रविवार, 19 जुलाई 2015

दुनिया की सबसे बड़ी साप्ताहिक पुस्तक बाजार (मेला) है दरियागंज







Christ University Hosur road Bangalore 4820.JPG यह सदस्य विकिपरियोजना क्राइस्ट विश्वविद्यालय का हिस्सा है।.



प्रस्तुति- हुमा असद


दरियागंज पुस्तक बाजार: यह नवीनतम सर्वश्रेष्ठ विक्रेता या एक बाहर के प्रिंट किताब हो , दिल्ली पुस्तकों की खरीद के लिए एक गर्म गंतव्य है। एक किलोमीटर से अधिक के लिए टूटती , दरियागंज पुरानी किताब बाजार में अक्सर दुनिया की सबसे बड़ी साप्ताहिक पुस्तक बाजार के रूप में जाना जाता है । यह हर रविवार को आयोजित किया जाता है ।
यहां उपलब्ध पुस्तकों का सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाता है। अस्थायी कीमत के अलावा, एक विस्तृत विविधता की और उपलब्धता के बाहर के प्रिंट , मुश्किल से मिल पुस्तकें यहाँ खरीदारों खींचता है। शौक के लिए कल्पना से चिकित्सा विज्ञान के लिए , वास्तुकला पाकशास्त्र के लिए , नक्शोन को कॉमिक्स , पत्रिकाओं के लिए क्लासिक्स , और प्रबंधन , किसी भी शैली के नाम है और आप इसे यहाँ पा सकते हैं।
चांदनी चौक से पुरानी दिल्ली में ऐतिहासिक बाजार क्षेत्र है । यह दिल्ली का सबसे पुराना बाजार है और अभी भी सबसे व्यस्त और भी एशिया के सबसे बड़े थोक बाजार और इसे करने के लिए एक यात्रा के लिए एक जैसे दुकानदारों और पर्यटकों के लिए काफी एक अनुभव है । सचमुच, नाम ' चांदनी चौक ' का अर्थ है और यह फतेहपुरी मस्जिद को लाल किले के लाहौर गेट से शाहजहानाबाद की पुरानी दीवारों शहर के बीच के माध्यम से चलाता है। इससे पहले, वहाँ पानी आपूर्ति योजना के एक हिस्से के रूप में सड़क के बीच के माध्यम से चल रहे एक नहर थी और यह जगह चांदनी बनाया और इस से बाजार के लिए यह नाम मिला है कि चांदनी प्रतिबिंबित करने के लिए प्रयोग किया जाता है ।
क्षेत्र उनके लिए अग्रणी और संकरी गलियों ( पुराने पैटर्न के मकानों , हवेलियों सहित) ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण इमारतों की एक संख्या है । १९६० में ध्वस्त कर दिया था कि ऐतिहासिक घन्ताघर्, यहाँ हुआ करता था । प्रसिद्ध उर्दू शायर मिर्जा गालिब की हवेली भी यहां स्थित है । यह हो रहा है और सबसे व्यस्त क्षेत्र के रूप में था जामा मस्जिद भी १६४४ में इस क्षेत्र के बहुत करीब बनाया गया था । यह लोगों के लाखों व्यस्त शॉपिंग , विक्रय या चिल्ला साथ बहुत भीड़भाड़ लगता है , हालांकि आज , यह अभी भी ऐतिहासिक चरित्र को दर्शाता है ।
क्षेत्र भी रूप में वहाँ एक प्रसिद्ध मस्जिदों , हिंदू मंदिरों , जैन मंदिर , सिख गुरुद्वारा की और एक करीबी पड़ोस में चर्चों के सह - अस्तित्व पाता आप सांप्रदायिक सद्भाव की एक महसूस कर देता है ।
चांदनी चौक इतने पर अलग और मिठाई ( कुछ के रूप में २५० वर्ष पुराने सहित) प्रसिद्ध रेस्तरां के भार से प्रसिद्ध मसाले बाजार , जूता बाजार , कपड़े बाजार , आभूषण बाजार , किताबें बाजार , चमड़ा बाजार और तरह के भीतर उप बाजारों की एक संख्या है मिठाई की किस्मों के हजारों के साथ दुकानें. पराठा दुकानों के साथ परांठे गली १९वीं सदी के बाद से बाजार में मौजूद है। यहां पारंपरिक भारतीय भोजन का स्वाद ले सकते हैं । और कुछ भी खरीद नहीं करना चाहते हैं जो उन लोगों के लिए , सिर्फ विंडो शॉपिंग भी काफी मजेदार है । गैर भारतीय टीम यहां भारतीय पुराने और व्यस्त बाजारों में से एक बहुत अच्छा विचार हो सकता है ।
लगता है कि सभी को जोड़ने के लिए, चांदनी चौक , इसे निम्नलिखित एक संस्कृति है , भारत में सिर्फ एक बाजार नहीं है । अब यह एक सदी से भी अधिक बॉलीवुड फिल्मों में उल्लेख पाया है । हिंदी भाषा शुरुआती के लिए, वहाँ चांदनी चौक के लिए उल्लेख उस भाषा में लोकप्रिय जीभ त्विस्तेर्स् हैं , और हिंदी सीखने जबकि हम सब उन्हें सीखा है . यह " चंदू के चाचा पूर्वोत्तर, चंदू के चाची को , चांदनी रात में , चांदनी चौक में , छन्दि के छम्चे एसई, चटनी च्खाइ " इस तरह से चलाता है। इसी तरह शोउन्द् " चर्चा " की पुनरावृत्ति यह एक जीभ भांजनेवाला बनाता है , और यह एक सच में सभी भारतीयों के साथ एक पसंदीदा किया जा रहा है । अर्थ है " चंदू के चाचा, चांदनी चौक में , एक चांदनी रात में , चंदू की चाची को एक चांदी के चम्मच से चटनी खिलाया "। एक बार चांदनी चौक के केंद्र में खड़ा था और एक ही गीत स्वतंत्रता आंदोलन से प्रेरित है कहा जाता है कि घन्ताघर् के बारे में था कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान एक लोकप्रिय देशभक्ति गीत भी था। चांदनी एवेन्यू अर्थ हन्दिनि चौक , केंद्रीय उत्तरी दिल्ली , भारत में सबसे पुराना और सबसे व्यस्त बाजारों में से एक है ।
चांदनी चौक मूल रूप से शाह जहानाबाद बुलाया गया था जो पुरानी दिल्ली की दीवारों शहर में प्रमुख सड़क है । दिल्ली के लाल किले में शामिल हैं जो दीवारों शहर मुगल सम्राट शाहजहां और भी शाहजहानाबाद की अपनी नई राजधानी की भूनिर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है जो उसकी बेटी जहांआरा बेगम साहिब , द्वारा डिजाइन द्वारा , 1650 ई. में स्थापित किया गया था ।

बुधवार, 8 जुलाई 2015

जन सरोकारों को समझने की विधा है जन सम्‍पर्क






जयश्री एन. जेठवानी और नरेन्‍द्र नाथ सरकार।

प्रस्तुति- निम्मी नर्गिस, हूमरा असद

By News Writers, July 7, 2015

अब जब हम एक नयी सदी में प्रवेश कर गये हैं प्रबंधन के क्षेत्र में सबसे ज्‍यादा मांग रखने वाले विषयों में से एक जन-संपर्क का भी दायरा बढ़ा है। भारत में नब्‍बे का दशक जन-संपर्क से जुड़े लोगों के लिए काफी लाभकारी रहा है। जन-संपर्क को अब सिर्फ सजावट की वस्‍तु नहीं माना जाता बल्कि वह कुल मिलाकर रणनीतिक प्रबंधन का अविभाज्‍य अंग बन गया है। जन-संपर्क को भले ही नये नामों जैसे कॉरपोरेट कम्‍यूनिकेशन, पब्लिक अफेयर्स, कॉरपोरेट अफेयर्स आदि से जाने जाना लगा हो लेकिन उसका मूल तत्‍व वही है। जोय सी गॉर्डेन अपने विश्‍लेषणात्‍मक लेखों में से एक में लिखते है कि विशेषज्ञ जन-संपर्क को इसे जन-संपर्क से जुड़े लोगों द्वारा किए जाने वाले कार्यों, उनकी दृष्टि में जन-संपर्क का जो प्रभाव होना चाहिए और जन-संपर्क का उत्‍तरदायित्‍वपूर्ण किस तरह पालन किया जाना चाहिए के दायरे में रखकर देखते हैं।

