सोमवार, 31 जनवरी 2022

 मुरादबादी ठठेरा 


जब ये खबर आयी कि प्रियंका मुरादाबाद के किसी ठठेरे से बियाह करेंगी तो मुल्क वाकई एक बार सन्न रह गया था । ठठेरा UP की एक बिरादरी होती है जो पुराने जमाने में बर्तन इत्यादि बनाया करते थे ।


उनका असली नाम Robert बढ़ेड़ा था । बढ़ेड़ा पंजाब के खत्री होते हैं ।

उनके पिता का नाम श्री राजेंद्र बढ़ेड़ा था । राजेंद्र जी का जन्म अखंड भारत के मुल्तान में हुआ था । जब 1947 में देश का विभाजन हुआ तो उनका परिवार मुरादाबाद चला आया ।

राजेंद्र जी बाढ़ेड़ा का विवाह Maureen McDonah नामक Scottish मूल की एक ब्रिटिश महिला से हुआ । ये विवाह कब कैसे किन परिस्थितियों में हुआ इसके बारे में बहुत ज़्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है ।

बहरहाल राजेंद्र भाई बाढ़ेड़ा की Maureen से 3 संतानें हुई ।

Robert , Richard और एक लड़की Michell .

राजेंद्र जी का मुरादाबाद में brass metal यानी पीतल के बर्तनों और कलात्मक वस्तुओं का निर्यात का छोटा मोटा व्यवसाय था । परिवार के हालात बहुत अच्छे न थे और Maureen दिल्ली के एक play school में पढ़ाती थीं । न जाने किन अज्ञात सूत्रों संबंधों के कारण उनके बच्चों का दाखिला दिल्ली के British School में हो गया जिसमें उस समय देश के प्रधान मंत्री की बेटी प्रियंका पढ़ती थी ।

13 साल की प्रियंका और Michell क्लास मेट थीं और मिशेल ने ही रोबर्ट की दोस्ती प्रियंका से कराई ।

स्कूल और स्कूल के बाहर भी प्रियांका सुर.क्षा कर्मियों से घिरी रहती थीं ।

शाही परिवार के बच्चों के चूँकि बहुत कम दोस्त थे लिहाजा मिशेल और robert दोनों 10 जनपथ आने जाने लगे । धीरे धीरे Robert की दोस्ती राहुल से भी हो गयी ।

सोनिया निश्चिन्त थीं कि प्रियंका की सहेली मिशेल और राहुल के दोस्त Robert हैं ।

पहली बार सोनिया के सिर पे बम तब फूटा जब एक दिन प्रियंका एक अनाथ आश्रम के बच्चों की सेवा के बहाने घर से निकली और अपनी माँ को बिना बताए Robert के घर मुरादाबाद पहुँच गयी । इधर दिल्ली में चिहाड़ मची । वापस लौटी तो पूछ ताछ हुई । IB ने सोनिया को खबर दी कि आपकी बेटी Robert से इश्क़ लड़ा रही है । जब सोनिया ने मना किया तो प्रियंका ने बगावत कर दी । और अपनी माँ से दो टूक कह दिया कि वो Robert से शादी करने जा रही हैं ।

इस खबर से congress में हड़कंम्प मच गया ।

राजनैतिक जमात में इसे ख़ुदकुशी करार दिया गया ।

प्रियंका को उंच नीच समझाने की जिम्म्मेवारी अहमद पटेल , जनार्दन द्विवेदी और मोतीलाल वोरा को दी गयी । इन सबने प्रियंका को उनके उज्जवल राजनैतिक भविष्य की दुहाई देते हुए समझाया कि किस तरह Robert एक Mr Nobody हैं , एक mismatch हैं और आगे चल के एक liability बन जाएंगे ।

पर ये कम्बख़त इश्क़ …….जब दिल आ जाए गधी पे तो परी क्या चीज़ है ।

इधर प्रियंका अड़ गयी उधर सोनिया टस से मस न होती थीं ।

इसके अलावा राजेंद्र बाढ़ेड़ा के परिवार की IB report भी माकूल न थी ।

परिवार पुराना संघी था ।

राजेंद्र जी का परिवार लंबे अरसे से , मने पाकिस्तान बनने से पहले से ही संघ के सक्रीय सदस्य था ।

इनके परिवार ने मुरादाबाद शहर की अपनी जमीन सरस्वती शिशु मंदिर के लिए दान कर दी थी और राजेंद्र जी के बड़े भाई श्री उस शिशु मंदिर के आज भी ट्रस्टी हैं ।

ऐसे में एक पुराने जनसंघी परिवार में गांधी परिवार के चश्मे चिराग का रिश्ता हो जाए , ये कांग्रेस की लीडरशिप को मंजूर न था । ऐसे में Maureen McDonagh ने न जाने ऐसी कौन सी गोटी चली और अपने ब्रिटिश मूल के Roman Catholic इतिहास का क्या पव्वा लगाया कि अचानक सोनिया गांधी मान गयी । वैसे बताया ये भी जाता है कि उन दिनों भी congress leadership ये जान चुकी थी कि राहुल गांधी बकलोल बकसोद हैं । थोड़ा बहुत चानस इस प्रियंकवा से लिया जा सकता है बशर्ते कि इसकी शादी किसी हिन्दू लीडर के परिवार में करा दी जाए । पर होइहैं वही जो राम रचि राखा ।

शादी इस शर्त पे तय हुई कि राजेंद्र बाढ़ेड़ा का परिवार गान्ही परिवार से किसी किस्म का मेलजोल रिश्तेदारी नहीं रखेगा और इनकी political powers का लाभ उठाने का कोई प्रयास नहीं करेगा ।

अंततः Feb 1997 में प्रियंका गांधी की शादी robert बाढ़ेड़ा से हो गयी ।

सोनिया गांधी को इस बाढ़ेड़ा surname से बहुत चिढ थी । और ये नाम इन्हें politically भी suit न करता था सो सबसे पहले इन ने इसे बदल के बाढ़ेड़ा से Vadra किया । यूँ भी ये परिवार नाम बदल के देश दुनिया को बेवक़ूफ़ बनाने में बहुत माहिर है ।


बहरहाल प्रियंकवा की सादी मुरादाबाद के ठठेरे से हो गयी ।

इस बीच Vadra परिवार को ये सख्त हिदायत थी कि वो लोग कभी 10 जनपथ में पैर नहीं रखेंगे ।

अलबत्ता वक़्त ज़रूरत पे प्रियंका गांधी अपनी ससुराल हो आती थीं ।

पर रोबर्ट ” वाड्रा ” को अपने परिवार से तआल्लुक़ रखने की इजाज़त न थी ।

गौर तलाब है कि प्रियंका से Robert की मुलाक़ात Michell ने कराई थी ।

पर अब उसी Michell का प्रवेश भी गांधी household में वर्जित हो गया था ।

फिर एक दिन Michell की एक car दुर्घटना में संदिग्ध हालात में मृत्यु हो गयी , जब कि वो दिल्ली से जयपुर जा रही थीं ।

उसके चंद दिनों बाद ही एक और अजीब घटना घटी ।

दिल्ली के एक वकील अरुण भारद्वाज ने दिल्ली के दो अख़बारों में Robert Vadraa के हवाले से ये इश्तहार दिया कि मेरे मुवक्किल श्री Robert Vadra का अपने पिता श्री राजेंद्र vadra , और भाई Richard Vadra से कोई सम्बन्ध नहीं है ।


यहां तक तो ठीक था । इसके बाद दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय से AICC के letter pad पे देश के सभी कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों , प्रदेश कांग्रेस कमेटी एवं कांग्रेस legislative पार्टियों को सोनिया गांधी की तरफ से एक पत्र भेजा गया जिसमें सभी को ये स्पष्ट निर्देश था कि मुरादाबाद के हमारे समधी और प्रियंका जी के जेठ जी की किसी सिफारिश पे कोई अमल न किया जाए और उन्हें किसी प्रकार के लाभ न पहुंचाए जाएं । वो बात दीगर है कि आगे चल के इन्ही congi मुख्य मंत्रियों अशोक गहलोत और भूपेंद्र हुड्डा के राज में मुरादाबादी ठठेरा देखते देखते ख़ाकपति से अरब पति व्यवसायी बन गया ।


इस घटना क्रम के कुछ ही महीनों बाद अपनी प्रियंका दीदी के जेठ जी , यानी अपने रोबर्ट जीजू के बड़े भाई Richard भाई ने पंखे से लटक के आत्महत्या कर ली ।

प्रियंका दीदी के ससुर जी , यानी रोबर्ट जीजू के पिता जी , श्री राजेंद्र भाई वाड्रा , जिनसे की robert vadra जीजू ने बाकायदा affidevit दे के संबंध विच्छेद कर लिया था , यानि कि बेटे ने बाप को बेदखल कर दिया था , वो राजेंद्र भाई गुमनामी और मुफलिसी में दिन काटने लगे ।

उनको लिवर सिरोसिस हो गया । उनका इलाज दिल्ली के सरकारी अस्पताल सफ़दर जंग हॉस्पिटल के जनरल वार्ड में हुआ । कुछ दिन बाद राजेंद्र वाड्रा सफदरजंग अस्पताल से डिस्चार्ज ले , दिल्ली में ही AIIMS के नज़दीक एक सस्ते से lodge के एक कमरे में पंखे से लटकते पाये गए । उनकी जेब में सरकारी अस्पतालों की दवाई का एक पुर्जा और 10 रु का एक नोट पाया गया ।

सोनिया गांधी की दिल्ली में पुलिस ने अच्छा किया कि postmortem न कराया वरना पेट में भूख और मुफलिसी के अलावा कुछ न मिलता ।

यूँ बताया जाता है कि जब पुलिस राजेंद्र वाड्रा की लाश उस lodge से ले जाने लगी तो उसके मालिक ने अपना 3 दिन का बकाया किराया सिर्फ इसलिए मुआफ़ कर दिया कि मरहूम शक़्स अपनी प्रियांका दीदी का ससुर था ।


उसी शाम दिल्ली के एक श्मशान में राजेंद्र वाड्रा का अंतिम संस्कार कर दिया गया जिसमें सिर्फ प्रियंका गांधी , सोनिया गांधी और राहुल बाबा शामिल हुए । शेष लोगों को सुरक्षा कारणों से अंदर नहीं आने दिया गया । Robert तो पहले ही बेदखल कर चुके थे ।

साभार

एक अज्ञात स्तम्भ ..क़ुतुब मीनार delhi

 ......


