शनिवार, 9 अक्तूबर 2021

अंतिम जन्मदिन पर गांधी जी चाहते थे मरना /विवेक ßshukl


तीस जनवरी मार्ग पर स्थित बिड़ला हाउस ( अब गांधी दर्शन) में महात्मा गांधी के कमरे की पवित्रता और वातावरण को देखकर लगता है कि वे मानो कभी भी यहां आ जाएंगे। उनका आसन, लिखने की टेबल, लाठी वगैरह वहां पर रखे हुए हैं। कमरे के अंदर-बाहर खादी के कपड़े पहने लोग आते –जाते दिखाई दे रहे है। वे 2 अक्तूबर, 1947 को ना चाहते हुए भी अपने जन्म दिन पर,जो उनका अंतिम साबित हुआ, की तमाम लोगों से शुभकामनाओं को स्वीकार कर रहे थे। वे उस दिन बेहद निराश-हताश थे। देश की आजादी के बाद यह उनका पहला जन्मदिन था।

गांधी जी से उनके 78 वें जन्म दिन पर सुबह मिलने के लिए आने वालों में लॉर्ड माउंटबेटन और लेड़ी माउंटबेटन भी थे। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु, गृह मंत्री सरदार पटेल, मौलाना आजाद वगैरह भी उनसे मिलने आ चुके थे। उनके साथ छाया की तरह रहने वाले ब्रज कृष्ण चांदीवाला, मनू बहन और उनकी निजी चिकित्सक डा. सुशीला नैयर भी बिड़ला हाउस में ही थे। ये तीनों बापू के साथ बिड़ल हाउस में ही रहते थे।

गांधी प्रार्थना-प्रवचन- पेज 371-74 के अनुसार, गाधी जी ने हमेशा की तरह जन्मदिन  प्रार्थना और विशेष कताई करके मनाया। वे साढ़े आठ बजे स्नान के बाद  अपने कमरे में आए तो कुछ अंतरंग साथी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे – पंडित नेहरु, मेजबान घनश्यामदास बिड़ला तथा उनके परिवार के समस्त सदस्यगण। मीरा बहन ने गांधीजी के आसन के सामने रंग-बिरंगे फूलों से ‘हे राम’ और ‘ॐ’ सजाया था। एक संक्षिप्त प्रार्थना हुई जिसमें सबने हिस्सा लिया। प्रार्थना-प्रवचन महात्मा गांधी के उन प्रवचनों का संकलन है, जो उन्होंने 1 अप्रैल, 1947 से 30 जनवरी, 1948 को अपनी हत्या से एक दिन पहले तक दिल्ली की अपनी प्रार्थना सभाओं में दिए थे।

गांधी जी से मिलने के लिए सरदार पटेल अपनी पुत्री मणिबेन पटेल के साथ बिड़ला हाउस पहुंचे थे । बापू इनसे कहने लगे कि “ अब मेरी जीने की कतई इच्छा नहीं रही है। अब मेरी कोई सुनता ही नहीं। मैं इतने दिनों से दिल्ली में दंगों को रूकवाने की कोशिश कर रहा हूं पर दंगे रूक नहीं रहे। मेरी कोई सुन ही नहीं रहा।” मणिबेन ने बाद में अपनी डायरी में लिखा, “उनकी (बापू) व्यथा असह्य थी। हम उत्साह से उनके पास गए थे, बोझिल ह्रदय लेकर घर लौटे।”

गांधीजी से 2 अक्तूबर को लोग शाम तक मिलने आते रहे। कई विदेशी आए, सैंकड़ों तार आए। गांधी जी ने उस दिन के बारे में लिखा भी है- "ये बधाइयां हैं या कुछ और। एक जमाना था, जब सब मेरी कही हर बात को मानते थे पर आज हालतयह है कि मेरी बात कोई सुनता तक नहीं है। मैंने अब ज्यादा जीने की इच्छा छोड़ दी है। मैंने कभी कहा था कि मैं सवा सौ साल तक जिंदा रहूं, लेकिन अब मेरी ज्यादा जीने की इच्छा नहीं रही।"


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