रविवार, 31 अक्टूबर 2021

आलू के फायदे


*स्‍वास्‍थ्‍य के लिए कितना फायदेमंद है आलू का जूस*

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*जोड़ों के लिये फायदेमंद:*


आलू के जूस में ऐसे गुण होते हैं, जो सूजन को दूर करते हैं। जोड़ों की समस्याओं जैसे अर्थराइटिस आदि से प्रभावित लोगों के लिये दिन में दो बार आलू का जूस पीने से सूजन व दर्द कम होते हैं। साथ ही आलू के जूस के सेवन से जोड़ों में रक्त संचार भी बेहतर होता है। 


कोलेस्ट्रोल के स्तर को घटाए

 और हृदयवाहिकीय रोगों से बचाए:-

दिल की बिमारियों और स्ट्रोक से बचने व इन्हें कम करने में आलू के जूस का सेवन बेहद लाभदायक होता है। यह नब्ज़ के अवरोध, कैंसर, हार्ट अटैक और ट्यूमर को बढ़ने से कम करता है। इसके अलावा आलू के जूस का सेवन करने से कोलेस्ट्रोल के स्तर को नियंत्रण में रखा जा सकता है। यह आपके समस्त स्वस्थ्य सम्बन्धी समस्याओं को भी ठीक करता है और सिरर्द को भी दूर करता है। 


*गाउट रोग के उपचार में:*

आलू का जूस गाउट अर्थात गठिया रोग में फायदेमंद होता है। इस जूस को पीने से शरीर में से यूरिक एसिड बाहर निकलता है। आलू के जूस में सूजन कम करने वाले गुण होते हैं, अतः इसके सेवन से गाउट के कारण होने वाली सूजन भी दूर होती है। 


*वज़न कम करने में मददगार:*

आलू के जूस को पीने से अतिरिक्त वज़न घटाता है। इसके लिये सुबह उठकर नाश्ते से पहले और सोने से दो से तीन घंटे पहले आलू का जूस पीएं। इससे आप भूख पर नियंत्रण कर पाते हैं और वज़न घटता है।


*किडनी की देखभाल करता है:*

किडनी की बीमारियों से बचने व इनसे राहत पाने के लिये आलू का जूस पीएं। यह ब्लड प्रेशर और डायबिटीज को भी नियंत्रण में रखने में सहायता करता है। आलू के जूस का सेवन मूत्राशय में कैल्शियम का पत्थर बनने नहीं देता। इसके अलावा हेपेटाइटिस लिवर और गॉल ब्लैडर की गंदगी शरीर से बाहर निकालने के लिए भी आलू के जूस का सेवन काफी फादेमंद होता है। जापानी लोग तो हेपेटाइटिस को दूर करने के लिये आलू के जूस का उपयोग किया करते थे।

*Vaid Deepak Kumar*

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वासुदेव बलवन्त फड़के

 

अगर बात करे भारतीय स्वतंत्रता की क्रांति और उन क्रांतिकारियों की जिनकी वजह से देश को आजादी मिली तो इतिहास की रेत में शायद हज़ारों नाम दबे मिले। पर हम सिर्फ कुछ नामों से ही रु-ब-रु हुए हैं। वैसे तो भारत माँ के इन सभी सपूतों के बारे में जानकारी सहेजने की कोशिश जारी है ताकि आने वाली हर पीढ़ी इनके बलिदान को जान-समझ सके।


ऐसा ही एक महान क्रांतिकारी और भारत माँ का सच्चा बेटा था वासुदेव बलवंत फड़के! फड़के ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह का संगठन करने वाले भारत के प्रथम क्रान्तिकारी थे। उनका जन्म 4 नवंबर, 1845 को महाराष्ट्र के रायगड जिले के शिरढोणे गांव में हुआ था।

 

साल 1857 की क्रांति की विफलता के बाद एक बार फिर भारतीयों में संघर्ष की चिंगारी फड़के ने ही जलाई थी।


वासुदेव बलवन्त फड़के बचपन से ही बड़े तेजस्वी और बहादुर बालक थे। उन्हें वनों और पर्वतों में घूमने का बड़ा शौक़ था। कल्याण और पुणे में उनकी शिक्षा पूरी हुई। फड़के के पिता चाहते थे कि वह एक व्यापारी की दुकान पर दस रुपए मासिक वेतन की नौकरी कर लें। लेकिन फड़के ने यह बात नहीं मानी और मुम्बई आ गए।


उन्होंने 15 साल पुणे के मिलिट्री एकाउंट्स डिपार्टमेंट में नौकरी की। इस सबके दौरान फड़के लगातार अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के सम्पर्क में रहे। उन पर खास प्रभाव महादेव गोविन्द रानाडे का था। फड़के के में पहले ही ब्रिटिश राज के खिलाफ बग़ावत के बीज पड़ चुके थे।

 

ऐसे में एक और घटना हुई और इस घटना ने फड़के के पुरे जीवन को ही बदल दिया। साल 1871 में, एक शाम उनकी माँ की तबियत खराब होने का तार उनको मिला। इसमें लिखा था कि ‘वासु’ (वासुदेव बलवन्त फड़के) तुम शीघ्र ही घर आ जाओ, नहीं तो माँ के दर्शन भी शायद न हो सकेंगे।


इस तार को पढ़कर वे विचलित हो गये और अपने अंग्रेज़ अधिकारी के पास अवकाश का प्रार्थना-पत्र देने के लिए गए। किन्तु अंग्रेज़ तो भारतीयों को अपमानित करने के लिए तैयार रहते थे। उस अंग्रेज़ अधिकारी ने उन्हें छुट्टी नहीं दी, लेकिन फड़के दूसरे दिन अपने गांव चले आए।


पर गांव जाकर देखा कि माँ तो अपने प्यारे वासु को देखे बिना ही इस दुनिया को छोड़ गयीं। इस बात का उनके मन पर बहुत आघात हुआ और उन्होंने तभी वह अंग्रेजी नौकरी छोड़ दी।

 

देश में स्वतंत्रता सेनानियों के साथ मिलकर उन्होंने भी ब्रिटिश राज के खिलाफ जंग की तैयारी शुरू कर दी। उन्हें देशी राज्यों से कोई सहायता नहीं मिली तो फड़के ने शिवाजी का मार्ग अपनाकर आदिवासियों की सेना संगठित करने की कोशिश शुरू की।


साल 1879 में उन्होंने अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा कर दी। उन्होंने पूरे महाराष्ट्र में घूम-घूमकर नवयुवकों से विचार-विमर्श किया, और उन्हें संगठित करने का प्रयास किया।  महाराष्ट्र की कोळी, भील तथा धांगड जातियों को एकत्र कर उन्होने ‘रामोशी’ नाम का क्रान्तिकारी संगठन खड़ा किया। अपने इस मुक्ति संग्राम के लिए धन एकत्र करने के लिए उन्होने धनी अंग्रेज साहुकारों को लूटा।

 

महाराष्ट्र के सात ज़िलों में वासुदेव फड़के की सेना का ज़बर्दस्त प्रभाव फैल चुका था। जिससे अंग्रेज़ अफ़सर डर गए थे। इस कारण एक दिन बातचीत करने के लिए वे विश्राम बाग़ में इकट्ठा हुए। वहाँ पर एक सरकारी भवन में बैठक चल रही थी।


13 मई, 1879 को रात 12 बजे वासुदेव बलवन्त फड़के अपने साथियों सहित वहाँ आ गए। अंग्रेज़ अफ़सरों को मारा तथा भवन को आग लगा दी। उसके बाद अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें ज़िन्दा या मुर्दा पकड़ने पर पचास हज़ार रुपए का इनाम घोषित किया। किन्तु दूसरे ही दिन मुम्बई नगर में वासुदेव के हस्ताक्षर से इश्तहार लगा दिए गए कि जो अंग्रेज़ अफ़सर ‘रिचर्ड’ का सिर काटकर लाएगा, उसे 75 हज़ार रुपए का इनाम दिया जाएगा। अंग्रेज़ अफ़सर इससे और भी बौखला गए।


फड़के की सेना और अंग्रेजी सेना में कई बार मुठभेड़ हुई, पर उन्होंने अंग्रेजी सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। लेकिन फड़के की सेना का गोला-बारूद धीरे-धीरे खत्म होने लगा। ऐसे में उन्होंने कुछ समय शांत रहने में ही समझदारी मानी और वे पुणे के पास के आदिवासी इलाकों में छिप गये।


20 जुलाई, 1879 को फड़के बीमारी की हालत में एक मंदिर में आराम कर रहे थे। पर किसी ने उनके यहाँ होने की खबर ब्रिटिश अफसर को दे दी। और उसी समय उनको गिरफ्तार कर लिया गया। उनके खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया और उन्हें फांसी की सजा सुनाई गयी।

 

लेकिन एक बहुत ही विख्यात वकील महादेव आप्टे ने उनकी पैरवी की। जिसके बाद उनकी मौत की सजा को कालापानी की सजा में बदल दिया गया और उन्हें अंडमान की जेल में भेजा गया। 17 फरवरी, 1883 को कालापानी की सजा काटते हुए जेल के अंदर ही देश का यह वीर सपूत शहीद हो गया।


साल 1984 में भारतीय डाक सेवा ने उनके सम्मान में एक पोस्टल स्टैम्प भी जारी की। दक्षिण मुंबई में उनकी एक मूर्ति की स्थापना भी की गयी।


देश के इस महान क्रांतिकारी को कोटि-कोटि नमन!

शनिवार, 30 अक्टूबर 2021

. होमी जहांगीर भाभा

 डॉ. होमी जहांगीर भाभा 1950 से 1966 तक परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष और भारत सरकार के सचिव थे। वो कभी भी अपने चपरासी को अपना ब्रीफ़केस उठाने नहीं देते थे। ख़ुद उसे ले कर चलते थे जो कि बाद में विक्रम साराभाई भी किया करते थे। वो हमेशा कहते थे कि पहले मैं वैज्ञानिक हूँ और उसके बाद परमाणु ऊर्जा आयोग का अध्यक्ष। एक बार वो किसी सेमिनार में भाषण दे रहे थे तो सवाल जवाब के समय एक जूनियर वैज्ञानिक ने उनसे एक मुश्किल सवाल पूछा। भाभा को ये कहने में कोई शर्म नहीं आई कि अभी इस सवाल का जवाब उनके पास नहीं है। मैं कुछ दिन सोच कर इसका जवाब दूंगा।


ऐसा विलक्षण व्यक्तित्व था भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक का!


