत से पुजारी तैयार किए हैं। संगठन अभी तक देश भर में दलित समुदाय के पांच हज़ार से ज़्यादा पुजारी तैयार होने को बड़ी सफलता मानता है। पहले जिन्हें मंदिरों में पूजा-अर्चना की अनुमति नहीं होती थी, वे ही अगर अब पूजा-अर्चना करा रहे हैं, तो यह भारतीय समाज में आया क्रांतिकारी बदलाव ही कहा जाएगा। वीएचपी का अर्चक पुरोहित विभाग और सामाजिक समरसता विभाग बिना किसी जातीय भेदभाव के इच्छुक व्यक्तियों को विधि-विधान से पूजा-अर्चना की विधि सिखा रहे हैं। प्रशिक्षण पूरा होने पर उन्हें बाक़ायदा प्रमाण पत्र भी दिया जाता है। आंध्र प्रदेश में तिरुपति बालाजी प्रबंधन ऐसे प्रमाण पत्र देता है।  

विनोद बताते हैं कि विश्व हिंदू परिषद अपनी स्थापना के बाद से ही समाज में छुआछूत ख़त्म करने के काम में लगी है। वर्ष 1969 में कर्नाटक के उडुपी में हुई धर्म संसद में इसके लिए बाक़ायदा संकल्प पारित किया गया। वर्ष 1994 में वाराणसी में हुई धर्म संसद में डोम राजा वीएचपी और संतों के निमंत्रण पर आए थे। नवंबर, 1989 में अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास भी कामेश्वर चौपाल के हाथों कराकर सामाजिक समरसता का संदेश दिया गया था।


पुजारी तैयार करने के मामले में विश्व हिंदू परिषद की लोकप्रियता का ही नतीजा है कि विपरीत विचारधारा को भी दलितों को पुजारी का दर्जा देने की दिशा में काम करना पड़ा। अक्टूबर, 2017 में केरल में त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड ने छह दलितों को आधिकारिक तौर पर पुजारी नियुक्त किया था। इससे पहले भी ग़ैर-ब्राह्मणों को पुजारी बनाया गया था, लेकिन दलितों को पुजारी का दर्जा सरकारी तौर पर पहली बार दिया गया। केरल में बोर्ड डेढ़ हज़ार से अधिक मंदिरों का संचालन करता है। वर्ष 2017 में बोर्ड ने देश में पहली बार इस मामले में सरकारी आरक्षण नीति का पालन किया। लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के बाद पिछड़े समुदाय के 36 उम्मीदवारों का चयन पुजारी के तौर पर किया गया, जिनमें से छह दलित समुदाय के थे। त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड के अध्यक्ष गोपालकृष्णन ने तब आशंका जताई थी कि दलितों को पुजारी बनाने के फ़ैसले का विरोध हो सकता है, लेकिन केरल की वाम मोर्चा सरकार के इस क़दम का वीएचपी ने स्वागत किया। वीएचपी के केंद्रीय संयुक्त महामंत्री डॉ. सुरेंद्र जैन ने कहा था कि ‘सुपात्र’ यानी शास्त्रीय सनातन पद्धति पर खरा उतरने वाला कोई भी व्यक्ति पूजा-अर्चना कराता है, तो इसमें कोई परेशानी नहीं है। 


हालांकि तब कुछ विचारकों ने यह भी कहा था कि आर्थिक रूप से कमज़ोर ब्राह्मणों के हितों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। उल्लेखनीय है कि ब्राह्मण समाज को भी अब सामाजिक अलगाव की भावना से दो-चार होना पड़ रहा है। ऐसे में पूजा-पाठ कराने के उनके स्वाभाविक अधिकारों का अतिक्रमण जातीय दुर्भावना के शमन और कुत्सित राजनैतिक उद्देश्यपूर्ति के लिए नहीं किया जाना चाहिए। बहरहाल, आशंकाओं के अनुरूप देश के ब्राह्मण समाज ने दलित पुजारियों की नियुक्ति का विरोध नहीं किया। हालांकि जुलाई, 2021 में त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड की एक अधिसूचना को केरल हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। अधिसूचना में कहा गया था कि सबरीमाला और मलिकप्पुरम मंदिरों में मुख्य पुजारी पद के लिए सिर्फ़ मलयाली ब्राह्मण ही आवेदन कर सकते हैं। याचिका में कहा गया कि बोर्ड की अधिसूचना से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 के तहत नागरिकों को मिले अधिकारों का उल्लंघन होता है।


भगवान राम को सामाजिक समरसता का सर्वोच्च प्रखर प्रतीक मानने वाली विश्व हिंदू परिषद ने भविष्य में आस्थावान समाज में जातीय भेदभाव मिटाने के प्रयास और तेज़ करने का मन बनाया है, तो यह स्वागत योग्य निर्णय है। भगवान राम ने अपने पूरे जीवन में समरसता का ही संदेश दिया, अशक्तों, उपेक्षितों को अपनाया, उन्हें न्याय दिलाया। राम ने कभी भेदभाव नहीं किया। सक्षम राजा होते हुए भी सीता के अपहरण के बाद रावण को दंड देने के लिए उन्होंने सुप्रशिक्षित, सुसज्जित क्षत्रिय सेना नहीं बुलाई, बल्कि अपने वनवासी मित्रों की सहायता से ही लक्ष्य प्राप्त किया। कुल मिलाकर सनातन आस्था के प्रति निष्ठावान जिन लोगों के भी हृदय में राम और रामत्व हो, वे पूजा-अर्चना कराने की पात्रता रखते ही हैं। इसमें भला किसी को क्या ऐतराज़ हो सकता है? 