विष्णु स्तम्भ (कुतुब मीनार टॉवर) के पास, शुद्ध लोहे से बना एक स्तंभ है। इसमें 99.72% लोहा, शेष 0.28% अशुद्धियाँ हैं। इसकी काली-नीली सतह पर, आप जंग के केवल कुछ ही स्थानों पर कठिनाई से देख सकते हैं। यह लोहे का स्तंभ किसने और कब बनाया। यह पता नहीं चला है कि इसे कैसे और कहां से दिल्ली पहुंचाया गया।


इस पर, पिछली सभ्यताओं और उपनिवेशवादियों के कई निशान हैं

इस कोलोसस का वजन 6.8 टन है। निचला व्यास 41.6 सेमी है, शीर्ष पर यह 30 सेमी तक बढ़ता है। स्तंभ की ऊंचाई 7.5 मीटर है। आश्चर्यजनक बात यह है कि वर्तमान में धातु विज्ञान में शुद्ध लोहे का निर्माण एक बहुत ही जटिल विधि और कम मात्रा में होता है, लेकिन लोहा इतनी शुद्धता का होना आज के युग में असम्भव है। एक स्तंभ की तकनीकी को आधुनिक युग में प्राप्त करना असंभव है।


एक अज्ञात स्तम्भ ........


विष्णु स्तम्भ (कुतुब मीनार टॉवर) के पास, शुद्ध लोहे से बना एक स्तंभ है। इसमें 99.72% लोहा, शेष 0.28% अशुद्धियाँ हैं। इसकी काली-नीली सतह पर, आप जंग के केवल कुछ ही स्थानों पर कठिनाई से देख सकते हैं। यह लोहे का स्तंभ किसने और कब बनाया। यह पता नहीं चला है कि इसे कैसे और कहां से दिल्ली पहुंचाया गया।


इस पर, पिछली सभ्यताओं और उपनिवेशवादियों के कई निशान हैं

इस कोलोसस का वजन 6.8 टन है। निचला व्यास 41.6 सेमी है, शीर्ष पर यह 30 सेमी तक बढ़ता है। स्तंभ की ऊंचाई 7.5 मीटर है। आश्चर्यजनक बात यह है कि वर्तमान में धातु विज्ञान में शुद्ध लोहे का निर्माण एक बहुत ही जटिल विधि और कम मात्रा में होता है, लेकिन लोहा इतनी शुद्धता का होना आज के युग में असम्भव है। एक स्तंभ की तकनीकी को आधुनिक युग में प्राप्त करना असंभव है।



टीएमयू में ऑनलाइन होगी नेशनल ईईपी

 

देशभर से जुड़ेगे जाने-माने सॉफ्ट स्किल्स ट्रेनर्स, शिक्षाविद और पेशेवर्स


ख़ास बातें


तीन फरवरी से होगा वर्चुअली ईईपी का शंखनाद

एफओईसीएस के अंतिम वर्ष के स्टुडेंट्स होंगे लाभान्वित

उद्योग जगत को कौशल से लैस युवाओं की दरकार

ईईपी का मकशद स्किल्स को बढ़ाना: प्रो. द्विवेदी

अंत में प्रतिभागियों को दिए जाएंगे ई-प्रमाण पत्र



प्रो.श्याम सुंदर भाटिया/डॉ.संदीप वर्मा

मुरादाबाद !



तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के फ़ैकल्टी ऑफ इंजीनियरिंग एंड कम्प्यूटिंग साइंसेज़- एफओईसीएस में तीन दिवसीय नेशनल ऑनलाइन एम्प्लॉयबिलिटी इन्हैंस्मेंट प्रोग्राम-ईईपी- ए रोडमैप फ्रॉम कैंपस टु कॉर्पाेरेट का शंखनाद 03 फरवरी को होगा। रोजगार योग्यता संवर्धन कार्यक्रम- ईईपी- कैंपस से कॉर्पाेरेट तक के रोडमैप में देश भर के सॉफ्ट स्किल ट्रेनर्स, शिक्षाविद और पेशेवर अंतिम वर्ष के स्टुडेंट्स को प्रशिक्षण देंगे।


 इस ईईपी का आयोजन एफओईसीएस के ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट सेल और मानविकी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में किया जाएगा। उद्घाटन सत्र के दौरान ईईपी जनरल चेयर और एफओईसीएस के निदेशक प्रो. राकेश कुमार द्विवेदी स्वागत भाषण देंगे। ईईपी की कन्वीनर और मानविकी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर नेहा आनंद ईईपी की थीम प्रस्तुत करेंगी। अंत में सभी प्रतिभागियों को ई-प्रमाण पत्र भी दिए जाएंगे।


ईईपी जनरल चेयर एवं एफओईसीएस के निदेशक प्रो. द्विवेदी ने बताया, कार्यक्रम का उद्देश्य अंतिम वर्ष के स्टुडेंट्स के रोजगार कौशल को बढ़ाना है। इस दौरान प्रतिभागियों को संचार कौशल, व्यक्तित्व विकास, जीडी/पीआई प्रशिक्षण, साक्षात्कार कौशल, रेज़्यूम राइटिंग, ड्रेसिंग सेंस, समय और तनाव प्रबंधन, कॉन्फ़िडेंस बिल्डिंग, कार्य-जीवन संतुलन प्राप्त करना इत्यादि जैसे रोजगार कौशल के महत्वपूर्ण विषयों पर गहन प्रशिक्षण दिया जाएगा।

 ईईपी में एमडीएस विश्वविद्यालय, अजमेर के कार्यवाहक कुलपति प्रो. मनोज कुमार, ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी, देहरादून के इंग्लिश कम्युनिकेशन एंड सॉफ्ट स्किल्स के प्रोफेसर प्रो. गोपाल कृष्ण द्विवेदी, हैंड इन हैंड वर्कशॉप, नई दिल्ली की निदेशक सुश्री मीना बलूजा, मंशा ट्रेनिंग एंड डेवलपमेंट कंसल्टेंट्स, पंजाब के संस्थापक निदेशक श्री मनीष शर्मा, टेक्नोसस सॉफ्टवेयर सर्विस प्राइवेट लिमिटेड, पंजाब की टैलेंट एक्विज़िशन की प्रबंधक सुश्री मीनू यादव, विवेकानंद इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज, गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, नई दिल्ली की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मीतू कपूर भाटिया, बीएसएसएस इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज, भोपाल के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अनंत गीते उप्पल, पंजाब स्टेट लाइफ स्किल्स, पंजाब के डब्ल्यूआईसीसीआई की प्रेसिडेंट और माइंडसेट परफॉर्मेंस कोच सुश्री अनुराधा चावला, भारतीय, लाइफ एंड करियर सक्सेस, पंजाब के कोच श्री सतविंदर सिंह, लिबरल आर्ट्स स्कूल, उत्तरांचल विश्वविद्यालय, देहरादून की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. पिंकी चुघ, लिबरल आर्ट्स स्कूल, एमिटी यूनिवर्सिटी, हरियाणा की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. पारुल यादव, आशुर्क अस्मय प्राइवेट लिमिटेड, नोएडा के संस्थापक और सीईओ श्री आशुतोष तिवारी और इंद्रप्रस्थ इंजीनियरिंग कॉलेज, एपीजे अब्दुल कलाम विश्वविद्यालय की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शिल्पी गुप्ता सरीखीं अपने-अपने क्षेत्र की हस्तियां प्रतिभागियों को ऑनलाइन प्रशिक्षण देंगे।


ईईपी कन्वीनर एवं सहायक निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट श्री विक्रम रैना और ईईपी की कन्वीनर एवं मानविकी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर नेहा आनंद ने बताया, उद्योग जगत के लीडर्स डिग्री से कहीं अधिक ऐसे स्नातकों की तलाश कर रहे हैं, जो व्यावसायिक कौशल से लैस हों। भारत में स्नातकों की आपूर्ति सालाना लगभग 5 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। भारत में तकनीकी जनशक्ति का सबसे बड़ा टैलेंट पूल है। कौशल की कमी के कारण इस योग्यता को रोजगार में बदलना आज एक वास्तविक चुनौती है।

ईईपी में कोऑर्डिनेटर्स प्रो. अशेंद्र कुमार सक्सेना, प्रो. आर.के. जैन, डॉ. शंभू भारद्वाज, डॉ. संदीप वर्मा, डॉ. विपिन कुमार, डॉ. पंकज कुमार गोस्वामी, डॉ. गरिमा गोस्वामी, डॉ. रंजना शर्मा, डॉ. गुलिस्ता खान, डॉ. विनय मिश्रा, डॉ. अजीत कुमार सिंह, डॉ. अमित कुमार शर्मा, डॉ. सुरजीत दलाल, डॉ. गजेंद्र सिंह, डॉ हिमांश कुमार, श्री रूपल गुप्ता, श्री ज्योति रंजन लाभ, श्री राहुल विश्नोई आदि की गरिमामयी मौजूदगी रहेगी।


👌🏽👌🏽✌🏾️

रवि अरोड़ा की नजर से......

