बुधवार, 27 अक्तूबर 2021

फ़िल्मी पोस्टर / राजा बुंदेला

 वक्त बड़ा बेरहम होता है। कभी किसी को नहीं बख्शता यह नामुराद! जिस साम्राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता था, इसने उसे भी डुबो दिया। 


इस दौर में टॉकीज के नाम से हमारे दिलो-दिमाग में छाए हुए उस जादू का तिलिस्म भी टूटा, जिसकी धड़कन हमारी साँसों के साथ वाबस्ता सी थी। एक नशा था, एक आकर्षण था, एक रोमांच था ,  गोया कि इसके बगैर हम अपनी जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकते थे।


बाजारवाद ने जिन संस्थाओं को बर्बाद किया उनमें से एक सिनेमा थिएटर भी है। हम में से 45-50 की उम्र के ऊपर का शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा जिसने टॉकीज में पिक्चर देखने के लिए मार या कम से कम डाँट ना खाई हो। तब चोरी-छिपे फ़िल्म देखना बहादुरी का काम माना जाता था। 


जवानी के बेहतरीन किस्सों में टॉकीज का जिक्र न हो ऐसा संभव ही नहीं था। पटिये की बैठक तख्ते ताउस का एहसास देती थी। रेत में सिंकती मूँगफली की खुशबू ,साथ में मिर्ची की चटनी और काला नमक पिक्चर का मज़ा दुगुना कर देते थे। मदहोश कर देनेवाले सस्ते समोसे बड़े से बड़ा व्रत तुड़वा देते थे।


 पान की पीक टॉकीज के रंगरोगन का खर्चा बचाती थी और बीड़ी और सिगरेट से निकलने वाला छल्लेदार धुआं गोपालराम गहमरी के उपन्यासों का तिलस्मी माहौल निर्मित कर देता था। उन दिनों की गेटकीपर से दोस्ती सांसद या विधायक से ऊपर मानी जाती थी।


खोजखबर करने पर मालूम पड़ा कि जिंदगी में अपने हिस्से में आये जितने भी टॉकीज, जो देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थित थे और जहाँ कभी अपन ने सिनेमा की खिड़की से दुनिया को देखा था, अब खुद दुनियाए-फानी से कूच कर चुके हैं।


इन भूतपूर्व इमारतों के साथ सामूहिक जीवन के न जाने कितने किस्से ज़मींदोज़ हो गए और सांस्कृतिक कब्रगाहों के नीचे न जाने कितनी कहानियाँ अँगड़ाई ले रही होंगी। अभी पिछले दिनों की बात है, मैं दिल्ली में था और मुझे मालूम पड़ा कि कनाट प्लेस पर स्थित वर्षों पुरानी टॉकीज ‘रीगल’ का आज आखिरी शो है और फ़िल्म का नाम है ‘मेरा नाम जोकर।’ 


तो एक बात तो तय है कि सारे सिंगल स्क्रीन टॉकीजों की हालत अमूमन देश में एक जैसी ही है। अधिकांश टॉकीजों की जगह या तो कोई मॉल या फिर किसी मल्टीप्लेक्स ने जन्म ले लिया है, जहाँ एक टिकिट चार-पाँच सौ रूपयों की और पॉप-कार्न अस्सी-सौ रूपयों का होता है। 


जाहिर है कि सिनेमा का दर्शक-वर्ग सिरे से बदल गया है और इसने इस पूरे माध्यम के लोकतांत्रिक चरित्र को गंभीर चोट पहुँचाई है। तब सिनेमा के टिकिट 70 पैसे में मिल जाते थे तो उसका कंटेंट भी आम इंसान को संबोधित करने वाला होता था।


 ‘नया दौर’ फिल्म की कहानी मशीन के विरूद्ध मानवीयता के पक्ष में खड़ी होती दिखाई पड़ती थी। यह फिल्म आज के दौर में बनती तो तांगे वांले का बेतरह मजाक उड़ाती और ओला या उबर वाले ‘नायक’ की तरफदारी करती। 


याद करें कि फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ के 2 इडियट्स किस तरह से अपने साथी के परिवार की गरीबी का ही मजाक उड़ाते दिखाई पड़ते हैं। यह अनायास नहीं है कि फिल्म का चरित्र इस बात पर भी निर्भर करता है कि फिल्म में पैसे किसने लगाए हैं ?


सुधीश पचौरी ने एक जगह लिखा है कि कुंदन शाह ‘जाने भी दो यारों ' जैसी फिल्म कभी भी नहीं बना सकते थे, अगर उसमें लगने वांले पैसे एनएफडीसी के न होते। आज भी ‘ऑफबीट’ फिल्में कम बजट के पैसों से ही बन पा रही हैं।


किसी बंद सिनेमाहाल की ढह चुकी इमारत के आगे घड़ी-भर को आँखे बंद करके खड़े हो जाएँ। आपके जेहन से होकर कई पुरानी फिल्मों के दृश्य और बीतें दिनों के सिनेमाई किस्से छलाँग भरते हुए गुजर जायेंगे ।

शब्दो का आभार

( Raja Bundela)


पुरानी पोस्ट 

सिंगल स्क्रीन थियेटर की बात चली तो याद आ गई

मंगलवार, 26 अक्तूबर 2021

पटना यूनिवर्सिटी किधर औऱ कहां है सुशासन बाबू ?

 बिहार सरकार पटना विश्वविद्यालय को पूरी तरह बंद कर इमारत और ज़मीन बेचकर खा जाए


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यह विश्वविद्यालय आधा से अधिक बंद ही हो चुका है। जब आधा से अधिक बंद होने से किसी को दिक्कत नहीं है तो पूरा बंद कर देने से भी किसी को दिक्कत नहीं होनी चाहिए।


अगर सरकार ऐसा करेगी तो लोगों का समर्थन भी मिलेगा। वे कहेंगे कि विश्वविद्यालय नाम से छुटकारा मिल गया। 


राजधानी पटना का भ्रष्ट सरकारी वर्ग और मध्यम वर्ग यह सच्चाई जानता है। बीस साल से नीतीश कुमार की सरकार है। बीस साल में यह विश्वविद्यालय बंद होने लायक ही हो सका है। 


इस विश्वविद्यालय का हाल बता रहा है कि बिहार को शिक्षा व्यवस्था से कोई मतलब नहीं है। 


इन बीस सालों में कई देश नए नए विश्वविद्यालय बना कर दुनिया के नक्शे पर आ गए लेकिन भारत और बिहार अपने विश्वविद्यालयों को मिटा कर दुनिया के नक्शे से ग़ायब हो गया। 


पटना विश्वविद्यालय में सत्तर फीसदी पदों पर शिक्षक नहीं हैं।  


यहां शिक्षकों के मंज़ूर पदों में पहले ही काफी कटौती कर दी गई है। उसके बाद जो 888 पद हैं उसमें से भी 500 से अधिक पद ख़ाली हैं। कहीं पूरे विभाग में एक भी शिक्षक नहीं हैं। 


कहीं एक भी प्रोफेसर नहीं हैं। कहीं पांच की जगह एक ही प्रोफेसर हैं। कहीं कोई सहायक प्रोफेसर भी नहीं हैं।


पटना यूनिवर्सिटी में 18,000 छात्र पढ़ते हैं। शिक्षकों के नहीं होने से कई कक्षाओं में ताले लगे हैं। प्रयोगशालाओं में ताले लगे हैं। 


जब भीतर से ताले लग ही गए हैं तो बाहर से ही क्यों न ताले लगा दिए जाएँ। जब यह यूनिवर्सिटी बंद होकर चल सकती है तो फिर पूरी तरह बंद ही क्यों न कर दी जाए। 


शिक्षक संघ का कहना है कि पिछले कुछ साल में बिहार में तीन हज़ार शिक्षकों की नियुक्ति का दावा किया जाता है।


बिहार के अलग अलग कालेजों में ये तैनात कई शिक्षक कई महीनों से वेतन के लिए दहाड़ रहे हैं। जितने नए नहीं आए उससे अधिक रिटायर हो कर चले गए। 


नए के आने से भी ख़ाली पदों की समस्या ख़त्म नहीं हुई है। गेस्ट फ़ैकल्टी के भरोसे यूनिवर्सिटी चल रही है। 


पटना विश्वविद्यालय के *साइंस कॉलेज* में पढ़ना बिहार की प्रतिभाओं का सपना होता था। इस कॉलेज की अपनी साख होती थी। 


आज इस एक कॉलेज में शिक्षकों के *91 पद हैं* लेकिन 29 ही शिक्षक हैं जो स्थायी तौर से नियुक्त हैं। *60 से अधिक पद ख़ाली हैं।* दर्जन भर से अधिक गेस्ट फैकल्टी पढ़ा रहे हैं। 


इनमें से कितने प्रतिभाशाली हैं और कितने ऐसे हैं जो कुछ न मिलने के नाम पर कुछ भी मिल जाने के नाम पर पढ़ा रहे हैं, इस पर कुछ नहीं कहना चाहूंगा लेकिनउसकी ज़रूरत ही क्या है। इतना तो सब जानते हैं। इस *साइंस कालेज में 1800 छात्र पढ़ते हैं।** इनमें से आधी लड़कियां हैं। 


यहां आकर प्रतिभाएं निखरती थीं, उल्टा कुंद हो जाती होंगी। पढ़ने का जज़्बा ख़त्म कर दिया जाता होगा। 


क्या इन छात्रों को पता होगा कि उनके साथ क्या हो रहा है। 


इनके फेसबुक पोस्ट और व्हाट्स एप चैट से आप पता कर सकते हैं कि इन्होंने एक शानदार कॉलेज की हत्या को लेकर कितनी बार चर्चा की है। 


यह जानना चाहिए कि इन छात्रों की दैनिक चिन्ताएं क्या हैं। वे अपने जीवन को किस तरह से देखते हैं? 