बास्किन, एओनॉल्‍फ और लट्टीमोर जन-संपर्क को कुछ इस तरह परिभाषित करते हैं ”प्रबंधन कार्य जो संगठनात्‍मक उददेश्‍यों, तारतम्‍य दर्शन स्‍पष्‍ट करने और संगठनात्‍मक परिवर्तन में सहायक हैं। जन-संपर्क से जुड़े लोग सभी संबंधित आंतरिक और बाह्यजनों से संबंधों के विकास और संगठनात्‍मक लक्ष्‍यों व सामाजिक आशाओं के मध्‍य तारतम्‍य स्‍थापित करते हेतु संवाद का सहारा लेते हैं। जन-संपर्क वाले ऐसे संगठनात्‍मक कार्यक्रमों का विकास, अनुपालन और मूल्‍यांकन सुनिश्चित करते हैं जिनसे संगठन के अवयवों और जनों के मध्‍य प्रभाव के आदान-प्रदान और समझ बढ़ाने में सहायता मिलती है।”

बिट्रिश इंस्‍टीट्यूट ऑफ पब्लिक रिलेशंस जन-संपर्क को इस तरह परिभाषित करता है ”संगठन और उसके विभिन्‍न जनों के मध्‍य आपसी समझ स्‍थापित करने और बनाये रखने के लिए योजनाबद्ध तरीके से निरंतर किया जाने वाला प्रयास”
क्रेबल और विबर्ट जन-संपर्क को इस तरह परिभाषित करते हैं ”विभिन्‍न चरणों वाला संवाद प्रबंधन का कार्य जिसमें किसी संगठन और उसके वातावरण के किसी भी पहलू के मध्‍य संबंधों पर शोध, विश्‍लेषण, प्रभाव और पुनर्मूल्‍यांकन शामिल है।

डा0 रेक्‍स एफ0 हार्लो जन-संपर्कविद और इस पेशे में लंबा समय बिताने वाले एवं फाउंडेशन ऑफ पीआर रिसर्च एंड एजूकेशन से जुड़े रहे, ने ढेरों जन-संपर्क की परिभाषायें एकत्रित की और 80 प्रमुख पेशेवरों के साथ बातचीत के बाद यह परिभाषा दी है- ”जन-संपर्क प्रबंधन की एक ऐसी विशिष्‍ट शाखा है जो किसी संगठन और उसके जनों के बीच संवाद, समझ, स्‍वीकार्यता और सहयोग के तार स्‍थापित करने और उन्‍हें बनाये रखने में सहायक है, इसमें समस्‍याओं और मुद्दों का प्रबंधन भी शामिल है, प्रबंधन को भावी परिवर्तनों और उनके प्रभावी उपयोग के लिए तैयार करता है, आ रहे बदलावों का अनुमान लगाने में सहायक है और शोध सही नैतिक संवाद तकनीकें इसके प्रमुख उपकरणों में से है।

ग्रुनिंग और हंट के अनुसार ”जन-संपर्क एक ऐसा प्रबंधन कार्य है जिसमें लोगों के व्‍यवहार का मूल्‍यांकन, किसी व्‍यक्ति या जनहित वाले संगठन की नीतियों और प्रक्रियाओं की पहचान की जाती है एवं लोगों की समझ और स्‍वीकार्यता प्राप्‍त करने के लिए कार्यक्रम की योजना बनाना और उसका क्रियान्‍वयन शामिल है।”

हारवुड आई चाइल्‍ड ने 1930 में जो लिखा था उसकी प्रासंगिकता आज भी है। चाइल्‍ड ने तर्क दिया था जन-संपर्क का तत्‍व किसी विचार की प्रस्‍तुति या मानसिक व्‍यवहार बदलने की कला या सदभावपूर्ण और लाभ के संबंध बनाना नहीं है बल्कि जनहित में अपने व्‍यक्तिगत कारपोरेट व्‍यवहार के पहलुओं जिनकी सामाजिक महत्‍ता है से सामंजस्‍य बैठाना है। अब जमीन पर वापस लौटते हैं और यह जानने की कोशिश करते है जन-संपर्क का उद्देश्‍य क्‍या है और हमें उसकी आवश्‍यकता क्‍यों है। जन-संपर्क का लक्ष्‍य है।

1. लोगों के नकारात्‍मक विचारों में बदलाव लाना या उन्‍हें तटस्‍थ बनाना। 2. अविकसित विचारों को ठोस रूप प्रदान करना। 3. लोगों के सकारात्‍मक विचार।

जन-संपर्क का निरंतर प्रयास रहता है :
1. आरंभ
2. बढ़त लेना 3. परिवर्तन
4. गति पकड़ना

इसका उद्देश्‍य किसी विचार, मत या गतिविधि का आरंभ करना होता है जो पहले से विद्यमान न हो, यह किसी गतिविधि या बहस में बढ़त लेने में सहायक है, इसका उद्देश्‍य नकारात्‍मक वातावरण को परिवर्तित करना और जब चीजें धीमी हो जाए उन्‍हें गति प्रदान करना है।

कई विशेषज्ञों के अनुसार लोगों का मत जन-संपर्क के बैरोमीटर की तरह कार्य करता है। लोगों का मत एक ऐसे मनोवैज्ञानिक वातावरण का निर्माण करता है जिसमें संगठन बनते या बिगड़ते हैं। व्‍यवसाय की जटिलताओं, लोगों के मध्‍य बढ़ती विभिन्‍नताओं और उपभोक्‍ताओं की बढ़ती आशाओं को देखते हुए, जन-संपर्क को न केवल संगठन की सकारात्‍मक छवि का निर्माण करना होता है, बल्कि इसका भी कि संगठन किसलिए अस्तित्‍व में है।

1989 में जब वी. पी. सिंह की सरकार सत्‍ता में थी, भारत मां के महान सपूत महात्‍मा गांधी के 120वें जन्‍मदिन के उपलक्ष्‍य में इंडिया गेट से एक छतरी को हटाकर उनकी मूर्ति लगाने का निर्णय किया गया। इसके पीछे तर्क यह दिया गया कि गांधी, जिनकी ब्रिटिश राज को हटाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका थी की मूर्ति ब्रिटिशों द्वारा निर्मित छतरी के नीचे नहीं लगाई जा सकती है। एक प्रसिद्ध मूर्तिकार को मूर्ति का आकार देने का काम सौंपा गया। जैसे-जैसे मूर्ति स्‍थापना का समय निकट आया प्रसिद्ध चित्रकार और शिल्‍पी सतीश गुजराल छतरी को हटाए जाने का विरोध करने वालों में पहले थे। टाइम्‍स ऑव इंडिया में प्रकाशित एक लेख में उन्‍होंने प्रशासन द्वारा छतरी हटाये जाने के तर्क पर ही प्रश्‍न खड़ा कर दिया। गुजराल ने प्रश्‍न किया अगर छतरी ब्रिटिश राज की याद दिलाती है तो ऐसे कई भवन है, जिसमें संसद और राष्‍ट्रपति भवन भी शामिल हैं। क्‍या हम ऐतिहासिक इमारतों को ढहाने की बात सोच सकते हैं। उन्‍होंने तर्क दिया छतरी लुटियन की पूरी डिजाइन और योजना का हिस्‍सा है और उसके साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ पूरे क्षेत्र के रूप को प्रभावित करेगी। उसके बाद प्रतिक्रियाओं की झड़ी लग गई। विभिन्‍न समाचार पत्रों में कई सारे लेख प्रकाशित हुए। यह मुद्दा राष्‍ट्रीय बहस का विषय बन गया। इस विचार के दो पक्ष थे, एक छतरी के हटाने का समर्थन और दूसरा विरोध। महात्‍मा गांधी का सम्‍मान किया जाना चाहिए, इस पर कोई मतभेद नहीं था। छतरी के पक्षधर लोगों का कहना था मूर्ति को छतरी के नीचे या फिर अन्‍य किसी उपयुक्‍त स्‍थान पर स्‍थापित किया जाना चाहिए। जन प्रतिक्रिया ने गति पकड़ी और मूर्ति स्‍थापित न‍हीं की जा सकी। वह आज भी उपयुक्‍त स्‍थान की बाट जोह रही है।

यह उदाहरण लोगों के मत के महत्‍व को दर्शाता है। एक व्‍यक्ति के संकल्‍प ने उसे किस तरह राष्‍ट्रीय बहस का विषय बना दिया। हालांकि उसकी शुरूआत एक अकेले ने की थी लेकिन समान सोच वाले लोग उसके पक्ष में खड़े हो गए। सरकार भी अपने निर्णय पर अडिग नहीं रह सकी बल्कि लोगों के मत के सामने झुकने को विवश हुई। जन-संपर्क से जुड़े पेशेवर लोग जनमत की जटिलताओं को समझने और न केवल उस पर निगाह रखते हैं बल्कि उसी के अनुसार नीतियों और कार्यक्रमों का क्रियान्‍वयन और उनमें परिवर्तन करते हैं।

नब्‍बे का दशक जैसा कि पहले कहा जा चुका है, देश में जन-संपर्क के लिए लाभकारी रहा है। जन-संपर्क को सिर्फ मीडिया संभालने से जोड़कर नहीं देखा जाता है। उसकी भूमिका को विषयों के प्रबंधन, जनमत सर्वेक्षण, उत्‍पादों को बाजार में उतारने और आयोजनों के प्रबंधन में भी स्‍वीकार किया जाता है।

जब जन-संपर्क को व्‍यवहार में लेने की बात आती है ऐसे कौन से प्रमुख क्षेत्र है जिन पर जन-संपर्क से जुड़े लोगों का जोर प्रमुख होना चाहिए?