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शुक्रवार, 27 अगस्त 2021

LATEST 100 भड़ास/ B4M

पत्नी के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाना अपराध नहीं!

गुरुवार, 26 अगस्त 2021

भारतीय_स्वतंत्रता_संग्राम_के_आरंभिक_शहीद

 भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के आरंभिक शहीद वीरपंड्याकट्टबोम्मन तमिलनाडु के एक महान देशभक्त थे। सन 1790 मे महज 30 वर्ष की अल्पायु मे वह पंचालनकुरुचि के शासक बने। उस काल मे दक्षिण भारत का एक बड़ा भाग आरकोट के नबाब के अधीन था। नबाब ने 1792 मे ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ एक समझौता किया था जिसके अंतर्गत उसने करों की वसूली का अधिकार ईस्ट इंडिया कंपनी को दे दिया था ।अपनी फितरत के अनुरूप ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश के रीति रिवाजों और परंपराओं की अनदेखी ही नहीं की वरन वह राजाओं से अधिक से अधिक धन वसूली के लिए निरंकुश भी हो गयी थी। अधिकांश स्थानीय राजाओं ने बिना किसी प्रतिरोध के कंपनी की तानाशाही कबूल कर ली थी और उनके दास बन गए थे। परंतु वीरपंड्या कट्टबोम्मन ने अंग्रेजों की दासता स्वीकार करने से इनकार कर दिया और कंपनी द्वारा अपनाए राजस्व समझौते की जम कर भर्त्सना भी की।


अंग्रेजों ने पंचालनकुरुचि किले पर अपना अधिकार करने की तमाम कोशिश की पर उनका हर प्रयास विफल ही रहा। यहाँ तक वीरपंड्या कट्टबोम्मन को छल से रामनाथपुरम मे गिरफ्तार करने के कंपनी के तिरुनेलवली के कलेक्टर डब्लू सी जैक्सन का प्रयास भी पूर्णतः विफल ही रहा। धीमे धीमे क्षेत्र के अधिकांश स्थानीय सरदार जिन्हे स्थानीय भाषा मे पालीगर कहा जाता था , कट्टबोम्मन को छोड़ कर कंपनी के वफादार बन गए , इससे कट्टबोम्मन के लिए परिस्थितियां विषम होने लगीं।


मैसूर और ब्रिटिश साम्राज्य की चौथी लड़ाई शुरू होने पर कट्टबोम्मन ने इस अवसर को लाभ मे परिवर्तित करने का निर्णय लिया और विद्रोहियों का एक संगठन बनाया। इस संगठन मे नागलपुरम , कुलातुर , कडालकुडी , कोलारपट्टी , मैलमंताई , ईझझरम्पनने के पालीगरों के अलावा रामनाथपुरम , शिवगंगा ,विरूपतची और स्थानीय लोग शामिल थे। सन 1799 मे कट्टबोम्मन ने कंपनी को कर देने से मना कर दिया और साथ ही साथ कंपनी अधिग्रहीत इलाकों पर आक्रमण भी कर दिया। उनके इस कदम को और बल मिल गया जब विद्रोही पालीगरों ने भी कंपनी को कर की किश्त का भुगतान करना बंद कर दिया।


अपनी किरकिरी से आगबबूला होकर , विद्रोही पालीगरों का दमन करने की इच्छा से मद्रास प्रेज़िडेन्सी के गवर्नर जनरल लॉर्ड वेलेजली एक विशाल फौज भेजी ।सन 1799 मे मेजर जॉन बैनेरमन ने कट्टबोम्मन के खिलाफ सैन्य कार्यवाही प्रारंभ की और कट्टबोम्मन को पालयमकोट्टई मे स्वयं मिलने की अंतिम चेतावनी दी। परंतु कट्टबोम्मन पर इसका कोई असर नहीं पड़ा । हारकर निराश मे ब्रिटिश फौजों ने 5 सितंबर 1799 को पंचालनकुरुचि किले पर हमला बोल दिया । दोनों पक्षों को भारी नुकसान हुआ। लेकिन जैसे मेजर जॉन बैनेरमन ने किले पर जल्द से जल्द कब्जा करने की योजना बनाई थी वह विफल हो गयी। कई दिनों तक बहादुरी से ब्रिटिश फौजों का सामना करने के बाद विद्रोहियों ने किले को खाली कर दिया।


कट्टबोम्मन और उनके साथियों को पुडुकोट्टई के निकट कालापोर के जंगलों मे पुडुकोट्टई के पालीगर विजया रघुनाथ तोंडईमान ने गिरफ्तार कर लिया और अंग्रेजों को सौंप दिया। 6 अक्टूबर 1799 को मेजर जॉन बैनेरमन ने इस बहादुर पालीगर कट्टबोम्मन को कायत्तर मे पालीगरों की एक सभा मे पेश किया। एक दिखावटी मुकदमा चलाने के बाद कट्टबोम्मन को 39 वर्ष की अल्पायु मे मौत की सजा सुना दी गई।


कट्टबोम्मन ने जीवन के अंतिम क्षणों मे भी अदम्य साहस का परिचय दिया। वह सम्राज्यवाद के एजेंटों के हाथों फांसी पर लटकना नहीं चाहते थे उन्होंने स्वयं ही निकट इमली के पेड़ पर लटकती हुई रस्सी उठाई और अपने आप ही स्वयं को फांसी लगा ली। इस प्रकार माँ भारती का यह सपूत स्वाधीनता संग्राम मे अपनी भारत भूमि के लिए प्रथमतः बलिदान देने वाले शहीदों के अग्रिम पंक्ति मे शामिल हो गए।


वीरपाण्ड्या कट्टबोम्मन के अदम्य साहस और बलिदान को मेरा शत शत नमन

सफर अभी जारी है ....