शॉर्ट टर्म मैमोरी लॉस / रवि अरोड़ा



बेशक मुल्क में चुनाव कराना एक महंगी प्रक्रिया है और इसका बोझ जनता पर ही पड़ता है मगर पता नहीं क्यों चुनाव अब अच्छे लगने लगे हैं । हालांकि मैं बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक काशी राम की तरह यह नहीं कह रहा कि चुनाव पांच साल में नहीं वरन और जल्दी जल्दी होने चाहिए । राम मनोहर लोहिया की तरह कोई भारी भरकम नारा भी नहीं उछालना चाहता कि जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करतीं मगर फिर भी दिल करता है कि देश में माहौल तो हमेशा चुनावी ही रहना चाहिए । अब देखिए न बड़े बड़े लोग गली गली घूम रहे हैं । जिन्होंने कभी महंगी कारों से नीचे कदम नहीं रखा था , वे भी घर घर जाकर हाथ जोड़ रहे हैं । जिस आम आदमी की कीमत दो कौड़ी की नहीं कभी मानी गई , वही अब सबका माई बाप बन गया है । महंगाई जैसे थम गई है । सरकारी वसूली क्या होती है , यह लोग भूल गए हैं । जब तक बेहद जरूरी न हो पुलिस बदमाशों को गिरफ्तार नहीं कर रही । जो भी रियायत दी जा सकती है वह दी ही नहीं जा रही बल्कि बरसाई जा रही है । सभी दलों ने जो वादे किए हैं , उनमें से आधे भी पूरे हो गए तो पब्लिक की बल्ले बल्ले ही हो जायेगी ।


अखबार बता रहे हैं कि दुनिया में कच्चे तेल के दाम आसमान छू रहे हैं मगर हमारे देश में तो लोग बाग भूल ही गए हैं कि हमारे यहां पेट्रोल डीजल के दाम बाजार के हिसाब से कभी रोज बढ़ते थे । शायद ही कोई ऐसा दिन होता था जब दाम न बढ़ें । हां जिस दिन दाम न बढ़ें तो उस दिन हैरानी अवश्य होती थी । रसोई गैस का भी यही हाल था मगर आजकल पूरा राम राज है । सरकारी कृपा ऐसी बरस रही है कि बिजली के दाम भी चुनावी बेला में कम हो गए हैं । यही नहीं कुछ ऐसे आदेश भी ऊपर से आए हुए हैं कि बिजली का बिल जमा न करवाने वालों की बत्ती भी नहीं कट रही । साल भर सर्दी गर्मी बरसात झेल कर किसान जो कृषि कानून  वापिस नहीं करवा सके , चुनावों ने एक झटके में करवा दिए । सरकारी कंपनियों की बिक्री भी जैसे सरकार भूल गई है । छोटे मोटे मामलों में पुलिस जेल न भेज कर मुलजिमों को थाने से ही जमानत दे रही है । वारंट तो खैर तामील ही नहीं हो रहे । अमीन मस्ती काट रहे हैं और विभिन्न करों की वसूली में भी पूरी ढील बरती जा रही है । परेशानी का सबब बने डिजिटल स्टांप बंद कर दिए गए हैं और लाखों स्टांप वेंडर के घर फिर से चूल्हा जल रहा है । एडीएम एफ के दफ्तरों में स्टांप अदालतें लग रही हैं और कम स्टांप लगाने के वाद आनन फानन निपटाए जा रहे हैं । ठेली पटरी वालों को ठीए अलॉट किए जा रहे हैं । अभी तो यह शुरुआत भर है । परिणाम आने दीजिए , पूरी कृपा बरसेगी । सरकार किसी की भी आए , झोली तो पब्लिक की ही भरेगी ।


मुझे मालूम है कि अब आप हमारे राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को मन ही मन कोस रहे होंगे मगर मेरी पूछें तो मैं अपने इन नेताओं के ही साथ हूं । दरअसल हमारे नेता बहुत विद्वान हैं । मनोविज्ञान और हमारे समाज की सोच समझ पर भी उनकी गहरी पकड़ है । उन्हें पता है कि पब्लिक गजनी फिल्म के आमिर खान जैसी शॉर्ट टर्म मैमोरी लॉस की शिकार है । पुरानी बात वह बहुत जल्दी भूल जाती है  और सिर्फ ताजा बात ही याद रखती है । जाहिर है कि वोट भी वो ताज़ा बात पर करेगी  । हर चुनाव में ऐसा ही होता है । अब आप ही हिसाब लगाइए कि पैट्रोल, डीजल और गैस के बढ़े दाम ताज़ा मुद्दा हैं क्या ? धरना रत सात सौ किसानों की मौत की बात कोई आज की है क्या ? किस सरकार के कार्यकाल में महंगाई और बेरोजगारी नहीं रही ? आज की बात होनी चाहिए । हमारे नेता भी तो यही कह रहे हैं कि बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध ले । उनका कसूर भी क्या है , शॉर्ट टर्म मैमोरी लॉस वालों से ऐसी उम्मीद नहीं की जानी चाहिए क्या ?

रविवार, 30 जनवरी 2022

चारा घोटाले में फंसे लालू समेत 99 घोटालेबाज़ो पर 15 फरवरी क़ो होगा

 कुमार सूरज

आरजेडी सुप्रीमो व बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव समेत 99 आरोपियों की किस्मत का फैसला* 15 फरवरी को होगा। चारा घोटाले के बहुचर्चित पांच मामलों में से पांचवें व अंतिम आरसी 47ए/96 मामले में शनिवार को बहस समाप्त होते ही सीबीआई के विशेष न्यायाधीश एसके शशि की अदालत ने  फैसले की तारीख निर्धारित कर दी।

 इस मामले में फैसला 26 साल बाद आयेगा।


सीबीआई के विशेष लोक अभियोजक बीएमपी सिंह ने बताया कि फैसले के दिन सभी आरोपियों को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का आदेश दिया गया है। डोरंडा कोषागार से 139 करोड़ 35 लाख रुपये की अवैध निकासी से जुड़े इस मामले में प्रारंभ में 170 आरोपी थे। इसमें से 55 आरोपियों की मौत हो गई जबकि दीपेश चांडक, आरके दास समेत सात को सीबीआई ने गवाह बना लिया। 


वहीं पीके जायसवाल व सुशील झा ने निर्णय पूर्व दोष स्वीकार कर लिया जबकि मामले में नामजद छह आरोपी फरार चल रहे हैं। मामले में लालू यादव, पूर्व सांसद जगदीश शर्मा, डॉ. आरके राणा, पीएसी के तत्कालीन अध्यक्ष धुव्र भगत, तत्कालीन पशुपालन सचिव बेक जुलियस, पशुपालन विभाग के सहायक निदेशक डॉ. केएम प्रसाद मुख्य आरोपी हैं।

शनिवार, 29 जनवरी 2022

कितने गाँधी ?

 कितने गांधीजी  


देश में किसिम-किसिम के गांधीजी हैं


हर किसी के पास 


उसके अपने गांधी हैें 


 


मेरी दादी मेरे दादाजी को गांधीजी 


सिर्फ इसलिए कहती थी कि वे सीधे थे


वे हर किसी की बात मान लेते थे


उन्हें कोई भी बेवकूफ बना सकता था


तो गांधी होने का एक मतलब यह भी है 


थोड़ा गम खा लेने 


थोड़ा संतोष कर लेने


अपनी जिद छोड़ कोई हल निकाल लेने की


सलाह देने वालों को गांधी संबोधन


 गाली की तरह मिलता है


और यह सुनने को मिलता है कि 


ज्यादा गांधी बनने की कोशिश मत करो


हालांकि कई बार पूरी सहानुभूति के साथ 


भी कहा जाता है 


बेचारा गांधीजी है 


मतलब थका-हारा असफल आदमी


गांधी एक बड़ा तमाशा भी है अपने देश में


कोई चतुर बूढ़ा गांधीजी की नकल करता हुआ


न जाने कितनी सहूलियतें और सम्मान


हासिल कर लेता है


कभी-कभार जब वह अनशन का खेल खेलता है 


लाखों की भीड़ उमड़ पड़ती है


हिल जाती है सत्ता थोड़ी देर के लिए 


तो गांधी एक खेल भी है


जिसे खेले बगैर राजदंड हासिल करना 


अब भी कठिन है


यही बात चुभती है हत्यारों को


 


वे कोई नया खेल खोज नहीं पा रहे


उनके अपने तमाशे फेल हो रहे 


वे गांधीजी की जान ले लेने के बाद भी


उन्हें खत्म नहीं कर पा रहे। 


2.