डॉ. होमी जहाँगीर भाभा का जन्म मुम्बई के एक पारसी परिवार में 30 अक्टूबर, 1909 को हुआ था। 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने बम्बई के एक हाईस्कूल से सीनियर कैम्ब्रिज की परीक्षा पास की और बाद में उच्च शिक्षा के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय गए। उनकी ज्ञान और प्रतिभा से परिचित कुछ नामी विश्वविद्यालयों ने उनको अध्यापन कार्य के लिये आमंत्रित किया लेकिन उन्होंने 'भारतीय विज्ञान संस्थान' (IISc) बैंगलोर को चुना जहाँ वे भौतिक शास्त्र विभाग के प्राध्यापक के पद पर रहे।


उस वक़्त सर सी. वी. रमन भौतिक शास्त्र विभाग के प्रमुख थे और उन्हें डॉ. भाभा शुरू से ही पसंद थे। उन्होंने डॉ. भाभा को फैलो ऑफ़ रायल सोसायटी में चयन हेतु भी मदद की। बैंगलोर में डॉ. भाभा कॉस्मिक किरणों के हार्ड कम्पोनेंट पर रिसर्च कर रहे थे लेकिन उन्हें देश में विज्ञान की उन्नति के बारे में बहुत चिंता थी।


चूँकि बैंगलोर का संस्थान देश में वैज्ञानिक क्रांति के लिए पर्याप्त नहीं था, उन्होंने परमाणु विज्ञान में रिसर्च करने के लिए एक अलग संस्थान बनाने की सोची और सर दोराब जी टाटा ट्रस्ट से मदद माँगी।


1 जून, 1945 को उनके द्वारा प्रस्तावित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) के एक छोटे से रूप का श्रीगणेश हुआ। डॉ. भाभा ने अपनी वैज्ञानिक और प्रशासनिक ज़िम्मेदारियों के साथ-साथ TIFR की इमारत की भी ज़िम्मेदारी उठायी। उन्होंने इसे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में खड़ा करने का सपना देखा। साल 1962 में TIFR पूरी तरह से फंक्शनल हो चूका था।


यह डॉ. भाभा के प्रयासों का ही प्रतिफल है कि आज विश्व के सभी विकसित देशों में भारत के नाभिकीय वैज्ञानिकों की प्रतिभा एवं क्षमता का लोहा माना जाता है।

उनके जन्मदिवस पर उनको नमन करते हैं।

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021

हल्दीघाटी की मिट्टी

 एक बार अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन भारत के दौरे पर आ रहे थे, तो उन्होंने अपनी मां से पूछा, मैं आपके लिए भारत से क्या लेकर आऊं, तो उनकी मां ने कहा था भारत से तुम हल्दीघाटी की मिट्टी लेकर आना जिसे हजारों वीरों ने अपने रक्त से सींचा है। लेकिन, इन सब के उपरांत भी इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में महाराणा प्रताप की वीरता के अध्याय पढ़ाने की बजाय अकबर की महानता के किस्से पढ़ाना इस सच्चे राष्ट्रनायक के बलिदान के साथ नाइंसाफी है।


धरती के इस वीर पुत्र के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी कि जब उसकी महानता व माटी के प्रति कृतज्ञता की कहानी हरेक जन तक पहुंचाई जाएगी।


#जय_राजपुताना 

#क्षत्रिय

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2021

फ्रेंकली स्पीकिंग ' वाली देवियानी चौबल / टिल्लन रिछारिया

 ' 

एक जमाने में बंबई के फिल्म  जर्नलिज्म में ...जहीन , हसीन , बेधड़क , चंचल , शोख ...महिला जर्नलिस्ट का नामा बड़े रुतबे से लिया जाता था । ...राजकपूर से ले कर राजेश खन्ना तक इनकी डैशिंग राइटिंग के मुरीद थे । ...अपनी खूबसूरती और लेखनी और हुनर के दम पर इन्होंने दशकों तक बम्बई के ग्लेमर की दुनिया में राज किया ।...खुबसूरती ऐसी की अच्छी अच्छी हीरोइनें तक फ़ीकी पड़ जाएं । ...नाम देवयानी चौबल ! कालम  ' फ्रैंकली स्पीकिंग '...  मैगज़ीन ...स्टार एंड स्टाइल और ईव्ज वीकली । ...जिंदादिल गपशप , सीधा निशाना और  सटीक आखेट के लिए मशहूर इस हस्ती से मिलने जब हम स्टार एंड स्टाइल  के ऑफिस में इनकी बैठक के ठीक सामने पहुंचे तो ... खुले दरवाजे के उस पार यह शख्सियत श्वेत परिधान में , श्वेत मोतियों की माला पहने , गोरी गोरी काया और खुले खुले बालों के आकर्षण के साथ दरवाजे तरफ ही देख रही थीं । मेरे ठीक द्वार के सामने रुकते ही बोली , जी कहिए । मैंने कहा , आप ही से मिलने आये हैं । ...आइए आइए  । ...पिछले दिनों दिल्ली में  एक मुलाकात में जनसत्ता के वरिष्ठ पत्रकार मनमोहन तल्ख ने विशेष जोर दे कर मुझसे कहा था कि आप मेरा रिफरेंस दे कर देवयानी से जरूर मिलना  । ...तो आज हो रही है मुलाकात , हम दोनों आमने सामन हैं । ... बेहद कम लोगों को मालूम होगा कि राजेश खन्ना का नाम अपने जमाने की एक बेहद प्रभावशाली महिला पत्रकार से भी जुड़ा था. तब कहा जाता था कि उनकी कामयाबी के पीछे इस महिला पत्रकार का हाथ था । इस दबंग महिला पत्रकार देवयानी चौबल ने राजेश खन्ना के करियर में काफी पुश अप किया ।


 60 - 70 के दशक में 'स्टार व स्टाइल' नाम से बॉलीवुड फिल्म मैगजीन निकलती थी. यह वहीं पत्रकार हैं जिन्होंने सबसे पहले राजेश खन्ना को सुपरस्टार कह । ' ' फ्रेंकली स्पीकिंग ' खासा चर्चित कालम था अपने समय का ।

देवयानी चौबल के पास फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़ी हर गतिविधियों की जानकारी होती थी.  देवयानी ही वह पत्रकार थी जिसने राजेश खन्ना की आनंद फिल्म  देखने के बाद यह कहा था कि तुम अब कभी इस लंबू के साथ काम मत करना, तुमने इसकी आंखें देखीं हैं. ...लेकिन उनस वक्त राजेश खन्ना देवयानी की बातों को समझ नहीं पाये थे.उन दिनों फिल्म इंडस्ट्री में कहा जाता था कि इस महिला पत्रकार का राजेश खन्ना के साथ करीबी रिश्ता है । यह सच है कि राजेश खन्ना के करियर को आगे बढ़ाने में देवयानी चौबल का बड़ा रोल रहा है...जब राजेश खन्ना की शादी हो रही थी तो इस बारे में भी सबसे पहले देवयानी को ही खबर हुई थी। देवयानी ही वो पहली शख्स थीं, जिसको राजेश खन्ना ने बताया था कि वह डिंपल कपाड़िया के साथ शादी के बंधन में बंधने जा रहे हैं।...देवयानी ने जब यह खबर ब्रेक की कि राजेश खन्ना अपनी उम्र से करीब आधी उम्र की डिंपल कपाड़िया संग शादी करने जा रहे हैं तो पूरी इंडस्ट्री में तहलका मच गया था। देवयानी और राजेश खन्ना की करीबी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देवयानी ने शादी के दिन राजेश खन्ना को अपने हाथों से सहरा पहनाया था।...देवयानी का अपना ही मिज़ाज था वह जिसे चाहती उस पर अपनी लेखनी से फूल बरसा देती  और आगर कोई उसे भाव नहीं देता तो वह अपने कॉलम्स में स्टार्स और एक्टर्स के बारे में शरारती गॉसिप्स छापना शुरू कर देती थीं। धर्मेद्र से लेकर राज कपूर और दिलीप कुमार तक के साथ वह ऐसा करती रहती । उनकी कई स्टार्स से नोंकझोंक भी हुई थी। वह नेमा मालिनी को इडली लिखती । कुछ हेमा मालिनी के बारे मे लिखा तो धर्मेंद्र खासे भड़क गए । यह वाकया काफी सुर्खियों में रह ।...मैं देख रहा हूँ उनकी गहरी आंखें  , इन आँखों ने बॉलीवुड के कितने रहस्य देखें होंगे , कितने उजागर हुए होंगे ,  कितने दफ्न हुए , कितने अभी यहीं तैर रहे हैं ।...मैंने अपने यहां आने का सबब बताया , तल्ख जी बता रहे थे कि आप अपने कॉलम ' फ्रैंकली स्पीकिंग '  का अन्य भाषाओं में  विस्तार  चाहती हैं । ...हां , इरादा तो है पर मैं ऐसे लोग चाहती हूं कि जो मेरी बात का सिर्फ तर्जुमा न करें बल्कि अपने भाषाई फ्लेवर और मुहावरों से उसे जानदार बना दें । अपनी बात कहना, लिखना बहुत आसान है , पर किसी   के लिखे को रिक्रिएट करना बड़े कौशल की बात है । आप को देख कर तो लगता कि आप बेहतर कर लोगे । ...मैन कहा यह विश्वास कैसे आया ।...अरे भाई  हमारा तो काम ही है कि... एक नज़र देख कर उसके भविष्य की कहानी लिख देना । हमने कहा ठीक है । ...हम लोग मिलते रहेंगे , मुझे और भाषाओं के लोग भी तलाशने होंगे । आप भी देखिए ।... नमस्ते बमस्ते हुआ और गुडबाय ।

कालापानी / काला पानी का गुमनाम वीर : महावीर

 



