बुधवार, 29 जून 2022

बेचा है ईमान धरम तब, घर में शानो शौकत आई है।

 गाँव बेचकर शहर खरीदा, कीमत बड़ी चुकाई है।  

जीवन के उल्लास बेच के, खरीदी हमने तन्हाई है।


बेचा है ईमान धरम तब, घर में शानो शौकत आई है।




संतोष बेच तृष्णा खरीदी, देखो कितनी मंहगाई है।।



बीघा बेच स्कवायर फीट, खरीदा ये कैसी सौदाई है।  

संयुक्त परिवार के वट वृक्ष से, टूटी ये पीढ़ी मुरझाई है।।  

रिश्तों में है भरी चालाकी, हर बात में दिखती चतुराई है।  

कहीं गुम हो गई मिठास, जीवन से हर जगह कड़वाहट भर आई है।।    


रस्सी की बुनी खाट बेच दी, मैट्रेस ने वहां जगह बनाई है। 

अचार, मुरब्बे को धकेल कर, शो केस में सजी दवाई है।।  

माटी की सोंधी महक बेच के, रुम स्प्रे की खुशबू पाई है।  

मिट्टी का चुल्हा बेच दिया, आज गैस पे बेस्वाद सी खीर बनाई  है।।  


पांच पैसे का लेमनचूस बेचा, तब कैडबरी हमने पाई है।  

बेच दिया भोलापन अपना, फिर मक्कारी पाई है।। 

सैलून में अब बाल कट रहे, कहाँ घूमता घर- घर नाई है।

कहाँ दोपहर में अम्मा के संग, गप्प मारने कोई आती चाची ताई है।।  


मलाई बरफ के गोले बिक गये, तब कोक की बोतल आई है।  

मिट्टी के कितने घड़े बिक गये, तब फ्रीज़ में ठंढक आई है ।। 

खपरैल बेच फॉल्स सीलिंग खरीदा, जहां हमने अपनी नींद  उड़ाई है। 

बरकत के कई दीये बुझा कर, रौशनी बल्बों में आई है।।


गोबर से लिपे फर्श बेच दिये, तब टाईल्स में चमक आई है।

देहरी से गौ माता बेची, फिर संग लेटे कुत्ते ने पूँछ हिलाई है ।। 

बेच दिये संस्कार सभी, और खरीदी हमने बेहयाई  है। 

ब्लड प्रेशर, शुगर ने तो अब, हर घर में ली अंगड़ाई है।।  


दादी नानी की कहानियां हुईं झूठी, वेब सीरीज ने जगह बनाई है। 

बहुत तनाव है जीवन में, ये कह के मम्मी ने दो पैग लगाई है।।

खोखले हुए हैं रिश्ते सारे, नहीं बची उनमें कोई सच्चाई है।।

चमक रहे हैं बदन सभी के, दिल पे जमी गहरी काई है।  

गाँव बेच कर शहर खरीदा, कीमत बड़ी चुकाई  है।।  

जीवन के उल्लास बेच के, खरीदी हमने तन्हाई है।। 

🙏🙏

भारत की जल संस्कृति -( 21) / डॉ. मोहन चंद तिवारी

 

“बृहत्संहिता में शिलाभेदन के रासायनिक फार्मूले”


लेखक:-डॉ. मोहन चंद तिवारी


हम जब प्राचीन काल की गुफाओं अजन्ता, ऐलोरा,मंदिरों,कुओं और विशाल जलाशयों आदि को देखते हैं तो आश्चर्य होता है कि आखिर कैसे इन विशाल गुफाओं की भूमिगत विशाल शिलाओं को खंड-खंड करके इतनी सुंदरता के साथ इनका निर्माण किया गया होगा? केवल छैनीं, कुदाल और हथौड़ों के उपकरणों से तो इनका निर्माण सम्भव नहीं लगता है. इसी सन्दर्भ में जब अपने प्राचीन ग्रन्थों में विवेचित भारत की रासायनिक विधियों का अन्वेषण करते हैं तो वराहमिहिर की बृहत्संहिता उनमें से रासायनिक शिलाविज्ञान का मुख्य ग्रन्थ सिद्ध होता है.


बृहत्संहिता में जल वैज्ञानिक आचार्य वराहमिहिर द्वारा अनेक ऐसे उपाय और विधियां बताई गई हैं,जिनसे जलाशय या कूप उत्खनन के समय में हो रही कठिनाइयों और कठोर तथा न टूटने वाले विशाल चट्टानों को पर्यावरण सम्मत रासायनिक तरीकों से बहुत आसानी से तोड़ा या फोड़ा जा सकता है. इस सम्बंध में वराहमिहिर ने भूमिगत कठोर शिलाओं और चट्टानों को तोड़ने और फोड़ने के अनेक रासायनिक फार्मूले बताए हैं,जो प्राचीन काल के कुओं और जलाशयों के उत्खनन में बहुत उपयोगी रहे थे. वराहमिहिर द्वारा बताए गए ये रासायनिक नुस्खे या फार्मूले इस प्रकार हैं-

1. कूप आदि खोदने के समय यदि कोई पत्थर की चट्टान निकले और वह फूटे नहीं तो उस पर ढाक और तेंदु की लकड़ी जलाकर उसे लाल करके ऊपर चूने की कली मिला पानी छिड़कने से वह चट्टान टूट जाती है –


“भेदं यदा नैति शिला तदानीं

पलाशकाष्ठैः सह तिन्दुकानाम्.

प्रज्वालयित्वाअनलं अग्निवर्णा

सुधाम्बुसिक्ता प्रविदारं एति..”

        -बृहत्संहिता,54.112


2. मरुवा पेड़ की भस्म मिलाकर पानी उबालकर उसमें शरका खार मिला कर फिर अग्नि से तपाई शिला के ऊपर वह पानी सात बार छिड़कने से वह चट्टान टूट जाती है-


“तोयं श्रृतं मोक्षकभस्मना

वा यत्सप्तकृत्वःपरिषेचनं तत्.

कार्य शरक्षारयुतं शिलायाः

प्रस्फोटनं वह्निवितापितायाः..”

            -बृहत्संहिता,54.113


3. छाछ,कांजी,सुरा (मद्य) और कुलथी, इन सबों को मिलाकर एक बर्तन में सात रात तक रख देना चाहिए. उसके बाद में अग्नि से तपाई हुईं शिला पर उस मिश्रण को बार-बार छिड़कने से शिला टूट जाती है-


“तक्रकाञ्जिकसुराः सकुलत्था

योजितानि बदराणि च तस्मिन्.

सप्तरात्रं उषितान्यभितप्तां

दारयन्ति हि शिलां परिषेकैः..”

           -बृहत्संहिता,54.114


4. नींबू का पत्ता,छाल, तलसरा,अपामार्ग, तिन्दुक की लकड़ी,गुडुची आदि इन तमाम वस्तुओं को गोमूत्र में रखकर क्षार बनावें तत्पश्चात् कुएं के नीचे आने वाली भूमिगत शिला को सुलगा कर लाल कर दें,एवं उस क्षार का छींटा छह बार मारें, तो वज्र जैसी कठोर शिला भी टूट जाती है-


“नैम्बं पत्रं त्वक्च नालं तिलानां

सापामार्गं तिन्दुकं स्याद् गुडूची.

गोमूत्रेण स्तनावितः क्षार एषां

षट्कृत्वोऽतस्तापितो भिद्यतेऽश्मा॥”

         -बृहत्संहिता,54.115


इस सम्बंध में बताना चाहुंगा कि आधुनिक काल में भूमिगत उत्खनन के लिए बारूदी सुरंगों या डायनामाइट का जो प्रयोग किया जाता है,वह तरीका न केवल पर्यावरण विज्ञान के विरुद्ध है बल्कि ऐसा करने से भूमिगत जल नाड़ियों का प्राकृतिक जलविज्ञान भी छिन्न भिन्न हो जाता है और भूमिगत ‘एक्वीफर्स’ यानी चट्टानों के जलसरोवरों में प्राकृतिक जल रिसाव की प्रक्रिया हमेशा के लिए अवरुद्ध हो जाती है.


आधुनिक जेसीबी मशीनों द्वारा तोड़े गए असगोली पहाड़ की ग्राउंड रिपोर्ट

पहाड़ की चट्टानों को प्राचीन रासायनिक तकनीकों से तोड़े जाने के सन्दर्भ में जब हम वर्त्तमान काल में चट्टानों को तोड़ने की तकनीकों की तुलना प्राचीन काल की बृहत्संहिता में प्रतिपादित शिलाभेदन की रासायनिक विधियों से करते हैं, तो भूविज्ञान और जलविज्ञान से सम्बद्ध वर्त्तमानकालीन अनेक प्रकार की पर्यावरण सम्बन्धी विकृतियां भी सामने आने लगती हैं,जिनके कारण आज खासकर उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में भूमिगत जल के नष्ट होने की गतिविधियां बढ़ी हैं.

इस सन्दर्भ में बताना चाहूंगा कि नौला फाउंडेशन’ के द्वारा उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र के परंपरागत जलस्रोतों- नौलौं, धारों को संरक्षित,संवर्धित करने के अभियान के तहत 11-12 अगस्त, 2019 को द्वाराहाट स्थित असगोली क्षेत्र में एक द्विदिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया था.पिछले साल आयोजित इसी जलवैज्ञानिक कार्यशाला के दौरान मेरे द्वारा किए गए चट्टानों के सर्वेक्षण और निरीक्षण से यह बात सामने आई कि असगोली क्षेत्र किसी समय अपने प्राकृतिक जलस्रोतों की दृष्टि से काफी सम्पन्न और जलबहुल जलागम क्षेत्र रहा था.


किंतु जब से यहां सड़कों के चौड़ीकरण के दौरान सड़क निर्माता ठेकेदारों द्वारा जेसीबी मशीनों द्वारा बेरहमी और गैर जिम्मेदाराना ढंग से पहाड़ों के जलवाहक चट्टानों को काटा और तोड़ा फोड़ा गया उससे उत्पन्न भूवैज्ञानिक विकृतियों के परिणाम स्वरूप यहां सदियों से प्राकृतिक रूप से विद्यमान चट्टानों के जल सरोवर (एक्वीफर्स), अनेक प्रकार के सदाबहार जलस्रोत और एक बहुत बड़े गांव को पेयजल की आपूर्ति करने वाले नौले, धारे, खाल, ताल आदि परम्परागत जलस्रोत सूखते गए. मैंने वहां अनेक वरिष्ठ नागरिकों से यह जानकारी प्राप्त की और स्वयं जाकर  मोटरमार्ग पर तराशी गई उन जल चट्टानों की  निशानदेही और वीडियो रिकार्डिंग भी की,

इसी सन्दर्भ में ग्राम के पूर्वप्रधान बालम सिंह अधिकारी द्वारा दी गई सूचना के आधार पर यह बात भी संज्ञान में आई कि जहां सड़क बनने के आठ दस साल पहले तक गांव के नौलों और खालों में भारी मात्रा में पानी का स्रोत फूटता था वहां अब सड़क निर्माण के दौरान जल शिलाओं को नष्ट-भ्रष्ट कर दिए जाने के कारण भूमिगत जलस्रोत सूख चुके हैं और इस पहाड़ के नीचे जितने भी सदियों पुराने नौले,धारे,खाल तालाब थे वे सब भी आज जलविहीन हो चुके हैं.ऐसा ही हाल छतीना खाल और मैनोली ग्राम के गणेश नौलों के साथ भी हुआ. वहां भी सड़क के चौड़ीकरण के बाद कत्यूरी काल से चले आ रहे गणेश के नौले सहित बहुत से नौले लुप्त हो चुके हैं,जिन्हें अब पुनर्जीवित करना बहुत कठिन है.


द्वाराहाट में पधारे जल वैज्ञानिक और भूगर्भ विशेषज्ञों ने असगोली ग्राम की इस ग्राउंड रिपोर्ट के आधार पर भौगोलिक और पर्यावरण वैज्ञानिक पृष्ठभूमि में विचार विमर्श करते हुए यह निष्कर्ष भी निकाला है कि उत्तराखंड जैसी पर्वतीय पारिस्थितिकी में इन पर्वतीय जल शिलाओं की जलस्रोतों के संरक्षण में महती भूमिका रहती है और इन जल शिलाओं से जुड़ी जल नाड़ियों के अंतर्जाल को जेसीबी आदि भारी भरकम मशीनों से यदि ध्वस्त कर दिया जाता है तो वहां के पार्श्ववर्ती और बहुत दूर दूर तक के नदी,नौलों के जलस्रोत भी धीरे धीरे सूखने लगते हैं.