क्या इनके भीतर कोई उम्मीद बची है?क्या इन्हें इस बात का बोध भी है कि यहां के तीन साल में वे बर्बाद किए जा रहे हैं। 


इस बर्बादी के पीछे उनके ही द्वारा पोषित राजनीति और सरकार का हाथ है। इन मुर्दा छात्रों की राजनीतिक चेतना क्या है? 


यहां के युवाओं में दहेज़ मांगने के टाइम पर्दे के पीछे से बाइक की जगह कार की आवाज़ निकल जाती है, लेकिन क्या कभी इस बात को लेकर आवाज़ निकल सकती है कि 70 फीसदी शिक्षकों के नहीं होने से यह साइंस कॉलेज किस सांइस से चल रहा है। 


भारत में लड़कियां शादी न करें तो कार और वाशिंग मशीन की बिक्री दस प्रतिशत भी नहीं रह जाएगी क्योंकि यह ख़रीदी ही जाती है कि शादी के वक्त लड़की के पिता के द्वारा। 


बिहार का बाज़ार ही दहेज़ का बाज़ार है। यह है युवाओं की पहचान जो ट्विटर पर राष्ट्रवाद चमकाता है। 


बिहार में बीस साल से एक सरकार है। किसी सरकार को कुछ अच्छा करने के लिए क्या एक सदी दी जाती है। 


अमरीका का राष्ट्रपति भी *दो बार से ज़्यादा अपने पद पर नहीं रह सकता* चाहे वो कितना ही अच्छा क्यों न हो, चाहे उसके बाद कितना ही बुरा क्यों न आ जाए। 


आख़िर यहां का समाज कैसा है जो यह सहन कर रहा है। क्या उसे अपने बच्चों के भविष्य की कोई चिन्ता नहीं है। 


शाम को घर लौट कर टीवी लगा देना है और हिन्दू मुस्लिम देखना है। लेकिन आपका बच्चा कैसा होगा, किस कालेज में पढ़ रहा है, वहां टीचर नहीं है तो कैसे पढ़ रहा है, इस पर बात तो कीजिए। उसकी चिन्ता भी कर लीजिए। 


पिछले साल भारत से 11 लाख से अधिक छात्र बाहर चले गए। बाहर जाना बायें हाथ का खेल नहीं है। 


छात्र आठवीं क्लास से बाहर जाने का सपना देख रहा है। मां बाप उसके इस सपने पर लाखों खर्च कर रहे हैं।


तत्कालीन शिक्षा मंत्री निशंक ने संसद में बताया था कि दो लाख करोड़ रुपया एक साल में खर्च हो रहा है। 


भारत की उच्च शिक्षा के बजट से कई गुना ज्यादा पैसा ये लाचार मां बाप अपने बच्चों को भारत से बाहर भेजने पर खर्च कर रहे हैं। इनमें केवल पैसे वाले नहीं हैं। वो भी हैं जो पढ़ाई के महत्व को जानते हैं। 


भारत की उच्च शिक्षा इतनी घटिया हो चुकी है कि इससे निकलने के लिए भी आपको लाखों रुपये खर्च करने पड़ेंगे। 


यह वो दलदल है। आखिर छात्र कब बोलेंगे। नहीं बोल कर मिला क्या। 


तो फिर भ्रम में रहा ही क्यों जाए कि पटना में कोई यूनिवर्सिटी है। 


जहां शिक्षक नहीं है, वहां भी छात्र नामांकन ले लेते हैं तो फिर किसी खंभे को विश्वविद्यालय मान नामांकन ले लीजिए ।


जब युवा आवारा नेताओं को अवतार मान सकते हैं तो खंभे को विश्वविद्यालय क्यों नहीं। बिहार सरकार को भी विश्वविद्यालय चलाने का नाटक छोड़ देना चाहिए।


इसलिए पटना विश्वविद्यालय को पूरी तरह बंद कर दे। इसकी शानदार इमारत और मैदानों को बेच दे। 


इस विश्वविद्यालय के पास कुछ भी नहीं बचा है. अतीत का गाना बचा है। आज का दाना नहीं।


🙏🏻

सोमवार, 25 अक्तूबर 2021

बॉम्बे टु हैदराबाद / टिल्लन रिछारिया

 

बम्बई की सुखद अनुभूतियों के साथ हैदराबाद में हफ्ते भर का प्रवास। मौसम लाजवाब है। दसहरा आसपास ही है। जाते ही हमारे लिए लालबहादुर शास्त्री  क्रिकेट स्टेडियम में यादगार जश्न रखा गया। 


टाइम्स ऑफ़ इंडिया के  के के शास्त्री , ओमप्रकाश निर्मल और शर्मा जी के  दो चार साथियों के साथ सांगत बैठी। सत्यनारायण शर्मा जी का कलरफुल  टेब्लॉयड ' द एविडेंस वीकली ' प्रकाशित हो रहा था।


...मेरे लिए ये यादगार शाम थी।  के के शास्त्री जी उन दिनों बड़ा नाम था। टाइम्स के एडीटर गिरिलाल जैन इनका बड़ा सम्मान  करते थे और इनकी कॉपी को  हाथ लगाने से डरते थे। ...ओमप्रकाश निर्मल प्रख्यात कवि हैं , आप साहित्य की पत्रिका ' कल्पना ' से भी समंद्ध रहे। ...जब डॉ राम मनोहर लोहिया ने रामायण मेला के आयोजन की ठानी तो चित्रकार मकबूल फ़िदा हुसैन से रामकथा पर चित्र बनाने को कहा , तब हैदराबाद के बद्रीविशाल पित्ती के यहां ओमप्रकाश निर्मल हुसैन को रामकथा पढ़ कर सुनाते , व्याख्या करते तब हुसैन चित्रांकन करते। यह चित्र मैंने धर्मयुग के 1969 के दीपावली अंक मैं प्रकाशित देखें हैं।


 ...इस दौरान अपने हैदराबाद प्रवास में के के शास्त्री और ओमप्रकाश निर्मल का सान्निध्य मेरे लिए बड़ा ज्ञानवर्धक रहा। ...शरद जोशी के परम मित्र ओमप्रकाश निर्मल ने मुझे जोशी जी के व्यक्तित्व के कई पहलुओं से वाकिफ कराया और बताया की शरद जोशी हैं क्या। बताया कि  जोशी जी बौद्धिक जटिलताओं से परे और छलछंद से मुक्त व्यक्तित्व हैं। उनसे व्यवहार  में आप कोई पर्दा मत रखना। वे बहुत सहज और किसी भी सीमा तक जा कर सहयोग करने वाले हैं। 


लाल बहादुर क्रिकेट स्‍टेडियम  का पहले फतेह मैदान नाम था। बाद में 1967 में इसका नामकरण भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्‍त्री के नाम पर किया गया। 


लाल बहादुर शास्‍त्री स्‍टेडियम पर केवल तीन टेस्‍ट मैच खेले गए, ये सभी भारत और न्‍यूजीलैंड के बीच खेले गए मैच हैं। इस मैदान पर पॉली उमरीगर का दोहरा शतक और सुभाष गुप्‍ते का न्‍यूजीलैंड के खिलाफ पारी में सात विकेट लेना, यादगार पलों से हैं।


निजामी ठाठ-बाट के इस शहर का मुख्य आकर्षण चारमीनार, हुसैन सागर झील, बिड़ला मंदिर, सालार जंग संग्रहालय है, जो इस शहर को एक अलग पहचान देते हैं। किसी समय नवाबी परम्परा के इस शहर में शाही हवेलियां और निज़ामों की संस्कृति के बीच हीरे जवाहरात का रंग उभर कर सामने आया तो कभी स्वादिष्ट नवाबी भोजन का स्वाद। 


इस शहर के ऐतिहासिक गोलकुंडा दुर्ग की प्रसिद्धि दूर दूर तक पहुंची और इसे उत्तर भारत और दक्षिणांचल के बीच संवाद का अवसर सालाजार संग्रहालय तथा चारमीनार ने प्रदान किया है।  गोलकुंडा दक्षिणी  हैदराबाद  से पाँच मील पश्चिम स्थित एक दुर्ग तथा ध्वस्त नगर है। यहां इतिहास आप से संवाद करता है ।


पूर्वकाल में यह कुतबशाही राज्य में मिलनेवाले हीरे-जवाहरातों के लिये प्रसिद्ध था। इस दुर्ग का निर्माण वारंगल के राजा ने 14वीं शताब्दी में कराया था। बाद में यह बहमनी राजाओं के हाथ में चला गया और मुहम्मदनगर कहलाने लगा। 1512 ई. में यह कुतबशाही राजाओं के अधिकार में आया और वर्तमान हैदराबाद के शिलान्यास के समय तक उनकी राजधानी रहा। 


फिर 1687 ई. में इसे औरंगजेब ने जीत लिया। यह ग्रैनाइट की एक पहाड़ी पर बना है जिसमें कुल आठ दरवाजे हैं और पत्थर की तीन मील लंबी मजबूत दीवार से घिरा है। यहाँ के महलों तथा मस्जिदों के खंडहर अपने प्राचीन गौरव गरिमा की कहानी सुनाते हैं। 