अंडमान की काला पानी कहे जानी वाली सेलुलर जेल में अंग्रेजों की यातनाओं, बदसलूकी और बदइंतजामी के खिलाफ जेल में बंद क्रांतिकारियों ने भूख हड़ताल शुरू कर दी। जब अंग्रेज अधिकारियों को इसकी सूचना हुई तो उन्होंने महावीर पर जुल्म बढ़ा दिए, उनकी भूख हड़ताल को खत्म करने  के सभी प्रयास किए, लेकिन महावीर सिंह नहीं टूटे। अंग्रेज़ों ने इनकी भूख हड़ताल को तोड़ने की भरसक कोशिशें कीं लेकिन वह नाकाम रहे। बन्दियों को जबरदस्ती खाना खिलाने का भी प्रयास किया गया, लेकिन उसमें भी गोरे अंग्रेज नाकाम रहे। उन्होंने महावीर सिंह की भी भूख हड़ताल तुड़वाने की बहुत कोशिशें की, उन्हें अनेकों लालच भी दिए, यातनाएं दीं लेकिन वह अपने निर्णय से टस से मस नहीं हुए। लाख कोशिशों के बावजूद अंग्रेज महावीर सिंह की भूख हड़ताल नहीं तुड़वा सके। अंग्रेज़ों ने फिर जबरदस्ती करके उनके मुँह में खाना ठूंसने की कोशिशें कीं, इसमें भी वो सफल नहीं हो पाए।


इसके बाद अंग्रेजों ने नली के द्वारा नाक से उन्हें जबरदस्ती दूध पिलाने की कोशिश की। इस प्रक्रिया में उन्हें जमीन पर गिराकर 8 पुलिसवालों ने पकड़ रखा था। हठी महावीर सिंह राठौड़ ने पूरी जान लगाकर उनका विरोध किया जिससे दूध उनके फेफड़ों में चला गया। नतीजतन इससे तड़प तड़पकर उनकी 17 मई 1933 को मृत्यु हो गई और उनके शव को पत्थरों से बांधकर समुद्र में फेंक दिया गया।


दुःख की बात है कि महावीर सिंह की शहादत से आज भी बहुत कम लोग परिचित हैं। उनके परिवार को भी उनकी राष्ट्रभक्ति की कीमत भीषण यातनाओं के रूप में चुकानी पड़ी। अंग्रेज़ों की यातनाओ से तंग आकर उनके परिवार को 9 बार अपने घर ,यहां तक कि गांव को भी छोड़कर जाना पड़ा। आज भी उनका परिवार गुमनामी की जिंदगी जीने को विवश है। ऐसे वीर क्रांतिकारी के परिवार से आजाद भारत की सरकार आज भी मुंह मोड़े हुए है। इससे अधिक शर्मनाक बात और क्या हो सकती है। यह है देश के लिए अपना सर्वस्व होम करने वाले भारत मां के वीर सपूतों की हकीकत। उन्हें सम्मान की बात तो दीगर है, उनके परिजनों की सुध लेने वाला भी कोई नहीं। उत्तर प्रदेश के एटा जिले के राजा का रामपुर क्षेत्र के शाहपुर टहला गांव में राजपूती परिवार ठाकुर देवी सिंह राठौर के यहां 16 सितंबर 1904 को उनका जन्म हुआ था जिसका नाम रखा गया महावीर। अब यह गांव कासगंज जिले के अंतर्गत आता है। नमन है वीर महावीर की शहादत को।


साभार....

Krishnapal सिंह / लोक माध्यम 

#vss

बुधवार, 27 अक्टूबर 2021

फ़िल्मी पोस्टर / राजा बुंदेला

 वक्त बड़ा बेरहम होता है। कभी किसी को नहीं बख्शता यह नामुराद! जिस साम्राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता था, इसने उसे भी डुबो दिया। 


इस दौर में टॉकीज के नाम से हमारे दिलो-दिमाग में छाए हुए उस जादू का तिलिस्म भी टूटा, जिसकी धड़कन हमारी साँसों के साथ वाबस्ता सी थी। एक नशा था, एक आकर्षण था, एक रोमांच था ,  गोया कि इसके बगैर हम अपनी जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकते थे।


बाजारवाद ने जिन संस्थाओं को बर्बाद किया उनमें से एक सिनेमा थिएटर भी है। हम में से 45-50 की उम्र के ऊपर का शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा जिसने टॉकीज में पिक्चर देखने के लिए मार या कम से कम डाँट ना खाई हो। तब चोरी-छिपे फ़िल्म देखना बहादुरी का काम माना जाता था। 


जवानी के बेहतरीन किस्सों में टॉकीज का जिक्र न हो ऐसा संभव ही नहीं था। पटिये की बैठक तख्ते ताउस का एहसास देती थी। रेत में सिंकती मूँगफली की खुशबू ,साथ में मिर्ची की चटनी और काला नमक पिक्चर का मज़ा दुगुना कर देते थे। मदहोश कर देनेवाले सस्ते समोसे बड़े से बड़ा व्रत तुड़वा देते थे।


 पान की पीक टॉकीज के रंगरोगन का खर्चा बचाती थी और बीड़ी और सिगरेट से निकलने वाला छल्लेदार धुआं गोपालराम गहमरी के उपन्यासों का तिलस्मी माहौल निर्मित कर देता था। उन दिनों की गेटकीपर से दोस्ती सांसद या विधायक से ऊपर मानी जाती थी।


खोजखबर करने पर मालूम पड़ा कि जिंदगी में अपने हिस्से में आये जितने भी टॉकीज, जो देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थित थे और जहाँ कभी अपन ने सिनेमा की खिड़की से दुनिया को देखा था, अब खुद दुनियाए-फानी से कूच कर चुके हैं।


इन भूतपूर्व इमारतों के साथ सामूहिक जीवन के न जाने कितने किस्से ज़मींदोज़ हो गए और सांस्कृतिक कब्रगाहों के नीचे न जाने कितनी कहानियाँ अँगड़ाई ले रही होंगी। अभी पिछले दिनों की बात है, मैं दिल्ली में था और मुझे मालूम पड़ा कि कनाट प्लेस पर स्थित वर्षों पुरानी टॉकीज ‘रीगल’ का आज आखिरी शो है और फ़िल्म का नाम है ‘मेरा नाम जोकर।’ 


तो एक बात तो तय है कि सारे सिंगल स्क्रीन टॉकीजों की हालत अमूमन देश में एक जैसी ही है। अधिकांश टॉकीजों की जगह या तो कोई मॉल या फिर किसी मल्टीप्लेक्स ने जन्म ले लिया है, जहाँ एक टिकिट चार-पाँच सौ रूपयों की और पॉप-कार्न अस्सी-सौ रूपयों का होता है। 


जाहिर है कि सिनेमा का दर्शक-वर्ग सिरे से बदल गया है और इसने इस पूरे माध्यम के लोकतांत्रिक चरित्र को गंभीर चोट पहुँचाई है। तब सिनेमा के टिकिट 70 पैसे में मिल जाते थे तो उसका कंटेंट भी आम इंसान को संबोधित करने वाला होता था।


 ‘नया दौर’ फिल्म की कहानी मशीन के विरूद्ध मानवीयता के पक्ष में खड़ी होती दिखाई पड़ती थी। यह फिल्म आज के दौर में बनती तो तांगे वांले का बेतरह मजाक उड़ाती और ओला या उबर वाले ‘नायक’ की तरफदारी करती। 


याद करें कि फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ के 2 इडियट्स किस तरह से अपने साथी के परिवार की गरीबी का ही मजाक उड़ाते दिखाई पड़ते हैं। यह अनायास नहीं है कि फिल्म का चरित्र इस बात पर भी निर्भर करता है कि फिल्म में पैसे किसने लगाए हैं ?


सुधीश पचौरी ने एक जगह लिखा है कि कुंदन शाह ‘जाने भी दो यारों ' जैसी फिल्म कभी भी नहीं बना सकते थे, अगर उसमें लगने वांले पैसे एनएफडीसी के न होते। आज भी ‘ऑफबीट’ फिल्में कम बजट के पैसों से ही बन पा रही हैं।


किसी बंद सिनेमाहाल की ढह चुकी इमारत के आगे घड़ी-भर को आँखे बंद करके खड़े हो जाएँ। आपके जेहन से होकर कई पुरानी फिल्मों के दृश्य और बीतें दिनों के सिनेमाई किस्से छलाँग भरते हुए गुजर जायेंगे ।

शब्दो का आभार

( Raja Bundela)


पुरानी पोस्ट 

सिंगल स्क्रीन थियेटर की बात चली तो याद आ गई

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2021

पटना यूनिवर्सिटी किधर औऱ कहां है सुशासन बाबू ?

 बिहार सरकार पटना विश्वविद्यालय को पूरी तरह बंद कर इमारत और ज़मीन बेचकर खा जाए


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यह विश्वविद्यालय आधा से अधिक बंद ही हो चुका है। जब आधा से अधिक बंद होने से किसी को दिक्कत नहीं है तो पूरा बंद कर देने से भी किसी को दिक्कत नहीं होनी चाहिए।


अगर सरकार ऐसा करेगी तो लोगों का समर्थन भी मिलेगा। वे कहेंगे कि विश्वविद्यालय नाम से छुटकारा मिल गया। 


राजधानी पटना का भ्रष्ट सरकारी वर्ग और मध्यम वर्ग यह सच्चाई जानता है। बीस साल से नीतीश कुमार की सरकार है। बीस साल में यह विश्वविद्यालय बंद होने लायक ही हो सका है। 


इस विश्वविद्यालय का हाल बता रहा है कि बिहार को शिक्षा व्यवस्था से कोई मतलब नहीं है। 


इन बीस सालों में कई देश नए नए विश्वविद्यालय बना कर दुनिया के नक्शे पर आ गए लेकिन भारत और बिहार अपने विश्वविद्यालयों को मिटा कर दुनिया के नक्शे से ग़ायब हो गया। 


पटना विश्वविद्यालय में सत्तर फीसदी पदों पर शिक्षक नहीं हैं।  


यहां शिक्षकों के मंज़ूर पदों में पहले ही काफी कटौती कर दी गई है। उसके बाद जो 888 पद हैं उसमें से भी 500 से अधिक पद ख़ाली हैं। कहीं पूरे विभाग में एक भी शिक्षक नहीं हैं। 


कहीं एक भी प्रोफेसर नहीं हैं। कहीं पांच की जगह एक ही प्रोफेसर हैं। कहीं कोई सहायक प्रोफेसर भी नहीं हैं।