हत्यारों को लगा था 


कि सच को अगवा कर लेने 


और झूठ को मुकुट पहना देने से


गांधी खत्म हो जाएंगे 


लेकिन फिर भी मिट नहीं रहा 


उनका वजूद 


हत्यारों ने गांधी की मूर्ति से बड़ी मूर्ति बनाई


उनका प्राण लेने वाले की


उसे सच्चा देशभक्त घोषित किया


उसकी जयंती धूमधाम से मनाई


फिर भी कोई असर नहीं हुआ


कहीं न कहीं से गांधीजी प्रकट 


हो जा रहे हैं


 


एक दिन अचानक कुछ औरतों ने


अपने बंधनों को झाले के साथ बुहार कर फेंक दिया


जो कभी घर की दहलीज नहीं लांघ पाती थीं


वे पहुंच गईं चौराहे पर 


 


वे भी वैष्णव जन का हिस्सा थीं 


उनकी पीड़ा में पराई पीर शामिल थी


उन्होंने देश को अपनी आंखों में बसा रखा था


उन्हें मंजूर नहीं था कि कोई 


उनके और उनके वतन के बीच आए 


उन्होंने मिलकर उनके खिलाफ मोर्चा बांधा


जो देशभक्ति को पिघले शीशे की तरह


लोगों के कानों में उड़ेल देने पर आमादा थे। 


   


3.


गांधी के देश से बहुत दूर 


एक लड़की ने अचानक तय किया कि 


वह हवा, पानी और आकाश को 


जहर से बचाएगी


वह पृथ्वी की खोई 


 हरीतिमा वापस ला कर रहेगी


वह घर से निकली और 


स्कूल न जाकर सड़क पर खड़ी हो गई 


वह अकेली ही गुहार लगाने लगी


वे पेंड़ों के लिए न्याय मांगने लगी


वह राष्ट्राध्यक्षों से सवाल करने लगी


गांधी के देश में एक बीमार वृद्धा ने जब टीवी पर 


उस लड़की को बोलते सुना 


उसकी आंखें छलछला आईं 


उसकी झुर्रियों में कंपकंपाहट हुई


उसने दोनों हाथ जोड़े हवा में  


उस वृद्धा ने देखा था गांधीजी को 


नोआखाली की गलियों में भटकते


जब वह खुद बच्ची थी।  


4.


दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क


 के कुछ कमजोर लोग 


अक्सर सड़कों पर उतरते थे नारे लगाते हुए


वे कहते थे मनुष्यता का रंग एक है


उन सबको उनकी चमड़ी के रंग से न पहचाना जाए


वे त्वचा के रंग से नागरिकों को पहचानने वाली 


हर व्यवस्था का विरोध करते थे


उन्होंने गांधीजी को किताबों में पढ़ा था


वे कहीं से भी गांधी या उनके शिष्यों की तरह


 नहीं लगते थे


पर सविनय अवज्ञा उनके खून में घुली हुई थी 


5. 


जिस तरह कुछ लोग गांधीजी को खत्म करने


पर तुले हैं


उसी तरह कुछ लोग गांधीजी को बचाने में लगे हैं


वे चाहते हैं कि गांधीजी का चश्मा सुरक्षित रहे


उनकी घड़ी में कोई खराबी न आ जाए


उऩका चरखा कहीं टूट न जाए


वे चाहते हैं कि चमक बनी रहे खादी की


मैली न हो उनकी टोपी 


वे परेशान हो उठते हैं


कि गांधीजी का सामान कहीं गलत


 हाथों में न चला जाए


कई बार वे चिल्लाते हैं-


बापू का अपमान हो रहा है


 शायद ही किसी ने सुना हो उन्हें 


बापू के हत्यारों के खिलाफ बोलते हुए। 


  


6.


लोगों को झूठ से घेरा जा रहा है


अफवाहों से घेरा जा रहा है


फतवों-फरमानों से घेरा जा रहा है


ताकत मुंह से आग छोड़ती हुई 


बार-बार चली आ रही ठीक सामने 


एक निहत्था कमजोर आदमी सोचता है 


अगर दो रोटी और नमक बराबर इज्जत भी


छीन ली जाए उससे तो वह क्या करेगा


नहीं वह चुप नहीं रहेगा


वह अपने निहत्थेपन  


और अपनी भूख को ही 


अपनी ताकत बनाकर खड़ा होगा


लाठियों, बंदूकों और अश्रु गैस के गोलों के खिलाफ


वह नहीं जानता इसे सत्याग्रह कहा जाता है


वह सिर्फ गांँधी बाबा को जानता है।  


……………...


(पटना से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'मगध' के प्रवेशांक में प्रकाशित)

भड़ास 4 मीडिया न्यूज़ -100

 पेगासस के लिए मोदी ने इज़रायल के हाथों भारत के सम्मान को गिरवी रख दिया : रवीश कुमार ☛ https://www.bhadas4media.com/bharat-ka-samman-girvi-rakha/ 


New York Times की Pegasus पर स्टोरी सच है तो मोदी सरकार की हरकत पर सिर शर्म से झुक जाता है! ☛ https://www.bhadas4media.com/new-york-times-pegasus-modi-government/


गए थे रक्षा सौदा करने, खरीद लाए पेगासस! ☛ https://www.bhadas4media.com/jasusi-karane-wale-modi-ka-sach/


न्यूयॉर्क टाइम्स के लेटेस्ट pegaus रेवलेशन ने Hanna वेब सीरीज के पार्ट 3 की याद दिला दी! ☛ https://www.bhadas4media.com/jasusi-ka-sach-samne-aaya/


पेगासस जासूसी कांड की खलनायक मोदी सरकार अब भी झूठ पर क़ायम है! ☛ https://www.bhadas4media.com/jasusi-karwate-the-modi/


‘जिन्ना, पाकिस्तान, मुगल, मुसलमान, कब्रिस्तान’ पर मुख्यधारा का मीडिया और चुनाव आयोग चुप, गांधीवादियों के एक समूह ने की पहल ☛ https://www.bhadas4media.com/gandhiwadiyon-ki-pahal/


शिवम दीक्षित ने टीवी की नौकरी छोड़ RSS का मुख्यपत्र ‘पाञ्चजन्य’ ज्वाइन किया ☛ https://www.bhadas4media.com/shivam-dixit-ki-nayi-pari/

गुरुवार, 27 जनवरी 2022

गांधी,27 जनवरी,1948 महरौली में / विवेक शुक्ला

 

दिल्ली में आजकल की ही तरह 27 जनवरी,1948 को भी कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। सारा वातावरण में अवसाद और निराशा फैली हुई थी। सूरत देवता दर्शन देने के नाम ही नहीं ले रहे थे।  इसके बावजूद गांधी जी सुबह साढ़े आठ बजे के आसपास अलबुर्कर रोड (अब तीस जनवरी मार्ग) पर स्थित बिड़ला हाउस से अपने कुछ सहयोगियों के साथ महरौली की तरफ निकले। वे महरौली में कुतुबउद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह में जा रहे थे। वे इससे पहले अपनी सन 1915 की पहली दिल्ली यात्रा के समय महरौली में कुतुब मीनार को देखने गए थे। तब कस्तूरबा गांधी और हकीम azmal खान भी उनके साथ साथ थे। 


पर इस बार मामला गंभीर था। महात्मा गांधी को दिल्ली आए हुए लगभग चार महीने हो चुके थे। पर इधर सांप्रदायिक दंगे थमने नहीं रहे थे। इनसानियत मर रही थी।  वे नोआखाली और कलकत्ता में दंगों को शांत करवाकर 9 सितंबर, 1947 को यहां आए थे। तब दिल्ली में सरहद पार से हिन्दू- सिख शरणार्थी आ रहे थे, यहां से बहुत से मुसलमान पाकिस्तान जा रहे है। करोल बाग,पहाड़गंज, दरियागंज, महरौली में मारकाट मची हुई थी। वे दंगाग्रस्त क्षेत्रों में जा रहे थे। पर बात नहीं बन रही थी। इस बीच, कुतुबउदीन बख्तियार काकी की दरगाह के बाहरी हिस्से को भी कुछ दंगाइयों ने क्षति पहुंचाई। 


इस घटना से बापू अंदर तक हिल गए थे। उन्हें 12 जनवरी 1948 को खबर मिली थी कि काकी की दरगाह के बाहरी हिस्से को दंगाइयों ने क्षति पहुंचाई है। ये सुनने के बाद उन्होंने अगले ही दिन से उपवास पर जाने का निर्णय लिया। हालांकि माना जाता है कि बापू ने अपना अंतिम उपवास इसलिए रखा था ताकि भारत सरकार पर दबाव बनाया जा सके कि वो पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये अदा कर दे। पर सच ये है कि उनका उपवास दंगाइयों पर नैतिक दबाव डालने को लेकर था। गांधी जी ने 13 जनवरी 1948 को प्रात: साढ़े दस बजे अपना उपवास चालू किया। उनके उपवास का असर दिखने लगा। दिल्ली शांत हो गई।


 तब बापू ने 18 जनवरी, 1948 को अपना उपवास तोड़ा। 78 साल के बापू ने हिंसा को अपने उपवास से मात दी। इसके बाद वे काकी की दरगाह में 27 जनवनरी को पहुंचे। तब तक महरौली बिल्कुल जंगल सी रही होगी। वे बिड़ला हाउस से जब महरौली के लिए निकले होंगे तो उन्हें सबसे पहली बस्ती युसुफ सराय ही मिली होगी। तक तक साउथ दिल्ली में कमोबेश गांव  ही ही आबाद थी। एम्स, हौज खास, सर्वप्रिय विहार, सफदरजंग डवलपमेंट एरिया वगैरह तो 1950 के दशक के शुरू में बनने शुरू हुए थे।