1. उनके लिए संस्‍थान के केन्‍द्रीय मूल्‍यों और प्रतियोगितात्‍मकता को समझना आवश्‍यक है – प्रत्‍येक संस्‍थान की कुछ प्रतियोगितात्‍मकताएं होती हैं, जो उसके लिए विशिष्‍ट हो सकती है। वह उत्‍पादन प्रक्रिया, उत्‍पादन का तरीका, असेम्‍बली लाइन विशेषज्ञता, मानव संसाधन आदि में से कुछ भी हो, जन-संपर्क के पेशे से जुड़े किसी भी व्‍यक्त्‍िा के लिए समझना और सूचना का सही प्रयोग करना आवश्‍यक है। इसी तरह प्रत्‍येक संस्‍थान के कुछ केन्‍द्रीय मूल्‍य होते हैं जिनका वह प्रतिनिधित्‍व करता है। अगर जन-संपर्क वाले को इनकी सही समझ हो तो वह कॉरपोरेशन पर हार्ड और सॉफ्ट स्‍टोरी लिखने के काम आती है। कुछ वर्ष पूर्व बिरला समूह के बारे में एक रोचक कहानी छपी।

एक राष्‍ट्रीय समाचार पत्र में उसके परिवार के कुछ केन्‍द्रीय मूल्‍यों का उल्‍लेख था। कहानी में यह कहा गया था बिरला आमतौर पर दूसरों से अलग हैं। परिवार के बारे में कहा जाता था, उसने होटल और शराब व्‍यवसाय में कदम न रखने का निर्णय किया है। इसके पीछे तर्क यह था जब वह स्‍वयं शराब का सेवन नहीं करते हैं, तो उन्‍हें शराब उत्‍पादन या परोसने का काम क्‍यों करना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं है जो उनके यहां कार्यरत हैं, उन्‍हे भी उन पारिवारिक मूल्‍यों का पालन करना होगा।

2. विभिन्‍न भागीदारों/जनों की पहचान करना आवश्‍यक- जन आंतरिक और बाह्य दोनों ही होंगे। उसे अंदर मुख्‍यत: निम्‍न आएंगे: कर्मचारी, उनके परिवार, यूनियन नेता, आंतरिक और बाह्य समर्थक, वित्‍तीय संस्‍थान, स्‍थानीय और ओवरसीज बैंक, स्‍टॉक एक्‍सचेंज, एजेंट, थोक विक्रेता, खुदरा व्‍यापारी, उपभोक्‍ता, स्‍थानीय और राष्‍ट्रीय सरकारें, स्‍थानीय और राष्‍ट्रीय प्रशासन, विशेष रूचिवाले समूह जिनमें कई लॉबियां और पेशेवर समूह, मीडिया क्षेत्रीय और मुख्‍यधारा की और अंततोगत्‍वा समुदाय। जन-संपर्क पेशेवरों के लिए विभिन्‍न जनों की संवाद आवश्‍यकताओं को समझना आवश्‍यक है। संवाद दोतरफा प्रक्रिया है। हालांकि भेजने और प्राप्‍त करने वाले दोनों की संवाद संबंधी कुछ आवश्‍यकताएं और दायित्‍व होते हैं। किसी कॉरपोरेट की संवाद संबंधी पहली आवश्‍यकता संबंधित समूहों तक अपनी गतिविधियों के बारे में सूचना पहुंचाना और संस्‍थान की सकारात्‍मक छवि बनाना है। दूसरा यह कि प्रत्‍येक संबंधित समूह की संस्‍थान से जुड़ी कुछ विशिष्‍ट संवाद आवयकताएं हो सकती है। इसे कुछ इस तरह समझा जा सकता है, कर्मचारियों की संवाद आवश्‍यकता अपने कल्‍याण के इर्द-गिर्द घूमती है। जैसे कोई ऊपर की तरफ बढ़ता है उनमें ज्ञान व कौशल अर्जित करने और अपनी बात सुने जाने की इच्‍छा जन्‍म लेती है। दूसरी तरफ थोक विक्रेताओं और खुदरा व्‍यापारियों की संवाद आवश्‍यकताएं अलग होती है। उनकी रूचि स्‍वयं को मिलने वाले कमीशन और अन्‍य लाभों के बारे में जानने की होती है। विशेष रूचि वाले समूह जनहित के विषयों पर नजर रखना चाहेंगे। संक्षेप में, प्रत्‍येक समूह की अपनी संवाद आवश्‍यकताएं और दायित्‍व होते हैं।

सूचना को शक्ति माना जाता है और यह कहा जाता है सूचना पर नियंत्रण रखने वाले राष्‍ट्रों के भाग्‍य का निर्धारण करते हैं। सूचना निश्‍चय ही शक्ति है लेकिन जब उसका नियंत्रण नहीं वितरण किया जाता है। जन-संपर्क जो सूचना के पूरे क्रम का महत्‍वपूर्ण भाग है को इसके वितरण पर ध्‍यान देना चाहिए। सूचना तकनीक के इस युग में सूचनाओं को दबाये रखना किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता है।

3. वातावरण पर निगाह रखना और संस्‍थान को नये परिवर्तनों से अवगत कराना:- संस्‍थान समाज का ही हिस्‍सा होता है। समाज में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में होने वाली हलचलों का संस्‍थान पर सीधा असर होता है। यह स्‍वाभाविक है जन-संपर्क से जुड़े लोग संस्‍थान के आंख और कान की भूमिका निभाता है और बाहरी दुनिया की गतिविधियों पर निगाह रखते हैं। मीडिया ऐसी गतिविधियों के बारे में जानकारी का प्रमुख स्रोत हैं।

4. विभिन्‍न जनों तक कम लागत में पहुंचने के लिए सही मीडिया की पहचान करना – मार्शल मैकलुहान ने कहा है माध्‍यम ही संदेश है। आधा रास्‍ता सही मीडिया की पहचान से ही पूरा हो जाता है हालांकि बुद्धिमता अपने लक्षित समूह में से अधिकतम लोगों तक कम से कम लागत में पहुंचने के लिए सर्वोतम मीडिया की पहचान में है। मीडिया के बारे में अधिक चर्चा हम अध्‍याय छह त्रिकोण: संदेश, माध्‍यम और श्रोता में करेंगे।

5. संस्‍थान के लिए अलग कॉरपोरेट पहचान बनाना – जिस तरह दो लोग एक जैसे नहीं हो सकते उसी तरह दो संस्‍थान भी नहीं। जिस तरह लोग अलग दिखने का प्रयास करते हैं उसी तरह संस्‍थान भी। वैज्ञानिक भले ही क्‍लोनिंग की बात कर रहे हों लेकिन अपना प्रतिरूप होने का विचार ही बहुत लोगों को अटपटा लग सकता है जो सृजन को किसी अदृश्‍य शक्ति का कार्य मानते हैं। कॉरपोरेट को अपनी अलग छवि बनाने के लिए काफी धन और संसाधन व्‍यय करने पड़ते हैं। जन-संपर्क का प्रमुख काम संस्‍थान की कॉरपोरेट छवि बनाना और उसकी रक्षा करना है।

जन-संपर्क के संदर्भ में लोग ‘प्रभावी जन-संपर्क’ की बात करते हैं। जन-संपर्क से जुड़े लोग ऐसे तत्‍वों की बात करते थे जिन्‍हें मापा नहीं जा सकता। अब स्थितियां बदल चुकी हैं। जन-संपर्क के प्रभाव का आकंलन बड़े और छोटे दोनों ही स्‍तरों पर विभिन्‍न जन-संपर्क कार्यक्रमों के लिए निर्धारित उददेश्‍यों के जरिए किया जाता है। हम जन-संपर्क से क्‍या आशा करते हैं? या इसे कुछ ऐसे भी कह सकते हैं जन-संपर्क की सतह क्‍या है? इसमें यह सभी आ जाता है:

1. सूचना का वितरण
2. विभिन्‍न साझीदारों का विश्‍वास जीतना
3. बेहतर उत्‍पादकता और अधिक लाभ को लक्ष्‍य बनाना
4. संबंधों में खुलापन और विश्‍वसनीयता हासिल करना प्रभावी जन-संपर्क कैसे किया जा सकता है?