पटना यूनिवर्सिटी में 18,000 छात्र पढ़ते हैं। शिक्षकों के नहीं होने से कई कक्षाओं में ताले लगे हैं। प्रयोगशालाओं में ताले लगे हैं। 


जब भीतर से ताले लग ही गए हैं तो बाहर से ही क्यों न ताले लगा दिए जाएँ। जब यह यूनिवर्सिटी बंद होकर चल सकती है तो फिर पूरी तरह बंद ही क्यों न कर दी जाए। 


शिक्षक संघ का कहना है कि पिछले कुछ साल में बिहार में तीन हज़ार शिक्षकों की नियुक्ति का दावा किया जाता है।


बिहार के अलग अलग कालेजों में ये तैनात कई शिक्षक कई महीनों से वेतन के लिए दहाड़ रहे हैं। जितने नए नहीं आए उससे अधिक रिटायर हो कर चले गए। 


नए के आने से भी ख़ाली पदों की समस्या ख़त्म नहीं हुई है। गेस्ट फ़ैकल्टी के भरोसे यूनिवर्सिटी चल रही है। 


पटना विश्वविद्यालय के *साइंस कॉलेज* में पढ़ना बिहार की प्रतिभाओं का सपना होता था। इस कॉलेज की अपनी साख होती थी। 


आज इस एक कॉलेज में शिक्षकों के *91 पद हैं* लेकिन 29 ही शिक्षक हैं जो स्थायी तौर से नियुक्त हैं। *60 से अधिक पद ख़ाली हैं।* दर्जन भर से अधिक गेस्ट फैकल्टी पढ़ा रहे हैं। 


इनमें से कितने प्रतिभाशाली हैं और कितने ऐसे हैं जो कुछ न मिलने के नाम पर कुछ भी मिल जाने के नाम पर पढ़ा रहे हैं, इस पर कुछ नहीं कहना चाहूंगा लेकिनउसकी ज़रूरत ही क्या है। इतना तो सब जानते हैं। इस *साइंस कालेज में 1800 छात्र पढ़ते हैं।** इनमें से आधी लड़कियां हैं। 


यहां आकर प्रतिभाएं निखरती थीं, उल्टा कुंद हो जाती होंगी। पढ़ने का जज़्बा ख़त्म कर दिया जाता होगा। 


क्या इन छात्रों को पता होगा कि उनके साथ क्या हो रहा है। 


इनके फेसबुक पोस्ट और व्हाट्स एप चैट से आप पता कर सकते हैं कि इन्होंने एक शानदार कॉलेज की हत्या को लेकर कितनी बार चर्चा की है। 


यह जानना चाहिए कि इन छात्रों की दैनिक चिन्ताएं क्या हैं। वे अपने जीवन को किस तरह से देखते हैं? 


क्या इनके भीतर कोई उम्मीद बची है?क्या इन्हें इस बात का बोध भी है कि यहां के तीन साल में वे बर्बाद किए जा रहे हैं। 


इस बर्बादी के पीछे उनके ही द्वारा पोषित राजनीति और सरकार का हाथ है। इन मुर्दा छात्रों की राजनीतिक चेतना क्या है? 


यहां के युवाओं में दहेज़ मांगने के टाइम पर्दे के पीछे से बाइक की जगह कार की आवाज़ निकल जाती है, लेकिन क्या कभी इस बात को लेकर आवाज़ निकल सकती है कि 70 फीसदी शिक्षकों के नहीं होने से यह साइंस कॉलेज किस सांइस से चल रहा है। 


भारत में लड़कियां शादी न करें तो कार और वाशिंग मशीन की बिक्री दस प्रतिशत भी नहीं रह जाएगी क्योंकि यह ख़रीदी ही जाती है कि शादी के वक्त लड़की के पिता के द्वारा। 


बिहार का बाज़ार ही दहेज़ का बाज़ार है। यह है युवाओं की पहचान जो ट्विटर पर राष्ट्रवाद चमकाता है। 


बिहार में बीस साल से एक सरकार है। किसी सरकार को कुछ अच्छा करने के लिए क्या एक सदी दी जाती है। 


अमरीका का राष्ट्रपति भी *दो बार से ज़्यादा अपने पद पर नहीं रह सकता* चाहे वो कितना ही अच्छा क्यों न हो, चाहे उसके बाद कितना ही बुरा क्यों न आ जाए। 


आख़िर यहां का समाज कैसा है जो यह सहन कर रहा है। क्या उसे अपने बच्चों के भविष्य की कोई चिन्ता नहीं है। 


शाम को घर लौट कर टीवी लगा देना है और हिन्दू मुस्लिम देखना है। लेकिन आपका बच्चा कैसा होगा, किस कालेज में पढ़ रहा है, वहां टीचर नहीं है तो कैसे पढ़ रहा है, इस पर बात तो कीजिए। उसकी चिन्ता भी कर लीजिए। 


पिछले साल भारत से 11 लाख से अधिक छात्र बाहर चले गए। बाहर जाना बायें हाथ का खेल नहीं है। 


छात्र आठवीं क्लास से बाहर जाने का सपना देख रहा है। मां बाप उसके इस सपने पर लाखों खर्च कर रहे हैं।


तत्कालीन शिक्षा मंत्री निशंक ने संसद में बताया था कि दो लाख करोड़ रुपया एक साल में खर्च हो रहा है। 


भारत की उच्च शिक्षा के बजट से कई गुना ज्यादा पैसा ये लाचार मां बाप अपने बच्चों को भारत से बाहर भेजने पर खर्च कर रहे हैं। इनमें केवल पैसे वाले नहीं हैं। वो भी हैं जो पढ़ाई के महत्व को जानते हैं। 


भारत की उच्च शिक्षा इतनी घटिया हो चुकी है कि इससे निकलने के लिए भी आपको लाखों रुपये खर्च करने पड़ेंगे। 


यह वो दलदल है। आखिर छात्र कब बोलेंगे। नहीं बोल कर मिला क्या। 


तो फिर भ्रम में रहा ही क्यों जाए कि पटना में कोई यूनिवर्सिटी है। 


जहां शिक्षक नहीं है, वहां भी छात्र नामांकन ले लेते हैं तो फिर किसी खंभे को विश्वविद्यालय मान नामांकन ले लीजिए ।


जब युवा आवारा नेताओं को अवतार मान सकते हैं तो खंभे को विश्वविद्यालय क्यों नहीं। बिहार सरकार को भी विश्वविद्यालय चलाने का नाटक छोड़ देना चाहिए।


इसलिए पटना विश्वविद्यालय को पूरी तरह बंद कर दे। इसकी शानदार इमारत और मैदानों को बेच दे। 


इस विश्वविद्यालय के पास कुछ भी नहीं बचा है. अतीत का गाना बचा है। आज का दाना नहीं।


🙏🏻

सोमवार, 25 अक्टूबर 2021

बॉम्बे टु हैदराबाद / टिल्लन रिछारिया

 

बम्बई की सुखद अनुभूतियों के साथ हैदराबाद में हफ्ते भर का प्रवास। मौसम लाजवाब है। दसहरा आसपास ही है। जाते ही हमारे लिए लालबहादुर शास्त्री  क्रिकेट स्टेडियम में यादगार जश्न रखा गया। 


टाइम्स ऑफ़ इंडिया के  के के शास्त्री , ओमप्रकाश निर्मल और शर्मा जी के  दो चार साथियों के साथ सांगत बैठी। सत्यनारायण शर्मा जी का कलरफुल  टेब्लॉयड ' द एविडेंस वीकली ' प्रकाशित हो रहा था।


...मेरे लिए ये यादगार शाम थी।  के के शास्त्री जी उन दिनों बड़ा नाम था। टाइम्स के एडीटर गिरिलाल जैन इनका बड़ा सम्मान  करते थे और इनकी कॉपी को  हाथ लगाने से डरते थे। ...ओमप्रकाश निर्मल प्रख्यात कवि हैं , आप साहित्य की पत्रिका ' कल्पना ' से भी समंद्ध रहे। ...जब डॉ राम मनोहर लोहिया ने रामायण मेला के आयोजन की ठानी तो चित्रकार मकबूल फ़िदा हुसैन से रामकथा पर चित्र बनाने को कहा , तब हैदराबाद के बद्रीविशाल पित्ती के यहां ओमप्रकाश निर्मल हुसैन को रामकथा पढ़ कर सुनाते , व्याख्या करते तब हुसैन चित्रांकन करते। यह चित्र मैंने धर्मयुग के 1969 के दीपावली अंक मैं प्रकाशित देखें हैं।


 ...इस दौरान अपने हैदराबाद प्रवास में के के शास्त्री और ओमप्रकाश निर्मल का सान्निध्य मेरे लिए बड़ा ज्ञानवर्धक रहा। ...शरद जोशी के परम मित्र ओमप्रकाश निर्मल ने मुझे जोशी जी के व्यक्तित्व के कई पहलुओं से वाकिफ कराया और बताया की शरद जोशी हैं क्या। बताया कि  जोशी जी बौद्धिक जटिलताओं से परे और छलछंद से मुक्त व्यक्तित्व हैं। उनसे व्यवहार  में आप कोई पर्दा मत रखना। वे बहुत सहज और किसी भी सीमा तक जा कर सहयोग करने वाले हैं। 


लाल बहादुर क्रिकेट स्‍टेडियम  का पहले फतेह मैदान नाम था। बाद में 1967 में इसका नामकरण भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्‍त्री के नाम पर किया गया। 


लाल बहादुर शास्‍त्री स्‍टेडियम पर केवल तीन टेस्‍ट मैच खेले गए, ये सभी भारत और न्‍यूजीलैंड के बीच खेले गए मैच हैं। इस मैदान पर पॉली उमरीगर का दोहरा शतक और सुभाष गुप्‍ते का न्‍यूजीलैंड के खिलाफ पारी में सात विकेट लेना, यादगार पलों से हैं।


निजामी ठाठ-बाट के इस शहर का मुख्य आकर्षण चारमीनार, हुसैन सागर झील, बिड़ला मंदिर, सालार जंग संग्रहालय है, जो इस शहर को एक अलग पहचान देते हैं। किसी समय नवाबी परम्परा के इस शहर में शाही हवेलियां और निज़ामों की संस्कृति के बीच हीरे जवाहरात का रंग उभर कर सामने आया तो कभी स्वादिष्ट नवाबी भोजन का स्वाद। 


