मंगलवार, 19 अक्तूबर 2021

टिल्लन रिछारिया की यादों का मोहक संसार

 कारवां फिर बम्बई की ओर ! दिसंबर 1980 में शरद जोशी जी के साथ ' हिंदी एक्सप्रेस ' के माध्यम से बम्बई में  प्रवेश मिला , श्रीवर्षा और जबलपुर के ज्ञानयुग प्रभात से गुजरते हुए फिर बम्बई की चौखट पर खड़ा था। डॉ महावीर अधिकारी की एक ललकार फिर यहां खीच लाई थी। …अधिकारी जी ने एक मुलाक़ात में हड़काया था। … क्या यार , लोग इलाहाबाद ,कानपुर ,जबलपुर छोड़ बम्बई आते है और आप बम्बई छोड़ जबलपुर रम गए हैं, आइये 'करंट' को पत्रिका बनाना है।...इस बार मैं जबलपुर से  बहला फुसला कर अपने एक साथी राकेश दीक्षित को भी ले गया था ।  नाटक प्रेमी राकेश तब जवानी और जोश की दहलीज पर थे , प्रखर और ऊर्जा से भरे हुए । बम्बई पहुंचे ही अपने पुराने अड्डे फूलवाली गली के बगल में भूलेश्वर के पंचमुखी हनुमान मंदिर में डेरा डाला । याद पड़ता है तब राकेश को मैंने चलती ट्रेन में चढ़ाया था । तब रिजर्वेशन आदि का झमेला कौन झेलता था , चढ़ गए तो गंतव्य तक पहुंच ही जायेंगे ।... ऐसे ही जबलपुर से  बम्बई की एक यात्रा बड़ी रोमांचक थी । ...जबलपुर स्टेशन पर बैठा सोच रहा था किधर जाया जाए ...4-20 पर महाकौशल जबलपुर से दिल्ली जाती थी , जो मानिकपुर होते। हुए हमारे शहर कर्वी 8 बजे के आसपास तक पहुंचा देती थी , लक्ष्य तो यही था । टिकट काउंटर पर गया तो पूछा गया कहां का टिकट चाहिए , मेरे मुंह से निकल गया बम्बई का और कहां का । बम्बई जाने वाली ट्रेन की भी सूचना दिख रही थी । टिकट बन गया बम्बई का । ...ट्रेन आयी प्लेटफार्म पर मैं निर्लिप्त निष्काम भाव से खड़ा रहा । विसिल बाजी , ट्रेन हिली चलने को , जो बोगी सामने थी चढ़ गया । ट्रेन गति पकड़ने लगी , बोगी मिलेट्री के जवानों से भरी थी , एक सरदार जी आगे बढ़े , कहां आगये जनाब , ये बोगी तो हम मिलेट्री वालों के लिए रिजर्व है । मैं बोला क्या करें कूद जाएं , मेरा सामान पकड़ते हुए सरदार जी बोले , अरे अब आगये तो आगये ...आइए आइए , मेरा सामान ऊपर की बर्थ पर रखते हुए बोले , कहां जाएंगे । मैंने बताया बम्बई । ...वेरी गुड़ हम लोग भी वहीं जाएंगे आराम से बैठिए । ट्रेन भरपूर रफ्तार में आ चुकी थी । तब तक सरदार जी मुझे चाय बिस्कुट खिला कर अपने साथियों से परिचित करा चुके थे ।...टिकट लेने के बाद मेरे पास केवल ढाई रुपये बचे थे , यह कोई चिंता की बात नही थी । मेरे एक कजिन अनंत राम रिछारिया तब बम्बई वी टी स्टेशन पर टिकट चेकर थे , कल्याण में रहते थे ।...रात बीती , सुबह हुई और दोपहर 12 बजे के आसपास ट्रेन बम्बई वी टी स्टेशन जा पहुंची । इस सफर मे एक पैसा खर्च नहीं हुआ , रात का भोजन , चाय , सुबह का नाश्ता सब मेरे सह यात्रियों की ओर से था । देवदूत जो मिल गए थे , मैं संकोच से भरा सब स्वीकार करता रहा । इतना प्रेम सत्कार । कहा गया , हम सीमा पर तैनात हैं देश की रक्षा के लिये और आप देश के अंदर बतौर पत्रकार सेवा दोनों कर रहे हैं । हमारे लिए ये यादगार सफर है कि आप का साथ मिला । वी टी स्टेशन में हम उनका शुक्रिया अदा कर आगे बढ़े । लोकल ट्रेन के प्लेटफार्म पर पहुंचते ही एक टिकर चेकर पिल्लई साहब मेरी ओर बढ़े , मैंने अपने कजिन का परिचय दिया । आज तो अनंतराम जी आये नहीं , आप आइए और जगदीश शर्मा जी से मिलवाया की ये आप को कल्याण ले जाएंगे । शर्मा जी साथ उनकी डियूटी खत्म होने के बाद शाम को हम कल्याण पहुंचे । शर्मा जी बताया अभी बोरीबंदर पत्रिका में आप के प्रकाशित लेख पढ़ें हैं । हफ्ते भर कल्याण में रहे ,उसी समय फ़िल्म मुकद्दर का सिकंदर फ़िल्म देखी , बम्बई देखी और संयोग बना तो आर के स्टूडियों जाने का ।