मूसी नदी दुर्ग के दक्षिण में बहती है। दुर्ग से लगभग आधा मील उत्तर कुतबशाही राजाओं के ग्रैनाइट पत्थर के मकबरे हैं जो टूटी फूटी अवस्था में अब भी विद्यमान हैं।


शहर में स्थित तेलुगु फिल्म उद्योग देश का दूसरा सबसे बड़ा चलचित्र चलचित्र निर्माता है। कहा जाता है कि किसी समय में इस ख़ूबसूरत शहर को क़ुतुबशाही परम्परा के पांचवें शासक मुहम्मद कुली क़ुतुबशाह ने अपनी प्रेमिका भागमती को उपहार स्वरूप भेंट किया था।


 हैदराबाद को 'निज़ाम का शहर' तथा 'मोतियों का शहर' भी कहा जाता है।...सालार जंग संग्रहालय अब तेलंगाना राज्य की राजधानी हैदराबाद शहर में मूसा नदी के दक्षिणी तट पर दार-उल-शिफा में स्थित एक कला संग्रहालय है। यह भारत के तीन राष्ट्रीय संग्रहालयों में से एक है। यह हैदराबाद शहर के पुराने शहर जैसे चारमीनार, मक्का मस्जिद आदि महत्वपूर्ण स्मारकों के करीब है।


मीर यूसुफ अली खान, सालार जंग 3 (1889 -1949) एक महान व्यक्ति थे, जिन्होंने 7th निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान के शासन के दौरान हैदराबाद प्रांत के प्रधान मंत्री के रूप में कार्य किया था।...हैदराबाद एक जिंदादिल शहर है ।


 ... निर्मल जी ने हमें खूब हैदराबाद घुमाया। निर्मल जी शहर के प्रतिष्ठित साहित्यकर हैं ।


मंगलवार /26 - 10 -21 / 2  - 27  ए  एम

सहारा देकर जिम्मेदारी का बीज बोती सरकार / मनोज कुमार


एक मजदूर के बेटे ने यूपीएससी की परीक्षा पास कर ली.. एक चाय बेचने वाले ने अपने बेटे को आइएसएस बना दिया.. एक गरीब परिवार के बेटे ने संघर्ष कर कामयाबी हासिल की... ये खबरें बताती हैं कि हमारे समाज में प्रतिभाओं की कमी नहीं है.. वे अपने दम पर कामयाबी पा रहे हैं.. यह खबरें देश के कोने कोने से आती हैं.. दूसरे राज्यों की तरह मध्यप्रदेश भी यह खबरें सुन रहा था.. अब यहां आकर मध्यप्रदेश और दूसरे राज्यों में फकत इस बात का अंतर रह गया कि दूसरे युवाओं की कामयाबी की खबरें सुनते रह गए और मध्यप्रदेश सरकार ने आगे बढक़र ऐसे हीरों को गले से लगा लिया. मुख्यमंत्री शिवराजसिंह ने इन प्रतिभावान युवाओं के कंधे पर हाथ रखा और कहा-बढ़ो और आगे बढ़ते रहो. मैं तुम्हारे साथ हूं. यकिन करना आसान नहीं है लेकिन मध्यप्रदेश में आप हैं तो इस पर यकिन ना करने का भी कोई कारण नहीं बचता है.


एक बच्चा यूपीएससी की परीक्षा में पास हो जाता है. दिल्ली से उसका बुलावा साक्षात्कार के लिए आया है. परिवार की मदद से वह दिल्ली जाने का इंतजाम करने लगता है कि तभी सरकार की तरफ से उसे संदेशा मिलता है मध्यप्रदेश भवन में आपके रूकने के लिए इंतजाम सरकार की ओर से किया गया है. पहले तो उसे यकीन ही नहीं होता है कि क्या सच है? वह दो बार फोन करने वाले अफसर से सच जानना चाहता है. उसे भरोसा दिलाया जाता है कि वह स्वयं इस बात की तस्दीक कर ले. वह दिल्ली स्थित मध्यप्रदेश भवन पहुंचता है तो कोई गफलत की गुंजाईश ही नहीं रह जाती है. उसके एक सामने एक संकट का निदान हो गया तो एक और बात उसके मन में डूबती-उतरती रहती है. संकोच करते हुए वह सरकार के अधिकारी से पूछ लेता है कि मेरे पिताजी को अपने साथ ठहरा सकता हूं? मुस्कराते हुए अधिकारी कहते हैं- बिना शक, आप अपने पेरेंट को अपने साथ ही रख सकते हैं. सरकार का यह आदेश है.


यह कपोल-कल्पित घटना नहीं है. यह एक सच्ची घटना है जो मेरे एक नजदीक के परिचित के साथ घटित हुई थी. चूंकि परिचित के सम्पर्क गहरे हैं तो वह कुछ प्रयास कर रहे थे कि दिल्ली में रूकने का ठिकाना मिल जाए लेकिन उन्हें भी यही सूचना मिली तो पहले पहल यकिन नहीं हुआ लेकिन बेटे ने जब कन्फर्म किया तो उनके लिए राहत की बात थी.सबसे बड़ी बात यह थी कि जिसे हम लोकतंत्र कहते हैं और जिस जवाबदारी की अपेक्षा हम अपनी चुनी हुई भरोसे की सरकार से करते हैं, वह मध्यप्रदेश में पूरा होता दिख रहा है. यह तय है कि हम इसमें भी नुक्स निकाल सकते हैं और कह सकते हैं कि ये महज सरकार की वाहवाही करने की स्कीम है लेकिन कभी उन बच्चों से पूछिये जिन्होंने अपनी मेहनत से कामयाबी तो पा ली और अब उनके साथ सरकार खड़ी है तो उनका भरोसा कितना बढ़ा होगा.


भोपाल के मिंटो हॉल में यूपीएससी परीक्षा पास करने वालों से मुख्यमंत्री शिवराजसिंह ने संवाद किया तो यह एक महज औपचारिक कार्यक्रम लग रहा था. लेकिन जब मुख्यमंत्री ने इन युवाओं का साथ देने के लिए ऐलान किया तो यह भी पहली सूरत में औपचारिक ही लगा क्योंकि आजादी के सात दशक बाद ऐसा करिश्माई ऐलान की उम्मीद नहीं की जा सकती थी. लेकिन जो हुआ, वह सच था और जो हो रहा है वह लोकतांत्रिक सरकार की नयी परिभाषा गढ़ रहा है. हालांकि इस योजना का श्रेय उच्च शिक्षामंत्री डॉ. मोहन यादव के हिस्से में जाता है जो इस योजना के शिल्पकार रहे हैं. उन्होंने अपने लीडर शिवराजसिंह को इस बात के लिए सहमत किया और आज युवाओं की कामयाबी की खबरें पढऩे वाले राज्य, मध्यप्रदेश की इस अनोखी पहल से स्तब्ध हैं. हो सकता है कि पूर्व में जिस तरह से मध्यप्रदेश की योजनाओं को अन्य राज्यों ने अपनाया है, वैसा ही इस योजना के बारे में सक्रियता दिखायें. ऐसा होता है तो निश्चित रूप से युवाओं को ना केवल सहारा मिलेगा बल्कि जिम्मेदारी की भावना बलवती होगी.


इस बात को भी याद रखा जाना चाहिए कि यूपीएससी की परीक्षा पहले दफा नहीं हो रही है और ना ही पहली दफा युवा कामयाब हो रहे हैं. लेकिन इस बार एक खास बात यह भी हुई कि युवाओं का हौसलाअफजाई करने राज्य शासन ने कामयाब युवाओं पर केन्द्रित एक पुस्तक भी तैयार की. यह सुखद अनुभव भी उनके लिए पहली होगा. संभव है कि इसके पहले भी कुछ युवा परीक्षा तो पास कर चुके होंगे लेकिन तब कोई शिवराजसिंह नहीं था जो उनके हौसले बुलंद करता. जो लोग इसके पहले परीक्षा पास कर चुके होंगे और साक्षात्कार में रूक गए होंगे, वह अपनी योग्यता और प्रतिभा की कमी के कारण नहीं बल्कि आर्थिक तनाव और संसाधनों की कमी के कारण विफल हो गए होंगे. इस बार वे तनाव मुक्त हैं और मन में उल्लास है. शिवराजसिंह सरकार के इस प्रयास को इस नजर से भी देखा जाना चाहिए कि ये वही युवा हैं जो भविष्य में प्रदेश के प्रशासन की कमान सम्हालेंगे. कोई प्रशासनिक अधिकारी होगा तो कोई पुलिस का अफसर बनेगा तो किसी के जिम्मे जंगल महकमा आएगा. तब इन लोगों के भीतर अपनेपन का अहसास होगा. जिम्मेदारी होगी और नेक-नीयति के साथ अपने दायित्वों को पूर्ण कर सकेंगे. दरअसल, इन युवाओं को सहारा देने का अर्थ उस बीज का छिडक़ाव है जो आने वाले दिनों में फलदार पौधे के रूप में पूरे प्रदेश को हरा-भरा करेगा. अपने इन्हीं फैसलों की वजह से मध्यप्रदेश, देश के दिल में धडक़ता है क्योंकि देश की धडक़न का नाम है मध्यप्रदेश.े

रविवार, 24 अक्तूबर 2021

न्यूज़ एंकर की लोकप्रियता /

 Doordarshan News Reader :  udbhrant 

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फिल्मी सितारों से कम फेमस नहीं होते थे उस जमाने में /   उदभ्रात 


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दूरदर्शन के ध्वनि-संकेत के साथ, सबका अपना-अपना काम-धाम छोड़कर टेलीविजन सेट के आगे बैठ जाना. मोहल्ले का मोहल्ला यानी समूचा जमघट, समाचार सुनने को तैयार.