इस शहर के ऐतिहासिक गोलकुंडा दुर्ग की प्रसिद्धि दूर दूर तक पहुंची और इसे उत्तर भारत और दक्षिणांचल के बीच संवाद का अवसर सालाजार संग्रहालय तथा चारमीनार ने प्रदान किया है।  गोलकुंडा दक्षिणी  हैदराबाद  से पाँच मील पश्चिम स्थित एक दुर्ग तथा ध्वस्त नगर है। यहां इतिहास आप से संवाद करता है ।


पूर्वकाल में यह कुतबशाही राज्य में मिलनेवाले हीरे-जवाहरातों के लिये प्रसिद्ध था। इस दुर्ग का निर्माण वारंगल के राजा ने 14वीं शताब्दी में कराया था। बाद में यह बहमनी राजाओं के हाथ में चला गया और मुहम्मदनगर कहलाने लगा। 1512 ई. में यह कुतबशाही राजाओं के अधिकार में आया और वर्तमान हैदराबाद के शिलान्यास के समय तक उनकी राजधानी रहा। 


फिर 1687 ई. में इसे औरंगजेब ने जीत लिया। यह ग्रैनाइट की एक पहाड़ी पर बना है जिसमें कुल आठ दरवाजे हैं और पत्थर की तीन मील लंबी मजबूत दीवार से घिरा है। यहाँ के महलों तथा मस्जिदों के खंडहर अपने प्राचीन गौरव गरिमा की कहानी सुनाते हैं। 


मूसी नदी दुर्ग के दक्षिण में बहती है। दुर्ग से लगभग आधा मील उत्तर कुतबशाही राजाओं के ग्रैनाइट पत्थर के मकबरे हैं जो टूटी फूटी अवस्था में अब भी विद्यमान हैं।


शहर में स्थित तेलुगु फिल्म उद्योग देश का दूसरा सबसे बड़ा चलचित्र चलचित्र निर्माता है। कहा जाता है कि किसी समय में इस ख़ूबसूरत शहर को क़ुतुबशाही परम्परा के पांचवें शासक मुहम्मद कुली क़ुतुबशाह ने अपनी प्रेमिका भागमती को उपहार स्वरूप भेंट किया था।


 हैदराबाद को 'निज़ाम का शहर' तथा 'मोतियों का शहर' भी कहा जाता है।...सालार जंग संग्रहालय अब तेलंगाना राज्य की राजधानी हैदराबाद शहर में मूसा नदी के दक्षिणी तट पर दार-उल-शिफा में स्थित एक कला संग्रहालय है। यह भारत के तीन राष्ट्रीय संग्रहालयों में से एक है। यह हैदराबाद शहर के पुराने शहर जैसे चारमीनार, मक्का मस्जिद आदि महत्वपूर्ण स्मारकों के करीब है।


मीर यूसुफ अली खान, सालार जंग 3 (1889 -1949) एक महान व्यक्ति थे, जिन्होंने 7th निज़ाम मीर उस्मान अली ख़ान के शासन के दौरान हैदराबाद प्रांत के प्रधान मंत्री के रूप में कार्य किया था।...हैदराबाद एक जिंदादिल शहर है ।


 ... निर्मल जी ने हमें खूब हैदराबाद घुमाया। निर्मल जी शहर के प्रतिष्ठित साहित्यकर हैं ।


मंगलवार /26 - 10 -21 / 2  - 27  ए  एम

सहारा देकर जिम्मेदारी का बीज बोती सरकार / मनोज कुमार


एक मजदूर के बेटे ने यूपीएससी की परीक्षा पास कर ली.. एक चाय बेचने वाले ने अपने बेटे को आइएसएस बना दिया.. एक गरीब परिवार के बेटे ने संघर्ष कर कामयाबी हासिल की... ये खबरें बताती हैं कि हमारे समाज में प्रतिभाओं की कमी नहीं है.. वे अपने दम पर कामयाबी पा रहे हैं.. यह खबरें देश के कोने कोने से आती हैं.. दूसरे राज्यों की तरह मध्यप्रदेश भी यह खबरें सुन रहा था.. अब यहां आकर मध्यप्रदेश और दूसरे राज्यों में फकत इस बात का अंतर रह गया कि दूसरे युवाओं की कामयाबी की खबरें सुनते रह गए और मध्यप्रदेश सरकार ने आगे बढक़र ऐसे हीरों को गले से लगा लिया. मुख्यमंत्री शिवराजसिंह ने इन प्रतिभावान युवाओं के कंधे पर हाथ रखा और कहा-बढ़ो और आगे बढ़ते रहो. मैं तुम्हारे साथ हूं. यकिन करना आसान नहीं है लेकिन मध्यप्रदेश में आप हैं तो इस पर यकिन ना करने का भी कोई कारण नहीं बचता है.


एक बच्चा यूपीएससी की परीक्षा में पास हो जाता है. दिल्ली से उसका बुलावा साक्षात्कार के लिए आया है. परिवार की मदद से वह दिल्ली जाने का इंतजाम करने लगता है कि तभी सरकार की तरफ से उसे संदेशा मिलता है मध्यप्रदेश भवन में आपके रूकने के लिए इंतजाम सरकार की ओर से किया गया है. पहले तो उसे यकीन ही नहीं होता है कि क्या सच है? वह दो बार फोन करने वाले अफसर से सच जानना चाहता है. उसे भरोसा दिलाया जाता है कि वह स्वयं इस बात की तस्दीक कर ले. वह दिल्ली स्थित मध्यप्रदेश भवन पहुंचता है तो कोई गफलत की गुंजाईश ही नहीं रह जाती है. उसके एक सामने एक संकट का निदान हो गया तो एक और बात उसके मन में डूबती-उतरती रहती है. संकोच करते हुए वह सरकार के अधिकारी से पूछ लेता है कि मेरे पिताजी को अपने साथ ठहरा सकता हूं? मुस्कराते हुए अधिकारी कहते हैं- बिना शक, आप अपने पेरेंट को अपने साथ ही रख सकते हैं. सरकार का यह आदेश है.


यह कपोल-कल्पित घटना नहीं है. यह एक सच्ची घटना है जो मेरे एक नजदीक के परिचित के साथ घटित हुई थी. चूंकि परिचित के सम्पर्क गहरे हैं तो वह कुछ प्रयास कर रहे थे कि दिल्ली में रूकने का ठिकाना मिल जाए लेकिन उन्हें भी यही सूचना मिली तो पहले पहल यकिन नहीं हुआ लेकिन बेटे ने जब कन्फर्म किया तो उनके लिए राहत की बात थी.सबसे बड़ी बात यह थी कि जिसे हम लोकतंत्र कहते हैं और जिस जवाबदारी की अपेक्षा हम अपनी चुनी हुई भरोसे की सरकार से करते हैं, वह मध्यप्रदेश में पूरा होता दिख रहा है. यह तय है कि हम इसमें भी नुक्स निकाल सकते हैं और कह सकते हैं कि ये महज सरकार की वाहवाही करने की स्कीम है लेकिन कभी उन बच्चों से पूछिये जिन्होंने अपनी मेहनत से कामयाबी तो पा ली और अब उनके साथ सरकार खड़ी है तो उनका भरोसा कितना बढ़ा होगा.


भोपाल के मिंटो हॉल में यूपीएससी परीक्षा पास करने वालों से मुख्यमंत्री शिवराजसिंह ने संवाद किया तो यह एक महज औपचारिक कार्यक्रम लग रहा था. लेकिन जब मुख्यमंत्री ने इन युवाओं का साथ देने के लिए ऐलान किया तो यह भी पहली सूरत में औपचारिक ही लगा क्योंकि आजादी के सात दशक बाद ऐसा करिश्माई ऐलान की उम्मीद नहीं की जा सकती थी. लेकिन जो हुआ, वह सच था और जो हो रहा है वह लोकतांत्रिक सरकार की नयी परिभाषा गढ़ रहा है. हालांकि इस योजना का श्रेय उच्च शिक्षामंत्री डॉ. मोहन यादव के हिस्से में जाता है जो इस योजना के शिल्पकार रहे हैं. उन्होंने अपने लीडर शिवराजसिंह को इस बात के लिए सहमत किया और आज युवाओं की कामयाबी की खबरें पढऩे वाले राज्य, मध्यप्रदेश की इस अनोखी पहल से स्तब्ध हैं. हो सकता है कि पूर्व में जिस तरह से मध्यप्रदेश की योजनाओं को अन्य राज्यों ने अपनाया है, वैसा ही इस योजना के बारे में सक्रियता दिखायें. ऐसा होता है तो निश्चित रूप से युवाओं को ना केवल सहारा मिलेगा बल्कि जिम्मेदारी की भावना बलवती होगी.


इस बात को भी याद रखा जाना चाहिए कि यूपीएससी की परीक्षा पहले दफा नहीं हो रही है और ना ही पहली दफा युवा कामयाब हो रहे हैं. लेकिन इस बार एक खास बात यह भी हुई कि युवाओं का हौसलाअफजाई करने राज्य शासन ने कामयाब युवाओं पर केन्द्रित एक पुस्तक भी तैयार की. यह सुखद अनुभव भी उनके लिए पहली होगा. संभव है कि इसके पहले भी कुछ युवा परीक्षा तो पास कर चुके होंगे लेकिन तब कोई शिवराजसिंह नहीं था जो उनके हौसले बुलंद करता. जो लोग इसके पहले परीक्षा पास कर चुके होंगे और साक्षात्कार में रूक गए होंगे, वह अपनी योग्यता और प्रतिभा की कमी के कारण नहीं बल्कि आर्थिक तनाव और संसाधनों की कमी के कारण विफल हो गए होंगे. इस बार वे तनाव मुक्त हैं और मन में उल्लास है. शिवराजसिंह सरकार के इस प्रयास को इस नजर से भी देखा जाना चाहिए कि ये वही युवा हैं जो भविष्य में प्रदेश के प्रशासन की कमान सम्हालेंगे. कोई प्रशासनिक अधिकारी होगा तो कोई पुलिस का अफसर बनेगा तो किसी के जिम्मे जंगल महकमा आएगा. तब इन लोगों के भीतर अपनेपन का अहसास होगा. जिम्मेदारी होगी और नेक-नीयति के साथ अपने दायित्वों को पूर्ण कर सकेंगे. दरअसल, इन युवाओं को सहारा देने का अर्थ उस बीज का छिडक़ाव है जो आने वाले दिनों में फलदार पौधे के रूप में पूरे प्रदेश को हरा-भरा करेगा. अपने इन्हीं फैसलों की वजह से मध्यप्रदेश, देश के दिल में धडक़ता है क्योंकि देश की धडक़न का नाम है मध्यप्रदेश.े

रविवार, 24 अक्टूबर 2021

न्यूज़ एंकर की लोकप्रियता /

 Doordarshan News Reader :  udbhrant 

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फिल्मी सितारों से कम फेमस नहीं होते थे उस जमाने में /   उदभ्रात 


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दूरदर्शन के ध्वनि-संकेत के साथ, सबका अपना-अपना काम-धाम छोड़कर टेलीविजन सेट के आगे बैठ जाना. मोहल्ले का मोहल्ला यानी समूचा जमघट, समाचार सुनने को तैयार.