अभ्‍यास
संस्‍थान के केन्‍द्रीय मूल्‍यों को समझने के लिए शीर्ष प्रबंधन प्रबंधकों के विभिन्‍न वर्गों और कर्मियों के साथ बैठे। यह पता लगायें, लोग संस्‍थान के बारे में क्‍या सोचते हैं और उनकी निगाह में संस्‍थान की छवि कैसी है। उनके विचारों को भलीभांति समझकर ‘मिशन स्‍टेटमेंट’ का रूप दिया जा सकता है। संक्षेप में अपने संस्‍थान के लिए एक दूरदृष्टि वाला कार्य करें।

जन-संपर्क के काम में लगे व्‍यक्ति को इससे संस्‍थान के चारों ओर एक आभामंडल के निर्माण और हार्ड व सॉफ्ट स्‍टोरी करने में सहायता मिलती है। यह अभ्‍यास अलग-अलग तरह के मीडिया के लिए उसे संस्‍थान के बारे में नई दृष्टि देता है, जिसका शायद पहले अभाव रहा हो।

सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक वातावरण पर निगाह रखें। मुददों के बारे में जाने, वातावरण को समझे, जिससे संस्‍थान के लिए उपयोगी सूचनायें अलग की जा सके। ऐसी सूचना को फिर विभिन्‍न स्‍तरों पर निर्णय और क्रियान्‍वयन के लिए उपयोग में लिया जा सकता है।

अपने संस्‍थान की दृश्‍य और अदृश्‍य विशेषताओं, अवसरों और खतरों का विश्‍लेषण कर उसके लिए एक अलग व्‍यक्तित्‍व और कॉरपोरेट छवि का निर्माण करने में सहायता करें।

संवाद का ऐसा वातावरण तैयार करें जिसमें विचारों का स्‍वतंत्र आदान-प्रदान संभव हो सके। प्रभावी संवाद के मापदंड हैं : संदेश की पहुंच, संदेश का अर्थ निकालना, संदेश की विश्‍वसनीयता, जिसके इच्छित परिणाम हों।

व्‍यवसाय के बारे में अक्‍सर ऐसा कहा जाता है, कहानी जिसे बुरी तरह कहा गया हो। ऐसा तब होता है जब मुद्दे विभिन्‍न कोणों से अलग होते हैं। हम इनके बारे में अध्‍याय छह त्रिकोण-संदेश, माध्‍यम और श्रोता में विस्‍तार से चर्चा करेंगे।

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टेलीविज़न पत्रकारिता-मीडिया के बदलते आयाम





आलोक वर्मा

प्रस्तुति- हूमरा असद

03 जुलाई 2015

 शायद एक थी ऐसी जगह ढूंढ पाना मुश्किल होगा जहां मीडिया और संचार के तमाम माध्यम अपनी पैठ न चुके हों। हम कहीं भी जाएं, किसी से भी मिल-मीडिया और संचार के माध्यम हमे अपने आस-पास नजर आ ही जाते हैं। मीडिया के कई रूप और संचार के तमाम माध्यम हैं पर ये कर्ई रूप और तमाम माध्यम दरसल एक ही रूप और एक ही माध्यम हैं।

आप में से बहुतों को लगता होगा कि संचार के क्षेत्र में जो हालिया क्रांति आई है उसमें पुरानी चीजे पीछे छूट गई हैं और इस्तेमाल की नई-नई चीजे ईजाद होकर हमारे सामने आ गई हैं। ऐसा लगता जरूर है पर दरअसल ऐसा है। वहीं संचार के क्षेत्र में जो क्रांति आई है उसे अगर हम ध्यान से देखें तो यही पाएंगे कि पुरानी चीजों में ही महत्वपूर्ण रद्दोबदल हुआ है और वो नई चीजें बन गई है-संचार की ये क्रांति नए और पुराने का अनोखा सा संगम है।

मीडिया की दुनिया की कई तकनीकी चीजें तो सौ साल पहले की र्ईजाद हो चुकी थीं पर उन चीजों ने बड़ी सुदंरता से खुद को नई तकनीक में ढाल लिया है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण है रेडियो। पिछले सौ सालों से अब तक लगातार पूरी दुनिया ये रेडियो पर खबरे सुनी जाती रही हैं, याद कीजिए वो तमाम पुरानी घटनाएं जब आप खबर सुनने के लिए बीबीसी या आकाशवाणी को बडी़ बेचैनी से ट्यून किया करते थे! ये रेडिया आज भी मौजूद है पर अपने एक नए स्वरूप ये नई डिजिटल तकनीक ने रेडियो को डिजिटल रेडियो बना दिया है जिससे इसका प्रसारण और स्पष्ट हो गया है। इससे स्पष्टï है कि नया कुछ नहीं हुआ बल्कि हुआ ये है कि एक नई तकनीक ने पुरानी तकनीक की जगह लेकर मीडिया के उसी माध्यम को और उपयोगी बना दिया है। इसी तरह का दूसरा उदाहरण अखबारों और किताबों का है। टीवी और फिल्मों का चलन बढऩे पर सबको ये डर था कि अखबार छपना बंद हो जाएंगे और किताबों की जरूरत ही नहीं रहेगी। पर क्या ऐसा हुआ? नहीं।

इलेक्ट्रानिक माध्यमों पर कईं अखबार और किताबें आई थी और गई थी पर प्रिंट माध्यम के अखबार और किताबें अपनी जगह पर जमीं रही- हां उन्होंने ये जरूर किया कि कंप्यूटर तकनीक का लाथ उठाकर इंटरनेट पर भी स्वयं को उपलब्ध करा दिया। इसका मतलब यही हुआ कि पुराने माध्यमों ने नई तकनीक से खुद को थोड़ा और फैला लिया…आप सोच कर देखिए, टीवी पर न्यूज देखने के बाद थी आप सुबह का अखबार पड़ते ही है ना!!

पर बदली हुई इस दुनिया में आपके लिए कई चीजें और उपलब्ध होती जा रही हैं। मीडिया के पुराने माध्यम (जैसे कि रेडियो, अखबार आदि) मोबाइल, वायरलेस और इंटरनेट जैसी नई तकनीकों के कारण नए-नए रूपों में सामने आ रहे हैं। ये नई तकनीके हमें मनोरंजन और समाचारों के लिए ढेर सारे माध्यम दे रही है जिनमें से हम अपनी सुविधा के अनुसार अपना माध्यम चुन सकते है। हम समाचार पाने के लिए अखबार पढ़े, रेडियो सुने, टीवी देखें या इंटरनेट पर जाकर किसी साइट को खंगाले- ये अब हम पर है।

तमाम नए लोगों को फिल्म टीवी अखबारों और इंटरनेट की नवीनतम तकनीकी चीजों की इतनी आदत सी हो गई है कि उनके लिए ये समझ पाना थोड़ा मुश्किल हो गया है कि महज पद्रंह साल पहले तक ये सब कुछ इस रूप में नहीं था। मीडिया में एक नए तरह की ये क्रांति हाथ फिलहाल ही आई है और ये अपने दूरगामी नतीजों के साथ आई है।