तब दस फ़ीसदी भी लोगों के यहाँ टेलीविजन नहीं होते थे. आस-पड़ोस में कहीं एक भी सेट हुआ, तो सब वही जाकर समाचार देख लेते थे. दिनभर की देश-विदेश की घटनाओं को उस बुलेटिन में आधे घंटे में ही समेट लिया जाता था. कम समय में ज्यादा इनपुट. देश- दुनिया की तटस्थ और मुकम्मल जानकारी. सीमित समय में, देश के लगभग सभी हिस्सों की एक संपूर्ण तस्वीर सामने आ जाती थी. यह केबिल-सैटलाइट टेलिविजन से पहले अर्थात् प्री सोशल मीडिया दौर की बात है. ये बुलेटिन खास माने जाते थे. युवा वर्ग इस बुलेटिन से जनरल नॉलेज की अच्छी-खासी जानकारी हासिल कर लेता था.


समाचार, शिष्ट-शालीन लहजे में समग्रता के साथ प्रस्तुत किए जाते थे. मसलन सलमा सुल्तान (शाहशुजा की प्रपौत्री) के धीर-गंभीर गरिमामयी व्यक्तित्व के साथ, निष्पक्ष समाचारों की प्रस्तुति. उनके बालों में बाई तरफ सलीके से लगाया गुलाब, लाखों लोगों के आकर्षण का केंद्र हुआ करता था.


न्यूज़ रीडर्स की प्रसिद्धि, किसी भी मायने में फिल्मी सितारों से कम नहीं रहती थी. उनका एक खास अंदाज़ रहता था, जो उनका ट्रेडमार्क बन जाता था. सलमा सुल्तान के, ‘आज के समाचार इस प्रकार है.’ कहते ही श्रोता एकाग्रचित्त होकर समाचार सुनते थे, या फिर बुलेटिन समाप्त होने के दौरान, शम्मी नारंग का कलम को जेब के हवाले करते हुए, ‘इसी के साथ ये समाचार बुलेटिन समाप्त हुआ.’ कहना असाइनमेंट कंप्लीट होने का आभास दे जाता था.


न्यूज़ रीडर्स की आवाज, बोलचाल का लहजा, भंगिमा के लिहाज से सबका अपना-अपना सिग्नेचर स्टाइल होता था. 


साफ-सुथरी भाषा, स्पष्ट उच्चारण, बेहतरीन वॉइस ओवर वाली आवाज, सलीके का प्रस्तुतीकरण. श्रोता उनके सिग्नेचर स्टाइल को दोहराने लगते थे, युवतियाँ महिला न्यूज़ रीडर्स के फैशन, साड़ी, मेकअप को फॉलो करतीं, तो नौजवान अपना उच्चारण दुरुस्त करते थे. अंग्रेजी बुलेटिन से विक्टोरियन प्रनंसीएशन को सीखने की चेष्टा करते.


समाचारों में उच्चारण एवं प्रस्तुति पर खासा जोर रहता था. समाचार बिना किसी निजी राय अथवा दृष्टिकोण के तटस्थ रूप से प्रस्तुत किए जाते थे. किसी भी न्यूज़ रीडर का पक्षीय झुकाव, बिल्कुल भी नहीं झलकता था. एकदम तटस्थ.


● इस श्रृंखला में : 

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जेबी रमण, वेद प्रकाश, सरला माहेश्वरी, मंजरी जोशी (प्रख्यात कवि रघुवीर सहाय की सुपुत्री), अविनाश कौर सरीन प्रमुख थे. अंग्रेजी बुलेटिन में सुमित टंडन, गीतांजलि अय्यर, रिमि साइमन खन्ना, मीनू तलवार, निधि रविंद्रन उषा अल्बुकर्क का नाम लिया जा सकता है. ये वे नाम हैं, जो उस दौर में समाचार प्रस्तुति के पर्याय बनकर रह गए. दर्शकों पर इन्होंने अपने सलीके की अमिट छाप छोड़ी.


समाचार वाचको के नेशनल आइकन बनने के पीछे एक प्रमुख कारण यह बताया जाता है कि, तब आकाशवाणी से दूरदर्शन का सफर नया-नया था, जो दर्शकों के लिए एक बहुत बड़ी छलांग हुआ करती थी. श्रव्य माध्यम से सीधे श्रव्य-दृश्य माध्यम का एक रोमांचक सफर.


दर्शक, स्वर से ही अपने पसंदीदा समाचार वाचक को पहचान लेते. तब प्रोग्राम बहुत ही सीमित होते थे. चित्रहार अथवा कृषि दर्शन के बाद राष्ट्रीय समाचार बुलेटिन की लोग व्यग्रता से प्रतीक्षा किया करते थे. न्यूज़ रूम में टेलीप्रॉम्पटर तब दूर की कौड़ी हुआ करते थे. साधारण तकनीक में उत्तम क्वालिटी. न्यूज रीडर के स्क्रिप्ट को औसत से तेज अथवा धीमे पढ़ने पर कोई अदृश्य व्यक्ति उन्हें लगातार इस बात की चेतावनी जारी करता रहता था.


समाचार वाचक एक अलिखित संहिता का पालन करते थे. समाचारों में न तो न्यूज़ रीडर्स का निजी झुकाव, रुझान अथवा पसंद-नापसंदगी झलकती थी, न ही किसी की किस्म की कोई व्यग्रता- उग्रता, उत्तेजना अथवा बिग ब्रेकिंग की ललक 

जन्मदिन मुबारक हो सुनयना ज्ञानरंजन जी / मनोहर बिल्लोरे

 सुनयना के बहाने ज्ञानरंजन जी / मनोहर बिल्लोरे 

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हुई सुंनयना 75 साल की

यह परिवार सार्थक यारी दोस्ती करने और उसे पारिवारिक तौर पर निबाहने में विश्वास रखने वाला परिवार है। इस गहन संसार में हर वय के मित्र मिलेंगे। अलग-अलग मित्र समूह हैं। गांवों कस्बों तक में दूरदराज़ फैले। हर स्तर और विस्तार के उनके मित्र उनके घर तीर्थ यात्रा के लिए आते रहते हैं। उनके प्रति सुनयना जी का उत्साह, समर्पण और आतिथ्य भाव देखते बनता है। संस्कृति के विभिन्न अनुशासनों में उनके ढेरों मुरीद मित्र मिल जायेंगे।


मैं उन्हें (सुनयना जी को) तब से जानता हूँ, जब से ज्ञान जी के अग्रवाल कालोनी वाले घर आना जाना शुरू हुआ। 85 के आसपास। राजेन्द्र चंद्रकांत राय जी की सोहबत में। जाते जाते, धीरे धीरे संकोच घटता गया और आपसी विश्वास आकार लेता गया। 


एक जवान शोध छात्रा आती है और हफ्ते-पन्द्रह दिन रहती है। घर की प्यारी सदस्या बनकर सुनयना जी की गलिबहियाँ करती प्यार से रहती है। अपना काम पूरा कर चली जाती गई।


ज्ञान जी जब 763, अग्रवाल कालोनी का किराये का मकान - जिसमें फर्नीचर आदि सब किराये का था - छोड़कर अपने निजी घर 101, रामनगर, अधारताल में आने वाले थे - 90-91 की बात होगी - उनसे पहले ही उनके घर में में सुरेन्द्र राजन (काकू), राजेन्द्र शर्मा (रज्जू) और ज्ञानरंजन के अनुज मौजूद थे। घर को कलात्मक बनाने का कार्यभार खुद ही आकर संभाल लिया था, काकू ने। परदे, तस्वीर, पोस्टर, पलंग, कुर्सी, ड्रेसिंग टेबिल और और चीज़ें। हर चीज़ की सबसे उपयुक्त जगह और स्थिति काकू ने ही निर्धारित की थी। बाकी लोग बस उनके सहायक बतौर थे। ज्ञान जी के घर में काकू घरू आदमी हैं। रात को भूख लगे तो किचिन में कुछ ढूढ़ ढांढ़ कर खाने पीने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता। ज़रूरत पड़े तो वे ज्ञान जी के बालों की कटिंग भी कर सकते हैं। काकू चीज़ों को तराशने में विश्वास करते हैं। 


विश्वमोहन वडोला का परिवार ज्ञान जी के परिवार से खूबसूरती के साथ गुथा हुआ है। वे आते हैं तो चहल-पहल बढ़ जाती है। और अनेक-अनेक उदाहरण मिल जायेंगे उनकी सघन और सान्द्र मित्रता के।

  

अब यदि सुनयना जी अपने घरेलू दायित्वों का निर्वाह इतनी कलात्मकता से न करतीं तो सम्बन्धों के समत्व की यह प्रगाढ़ता इतने उच्च स्तर की न होती, जितनी उनके साहित्यिक-सांस्कृतिक और गैर साहित्यिक-सांस्कृतिक मित्र-सम्बन्धों में हमेशा से रही है।


सुनयना जी एक जाहिर, प्रतिष्ठित, नागर, वैद्य परिवार के पिता की छह बहनों और एक भाई में तीसरी संतान हैं। उन्होंने अपने बचपन, किशोरपन और शादी से पहले युवावस्था में पिता जी के निर्देश पर घर में जरूर जड़ी बूटियां बांटी-कूटी होंगी। उनके बनाये पेयों-खाद्यों में भी वही गंध मौजूद होती है। सुनयना जी की आदत में आयुर्वेद घुल मिल गया है। मित्रता की बदौलत देश के अलग अलग शहरों से आयी खाद्य वस्तुएँ अपनी विशिष्टता के साथ उनके घर आती हैं और उनका स्वाद उनके स्थानीय मित्रों तक बड़े स्नेह और लगाव के साथ उनकी ही वजह से पहुँचता है। 