तब दस फ़ीसदी भी लोगों के यहाँ टेलीविजन नहीं होते थे. आस-पड़ोस में कहीं एक भी सेट हुआ, तो सब वही जाकर समाचार देख लेते थे. दिनभर की देश-विदेश की घटनाओं को उस बुलेटिन में आधे घंटे में ही समेट लिया जाता था. कम समय में ज्यादा इनपुट. देश- दुनिया की तटस्थ और मुकम्मल जानकारी. सीमित समय में, देश के लगभग सभी हिस्सों की एक संपूर्ण तस्वीर सामने आ जाती थी. यह केबिल-सैटलाइट टेलिविजन से पहले अर्थात् प्री सोशल मीडिया दौर की बात है. ये बुलेटिन खास माने जाते थे. युवा वर्ग इस बुलेटिन से जनरल नॉलेज की अच्छी-खासी जानकारी हासिल कर लेता था.


समाचार, शिष्ट-शालीन लहजे में समग्रता के साथ प्रस्तुत किए जाते थे. मसलन सलमा सुल्तान (शाहशुजा की प्रपौत्री) के धीर-गंभीर गरिमामयी व्यक्तित्व के साथ, निष्पक्ष समाचारों की प्रस्तुति. उनके बालों में बाई तरफ सलीके से लगाया गुलाब, लाखों लोगों के आकर्षण का केंद्र हुआ करता था.


न्यूज़ रीडर्स की प्रसिद्धि, किसी भी मायने में फिल्मी सितारों से कम नहीं रहती थी. उनका एक खास अंदाज़ रहता था, जो उनका ट्रेडमार्क बन जाता था. सलमा सुल्तान के, ‘आज के समाचार इस प्रकार है.’ कहते ही श्रोता एकाग्रचित्त होकर समाचार सुनते थे, या फिर बुलेटिन समाप्त होने के दौरान, शम्मी नारंग का कलम को जेब के हवाले करते हुए, ‘इसी के साथ ये समाचार बुलेटिन समाप्त हुआ.’ कहना असाइनमेंट कंप्लीट होने का आभास दे जाता था.


न्यूज़ रीडर्स की आवाज, बोलचाल का लहजा, भंगिमा के लिहाज से सबका अपना-अपना सिग्नेचर स्टाइल होता था. 


साफ-सुथरी भाषा, स्पष्ट उच्चारण, बेहतरीन वॉइस ओवर वाली आवाज, सलीके का प्रस्तुतीकरण. श्रोता उनके सिग्नेचर स्टाइल को दोहराने लगते थे, युवतियाँ महिला न्यूज़ रीडर्स के फैशन, साड़ी, मेकअप को फॉलो करतीं, तो नौजवान अपना उच्चारण दुरुस्त करते थे. अंग्रेजी बुलेटिन से विक्टोरियन प्रनंसीएशन को सीखने की चेष्टा करते.


समाचारों में उच्चारण एवं प्रस्तुति पर खासा जोर रहता था. समाचार बिना किसी निजी राय अथवा दृष्टिकोण के तटस्थ रूप से प्रस्तुत किए जाते थे. किसी भी न्यूज़ रीडर का पक्षीय झुकाव, बिल्कुल भी नहीं झलकता था. एकदम तटस्थ.


● इस श्रृंखला में : 

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जेबी रमण, वेद प्रकाश, सरला माहेश्वरी, मंजरी जोशी (प्रख्यात कवि रघुवीर सहाय की सुपुत्री), अविनाश कौर सरीन प्रमुख थे. अंग्रेजी बुलेटिन में सुमित टंडन, गीतांजलि अय्यर, रिमि साइमन खन्ना, मीनू तलवार, निधि रविंद्रन उषा अल्बुकर्क का नाम लिया जा सकता है. ये वे नाम हैं, जो उस दौर में समाचार प्रस्तुति के पर्याय बनकर रह गए. दर्शकों पर इन्होंने अपने सलीके की अमिट छाप छोड़ी.


समाचार वाचको के नेशनल आइकन बनने के पीछे एक प्रमुख कारण यह बताया जाता है कि, तब आकाशवाणी से दूरदर्शन का सफर नया-नया था, जो दर्शकों के लिए एक बहुत बड़ी छलांग हुआ करती थी. श्रव्य माध्यम से सीधे श्रव्य-दृश्य माध्यम का एक रोमांचक सफर.


दर्शक, स्वर से ही अपने पसंदीदा समाचार वाचक को पहचान लेते. तब प्रोग्राम बहुत ही सीमित होते थे. चित्रहार अथवा कृषि दर्शन के बाद राष्ट्रीय समाचार बुलेटिन की लोग व्यग्रता से प्रतीक्षा किया करते थे. न्यूज़ रूम में टेलीप्रॉम्पटर तब दूर की कौड़ी हुआ करते थे. साधारण तकनीक में उत्तम क्वालिटी. न्यूज रीडर के स्क्रिप्ट को औसत से तेज अथवा धीमे पढ़ने पर कोई अदृश्य व्यक्ति उन्हें लगातार इस बात की चेतावनी जारी करता रहता था.


समाचार वाचक एक अलिखित संहिता का पालन करते थे. समाचारों में न तो न्यूज़ रीडर्स का निजी झुकाव, रुझान अथवा पसंद-नापसंदगी झलकती थी, न ही किसी की किस्म की कोई व्यग्रता- उग्रता, उत्तेजना अथवा बिग ब्रेकिंग की ललक 

जन्मदिन मुबारक हो सुनयना ज्ञानरंजन जी / मनोहर बिल्लोरे

 सुनयना के बहाने ज्ञानरंजन जी / मनोहर बिल्लोरे 

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हुई सुंनयना 75 साल की

यह परिवार सार्थक यारी दोस्ती करने और उसे पारिवारिक तौर पर निबाहने में विश्वास रखने वाला परिवार है। इस गहन संसार में हर वय के मित्र मिलेंगे। अलग-अलग मित्र समूह हैं। गांवों कस्बों तक में दूरदराज़ फैले। हर स्तर और विस्तार के उनके मित्र उनके घर तीर्थ यात्रा के लिए आते रहते हैं। उनके प्रति सुनयना जी का उत्साह, समर्पण और आतिथ्य भाव देखते बनता है। संस्कृति के विभिन्न अनुशासनों में उनके ढेरों मुरीद मित्र मिल जायेंगे।


मैं उन्हें (सुनयना जी को) तब से जानता हूँ, जब से ज्ञान जी के अग्रवाल कालोनी वाले घर आना जाना शुरू हुआ। 85 के आसपास। राजेन्द्र चंद्रकांत राय जी की सोहबत में। जाते जाते, धीरे धीरे संकोच घटता गया और आपसी विश्वास आकार लेता गया। 


एक जवान शोध छात्रा आती है और हफ्ते-पन्द्रह दिन रहती है। घर की प्यारी सदस्या बनकर सुनयना जी की गलिबहियाँ करती प्यार से रहती है। अपना काम पूरा कर चली जाती गई।


ज्ञान जी जब 763, अग्रवाल कालोनी का किराये का मकान - जिसमें फर्नीचर आदि सब किराये का था - छोड़कर अपने निजी घर 101, रामनगर, अधारताल में आने वाले थे - 90-91 की बात होगी - उनसे पहले ही उनके घर में में सुरेन्द्र राजन (काकू), राजेन्द्र शर्मा (रज्जू) और ज्ञानरंजन के अनुज मौजूद थे। घर को कलात्मक बनाने का कार्यभार खुद ही आकर संभाल लिया था, काकू ने। परदे, तस्वीर, पोस्टर, पलंग, कुर्सी, ड्रेसिंग टेबिल और और चीज़ें। हर चीज़ की सबसे उपयुक्त जगह और स्थिति काकू ने ही निर्धारित की थी। बाकी लोग बस उनके सहायक बतौर थे। ज्ञान जी के घर में काकू घरू आदमी हैं। रात को भूख लगे तो किचिन में कुछ ढूढ़ ढांढ़ कर खाने पीने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता। ज़रूरत पड़े तो वे ज्ञान जी के बालों की कटिंग भी कर सकते हैं। काकू चीज़ों को तराशने में विश्वास करते हैं। 


विश्वमोहन वडोला का परिवार ज्ञान जी के परिवार से खूबसूरती के साथ गुथा हुआ है। वे आते हैं तो चहल-पहल बढ़ जाती है। और अनेक-अनेक उदाहरण मिल जायेंगे उनकी सघन और सान्द्र मित्रता के।

  

अब यदि सुनयना जी अपने घरेलू दायित्वों का निर्वाह इतनी कलात्मकता से न करतीं तो सम्बन्धों के समत्व की यह प्रगाढ़ता इतने उच्च स्तर की न होती, जितनी उनके साहित्यिक-सांस्कृतिक और गैर साहित्यिक-सांस्कृतिक मित्र-सम्बन्धों में हमेशा से रही है।


सुनयना जी एक जाहिर, प्रतिष्ठित, नागर, वैद्य परिवार के पिता की छह बहनों और एक भाई में तीसरी संतान हैं। उन्होंने अपने बचपन, किशोरपन और शादी से पहले युवावस्था में पिता जी के निर्देश पर घर में जरूर जड़ी बूटियां बांटी-कूटी होंगी। उनके बनाये पेयों-खाद्यों में भी वही गंध मौजूद होती है। सुनयना जी की आदत में आयुर्वेद घुल मिल गया है। मित्रता की बदौलत देश के अलग अलग शहरों से आयी खाद्य वस्तुएँ अपनी विशिष्टता के साथ उनके घर आती हैं और उनका स्वाद उनके स्थानीय मित्रों तक बड़े स्नेह और लगाव के साथ उनकी ही वजह से पहुँचता है। 