हालांकि नौला संरक्षण अभियान के तहत  द्वाराहाट क्षेत्र के असगोली,मैनोली और छतीनाखाल के ग्रामवासियों द्वारा वहां लुप्त होते जलाशयों को पुनर्जीवित करने और बचे-खुचे नौलों के संरक्षण का जो अभियान चलाया जा रहा है, वह सराहनीय है और जागरूकता की दृष्टि से भी आज बहुत जरूरी है. पर आज जल संरक्षण के प्रति जन सामान्य का सबसे बड़ा सामाजिक दायित्व यह है कि वे अपने क्षेत्र के भूमिगत जलसरोवरों की हत्या करने वाले सड़क बनाने वाले ठेकेदार माफियों से बचाए रखें.

पहाड़ के जलस्रोतों की रक्षा के लिए क्षेत्रवासियों और सरकारी पीडब्ल्यूडी को इस ओर विशेष सावधान और सतर्क रहने की आवश्यकता है कि सड़क चौड़ीकरण के दौरान ठेकेदारों द्वारा पहाड़ों को तोड़ने के लिए जेसीबी मशीनों का प्रयोग बिल्कुल न किया जाए और हल्के तथा लघु उपकरणों द्वारा ही पहाड़ों का कटान किया जाए ताकि वहां परंपरागत जलशिराओं और ‘एक्वीफर्स’ में बहने वाले जलस्रोतों को हानि न पहुंचे.


सरकार के द्वारा ठेकेदारों को यह गाइड लाइन भी दी जानी चाहिए कि सड़क निर्माण करते हुए वे इन पहाड़ों को तोड़ने के लिए बारूदी डायनामाईट का प्रयोग कदापि न करें, ताकि जल चट्टानों के भीतर प्रकृति द्वारा मानव कल्याण हेतु संरक्षित जलनाडियों की रक्षा सुरक्षा हो सके और हमारे सूखते तथा लुप्त होते जलस्रोत भावी पीढ़ी के लिए भी संरक्षित और जीवित रह सकें. सरकार द्वारा ठेकेदारों को यह जरूरी दिशा निर्देश भी दिया जाना चाहिए कि सड़क चौड़ीकरण के दौरान उसका मलवा नदियों और पार्श्ववर्ती गाड़-गधेरों में नहीं डाला जाए ताकि नदियों और चट्टानों के मध्य जो जलरिसाव की प्रक्रिया होती है,वह अवरुद्ध न हो.

अंत में कहना चाहूंगा कि नौलों, गाड़ गधेरों को पुनर्जीवित करने से भी बड़ा अभियान है अन्ध विकासवादी आसुरी योजनाओं से अपने प्राकृतिक जल स्रोतों की रक्षा करना, विकासवाद के नाम पर इन जलस्रोतों की जो बेरहमी से हत्या हो रही है,उसके विरुद्ध पर्यावरणविदों और जल संरक्षण से जुड़े संगठनों को आवाज उठानी चाहिए.हमें जलवैज्ञानिक वराहमिहिर की जल संरक्षण की योजनाओं पर अमल करने की बहुत जरूरत है.वरना तो अन्ध विकासवादी योजनाओं और सड़क चौड़ीकरण के नाम पर हिमालय के पारम्परिक जलस्रोतों का लुप्तीकरण होता रहेगा.


अगले लेख में पढ़िए- “बृहत्संहिता में नौला,वापी कूप निर्माण की पारम्परिक विधियां”

✍🏻डॉ मोहन चंद तिवारी, हिमान्तर में प्रकाशित लेख

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)

मंगलवार, 28 जून 2022

The true history behind our distorted history books



Dr. Bhyrappa recalls how he was removed from NCERT panel for questioning distortion of history...


Recalling his professional days with NCERT (National Council of Educational Research and Training) in New Delhi, Dr. Bhyrappa said that when Indira Gandhi was the PM, she framed National Integration Rules and as part of it, a committee was formed under the Presidentship of G. Parthasarathy, who was the Policy Advisor to Indira Gandhi and was her confidante and was also close to Jawaharlal Nehru family.


“Parthasarathy later formed a National Syllabus Revision Committee and five members were appointed and I was one among the members. In the very first meeting, Parthasarathy told us to cleanse the history and social studies textbooks. I asked what actually must be removed from the textbooks,” Dr. Bhyrappa recalled.


“Parthasarathy replied to me that in the textbooks, it has been mentioned that Mughal ruler Aurangzeb destroyed hundreds of temples including the Kashi Vishwanath Temple at Varanasi, revered by lakhs of Hindus. Parthasarathy asked me if this is needed in the history books and such incidents will pollute young minds. I was surprised and asked Parthasarathy if Aurangzeb did not destroy Kashi Vishwanath Temple. Parthasarathy had no answer for that,” Dr. Bhyrappa said.


Narrating the proceedings of the National Syllabus Revision Committee meeting, Dr. Bhyrappa said, “I asked Parthasarathy that what does one infer when he/she saw a Nandi staring at a mosque in Varanasi? What if the students question the teacher tomorrow on this? Parthasarathy had no answers to these questions and he led me to his chamber and told me, ‘You are from Karnataka and I am from Tamil Nadu and we must be like brothers. Let’s not fight.’ After listening to Parthasarathy, I headed out.” 


“In the next meeting held after 15 days, I again asked the same questions as I did not get any answers earlier. Parthasarathy ended the meeting there itself. After a few days, a Government notification was published which said that the National Syllabus Revision Committee has been reconstituted and my name was missing from the list,” Dr. Bhyrappa recalled.


“The five-member composition was retained and instead of me, one left-leaning historian was appointed and this committee changed the history and social studies books and hid the real history from the students. All lessons were favourable to the left-leaning ideology and the authentic history was dropped. The lessons projected outside invaders as heroes and India’s real treasures, history and knowledge found no place in those books. As most of the States were ruled by the Congress, all meekly accepted the syllabus and no one protested,” he added.


In his concluding remarks, the noted litterateur said that academics have been spoilt for the sake of votes. “Agenda-driven historians, academicians and also vote-bank-focussed politicians have corrupted young minds,”  he regretted. 


This post was published on June 2, 2022 in Star of Mysore.

 https://starofmysore.com/no-place-for-ideology-in-education-dr-s-l-bhyrappa/


The true history behind our distorted history books

सोमवार, 27 जून 2022

रवि अरोड़ा की नजर से.... (अग्निपथ 1-2)

 अग्निपथ : एक सपने की मौत / रवि अरोड़ा


विगत 26 अप्रैल की एक खबर आपको दोबारा पढ़वाना चाहता हूं । हरियाणा के भिवानी में एक 23 वर्षीय युवक पवन ने पेड़ से लटक कर आत्महत्या कर ली। यह पेड़ उसी स्कूल के मैदान में था जहां पिछले कई साल से पवन पसीना बहा कर फौज में भर्ती की तैयारी कर रहा था । उसने मेडिकल और फिटनेस दोनो एग्जाम पास कर लिए थे मगर इसी बीच कोविड के चलते भर्तियां बंद हो गईं और दोबारा शुरू होने के इंतजार में ही उसकी योग्यता हेतु अधिकतम उम्र सीमा पार हो गई । मरने से पहले अपने पिता के नाम चिट्ठी में पवन ने लिखा कि पिता जी इस जन्म में तो फौजी नहीं बन सका मगर अगले जन्म में जरूर बनूंगा । पवन से मिलती जुलती ही एक खबर अभी अभी फिर पढ़ने को मिली । हरियाणा के ही रोहतक के पीजी हॉस्टल में सचिन नाम के एक नवयुवक ने आत्महत्या कर ली । सचिन भी सेना में भर्ती होने की तैयारी कर रहा था और अब इस भर्ती के लिए लाई गई सरकार की अग्निपथ योजना के चलते निराशा के गर्त में चला गया था । फौज में भर्ती का सपना टूटने पर पवन और सचिन जैसे ही अपनी इहलीला समाप्त करने वाले युवकों की इस देश में एक लंबी फेहरिस्त है ।


मेरा लगभग रोज ही अनेक गांवों से होकर गुजरना होता है । भरी दुपहरी में किशोर और नवयुवक सड़कों पर दौड़ लगाते दिखते हैं । दरअसल फौज में भर्ती एक ऐसा सपना है जो मुल्क की ग्रामीण आबादी लेकर ही पैदा होती है । यदि चुन लिए गए तो मान सम्मान , पैसा, शोहरत और अच्छी जगह शादी तो हो ही जाती है और यदि शहादत भी मिली तो भी परिवार ही नहीं पूरे खानदान का नाम रौशन हो जाता है । उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और बिहार के ग्रामीण अंचल में छुट्टी पर आए फौजी किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं होते । शायद यही वजह है कि हर साल लाखों नवयुवक इस भर्ती की तैयारी करते हैं और अब पिछले दो साल से भर्ती बंद होने के बावजूद उनके उत्साह में दो दिन पहले तक कोई कमी भी नहीं आई थी । अब 14 जून को सरकार ने घोषणा कर दी कि उसकी अग्निपथ योजना के तहत यह भर्ती अब केवल चार साल के लिए होगी और सेवा समाप्त होने पर सेवानिवृत सैनिकों को मिलने वाला लाभ भी नहीं दिया जायेगा तो ग्रामीण नवयुवकों को यह अपने सपने की हत्या जैसा लग रहा है और गुस्से में वे तोड़फोड़, आगजनी और हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं । 


पता नहीं क्यों मुल्क के रहनुमाओं को नए नए प्रयोग करने में मज़ा आता है ? लगातार एक के बाद एक असफल हो रहे प्रयोगों के बावजूद उन्हे ऐसा कुछ करने में न जाने क्यों जरा भी हिचकिचाहट नहीं होती ? इस अग्निपथ योजना से देश की सुरक्षा पता नहीं कितनी मजबूत होगी अथवा कितनी कमज़ोर , यह तो आने वाला समय बताएगा मगर इतना तो साफ दिख ही रहा है कि फौजियों को मिलने वाली पेंशन सरकार की आंख में खटक रही है और यह योजना बस पैसा बचाने का टोटका भर है । पाकिस्तान द्वारा किए जाने वाले नित नए षड्यंत्रों , सीमाओं पर चीन के अतिक्रमण और रूस यूक्रेन युद्ध से जन्मे अंतराष्ट्रीय हालात के बावजूद पता नहीं सरकार ने इस अनोखे प्रयोग के लिए यही वक्त क्यों चुना ? आज जब सेना में 97 हजार 177 पद खाली पड़े हैं और इनके लिए लाखों नवयुवक पिछले कई सालों से पसीना बहा रहे हैं , उनके साथ केवल चार साल की भर्ती क्या छलावा नहीं होगा ?  क्या यह उचित नहीं होता कि सरकार पुराने पद पुराने तरीके से ही भरती और अग्निपथ जैसी अपनी योजना अगले सालों की भर्ती के लिए रख छोड़ती ? अजब विडंबना है , जिन्हे देश की हिफाजत के लिए हम सालों तक प्रेरित करते रहे अब वही युवक उपद्रवी हो गए और सरकार को उन पर लाठियां भांजनी पड़ रही हैं ।

रवि अरोड़ा:

अग्निपथ : मूर्खता बनाम महामूर्खता



देश में आजकल जो हो रहा है , उसके संकेत अच्छे नहीं हैं । सरकार ने मूर्खता की तो नवयुवक महामूर्खता कर रहे हैं । विरोध जताने को कोई अपना ही घर फूंकता है क्या ? चलो देश का तो जो नुकसान हुआ सो हुआ, इन नवयुवकों के हाथ भी क्या आयेगा ? पहल छात्रों ने की है तो सरकारी तंत्र भी भला कब तक चुप बैठ सकता है । बेशक सरकारी मंशा के तहत दंगाइयों जितनी बेरहम कार्रवाई न हो मगर गिरफ्तारियां और उत्पीड़न तो होना लाजमी है। अजब हालात हैं,  लंबे अर्से से देश को जिस नफरत की भट्टी में झौंका जा रहा था उससे तैयार हुआ बारूद ऐसा लक्ष्य हीन होगा यह तो उसके निर्माताओं ने भी नहीं सोचा होगा । उम्मीद कीजिए कि सरकार को अब कुछ अक्ल आ जाए और वह फौज में भर्ती की अपनी इस विनाशक योजना अग्निपथ को वापिस ले ले अथवा उसे इतना लचीला बना दे कि नौजवानों को स्वीकार हो जाए , वरना न जाने अभी और कितनी अशांति और बवाल देखने को हम अभिशप्त होंगे । 


पता नहीं सरकार यह कैसे दावा कर रही है कि उसने लम्बी सलाह मशवरे के बाद यह स्कीम शुरू की है , जबकि सेना के ही अधिकांश पूर्व अफसर इसे विनाशकारी बता रहे हैं । जाहिर है उनसे इस बाबत नहीं पूछा गया । मेजर जनरल गगन दीप बक्शी मोदी सरकार के बड़े हिमायतियों में शुमार होते हैं और न्यूज चैनलों पर छाए रहते हैं , अग्निपथ का जिस तरह से उन्होंने विरोध किया है , उससे उनकी अनभिज्ञता भी स्पष्ट होती है । जनरल वी के सिंह उन चुनिंदा पूर्व सेनाध्यक्षों में शामिल हैं जिनका नाम आम आदमी को आज भी याद है । पिछले आठ सालों से वे मोदी सरकार में महत्त्वपूर्ण मंत्रालयों के मंत्री हैं मगर उनके बयान से भी स्पष्ट है कि उसने इस बाबत राय नहीं ली गई । ऐसे में भला वे कौन लोग थे जिनकी राय पर सरकार यह योजना लाई ? क्या केवल शहरों में रहने वाले उन चंद पिट्ठू अफसरों की राय पर जो कभी गांव नहीं गए जहां से सैनिक आते हैं ? क्या केवल उनकी राय पर जिन्होंने कभी कोई युद्ध नहीं लड़ा ? फ़ौज की जरुरत युद्ध काल में ही मूलतः होती है , क्या 1962 , 1965 अथवा 1971 के युद्ध में शामिल किसी आला फौजी से भी इस योजना के इम्पेक्ट के बाबत पूछा गया ? 