उन्हें बागवानी से शौक भर नहीं गहरा राग भी है। घर गमलों से भरा पड़ा है। बाहर चारों ओर तो हैं ही, भीतर और ऊपर भी गमले। उनके साज सम्हाल के लिए नियमित माली। पाशा (शान्तनु) और बुलबल (वत्सला) इसी सुमधुर वातावरण में उपजे, फूले फले और अपनी सार्थक जिंदगी पूरी गरिमा से जी रहे हैं। ज्ञानजी और सुनयना जी ने प्रेम विवाह किया पर उनके दोनों बच्चों के लिए बहू दामाद सुनयना जी और ज्ञानजी को ही मशक्कत कर ढूढ़ना पड़ा है।


ज्ञान जी का यदि नारा है - सर्वोत्तम, सर्वात्कृष्ट, सर्वश्रेष्ठ, सुगठित, सुविचारित, सुस्थिर है; एक कड़ा कठोर और कठिन अनुशासन, यदि ज्ञान जी का साहित्कि मानदण्डों के लिए है तो सुनयना जी उनके लिए घर में भी वह वातावरण बनाने में अपनी पूरी हिस्सेदार के साथ खड़ी होकर उनकी मित्रता की हर कड़ी को और मजबूत बनाने में सजग हिस्सेदारी लेती हैं। ज्ञान जी के सपनों को साकार करने में सुनयना जी की भूमिका किसी भी ओर-छोर उनसे कम नहीं है।


76 वें वर्ष में उनके गरिमामयी प्रवेश पर सुनयना जी को मेंरे परिवार और मित्र परिवारों की ओर से आत्मीय बधाई और सादर हार्दिक शुभ कामनाएँ।  


                                                                                 - 

शनिवार, 23 अक्तूबर 2021

पैंसठ का हो गया अशोक होटल / विवेक शुक्ला

 महान क्रांतिकारी चे ग्वेरा और धीरूभाई अंबानी में समानता तलाशना आसान नहीं है। पर बहुत कोशिश करने पर पता  चलेगा कि दोनों को अशोक होटल जोड़ता है। चे ग्वेरा यहां 30 जून, 1959 को आए थे। फिर वे यहां सात दिनों तक ठहरे । धीरूभाई अंबानी इधर 70 से 90 के दशकों में बार-बार रुका करते थे। उन्हें इधर के वे कमरे खासतौर पर पसंद थे जहां से नेहरु पार्क के नजारें देखे जा सकते हैं। वही अशोक होटल इस महीने अपनी स्थापना के 65 सालों का सफर पूरा कर रहा है। इसका 2007 से नाम हो गया है ‘दि अशोक’। लेकिन पुराना नाम नए पर भारी पड़ता है। 


यहां पर अक्तूबर,1956 में यूनिस्को सम्मेलन में भाग लेने आए दुनियाभर के प्रतिनिधियों को ठहरया गया था। गुजरे साढ़े छह दशकों के दौरान अशोक होटल को दर्जनों राष्ट्राध्यक्षों और नामवर शख्सियतों की मेजबानी का मौका मिला। इसकी भव्यता के आगे सब होटल उन्नीस हैं। इसका डिजाइन मुंबई के आर्किटेक्ट ई.बी.डाक्टर ने बनाया था। वे जेजे स्कूल ऑफ आर्ट में पढ़ाते थे।


 उन्हें पता चला कि दिल्ली में सरकार एक लक्जरी होटल का निर्माण करने जा रही है और उसे एक आर्किटेक्ट की तलाश है। डाक्टर ने फौरन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के दफ्तर में अपने काम का ब्यौरा यह कहते हुए भेज दिया कि वे होटल का डिजाइन बनाने के लिए उत्सुक  हैं। किस्मत ने उनका साथ दिया। डाक्टर को दिल्ली में प्रेजेंटेशन के लिए बुलाया गया। पंडित नेहरु ने उनसे मुलाकात की और उन्हें अशोक होटल का डिजाइन बनाने की जिम्मेदारी मिल गई। ये सब बातें 1955 की पहली तिमाही की हैं। 


डाक्टर को साफ निर्देश थे कि उन्हें तेजी से काम करना है क्योंकि अशोक होटल का निर्माण अक्तूबर 1956 तक पूरा करना है। सरकार जल्दी में थी क्योंकि राजधानी में यूनिस्को सम्मेलन आयोजित होना था। आजादी के बाद संभवत: पहली बार यहां कोई अंतरराष्ट्रीय स्तर  का सम्मेलन हो रहा था। डाक्टर ने अशोक होटल का डिजाइन बनाना शुरू किया और इसके साथ ही अशोक होटल का भूमि पूजन हो गया। तब तक चाणक्यपुरी में सब तरफ झाड़ियां और झुग्गियां ही थीं। जयपुर पोलो ग्राउंड के आगे कुछ नहीं था। इधर तमाम एंबेसी तो साठ के दशक के आरंभ में ही बनने लगी थीं।


 नए होटल को बनाने के लिए 25 एकड़ जमीन दी गई। डाक्टर ने अशोक होटल में 550 कमरों,कनवेंशन सेंटर,बगीचों वगैरह का डिजाइन और लैंड स्केपिंग की। उन्होंने इसके डिजाइन में झरोखों और जालियां देकर राजसी पुट दिया। इसका विशाल कनवेंशन सेंटर का डिजाइन तैयार करने में अपनी क्षमताओं को दिखाया। करीब डेढ़ हजार लोगों की क्षमता वाले कनवेंशन सेंटर में एक भी खंभा नहीं है। 200 पेड़ों के लिए स्पेस निकाला। ये लगभग सभी गुलमोहर के हैं। कुछ आम के हैं। 


अशोक होटल में 1983 में हुए गुट निरपेक्ष सम्मेलन के समय दर्जनों देशों के राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री ठहरे थे। उनमें फिदेल कास्त्रों भी थे। तब पीएलओ के नेता यासर अराफत भी यहीं रूके हुए थे। कहते हैं कि तब सुरक्षा कारणों के चलते कास्त्रो के चेहरे से मिलते-जुलते तीन और व्यक्ति भी अशोक होटल में थे। यह सब इसलिए किया जा रहा था ताकि कास्त्रो पर हमले की किसी भी आशंका को निरस्त किया जा सके। यहां 1986 में लिट्टे के खूंखार नेता प्रभाकरण ने भी रात बिताई थी।


 अशोक होटल की लॉबी अप्रतिम है। इधर विशाल झाड़-फानूस लगे हैं। उन्हें देखकर एक बार तो लगता है कि आप किसी महल में आ चुके हैं। यहां ही भगवान विष्णु की मूर्ति ऱखी हुई है। ये होटल में पहले दिन से है। आप लॉबी से निकलकर होटल के गलियारे में पहुंचिए। ये भी इसके मूल मिजाज के मुताबिक खासे बड़े हैं।


  अशोक होटल से पहले राजधानी में कायदे के दो ही फाइव स्टार इंपीरियल और ओबराय मेंडिस हुआ करते थे। अशोक होटल बैंड,बाजा, बारात के लिए भी विख्यात रहा है। इसमें 1968 में श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपने बड़े पुत्र राजीव गांधी की शादी की रिस्पेशन का आयोजन किया था। इधर हजारों शादियां हो चुकी हैं। आप इसकी सीढ़ियों के स्पेस को देखिए। लाजवाब है। 


ई.बी.डाक्टर को इधर आने वाले बुजुर्ग तथा गर्भवती महिलाएं दिल में धन्यवाद देते होंगे क्योंकि इधर की सीढ़ियों पर चढ़ने में कतई कष्ट नहीं होता। डाक्टर उन डिजाइनरों में थे जिन्हें मालूम था कि किस तरह से यूजर फ्रैंडली इमारतें बनाई जाती हैं। पर हैरानी की बात है कि उन्होंने दिल्ली में अशोक होटल के बाद किसी अन्य इमारत को डिजाइन नहीं किया।

Vivekshukladelhi@gmail.com 

Navbharattimes में 21 अक्तूबर को छपे लेख के अंश. 

अशोक होटल 1960 में और निर्माण के समय.

शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2021

कैंसर निरोधक है ओल ( जिमीकंद )

 *दीपावली के दिन सूरन की सब्जी*


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दीपावली के दिन सूरन की सब्जी बनती है,,,सूरन को जिमीकन्द (कहीं कहीं ओल) और कांद भी बोलते हैं, आजकल तो मार्केट में हाईब्रीड सूरन आ गया है,, कभी-२ देशी वाला सूरन भी मिल जाता है ! दीपावली के 3-4 दिन पहले से ही मार्केट में हर सब्जी वाला (खास कर के उत्तर भारत में) इसे जरूर रखता है ! और मजे की बात है कि इसकी लाइफ भी बहुत होती है !


बचपन में ये सब्जी फूटी आँख भी नही सुहाती थी ! लेकिन चूँकि यही सब्जी बनती थी तो झख मारकर इसे खाना ही पड़ता था ! तब मै सोचता था कि पापा लोग कितने कंजूस हैं जो आज त्यौहार के दिन भी ये खुजली वाली सब्जी खिला रहे हैं,,, माँ बोलती थी जो आज के दिन सूरन नहीं खायेगा 

अगले जन्म में छछुंदर का जन्म लेगा,,

यही सोच कर अनवरत खाये जा रहे है कि छछुंदर न बन जाये😂😂  


खाने के बाद हर कोई यह जरूर पूछता था कि तुम्हारा गला तो नहीं काट रहा है 😔😔 ?