उन्हें बागवानी से शौक भर नहीं गहरा राग भी है। घर गमलों से भरा पड़ा है। बाहर चारों ओर तो हैं ही, भीतर और ऊपर भी गमले। उनके साज सम्हाल के लिए नियमित माली। पाशा (शान्तनु) और बुलबल (वत्सला) इसी सुमधुर वातावरण में उपजे, फूले फले और अपनी सार्थक जिंदगी पूरी गरिमा से जी रहे हैं। ज्ञानजी और सुनयना जी ने प्रेम विवाह किया पर उनके दोनों बच्चों के लिए बहू दामाद सुनयना जी और ज्ञानजी को ही मशक्कत कर ढूढ़ना पड़ा है।


ज्ञान जी का यदि नारा है - सर्वोत्तम, सर्वात्कृष्ट, सर्वश्रेष्ठ, सुगठित, सुविचारित, सुस्थिर है; एक कड़ा कठोर और कठिन अनुशासन, यदि ज्ञान जी का साहित्कि मानदण्डों के लिए है तो सुनयना जी उनके लिए घर में भी वह वातावरण बनाने में अपनी पूरी हिस्सेदार के साथ खड़ी होकर उनकी मित्रता की हर कड़ी को और मजबूत बनाने में सजग हिस्सेदारी लेती हैं। ज्ञान जी के सपनों को साकार करने में सुनयना जी की भूमिका किसी भी ओर-छोर उनसे कम नहीं है।


76 वें वर्ष में उनके गरिमामयी प्रवेश पर सुनयना जी को मेंरे परिवार और मित्र परिवारों की ओर से आत्मीय बधाई और सादर हार्दिक शुभ कामनाएँ।  


                                                                                 - 

शनिवार, 23 अक्टूबर 2021

पैंसठ का हो गया अशोक होटल / विवेक शुक्ला

 महान क्रांतिकारी चे ग्वेरा और धीरूभाई अंबानी में समानता तलाशना आसान नहीं है। पर बहुत कोशिश करने पर पता  चलेगा कि दोनों को अशोक होटल जोड़ता है। चे ग्वेरा यहां 30 जून, 1959 को आए थे। फिर वे यहां सात दिनों तक ठहरे । धीरूभाई अंबानी इधर 70 से 90 के दशकों में बार-बार रुका करते थे। उन्हें इधर के वे कमरे खासतौर पर पसंद थे जहां से नेहरु पार्क के नजारें देखे जा सकते हैं। वही अशोक होटल इस महीने अपनी स्थापना के 65 सालों का सफर पूरा कर रहा है। इसका 2007 से नाम हो गया है ‘दि अशोक’। लेकिन पुराना नाम नए पर भारी पड़ता है। 


यहां पर अक्तूबर,1956 में यूनिस्को सम्मेलन में भाग लेने आए दुनियाभर के प्रतिनिधियों को ठहरया गया था। गुजरे साढ़े छह दशकों के दौरान अशोक होटल को दर्जनों राष्ट्राध्यक्षों और नामवर शख्सियतों की मेजबानी का मौका मिला। इसकी भव्यता के आगे सब होटल उन्नीस हैं। इसका डिजाइन मुंबई के आर्किटेक्ट ई.बी.डाक्टर ने बनाया था। वे जेजे स्कूल ऑफ आर्ट में पढ़ाते थे।


 उन्हें पता चला कि दिल्ली में सरकार एक लक्जरी होटल का निर्माण करने जा रही है और उसे एक आर्किटेक्ट की तलाश है। डाक्टर ने फौरन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के दफ्तर में अपने काम का ब्यौरा यह कहते हुए भेज दिया कि वे होटल का डिजाइन बनाने के लिए उत्सुक  हैं। किस्मत ने उनका साथ दिया। डाक्टर को दिल्ली में प्रेजेंटेशन के लिए बुलाया गया। पंडित नेहरु ने उनसे मुलाकात की और उन्हें अशोक होटल का डिजाइन बनाने की जिम्मेदारी मिल गई। ये सब बातें 1955 की पहली तिमाही की हैं। 


डाक्टर को साफ निर्देश थे कि उन्हें तेजी से काम करना है क्योंकि अशोक होटल का निर्माण अक्तूबर 1956 तक पूरा करना है। सरकार जल्दी में थी क्योंकि राजधानी में यूनिस्को सम्मेलन आयोजित होना था। आजादी के बाद संभवत: पहली बार यहां कोई अंतरराष्ट्रीय स्तर  का सम्मेलन हो रहा था। डाक्टर ने अशोक होटल का डिजाइन बनाना शुरू किया और इसके साथ ही अशोक होटल का भूमि पूजन हो गया। तब तक चाणक्यपुरी में सब तरफ झाड़ियां और झुग्गियां ही थीं। जयपुर पोलो ग्राउंड के आगे कुछ नहीं था। इधर तमाम एंबेसी तो साठ के दशक के आरंभ में ही बनने लगी थीं।


 नए होटल को बनाने के लिए 25 एकड़ जमीन दी गई। डाक्टर ने अशोक होटल में 550 कमरों,कनवेंशन सेंटर,बगीचों वगैरह का डिजाइन और लैंड स्केपिंग की। उन्होंने इसके डिजाइन में झरोखों और जालियां देकर राजसी पुट दिया। इसका विशाल कनवेंशन सेंटर का डिजाइन तैयार करने में अपनी क्षमताओं को दिखाया। करीब डेढ़ हजार लोगों की क्षमता वाले कनवेंशन सेंटर में एक भी खंभा नहीं है। 200 पेड़ों के लिए स्पेस निकाला। ये लगभग सभी गुलमोहर के हैं। कुछ आम के हैं। 


अशोक होटल में 1983 में हुए गुट निरपेक्ष सम्मेलन के समय दर्जनों देशों के राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री ठहरे थे। उनमें फिदेल कास्त्रों भी थे। तब पीएलओ के नेता यासर अराफत भी यहीं रूके हुए थे। कहते हैं कि तब सुरक्षा कारणों के चलते कास्त्रो के चेहरे से मिलते-जुलते तीन और व्यक्ति भी अशोक होटल में थे। यह सब इसलिए किया जा रहा था ताकि कास्त्रो पर हमले की किसी भी आशंका को निरस्त किया जा सके। यहां 1986 में लिट्टे के खूंखार नेता प्रभाकरण ने भी रात बिताई थी।


 अशोक होटल की लॉबी अप्रतिम है। इधर विशाल झाड़-फानूस लगे हैं। उन्हें देखकर एक बार तो लगता है कि आप किसी महल में आ चुके हैं। यहां ही भगवान विष्णु की मूर्ति ऱखी हुई है। ये होटल में पहले दिन से है। आप लॉबी से निकलकर होटल के गलियारे में पहुंचिए। ये भी इसके मूल मिजाज के मुताबिक खासे बड़े हैं।


  अशोक होटल से पहले राजधानी में कायदे के दो ही फाइव स्टार इंपीरियल और ओबराय मेंडिस हुआ करते थे। अशोक होटल बैंड,बाजा, बारात के लिए भी विख्यात रहा है। इसमें 1968 में श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपने बड़े पुत्र राजीव गांधी की शादी की रिस्पेशन का आयोजन किया था। इधर हजारों शादियां हो चुकी हैं। आप इसकी सीढ़ियों के स्पेस को देखिए। लाजवाब है। 


ई.बी.डाक्टर को इधर आने वाले बुजुर्ग तथा गर्भवती महिलाएं दिल में धन्यवाद देते होंगे क्योंकि इधर की सीढ़ियों पर चढ़ने में कतई कष्ट नहीं होता। डाक्टर उन डिजाइनरों में थे जिन्हें मालूम था कि किस तरह से यूजर फ्रैंडली इमारतें बनाई जाती हैं। पर हैरानी की बात है कि उन्होंने दिल्ली में अशोक होटल के बाद किसी अन्य इमारत को डिजाइन नहीं किया।

Vivekshukladelhi@gmail.com 

Navbharattimes में 21 अक्तूबर को छपे लेख के अंश. 

अशोक होटल 1960 में और निर्माण के समय.

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2021

कैंसर निरोधक है ओल ( जिमीकंद )

 *दीपावली के दिन सूरन की सब्जी*


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दीपावली के दिन सूरन की सब्जी बनती है,,,सूरन को जिमीकन्द (कहीं कहीं ओल) और कांद भी बोलते हैं, आजकल तो मार्केट में हाईब्रीड सूरन आ गया है,, कभी-२ देशी वाला सूरन भी मिल जाता है ! दीपावली के 3-4 दिन पहले से ही मार्केट में हर सब्जी वाला (खास कर के उत्तर भारत में) इसे जरूर रखता है ! और मजे की बात है कि इसकी लाइफ भी बहुत होती है !


बचपन में ये सब्जी फूटी आँख भी नही सुहाती थी ! लेकिन चूँकि यही सब्जी बनती थी तो झख मारकर इसे खाना ही पड़ता था ! तब मै सोचता था कि पापा लोग कितने कंजूस हैं जो आज त्यौहार के दिन भी ये खुजली वाली सब्जी खिला रहे हैं,,, माँ बोलती थी जो आज के दिन सूरन नहीं खायेगा 

अगले जन्म में छछुंदर का जन्म लेगा,,

यही सोच कर अनवरत खाये जा रहे है कि छछुंदर न बन जाये😂😂  


खाने के बाद हर कोई यह जरूर पूछता था कि तुम्हारा गला तो नहीं काट रहा है 😔😔 ?


बड़े हुए तब सूरन की उपयोगिता समझ में आई,,


सब्जियो में सूरन ही एक ऐसी सब्जी है जिसमें फास्फोरस अत्यधिक मात्रा में पाया जाता है,, और अब तो मेडिकल साइंस ने भी मान लिया है कि इस एक दिन यदि हम देशी सूरन की सब्जी खा ले तो स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में महीनों फास्फोरस की  कमी नही होगी,,

यह बवासीर से लेकर कैंसर जैसी भयंकर बीमारियों से बचाए रखता है। इसमें फाइबर, विटामिन सी, विटामिन बी6, विटामिन बी1 और फोलिक एसिड होता है। साथ ही इसमें पोटेशियम, आयरन, मैग्नीशियम और कैल्शियम भी पाया जाता है !