वहां तीन चार घंटे समय बिताने का मौका मिला । वहां उस समय , सत्यम शिवम सुंदरम का सेट तोड़ा जा रहा था और मनोज कुमार की फ़िल्म क्रांति के लिए सेट बनाया जा रहा था ।...यह मेरे शरद जोशी जी के साथ हिंदी एक्सप्रेस ज्वाइन करने के पहले यानी 1980 के पहले का वृत्तान्त है ।...जिस दिन आर के स्टूडियो जाना हुआ संयोग ऐसा रहा कि उस दिन वहां  किसी हाल में कोई शूटिंग  नहीं थी । सत्यम शिवम सुंदरम का टूटता और क्रांति का बनता हुआ से देखने के बाद राज साब कके निजी कक्ष को देखने का मौका मिला । जीने चढ़ कर पहली मंजिल पर जाते हुए देखा , दीवारों आर के की अब तक आई फिल्मों के पोस्टर दीवारों पर लगे हैं । उनके कमरे में उनकी आदमकद तस्वीर , सफेद चादर से सजी मुलायम गद्दों वाली वैठक , कोने मुंशियों वालो डेस्क , इसी कक्ष से लगा मेकअप रूम ।...कितनी प्रतिभाओं की यादों , इतनी कहानियों से भरा यह कक्ष ...महसूस कर सकतें हैं राज कपूर के सृजन की तासीर । उनकी मौजूदगी का अहसास  । यहां आयी  गई तमाम शख्सियत बेशक इस समय सामने न हों पर उनकी अदृश्य मौजूदगी महसूस होती है । पृथ्वीराज , प्रेमनाथ , राज कपूर , नरगिस , शैलेन्द्र , शंकर जय किशन...कितने नाम अनाम सितारों का दीदार काने वाला यह कक्ष अदृश्य रूप में ही सही उन सबसे मिलवा तो रहा । सिनेमा का अनुपम तीर्थ । राज साहब के कक्ष में स्मृतियो का आसव पीने के बादं बाहर वह शिवलिग भी देखा जो आर के की फिल्मों की शुरुआत में पूजा करते हुए पृथ्वीराज जी के साथ दिखता है ।... डॉ महावीर अधिकारी से मुलाकात होती है ' करंट ' के मैग्ज़ीनीकरण पर चर्चा होती है । इस बार के बम्बई प्रवास में राकेश भी साथ है , मैं इसे करंट में साथ काम करने के लिहाज से साथ ले आया था जल्द ही करंट ज्वाइन करना था । पर हुआ यह कि बम्बई की घुमाई फिराई के बीच  एक दिन पृथ्वी थियेटर मे हम लोगों ने नादिरा बब्बर निर्दर्शित नाटक ' सांध्य छाया ' देखा । बहुत भावपूर्ण नाटक था । राकेश झटका कहा गया । ... नहीं नहीं अब नहीं रहना यहां , मैं जबलपुर जाऊंगा । मैंने फुसलाने का बड़ा तिलिस्म फैलाया इसका ध्यान भटकाने के लिए पर भइया न माना तो न माना । जबलपुरिया भावुकता के लपेटे में आ गया । ऐसे ही 1970 में जबलपुर से बम्बई कूच करते समय आचार्य रजनीश से जबलपुर के संगियों ने कहा कि अब डूब जाओगे बम्बई जा कर भूल जाओगे हम सब को कौन साथी , कौन और कैसा जबलपुर  । ...रजनीश ने कहा , मैं कहीं भी रहूं , कैसा भी रहूं , रहूँगा तो जबलपुर का ही । ये कैसे हो सकता है कि मैं कही रहूं और वहां जबलपुर न हो । ...कौन भूल पाता है अपनी कुंज गलियों को , अपनी क्रीड़ाभूमि को , अपने घर , गांव , शहर को पर जब बात अपने लक्ष्य और अपने सपनों को हकीकत में पाने की होती है तो अपने अवधपुर वासियों को सोता छोड़ कर , गोपियों को बिलखता छोड़ और बुद्ध की तरह अपना सर्वस्व छोड़ संकल्प सिद्धि के लिए अनजान  अचीन्ही दुनिया में जाना ही पड़ता हैं  ।  ...कितनी कितनी बार हमने  राग अनुराग के अनुबंध तोड़े हैं ।

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