सबको मालूम है कि पेंशन पर खर्च होने वाली एक बड़ी राशि को बचाने के लिए सरकार यह योजना लाई है मगर क्या यह अच्छा नहीं होता कि यह योजना अन्य सरकारी विभागों से पहले शुरू होती और सबसे आखिर में सेना को लिया जाता ? वैसे क्या ही अच्छा होता कि शुरूआत विधायकों और सांसदों पर खर्च होने वाली बड़ी राशि को बचाने से की जाती ? इन जन प्रतिनिधियों में ऐसा क्या है कि दो दिन के लिए भी सांसद अथवा विधायक बनने पर उन्हे आजीवन पेंशन और तमाम अन्य सुविधाएं मिलती हैं जबकि उनका काम नौकरी की श्रेणी में भी नहीं आता ? 


लगता है कि सरकार के सारे सलाहकार भस्मासुर ही हैं जिन्होंने यह तथ्य अपने आकाओं से छुपाया कि अग्निपथ योजना से बेस्ट यूथ अब फ़ौज को नहीं मिलेगा । ऐसा क्यों नहीं होगा कि गांवों की सड़कों पर दौड़ रहा नवयुवक पहले पैरा मिलिट्री की तैयारी करेगा जहां कम से कम पक्की नौकरी की गारंटी तो है ?  वहां नम्बर नहीं आया तो अपने राज्य की  पुलिस में ही चला जाएगा ताकि अपने घर के निकट रहे । कहीं भी नम्बर नहीं आया तब जाकर वह चार साल के लिए अग्निवीर बनना स्वीकार करेगा । क्या दोयम दर्जे के सैनिकों के हवाले होगी अब देश की सुरक्षा ? हे राम ! भगवान ही मालिक है अब तो इस देश का ।

रवि अरोड़ा कि नजर से....

 काहे भरमा रहे हो जी / रवि अरोड़ा




ज़माना गालियों का है जी । झूठे दावे, झूठे वादे करने और मलाई उड़ाने के चलते नेता गाली खा रहे हैं तो नेताओं की जूतियां चाटने के कारण अफसरशाही गरियाई जा रही है । भ्रष्टाचार, लेटलतीफी और न्याय को अमीरों की चेरी बनाने के कारण न्यायपालिका अपमानित हो रही है तो सरकारों के भोंपू बनने के कारण मीडिया जगत की भी थुक्का फजीहत जारी है। इन तमाम ताकतों के निराकार स्वामी हमारे लोकतंत्र की भी समय समय पर लानत मलानत होती रही है मगर संविधान की आड़ लेकर अक्सर वह पतली गली से बच निकलता है ।

हालांकि सारी बदमाशियां उसके जहाज़ के सुराखों के चलते ही हैं। बेशक किसी राज्य अथवा केंद्र में जब कोई खुराफात होती है तो लोगों की गालियां उसकी ओर भी रुख कर लेती है मगर आम तौर पर वह निर्बाध ही बना रहता है । आजकल महाराष्ट्र में हो रहे हाई वोल्टेज ड्रामे से यकीनन जनता की तोपों के मुंह उसकी ओर फिर घूमे हैं मगर तमाशों से भरे इस मुल्क में जल्द ही कोई और नया तमाशा होगा और एक बार फिर हमारा कथित लोकतंत्र साफ बच निकलेगा।


वैसे क्या इस पर देश में खुल कर चर्चा नहीं होनी चाहिए कि जिस व्यवस्था को हम लोकतंत्र कह रहे हैं, क्या यही लोकतंत्र होता है ? जनता चुनती ए को है। राज बी करता है। बी टूट कर सी हो जाती है और सारी कमान फिर डी संभालता है। रिजॉर्ट राजनीति ने भी क्या दिन दिखाए हैं । केंद्र में जिसकी सरकार हो वह अपने विरोधियों को सीबीआई, इनकम टैक्स और ईडी के मार्फत टाइट रखता है और यदि विरोधी थोड़ा बहुत बेईमान हुआ तो पालतू ही बना लेता है। राज्य में विरोधी दल की सरकार हो तो केंद्र के नेता वहां जा नहीं सकते और उधर, राज्य सरकार के नेताओं को केंद्र जब चाहे उठा कर बंद कर देता है । सीबीआई जैसे केंद्रीय इदारे विरोधी दल की सरकार वाले राज्य में घुस नहीं सकते और प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति के भी राज्य में जाने पर वहां का मुख्यमंत्री भाव नहीं देता । राज्य और केंद्र सरकार एक ही दल की हों तो योजनाएं और पैसा छप्पर फाड़ कर बरसता है और यदि दोनो अलग हैं तो बस चिट्ठी पत्री ही चलती रहती हैं । हालांकि अब केंद्र सरकारें विरोधी दल की राज्य सरकारों को भंग नहीं करतीं मगर ढंग से राज्य सरकार चल जाए, ऐसा भी नहीं होने देतीं । 


विधायक खरीदने के मामले में गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने इतिहास में हमें ऐसे ऐसे किस्से दिए हैं कि फिल्मी कहानियां मात खा जाएं। महाराष्ट्र में आजकल पुनः चुने हुए विधायकों को सड़कों पर फिल्मी अंदाज़ में निपटाया जा रहा है। शिवसेना के सांसद और प्रवक्ता संजय राउत का अपने बागी विधायकों के लिए बोला गया यह डायलॉग कि कब तक रहोगे गुवाहाटी में कभी तो आओगे चौपाटी में, ने तो फिल्मी डायलॉग राइटरों को भी मात दे दी है। उधर,उत्तर प्रदेश में बुलडोजर से लोकतंत्र को हांका जा रहा है तो केंद्र सरकार ने भी पिछले आठ सालों के अघोषित आपात काल में एक के बाद एक अपने दुश्मन ठिकाने लगाए हैं और यह क्रम नित नए मानक गढ़ रहा है ।

इस पर भी तुर्रा यह है कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र हैं और यह हमारा अमृत काल चल रहा है। समझ नहीं आता कि यह लोकतंत्र है तो राजशाही क्या होती है ? अपने पल्ले तो यह भी नहीं पड़ता कि जब असली लोकतन्त्र हमें चाहिए ही नहीं तो इस तमाम ड्रामे की जरुरत ही क्या है ? एक घोषणा भर ही तो करनी है कि लोकतंत्र की अकाल मृत्यु हो गई है। यूं भी यह बस औपचारिकता भर ही तो होगी, काम तो कब का हो चुका है । काहे भरमा रहे हो जी ।

शुक्रवार, 24 जून 2022

राजीव रंजन के संघर्ष और सफलता की कहानी / डॉ. अरविंद singhv

 #सफलता_की_कहानी


एक दिन में कोई  Rajeev Ranjan Singh  नहीं बनता, उसे अपने  को बरसों तपाना और खपाना पड़ता है..! 


@डॉ अरविंद सिंह

वह भी, एक कस्बाई शहर आजमगढ़ से अपने नौजवान सपनों की उड़ान भरने पूरब के आक्सफोर्ड इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लिया था.उसके जीवन में भी आम स्टुडेंट्स की तरह विकल्पों की सर्वथा कमी थी. वह भी पूरब की पट्टी के माँ-बाप के अरमानों को लेकर आईएएस बनने संगम नगरी पहुंचा था, सिविल सेवा की तैयारी करने. 

समय की रेखा पर चलते हुए वह आईएएस तो नहीं बन सका, लेकिन एक काबिल पत्रकार जरूर बन गया. शायद एक आईएएस से ज्यादा अपने पेशे-पत्रकारिता से देश और दुनिया में ख्याति और पहचान अर्जित किया. उसकी सफलता की कहानी में संघर्ष है, त्याग है, और जीवन को हर पल चुनौतियों के बीच रिवाइव करने का उसका अदभुत हुनर है, नया करने और नया सीखने की मौलिक ललक है. 'आइडिया आफ इंडिया' की तरह , उसके पास 'आइडिया आफ जर्नलिज्म' का मौलिक और निस्पृह विचार की अमूल्य संपदा है. वह मौलिकता का आखिरी हिमायती है, लेकिन प्रयोगधर्मी होना उसकी फितरत, अपनी भाषा और लोकभाषा के प्रति चिंता और चिंतन है, लिहाजा उसे समृद्ध करने के लिए नेशनल न्यूज़ चैनल पर भी भोजपुरी में जन संवाद करने की अनूठी कला का विशेषज्ञ है.

'माहौल क्या है.?' उसका प्राइम शो है, जनपक्षीय पत्रकारिता करना उसकी पहचान, नाम है राजीव रंजन सिंह, और मुकाम है आजमगढ़. चैनल है 'न्यूज़-24' और पत्रकारिता में पद है- पोलिटिकल एडिटर, लेकिन क़द बहुतों से, बहुत बड़ा है.क्योंकि उसे बड़ा करने में कड़ी मेहनत, त्याग और अपने को हरपल अपडेट रखने की बेचैनी है, जो उसमें है, बड़ा है-इसलिए बडप्पन भी दिखती है, संघर्ष से सफलता के सफ़र तक की यात्रा में हाड़तोड मेहनत, उसकी पूंजी के रूप में एक-एक दिन का निवेश है.

दर्द और धूप-छाँव उसे भी लगती है, लेकिन 'आइडिया आफ जर्नलिज्म' की प्रतिबद्धता, उसके मन-मस्तिष्क में द्वंद्व बनाएं रखती हैं, लिहाजा- 'माहौल क्या है' के जरिये, अपनी पीड़ा को स्वर देता है, आम हिन्दुस्तानी की चिंता को मुखर करता है.

जर्नलिस्ट क्लब' के सम्मान समारोह में जब राजीव रंजन अपनी आपबीती बता रहे थे- एक नौजवान की संघर्ष की कहानी, कैसे सफलता की कहानी बनती है, एक-एक परत खुलती चली जा रही थी, एक पूरा चलचित्र मस्तिष्क में घुम रहा था, जो ध्वनियों के माध्यम से शब्दचित्र बना रहे थे- आत्म संघर्ष और आत्म विवेचन व परिमार्जन की दास्ताँ बयां कर रहे थें.

सफलता का कोई शाटकट नहीं होता है, यह सत्य एक बार फिर हम पत्रकारों की ज़मात में स्थापित हो रहा था. हम सीख रहे थे, समझ रहे थे, कि स्क्रीन पर चमक-दमक दिखने वाले इस मायावी पेशे के पीछे की कठोर मेहनत और जबाबदेही की प्रतिबद्धता. लोकतंत्र में कैसे पत्रकारिता की अदृश्य ताकत, उसे महान और जबादेह होने की प्रतिबद्धता से जनविश्वास का लोक प्रहरी बना दिया है. जो अब धीरे-धीरे दरकने लगा है.