खैर, वे बिड़ला हाउस से युसुफ सराय के रास्ते 30-40 मिनट में काकी की दरगाह में पहुंच गए होंगे। वहां पर उर्स चल रहा था,पर जायरीन कम ही थे। उर्स का उत्साह नहीं था। वहां पर पहुंचते ही उन्होंने दरगाह के उन हिस्सों को देखा जिसे दंगाइयों ने नुकसान पहुंचाया था। उन्होंने वहां पर एकत्र हुए मुसलमानों को भरोसा दिलाया कि उन्हें सरकार सुरक्षा देगी। 


उन्हें पाकिस्तान जाने की जरूरत नहीं है। उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु से दरगाह की फिर से मरम्मत कराने के लिए भी कहा। गांधी जी के साथ नेहरु कैबिनेट में स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर भी थीं। वे काकी की दरगाह में लगभग एकाध घंटा रहे। पर अफसोस कि दरगाह के आसपास कोई शिलालेख भी नहीं लगा जिससे पता चल सके कि यहां कब और किसलिए राष्ट्रपिता आए थे।


 अब दरगाह से जुड़े किसी खादिम को ये जानकारी नहीं है कि बापू का काकी की दरगाह से किस तरह का रिश्ता रहा है। बहरहाल, यहां आने के तीन दिनों के बाद उनकी हत्या कर दी जाती है।

Vivekshukladelhi@gmail.com 

Navbharatimes 27 January 2022



नागा साधु संतो की शहादत

 जब अहमदशाह अब्दाली दिल्ली और मथुरा पर आक्रमण करता हुआ गोकुल तक आ गया था ।लोगो को बर्बरतापूर्वक काटा जा रहा था . .. महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहे थे और बच्चे देश के बाहर बेचे जा रहे थे . 


तभी गोकुल में अहमदशाह अब्दाली का सामना नागा साधुओं हुआ । कुछ 5 हजार साधुओं की सेना कई हजार सैनिकों से लड़ गयी थी पहले तो अब्दाली साधुओं को मजाक में ले रहा था , किन्तु तभी अब्दाली को एहसास हो गया था कि यह साधू अपनी भारत माता के लिए जान तक दे सकते हैं ।


 इस युद्ध में 2000 नागा साधू वीरगति को प्राप्त हुए थे . लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही थी कि दुश्मनों की सेना चार कदम भी आगे नहीं बढ़ा पाई थी . जो जहाँ था वहीं ढेर कर दिया गया था या फिर पीछे हटकर भाग गया था ।


 तबसे कई मुस्लिम शासक जब यह सुनते थे कि युद्ध में नागा साधू भाग ले रहे हैं तो वह लड़ते ही नहीं थे देश का इससे बड़ा दुर्भाग्य कुछ नहीं है कि आज हम दुश्मन औरंगजेब , तैमूर अकबर बर्बर लुटेरो को याद रखते हैं , जहाँगीर को सपनों में देखते हैं और ऐसे भारतीय वीर योद्धाओं के बारे में कुछ नहीं जानते हैं जो देश और धर्म की शान हैं .


 तो इस प्रकार से साधू संतों ने देश की आजादी के लिए भी कई युद्ध लड़े है और अपनी कुर्बानियां दी हैं । 


सनातन धर्म , संस्कृति साधु संत यही पहचान रही है हमारी


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बुधवार, 26 जनवरी 2022

भारत का संविधान ( कब कहाँ क्यों और कैसे)

 नई दिल्ली l भारत के इतिहास में 26 नवंबर, 1949 और 26 जनवरी , 1950 का बहुत महत्‍व है। यह दोनों तारीखें भारत के संविधान के इतिहास से जुड़ी हैं। विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान ‘भारतीय संविधान’ 26 नंवबर 1949 को पारित हुआ और 26 जनवरी 1950 को प्रभावी हुआ। भारतीय संविधान के जनक डॉ. भीमराव अम्बेडकर के प्रयासों के कारण ही यह ऐसे रूप में सामने आया, जिसे न केवल भारत में सबने सराहा बल्कि विश्व में कई अन्य देशों ने भी इसे अपनाया। भारत के संविधान के प्रति हमारी आस्था, उसके बारे में जानना और उसका पूर्ण रूप से अनुपालन करना हम भारतीयों का प्रथम कर्तव्य है।

22 भागों में विभजित है भारत का संविधान

  • भारतीय संविधान दुनिया का न सिर्फ सबसे लंबा हस्तलिखित दस्तावेज है, बल्कि इसके निर्माताओं ने कई देशों की उन अच्छाइयों को भी इसके भीतर समेटा, जिससे भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में मजबूत बन सके।

  • यह 22 भागों में विभजित है, इसमे 395 अनुच्छेद एवं 12 अनुसूचियां हैं।

  • भारतीय संविधान की दो प्रतियां हिंदी और अंग्रेजी में हाथ से लिखी गईं।

  • इस संविधान को तैयार करने में 2 साल, 11 माह और 18 दिन का समय लगा।

  • इसमें कुल शब्दों की संख्या करीब 1,45,000 थी।

  • संविधान लागू होने के करीब 70 साल बाद इसमें 108 संशोधन हो चुके हैं।

  • संविधान सभा के सदस्यों की कुल संख्या 389 निश्चित की गई थी, जिनमें 292 ब्रिटिश प्रांतों के प्रतिनिधि, 4 चीफ कमिश्नर क्षेत्रों के प्रतिनिधि एवं 93 देशी रियासतों के प्रतिनिधि थे।

मूल अधिकार और मूल कर्तव्य

  • संविधान में देश के नागरिकों के लिए मूल अधिकारों की विस्तृत व्याख्या (अनुच्छेद 12-35) की गई है, जिन्हें किसी भी कानून द्वारा छीना या कमजोर नहीं किया जा सकता।

  • इसी तरह, अनुच्छेद 51ए में नागरिकों के 11 कर्तव्यों का प्रावधान है।

  • शुरुआत में धर्मनिरपेक्षता शब्द संविधान का हिस्सा नहीं था। 42वें संशोधन द्वारा इसे संविधान की प्रस्तावना में जोड़ा गया।

भारतीय संविधान के विदेशी स्त्रोत

  • भारत के संविधान को उधार का थैला भी कहा जाता है। इसमें कई अहम चीजों को अन्य संविधानों से लिया गया है।

  • आजादी, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों को फ्रांस के संविधान से लिया गया है।

  • 5 वर्षीय योजना का आइडिया यूएसएसआर से लिया गया था। सामाजिक-आर्थिक अधिकार का सिद्धांत आयरलैंड से लिया गया।

  • सबसे अहम, जिस कानून पर सुप्रीम कोर्ट काम करता है, वह जापान से लिया गया। ऐसी कई और चीजें हैं जो अन्य देशों के संविधान से ली गई हैं।

  • संघात्‍मक विशेषताएं, अवशिष्‍ट शक्तियां केंद्र के पास, केंद्र द्वारा राज्य के राज्यपालों की नियुक्ति और उच्चतम न्यायालय का परामर्श न्याय निर्णयन कनाडा से लिया गया है।

  • संविधान संशोधन की प्रक्रिया प्रावधान, राज्यसभा में सदस्यों का निर्वाचन दक्षिण अफ्रीका के संविधान से लिया गया है।

हस्तलिखित संविधान क़ो लिखने वाले प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा

 How many Indians know that the Constitution of India was written by hand. No instrument was used to write the whole constitution. Prem Bihari Narayan Rayzada, a resident oaf Delhi, wrote this huge book, the entire constitution, in italic style with his own hands.


Prem Bihari was a famous calligraphy writer of that time. He was born on 16 December 1901 in the family of a renowned handwriting researcher in Delhi. He lost his parents at a young age. He became a man to his grandfather Ram Prasad Saxena and uncle Chatur Bihari Narayan Saxena. His grandfather Ram Prasad was a calligrapher. He was a scholar of Persian and English. He taught Persian to high-ranking officials of the English government.


Dadu used to teach calligraphy art to Prem Bihari from an early age for beautiful handwriting. After graduating from St. Stephen's College, Delhi, Prem Bihari started practicing calligraphy art learned from his grandfather. Gradually his name began to spread side by side for the beautiful handwriting. When the constitution was ready for printing, the then Prime Minister of India Jawaharlal Nehru summoned Prem Bihari. Nehru wanted to write the constitution in handwritten calligraphy in italic letters instead of in print. 


That is why he called Prem Bihari. After Prem Bihari approached him, Nehruji asked him to handwrite the constitution in italic style and asked him what fee he would take.


Prem Bihari told Nehruji “Not a single penny. By the grace of God I have all the things and I am quite happy with my life. ” After saying this, he made a request to Nehruji "I have one reservation - that on every page of constitution I will write my name and on the last page I will write my name along with my grandfather's name." Nehruji accepted his request. He was given a house to write this constitution. Sitting there, Premji wrote the manuscript of the entire constitution.


Before starting writing, Prem Bihari Narayan came to Santiniketan on 29 November 1949 with the then President of India, Shri Rajendra Prasad, at the behest of Nehruji. They discussed with the famous painter Nandalal Basu and decided how and with what part of the leaf Prem Bihari would write,

Nandalal  Basu would decorate the rest of the blank part of the leaf.


Nandalal Bose and some of his students from Santiniketan filled these gaps with impeccable imagery. Mohenjo-daro seals, Ramayana, Mahabharata, Life of Gautam Buddha, Promotion of Buddhism by Emperor Ashoka, Meeting of Vikramaditya, Emperor Akbar and Mughal Empire.. 