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डीयू: दीनबंधु एंड्रयूज से बेकर तक / विवेक शुक्ला

 साउथ दिल्ली में लाजपत नगर से आगे बढ़ते ही आप एंड्रयूज गंज में पहुंचेंगे। इधर आपको मिलेगा केन्द्रीय विद्लाय,एंड्रयूज गंज। गुस्ताखी माफ, अगर आपको नहीं पता तो बता दें दीनबंधु सी.एफ.एंड्रयूज के नाम पर एंड्रयूज गंज है। वे गांधी जी के मित्र थे और सेंट स्टीफंस कॉलेज में इंग्लिश पढ़ाते थे। वे अपने कॉलेज के संभवत: पहले विदेशी शिक्षक थे। उसके बाद पर्सिवल स्पियर और फिर डेविड बेकर इधर दशकों तक पढ़ाते रहे। ये दोनों इतिहास पढ़ाते थे। बेकर साहब का पिछले दिनों निधन हो गया।


एंड्रयूज ने 1904 से 1914 तक सेंट स्टीफंस कॉलेज में पढ़ाया। उन्होंने अपने को यहां शिक्षक तक सीमित नहीं रखा। उन्हीं के प्रयासों से ही गांधी जी पहली बार 12 अप्रैल-15 अप्रैल, 1915 को दिल्ली आए और सेंट स्टीफंस कॉलेज में रूके थे। तब सेंट स्टीफंस कॉलेज कश्मीरी गेट पर था। उस बिल्डिंग में अब दिल्ली चुनाव आयोग का दफ्तर चलता है।


 एंड्रयूज और गांधी जी दक्षिण अफ्रीका में मिल चुके थे। उन्होंने सेंट स्टीफंस कॉलेज के प्रिंसिपल सुशील कुमार रुद्रा से कहा था कि वे बापू को कॉलेज में आमंत्रित करें। रुद्रा साहब ने तब बापू को खत लिखा। फिर बापू दिल्ली में आए तो सेंट स्टीफंस कॉलेज में ही ठहरे। रुद्रा साहब का नाम फतेहपुरी की 150 साल पुरानी चर्च में भी लिखा हुआ है।


एन्ड्रयूज ने ब्रिटिश नागरिक होते हुए भी जलियांवाला बाग कांड के लिए ब्रिटिश सरकार को जिम्मेदार माना था। वे गुरुदेव टैगोर के भी करीबी रहे। शांति निकेतन में 'हिंदी भवन' की स्थापना उनके आश्रम में हुई थी। उन्होंने 16 जनवरी 1938 को शांति निकेतन में 'हिंदी भवन' की नींव रखी। 31 जनवरी 1939 को 'हिंदी भवन' का उद्घाटन पं० जवाहरलाल नेहरू ने किया था। वे तब वहां पर गुरुदेव टेगौर के साथ मौजूद थे। गुरुदेव की कूची से बना एन्ड्रयूज का एक चित्र सेंट स्टीफंस कॉलेज के प्रिंसिपल के कक्ष में लगा हुआ है। उनकी परम्परा को सेंट स्टीफंस कॉलेज में आगे लेकर गए इतिहासकार पर्सिवल स्पियर। वे इधर 1924-1940 तक पढ़ाते रहे। मतलब ये है कि वे भी कश्मीरी गेट की बिल्डिंग में ही रहे। 


सेंट स्टीफंस कॉलेज अपनी मौजूदा बिल्डिंग में 1941 में शिफ्ट हुआ था। स्पियर साहब ने भारत के इतिहास पर अनेक महत्वपूर्ण किताबें लिखीं। वे विशुद्ध अध्यापक और रिसर्चर थे। वे भारत के स्वाधीनता आंदोलन को करीब से देख रहे थे। पर वे उसके साथ या विरोध में खड़े नहीं थे। सेंट स्टीफंस कॉलेज छोड़ने के बाद वे ब्रिटिश सरकार के भारत मामलों के उप सचिव बन गए थे।


 उन्होंने भारत को छोड़ने के बाद इंडिया, पाकिस्तान एंड दि वेस्ट (1949),ट्वाइलाइट आफ दि मुगल्स (1951),दि हिस्ट्री आफ इंडिया (1966)समेत कई महत्वपूर्ण किताबें लिखीं। इन सबका अब भी महत्व बना हुआ। गालिब के दौर की दिल्ली? पर्सिवल स्पियर ने लिखा है कि दिल्ली सन 1781-82 के दौरान भयंकर भूखमरी के दौर से गुजरी थी। दिल्ली वाले दाने-दाने को मोहताज हो गए थे। 