 एक राजीव रंजन को बनाने में पत्रकारिता ने कितने संघर्ष किए होगें, किस-किस एंगिल ने कब-कब उसे गढ़ा और संवारा होगा, कितनी भूलों ने उसे सिखाया होगा. कितनी दुपहरियों ने पसीना बहाएं होगें, तो कितनी रातों ने जागरण किया होगा, तब जाकर एक राजीव रंजन पैदा होता है, इतनी सहनशीलता, इतनी तड़प, इतनी बेचैनी, इतनी मेहनत के हम हिमायती है, तो, तो यह पेशा हमारे लिए है, नहीं तो अब भी समय है, कोई दुकान खोल लें, बिजनेस कर लें, व्यापार कर लें, और सुखमय जीवन के साथ राष्ट्र निर्माण में योगदान दें, पत्रकारिता को बख्श दो यार.. यह राह नहीं आसान.. इतना तो जान गयें होगें..

गुरुवार, 23 जून 2022

सुभाष विश्वकर्मा की जय हो / अरविंद कुमार सिंह

 ये सुभाष विश्वकर्मा हैं, पेशे से पत्रकार. प्रतापगढ़ के रानीगंज के रहने वाले हैं. इनकी पत्रकारिता के लिए कई बार सम्मानित भी किया जा चुका है.

 कुछ दबंगों ने इन्हें परेशान किया. इनके परिवार को लक्ष्य बनाया. बेटी के साथ अभद्रता किया. जबरन समझौता के लिए बाध्य किया. एक पत्रकार समाज का लोक सेवक होता है. खुद की पीड़ा को झेलते हुए समाज की वेदना को स्वर देता है. उसके मान सम्मान की रक्षा करना समाज और सिस्टम दोनों की जिम्मेदारी होती है.

हमें उम्मीद है कि यदि सुभाष जी की पीड़ा उचित है तो पत्रकारिता समाज को इनकी मदद करनी चाहिए, न केवल पत्रकारिता को बल्कि समाज और सिस्टम को भी इनके साथ न्याय करनी चाहिए.

एक ईमानदार पत्रकार टूटेगा तो, समाज की संवेदनशीलता टूटेगी,वह वह बेमौत मरेगी.. इनकी मदद होनी चाहिए.. वे कुछ डरे हुए भी हैं

Raghwendra Pratap Singh @Subhash vishwakarma

 Om Prakash Singh Yashwant Singh Saurabh Somvansi Journalists प्रतापगढ़ Pratapgarh Police  Government of UP UP Police Chandra Prakash Rai Aditya Singh Vishen  Brejesh Singh

बुधवार, 22 जून 2022

TMU में योग दिवस पर योग शिविर

 टीएमयू में योग से सैकड़ों स्टुडेंट्स में ऊर्जा का संचार


तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी में ग्रांड मास्टर श्री अक्षर ने योग के कराए दो दर्जन से अधिक आसन, योग ऋषि के संग चला सवालों का दौर भी


ख़ास बातें

योग गुरू ने कहा , सर्वश्रेष्ठ आसन सूर्य नमस्कार 

चांसलर और ईडी ने श्री अक्षर को दिया स्मृति चिन्ह



अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी का कैंपस अक्षर योगा रिसर्च एंड डवलपमेंट सेंटर के फाउंडर श्री अक्षर की गरिमामयी मौजूदगी का साक्षी बना। इंडोर स्पोर्टस स्टेडियम में अपने सारगर्भित एवम् संक्षिप्त संबोधन में श्री अक्षर ने बतौर मुख्य अतिथि बोले, सूर्य नमस्कार सर्वश्रेष्ठ आसन जबकि दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति पढ़ाई है। अंगों का दान महादान के मानिंद है। साथ ही बोले, सकारात्मकता के लिए लक्ष्य का होना अनिवार्य है। मेंटल पीस और फिजिकल फिटनेस के लिए योगा को सभी आत्मसात करें। इससे पूर्व कुलाधिपति श्री सुरेश जैन, एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर श्री अक्षत जैन और सुश्री नंदिनी जैन ने ग्रांड मास्टर को बुके देकर गर्मजोशी से स्वागत किया। श्री अक्षर का टीएमयू में पहली बार मंगल प्रवेश हुआ है। डेढ़ घंटे चले योग प्रोग्राम में सूर्य नमस्कार समेत दो दर्जन से अधिक आसनों के जरिए यूनिवर्सिटी के सैकड़ों स्टुडेंट्स के संग-संग स्टाफ और नॉन टीचिंग में ऊर्जा का संचार कर गए। योग के दौरान कुलाधिपति श्री सुरेश जैन और एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर श्री अक्षत जैन की भी उल्लेखनीय मौजूदगी रही। योगाभ्यास के अंत में सवाल-जवाब का दौर भी चला। ब्रेकअप, निद्रादोष, एकाग्रता, असंतुलन, रोग-प्रतिरोध क्षमता, फ्लैक्सबिल्टी, स्ट्रेस, श्वांस सरीखे सवाल पूछे गए। योग ऋषि ने सभी प्रश्नों के बारी-बारी से संतुलित, तर्कसंगत और सकारात्मक तौर पर जवाब दिए। अंत में कुलाधिपति ने कहा, योग कार्यक्रम विशेषकर छात्रों के लिए मील का पत्थर साबित होगा। उन्होंने उम्मीद जताई, कोई स्टुडेंट स्ट्रेस में होगा तो योग उसके लिए संजीवनी का काम करेगा। उन्होंने ग्रांड मास्टर श्री अक्षर का यूनिवर्सिटी में आगमन के लिए आभार प्रकट किया, जबकि एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर श्री अक्षत जैन ने योग के इस महायज्ञ को सफल बनाने के लिए शहर के बाशिंदों और टीएमयू परिवार के सदस्यों का धन्यवाद देते हुए कहा, हमें योग गुरू के हर स्टेप्स को संजीदगी से लेना चाहिए। वह बोले, अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस भले ही एक दिन मनाया जाता हो, लेकिन अब यह हमारी जिंदगी का रोजमर्रा का हिस्सा होना चाहिए। उल्लेखनीय है, इस योग कार्यक्रम में टिमिट कॉलेज ऑफ फिजिकल एजुकेशन की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।


योगाभ्यास में दो बार सूर्य नमस्कार के अलावा उत्कट आसन, मलासन, चक्रदंडासन, नौका आसन, पश्चिम उत्थान आसन, सुखासन के तौर-तरीके न केवल बताए, बल्कि अपने संग-संग कराए भी। पीठ की मजबूती को कैट पोज जबकि स्पाइन के लिए वज्रासन, स्ट्रेस की समाप्ति को सूर्य नमस्कार, भुजंगासन भी करने की पुरजोर वकालत की। दुनिया के जाने-माने योग गुरू श्री अक्षर ने ओम् सूर्याय नमः और ओम् के उच्चारण करने पर जोर दिया। भ्रामरी प्राणायाम पर एक्सरसाइज करके उन्होंने गहरी श्वांस अन्दर लेने और गहरी श्वांस छोड़ने के फायदे भी बताए।

मन की शांति के लिए श्वांस ध्यान की ओर स्टुडेंट्स समेत सभी अनुयायियों का ध्यान आकर्षित किया। वर्ल्ड योग ऑर्गेनाइजेशन के प्रेसिडेंट श्री अक्षर ने सूक्ष्म से लेकर गहन आसनों, मुद्राओं, प्राणायाम, सूर्य नमस्कार, श्वांस ध्यान में डुबकी लगवाई। अंत में उन्होंने एकाग्रता के लिए क्रीड़ायोग, गुड हैबिट्स के लिए यम-नियम का हवाला देते हुए अधिक नींद से बचाव को उन्होंने ताड़ासन और वकासन करके दिखाया। योग कार्यक्रम में मेडिकल कॉलेज, डेंटल कॉलेज, एफओईसीएस, एग्रीकल्चर कॉलेज, नर्सिंग कॉलेज, फिजिकल एजुकेशन कॉलेज, पैरामेडिकल कॉलेज, फार्मेसी कॉलेज, फैकल्टी ऑफ एजुकेशन, फिजियोथैरेपी विभाग आदि के स्टुडेंट्स के संग-संग निदेशक छात्र कल्याण प्रो. एमपी सिंह, एफओईसीएस के निदेशक प्रो. आरके द्विवेदी, टिमिट फिजिकल एजुकेशन कॉलेज के प्राचार्य डॉ. मनु मिश्रा, मेडिकल कॉलेज के वाइस प्रिंसिपल प्रो. एसके जैन, निदेशक हॉस्पिटल पीएंडडी श्री विपिन जैन, डॉ. नवनीत कुमार, डॉ. उमर फारूख, डॉ. अक्षत जैन, डॉ. आरके जैन, डॉ. अर्चना जैन, के अलावा शहर से समाज सेवी सरदार गुरविन्दर सिंह, श्री राजेन्द्र सिंह, श्री संतोष धीर, श्री हरि गोपाल शर्मा, श्री अनिल अग्रवाल आदि की भी मौजूदगी रही। संचालन श्री विपिन चौहान ने किया।

मंगलवार, 21 जून 2022

द्रौपदी होंगी भारत की दूसरी महिला राष्ट्रपति / आलोक कुमार


झारखंड के शतरंज में द्रौपदी के सामने यश नहीं लें पाएंगे यशवंत


जोहार ! द्रौपदी दीदी। साफ है,आप विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की राष्ट्रपति बनने जा रही हैं। एनडीए ने जबरदस्त दाव खेला। विपक्ष चकराकर चक्कर घिन्नी में फंस गया है। 


विपक्ष के खेमे में जा सकने वाले नवीन पटनायक का रास्ता द्रौपदी के उम्मीदवार घोषित होते ही  बंद हो गया। पटनायक की पार्टी अपनी सरकार के पहली कैबिनेट की प्रतिभाशाली मंत्री रहीं द्रौपदी के अलावा किसी और को वोट दे ही नहीं सकती। झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा सरकार के लिए संथाली उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के खिलाफ जाना ब्लंडर हो सकता है। लिहाजा पहली बार एक आदिवासी वह भी महिला भारत की राष्ट्रपति बनने जा रही हैं। निजी गर्व का विषय है। झारखंड मेरी कर्मभूमि रही है। वह भी खासकर दुमका जो कि संथाल परगना का मुख्यालय है। इसलिए अतिरिक्त खुशी है। दिल की गहराईयों से सबको बधाई। शुभकामना। आभार।


ओडिशा की द्रौपदी मुर्मू संथाल जनजाति से हैं। भाजपा की खास रणनीति के तहत झारखण्ड की राज्यपाल रही। सार्वजानिक जीवन में उनकी छवि साफ सुथरी है। कई भाषाओं की जानकर हैं। मातृभाषा संथाली के साथ हिंदी, ओड़िया,बंगाली बेबाकी से बोलती हैं। बीजेपी की कर्मठ  कार्यकर्ता, विधायक, मंत्री और नेता रही हैं। 


गैर आदिवासियों यानी दिक्कुओं में संथाल जिद पालने के लिए विख्यात है। बांग तो बांग, हे तो हे। बांग का हिंदी मतलब हुआ, नहीं और हे का मतलब हां। किसी संथाली के मुंह से हे निकल गया, तो आंधी आए या तूफान, जिद्दी संथाल अपने संकल्प को हरहाल में  पूरा करके मानेगा। अगर बांग निकल गया, तो आप लाख मिन्नतें कर लीजिए। वह बड़ा से बड़ा नुकसान उठा लेगा पर न जो बोला,तो नहीं ही करेगा। इसी कर्मठता ने संथाल नायक चांद, भैरो और सिद्धो, कान्हो को इतिहास में खास जगह दे रखी है।


 1819 में संथाल विद्रोह से घबरा कर अंग्रेज प्रशकों ने भागलपुर प्रमंडल से अलग कर दामिन ए कोह नाम से संथाल और पहाड़िया जनजाति के लिए अलग प्रांत बनाने की सहमति बना ली। दुमका, गोड्डा, राजमहल अनुमंडलों को मिलाकर 1932-33 में ब्रिटिश इंडिया की सरकार ने प्रशासनिक तौर पर दामिन – ई. कोह प्रदेश की स्थापना की, जो संथाल परगना जिले के लगभग 1, 338  वर्ग मील में फैला हुआ था। 


दामिन – ई. कोह का पर्वतीय भू – भाग आज विलुप्त होने के कगार पर फंसी पहाड़िया जनजाति के लिए आवंटित किया गया। जबकि पर्वतीय भू – भाग के आगोश में फैला लगभग पांच सौ वर्ग मील का मैदानी क्षेत्र संथाल जनजाति के बसाव के लिए निर्धारित किया गया। अभिलेखागार के कागजात बताते हैं कि 1851 ई. तक दामिन – ई – कोह प्रदेश के 1, 473 गाँवों में लगभग 82, 795 संथाल रहने लगे।