बड़े हुए तब सूरन की उपयोगिता समझ में आई,,


सब्जियो में सूरन ही एक ऐसी सब्जी है जिसमें फास्फोरस अत्यधिक मात्रा में पाया जाता है,, और अब तो मेडिकल साइंस ने भी मान लिया है कि इस एक दिन यदि हम देशी सूरन की सब्जी खा ले तो स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में महीनों फास्फोरस की  कमी नही होगी,,

यह बवासीर से लेकर कैंसर जैसी भयंकर बीमारियों से बचाए रखता है। इसमें फाइबर, विटामिन सी, विटामिन बी6, विटामिन बी1 और फोलिक एसिड होता है। साथ ही इसमें पोटेशियम, आयरन, मैग्नीशियम और कैल्शियम भी पाया जाता है !


मुझे नही पता कि ये परंपरा कब से चल रही है लेकिन सोचीए तो सही कि हमारे लोक मान्यताओं में भी वैज्ञानिकता छुपी हुई होती थी ,,,

धन्य हों हमारे पूर्वज जिन्होंने विज्ञान को हमारी परम्पराओं, रीतियों और संस्कारों में पिरो दिया🙏🏻

पूर्वजों को शत -शत नमन


आप सभी को 

सादर नमस्कार 

🙏🙏🙏🙏

बुधवार, 20 अक्तूबर 2021

LATEST 100 भड़ास/ B4M


मंगलवार, 19 अक्तूबर 2021

टिल्लन रिछारिया की यादों का मोहक संसार

 कारवां फिर बम्बई की ओर ! दिसंबर 1980 में शरद जोशी जी के साथ ' हिंदी एक्सप्रेस ' के माध्यम से बम्बई में  प्रवेश मिला , श्रीवर्षा और जबलपुर के ज्ञानयुग प्रभात से गुजरते हुए फिर बम्बई की चौखट पर खड़ा था। डॉ महावीर अधिकारी की एक ललकार फिर यहां खीच लाई थी। …अधिकारी जी ने एक मुलाक़ात में हड़काया था। … क्या यार , लोग इलाहाबाद ,कानपुर ,जबलपुर छोड़ बम्बई आते है और आप बम्बई छोड़ जबलपुर रम गए हैं, आइये 'करंट' को पत्रिका बनाना है।...इस बार मैं जबलपुर से  बहला फुसला कर अपने एक साथी राकेश दीक्षित को भी ले गया था ।  नाटक प्रेमी राकेश तब जवानी और जोश की दहलीज पर थे , प्रखर और ऊर्जा से भरे हुए । बम्बई पहुंचे ही अपने पुराने अड्डे फूलवाली गली के बगल में भूलेश्वर के पंचमुखी हनुमान मंदिर में डेरा डाला । याद पड़ता है तब राकेश को मैंने चलती ट्रेन में चढ़ाया था । तब रिजर्वेशन आदि का झमेला कौन झेलता था , चढ़ गए तो गंतव्य तक पहुंच ही जायेंगे ।... ऐसे ही जबलपुर से  बम्बई की एक यात्रा बड़ी रोमांचक थी । ...जबलपुर स्टेशन पर बैठा सोच रहा था किधर जाया जाए ...4-20 पर महाकौशल जबलपुर से दिल्ली जाती थी , जो मानिकपुर होते। हुए हमारे शहर कर्वी 8 बजे के आसपास तक पहुंचा देती थी , लक्ष्य तो यही था । टिकट काउंटर पर गया तो पूछा गया कहां का टिकट चाहिए , मेरे मुंह से निकल गया बम्बई का और कहां का । बम्बई जाने वाली ट्रेन की भी सूचना दिख रही थी । टिकट बन गया बम्बई का । ...ट्रेन आयी प्लेटफार्म पर मैं निर्लिप्त निष्काम भाव से खड़ा रहा । विसिल बाजी , ट्रेन हिली चलने को , जो बोगी सामने थी चढ़ गया । ट्रेन गति पकड़ने लगी , बोगी मिलेट्री के जवानों से भरी थी , एक सरदार जी आगे बढ़े , कहां आगये जनाब , ये बोगी तो हम मिलेट्री वालों के लिए रिजर्व है । मैं बोला क्या करें कूद जाएं , मेरा सामान पकड़ते हुए सरदार जी बोले , अरे अब आगये तो आगये ...आइए आइए , मेरा सामान ऊपर की बर्थ पर रखते हुए बोले , कहां जाएंगे । मैंने बताया बम्बई । ...वेरी गुड़ हम लोग भी वहीं जाएंगे आराम से बैठिए । ट्रेन भरपूर रफ्तार में आ चुकी थी । तब तक सरदार जी मुझे चाय बिस्कुट खिला कर अपने साथियों से परिचित करा चुके थे ।...टिकट लेने के बाद मेरे पास केवल ढाई रुपये बचे थे , यह कोई चिंता की बात नही थी । मेरे एक कजिन अनंत राम रिछारिया तब बम्बई वी टी स्टेशन पर टिकट चेकर थे , कल्याण में रहते थे ।...रात बीती , सुबह हुई और दोपहर 12 बजे के आसपास ट्रेन बम्बई वी टी स्टेशन जा पहुंची । इस सफर मे एक पैसा खर्च नहीं हुआ , रात का भोजन , चाय , सुबह का नाश्ता सब मेरे सह यात्रियों की ओर से था । देवदूत जो मिल गए थे , मैं संकोच से भरा सब स्वीकार करता रहा । इतना प्रेम सत्कार । कहा गया , हम सीमा पर तैनात हैं देश की रक्षा के लिये और आप देश के अंदर बतौर पत्रकार सेवा दोनों कर रहे हैं । हमारे लिए ये यादगार सफर है कि आप का साथ मिला । वी टी स्टेशन में हम उनका शुक्रिया अदा कर आगे बढ़े । लोकल ट्रेन के प्लेटफार्म पर पहुंचते ही एक टिकर चेकर पिल्लई साहब मेरी ओर बढ़े , मैंने अपने कजिन का परिचय दिया । आज तो अनंतराम जी आये नहीं , आप आइए और जगदीश शर्मा जी से मिलवाया की ये आप को कल्याण ले जाएंगे । शर्मा जी साथ उनकी डियूटी खत्म होने के बाद शाम को हम कल्याण पहुंचे । शर्मा जी बताया अभी बोरीबंदर पत्रिका में आप के प्रकाशित लेख पढ़ें हैं । हफ्ते भर कल्याण में रहे ,उसी समय फ़िल्म मुकद्दर का सिकंदर फ़िल्म देखी , बम्बई देखी और संयोग बना तो आर के स्टूडियों जाने का ।वहां तीन चार घंटे समय बिताने का मौका मिला । वहां उस समय , सत्यम शिवम सुंदरम का सेट तोड़ा जा रहा था और मनोज कुमार की फ़िल्म क्रांति के लिए सेट बनाया जा रहा था ।...यह मेरे शरद जोशी जी के साथ हिंदी एक्सप्रेस ज्वाइन करने के पहले यानी 1980 के पहले का वृत्तान्त है ।...जिस दिन आर के स्टूडियो जाना हुआ संयोग ऐसा रहा कि उस दिन वहां  किसी हाल में कोई शूटिंग  नहीं थी । सत्यम शिवम सुंदरम का टूटता और क्रांति का बनता हुआ से देखने के बाद राज साब कके निजी कक्ष को देखने का मौका मिला । जीने चढ़ कर पहली मंजिल पर जाते हुए देखा , दीवारों आर के की अब तक आई फिल्मों के पोस्टर दीवारों पर लगे हैं । उनके कमरे में उनकी आदमकद तस्वीर , सफेद चादर से सजी मुलायम गद्दों वाली वैठक , कोने मुंशियों वालो डेस्क , इसी कक्ष से लगा मेकअप रूम ।...कितनी प्रतिभाओं की यादों , इतनी कहानियों से भरा यह कक्ष ...महसूस कर सकतें हैं राज कपूर के सृजन की तासीर । उनकी मौजूदगी का अहसास  । यहां आयी  गई तमाम शख्सियत बेशक इस समय सामने न हों पर उनकी अदृश्य मौजूदगी महसूस होती है । पृथ्वीराज , प्रेमनाथ , राज कपूर , नरगिस , शैलेन्द्र , शंकर जय किशन...कितने नाम अनाम सितारों का दीदार काने वाला यह कक्ष अदृश्य रूप में ही सही उन सबसे मिलवा तो रहा । सिनेमा का अनुपम तीर्थ । राज साहब के कक्ष में स्मृतियो का आसव पीने के बादं बाहर वह शिवलिग भी देखा जो आर के की फिल्मों की शुरुआत में पूजा करते हुए पृथ्वीराज जी के साथ दिखता है ।... डॉ महावीर अधिकारी से मुलाकात होती है ' करंट ' के मैग्ज़ीनीकरण पर चर्चा होती है । इस बार के बम्बई प्रवास में राकेश भी साथ है , मैं इसे करंट में साथ काम करने के लिहाज से साथ ले आया था जल्द ही करंट ज्वाइन करना था । पर हुआ यह कि बम्बई की घुमाई फिराई के बीच  एक दिन पृथ्वी थियेटर मे हम लोगों ने नादिरा बब्बर निर्दर्शित नाटक ' सांध्य छाया ' देखा । बहुत भावपूर्ण नाटक था । राकेश झटका कहा गया । ... नहीं नहीं अब नहीं रहना यहां , मैं जबलपुर जाऊंगा । मैंने फुसलाने का बड़ा तिलिस्म फैलाया इसका ध्यान भटकाने के लिए पर भइया न माना तो न माना । जबलपुरिया भावुकता के लपेटे में आ गया । ऐसे ही 1970 में जबलपुर से बम्बई कूच करते समय आचार्य रजनीश से जबलपुर के संगियों ने कहा कि अब डूब जाओगे बम्बई जा कर भूल जाओगे हम सब को कौन साथी , कौन और कैसा जबलपुर  । ...रजनीश ने कहा , मैं कहीं भी रहूं , कैसा भी रहूं , रहूँगा तो जबलपुर का ही । ये कैसे हो सकता है कि मैं कही रहूं और वहां जबलपुर न हो । ...कौन भूल पाता है अपनी कुंज गलियों को , अपनी क्रीड़ाभूमि को , अपने घर , गांव , शहर को पर जब बात अपने लक्ष्य और अपने सपनों को हकीकत में पाने की होती है तो अपने अवधपुर वासियों को सोता छोड़ कर , गोपियों को बिलखता छोड़ और बुद्ध की तरह अपना सर्वस्व छोड़ संकल्प सिद्धि के लिए अनजान  अचीन्ही दुनिया में जाना ही पड़ता हैं  ।  ...कितनी कितनी बार हमने  राग अनुराग के अनुबंध तोड़े हैं ।