मीडिया के नए अवतार ने हमारी आंखों को दूरबीन, कानों को ट्रांसमीटर और मुंह को लाउडस्पीकर सा बना दिया है। दूरियों और समय के बंधनों को मीडिया के इस नए अवतार ने बदल कर रख दिया है। हमने जो कभी नहीं देखा-अब देख सकते हैं, हमने जो कभी नहीं सुना-अब सुन सकते हैं। मीडिया ने हमारी जानकारियों को हजारों गुना बढ़ा डाला है। हिमालय की ऊजॉइयों को जिन्हें नापने में तेनसिंग को वर्षों लगे थे, अब हम किसी भी टेलीविजन डाक्यूमेंट्री में बड़े आराम से देख लेते हैं। नेपाल में भूकंप के झटके लगते हैं तो हम उसे भय रिचर स्केल पैमाने के टीवी-न्यूज पर लाइव देख रहे होते हैं। रातों को जाग-जागकर अमरीकी बमवर्षकों को अफगानिस्तान पर बम बरसाते हम किसी भी न्यूज चैनल पर लाइव देख सकते हैं। इस सबके लिए हमे अब इंतजार भी नहीं करना पड़ता। ऐसा लगता है जैसे कि पूरी दुनिया सिमट सी गई है। एक बटन दबाइए और दुनिया की हर खबर, हर मनोरंजन आपके ड्राइंग रूप में पहुंच जाएगा। जरा कल्पना कीजिए कि डेढ़ सौ साल पहले ये सब कुछ कैसे हो रहा होगा- आप यकीनन समाचार लेकर घोड़े पर दौड़ते किसी व्यक्ति को ही देखेंगे-समाचारों का वही घोड़ा आज हवा पर संवार हो चुका है।

    इसमें कोई दो राय नहीं है कि हर टीवी न्यूज चैनल आज एक ऐसी दौड़ में शामिल है जिसमें वो सबसे ज्यादा लोकप्रियता हासिल कर नंबर वन बनना चाहता है। नंबर वन की इस दौड़ को जीतने के लिए ये जरूरी है कि आप वही दिखाएं जो लोग देखना चाहते हैं, इस वजह से कई बार आप न्यूज चैनल पर उस तरह की खबरें ज्यादा देखेंगे जो आपे ध्यान को टीवी पर खींच सके। दूसरी तरफ दूरगामी नतीजों वाली कई खबरें कई बार उपेक्षित भी हो जाती है।

मीडिया के नए दौर में सूचनाओं को छिपा पाना संभव नहीं रह गया है। सूचनाओं का प्रवाह इतना ज्यादा है कि लोगों की सक्रियता और समझदारी भी बढ़ी है और इसका सीधा असर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पड़ा है। कैसे? देखिए, ये सभी समझते हैं कि जानकार होना ही आपको सही अर्थ में ताकतवर बनाता है और मीडिया के द्वारा आज लोगों में जानकारियों का ढेर लगा दिया गया है। ऐसा लगने लगा है कि हर कोई हर कुछ जानता है। ऐसे ये कोई सरकार थी ये गलतफहमी पालने का जोखिम नहीं उठा सकती कि लोगों को जानकारी नहीं है इसलिए जो चल रहा है उसे चलने दिया जाए। सरकारें आज लोगों के सीधे नियंत्रण में है और लोकतंत्र के इस बेहतर होते स्वरूप के लिए मीडिया की क्रांति को ही श्रेय है।

पिछले कई सालों में हमारी सामाजिक व्यवस्था में भी बदलाव नजर आने लगे हैं और ये भी इलैक्ट्रानिक क्रांति का ही नतीजा हैं। पूरा देश धीरे-धीरे उस अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था का हिस्सा बनता जा रहा है जिसमें राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यवसायिक रिश्तों की लेन-देन में मीडिया का इस्तेमाल होता है। मीडिया ने ऐसी व्यवस्थाएं पैदा कर दी हैं जिसमे हर देश किसी से सूचनाएं ले रहा है और किसी को सूचनाएं दे रहा है। पूरी दुनिया के शेयर बाजारों का हाल टीवी चैनलों और इंटरनेट पर मौजूद है। सूचनाओं का प्रवाह इतना तेत है कि अमरीकन शेयर मार्केट की आंख फडक़ती है तो मुंबई के शेयर दलालों के दिल पर असर होने में पांच सेकण्ड से ज्याद वक्त नहीं लगता। बाजार में कोई नई चीज आए या विज्ञान की दुनिया में कोई तहलका मचे-सारी दुनिया को खबर एक साथ ही होती है। खबरे मानों हवाओं में उड़कर आ जाती है और ये सच ही तो है, खबरे दरअसल हवाओं में उड़कर ही तो आती है। उपग्रहों का इस्तेमाल करके आई इस मीडिया क्रांति के बाद अलग-अलग देशों और संस्कृतियों के लोग दूसरे देशों और संस्कृतियेां के लोगों के साथ किसी भी रूप में खुद को जोड़ सकने में सक्षम हैं। ये सक्षमता मीडिया का असर है।

पढऩे लिखने या सीखने के लिए भी अब हमेशा स्कूल कालेज या किसी इंस्टीट्यूट में ही जाना जरूरी नहीं रह गया है। कई ऐसे संस्थान है जिन्होंने इंटरनेट पर ही अपने स्कूल खोज लिए है। आप इंटरनेट पर उनकी साइट पर जाकर किसी भी चीज को सीखने के दांव पेंच हासिल कर सकते हैं। ऐसी संस्थाएं आपको कई तरह की सेवाएं घर बैठे उपलब्ध करा रही हैं और उससे भी जी न भरे तो देश भर में इन्होंने अपने केन्द्र भी खोल रखे हैं जहां जाकर इंटरनेट शिक्षा की न समझ में आने वाली बारीकियां भी आप समझ सकते हैं। हालत यहां तक है कि अब तो डॉक्टर भी दूर बैठे-बैठे ही मरीज का हाल सुनकर और समझकर उसका इलाज करने लगे हैं। इस तरह का इलाज खांसी, बुखार का हो तो डॉक्टर साहब फोन पर उपलब्ध हैं और मामला किसी जटिल ऑपरेशन का है तो वीडियों क्रांफेसिंग के जरिए न्यूयार्क में बैठा विशेषज्ञ डॉक्टर मुंबई के ब्रीच कै्रंडी अस्पताल में आपरेशन कर रहे डॉक्टरों को मशवरा दे सकता है। मुश्किल चीजे अब आसान हो गई है और आसान चीजें अब और भी ज्यादा आसान हो गई हैं। बात सिर्फ बड़ी बड़ी चीजों तक ही नहीं है, एम्बुलेंस को बुलाना हो या किसी रेस्टारेंट से खाना मंगाना हो, सिर्फ एक टेलीफोन करने की जरूरत है, चीज तुरंत हाजिर हो जाएगी। मुंबई शहर में लोग खाने-पीने की चीजो से लेकर फर्नीचर, कंप्यूटर, रेल के टिकट और कपड़े तक फोन करके घर मंगवा डालते हैं। थैला लेकर खरीदारी करने तक की जरूरत नहीं रही है। ये सब कुछ मीडिया में आई तरक्की के कारण ही संभव हुआ है।

आप किसी भी आम घर में चले जाए वहां टेलीफोन, टीवी, केवल कनेक्‍शन, कंप्यूटर और इंटरनेट आपको जरूर मिल जाएगा। इन चीजों को भारतीय समाज अब उसी तरह की बुनियादी जरूरते मान रहा है जैसे घर में समय दिखाने के लिए घड़ी का होना या फिर और आसानी से समझे तो यूं कहे जैसे कि लेटने के लिए बिस्तर का होना या खाने के लिए बर्तनों का होना। मनोरंजन और सूचना के इन माध्यमों पर आज हर घर में सब्जी तरकारी के मासिक खर्च से भी ज्यादा खर्चा किया जाता है। मीडिया और संचार उद्योग इन्ही कारणों से आज भारतीय अर्थव्यवस्था में सबसे तेजी से उभरता उद्योग बन गया है।

संचार की इस क्रांति के कारण तकनीकी औद्योगिकता बढ़ी है और भारत जैसे देश भी अब ये महसूस करने लगे हैं कि संचार क्रांति में एक भरा-पूरा उद्योग भी फुला हुआ है। नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्यर, ऑप्टो इलेक्ट्रानिक्स, सॉफ्टवेयर, मोबाइल तकनीक और मीडिया कार्यक्रमों का प्रोडक्ïशन अपने आप में किसी भरे पूरे उद्योग से कम नहीं रह गया है। ये हजारों करोड़ रुपयों का उद्योग है और लाखों करोड़ों लोगो की रोजी रोटी है।