 भावी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू टेक्निकली ओडिशा की मूलवासी हैं। पर संथाली जनजाति से हैं जिसका डीह झारखंड के संथाल परगना है। संथालों की आबादी उत्तर में बिहार, पूर्व में पश्चिम बंगाल और असम, दक्षिण में ओडिशा में बसी है। इनमें संथाल परगना का बेहद क्रेज है। इसी क्रेज ने छोटानागपुर के हजारीबाग ज़िला के शिबू सोरेन को दूरस्थ दुमका खींच लाया। उन्होंने अस्सी के दशक में संथाल परगना के रामगढ़ प्रखंड से महाजनों के खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंका। संथालों के बीच दिशाम गुरु बनकर राज करने लगे। 


झारखंड में संथाल जनजाति का क्या महत्व है इसे ऐसे समझा जा सकता है कि राज्य गठन के 22 साल तक झारखंड ने संथाल नेता शिबू सोरेन के वंशवाद को ही देखा है। उनके तीनों पुत्र स्व. दुर्गा सोरेन, हेमंत सोरेन व बसंत सोरेन और एक पुत्रवधू सीता मुर्मू विधायक बने। दिशाम गुरु खुद और पत्नी रूपा सोरेन सांसद बनी। पिता और पुत्र हेमंत मुख्यमंत्री रहे। सबपर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। 


बहरहाल राष्ट्रपति चुनाव में बीजेपी के पुराने दिग्गज नेता की बैंड बजनी तय है। बुढौती में विपक्ष ने उनको झार पर चढ़ा दिया। महत्वाकांक्षा में फंसे यशवंत सिन्हा की हार तय है। संयोग से प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे यशवंत सिन्हा भी झारखण्ड के हजारीबाग से हैं।

शुक्रवार, 17 जून 2022

राजेंद्र नगर वाले बलराज मधोक / विवेक शुक्ला

 राजेन्द्र नगर- ना बलराज मधोक, ना ग्रैंड बेकरी

राजेन्द्र नगर में उपचुनाव की सरगर्मियों को महसूस किया जा सकता है। आप, भाजपा, कांग्रेस के वर्कर घर-घर जा रहे हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी इधर कुछ रोड शो करन हैं।

अगर देखा जाए तो राजेन्द्र नगर इस तरह का एरिया है, जिससे राजधानी में रहने वाले लगभग हरेक संपन्न पंजाबी और सिंधी का कोई न कोई संबंध निकल आता है। इसकी एक पहचान ये भी रही है कि जनसंघ के शिखर नेता बलराज मधोक लगभग छह दशकों तक यहां पर रहे। वे दावा करते थे कि उन्होंने ही लोकसभा में 1968 में सबसे पहले मांग की थी कि हिन्दुओं को राम जन्म भूमि सौंप दी जाए। 


उन्होंने 1960 के दशक में गौहत्या विरोधी आन्दोलन का नेतृत्व किया था। आप,भाजपा और कांग्रेस के वर्कर मधोक साहब के घर के आसपास भी कैंपेन में जुटे हुए हैं। हमने कुछ नौजवान कार्यकर्ताओं से पूछा कि ‘क्या वे मधोक साहब के बारे में जानते हैं?’ लगभग सभी का कहना था कि ‘हमने नाम नहीं सुना है।’ एकाध ने सोचते हुए कहा कि ‘वे भाजपा के नेता थे।’ मधोक साहब कभी भाजपा में नहीं रहे थे। वे जनसंघ के संस्थापकों में से थे। आमतौर पर किसी की ना सुनने वाले मधोक साहब प्रखर वक्ता थे। मधोक साहब दिल्ली और देश की सियासत में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करवाते थे। आप उनसे सहमत हों या ना हों, पर आप उन्हें इग्नोर नहीं कर सकते थे।


वे साउथ दिल्ली सीट से लोकसभा के लिए 1961 और 1967 में चुने गए थे। वे जनसंघ के पहले सम्मेलन की चर्चा करना नहीं भूलते थे। कनॉट प्लेस से सटे राजा बाजार के रघुमल आर्य कन्या विद्लाय में 21 अक्तूबर,1951 को जनसंघ का पहला सम्मेलन हुआ था। उसमें डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को जनसंघ का अध्यक्ष और बलराज मधोक को राष्ट्रीय सचिव चुना गया।


 मधोक साहब ने ही जनसंघ का संविधान लिखा था। सम्मेलन में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और फिर बलराज मधोक ने गर्मागर्म भाषणों में नेहरु सरकार की ‘जन विरोधी नीतियों’ पर हल्ला बोला था। तब ही देश में गौ-हत्या पर रोक लगाने की मांग भी की गई थी।


जाहिर है, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि जनसंघ आगे चलकर अपने नए भाजपा नामक संस्करण में देश पर राज करेगी। जनसंघ की स्थापना बैठक के लिए रघुमल कन्या विद्यालय को इसलिए चुना गया था क्योंकि इसका हॉल काफी बड़ा है। ये नई दिल्ली में कन्याओं के पहले स्कूलों में से एक माना जा सकता है। इसकी स्थापना 1944 में हुई थी। दिल्ली के 1970 के दशक में मेयर रहे लाला हंसराज गुप्ता के पिता लाला रघुमल गुप्ता के नाम पर इस स्कूल का नाम रखा गया था।


 हंसराज गुप्ता के नाम पर एक सड़क ग्रेटर कैलाश में है। उनके पुत्र राजेन्द्र गुप्त मदनलाल खुराना की कैबिनेट में मंत्री थे।


बहरहाल, बलराज मधोक की विचारधारा हिन्दू राष्ट्र के इर्दगिर्द घूमती थी।  मधोक साहब का नाम उप चुनावों में किसी भी रूप में नहीं आ रहा है। ये वक्त की वक्त बातें हैं। आप जब राजेन्द्र नगर की शंकर रोड मार्केट से बाहर आते हैं, तो इधर की मशहूर ग्रैंड बेकरी का बोर्ड भी दिखाई नहीं देता। इसके लजीज केक,मीठे-नमकीन बिस्कुट,रस्क, पेस्ट्रजी वगैरह का स्वाद लेते हुए दिल्ली की कई पीढ़ियां बढ़ी हुई थीं।  ना जाने कितने बच्चों के बर्थ डे केक ग्रेंड बेकरीज से खरीदे गए थे। 


 ग्रैंड बेकरी को पेशावर से आए एक रिफ्यूजी परिवार ने खोला था। इधर लाहौर, पेशावर और रावलपिंडी से आए परिवारों की भरमार है। इस बीच, दिल्ली का क्रिस्चियन समाज भी पसंद करता था ग्रैंड बेकरी से क्रिसमस केक बनवाना। पर जैसे राजेन्द्र नगर मधोक साहब को भूल सा गया है, वैसे ही उसने न्यू ग्रैंड बेकरी के बिना भी रहना सीख लिया है।


 विवेक शुक्ला,

नवभारत टाइम्स, 16 जून, 2022

झुमका गिरा बरेली के बाजार में बना झुमका तिराहा

प्रस्तुति - राकेश सिन्हा /  रागिनी सिन्हा


🌹👆‘मेरा साया’* यह फिल्म  १९६६ में आई थी .   *'झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में...!’* इस फिल्म का एक लोकप्रिय गीत है . इस गीत में *बरेली के  बाजार में नायिका का झुमका खो गया हुआ है . मगर अब ५४ वर्ष बाद वो मिल गया है .* उस झुमके को देखने आप को  बरेली जाना होगा . 


 *बरेली यह उत्तर प्रदेश का एक शहर है.* ५४ वर्ष पूर्व  केवल इस गीत की वजह से संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध हो गया था. 

अब *बरेली विकास प्राधिकरण ने शहर के एन एच २४ पर झीरो पॉइंट पर एक झुमका लगवाया है .  झुमके की ऊंचाई  १४ फूट है व वजन है २०० किलोग्रॅम. पितल तथा तांबे से यह  झुमका बनाया गया है , गुडगाव के  एक कारागिर  ने.  इसकी  किंमत है १८ लाख रुपये.*       

इस जगह का नाम है   *“झुमका तिराहा.”*  ५४ वर्ष बाद, सन  २०२० में  झुमके का यह स्मारक तैयार हुआ और अब एक पर्यटक  आकर्षण  का स्थान बन गया है . 

            

इस गाने के गीतकार थे *राजा मेहंदी अली खान.* गायिका *आशा*, संगीतकार – *मदन मोहन.* परदे पर  गीत सादर किया था बहारदार नृत्य के संग  *दिवंगत साधना जी ने.*

 ‘मेरा साया’ (१९६६) यह  सिनेमा मराठी फिल्म ‘पाठलाग’ (१९६४) का रीमेक था . मूल सिनेमा की कथा से  बरेली  शहर का कोई भी संबंध नही है .

 

*मगर फिर भी  बरेली गाव में झुमका गिरा यह  कहानी एकदम  सच्ची है .* और इस कहानी का संबंध सीधा  *अभिताभ बच्चन परिवार से जुड़ता है.*


अभिताभ के पिताश्री  हरिवंशराय बच्चन और मातोश्री तेजी (  उस समय-तेजी सूरी) इन की पहली भेंट  बरेली में किसी रिश्तेदार की शादी में हुई थी . उस शादी के दौरान  एक कार्यक्रम में  हरिवंशराय जी को कोई एक कविता सुनाने का आग्रह किया गया . उन्होंने  कविता का पठन अतिशय सुंदर रीति से किया . कविता सुन कर  तेजी की आंखे भर आई,  अश्रु बहने लगे . हरिवंशराय की आंखे भी  तेजी की अवस्था देख भर आई . इस प्रथम   *कविताभेट *  का रूपांतर फिर  एक *प्रेमकथा* में हो गया. 

मगर काफी समय तक दोनो की शादी की कोई खबर नहीं आई तो दोस्त लोग पूछने लग गए . गीतकार राजा मेहंदी दोनो के अच्छे मित्र थे . उन्होंने भी  एक बार  तेजी को इस के बारे में पूछा  . तब तेजी ने उनका ध्यान भटकाने के इरादे से बोला “मेरा झुमका तो बरेली के बाजार में गिर गया है..!” 

 तेजी ने किया यह विधान  राजा मेहंदी के दिमाग में फिट हो गया . 


फिर जब " मेरा साया" फिल्म के गीत लिखने का समय आया तो राजा मेंहदी को तेजी के उस वाक्य की याद आई. इस ही  वाक्य पर उन्होंने संपूर्ण गीत लिख डाला . और इस गीत ने  बरेली शहर की प्रसिद्धी दिला दी .  इस लोकप्रिय गाने की याद में बरेली में  ५४ वर्ष (२०२०) बाद जो  झुमका गिरा था वह फिर से स्थापित हो गया .


गुरुवार, 16 जून 2022

पाठकीय पाठ:रेत समाधि / धीरेन्द्र अस्थाना

 पाठकीय पाठ: रेत समाधि


 * रेत समाधि उपन्यास नहीं है, यह एक संयुक्त परिवार की महागाथा है। खुद लेखिका ने भी जगह-जगह इसे गाथा कहा है।

  * यह एक मार्मिक, कौतुकपूर्ण, बेहतरीन और विनम्र आख्यान है।

 * इसका कथ्य तो अद्वितीय है ही, इसका कहन भी बेजोड़ और विस्मयकारी है।

 * यह एक आवारा लेकिन चिंतनीय कथानक है जिसकी भाषा बंजारों सी भटकती है।

  * ऐसी भाषा सीखी नहीं जा सकती,वह इनबिल्ट होती है। चालू अर्थों में इसे गाॅड गिफ्ट कह सकते हैं।

 * इसे एक सिटिंग में आनंददायक ढंग से नहीं पढ़ा जा सकता। यह एक तकलीफदेह किताब है, इसे इसकी तकलीफ में शामिल होकर समझा जा सकता है।

 * यह किताब अपने पूर्ववर्ती कुछ अनूठे लेखकों,यथा- कृष्णा सोबती, कृष्ण बलदेव वैद,विनोद कुमार शुक्ल, निर्मल वर्मा के योगदान को कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करती है।

  * इस गाथा का पहला चैप्टर थोड़ा कठिन,दुर्बोध और थका देने वाला है लेकिन उसके बाद किताब खुल जा सिमसिम की तरह खुलती जाती है।

  * और अंत में एक कठोर सच्चाई- अगर इसे बुकर प्राइज नहींं मिलता तो यह इतनी जरूरी किताब बड़े स्तर पर अपठित भी रह जा सकती थी।


पूरे तीन सौ पिचहत्तर पेज तेरह दिन में ठहर ठहर कर पढ़ने के बाद की गई टिप्पणी।

✌🏼

अद्भुत, अकल्पनीय, अविश्वसनीय किन्तु सत्य डॉ. श्रीकांत जिचकर !