Prem Bihari needed 432 pen holders to write the Indian constitution and he used nib number 303. The nibs were brought from England and Czechoslovakia. He wrote the manuscript of the entire constitution for six long months in a room in the Constitution Hall of India. 251 pages of parchment paper had to be used to write the constitution. The weight of the constitution is 3 kg 650 grams. The constitution is 22 inches long and 16 inches wide.


Prem Bihari died on February 17, 1986.


Collected

(ध्वजारोहण और झंडा फहराने के अंतर की व्याख्या

 !!!एक रोचक तथ्य!!!


जानिए स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस में झंडा फहराने में क्या है अंतर ?

पहला अंतर -


15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर *झंडे को नीचे से रस्सी द्वारा खींच कर ऊपर ले जाया जाता है, फिर खोल कर फहराया जाता है, जिसे *ध्वजारोहण* कहा जाता है क्योंकि यह 15 अगस्त 1947 की ऐतिहासिक घटना को सम्मान देने हेतु किया जाता है जब प्रधानमंत्री जी ने ऐसा किया था। संविधान में इसे अंग्रेजी में *Flag Hoisting (ध्वजारोहण)* कहा जाता है।


जबकि


26 जनवरी गणतंत्र दिवस के अवसर पर *झंडा ऊपर ही बंधा रहता है, जिसे खोल कर फहराया जाता है,* संविधान में इसे *Flag Unfurling (झंडा फहराना)* कहा जाता है।

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*दूसरा अंतर*


15 अगस्त के दिन *प्रधानमंत्री जो कि केंद्र सरकार के प्रमुख होते हैं वो ध्वजारोहण करते हैं,* क्योंकि स्वतंत्रता के दिन भारत का संविधान लागू नहीं हुआ था और राष्ट्रपति जो कि राष्ट्र के संवैधानिक प्रमुख होते है, उन्होंने पदभार ग्रहण नहीं किया था। इस दिन शाम को राष्ट्रपति अपना सन्देश राष्ट्र के नाम देते हैं।


जबकि


26 जनवरी जो कि देश में संविधान लागू होने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है, *इस दिन संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति झंडा फहराते हैं*

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*तीसरा अंतर*


स्वतंत्रता दिवस के दिन *लाल किले* से ध्वजारोहण किया जाता है।


जबकि


गणतंत्र दिवस के दिन *राजपथ* पर झंडा फहराया जाता है।

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HAPPY REPUBLIC DAY

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मंगलवार, 25 जनवरी 2022

रवि अरोड़ा की nj

 अंटी में क्या है/ रवि अरोड़ा


 fr

चुनाव की बेला है । प्रत्याशी धड़ाधड़ नामांकन दाखिल कर रहे हैं । कई चरणों में चुनाव होने हैं सो यह क्रम अभी लंबा चलेगा । परंपरा ही कुछ ऐसी है नामांकन दाखिल होते ही अखबार प्रत्याशी की घोषित जन्मकुंडली छापते हैं । किसके पास कितनी चल अचल संपत्ति , कितने मुकदमे, शिक्षा और कौन कौन सी गाड़ी है वगैरह वगैरह । इस वैगरह वगैरह के क्रम में यह भी लिखा होता है कि प्रत्याशी के पास कौन कौन से हथियार हैं । पता नहीं क्या गंदी आदत है कि मेरा ध्यान हथियार वाली बात पर सबसे पहले जाता है । दरअसल मुझे लगता है कि बाकी तमाम घोषणाओं में तो हेर फेर होगा मगर यह इकलौती ऐसी बात है जिसमे कोई लाग लपेट नहीं हो सकती । जैसे बेनामी संपत्ति का लेखा जोखा कोई ढूंढ नहीं सकता । माल मत्ता कितना दिखाना है यह प्रत्याशी से अधिक उसके चार्टेड एकाउंटेंट की काबिलियत पर निर्भर करता है । शिक्षा वाले कॉलम में तो राष्ट्रीय स्तर के नेता भी झोल कर लेते हैं । मुकदमों की संख्या भी फाइनल रिपोर्ट लगवा कर कम की जा सकती है । ले देकर हथियार ही ऐसा कॉलम है जिसमें चाह कर भी कोई प्रत्याशी झूठी घोषणा नहीं कर सकता । हां हथियार अवैध हो तो बात अलग है । 


मेरे शहर समेत पहले राउंड की तमाम विधान सभा सीटों पर नामांकन हो चुका है । अपनी बुरी आदत के अनुरूप इसबार भी मेरा ध्यान केवल इसी बात पर है कि किस प्रत्याशी के पास कौन सा हथियार है ? वैसे थोड़ी हैरानी भी होती है कि राजनीति तो सेवा कार्य है फिर इसमें ऐसा कौन सा जान का खतरा है कि हमारे नेताओं को हथियार रखना पड़ जाता है ? यूं भी तो गांधी जयंती और दूसरे तमाम राष्ट्रीय उत्सवों में ये नेता हमें अहिंसा का पाठ पढ़ाते रहते हैं , फिर हिंसा के इस औजार की उन्हें क्या जरूरत है ? अब तक मैं सैकड़ों प्रत्याशियों का चुनाव अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत बायोडाटा खंगाल चुका हूं , अधिकांश के पास पिस्टल, रिवाल्वर, दोनाली अथवा राइफल मौजूद है । अच्छी खासी भली सूरत वाले प्रत्याशियों के पास भी गन है । उनके पास भी है जिनके पास कोई माल असबाब भी नहीं है । पता नहीं क्या लुटने का खतरा उन्हें है ? और तो और महिला प्रत्याशियों के पास भी हथियार है । मुख्यमंत्री , पूर्व मुख्यमंत्री  स्तर के ऐसा नेता भी हथियार लिए बैठे हैं जिनकी सुरक्षा में पूरा अमला दिन भर लगा रहता है । अहिंसा का राग अलापने वाले देश का यह हाल है । कमाल है , कैसे लोग आ गए हैं राजनीति में ? 


बेशक प्रदेश में मात्र प्वाइंट 63 फीसदी लोगो को हथियार का लाइसेंस मिला हुआ है । मगर यहां के बाशिंदों के सिर हथियार का भूत ही सवार है । हर जिले में असला बाबू की औकात कलक्टर जैसी है । जिनके पास लाइसेंस है अथवा जिन्होंने इसके लिए आवेदन किया हुआ है, उन्हें पता है कि सामान्य आदमी की जूतियां घिस जाती हैं एक अदद लाइसेंस बनवाने में । सारे नियम कानूनों का पालन करने के बावजूद यह जिलाधिकारी के मूड पर निर्भर करता है कि आपको लाइसेंस मिलेगा अथवा नहीं । अधिकांश नेता भी बताते हैं कि उनके पास आने वाली आधी सिफारिशें हथियार के लाइसेंस की ही होती हैं । पूरे प्रदेश में हथियार का ऐसा क्रेज है कि देश भर में सर्वाधिक हथियार इसी सूबे में हैं । कई जिले तो ऐसे हैं कि बंदे के पांव में जूता हो अथवा नहीं , मगर कंधे पर बंदूक जरूर होगी । अब ऐसी आबोहवा हो तो नेता जी पहले अपना लाइसेंस ही तो बनवाएंगे ।  गण तंत्र दिवस आ रहा है । इस बार भी हम शहर शहर गली गली शांति, अहिंसा , प्रेम और सद्भावना पर छोटे बड़े नेताओं के भाषण सुनेंगे । यदि मन करे तो आप भी इसबार मेरी तरह नेता जी की अंटी पर ध्यान देना और पता करने की कोशिश करना कि उनकी पेंट में रिवाल्वर है या पिस्टल ?

मानवता के देवदूत

प्रस्तुति - सिन्हा आत्म स्वरूप 

मैं चेन्नई में कार्यरत था और मेरा पैतृक घर भोपालa में था।अचानक घर से पिताजी का फ़ोन आया कि तुरन्त चले आओ, जरूरी काम है। मैं आनन फानन में रेलवे स्टेशन पहुंचा और तत्काल रिजर्वेशन की कोशिश की परन्तु एक भी सीट उपलब्ध नहीं थी। सामने प्लेटफार्म पर ग्रैंड ट्रंक एक्सप्रेस खड़ी थी और उसमें भी बैठने की जगह नहीं थी, परन्तु मरता क्या नहीं करता, घर तो कैसे भी जाना था। बिना कुछ सोचे समझे सामने खड़े स्लीपर क्लास के डिब्बे में चढ गया। डिब्बे के अन्दर भी बुरा हाल था। जैसे-तैसे जगह बनाने हेतु एक बर्थ पर एक सज्जन को लेटे देखा तो उनसे याचना करते हुए बैठने के लिए जगह मांग ली। सज्जन मुस्कुराये, उठकर बैठ गए और बोले, 

*"कोई बात नहीं, आप यहाँ बैठ सकते हैं।"*

मैं उन्हें धन्यवाद दे वहीं कोने में बैठ गया। थोड़ी देर बाद ट्रेन ने स्टेशन छोड़ दिया और रफ़्तार पकड़ ली। कुछ मिनटों में जैसे सभी लोग व्यवस्थित हो गए और सभी को बैठने का स्थान मिल गया. मैंने अपने सहयात्री को देखा और सोचा बातचीत का सिलसिला शुरू किया जाये। मैंने कहा, 