कहा जाता है कि हर अच्छी चीज में भी कहीं न कहीं कोई कमी भी रह ही जाती है। मीडिया इसका अपवाद नहीं है। तमाम तरह की सुविधाएं दे पाने में आज मीडिया इसलिए सक्षम है क्योंकि इसके विस्तार की गति बहुत तेज है। चीजे रातों रात बदल रही हैं, बढ़ रही है और इसी कारण पूरी व्यवस्था में कई जगह भ्रम और अनिश्चितता की स्थिति भी बन गई है। ये कुछ-कुछ बेहद तेज रफ्तार से चल रही उस कार की स्थिति के समान स्थिति है जिसमें कार के ड्राइवर को उसी रफ्तार पर तालियां तो खूब मिल रही है पर उस ड्राइवर के लिए कार की रफ्तार और संतुलन दोनों को एक साथ संभाल पाना बेहद मुश्किल होता जा रहा है।

दिक्कते विकास की इस अप्रत्याशित तेज दर के कारण ही पैदा हुई हैं। कुछ साल पहले तक गिने-चुने चंद टीवी चैनल हुआ करते थे। पर आज जब लोग मीडिया क्रांति के प्रोडक्ट्स का घरेलू प्रोडक्ट्स की तरह इस्तेमाल करने लगे है तो खेल और खेल के नियम दोनों ही बदल गए हैं। ऐसे मे ये निर्धारित कर पाना कठिन हो गया है कि इस उद्योग में कौन क्या भूमिका निभाएगा। संचार कंपनियां अब इंटरनेट में कूदने को तैयार है, ऐसे में आवश्यभावी है कि इंटरनेट सेवाएं देने वाली कंपनियां भी अब टीवी चैनलों की दुनिया में आएंगी। स्पष्टï है कि मीडिया की क्रांति ने मीडिया के व्यवसाय को भी जन्म दिया है और हर व्यवसाय की तरह इस व्यवसाय को भी बाजार के नियमों से ही चलाया जाना है, यही वो बिंदु है जहां आकर थोड़ी समझदारी बरते जाने की जरूरत है। मीडिया एक ऐसा व्यवसायिक माध्यम है जो आम लोगों की मनोरंजन, शैक्षिक और तमाम और सोचों को सीधा प्रभावित करता है। लोग सूचना और संचार के इन माध्यमों पर निर्भर होकर अपनी रोजाना की जिंदगी चला रहे है और इसीलिए ये व्यवसाय, व्यवसाय होकर भी इतना अलग तो है ही कि नागरिकों और उपभोक्ताओं के अधिकारों का ख्याल रखा जाए। मीडिया एक माध्यम है पर ये माध्यम आम लोगों का माध्यम है और इसलिए आम लोगों को सही संतुलित और सटीक सूचनाएं पाने का पूरा अधिकार है। सरकार की ये जिम्मेदारी बनती है कि वो मीडिया की इस क्रांति को कुछ इस तरह से व्यवस्थित करे कि सही सूचनाओं और सूचना पाने के जनता के अधिकार के बीच एक सुंदर संतुलन बना रहे। सरकार को शायद उस तरह के इंस्ट्रक्टर की भूमिका निभानी होगी जो किसी जिम में कसरत कर रहे व्यक्ति को सही दिशा निर्देश देकर हष्ट-पुष्ट स्वरूप पाने में मदद करता है। भारत के मीडिया जगत को भी अपने सुंदर, सजग और संतुलित स्वरूप को पाने के लिए ऐसे ही सहयोग की दरकार रहेगी।

मैं टीवी न्यूज का महत्व समझना चाहता हूं
किसी भी लोकतांत्रिक समाज में न्यूज और डॉक्यूमेंट्री हमेशा से ही एक प्रहरी की भूमिका निभाते आए हैं। चाहे राजनेताओं और अफसरों पर नजर रखनी हो या किसी गैरकानूनी काम का भंडाफोड़ करना हो, न्यूज और डॉक्यूमेंट्रीज के लोग हर जगह मौजूद मिलेंगे। आम लोग ये तमाम बातें जानना चाहते है और न्यूज और डॉक्यूमेंट्रीज के लोग आम लोगों तक ये बाते पहुंचा देते हैं। आम लोग सुनने या पढऩे के बजाए देखकर चीजों को ज्यादा आसानी से समझ पाते हैं और चीजों को दिखा पाने की तकनीकी सक्षमता सिर्फ टेलीविजन के पास है। टेलीविजन अपनी इसी खूबी के कारण खबरों और सूचनाओं के लिए सबसे लोकप्रिय माध्यम है।

अगर पिछले कुछ सालों पर नजर डाली जाए तो हम देखेंगे कि दुनिया की हर बड़ी घटना के घटते समय टीवी न्यूज के कैमरे वहां हमेशा मौजूद रहे हैं। कारगिल का युद्ध हो या संसद पर हमला, गुजरात में दंगे भडक़ रहे हो या गयारह सितंबर को अमरीकी टावर ढह रहे हो, पूर्वी अमेरिका पर आतंकवादी हमला हो या ताजातरीन ईराक युद्ध-टीवी न्यूज ने हमे न सिर्फ सब कुछ सिखाया है बल्कि हमे कहीं अंदर तक प्रभावित भी किया है। दूर बैठकर भी हम गुस्से या आसुंओं में अपनी संवेदनाओं को अभिव्यक्त कर सके हैं और ये टीवी न्यूज की बदौलत ही हुआ है। टीवी न्यूज ने हर युद्ध, हर हादसे और हर गड़बड़ी को इस अंदाज में दिखाया है कि सच्चाईयों को छुपा पाना मुमकिन नहीं रहा, ऐसा इसलिए क्योंकि हर घटना के घटते समय टीवी सेटों के सामने बैठे करोड़ों लोग उस घटना के मूकदर्शक बन चुके होते है। लोगों की ताकत को अपनी ताकत बना लेना टीवी न्यूज की बड़ी खासियतों में से एक है।

लोगों की इसी ताकत को पहचान कर इस संभव देने के लिए भारतीय संविधान ने लोगों को अभिव्यक्त का मौलिक अधिकार दिया है पर इसके बावजूद भी समय-समय पर अभिव्यक्ति की इस स्वतंत्रता को छीनने के असफल प्रयास होते रहे हैं। आज भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो खबरों और सूचनाओं के असर को कम करने के लिए टीवी-रेडियों के बाद अब इंटरनेट को सेसंर करने की वकालत करते हैं।

वैसे तो मीडिया की हर चीज पर सवाल जवाब होते रहे है पर टीवी न्यूज की मजबूरियों और बंधनों पर तो लगभग हर घर में वाद-विवाद होता है। ये वाद-विवाद टीवी न्यूज की तंत्र प्रणाली को समझे बिना ही होता है और कई बार बेइरादा और बेवजह भ्रम का कारण बन जाता है।

चलिए, इस पूरी स्थिति को थोड़ा आसानी से समझते हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि हर टीवी न्यूज चैनल आज एक ऐसी दौड़ में शामिल है जिसमें वो सबसे ज्यादा लोकप्रियता हासिल कर नंबर वन बनना चाहता है। नंबर वन की इस दौड़ को जीतने के लिए ये जरूरी है कि आप वही दिखाएं जो लोग देखना चाहते हैं, इस वजह से कई बार आप न्यूज चैनल पर उस तरह की खबरें ज्यादा देखेंगे जो आपे ध्यान को टीवी पर खींच सके। दूसरी तरफ दूरगामी नतीजों वाली कई खबरें कई बार उपेक्षित भी हो जाती है। इसी तरह से एक कारण और भी है जो खबरों के इस सिलसिले को प्रभावित करता है। खबर अगर रूखी है और इतनी जटिल है कि आम दर्शक उसे न समझ पाए तो उसके बजाय टीवी न्यूज चैनल उस खबर को दिखाना ज्यादा पसंद करेगा जिसमे दिखाने के लिए तस्वीरें हो और जो ज्यादा आसानी से लोगों को बताई जा सके।

