शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2021

दिल्ली : मत भूलो बापू के इन दो एहसानों को / विवेल शुक्ला

 विवेक शुक्ला 

महात्मा गांधी के नोआखाली और कोलकाता में सांप्रदायिक दंगों को खत्म करवाने के बारे में बार-बार लिखा जाता है। पर उन्होंने यही काम दिल्ली में भी किया था। अजीब सी बात है कि इसकी अधिक चर्चा नहीं होती। इसके साथ ही वे दिल्ली में शिक्षक भी बने। उन्होंने दिल्ली के बच्चों को पढ़ाया भी। बाकी शायद ही कहीं वे किसी जगह पर मास्टर जी बने हों।


 दरअसल गांधी जी शाहदरा रेलवे स्टेशन में 9 सितंबर, 1947 को पहुंचते हैं। वे उसके बाद कभी दिल्ली से गए नहीं। वे पहली बार राजधानी में 12 अप्रैल 1915 को आए थे। वे तब पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरे थे। शाहदरा रेलवे स्टेशन में देश के गृह मंत्री सरदार पटेल और स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर उन्हें लेने आए थे। उस वक्त सारे वातावरण में तनाव और निराशा फैली हुई थी।


 कारण ये था कि देश आजाद होने के साथ-साथ बंटा भी था। बंटने के कारण अनेक शहरों में सांप्रदायिक दंगे भड़के थे। दिल्ली भी दंगों से अछूती नहीं रही थी। पहाड़गंज,करोलबाग,दरियागंज, महरौली वगैरह को दंगों ने हिला कर रखा दिया था। गांधी जी को शाहदरा रेलवे स्टेशन पर ही सरदार पटेल ने बता दिया कि अब उनका पंचकुईयां रोड की वाल्मिकी बस्ती के  वाल्मिकी मंदिर में रहना सुरक्षित नहीं होगा। बापू वहां पर पहले रह चुके थे।


 नहीं थम रहे थे दंगे


बापू को यह भी बताया गया कि अब वाल्मिकी बस्ती में पाकिस्तान से आए शरणार्थी ठहरे हैं। इसलिए उनके लिए वहां पर स्पेस भी नहीं है। पंडित नेहरु भी यही चाहते थे कि बापू किसी सुरक्षित जगह पर ठहरे क्योंकि दिल्ली में दंगे-फसाद थम ही नहीं रहे थे। तब बापू अलबुर्कर रोड (अब तीस जनवरी) पर स्थित बिड़ला हाउस में ठहरने के लिए तैयार हुए। शाहदरा से बिड़ला हाउस तक के सफर में गांधी जी ने जलती दिल्ली को देख लिया था। वे समझ गए थे कि यहां के हालात बेहद संवेदनशील हैं।


 वे दिल्ली आने के बाद सांप्रदायिक सौहार्द कायम करने जुट गए। वे 1 4 सितंबर को  ईदगाह और मोतियाखान जाते हैं। ये दोनों स्थान भी दंगों की आग में झुलसे थे। वे स्थानीय लोगों से शांति बनाए करने की अपील करते हैं। दोनों जगहों पर दोनों संप्रदायों के लोग उन्हें अपनी आपबीती सुनाते हैं। पाकिस्तान से अपना सब कुछ खोकर  आए हिंदू और सिख शरणार्थी हैरान थे कि गांधी जी कह रहे हैं कि “ भारत में मुसलमानों को रहने का हक़ है।”


 अंतिम उपवास किसलिए ?


गांधी जी के सघन प्रयासों के बाद भी यहां जब दंगे रूक ही नहीं रहे थे, तब उन्होंने 13 जनवरी,1948 से अनिश्चितकालीन उपवास चालू कर दिया। दरअसल उन्हें 12 जनवरी को खबर मिली कि महरौली में स्थित कुतुबउदीन बख्तियार काकी की दरगाह के बाहरी हिस्से को दंगाइयों ने क्षति पहुंचाई है।  ये सुनने के बाद उन्होंने अगले ही दिन से उपवास पर जाने का निर्णय लिया। माना जाता है कि बापू ने अपना अंतिम उपवास इसलिए रखा था ताकि भारत सरकार पर दबाव बनाया जा सके कि वो पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये अदा कर दे। पर सच ये है कि उनका उपवास दंगाइयों पर नैतिक दबाव डालने को लेकर था। गांधी जी ने 13 जनवरी को प्रात: साढ़े दस बजे अपना उपवास चालू किया। उस वक्त पंडित नेहरु, बापू के निजी सचिव प्यारे लाल नैयर वगैरह वहां पर थे। बिड़ला हाउस परिसर के बाहर मीडिया भी ‘ब्रेकिंग’ खबर पाने की कोशिश कर रहा था। हालांकि तब तक खबरिया चैनलों का युग आने में लंबा वक्त बचा था।