*"मेरा नाम आलोक है और मैं इसरो में वैज्ञानिक हूँ। आज़ जरुरी काम से अचानक मुझे घर जाना था इसलिए स्लीपर क्लास में चढ गया, वरना मैं ए.सी. से कम में यात्रा नहीं करता।"*

वो मुस्कुराये और बोले, 

*"वाह ! मेरे साथ एक वैज्ञानिक यात्रा कर रहे हैं। मेरा नाम जगमोहन राव है। मैं वारंगल जा रहा हूँ। उसी के पास एक गाँव में मेरा घर है। मैं अक्सर शनिवार को घर जाता हूँ।"*

इतना कह उन्होंने अपना बैग खोला और उसमें से एक डिब्बा निकाला। वो बोले, 

*“ये मेरे घर का खाना है, आप लेना पसंद करेंगे ?”* 

मैंने मना कर दिया और अपने बैग से सैंडविच निकाल कर खाने लगा। जगमोहन राव !  ये नाम कुछ सुना-सुना सा लग रहा था परन्तु इस समय याद नहीं आ रहा था।

रेलगाड़ी तेज़ रफ़्तार से चल रही थी। अचानक मैंने देखा कि सामने वाली बर्थ पर 55-56 साल के सज्जन अपनी बर्थ पर तड़पने लगे। उनका परिवार भी घबरा कर उठ गया और उन्हें पानी पिलाने लगा परन्तु वो कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं थे। मैं चिल्लाया, "अरे ! कोई डॉक्टर यहाँ सफर कर रहा, इमरजेंसी है।"

रात में स्लीपर क्लास के डिब्बे में डॉक्टर कहाँ से मिलता? उनके परिवार के लोग उन्हें असहाय अवस्था में देख रोने लगे।


 तभी जगमोहन राव नींद से जाग गए। उन्होंने मुझसे पूछा, "क्या हुआ ?"

मैंने उन्हें सब बताया। मेरी बात सुनते ही उन्होंने अपने सूटकेस में से स्टेथेस्कोप निकाला और सामने वाले सज्जन की सीने धड़कने सुनने लगे। उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें दिखने लगीं। उन्होंने कुछ नहीं कहा और सूटकेस में से एक इंजेक्शन निकाला और सज्जन के सीने में लगा दिया व उनका सीना दबा-दबा कर, मुंह पर अपना रूमाल लगा कर अपने मुंह से सांस देने लगे। कुछ मिनट तक सी.पी.आर. देने के बाद मैंने देखा कि रोगी सहयात्री का तड़फना कम हो गया।

जगमोहन राव जी ने अपने सूटकेस में से कुछ गोलियां निकाली और परिवार के बेटे से बोले- 

*“बेटा, ये बात सुनकर घबराना नहीं। आपके पापा जी को मेसिव हृदयाघात आया था, मैंने इंजेक्शन दे दिया है और ये दवाइयां उन्हें दे देना।”*

उनका बेटा आश्चर्य से बोला, 

*“पर आप कौन हो ?"*

वो बोले, *“मैं एक डॉक्टर हूँ। मैं इनकी केस हिस्ट्री और दवाइयां लिख देता हूँ, अगले स्टेशन पर उतर कर आप लोग इन्हें अच्छे अस्पताल ले जाइएगा।"*

उन्होंने अपने बैग से एक लेटरपेड निकाला और जैसे ही मेरी उस लेटरपेड पर नजर पडी, मेरी याददाश्त वापस आ गयी।

उस पर छपा था - 

*डॉक्टर जगमोहन राव, हृदय रोग विशेषज्ञ, अपोलो अस्पताल, चन्नयी।*

अब मुझे भी याद आ गया कि कुछ दिन पूर्व मैं जब अपने पिता को चेकअप के लिए अपोलो हस्पताल ले गया था, वहाँ मैंने डॉक्टर जगमोहन राव के बारे में सुना था। वो अस्पताल के सबसे वरिष्ठ, विशेष प्रतिभाशाली हृदय रोग विशेषज्ञ थे। उनका एपोइमेण्ट लेने के लिए महीनों का समय लगता था। मैं आश्चर्य से उन्हें देख रहा था। 

*एक इतना बड़ा डॉक्टर स्लीपर क्लास में यात्रा कर रहा था और मैं एक छोटा सा तृतीय श्रेणी वैज्ञानिक घमंड से ए.सी. में चलने की बात कर रहा था, ये इतने बड़े आदमी इतने सामान्य ढंग से पेश आ रहे थे।* 

इतने में अगला स्टेशन आ गया और वो हृदयाघात से पीड़ित बुजुर्ग एवं उनका परिवार टी.टी. एवं स्टेशन पर बुलवाई गई मेडिकल मदद से उतर गये।

रेल वापस चलने लगी। मैंने उत्सुकतावश उनसे पूछा, “डॉक्टर साहब, आप तो आराम से ए.सी. में यात्रा कर सकते थे फिर स्लीपर में क्यूँ ?"

वो कुछ रुक कर बोले,

*“मैं जब छोटा था और गाँव में रहता था तब मैंने देखा था कि रेल में कोई डॉक्टर उपलब्ध नहीं होता, खासकर दूसरे दर्जे में। इसलिए मैं जब भी घर या कहीं जाता हूँ तो स्लीपर क्लास में ही सफ़र करता हूँ... न जाने कब किसे डाक्टर की जरुरत पड़ जाए। मैंने डॉक्टरी गरीब लोगों की सेवा के लिए ही की थी। हमारी पढ़ाई का क्या फ़ायदा यदि हम किसी के काम न आ सकें,"*

वारंगल आ गया था। वो मुस्कुरा कर उतर गये और मैं उनके बैठे हुए स्थान से आती हुई खुशबू को महसूस कर रहा था। ये खुशबू उन महान व्यक्तित्व और पुण्य आत्मा की थी।

सोमवार, 24 जनवरी 2022

सुभाष भौमिक अंबेडकर स्टेडियम में / विवेक शुक्ला

 

सुभाष भौमिक को अंबेडकर स्टेडियम में दिल्ली के फुटबॉल प्रेमियों ने 1970 से 1980 के दशकों के दौरान अपने जलवे बिखते हुए खूब देखा है। उनका गेंद पर कंट्रोल और विरोधी टीम के खिलाड़ियों को चकमा देने की कला लाजवाब थी। भौमिक को दिल्ली ने कोलकात्ता के ईस्ट बंगाल क्लब और मोहन बागान की टीमों की तरफ से खेलते हुए देखा था। वे बेहद उम्दा राइट आउट थे। वे थोड़े से स्थूल थे पर इसके बावजूद वे मैदान में लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते थे।


 दरअसल दिल्ली में 20-25 साल पहले कोलकात्ता और पंजाब की टीमों के मैचों को देखने के लिए दर्शक बड़ी तादाद में उमड़ते थे। ईस्ट बंगाल और मोहन बागान को दिल्ली भरपूर प्यार देती थी। खासतौर पर  ईस्ट बंगाल का लाल एवं सुनहरा रंग दिल्ली के फुटबॉल के शैदाइयों की कई पीढ़ियों को अपनी तरफ खींचता रहा है। पूर्व भारतीय दिग्गज फुटबॉलर और मशहूर कोच सुभाष भौमिक का लंबी बीमारी के बाद विगत शनिवार को निधन हो गया।  सुभाष भौमिक 1970 में एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीतने वाली फुटबॉल टीम के सदस्य थे। 


 अगर बात 1960 के दशक की करें तो दिल्ली को चुन्नी गोस्वामी का खेल भी बहुत पसंद था। डुरंड कप का 1965 का फाइनल मैच मोहन बागान बनाम पंजाब पुलिस के बीच  शुरू होने वाला था। अंबेडकर स्टेडियम दर्शकों से खचाखच भरा था। राष्ट्रपति एस. राधाकृष्नन मैच देखने स्टेडियम में आए हुए थे। उन्होंने देखा कि मोहन बागान के खिलाड़ियों के साथ चुन्नी गोस्वामी भी अभ्यास कर रहे हैं। 


राष्ट्रपति जी ने चुन्नी गोस्वामी को अपने पास बुलाकर कहा, “ मुझे लगता है कि तुम फाइनल मैच का स्थायी हिस्सा बन गए हो।”जरा सोचिए कि कितने खुशनसीब होते हैं वे लोग, जिनके फैन राष्ट्रपति भी होते हैं। चुन्नी गोस्वामी 1959 से  लेकर 1965 तक के हरेक डुरंड फाइनल मैच में खेले थे। दिल्ली उनकी मैदान में लय,ताल और गति की दिवानी थी।


 कोलकाता के किन खिलाड़ियों को पसंद करती दिल्ली


अगर बात सत्तर और अस्सी के दशकों की करें तो तब ईस्ट बंगाल, मोहन बागान और मोहम्डन स्पोर्टिंग के मैचों को देखने के लिए दिल्ली के दर्शक बेताब  रहते थे। ये सब टीमें अंबेडकर स्टेडियम में डीसीएम और डुरंड फुटबॉल कप में खेलती थी। कोलकाता की टीमों के सुरजीत सेन गुप्ता, सुधीर कर्माकर, भास्कर घोष, मोहम्मद हबीब,मनोरंजन भट्टाचार्य, सुभाष भौमिक, श्याम थापा जैसे बेहतरीन खिलाड़ियों की लय,ताल और गति को देखने के लिए दर्शकों में कमाल का उत्साह रहता था। ये मैच के शुरू होने से एक-दो घंटे पहले ही स्टेडियम में बैठ जाते थे। 