टिल्लन रिछारिया की यादों का संसार

 ' करंट ' से पहले ' धर्मयुग ' की अंगनाई में 


कभी  की बम्बई , यानी  आज की मुंबई हमेशा ही  मेरे दिलों-दिमाग के सबसे खूसूरत अहसास का मुकाम रही है ! … वो बोरी बन्दर ,वो टाइम्स इंडिया की बिल्डिंग ,वो धर्मयुग के गलियारे ,वो संध्याएं, वो समंदर की लहरें ,वो  लोकल ट्रेन , चर्चगेट ,बांद्रा ,खार,अँधेरी तक का सफर ! यादों के सफर का एक जिंदादिल पड़ाव। …सन 1980 से 87 तक के बम्बई-प्रवास के दौरान ' धर्मयुग ' की अँगनाई में इस टिल्लन रिछारिया नाम के प्राणी को भी कुछ कालावधि तक किलोल करने का अवसर मिला। … मैं  बुद्धि,कला , विज्ञान सब में अौसत से अौसततर,यह किस करिश्में का अंजाम था , सब के साथ-साथ मैं भी चकित था --यूं ही सहज भाव से एक सामान्य सी  दोपहर मैं धर्मयुग की की और मुड़ गया , गणेश मंत्री जी से मुखातिब था चाय के प्याले के साथ , भारती जी से मिलने के लिए  अनुमति की अर्जी लगा चुका  था -- मंत्री जी बोले , टिल्लन  जी.… अवध जी तीन -चार माह की छुट्टी पर जा रहे हैं आप उनकी ऐवज में  यहां  काम कर लो !… कुछ कह-सुन पाता  की भारती जी का बुलावा आ गया !


 


भारती के साथ उनके कक्ष में  … वो हाल चाल पूंछते रहे मैं बताता रहा ,घर यानी कर्वी - चित्रकूट से लौटा था रामायण मेला का हाल सुना रहा था। … चाय भी आ गयी। … कुछ और बातें की  एकाएक पता नहीं किस भाव-उराव में मैं कह गया , मंत्री जी ऐसा-ऐसा कह रहे थे ! बड़े सहज भाव से भारती जी ने सुना , बोले … अच्छा ! घंटी बजाई,चपरासी आया … सरल जी ! सरल जी आये तो सहज ही मैं  अपना चाय का कप लिए खड़ा हो गया। … सरल जी , ये टिल्लन जी कल से अवध जी का काम देखेंगे , इन्हें यहाँ के तौर -तरीके बता दीजिये। … मैं हतप्रभ … ! मेरी ओर देख भारती जी बोले , हाँ अब क्या , जाइए …! 


 


हम दोनों कक्ष से बाहर ! सरल जी … ' डियर क्या हुआ ! ' मैंने कहा , भाई साहब जो भी कुछ हुआ सब आप के सामने ही  हुआ  ! मंत्री जी को सरल जी ने बताया , मंत्री जी मुस्कुराते हुए उलाहना भरे अंदाज़ में बोले ' जब हमने कहा तो … और जब भारती जी  ने कहा तो राजी !… मैंने  आग्रह सहित मंत्री का आभार व्यक्त करते हुए कहा , ' मंत्री जी मैं आप की बात को साहस करके अंदर कह गया। … चलिए ख़ुशी है , स्वागत है धर्मयुग परिवार में !


 अजब-गजब अनुभूति थी ! …जैसे  हजारों पंख उग आये हो , क्षितिज इंद्रधनुषी , हवाओं में सरगम … ऐसा भी होता है क्या ! लेकिन यह सब हो चुका था ! 


 घर - परिवार के  बाहर अगर कहीं कोई प्यार-परिवार का अहसास मिला तो धर्मयुग परिवार में !


 बम्बई में सबका प्यार मिला  ऐतबार मिला, रचना का भरपूर संसार मिला !  … सुरेन्द्र प्रताप जी जब  कलकत्ता से लौटे नवभारत टाइम्स के लिए  तो धर्मयुग उनकी मौजूदगी से खास गुलजार रहा , हमें भी उनका सानिध्य मिला ! सरल जी सब के प्यारे रहे , वे चिरायु हो , मंत्री जी सब के आदरणीय रहे। … मैं सभी का स्नेह  भाजन रहा पर अवध किशोर पाठक और ओमप्रकाश मेरे अन्यतम रहे और हैं। … एक निर्मोही की भी बहुत याद आती है --युगांक धीर की ,जिनका नाम नहीं लिख पा रहा वो सब   कम प्यारे नहीं रहे ! नारायण दत्त , विश्वनाथ , कुमार प्रशांत , सुदीप, सुदर्शना जी स्मृतियों से परे  नहीं हैं। भूले-बिसरे सब को   नमन ! 


डॉ  धर्मवीर भारती हिंदी पत्रकारिता के सफलतम सम्पादकों में शुमार हैं। धर्मयुग कभी 5 लाख की प्रसार संख्या पार कर चुका है।

सोमवार, 18 अक्तूबर 2021

महाभारत पांचवा वेद ?

 महाभारत को पांचवां वेद कहा गया है। यह भारत की गाथा है। इस ग्रंथ में तत्कालीन भारत (आर्यावर्त) का समग्र इतिहास वर्णित है। अपने आदर्श पात्राें के सहारे यह हमारे देश के जन-जीवन को प्रभावित करता रहा है। इसमें सैकड़ों पात्रों, स्थानों, घटनाओं तथा विचित्रताओं व विडंबनाओं का वर्णन है।


महाभारत में कई घटना, संबंध और ज्ञान-विज्ञान के रहस्य छिपे हुए हैं। महाभारत का हर पात्र जीवंत है, चाहे वह कौरव, पांडव, कर्ण और कृष्ण हो या धृष्टद्युम्न, शल्य, शिखंडी और कृपाचार्य हो। महाभारत सिर्फ योद्धाओं की गाथाओं तक सीमित नहीं है। महाभारत से जुड़े शाप, वचन और आशीर्वाद में भी रहस्य छिपे हैं।


उस समय मौजूद थे परमाणु अस्त्र


मोहनजोदड़ो में कुछ ऐसे कंकाल मिले थे जिसमें रेडिएशन का असर था। महाभारत में सौप्तिक पर्व के अध्याय 13 से 15 तक ब्रह्मास्त्र के परिणाम दिए गए हैं। हिंदू इतिहास के जानकारों के मुताबिक 3 नवंबर 5561 ईसापूर्व छोड़ा हुआ ब्रह्मास्त्र परमाणु बम ही था?


18 का अंक का जादू


कहते हैं कि महाभारत युद्ध में 18 संख्‍या का बहुत महत्व है। महाभारत की पुस्तक में 18 अध्याय हैं। कृष्ण ने कुल 18 दिन तक अर्जुन को ज्ञान दिया। गीता में भी 18 अध्याय हैं।18 दिन तक ही युद्ध चला। कौरवों और पांडवों की सेना भी कुल 18 अक्षोहिणी सेना थी जिनमें कौरवों की 11 और पांडवों की 7 अक्षोहिणी सेना थी। इस युद्ध के प्रमुख सूत्रधार भी 18 थे। इस युद्ध में कुल 18 योद्धा ही जीवित बचे थे। सवाल यह उठता है कि सब कुछ 18 की संख्‍या में ही क्यों होता गया?