बापू के उपवास शुरू करते ही नेहरु जी और सरदार पटेल ने बिड़ला हाउस में डेरा जमा लिया। वायसराय लार्ड माउंटबेटन भी उनसे बार-बार मिलने आने लगे। बापू से अपना उपवास तोड़ने के लिए सैकड़ों हिन्दू, मुसलमान और सिख भी पहुंच रहे थे। उनकी निजी चिकित्सक डा. सुशीला नैयर उनके गिरते स्वास्थ्य पर नजर रख रही थीं। आकाशवाणी बापू की सेहत पर बुलेटिन प्रसारित कर रहा था। उनके उपवास का असर दिखने लगा। दिल्ली शांत हो गई। दंगाइयों ने बवाल काटना बंद कर दिया। तब बापू ने 18 जनवरी को अपना उपवास तोड़ा। उन्हें नेहरु जी और मौलाना आजाद ने ताजा फलों का रस पिलाया। इस तरह से 78 साल के बापू ने हिंसा को अपने उपवास से मात दी।”


क्यों गए थे फकीर  की दरगाह


वे इसके बाद 27 जनवरी को सुबह काकी की दरगाह में पहुंचते हैं। उनके साथ मौलाना आजाद भी दरगाह में जाते हैं। वे वहां पर मुसलमानों को भरोसा दिलाते हैं कि उन्हें भारत में ही रहना है। कुछ मुसलमान जब पाकिस्तान जाने की उनके साथ ही जिद्द करने लगे तो बापू ने उन्हें कसकर डांट भी पिलाई। बापू ने वापस बिड़ला हाउस आने पर प्रधानमंत्री नेहरु को निर्देश दिया कि वे काकी साहब की दरगाह के क्षतिग्रस्त भागों की मरम्मत करवाएं। नेहरु जी ने बापू के निर्देशों का पालन किया।पर अफसोस कि अब दरगाह से जुड़े किसी खादिम को ये जानकारी नहीं है कि बापू का काकी की दरगाह से किस तरह का रिश्ता रहा है। 


 जब बापू बने मास्टर जी



 दिल्ली ने महात्मा गांधी को मास्टर जी के रूप में देखा। ये तथ्य कम ही लोग जानते हैं। यहां उनकी पाठशाला चलती थी। वे अपने छात्रों को अंग्रेजी और हिन्दी पढ़ाते थे। उनकी कक्षाओं में सिर्फ बच्चे ही नहीं आते थे। उसमें बड़े-बुजुर्ग भी रहते थे। वे पंचकुईया रोड स्थित वाल्मिकि मंदिर परिसर में 214 दिन रहे। 1 अप्रैल 1946 से 10 जून,1947 तक। वे शाम के वक्त मंदिर से सटी वाल्मिकी बस्ती में रहने वाले परिवारों के बच्चों को पढ़ाते थे। उनकी पाठशाला में खासी भीड़ हो जाती थी। तब बापू की पाठशाला में रीडिंग रोड (अब मंदिर मार्ग) में स्थित हारकोर्ट बटलर स्कूल, रायसीना बंगाली स्कूल, दिल्ली तमिल स्कूल वगैरह के बच्चे भी आने लगे थे। कुछ बच्चे करोल बाग और इरविन रोड तक से आते थे। 


बापू अपने उन विद्यार्थियों को फटकार भी लगा देते थे, जो कक्षा में साफ-सुथरे हो कर नहीं आते थे। वे स्वच्छता पर विशेष ध्यान देते थे। वे मानते थे कि स्वच्छ रहे बिना आप ज्ञान अर्जित नहीं कर सकते। ये संयोग ही है कि इसी मंदिर से सटी वाल्मिकी बस्ती से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2 अक्तूबर 2014 को स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की थी।


बहरहाल वो कमरा जहां पर बापू पढ़ाते थे, अब भी पहले की तरह बना हुआ है। इधर एक चित्र रखा है, जिसमें कुछ बच्चे उनके पैरों से लिपटे नजर आते हैं। आपको इस तरह का चित्र शायद ही कहीं देखने को मिले। बापू की कोशिश रहती थी कि जिन्हें कतई लिखना-पढ़ना नहीं आता वे कुछ लिख-पढ़ सकें। इस वाल्मिकी मंदिर में बापू से विचार-विमर्श करने के लिए


पंडित नेहरु से लेकर सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान भी आते थे। सीमांत गांधी यहां  बापू के साथ कई बार ठहरे भी थे। अब भी इधर बापू के कक्ष के दर्शन करने के लिए देखने वाले आते रहते हैं। वाल्मिकी समाज की तरफ से प्रयास हो रहे हैं कि इधर गांधी शोध केन्द्र की स्थापना हो जाए। वे शाम को प्रार्थना के तुरंत बाद बच्चों को पढ़ाते थे।


जहां लुई फिशर मिलते थे बापू से


गांधी जी की संभवत: महानतम जीवनी ‘दि लाइफ आफ महात्मा गांधी’ के लेखक लुई फिशर भी उनसे वाल्मिकी मंदिर में ही मिलते थे। वे 25 जून,1946 को दिल्ली आए तो यहां पर बापू से मिलने पहुंचेथे। उस समय इधर प्रार्थना सभा की तैयारियां चल रही थीं। ‘दि लाइफ आफ महात्मा गांधी’ को आधार बनाकर ही फिल्म गांधी का निर्माण हुआ था।


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