स्पीयर लिखते है-“ उस भूखमरी के कारण दिल्ली के गांवों में सैकड़ों लोगों की जानें चली गईं थीं। उस आपदा का असर यहां के जीवन पर लंबे समय तक रहा।” पर्सिवल स्पियर को दिल्ली के सैकड़ों गांवों के समाज और जीवन की गहरी समझ थी। एन्ड्रयूज और स्पीयर की परंपरा के अंतिम समृद्ध हस्ताक्षर डेविड बेकर के निधन से सेंट स्टीफंस कॉलेज और दिल्ली यूनिवर्सिटी ने अपने एक गुरुओं के गुरु खो दिया है।


 बेकर का संबंध आस्ट्रेलिया से था। वे 1960 के दशक में रिसर्च के लिए भारत आए और फिर आधी सदी से अधिक समय तक यहां इतिहास पढ़ाते रहे। पाकिस्तान के राष्ट्रपति जिया उल हक 1981 में सेंट स्टीफंस कॉलेज आए थे। वे सेंट स्टीफंस कॉलेज में 1941 से 1945 तक पढ़े थे। वे तब राजधानी में निर्गुट सम्मेलन में भाग लेने आए थे। तब वे कुछ समय चुराकर अपने पुराने कॉलेज आ गए थे। जिया को तब सेंट स्टीफंस कॉलेज परिसर में  प्रो. मोहम्मद अमीन और बेकर साहब ने घुमाया था। वे बताते थे कि जिया उल हक ने कॉलेज में अपने हॉस्टल के  कमरे को देखा। वे प्रिंसिपल रूम में भी गए। पुराने अध्यापकों के बारे में पूछा। वे कुछ पलों तक कॉलेज कैंटीन में नींबू पानी बेचने वाले वाले सुखिया से गले मिलते रहे थे।  


डेविड बेकर को देखकर अहसास होता था कि आप किसी संत से मिल रहे रहे हैं। वे हजारों स्टुडेंट्स के मेनटर और मार्गदर्शक रहे। वे दिन-रात कॉलेज में विद्यार्थियों के बीच में ही रहते थे। वे अपने जीवनकाल में ही लीजेंड बन गए थे।


 नवभारत टाइम्स, 26 अगस्त, 2021 को छपे लेख के अंश।


Pictures: CF Andrews and David Baker

बुधवार, 25 अगस्त 2021

वसई किला / मनीषा सिंह

 

मुंबई के पास एक स्थान है वसई जहाँ समुद्र किनारे पुर्तगालियो द्वारा बनवाया एक किला है, 

इस किले पर पहुँचने के लिए आपको एक बस स्टॉप पर उतरना होता है जिसका नाम है चिमाजी अप्पा जंक्शन। 


किसी भी स्थान के नाम के पीछे उस जगह का इतिहास छिपा होता है, यह बात थोड़ी जिज्ञासा पैदा करती है कि आखिर पुर्तगालियो के किले का चिमाजी अप्पा से क्या लेना देना होगा।


चिमाजी अप्पा एक ब्राह्मण, पेशवा बाजीराव के छोटे भाई और मराठा सेना के जनरल थे। 

उत्सुकता में इस किले का इतिहास निकालना पड़ा और जो सच सामने आया उसने झकझोर कर रख दिया और सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर चिमाजी अप्पा जैसे महापुरुष इतिहास में कहाँ गुमनाम हो गए। 


नेहरूजी पर दोषारोपण कर भी दिया जाए तो हिंदूवादियों ने भी इन्हें प्रसिद्धि दिलाने का क्या प्रयास किया??


भारत को गुलाम बनाने का सपना सबसे पहले पुर्तगालियो ने ही देखा था ये मुगलो से पहले भारत मे आ गए थे। 

सन 1738 तक इन्होंने मुंबई और गोवा पर कब्जा कर लिया साथ ही एक अलग राष्ट्र की घोषणा कर दी। 

उस समय मराठा साम्राज्य बेहद शक्तिशाली हो चुका था। ठीक एक साल पहले पेशवा बाजीराव दिल्ली और भोपाल में सारे रणबांकुरों को धूल चटाकर लौटे थे।


बाजीराव ने पुर्तगालियो को संदेश भेजा कि आप मुंबई और गोवा में व्यापार करें मगर ये दोनो मराठा साम्राज्य और भारत के अंग हैं इसलिए मुगलो की तरह आप भी हमारी अधीनता स्वीकार करें। 

जब पुर्तगाली नही माने तो बाजीराव ने अपने छोटे भाई और मराठा जनरल श्री चिमाजी अप्पा को युद्ध का आदेश दिया। 

चिमाजी अप्पा ने पहले गोवा पर हमला किया और वहाँ के चर्चो को तहस नहस कर दिया इससे पुर्तगालियो की आर्थिक कमर टूट गयी। 

फिर वसई आये जहाँ ये किला है। 


चिमाजी अप्पा ने 2 घंटे लगातार किले पर बमबारी की और पुर्तगालियो ने सफेद झंडा दिखाया, चिमाजी अप्पा ने किले पर मराठा ध्वज फहराया और पुर्तगालियो ने समझौता किया कि वे सिर्फ व्यापार करेंगे और अपने लाभ का एक चौथाई हिस्सा मराठा साम्राज्य को कर के रुप में देंगे। 


चिमाजी अप्पा ने सारे हथियार, गोला, बारूद जब्त कर लिए। 

इस युद्ध ने पुर्तगालियो की शक्ति का अंत कर दिया और भारत पर राज करने का सपना आखिर सपना ही बनकर रह गया।