इसका सीधा सा उदाहरण ये है कि एक ही शहर में एक तरफ ब्यूटी कांटेस्ट या फैशन शो हो और दूसरी तरफ शहर में बुद्धिजीवियों या आर्थिक विशेषज्ञों की कोई मीटिंग या कांफ्रेस हो रही हो तो इस बात की पूरी संभावना है कि आप टीवी न्यूज में ब्यूटी कांटेस्ट और फैशन शो को बार-बार देखे और कांफ्रेस को भूले-भटके एक बार (या एक बार भी नहीं) टीवी चैनलों को चलाने वालों के पास हर सप्ताह एक ऐसी रेटिंग लिस्ट आती है जो ये बताती है कि कौन सा चैनल और कौन सा कार्यक्रम कितना देखा जा रहा है। ये रेटिंग प्राप्त करने के लिए कई संस्थाएं हैं जो एक खास तरह का मीटर कुछ चुने हुए शहरों के हजारों घरों में लगाती है जो ये बताता है कि कितने घरों में क्या देखा जा रहा है। लोकप्रियता के इन्ही आंकड़ों के आधार पर चैनल को चलाने वाले विज्ञापन आते है और किसी न्यूज डायरेक्टर (न्यूज चैनल का संपादकीय प्रमुख) के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि वो अपने चैनल की लोकप्रियता दूसरों चैनलों की लोकप्रियता से ज्यादा बनाए रखे। अब शायद आपके लिए ये समझना आसान होगा कि ऐसी खबरे और ऐसे कार्यक्रम ज्यादा क्यों दिखए जाएंगे जो लोकप्रियता नापने वाले बड़े शहरों के दर्शकों को ला सके। लोकप्रिय होना किसी चैनल की सबसे बड़ी जरूरत और मजबूरी दोनों है।

न्यूज बुलेटिंस में डेढ़ दो मिनट की समयावधि को जो अलग-अलग खबरें आप देखते हैं उन्हे न्यूज की दुनिया में ‘न्यूज स्टोरी’ (या सिर्फ स्टोरी भी) कहां जाता है। चूंकि आज दर्शकों की रुचि को ध्यान में रखकर न्यूज चैनलों का चलाया जाता है तो हर न्यूज स्टोरी आम दर्शक के लिए कुछ न कुछ लेकर आती है, या कम से कम ऐसा प्रयास तो जरूर करती है। टीवी न्यूज में शब्द, ध्वनि और दृश्यों को आप एक साथ देखते हैं पर इसमें शब्द उतने माएने नहीं रखते है। ये माध्यम देखने का माध्यम है । (अग्रेंजी में वनिुअल मीडियम) और देखने के लएि दृश्य का होना सबसे बड़ी जरूरत है। अगर अमेरिका के वर्ल्‍ड ट्रेड सेटंर को आप टी वी पर लाइव ढहता हुआ देख रहें हैं तो उसका ढहना और ढहते वक्त आ रहीं आवाजे आपको सब कुछ समझाने के लिए काफी हैं, उस वक्त इन शब्दों की जरूरत नही रहती कि वर्ल्‍ड ट्रेड सेटंर की इतनी मंजिले ढह रहीं हैं (हॉं अगर यह खबर अखबार में होती तो यही शब्द महत्वपूर्ण हो जाते) टीवी न्यूज की दृश्यता इस माध्यम का सबसे बड़ा हथियार है और इसी कारण टीवी की खबरे लोगों के दिमाग में अंदर तक पैर जमा लेती हैं ।

खबरों का असर
ऐसा अक्सर होता है जब सरकारें या प्रभावशाली लोग टीवी न्यूज को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिशें करते हैं और न्यूज चैनल को अपनी मनमर्जी मुताबिक ढालने के लिए वो जो कुछ संभव हो वो कर डालते हैं। ऐसी कोशिशे कितनी सफल होती हैं, इस बात में जाए बिना भी इस आधार पर हम टीवी न्यूज की ताकत और असर का अदांजा तो लगा ही सकते हैं।

आपने कई बार देखा होगा कि जब भी कोई तानाशाह अपने देश के लोगों पर बेधडक़ कब्जा बनाए रखना चाहता है तो वो सबसे पहले न्यूज मीडिया को ही अपना निशाना बनाता है। बेखौफ तानाशाह अक्सर अपने देश के लोगों के सूचना पाने के अधिकार को कुचलकर न्यूज पर सेसंर लगा देते हैं और इसके पीछे उनका घिसा पिटा तर्क यही होता है कि देश की संस्कृति और व्यवस्था को बचाने के लिए इस तरह का नियंत्रण अनिवार्य है। ये अलग बात है कि इस तरह की सेसंरशिप का अंतिम नतीजा यही होता है कि एक ऐसी शासन व्यवस्था हो जिसमे कब कहां क्या हो रहा है, इसकी सूचना सत्ताधीशो की मर्जी से दी जाए। सेसंरशिप तानाशाही का ही एक हथियार है।

ये मामला सिर्फ तानाशाहों तक ही सीमित नही है। कई ऐसे लोकतांत्रिक देश भी हैं जो अपने यहॉं न्यूज और इंटरनेट को सेसंर करने का कारण ये बताते हैं कि वे अश्लील प्रसारणों को रोककर अपने देश की सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित करना चाहते हैं । अगर आप इन देशों द्वारा सेसंर की गई चीजों की सूची मॉंगे तो उनमें आपको कई न्यूज वेबसाइट्स के अलावा अन्य तरह की उपयोगी, ज्ञानवर्धक और नैतिक वेबसाइट्स के नाम भी मिलेंगे। इस तरह की वेबसाइट्स को सेंसर करने के क्या कारण हो सकते हैं – ये आप आसनी से समझ सकते हैं।

हालांकि भारत में अभिव्यक्ति का अधिकार संविधान द्वारा किया गया मौलिक अधिकार है पर हमारे यहां भी कई बार सेसंरशिप लागू करने की कोशिशें की जाती रही हैं। ये हमारे देश के संवैधानिक ढांचे की खूबी है कि इस तरह की कोशिशें कभी कामयाब नहीं हो सकी (आपात काल के चंद महीनों को छोडक़र) खुली अर्थव्यवस्था के इस दौर में भारतीय मीडिया भी अपनी क्रांति को एक स्थिर क्रांति में तब्दील करने में जुटा हुआ है।

ये सब कुछ पढऩे के बाद आपके लिए इतना समझपाना बहुत मुश्किल नहीं होगा कि कुछ कमियों के बावजूद टीवी न्यूज और डॉक्युमेंट्रीज उस भूमिका में तो है ही जब वे समाज पर गहरा असर डाल सकती हैं। आज हालत ये है कि देश, दुनिया और लोगों के साथ-साथ हर तरह की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक जानकारी भी हम तक सिर्फ टेलिविजन ही लेकर आता है। ऐसे में टेलीविजन आज शक्ति का प्रतीक बन गया है और टेलीविजन में काम करने वाले वो लोग, जो न्यूज और डॉक्युमेंट्रीज बनाते है, इस देश के सबसे शक्तिशाली असरदायी लोगों के साथ नजर आते हैं।

विवादास्पद मुद्दों से कैसे निपटे!
न्यूज की ताकत और असर को असर को अब तक आप समझ चुके होंगे। चालिए अब जरा ये समझने की कोशिश करते हैं कि इस ताकत और असर के साइडइफेक्ट्स क्या हो सकते हैं!

मैं आपका अपनी जिंदगी की एक बात बताता हूं। ये बात आज हम सबको पता है कि अगर किसी टीवी पत्रकार को अपनी नौकरी बचाए रखनी है तो उसे अपने ऊपर कभी भी पक्षपाती होने का आरोप नहीं लगने देना चाहिए। न्यूज बनाते वक्त इस बात की कोई जरूरत नहीं है कि अपने निजी विचार उसमें घुसेडें जाएं। जितनी आसानी से ये बात आज मैं आपसे कह रहा हूं, उतनी आसानी से यही बात उस वक्त् मैं नहीं कह पाता था जब मैने पत्रकारिता में अपना करियर शुरू किया था। न्यूज की ताकत और असर ने मेरे अंदर भी एक अतिरिक्त जोश भर रखा था। मुझे याद है कि शुरूआती दिनों मे जब भी किसी गलत या गैरकानूनी घटना को मैं रिपोर्ट करता था तो उस घटना से इतना जुड़ जाता था कि गलत चीजों पर बेहद गुस्सा आता था। ये सब होता देखकर मैं बेहद परेशान भी हो जाया करता था। न्यूजरूम से थोड़ी सी फुर्सत मिलते ही मैं बिल्कुल सामाजिक कार्यकर्ता की भाषा बोलने लगता था- ”यार, ये सब नहीं होना चाहिए…”, हम लोग कुछ क्यों नहीं करते.. ”, ”इन गलत चीजों को रोकने का हमारा भी कुछ फर्ज बनता है”, बगैरह-बगैरह।

अच्छी बात ये हुई कि जल्दी ही थोड़ी समझदारी आ गई। मेरे एक सीनियर सहयोगी पत्रकार ने मेरे जोश और मेरे हालात को देखकर ये समझ लिया था (जो मैं तब नहीं समझा था) कि अगर मेरा रवैया ऐसा ही रहा तो मैं अपने आप को निष्पक्ष रखकर रिर्पोटिंग नहीं कर पाऊंगा। एक दिन बड़े प्यार से उन्होंने मुझे बुलाया और ऐसी बातें समझाई जो आत तक मेरे काम आ रही हैं।