इन टीमों के मैच जब पंजाब के जेसीटी क्लब,बीएसएफ या पंजाब पुलिस से होते तो नजारा कमाल का होता था। पंजाब और बंगाल की टीमों के मैच बेहद संघर्ष के बाद समाप्त होते थे। इस तरह के मैचों में एक तरफ बंगाली दर्शक और दूसरी तरफ पंजाबी दर्शक होते थे। पंजाबी दर्शकों में सिखों की संख्या खासी रहा करती थी।


 पर 1984 के बाद सिख दर्शक अंबेडकर स्टेडियम से दूर होने लगे। उसके बाद अंबेडकर स्टेडियम में बंगाल और पंजाब की टीमों के बीच पहले वाले कांटे के मुकाबले होने लगभग बंद हो गए। यह मानना होगा कि बंगाली फुटबॉल प्रेमी भी पंजाब की टीमों के इंदर सिंह, हरजिंदर सिंह,मंजीत सिंह, सुखविंदर सिंह जैसे बेहद प्रतिभावान खिलाड़ियों की क्षमताओं का लोहा मानते थे।


 ईस्ट बंगाल-मोहन बगान के मैच किसे बांटते थे


ईस्ट बंगाल और मोहन बागान के बीच होने वाले मैचों से दिल्ली का बंगाली समाज भी बंट जाता था। ईस्ट बंगाल को दिल्ली में मुख्य रूप से सपोर्ट मिलती थी पूर्वी बंगाल ( अब बांग्लादेश) से देश के बंटवारे के समय बसे बंगालियों की। इनके पुऱखे देश के बंटवारे के वक्त दिल्ली आए थे। ईस्ट बंगाल और मोहन बागान के बीच होने वाले मैचों में यह दूरियां साफ तौर पर नजर आती थीं। 


मोहन बागान के साथ  मौजूदा बंगाल से संबंध रखने वाले बंगाली बंधु खड़े होते थे। पर जब ये दोनों टीमें पंजाब की बीएसएफ, जेसीटी मिल्स या पंजाब पुलिस  की टीमों से भिड़ती तब सब बंगबंधु एक हो जाते।ईस्ट बंगाल और मोहन बागान की टीम जब राजधानी में मॉडर्न स्कूल या मिन्टो रोड के प्रेस ग्राउंड में अभ्यास करती तब भी भारी संख्या में स्कूलों- कॉलेजों के नौजवान इसके स्टार खिलाड़ियों को करीब से देखने के लिए पहुंच जाते। अर्थशास्त्री डा.अर्मत्य सेन भी ईस्ट बंगाल के मैच देखने के लिए अंबेडकर स्टेडियम में मौजूद रहते थे। 

Vivek Shukla


Navbharattimes 24 January 2022.

Picture- Subhash Bhowmick

नेताजी क़ो कोटि कोटि प्रणाम /गोपाल प्रसाद व्यास

प्रस्तुति --  संगीता सिन्हा 


खोए हुए शेरों की तलाश माँगता है देश,

फिर सुभाष और आज़ाद माँगता है देश ।

महान क्रांतिकारी नेताजी सुभाषचंद्र बोस जी के जन्म दिवस पर उन्हें शत्-शत् नमन........🇮🇳🙏


वह ख़ून कहो किस मतलब का

जिसमें उबाल का नाम नहीं।

वह ख़ून कहो किस मतलब का

आ सके देश के काम नहीं।



वह ख़ून कहो किस मतलब का

जिसमें जीवन, न रवानी है!

जो परवश होकर बहता है,

वह ख़ून नहीं, पानी है!


उस दिन लोगों ने सही-सही

ख़ून की कीमत पहचानी थी।

जिस दिन सुभाष ने बर्मा में

मॉंगी उनसे कुर्बानी थी।


बोले, स्वतंत्रता की ख़ातिर

बलिदान तुम्हें करना होगा।

तुम बहुत जी चुके जग में,

लेकिन आगे मरना होगा।


आज़ादी के चरणों   में जो,

जयमाल चढ़ाई जाएगी।

वह सुनो, तुम्हारे शीशों के

फूलों से गूँथी जाएगी।


आजादी का संग्राम कहीं

पैसे पर खेला जाता है?

यह शीश कटाने का सौदा

नंगे सर झेला जाता है”


यूँ कहते-कहते वक्ता की

आँखों में ख़ून उतर आया!

मुख रक्त-वर्ण हो दमक उठा

दमकी उनकी रक्तिम काया!


आजानु-बाहु ऊँची करके,

वे बोले, रक्त मुझे देना।

इसके बदले भारत की

आज़ादी तुम मुझसे लेना।


हो गई सभा में उथल-पुथल

सीने में दिल न समाते थे।

स्वर इनक्लाब के नारों के

कोसों तक छाए जाते थे।


`हम देंगे-देंगे ख़ून'

शब्द बस यही सुनाई देते थे

रण में जाने को युवक खड़े

तैयार दिखाई देते थे। 


बोले सुभाष, इस तरह नहीं

बातों से मतलब सरता है।

लो यह कागज़ है कौन यहॉं

आकर हस्ताक्षर करता है?


इसको भरनेवाले जन को

सर्वस्व-समर्पण करना है

अपना तन-मन-धन-जन-जीवन

माता को अर्पण करना है


पर यह साधारण पत्र नहीं

आज़ादी का परवाना है

इस पर तुमको अपने तन का

कुछ उज्जवल रक्त गिराना है!


वह आगे आए जिसके तन में

खून भारतीय बहता हो।

वह आगे आए जो अपने को

हिंदुस्तानी कहता हो!


वह आगे आए, जो इस पर

खूनी हस्ताक्षर करता हो!

मैं कफ़न बढ़ाता हूँ, आए

जो इसको हँसकर लेता हो!


सारी जनता हुँकार उठी-

हम आते हैं, हम आते हैं!

माता के चरणों में यह लो,

हम अपना रक्त चढ़ाते हैं। ।


# गोपाल प्रसाद व्यास




जननायक कर्पूरी ठाकुर की सादगी बेमिसाल

 


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जननायक कर्पूरी ठाकुर की सादगी बेमिसाल व अनुकरणीय है। मुख्यमंत्री के सर्वोच्च पद पर पहुंचने के बावजूद आजीवन वे तामझाम व दिखावे से दूर रहे।
जननायक कर्पूरी ठाकुर की सादगी बेमिसाल व अनुकरणीय है। मुख्यमंत्री के सर्वोच्च पद पर पहुंचने के बावजूद आजीवन वे तामझाम व दिखावे से दूर रहे।
  • सुशील कुमार मोदी
सुशील कुमार मोदी
सुशील कुमार मोदी






ननायक कर्पूरी ठाकुर की सादगी बेमिसाल व अनुकरणीय है। मुख्यमंत्री के सर्वोच्च पद पर पहुंचने के बावजूद आजीवन वे तामझाम व दिखावे से दूर रहे। उनसे जुड़े अनेक संस्मरणों में से एक ऐसा है, जिसे मैं कभी भूल नहीं पाता हूं।

बात 1978 की है। पटना विश्वविद्यालय में छात्रसंघ के एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आए प्रसिद्ध गांधीवादी अर्थशास्त्री डा. जे. डी. सेठी मेरे राजेन्द्र नगर स्थित घर पर ठहरे हुए थे। एक दिन बाद विश्वविद्यालय के कार्यक्रम में उन्हें शामिल होना था। मैंने उनसे पूछा कि वे पटना में किससे मिलना चाहेंगे। डा. सेठी ने कहा कि अगर संभव हो तो वे जननायक कर्पूरी ठाकुर जी से मिलना चाहेंगे। मैंने कर्पूरी जी के आफिस में फोन कर डा. सेठी के पटना में होने और उनसे मिलने की इच्छा के बारे में नोट करा दिया। मैंने आग्रह किया था कि जब भी कर्पूरी जी समय देंगे, मैं डा. सेठी को लेकर बताई गई जगह पर आ जाऊंगा।

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मैं सी.एम. आफिस से कोई सूचना आने का इंतजार ही कर रहा था कि 4-5 धंटे बाद मेरे घर का काॅल बेल बजा। मेरी भाभी दरवाजा खोली, सामने जननायक कर्पूरी ठाकुर जी खड़े थे। मगर वह कर्पूरी जी को पहचानती नहीं थी। उन्होंने पूछा, आप कौन है? किससे मिलना है? कर्पूरी जी ने कहा, ‘क्या सुशील मोदी जी का घर यही है, मैं कर्पूरी ठाकुर हूं।’ कर्पूरी ठाकुर का नाम सुनते ही भाभी भौंचक रह गई।

जब जननायक कर्पूरी जी मेरे घर पर पहुंचे थे, तब उनके साथ सुरक्षाकर्मी, स्काॅट, पायलट कुछ भी नहीं था। राजेन्द्र नगर स्थित मेरे घर पर पहुंचने से पहले अम्बेसडर गाड़ी में आगे बैठे कर्पूरी जी ने रास्ते में दो-तीन जगहों पर रूक कर लोगों से रास्ता पूछा था।

यह दीगर है कि जे. डी. सेठी का 74 के जेपी आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान था। कर्पूरी जी से उनका पुराना सम्पर्क-संबंध भी था। मगर किसी राज्य का मुख्यमंत्री किसी से मिलने के लिए स्वयं किसी दूसरे के घर पर बिना किसी पूर्व सूचना, तामझाम के पहुंच जाए यह विस्मित करने वाली बात थी।

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