 


आपसे कोई पूछे भारत के सबसे अधिक शिक्षित एवं विद्वान व्यक्ति का नाम  बताइए,


 जो,

 

⭕ डॉक्टर भी रहा हो,

⭕ बैरिस्टर भी रहा हो,

⭕ IPS अधिकारी भी  रहा हो,

⭕ IAS अधिकारी भी रहा हो,

⭕ विधायक, मंत्री,  सांसद भी रहा हो,

⭕ चित्रकार, फोटोग्राफर भी रहा हो, 

⭕ मोटिवेशनल स्पीकर भी रहा हो,

⭕ पत्रकार भी रहा हो,

⭕ कुलपति भी रहा हो, 

⭕ संस्कृत, गणित का विद्वान भी रहा हो,

⭕ इतिहासकार भी रहा हो,

⭕ समाजशास्त्र,  अर्थशास्त्र का भी ज्ञान रखता हो,

⭕ जिसने काव्य रचना भी की हो !


अधिकांश लोग यही कहेंगे -

"क्या ऐसा संभव है ?आप एक व्यक्ति की बात कर रहे हैं या किसी संस्थान की ?"


पर भारतवर्ष में ऐसा एक व्यक्ति मात्र 49 वर्ष की अल्पायु में भयंकर सड़क हादसे का शिकार हो कर  इस संसार से विदा भी ले चुका है !


उस व्यक्ति का नाम है- 


 *डॉ. श्रीकांत जिचकर !* 


श्रीकांत जिचकर का जन्म 1954 में एक संपन्न मराठा कृषक परिवार में हुआ था ! 


वह भारत के सर्वाधिक पढ़े-लिखे व्यक्ति थे, जो गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज है !


डॉ. श्रीकांत ने 20 से अधिक डिग्री हासिल की थीं !

 

कुछ रेगुलर व कुछ पत्राचार के माध्यम से ! 


वह भी फर्स्ट क्लास,  गोल्डमेडलिस्ट, कुछ डिग्रियां तो उच्च शिक्षा में नियम ना होने के कारण उन्हें नहीं मिल पाई, जबकि इम्तिहान उन्होंने दे दिया था !


 *उनकी डिग्रियां/ शैक्षणिक योग्यता इस प्रकार थीं...*


✔️MBBS, MD gold medalist, 

✔️LLB, LLM, 

✔️MBA, 

✔️Bachelor in  journalism ,

✔️संस्कृत में डी. लिट.  की उपाधि, यूनिवर्सिटी टॉपर ,

✔️M. A इंग्लिश,

✔️M.A हिंदी,

✔️M.A हिस्ट्री,

 ✔️M.A  साइकोलॉजी,

✔️M.A  सोशियोलॉजी,

✔️M.A पॉलिटिकल साइंस,

✔️M.A  आर्कियोलॉजी,

 ✔️M.A एंथ्रोपोलॉजी,

✔️श्रीकान्तजी 1978 बैच के आईपीएस व 1980 बैच के आईएएस अधिकारी भी रहे !

✔️1981 में महाराष्ट्र में  विधायक बने,

✔️1992 से लेकर 1998 तक राज्यसभा सांसद रहे !


❗श्रीकांत जिचकर ने वर्ष 1973 से लेकर 1990 तक का समय यूनिवर्सिटी के इम्तिहान देने में गुजारा !


❗1980 में आईएएस की केवल 4 महीने की नौकरी कर इस्तीफा दे दिया !

                

❗26 वर्ष की उम्र में देश के सबसे कम उम्र के विधायक बने, महाराष्ट्र सरकार में मंत्री भी बने,


❗14 पोर्टफोलियो हासिल कर सबसे प्रभावशाली मंत्री रहे !


❗महाराष्ट्र में पुलिस सुधार किये !


❗1992 से लेकर 1998 तक बतौर राज्यसभा सांसद संसद की बहुत सी समितियों के सदस्य रहे, वहाँ भी महत्वपूर्ण कार्य किये !


❗1999 में कैंसर लास्ट स्टेज का डायग्नोज हुआ, डॉक्टर ने कहा आपके पास केवल एक महीना है ! 


*अस्पताल पर मृत्यु शैया पर पड़े हुए थे...*

*लेकिन आध्यात्मिक विचारों के धनी श्रीकांत जिचकर ने आस नहीं छोड़ी ।*


*उसी दौरान कोई सन्यासी अस्पताल में आया। उसने उन्हें ढांढस बंधाया ।*

 

*संस्कृत भाषा, शास्त्रों का अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया । कहा- "तुम अभी नहीं मर सकते...अभी तुम्हें बहुत काम करना है...!"*


चमत्कारिक तौर से श्रीकांत जिचकर पूर्ण स्वस्थ हो गए...!


👍 स्वस्थ होते ही राजनीति से सन्यास लेकर...संस्कृत में डी.लिट. की उपाधि अर्जित की !


वे कहा करते थे - "संस्कृत भाषा के अध्ययन के बाद मेरा जीवन ही परिवर्तित हो गया है ! मेरी ज्ञान पिपासा अब पूर्ण हुई है !"


👍पुणे में संदीपनी स्कूल की स्थापना की, 


👍नागपुर में कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना की, जिसके पहले कुलपति भी वे बने !


उनका पुस्तकालय किसी व्यक्ति का निजी सबसे बड़ा पुस्तकालय था, जिसमें 52000 के लगभग पुस्तकें थीं !


उनका एक ही सपना बन गया था, भारत के प्रत्येक घर में कम से कम एक  संस्कृत भाषा का विद्वान हो तथा कोई भी परिवार मधुमेह जैसी  जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का शिकार ना हो !

 

यूट्यूब पर उनके केवल 3 ही मोटिवेशनल हेल्थ फिटनेस संबंधित वीडियो उपलब्ध हैं !


ऐसे असाधारण प्रतिभा के लोग, आयु के मामले में निर्धन ही देखे गए हैं ।


अति मेधावी, अति प्रतिभाशाली व्यक्तियों का जीवन ज्यादा लंबा नहीं होता ।

शंकराचार्य, महर्षि दयानंद सरस्वती, विवेकानंद  भी अधिक उम्र नहीं जी पाए थे !


2 जून 2004 को नागपुर से 60 किलोमीटर दूर महाराष्ट्र में ही भयंकर सड़क हादसे में श्रीकांत जिचकर का निधन हो गया !


संस्कृत भाषा के प्रचार प्रसार व  Holistic health को लेकर उनका कार्य अधूरा ही रह गया !


  *विभिन्न व्यक्तियों के जन्म दिवस को उत्सव की तरह मनाने वाले हमारे देश में ऐसे गुणी व्यक्ति को कोई जानता भी नहीं है, जिसके जीवन से कितने ही युवाओं को प्रेरणा मिल सकती है।*


ऐसे शिक्षक,  ज्ञानी, उत्साही व्यक्तित्व,  चिकित्सक, विधि  विशेषज्ञ, प्रशासक व राजनेता के मिश्रित व्यक्तित्व को शत शत नमन* 🙏

रविवार, 12 जून 2022

एकाकी विवाह : कितना विवाह? / ऋषभ देव शर्मा

 


गुजरात में एक युवती के अपने आप से विवाह की घटना सामाजिक बदलाव की ओर इशारा तो करती है, लेकिन विवाह संस्था पर पुनर्विचार की ज़रूरत को भी उजागर करती है। उभयलिंगी लड़के-लड़की के लिए यह एक प्रकार की दैहिक और मानसिक विवशता हो सकती है। पर आज अनेक सामान्य लड़कियाँ भी अगर विवाह नहीं करना चाहती हैं, तो इसके कारण सामाजिक हो सकते हैं। पारंपरिक समाज स्वीकार करे या न करे, सोलोगेमी (एकल या एकाकी या स्व या आत्म विवाह) उसकी दो अलग व्यक्तियों के विवाह की धारणा को चुनौती दे रहा है। यह भी देखना होगा कि ऐसे विवाह की कानूनी वैधता क्या है। यह विवाह विवाह है भी या नहीं? और भी बहुतेरे सवाल हो सकते हैं इस तरह के चलन के प्रभाव को लेकर। पूछा जा सकता है कि इसे वास्तव में विवाह कहा जाएगा या सनक या फैशन! 


एक नज़रिया यह भी है कि अपने लिए एकल जीवन चुनना किसी लड़के या लड़की की निजी आज़ादी भी हो सकती है न। समाज या कानून को इससे कुछ भी दिक्कत क्यों होनी चाहिए? किसी उभयलिंगी व्यक्ति को अगर इस तरह विवाह-सुख मिलता है, तो उसे इस खुशी से क्यों वंचित किया जाना चाहिए?  लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि आत्म विवाह की यह प्रवृत्ति यदि 'आत्म रति' का विस्तार है, तो इसे असामान्य मानसिक विकार या मनो ग्रंथि ही माना जाएगा। कहीं यह कुछ वैसा ही तो नहीं है जैसे कि कोई पुरुष खुद को परमात्मा की प्रेमिका मान कर महिलाओं का परिधान और शृंगार धारण करने लगे! 


याद रहे कि गुजरात की इस युवती क्षमा बिंदु ने कहा है कि उसे दुलहन बनना पसंद है, पर किसी दूसरे व्यक्ति से शादी करना नहीं। उसकी यह आत्म स्वीकृति विचारणीय है कि 'लोग ऐसे किसी इनसान से शादी करते हैं, जिससे प्यार करते हों। मैं ख़ुद से प्यार करती हूँ, इसलिए ख़ुद से शादी कर रही हूँ।' अब यह तो मनोवैज्ञानिक ही बता सकते हैं कि इस तरह 'खुद से प्यार' आम बात हो सकती है, या असामान्य ग्रंथि! क्षमा बिंदु भाग्यशाली हैं कि उनकी मनोग्रंथि को पहचान कर उनके परिवार ने उनके आत्म विवाह को समर्थन दिया है। हाँ, पंडित जी तैयार नहीं हुए, तो मंत्रोच्चार की ज़िम्मेदारी तकनीक ने निभा ली! 


इस बीच सयाने बता रहे हैं कि आत्मविवाह भारत के लिए अजूबा हो सकता है, लेकिन  अमेरिका, इटली, जापान, ताइवान, यूके और दूसरे कई देशों में यह काफी प्रचलित है। यह जानना मनोरंजक लग सकता है कि जापान और इटली में इस तरह के एकाकी विवाहों  के लिए कंपनियाँ बाकायदा दो-तीन तरह के पैकेज ऑफर करती हैं। साज-सिंगार  और फोटो शूट  से लेकर विवाह की रस्मों और हनीमून ट्रिप तक! इस मामले में जापान सबसे आगे है, फिर इटली और अमेरिका। देखना होगा कि यह प्रवृत्ति क्या भारत में भी सहज स्वीकृत हो पाएगी! हमारे यहाँ बहुत सी लड़कियाँ विवाह के बाद की खिट-खिट और ससुराल की समस्याओं से इतनी आतंकित रहती हैं कि विवाह की इच्छा होते हुए भी विवाह नहीं करतीं। हो सकता है कि ऐसी लड़कियाँ आत्म विवाह की ओर आकर्षित हों। यदि ऐसा होता है तो इसे वर्तमान विवाह संस्था की खामी का परिणाम मानना होगा। यानी, अब समय आ गया है कि भारतीय विवाह या परिवार में पुरुष-वर्चस्व को ढीला किया जाए, ताकि वह विवाहित स्त्री के लिए दमघोंटू न बने। विवाह और परिवार से आनंद झलकना चाहिए, ताकि युवक-युवती विवाह से कतराएँ नहीं! 

   😀😀   प्रेम बना रहे!!!