उनका कहना ये था कि- ”तुम सिर्फ अपना काम करो और दूसरों को क्या करना चाहिए ये चिंता छोड़ दो। तुम्हारा काम बस इतना है कि जो मुद्दा हो उसके सारे पक्षों को समझकर पूरी बात साफ-साफ लोगों के सामने रख दो अगर उस मुद्दे में तुम खुद जाती तौर पर घुसने लगोगे तो उस मुद्दे को ईमानदारी से पेश नहीं कर पाओगे। तुम मुद्दो को उठाओ और मुद्दों को हल करने की जिम्मेदारी राजनेताओं, धार्मिक गुरुओं, सरकारी अफसरों या बाकी लोगों पर छोड़ दो क्योंकि ये करना उनकी जिम्मेदारियों में आता है।”

तो ये बात में उस दिन से समझ गया कि पत्रकारिता के लिए दिमाग के साथ-साथ दिल पर नियंत्रण रखना बेहद जरूरी है।

कुछ और बातें भी हैं, जैसे कि एक पत्रकार के लिए ये बड़ा जरूरी है कि वो जिस मुद्दे को भी रिपोर्ट करें, उस मुद्दे से जुड़े सभी पक्षों को साथ लेकर रिपोर्ट करें। इसका मतलब ये है कि आप अपनी न्यूज स्टोरी में सभी पक्षों को अपनी बात रखने का मौका दे। ऐसा करना एक तो ईमानदारी की जरूरत है, दूसरे ऐसा करने से आपकी न्यूज स्टोरी भी कहीं ज्यादा दिलचस्प और विवादास्पद बन जाती है। हां, आप अपनी पसंद और नापसंद को कृपया इस न्यूज स्टोरी में शामिल न करें। अगर आप पहले से तय नजरिए से एक न्यूज बनाना शुरू करेंगे तो आप सब कुछ उसी नजरिए से देखेंगे, उसमें ईमानदारी नहीं रहेगी। हां, अगर खुली सोच के साथ उसी न्यूज स्टोरी पर काम शुरू करेंगे तो हो सकता है कि आप उसी मुद्दे के अंदर कुछ और नई बातें ढूंढ लें। ये बाते शुरूआती दिनों के जोश के कारण लोग अक्सर उपेक्षित कर देते हैं पर यही बाते उस व्यक्ति की पत्रकारिता सोच की बुनियाद तय कर देती हैं। मै फिर अपने निजी अनुभवों के आधार पर आपको ये बताना चाहता हूं कि संतुलित खयालात और अपनी भूमिका से जुड़ी बातों को जब मैने नए ढंग से समझा था तो शुरूआती जोशीली पत्रकारिता पर मेरे विचार एकदम बदल गए थे। पत्रकारिता के सच समझ लेने के बाद ही आप तमाम और सच सामने लाने की लड़ाई लड़ सकते हैं।

एक टेलीविजन पत्रकार के रूप में आप जब अपनी न्यूज स्टोरी को अपने सीनियर को समझाएं तो एक तो उसे ये बताएं कि ये स्टोरी है क्या और दूसरे इस बात को खास जोर देकर सामने रखे कि आपने किस एंगल से स्टोरी की है और उसमें क्या बात निकलकर सामने आती है। ये बात भी खास कर सामने रखें कि आपने अपनी स्टोरी के सभी पक्षों से या तो बात की है या बात करने की कोशिश की है (वो सफल हुई हो या असफल) ये बातें आप अपनी स्टोरी में भी शामिल रखें, इससे न सिर्फ आपकी प्रोफेशनल ईमानदारी सामने आएगी बल्कि आप किसी कानूनी पचडें में फंसने से भी बचे रहेंगे।

न्यूज बनाना एक टीमवर्क है
दुनिया के तमाम और क्रिएटिव कामों की तरह न्यूज बनाना भी एक टीमवर्क है। दूर से देखने पर ये लग सकता है कि ये अकेले व्यक्ति का काम भी हो सकता है पर जमींनी सच्चाई यही है कि ये अकेले व्यक्ति को काम न तो है और न हो सकता है। न्यूज बनाने से लेकर न्यूज पेश करने तक के चक्र में तमाम तीलिया हैं और हर तीली की अपनी खास अहमियत है। कोई ये चाह तो सकता है कि वो अकेले ही सबकुछ कर ले पर वो इस चक्र के दूसरे लोगों की जरूरत चाहकर भी खत्म नहीं कर सकता है।

अब ये बात पढ़कर आप लोग एक नए सवाल से दो-चार हो रहे होंगे। जब हर व्यक्ति बराबर की अहमियत रखता है तो क्या न्यूज चैनल में सब लोग एक ही स्तर पर काम करते हैं? या तमाम और जगहों की तरह न्यूज चैनल में भी जूनियर्स और सीनियर्स का स्थिति क्रम होता है (अंग्रेजी में हाइऑर्की) इस सवाल का जवाब किसी एक हां या एक ना में देना जरा मुश्किल है, दरअसल बातें दोनों ही हैं। आइए समझते हैं-

ये बात बिलकुल ठीक है कि एक न्यूज बुलेटिन या न्यूज कार्यक्रम को पेश करने की प्रक्रिया में तमाम लोग अपने-अपने हिस्से का काम करते हैं और हर व्यक्ति का अपना महत्व होता है। किसी एक का महत्व किसी दूसरे के महत्व से कम या ज्यादा नहीं होता। इस नजरिए से देखें तो किसी न्यूज चैनल में सब लोग एक ही स्तर पर कहे जाएंगे। अब जरा दूसरे नजरिए से देखते हैं- भले ही किसी न्यूज बुलेटिन या न्यूज कार्यक्रम को बनाने की प्रक्रिया में काम सारे लोग कर रहे हो और अपने-अपने महत्व को बरकरार रखते हुए काम कर रहें हो पर ये काम करने की प्रक्रिया कुछ लोगों के दिशा निर्देशों पर ही बनती है और समय-समय पर बदलती भी है। इस प्रक्रिया के अंदर पेश आने वाले नीतिगत फैसलों के वक्त हमे नजर आता है कि फैसले लेने के लिए एक व्यवस्था बनी हुई है, इस स्तर पर आप इसे जूनियर सीनियर व्यवस्था या अंग्रेजी में हाईआर्की कह सकते हैं। कहने का अर्थ ये निकला कि काम करने के स्तर पर सब बराबर है और जूनियर सीनियर व्यवस्था नहीं है लेकिन जब फैसलो की घड़ी आती है, तो जूनियर सीनियर व्यवस्था न्यूज चैनलों में भी है। न्यूज हेड इस पूरी व्यवस्था का कप्तान होता है न्यूज प्रसारण की पूरी जिम्मेदारी उसी के सर होती है।

ये जिम्मेदारी कौन कितनी कुशलता से निभाता है, इसी आधार पर ये तय होता है कि कौन किस श्रेणी का टीवी पत्रकार न्यूज चैनल का काम इतने दबाव का काम है कि ठीक वक्त पर काम होना और योजना के मुताबिक ही काम होना अनिवार्य है। प्रक्रिया में गड़बड़ी होने के लिए आपके पास कोई बहाना नहीं होना चाहिए, सीधा नियम ये है कि जो होता है वो होना है। ऐसे में सिर्फ न्यूज की समझ रखना ही टीवी पत्रकार नहीं बना देता, बल्कि ये भी उतना ही जरूरी है कि आप सटीक और सही काम भी इतनी तेजी से कर सके जितनी तेजी आपने सामान्य अवस्था में कभी सोची भी नहीं होती है। टेलीविजन एक दृश्य माध्यम है और रफ्तार और चुस्ती ही आपकी सफलता का ग्रेड तय करती है।… ये बात आप महसूस तभी कर पाएंगे जब टेलीविजन का तमाम काम आप अपने हाथों से खुद करेंगे।

साभार : आलोक वर्मा की प्रकाशनाधीन पुस्तक “टेलीविजन पत्रकार कैसे बने!”


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फ़िल्मी पोस्टर / राजा बुंदेला

 वक्त बड़ा बेरहम होता है। कभी किसी को नहीं बख्शता यह नामुराद! जिस साम्राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता था, इसने उसे भी डुबो दिया।  इस दौर में टॉ...