हिन्दू धर्म मे यह बेहद दुर्लभ है कि किसी व्यक्ति को शस्त्र के साथ शास्त्र का भी ज्ञान हो, चिमाजी अप्पा उन्ही लोगो मे से एक थे। 

वसई का किला खण्डहर हो चुका है कुछ सालो में शायद खत्म भी हो जाये मगर उस बस स्टॉप का नाम हमेशा भारत के गौरवशाली इतिहास का स्मरण कराता रहेगा कि एक भरतवंशी योद्धा इस जगह आया था जिसने मातृभूमि को पराधीनता में जकड़े जाने से पहले ही आज़ाद कर लिया और इतिहास में अमर हो गया।


नीचे किले में बनी चिमाजी अप्पा की मूर्ति है। 

चिमाजी अप्पा अपनी विजयी मुद्रा में खड़े आज अपने अस्तित्व का युद्ध भी लड़ रहे है क्योकि राष्ट्रवादी व्यस्त है अपनी राजनीति में।।

✍🏻परख सक्सेना


कोलाचेल युद्ध में डचों को हराने वाले राजा मार्तण्ड वर्मा : इतिहास की पुस्तकों से गायब


डच वर्तमान नीदरलैंड (यूरोप) के निवासी हैं. भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से इन लोगों ने 1605 में डच ईस्ट इंडिया कंपनी बनायीं और ये लोग केरल के मालाबार तट पर आ गए. ये लोग मसाले, काली मिर्च, शक्कर आदि का व्यापार करते थे.

धीरे धीरे इन लोगों ने श्रीलंका, केरल, कोरमंडल, बंगाल, बर्मा और सूरत में अपना व्यवसाय फैला लिया. इनकी साम्राज्यवादी लालसा के कारण इन लोगों ने अनेक स्थानों पर किले बना लिए और सेना बनायीं. श्रीलंका और ट्रावनकोर इनका मुख्य गढ़ था. स्थानीय कमजोर राजाओं को हरा कर डच लोगों ने कोचीन और क्विलोन (quilon) पर कब्ज़ा कर लिया.

उन दिनों केरल छोटी छोटी रियासतों में बंटा हुआ था. मार्तण्ड वर्मा एक छोटी सी रियासत वेनाद का राजा था. दूरदर्शी मार्तण्ड वर्मा ने सोचा कि यदि मालाबार (केरल) को विदेशी शक्ति से बचाना है तो सबसे पहले केरल का एकीकरण करना होगा. उसने अत्तिंगल, क्विलोन (quilon) और कायामकुलम रियासतों को जीत कर अपने राज्य की सीमा बढाई.

अब उसकी नज़र ट्रावनकोर पर थी जिसके मित्र डच थे. श्रीलंका में स्थित डच गवर्नर इम्होफ्फ़ (Gustaaf Willem van Imhoff) ने मार्तण्ड वर्मा को पत्र लिख कर कायामकुलम पर राज करने पर अप्रसन्नता दर्शायी. इस पर मार्तण्ड वर्मा ने जबाब दिया कि 'राजाओं के काम में दखल देना तुम्हारा काम नहीं, तुम लोग सिर्फ व्यापारी हो और व्यापार करने तक ही सीमित रहो'.

कुछ समय बाद मार्तण्ड वर्मा ने ट्रावनकोर पर भी कब्ज़ा कर लिया. इस पर डच गवर्नर इम्होफ्फ़ ने कहा कि मार्तण्ड वर्मा ट्रावनकोर खाली कर दे वर्ना डचों से युद्ध करना पड़ेगा. मार्तण्ड वर्मा ने उत्तर दिया कि 'अगर डच सेना मेरे राज्य में आई तो उसे पराजित किया जाएगा और मै यूरोप पर भी आक्रमण का विचार कर रहा हूँ'. ['I would overcome any Dutch forces that were sent to my kingdom, going on to say that I am considering an invasion of Europe'- Koshy, M. O. (1989). The Dutch Power in Kerala, 1729-1758) ]

डच गवर्नर इम्होफ्फ़ ने पराजित ट्रावनकोर राजा की पुत्री स्वरूपम को ट्रावनकोर का शासक घोषित कर दिया. इस पर मार्तण्ड वर्मा ने मालाबार में स्थित डचों के सारे किलों पर कब्ज़ा कर लिया.

अब डच गवर्नर इम्होफ्फ़ की आज्ञा से मार्तण्ड वर्मा पर आक्रमण करने श्रीलंका में स्थित और बंगाल, कोरमंडल, बर्मा से बुलाई गयी 50000 की विशाल डच जलसेना लेकर कमांडर दी-लेननोय कोलंबो से ट्रावनकोर की राजधानी पद्मनाभपुर के लिए चला. मार्तण्ड वर्मा ने अपनी वीर नायर जलसेना का नेतृत्व स्वयं किया और डच सेना को कन्याकुमारी के पास कोलाचेल के समुद्र में घेर लिया.

कई दिनों के भीषण समुद्री संग्राम के बाद 31 जुलाई 1741 को मार्तण्ड वर्मा की जीत हुई. इस युद्ध में लगभग 11000 डच सैनिक बंदी बनाये गए, शेष डच सैनिक युद्ध में हताहत हो गए.