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डेलीहिंदीमिलाप

शनिवार, 11 जून 2022

अपंगो में जीवन की नयी उम्मीद हैं टीएमयू हॉस्पिटल & रिसर्च सेंटर मुरादाबाद के डॉ अरोड़ा

 अपंगों के जीवन में खुशियां बिखेर रहे टीएमयू हॉस्पिटल  & रिसर्च सेंटर मुरादाबाद के डॉ. जीएल अरोड़ा


तीन दशक में ढाई हजार हैंडीकैप को बना चुके हैं सक्षम


यूं तो हर इंसान के जीवन की डोर ईश्वर के हाथों में है, लेकिन धरती पर डॉक्टर भगवान से कम नहीं  हैं।

 यदि ईश्वर किसी मानव के बेइंतहा दर्द को नहीं हर्ता तो छोटी से बड़ी पीड़ा से राहत को चिकित्सक की ही शरण लेता है। डॉक्टर भी पेशेंट के विश्वास की खातिर जी-जान लगा देता है। पेशेंट्स के प्रति सेवा, समर्पण और संकल्प की यह छोटी-सी कहानी है, देश के जाने-माने ऑर्थोपैडिक्स डॉ. जीएल अरोड़ा की। तीन दशक से डॉ. अरोड़ा अपंगों के जीवन में आशा की नई किरण हैं।

करीब-करीब ढाई हजार विकलांगों के जीवन में खुशियां भर चुके हैं। तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद का यह सौभाग्य है, डॉ. अरोड़ा टीएमयू हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर, मुरादाबाद से संबद्ध है।

 

दुर्लभ ऑपरेशन का प्रतिफल चमत्कारिक 

यदि दुर्भाग्यवश यानी जन्मजात- पोलियो या किसी दुर्घटनावश आपके अपने परिजनों- बच्चों या बड़ों में हाथ या पैर में टेढ़ापन है तो यकीनन डॉ. अरोड़ा उनके लिए किसी देवदूत से कम नहीं हैं। एमएस में गोल्ड मेडलिस्ट डॉ. अरोड़ा के हाथों में बेमिसाल सफाई है। हजारों मरीज उनके मुरीद हैं तो डॉ. अरोड़ा भी सालों-साल बाद उन्हें विस्मृत नहीं करते हैं। गुफ्तगू में न तो नौ माह के ऑपरेशन भूलते हैं, न ही किसी उम्र दराज का। दुर्लभ से दुर्लभ ऑपरेशन का प्रतिफल भी किसी मिरकल के मानिंद है। 


बकौल डॉ. अरोड़ा अपंगता की होती हैं तीन श्रेणियां


डॉ. अरोड़ा बताते हैं, कोई भी बाय बर्थ विकलांग हो सकता है। किसी हादसे में उसका कोई अंग भंग हो सकता है या किसी बीमारी की चपेट में आकर वह हैंडीकैप्ड हो सकता है। मोटे तौर पर यह धारणा रहती है, लाखों-करोड़ों के मेडिकल खर्च के बाद भी हमारा परिजन सेहतमंद नहीं हो पाएगा, लेकिन प्रसिद्ध हड्डी रोग विशेषज्ञ कहते हैं, ये सब मिथक हैं। डॉ. अरोड़ा कहते हैं, टीएमयू में ऐसे ऑपरेशन हजारों के खर्च में ही हो जाते हैं। ऐसा उनके ट्रीटमेंट से सेहतमंद हुए मरीज और उनके परिजन भी मानते हैं। बस जरूरत है तो सही समय पर सही डॉक्टर और सही हॉस्पिटल के चयन की। 


हाथ-पैरों के टेढ़ेपन के दो कारण


डॉ. अरोड़ा कहते हैं, किसी के भी हाथ या पैर के टेढ़ेपन के दो कारण होते हैं- पोलियो और सेरेब्रल पाल्सी। डॉक्टर का साफ मानना हैं, डिलीवरी गैर अनुभवी नर्स से कराने पर बच्चे के अपंग होने की आशंका रहती है, इसीलिए डिलीवरी प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ से ही कराई जानी चाहिए। यह सच है, पोलियो देश और दुनिया से लगभग अलविदा हो गया है। मौजूदा वक्त में डिलीवरी के समय सेरेब्रल पाल्सी ही शारीरिक अक्षमता का कारण है। ऐसे में डिलीवरी के वक्त बेहद सतर्क रहने की जरूरत है।


आत्मविश्वास से लबरेज हो जाते हैं अपंग


डॉ. अरोड़ा भी अपंगों के लिए किसी भगवान से कम नहीं हैं। वे न केवल अपंगों के अंगों को नया रूप देते हैं बल्कि अपने पेशेंट को एक नया जीवन और आत्मसम्मान से जीने योग्यता भी देते है। मसलन, डॉ. अरोड़ा उसकी अपंगता को दूर करके उसे शारीरिक रूप से सक्षम बनाते हैं, जिससे वह दूसरों पर निर्भर न रहकर स्वंय सामाजिक और आर्थिक रूप से भी आत्मनिर्भर बन सकें।


ज्वाइंट रिप्लेसमेंट वरदान


ऑर्थोपेडिक्स डिपार्टमेंट के हेड प्रो. अमित सराफ कहते हैं, नी और हिप रिप्लेसमेंट कराते वक्त घबराने की कोई जरूरत नहीं है। इनके ऑपरेशन 100 प्रतिशत कामयाब हैं। आंकडे़ बताते हैं, पुरूषों की अपेक्षा महिलाओं में यह बीमारी ज्यादा है, क्योंकि चौका-बर्तन से लेकर दिन में कई मर्तबा उन्हें घुटनों के बल बैठना होता है। इससे महिलाओं की हड्डियां कमजोर हो जाती हैं। प्रो. सराफ बताते हैं, यदि हम ओपीडी में 200 मरीजों को रोज देखते हैं तो 40 प्रतिशत महिलाओं को घुटने और कूल्हे की शिकायत रहती है। तीर्थंकर महावीर हॉस्पिटल और रिसर्च सेंटर का ऑर्थोपेडिक्स विभाग ऐसे रोगियों के लिए हर सोमवार और वृहस्पतिवार को स्पेशल ड्राइव चलाता है। ऑपरेशन की सफलता को लेकर शक की कोई गुंजाइश नहीं है। नी और हिप के रिप्लेसमेंट को मेडिकल साइंस का वरदान बताते हुए कहते हैं, ऑपरेशन के दूसरे दिन पेशेंट चलने-फिरने लगता है। पांच या छह दिन बाद उसे डिस्चार्ज कर दिया जाता है।

प्रो. सराफ कहते हैं, स्माल इनसिश़न सर्जरी से लेकर ट्रामा सर्जरी, स्पाइन सर्जरी, दूरबीन सर्जरी की सहूलियत अस्पताल में मौजूद हैं। जो ज्यादा कारगर होने के बावजूद सस्ता बेहतर उम्दा और सटीक ईलाज हैं. 


शुक्रवार, 3 जून 2022

जन्मकुंडली के 12 स्थानों के भाव चरित्र / आत्म स्वरूप सिन्हा

 ज्योतिष में मान्य बारह राशियों के आधार पर जन्मकुंडली में बारह भावों की रचना की गई है। प्रत्येक भाव में मनुष्य जीवन की विविध अव्यवस्थाओं, विविध घटनाओं को दर्शाता है। आइए इनके बारे में विस्तार से जानें।


1. प्रथम भाव : यह लग्न भी कहलाता है। इस स्थान से व्यक्ति की शरीर यष्टि, वात-पित्त-कफ प्रकृति, त्वचा का रंग, यश-अपयश, पूर्वज, सुख-दुख, आत्मविश्वास, अहंकार, मानसिकता आदि को जाना जाता है।


2. द्वितीय भाव : इसे धन भाव भी कहते हैं। इससे व्यक्ति की आर्थिक स्थिति, परिवार का सुख, घर की स्थिति, दाईं आँख, वाणी, जीभ, खाना-पीना, प्रारंभिक शिक्षा, संपत्ति आदि के बारे में जाना जाता है।

. तृतीय भाव : इसे पराक्रम का सहज भाव भी कहते हैं। इससे जातक के बल, छोटे भाई-बहन, नौकर-चाकर, पराक्रम, धैर्य, कंठ-फेफड़े, श्रवण स्थान, कंधे-हाथ आदि का विचार किया जाता है।


4. चतुर्थ स्थान : इसे मातृ स्थान भी कहते हैं। इससे मातृसुख, गृह सौख्‍य, वाहन सौख्‍य, बाग-बगीचा, जमीन-जायदाद, मित्र छाती पेट के रोग, मानसिक स्थिति आदि का विचार किया जाता है।


5. पंचम भाव : इसे सुत भाव भी कहते हैं। इससे संतति, बच्चों से मिलने वाला सुख, विद्या बुद्धि, उच्च शिक्षा, विनय-देशभक्ति, पाचन शक्ति, कला, रहस्य शास्त्रों की रुचि, अचानक धन-लाभ, प्रेम संबंधों में यश, नौकरी परिवर्तन आदि का विचार किया जाता है।


6. छठा भाव : इसे शत्रु या रोग स्थान भी कहते हैं। इससे जातक के श‍त्रु, रोग, भय, तनाव, कलह, मुकदमे, मामा-मौसी का सुख, नौकर-चाकर, जननांगों के रोग आदि का विचार किया जाता है।

सातवाँ भाव : विवाह सौख्य, शैय्या सुख, जीवनसाथी का स्वभाव, व्यापार, पार्टनरशिप, दूर के प्रवास योग, कोर्ट कचहरी प्रकरण में यश-अपयश आदि का ज्ञान इस भाव से होता है। इसे विवाह स्थान कहते हैं।


आठवाँ भाव : इस भाव को मृत्यु स्थान कहते हैं। इससे आयु निर्धारण, दु:ख, आर्थिक स्थिति, मानसिक क्लेश, जननांगों के विकार, अचानक आने वाले संकटों का पता चलता है।


नवाँ भाव : इसे भाग्य स्थान कहते हैं। यह भाव आध्यात्मिक प्रगति, भाग्योदय, बुद्धिमत्ता, गुरु, परदेश गमन, ग्रंथपुस्तक लेखन, तीर्थ यात्रा, भाई की पत्नी, दूसरा विवाह आदि के बारे में बताता है।


दसवाँ भाव : इसे कर्म स्थान कहते हैं। इससे पद-प्रतिष्ठा, बॉस, सामाजिक सम्मान, कार्य क्षमता, पितृ सुख, नौकरी व्यवसाय, शासन से लाभ, घुटनों का दर्द, सासू माँ आदि के बारे में पता चलता है।


ग्यारहवाँ भाव : इसे लाभ भाव कहते हैं। इससे मित्र, बहू-जँवाई, भेंट-उपहार, लाभ, आय के तरीके, पिंडली के बारे में जाना जाता है।


बारहवाँ भाव : इसे व्यय स्थान भी कहते हैं। इससे कर्ज, नुकसान, परदेश गमन, संन्यास, अनैतिक आचरण, व्यसन, गुप्त शत्रु, शैय्या सुख, आत्महत्या, जेल यात्रा, मुकदमेबाजी का विचार किया जाता है।

गुरुवार, 2 जून 2022

एक थे सेठ गंगाराम ....

प्रस्तुति - उषा रानी / राजेंद्र प्रसाद सिन्हा 


विभाजन पूर्व देश के बहुत बड़े धन्नासेठ थे गंगाराम। मूलतः वह एक सिविल इंजीनियर व आर्किटेक्ट थे।वो इतने बड़े धन्नासेठ थे कि लाहौर का हाईकोर्ट, लाहौर का सबसे बड़ा अस्पताल, लाहौर का आर्ट्स कॉलेज, लाहौर का म्यूजियम, लाहौर का सबसे बड़ा कॉलेज एचिसन कॉलेज और केवल लाहौर नहीं बल्कि पाकिस्तान में मानसिक रोगियों का सबसे बड़ा अस्पताल फाउंटेन हॉउस भी धन्नासेठ गंगाराम ने अपने धन से ही बनवाया था। उनके द्वारा बनवाए गए उपरोक्त संस्थानों का भरपूर लाभ लाहौर समेत पाकिस्तान वाले पंजाब अर्थात आधे से अधिक पाकिस्तान के नागरिक आज भी ले रहे हैं। गंगाराम तो बिचारे 1926 में ही मर गए थे। लेकिन 1947 में जब भारत विभाजित हुआ तो लाहौर के शांतिप्रिय सेक्युलर समाज ने गंगाराम को उनकी मौत के 21 बरस बाद भी बख्शा नहीं। पाकिस्तान बनते ही सेक्युलर समाज की भीड़ ने लाहौर के मॉल रोड पर लगी हुई गंगाराम की मूर्ति को घेर कर उस पर अंधाधुंध लाठियां बरसाते हुए मूर्ति को बुरी तरह क्षत विक्षत कर दिया। लेकिन उस भीड़ की गंगा जमुनी तहजीब और सेक्युलरिज्म की आग फिर भी ठंढी नहीं हुई तो उसने गंगाराम की मूर्ति पर जमकर कालिख पोती और मूर्ति को फ़टे पुराने जूतों की माला पहना कर अपने सेक्युलरिज्म की आग को भीड़ ने ठंढा किया।