कौरवों का जन्म एक रहस्य


कौरवों को कौन नहीं जानता। धृतराष्ट्र और गांधारी के 99 पुत्र और एक पुत्री थीं जिन्हें कौरव कहा जाता था। कुरु वंश के होने के कारण ये कौरव कहलाए। सभी कौरवों में दुर्योधन सबसे बड़ा था। गांधारी जब गर्भवती थी, तब धृतराष्ट्र ने एक दासी के साथ सहवास किया था जिसके चलते युयुत्सु नामक पुत्र का जन्म हुआ। इस तरह कौरव सौ हो गए।


गांधारी ने वेदव्यास से पुत्रवती होने का वरदान प्राप्त कर लिया। गर्भ धारण के पश्चात भी दो वर्ष व्यतीत हो गए, किंतु गांधारी काे कोई भी संतान उत्पन्न नहीं हुई। इस पर क्रोधवश गांधारी ने अपने पेट पर जोर से मुक्के का प्रहार किया जिससे उसका गर्भ गिर गया।


वेदव्यास ने इस घटना को तत्काल ही जान लिया। वे गांधारी के पास आकर बोले- गांधारी! तूने बहुत गलत किया। मेरा दिया हुआ वर कभी मिथ्या नहीं जाता। अब तुम शीघ्र ही सौ कुंड तैयार करवाओ और उनमें घृत (घी) भरवा दो।वेदव्यास ने गांधारी के गर्भ से निकले मांस पिण्ड पर अभिमंत्रित जल छिड़का जिससे उस पिण्ड के अंगूठे के पोरुए के बराबर सौ टुकड़े हो गए।


वेदव्यास ने उन टुकड़ों को गांधारी के बनवाए हुए सौ कुंडों में रखवा दिया और उन कुंडों को दो वर्ष पश्चात खोलने का आदेश देकर अपने आश्रम चले गए। दो वर्ष बाद सबसे पहले कुंड से दुर्योधन की उत्पत्ति हुई। फिर उन कुंडों से धृतराष्ट्र के शेष 99 पुत्र एवं दु:शला नामक एक कन्या का जन्म हुआ।


महान योद्धा बर्बरीक


बर्बरीक महान पांडव भीम के पुत्र घटोत्कच और नागकन्या अहिलवती के पुत्र थे। कहीं-कहीं पर मुर दैत्य की पुत्री कामकंटकटा के उदर से भी इनके जन्म होने की बात कही गई है। महाभारत का युद्ध जब तय हो गया तो बर्बरीक ने भी युद्ध में सम्मिलित होने की इच्छा व्यक्त की और मां को हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन दिया। बर्बरीक अपने नीले रंग के घोड़े पर सवार होकर तीन बाण और धनुष के साथ कुरुक्षेत्र की रणभूमि की ओर अग्रसर हुए।


बर्बरीक के लिए तीन बाण ही काफी थे जिसके बल पर वे कौरव और पांडवों की पूरी सेना को समाप्त कर सकते थे। यह जानकर भगवान कृष्ण ने ब्राह्मण के वेश में उनके सामने उपस्थित होकर उनसे दान में छलपूर्वक उनका शीश मांग लिया।


बर्बरीक ने कृष्ण से प्रार्थना की कि वे अंत तक युद्ध देखना चाहते हैं, तब कृष्ण ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। फाल्गुन मास की द्वादशी को उन्होंने अपने शीश का दान दिया। भगवान ने उस शीश को अमृत से सींचकर सबसे ऊंची जगह पर रख दिया ताकि वे महाभारत युद्ध देख सकें। उनका सिर युद्धभूमि के समीप ही एक पहाड़ी पर रख दिया गया, जहां से बर्बरीक संपूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे।


राशियां नहीं थीं ज्योतिष का आधार


महाभारत के दौर में राशियां नहीं हुआ करती थीं। ज्योतिष 27 नक्षत्रों पर आधारित था, न कि 12 राशियों पर। नक्षत्रों में पहले स्थान पर रोहिणी था, न कि अश्विनी। जैसे-जैसे समय गुजरा, विभिन्न सभ्यताओं ने ज्योतिष में प्रयोग किए और चंद्रमा और सूर्य के आधार पर राशियां बनाईं और लोगों का भविष्य बताना शुरू किया, जबकि वेद और महाभारत में इस तरह की विद्या का कोई उल्लेख नहीं मिलता जिससे कि यह पता चले कि ग्रह नक्षत्र व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करते हैं।


विदेशी भी शामिल हुए थे लड़ाई में


महाभारत के युद्ध में विदेशी भी शामिल हुए थे। इस आधार पर यह माना जाता है कि महाभारत प्रथम विश्व युद्ध था।


28वें वेदव्यास ने लिखी महाभारत


ज्यादातर लोग यह जानते हैं कि महाभारत को वेदव्यास ने लिखा है लेकिन यह अधूरा सच है। वेदव्यास कोई नाम नहीं, बल्कि एक उपाधि थी, जो वेदों का ज्ञान रखने वालाें काे दी जाती थी। कृष्णद्वैपायन से पहले 27 वेदव्यास हो चुके थे, जबकि वे खुद 28वें वेदव्यास थे। उनका नाम कृष्णद्वैपायन इसलिए रखा गया, क्योंकि उनका रंग सांवला (कृष्ण) था और वे एक द्वीप पर जन्मे थे।


तीन चरणों में लिखी महाभारत


वेदव्यास की महाभारत तीन चरणों में लिखी गई। पहले चरण में 8,800 श्लोक, दूसरे चरण में 24 हजार और तीसरे चरण में एक लाख श्लोक लिखे गए ।।

रविवार, 17 अक्तूबर 2021

ये उन दिनों की बात है जब.....

 *गांव - गिरांव*


कभी नेनुँआ टाटी पे चढ़ के रसोई के दो महीने का इंतज़ाम कर देता था!


कभी खपरैल की छत पे चढ़ी लौकी महीना भर निकाल देती थी  और कभी बैसाख में दाल और भतुआ से बनाई सूखी कोहड़ौरी,  सावन भादों की सब्जी का खर्चा निकाल देती थी‌!


वो दिन थे,  जब सब्जी पे

खर्चा पता तक नहीं चलता था!


देशी टमाटर और मूली जाड़े के सीजन में भौकाल के साथ आते थे  लेकिन खिचड़ी आते-आते उनकी इज्जत घर जमाई जैसी हो जाती थी!


तब जी.डी.पी. का अंकगणितीय करिश्मा नहीं था!


ये सब्जियाँ सर्वसुलभ और हर रसोई का हिस्सा होती थीं!


लोहे की कढ़ाई में किसी के घर रसेदार सब्जी पके तो,  गाँव के डीह बाबा तक गमक जाती थी !

धुंआ एक घर से निकला की नहीं, तो आग के लिए लोग चिपरि लेके दौड़ पड़ते थे।

संझा को रेडियो पे चौपाल और आकाशवाणी के सुलझे हुए

समाचारों से दिन रुखसत लेता था!


रातें बड़ी होती थीं पर  दुआर पे कोई पुरनिया आल्हा छेड़ देता था तो मानों कोई सिनेमा चल गया हो!


किसान लोगों में कर्ज का फैशन नहीं था  फिर बच्चे बड़े होने लगे,  बच्चियाँ भी बड़ी होने लगीं।


बच्चे सरकारी नौकरी पाते ही अंग्रेजी इत्र लगाने लगे।


बच्चियों के पापा सरकारी दामाद में नारायण का रूप देखने लगे,  किसान क्रेडिट कार्ड डिमांड और ईगो का प्रसाद बन गया,  इसी बीच मूँछ बेरोजगारी का सबब बनी।


बीच में मूछमुंडे इंजीनियरों का दौर आया।


अब दीवाने किसान,  अपनी बेटियों के लिए खेत बेचने के लिए तैयार थे।

  बेटी गाँव से रुख़सत हुई,  पापा का कान पेरने वाला रेडियो, साजन की टाटा स्काई वाली एल.ई.डी. टीवी के सामने फीका पड़ चुका था!


अब आँगन में नेनुँआ का बिया छीटकर,   मड़ई पे उसकी लताएँ चढ़ाने वाली बिटिया,  पिया के ढाई बी.एच.के. की बालकनी के गमले में क्रोटॉन लगाने लगी और सब्जियाँ मंहँगी हो गईं!


बहुत पुरानी यादें ताज़ा हो गई। सच में उस समय सब्जी पर कुछ भी खर्च नहीं हो पाता था,  जिसके पास नहीं होता उसका भी काम चल जाता था!


दही मट्ठा का भरमार था,

सबका काम चलता था!

मटर, गन्ना, गुड़ सबके लिए

इफरात रहता था और

सबसे बड़ी बात तो यह थी कि आपसी मनमुटाव रहते हुए भी अगाध प्रेम रहता था!


आज की छुद्र मानसिकता,

दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती थी।

हाय रे ऊँची शिक्षा,  कहाँ तक ले आई!


आज हर आदमी, एक दूसरे को शंका की निगाह से देख रहा है!


विचारणीय है कि,

क्या सचमुच हम विकसित हुए हैं,या

यह केवल एक छलावा है

ई बात नये लोग नहीं जानते हैं।


ये उन दिनों की बात है जब


घर आँगन चौपाल नहीं


पूरा गली मोहल्ला गांव अपना होता था


बड़े घर परिवार  आँगन की तरह

दिल भी बड़े होते थे.


बैंक बैलेंस तो मोटा हो गया


पर पतले से हो गये मोटे भाई


 घर आँगन खेत चौपाल की तरह.


हम दो हमारे दो के  अमर मुहावरें  के फ्रेम  में


 परिवार की गाड़ी मारुती सेट हो गयी


गांव भर की अपनी गाड़ी

 बिन बैल कबाड़ में ख़डी है


औऱ ट्रैक्टर


बिन. ब्याहे बुजुर्ग की तरह बेकाम


खेत में ख़डी है.. 🙏🏿✌🏼





फ़िल्मी पोस्टर / राजा बुंदेला

 वक्त बड़ा बेरहम होता है। कभी किसी को नहीं बख्शता यह नामुराद! जिस साम्राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता था, इसने उसे भी डुबो दिया।  इस दौर में टॉ...