डच कमांडर दी-लेननोय, उप कमांडर डोनादी तथा 24 डच जलसेना टुकड़ियों के कप्तानो को हिन्दुस्तानी सेना ने बंदी बना लिया और राजा मार्तण्ड वर्मा के सामने पेश किया. राजा ने जरा भी नरमी न दिखाते हुए उनको आजीवन कन्याकुमारी के पास उदयगिरी किले में कैदी बना कर रखा.

अपनी जान बचाने के लिए इनका गवर्नर इम्होफ्फ़ श्रीलंका से भाग गया. पकडे गए 11000 डच सैनिकों को नीदरलैंड जाने और कभी हिंदुस्तान न आने की शर्त पर वापस भेजा गया, जिसे नायर जलसेना की निगरानी में अदन तक भेजा गया, वहां से डच सैनिक यूरोप चले गए. 

कुछ वर्षों बाद कमांडर दी-लेननोय और उप कमांडर डोनादी को राजा ने इस शर्त पर क्षमा किया कि वे आजीवन राजा के नौकर बने रहेंगे तथा उदयगिरी के किले में राजा के सैनिकों को प्रशिक्षण देंगे. इस तरह नायर सेना यूरोपियन युद्ध कला में निपुण हुई. उदयगिरी के किले में कमांडर दी-लेननोय की मृत्यु हुई, वहां आज भी उसकी कब्र है.

केरल और तमिलनाडु के बचे खुचे डचों को पकड़ कर राजा मार्तण्ड सिंह ने 1753 में उनको एक और संधि करने पर विवश किया जिसे मवेलिक्कारा की संधि कहा जाता है. इस संधि के अनुसार डचों को इंडोनेशिया से शक्कर लाने और काली मिर्च का व्यवसाय करने की इजाजत दी जायेगी और बदले में डच लोग राजा को यूरोप से उन्नत किस्म के हथियार और गोला बारूद ला कर देंगे.

राजा ने कोलाचेल में विजय स्तम्भ लगवाया और बाद में भारत सरकार ने वहां शिला पट्ट लगवाया.

मार्तण्ड वर्मा की इस विजय से डचों का भारी नुकसान हुआ और डच सैन्य शक्ति पूरी तरह से समाप्त हो गयी. श्रीलंका, कोरमंडल, बंगाल, बर्मा एवं सूरत में डचो की ताकत क्षीण हो गयी.

राजा मार्तण्ड वर्मा ने छत्रपति शिवाजी से प्रेरणा लेकर अपनी सशक्त जल सेना बनायीं थी.

तिरुवनन्तपुरम का प्रसिद्द पद्मनाभस्वामी मंदिर राजा मार्तण्ड वर्मा ने बनवाया और अपनी सारी संपत्ति मंदिर को दान कर के स्वयं भगवान विष्णु के दास बन गए. इस मंदिर के 5 तहखाने खोले गए जिनमे बेशुमार संपत्ति मिली. छठा तहखाना खोले जाने पर अभी रोक लगी हुई है.

यह दुख की बात है कि महान राजा मार्तण्ड वर्मा और कोलाचेल के युद्ध को NCERT की इतिहास की पुस्तकों में कोई जगह न मिल सकी.

1757 में अपनी मृत्यु से पूर्व दूरदर्शी राजा मार्तण्ड वर्मा ने अपने पुत्र राजकुमार राम वर्मा को लिखा था - 'जो मैंने डचों के साथ किया वही बंगाल के नवाब को अंग्रेजों के साथ करना चाहिए. उनको बंगाल की खाड़ी में युद्ध कर के पराजित करें, वर्ना एक दिन बंगाल और फिर पूरे हिंदुस्तान पर अंग्रेजो का कब्ज़ा हो जाएगा'.


छत्रपति संभाजी महाराज ने शस्त्र युक्त नौ जहाज का निर्माण किया यह कहना गलत नही होगा संभाजी महाराज नौ वैज्ञानिक तो थे ही साथ में शस्त्र विशेषज्ञ भी थे उन्हें ज्ञात था कौनसा नौके में कितने वजन का तोप ले जा सकता हैं ।

छत्रपति शिवाजी महाराज नौसेना के जनक थे केवल भारत ही नही अपितु पुरे विश्व को नौ सेना बनाने का विचार सूत्र दिया नौका को केवल वाहन रूप में इस्तेमाल किया जाता था शिवाजी महाराज प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने साधारण नौका को समंदर का रक्षक का रूप दे दिया शस्त्रयुक्त लड़ाकू जहाज बनाकर । शिवपुत्र संभाजी महाराज समंदर के अपराजय योद्धा थे समंदर की रास्ता उन्हें अपनी हथेलियों की लकीर जैसी मालूम थी , इसलिए पुर्तगालियों के पसीने छूटते थे संभाजी महाराज के नाम से केवल।


पुर्तगाली साथ युद्ध-:

‘छत्रपति संभाजी महाराजने गोवामें पुर्तगालियों से किया युद्ध राजनीतिक के साथ ही धार्मिक भी था । हिंदुओं का धर्मांतरण करना तथा धर्मांतरित न होनेवालों को जीवित जलाने की शृंखला चलानेवाले पुर्तगाली पादरियों के ऊपरी वस्त्र उतार कर तथा दोनों हाथ पीछे बांधकर संभाजी महाराज ने गांव में उनका जुलूस निकाला ।’ – प्रा. श.श्री. पुराणिक (ग्रंथ : ‘मराठ्यांचे स्वातंत्र्यसमर (अर्थात् मराठोंका स्वतंत्रतासंग्राम’ डपूर्वार्ध़) छत्रपति संभाजी महाराज अत्यंत क्रोधित हुए क्योंकि गोवा में पुर्तगाली हिन्दुओं के धर्म परिवर्तन के साथ साथ मंदिरों को ध्वंश भी कर रहे थे। छत्रपति संभाजी महाराज द्वारा किये जा रहे हमले से अत्यंत भयभीत होगे थे जो पोर्तुगाली के लिखे चिट्ठी में दर्शाता हैं : “ संभाजी आजके सबसे पराक्रमी व्यक्ति हैं और हमें इस बात का अनुभव हैं” । 

यह रहा पोर्तुगाली इसाई कसाइयों द्वारा लिखा हुआ शब्द-: (The Portuguese were very frightened of being assaulted by Sambhaji Maharaj, and this reflects in their letter to the British in which they wrote, ‘Now-a-days Sambhaji is the most powerful person and we have experienced it’. ) 

 

संभाजी महाराज गोवा की आज़ादी एवं हिन्दुओ के उप्पर हो रहे अत्याचारों का बदला लेने के लिए 7000 मावले इक्कट्ठा किया और पुर्तगालीयों पर आक्रमण कर दिया पुर्तगाली सेना जनरल अल्बर्टो फ्रांसिस के पैरो की ज़मीन खिसक गई महाराज संभाजी ने 50,000 पुर्तगालीयों सेना को मौत के घाट उतार दिया बचे हुए पुर्तगाली अपने सामान उठाकर चर्च में जाकर प्रार्थना करने लगे और कोई चमत्कार होने का इंतेज़ार कर रहे थे संभाजी महाराज के डर से समस्त पुर्तगाली लूटेरे पंजिम बंदरगाह से 500 जहाजों पर संभाजी महाराज के तलवारों से बच कर कायर 25000 से अधिक पुर्तगाली लूटेरे वापस पुर्तगाल भागे । 


संभाजी महाराज ने पुरे गोवा का शुद्धिकरण करवाया एवं ईसाइयत धर्म में परिवर्तित हुए हिंदुओं को हिंदू धर्म में पुनः परिवर्तित किया ।  


पुर्तगाली सेना के एक सैनिक मोंटिरो अफोंसो वापस पुर्तगाल जाकर किताब लिखा (Drogas da India) लिखता हैं संभाजी महाराज को हराना किसी पहाड़ को तोड़ने से ज्यादा मुश्किल था महाराज संभाजी के आक्रमण करने की पद्धति के बारे में  से ब्रिटिश साम्राज्य तक भयभीत होगया गया था अंग्रेजो और हम (पुर्तगाल) समझ गए थे भारत को गुलाम बनाने का सपना अधुरा रह जायेगा।  

संभाजी महाराज की युद्धनिति थी अगर दुश्मनों की संख्या ज्यादा हो या उनके घर में घुसकर युद्ध करना हो तो घात लगा कर वार करना चाहिए जिसे आज भी विश्व के हर सेना इस्तेमाल करती हैं जिसे कहते हैं Ambush War Technic। पुर्तगाल के सैनिक कप्तान अफोंसो कहता हैं संभाजी महाराज के इस युद्ध निति की कहर पुर्तगाल तक फैल गई थी संभाजी महाराज की आक्रमण करने का वक़्त होता था रात के ८ से ९ बजे के बीच और जब यह जान बचाकर पुर्तगाल भागे तब वहा भी कोई भी पुर्तगाली लूटेरा इस ८ से ९ बजे के बीच घर से नहीं निकलता था in लूटेरो को महाराज संभाजी ने तलवार की वह स्वाद चखाई थी जिससे यह अपने देश में भी डर से बहार नहीं निकलते थे घर के ।     

    

हिंदू धर्म में पुनः परिवर्तित किया गया :

हम सभी जानते हैं छत्रपति शिवाजी महाराज के निकट साथी, सेनापति नेताजी पालकर जब औरंगजेब के हाथ लगे और उसने उनका जबरन धर्म परिवर्तन कर उसका नाम मोहम्मद कुलि खान रख दिया । शिवाजी महाराज ने मुसलमान बने नेताजी पालकर को ब्राम्हणों की सहायता से पुनः हिन्दू बनाया और उनको हिन्दू धर्म में शामिल कर उनको प्रतिष्ठित किया।

हालांकि, यह ध्यान देने की बात हैं संभाजी महाराज ने हिंदुओं के लिए अपने प्रांत में एक अलग विभाग स्थापित किया था जिसका नाम रखा गया 'पुनः परिवर्तन समारोह' दुसरे धर्म में परिवर्तित होगये हिन्दुओ के लिए इस समारोह का आयोजन किया गया था ।

हर्षुल नामक गाँव में कुलकर्णी ब्राह्मण रहता था संभाजी महाराज पर लिखे इतिहास में इस वाकया का उल्लेख हैं कुलकर्णी नामक ब्राह्मण को ज़बरन इस्लाम में परिवर्तित किया था मुगल सरदारों ने कुलकर्णी मुगल सरदारों की कैद से रिहा होते ही संभाजी महाराज के पास आकर उन्होंने अपनी पुन: हिन्दू धर्म अपनाने की इच्छा जताई संभाजी महाराज ने तुरंत 'पुनः धर्म परिवर्तन समारोह का योजन करवाया और हिन्दू धर्म पुनःपरिवर्तित किया ।