मुझे नही पता कि ये परंपरा कब से चल रही है लेकिन सोचीए तो सही कि हमारे लोक मान्यताओं में भी वैज्ञानिकता छुपी हुई होती थी ,,,

धन्य हों हमारे पूर्वज जिन्होंने विज्ञान को हमारी परम्पराओं, रीतियों और संस्कारों में पिरो दिया🙏🏻

पूर्वजों को शत -शत नमन


आप सभी को 

सादर नमस्कार 

🙏🙏🙏🙏

बुधवार, 20 अक्टूबर 2021

LATEST 100 भड़ास/ B4M


मंगलवार, 19 अक्टूबर 2021

टिल्लन रिछारिया की यादों का मोहक संसार

 कारवां फिर बम्बई की ओर ! दिसंबर 1980 में शरद जोशी जी के साथ ' हिंदी एक्सप्रेस ' के माध्यम से बम्बई में  प्रवेश मिला , श्रीवर्षा और जबलपुर के ज्ञानयुग प्रभात से गुजरते हुए फिर बम्बई की चौखट पर खड़ा था। डॉ महावीर अधिकारी की एक ललकार फिर यहां खीच लाई थी। …अधिकारी जी ने एक मुलाक़ात में हड़काया था। … क्या यार , लोग इलाहाबाद ,कानपुर ,जबलपुर छोड़ बम्बई आते है और आप बम्बई छोड़ जबलपुर रम गए हैं, आइये 'करंट' को पत्रिका बनाना है।...इस बार मैं जबलपुर से  बहला फुसला कर अपने एक साथी राकेश दीक्षित को भी ले गया था ।  नाटक प्रेमी राकेश तब जवानी और जोश की दहलीज पर थे , प्रखर और ऊर्जा से भरे हुए । बम्बई पहुंचे ही अपने पुराने अड्डे फूलवाली गली के बगल में भूलेश्वर के पंचमुखी हनुमान मंदिर में डेरा डाला । याद पड़ता है तब राकेश को मैंने चलती ट्रेन में चढ़ाया था । तब रिजर्वेशन आदि का झमेला कौन झेलता था , चढ़ गए तो गंतव्य तक पहुंच ही जायेंगे ।... ऐसे ही जबलपुर से  बम्बई की एक यात्रा बड़ी रोमांचक थी । ...जबलपुर स्टेशन पर बैठा सोच रहा था किधर जाया जाए ...4-20 पर महाकौशल जबलपुर से दिल्ली जाती थी , जो मानिकपुर होते। हुए हमारे शहर कर्वी 8 बजे के आसपास तक पहुंचा देती थी , लक्ष्य तो यही था । टिकट काउंटर पर गया तो पूछा गया कहां का टिकट चाहिए , मेरे मुंह से निकल गया बम्बई का और कहां का । बम्बई जाने वाली ट्रेन की भी सूचना दिख रही थी । टिकट बन गया बम्बई का । ...ट्रेन आयी प्लेटफार्म पर मैं निर्लिप्त निष्काम भाव से खड़ा रहा । विसिल बाजी , ट्रेन हिली चलने को , जो बोगी सामने थी चढ़ गया । ट्रेन गति पकड़ने लगी , बोगी मिलेट्री के जवानों से भरी थी , एक सरदार जी आगे बढ़े , कहां आगये जनाब , ये बोगी तो हम मिलेट्री वालों के लिए रिजर्व है । मैं बोला क्या करें कूद जाएं , मेरा सामान पकड़ते हुए सरदार जी बोले , अरे अब आगये तो आगये ...आइए आइए , मेरा सामान ऊपर की बर्थ पर रखते हुए बोले , कहां जाएंगे । मैंने बताया बम्बई । ...वेरी गुड़ हम लोग भी वहीं जाएंगे आराम से बैठिए । ट्रेन भरपूर रफ्तार में आ चुकी थी । तब तक सरदार जी मुझे चाय बिस्कुट खिला कर अपने साथियों से परिचित करा चुके थे ।...टिकट लेने के बाद मेरे पास केवल ढाई रुपये बचे थे , यह कोई चिंता की बात नही थी । मेरे एक कजिन अनंत राम रिछारिया तब बम्बई वी टी स्टेशन पर टिकट चेकर थे , कल्याण में रहते थे ।...रात बीती , सुबह हुई और दोपहर 12 बजे के आसपास ट्रेन बम्बई वी टी स्टेशन जा पहुंची । इस सफर मे एक पैसा खर्च नहीं हुआ , रात का भोजन , चाय , सुबह का नाश्ता सब मेरे सह यात्रियों की ओर से था । देवदूत जो मिल गए थे , मैं संकोच से भरा सब स्वीकार करता रहा । इतना प्रेम सत्कार । कहा गया , हम सीमा पर तैनात हैं देश की रक्षा के लिये और आप देश के अंदर बतौर पत्रकार सेवा दोनों कर रहे हैं । हमारे लिए ये यादगार सफर है कि आप का साथ मिला । वी टी स्टेशन में हम उनका शुक्रिया अदा कर आगे बढ़े । लोकल ट्रेन के प्लेटफार्म पर पहुंचते ही एक टिकर चेकर पिल्लई साहब मेरी ओर बढ़े , मैंने अपने कजिन का परिचय दिया । आज तो अनंतराम जी आये नहीं , आप आइए और जगदीश शर्मा जी से मिलवाया की ये आप को कल्याण ले जाएंगे । शर्मा जी साथ उनकी डियूटी खत्म होने के बाद शाम को हम कल्याण पहुंचे । शर्मा जी बताया अभी बोरीबंदर पत्रिका में आप के प्रकाशित लेख पढ़ें हैं । हफ्ते भर कल्याण में रहे ,उसी समय फ़िल्म मुकद्दर का सिकंदर फ़िल्म देखी , बम्बई देखी और संयोग बना तो आर के स्टूडियों जाने का ।वहां तीन चार घंटे समय बिताने का मौका मिला । वहां उस समय , सत्यम शिवम सुंदरम का सेट तोड़ा जा रहा था और मनोज कुमार की फ़िल्म क्रांति के लिए सेट बनाया जा रहा था ।...यह मेरे शरद जोशी जी के साथ हिंदी एक्सप्रेस ज्वाइन करने के पहले यानी 1980 के पहले का वृत्तान्त है ।...जिस दिन आर के स्टूडियो जाना हुआ संयोग ऐसा रहा कि उस दिन वहां  किसी हाल में कोई शूटिंग  नहीं थी । सत्यम शिवम सुंदरम का टूटता और क्रांति का बनता हुआ से देखने के बाद राज साब कके निजी कक्ष को देखने का मौका मिला । जीने चढ़ कर पहली मंजिल पर जाते हुए देखा , दीवारों आर के की अब तक आई फिल्मों के पोस्टर दीवारों पर लगे हैं । उनके कमरे में उनकी आदमकद तस्वीर , सफेद चादर से सजी मुलायम गद्दों वाली वैठक , कोने मुंशियों वालो डेस्क , इसी कक्ष से लगा मेकअप रूम ।...कितनी प्रतिभाओं की यादों , इतनी कहानियों से भरा यह कक्ष ...महसूस कर सकतें हैं राज कपूर के सृजन की तासीर । उनकी मौजूदगी का अहसास  । यहां आयी  गई तमाम शख्सियत बेशक इस समय सामने न हों पर उनकी अदृश्य मौजूदगी महसूस होती है । पृथ्वीराज , प्रेमनाथ , राज कपूर , नरगिस , शैलेन्द्र , शंकर जय किशन...कितने नाम अनाम सितारों का दीदार काने वाला यह कक्ष अदृश्य रूप में ही सही उन सबसे मिलवा तो रहा । सिनेमा का अनुपम तीर्थ । राज साहब के कक्ष में स्मृतियो का आसव पीने के बादं बाहर वह शिवलिग भी देखा जो आर के की फिल्मों की शुरुआत में पूजा करते हुए पृथ्वीराज जी के साथ दिखता है ।... डॉ महावीर अधिकारी से मुलाकात होती है ' करंट ' के मैग्ज़ीनीकरण पर चर्चा होती है । इस बार के बम्बई प्रवास में राकेश भी साथ है , मैं इसे करंट में साथ काम करने के लिहाज से साथ ले आया था जल्द ही करंट ज्वाइन करना था । पर हुआ यह कि बम्बई की घुमाई फिराई के बीच  एक दिन पृथ्वी थियेटर मे हम लोगों ने नादिरा बब्बर निर्दर्शित नाटक ' सांध्य छाया ' देखा । बहुत भावपूर्ण नाटक था । राकेश झटका कहा गया । ... नहीं नहीं अब नहीं रहना यहां , मैं जबलपुर जाऊंगा । मैंने फुसलाने का बड़ा तिलिस्म फैलाया इसका ध्यान भटकाने के लिए पर भइया न माना तो न माना । जबलपुरिया भावुकता के लपेटे में आ गया । ऐसे ही 1970 में जबलपुर से बम्बई कूच करते समय आचार्य रजनीश से जबलपुर के संगियों ने कहा कि अब डूब जाओगे बम्बई जा कर भूल जाओगे हम सब को कौन साथी , कौन और कैसा जबलपुर  । ...रजनीश ने कहा , मैं कहीं भी रहूं , कैसा भी रहूं , रहूँगा तो जबलपुर का ही । ये कैसे हो सकता है कि मैं कही रहूं और वहां जबलपुर न हो । ...कौन भूल पाता है अपनी कुंज गलियों को , अपनी क्रीड़ाभूमि को , अपने घर , गांव , शहर को पर जब बात अपने लक्ष्य और अपने सपनों को हकीकत में पाने की होती है तो अपने अवधपुर वासियों को सोता छोड़ कर , गोपियों को बिलखता छोड़ और बुद्ध की तरह अपना सर्वस्व छोड़ संकल्प सिद्धि के लिए अनजान  अचीन्ही दुनिया में जाना ही पड़ता हैं  ।  ...कितनी कितनी बार हमने  राग अनुराग के अनुबंध तोड़े हैं ।

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