✍🏻मनीषा सिंह

कपालभाति.....*

कपाल’ का अर्थ है माथा(सिर) तथा भाति का अर्थ है चमकना।*

 *कपालभाति के नियमित अभ्यास करने के से सिर चमकदार बनता है अतः इसे कपालभाति कहते हैं।*

 *कपालभाति एक ऐसी सांस की प्रक्रिया है जो सिर तथा मस्तिष्क की क्रियाओं को नई जान प्रदान करता है।*  

*भाल और कपाल का अर्थ है माथा। भाति का अर्थ है*  *प्रकाश अथवा तेज, इसे ‘ज्ञान की प्राप्ति’ भी कहते हैं।*

 *कपालभाति समूचे मस्तिष्क को तेजी प्रदान करती है तथा निष्क्रिया पड़े उन मस्तिष्क केंद्रों को जागृत करती है जो सूक्ष्म ज्ञान के लिए उत्तरदायी होते हैं।*

*#कपालभाति में सांस उसी प्रकार ली जाती है, जैसे धौंकनी चलती है। सांस तो स्वतः ही ले ली जाती है किंतु उसे छोड़ा पूरे बल के साथ जाता है।*


*कपालभाति का अभ्यास करने के लिये ध्यान_की_मुद्रा में बैठें, आँखें_बंद_करें एवं संपूर्ण  ढीला छोड़ दें।*

*दोनों_नोस्ट्रिल से सांस लें, जिससे पेट फूल जाए और पेट की पेशियों को बल के साथ सिकोड़ते हुए सांस छोड़ दें।*

*अगली बार सांस स्वतः ही खींच ली जाएगी और पेट की पेशियां भी स्वतः ही फैल जाएंगी। सांस_खींचने में किसी प्रकार के बल का प्रयोग नहीं होना चाहिए।*

*कपालभाति मे सांस_धौंकनी के समान चलनी चाहिए।*

*कपालभांति_को तेजी से कई बार दोहराएं।कपालभाति करते समय पेट फूलना और सिकुड़ना चाहिए।*

*आप कपालभाति के नियमित अभ्यास को 500 बार तक कर सकते हैं।*

*अगर आपके पास समय है तो रुक रुक कर इसे आप 5 से 10 मिनट तक कर सकते हैं।*


*कपालभाति के लाभ*


*कपालभाति लगभग हर बिमारियों को किसी न किसी तरह से रोकता है।*

*कपालभाति को नियमित रूप से करने पर वजन घटता है और मोटापा में बहुत हद तक फर्क देखा जा सकता है।*

*कपांलभाँति अभ्यास से त्वचा में ग्लोइंग और निखार देखा जा सकता है।*

*कपालभाति के नियमित अभ्यास करने से आपके बालों के लिए बहुत अच्छा है।*

*कपालभाँति के नियमित अभ्यास से अस्थमा को बहुत हद तक कंट्रोल किया जा सकता*

*कपालभाति के नियमित अभ्यास करने से श्वसन मार्ग के अवरोध दूर होते हैं तथा इसकी अशुद्धियां एवं बलगम की अधिकता दूर होती है।*

*कपालभाँति शीत, (नाक की श्लेष्मा झिल्ली का सूजना), साइनसाइटिस तथा श्वास नली के संक्रमण के उपचार में उपयोगी है।*

*कपालभाँति के नियमित अभ्यास करने उदर में तंत्रिकाओं को सक्रिय करती है, उदरांगों की मालिश करती है तथा पाचन क्रिया को सुधारती है।*

*#कपालभाँति के नियमित अभ्यास करने से फेफड़ों की क्षमता में वृद्धि करती है।*

*कपालभांति के नियमित अभ्यास करने से साइनस को शुद्ध करती है तथा मस्तिष्क को सक्रिय करती है।*

*कपाल भाँति के नियमित अभ्यास करने से पाचन क्रिया को स्वस्थ बनाता है।*

*कपालभाति केनियमित अभ्यास करने से माथे के क्षेत्र में यह विशेष प्रकार की जागरुकता उत्पन्न करती है तथा भ्रूमध्य दृष्टि के प्रभावों को बढ़ाती है।*

*कपालभाँति के नियमित अभ्यास करने से कुंडलिनीशक्ति को जागृत करने में सहायक होती है।*

*कपालभाँति के नियमित अभ्यास करने से कब्ज की शिकायत को दूर करने के लिए बहुत लाभप्रद योगाभ्यास है।*

*कपालभाति के नियमित अभ्यास करने से सांस भीतर स्वतः ही अर्थात् बल प्रयोग के बगैर ली जानी चाहिए तथा उसे बल के साथ छोड़ा जाना चाहिए किंतु व्यक्ति को इससे दम घुटने जैसी अनुभूति नहीं होनी चाहिए*


*हृदय रोग, चक्कर की समस्या, उच्च रक्तचाप, मिर्गी, दौरे, हर्निया तथा आमाशाय के अल्सर से पीड़ित व्यक्तियों को #कपालभाति नहीं करनी चाहिए।*

फ़िल्मी पोस्टर / राजा बुंदेला

 वक्त बड़ा बेरहम होता है। कभी किसी को नहीं बख्शता यह नामुराद! जिस साम्राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता था, इसने उसे भी डुबो दिया।  इस दौर में टॉ...