1947 के धार्मिक दंगों के दौरान घटी उपरोक्त घटना का जिक्र उर्दू के मशहूर साहित्यकार सआदत हसनi मंटो ने अपनी बहुचर्चित लघुकथा "गारलैंड" में कुछ इस तरह किया है... "हुजूम ने रुख़ बदला और सर गंगाराम के बुत पर पिल पड़ा। लाठीयां बरसाई गईं, ईंटें और पत्थर फेंके गए। एक ने मुँह पर तारकोल मल दिया। दूसरे ने बहुत से पुराने जूते जमा किए और उन का हार बना कर बुत के गले में डाल दिया। तब तक वहां पुलिस आ गई और गोलियां चलना शुरू हुईं। बुत को जूतों का हार पहनाने वाला जखम हो गया। चुनांचे मरहम पट्टी के लिए उसे सर गंगाराम हस्पताल भेज दिया गया।"


केवल गंगाराम ही नहीं, लाहौर में अपनी पत्नी के नाम से पाकिस्तान का सबसे बड़ा चेस्ट हॉस्पिटल, गुलाब देवी चेस्ट हॉस्पिटल बनवाने वाले लाला लाजपत राय की मूर्ति के साथ भी यही व्यवहार किया गया और उसे उखाड़ कर फेंक दिया गया। हालांकि लाला जी की मृत्यु 19 साल पहले 1926 में ही हो चुकी थी।

तथाकथित "गंगा जमुनी" तहजीब और सेक्युलरिज्म का डांस करने वाले मीडिया का कोई सेक्युलर डांसर क्योंकि आपको धन्नासेठ गंगाराम औऱ लाला लाजपत राय जी की उपरोक्त कहानी कभी नहीं सुनाएगा बताएगा। इसलिए आवश्यक है कि इस कहानी को हम आप जन जन तक पहुंचाएं और उन्हें बताएं कि अपनी "गंगा जमुनी" तहजीब और "सेक्युलरिज्म" की भयानक आग से बंगाल को जलाकर राख करने पर उतारू शांतिप्रिय सेक्युलर नागरिक कितने अहसानफरामोश कितने कमीने, कितने कृतघ्न और कितने जहरीले होते हैं। इसका एहसास सिर्फ कश्मीर से मारे गए हिंदू ही कर पा रहे हैं बाकी लोग तो मस्त सो रहे हैं


अंत में यह उल्लेख अवश्य कर दूं कि #दिल्ली_स्थित_सर_गंगाराम_हॉस्पिटल भी लाहौर के उन्हीं धन्नासेठ गंगाराम ने ही बनवाया था।

सच को पहचाने समझे और एहसास करें कि आप हजारों साल गुलाम क्यों रहे?

*गंगा जमुनी तहजीब आपको निभानी है, वह भाई हैं और आप उनका चारा है वह उनकी इच्छा है कि वह उसे कब खाते हैं*

अद्भुत जज्बे क़ो सलाम ( चमत्कार )

 ऐसे भी मर्द होते हैं _

इस बार UPSC में एक पुनर्जन्म पाया व्यक्ति भी चयनित हुआ! 


(वह मरा नहीं, आईएएस बन गया!) 


जी हाँ, यह कोई अंधविश्वास नहीं, जीती-जागती सच्चाई है। किसी के शरीर में सात गोलियाँ दाग दी जायँ और उसकी लगभग मृत्यु हो गयी हो, तब वह जीवन में कोई अप्रत्याशित सफलता पाकर दिखाये तो क्या कहिएगा?


इस प्रसंग में चमत्कार और दैवी वरदान के विश्वास की प्रबल संभावना है। हालाँकि है यह नितांत लौकिक संघर्ष और नैतिक साहस की कथा। इसलिए ज़रा ठहरकर इसपर गौर करना आवश्यक है। 


रिंकू राही पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। 2007 में वे मुज़फ़्फ़रनगर में पीसीएस अधिकारी थे। युवा अधिकारी में नैतिकता और ईमानदारी का भूत सवार था। उसने देखा कि 100 करोड़ रुपये का स्कालरशिप घोटाला धड़ल्ले से चल रहा है। उसने इस घोटाले को उजागर किया। स्वभावत: इतनी बड़ी रक़म का घोटाला सरकारी अधिकारियों और बाहरी माफिया की मिलीभगत से चल रहा था। 


ये सब रिंकू राही पर बौखला गये। 2009 में अपराधियों द्वारा उन्हें गोलियों से भून दिया गया। उनके शरीर में सात गोलियाँ घुसीं। इनमें तीन उनके चेहरे पर लगी थीं। चेहरा बिगड़ गया। एक आँख जाती रही। एक कान चला गया। 


पर रिंकू बच गये। चार महीने अस्पताल में रहने के बाद जब वे वापस लौटे तो उन्होंने निश्चय किया कि अपनी शक्ति बढ़ाने की ज़रूरत है। यह शक्ति माफिया बनकर फ़िल्मी तरीक़े से नहीं, प्रशासन में बेहतर स्थिति हासिल करके बढ़ायी जा सकती है। उन्होंने यूपीएससी की तैयारी शुरू की। इस साल जब हम सब जामिया के प्रशिक्षण केंद्र से आकर यूपीएससी में पहले तीनों स्थान लेने पर रिचा शर्मा और दो अन्य बच्चियों की सफलता का आनंद ले रहे हैं, तब इसी के साथ 683वें  स्थान पर आईएएस की परीक्षा पास करने वाले रिंकू राही को भुला नहीं सकते—उनकी सफलता कम प्रेरणादायी और आनंदप्रद नहीं है। 


रिंकू पर हत्या के इरादे से गोली चलाने वालों में आठ लोग गिरफ़्तार हुए। उनमें चार को 10-10 साल की सज़ा हुई। इस संघर्ष में रिंकू राही को बहुत पीड़ादायक अनुभवों से गुजरना पड़ा। उनका कहना है कि “मैं व्यवस्था से नहीं लड़ रहा था, व्यवस्था मुझसे लड़ रही थी!” यह बात कितनी सच है, आप स्वयं सोचिए कि चार महीने इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती रहने का चिकित्सकीय अवकाश (मेडिकल लीव) आज तक स्वीकार नहीं हुआ है!!


रिंकू राही अब 40 वर्ष के हैं। पंद्रह साल पहले जब उनपर गोलियाँ चली थीं, तब वे 25 साल के थे। तब से उत्तर प्रदेश में आने वाली सरकारों ने उनके साथ बेरहमी का ही बर्ताव किया। 


उन्हें मारने की कोशिश मायावती की बसपा सरकार के समय हुई थी। 


अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार ने उन्हें भ्रष्टाचार पर बहुत ज़्यादा विरोध करने के नाते पागलखाने भेज दिया था। 


यूपीएससी ने किसी-किसी वर्ग के लिए आयुसीमा में छूट दी थी। रिंकू गोली लगने के बाद विकलांग श्रेणी में आ गये हैं जिनके लिए यूपीएससी में 42 वर्ष की अर्हता आयु है। इसका लाभ रिंकू राही को मिला। 


इस नौजवान का जीवन पहले से संघर्षपूर्ण रहा है। पिता दस साल के थे, तभी दादाजी का निधन हो गया। दादी ने किस तरह परिवार पाला होगा, उसका वृत्तांत रोमांचक है। पिता पढ़ने में बहुत अच्छे थे लेकिन परिवार चलाने में दादी का साथ दिये बिना चारा नहीं था। पढ़ाई ढंग से और नियमित रूप में नहीं हो सकती थी। अपने विकासकाल में रिंकू ने अनुभव किया कि अगर सरकारी अधिकारी ईमानदार हों तो ग़रीबों के लिए चलने वाली योजनाओं का लाभ सचमुच लोगों को प्राप्त हो। 


बहरहाल, अब रिंकू स्वयं आईएस अधिकारी हैं। अपने आदर्शों और सपनों को क्रियान्वित करें, प्रशासन को ईमानदार ही नहीं, संवेदनशील बनाने में भी जो भूमिका निभा सकते हैं, निभाएँ। तंत्र और व्यवस्था के भीतर व्यक्तिगत प्रभाव की सीमाएँ होती हैं। लेकिन व्यक्तिगत प्रयत्न भी महत्व रखते हैं, इसमें संदेह नहीं। 


रिंकू का जीवन प्रसंग मौत से लड़कर और फिर व्यवस्था से लड़कर अनोखी उपलब्धि का उदाहरण है। इसमें आस्तिक और धर्मभीरु मन के लिए चमत्कारिक व्याख्या की बड़ी गुंजाइश है लेकिन दूसरी तरफ़ मृत्यु को चुनौती देकर ईमानदारी के लिए संघर्ष की अदम्य प्रेरणा भी है। 


मैं इस मृत्युंजय युवक को बधाई और शुभकामना देता हूँ कि वह अपने बड़े ध्येय में सफल हों ।


✍..Nishakant Pandey

ब्रज चौरासी कोस की, परिक्रमा एक देत।

 🌼व्रज 84 कौस - 66 अरब तीर्थ🌼

वृंदावन, मथुरा, गौकुल, नँदगांव, बरसाना, गोवर्धन सहित वें सभी जगह जहाँ श्री कृष्ण जी का बचपन बीता और आज भी जहाँ उनको महसूस किया जा सकता है जैसे कि सांकोर आदि में वह सब बृज 84 कोस का हिस्सा है। 


ब्रज चौरासी कोस की, परिक्रमा एक देत।

लख चौरासी योनि के, संकट हरि हर लेत।।


वृंदावन के वृक्ष कों, मरम ना जाने कोय।

डाल-डाल और पात पे, श्री राधे-राधे होय।।


आइए जानते हैं इसके बारे में विस्तार से।


वेद-पुराणों में ब्रज की 84 कोस की परिक्रमा का बहुत महत्व है, ब्रज भूमि भगवान श्रीकृष्ण एवं उनकी शक्ति राधा रानी की लीला भूमि है। इस परिक्रमा के बारे में वारह पुराण में बताया गया है कि पृथ्वी पर 66 अरब तीर्थ हैं और वे सभी चातुर्मास में ब्रज में आकर निवास करते हैं।

कृष्ण की लीलाओं से जुड़े हैं 1100 सरोवरें

ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा मथुरा के अलावा राजस्थान और हरियाणा के होडल जिले के गांवों से होकर गुजरती है। करीब 268 किलोमीटर परिक्रमा मार्ग में परिक्रमार्थियों के विश्राम के लिए 25 पड़ावस्थल हैं। इस पूरी परिक्रमा में करीब 1300 के आसपास गांव पड़ते हैं। कृष्ण की लीलाओं से जुड़ी 1100 सरोवरें, 36 वन-उपवन, पहाड़-पर्वत पड़ते हैं। बालकृष्ण की लीलाओं के साक्षी उन स्थल और देवालयों के दर्शन भी परिक्रमार्थी करते हैं, जिनके दर्शन शायद पहले ही कभी किए हों। परिक्रमा के दौरान श्रद्धालुओं को यमुना नदी को भी पार करना होता है।


इस समय निकलती है परिक्रमा

ज्यादातर यात्राएं चैत्र, बैसाख मास में ही होती है चतुर्मास या पुरुषोत्तम मास में नहीं। परिक्रमा यात्रा साल में एक बार चैत्र पूर्णिमा से बैसाख पूर्णिमा तक ही निकाली जाती है। कुछ लोग आश्विन माह में विजया दशमी के पश्चात शरद् काल में परिक्रमा आरम्भ करते हैं। शैव और वैष्णवों में परिक्रमा के अलग-अलग समय है।


क्या है महत्व?

मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने मैया यशोदा और नंदबाबा के दर्शनों के लिए सभी तीर्थों को ब्रज में ही बुला लिया था। 84 कोस की परिक्रमा लगाने से 84 लाख योनियों से छुटकारा पाने के लिए है। परिक्रमा लगाने से एक-एक कदम पर जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि इस परिक्रमा के करने वालों को एक-एक कदम पर अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। साथ ही जो व्यक्ति इस परिक्रमा को लगाता है, उस व्यक्ति को निश्चित ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।


गर्ग संहिता में कहा गया है कि यशोदा मैया और नंद बाबा ने भगवान श्री कृष्ण से 4 धाम की यात्रा की इच्छा जाहिर की तो भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि आप बुजुर्ग हो गए हैं, इसलिए मैं आप के लिए यहीं सभी तीर्थों और चारों धामों को आह्वान कर बुला देता हूं। उसी समय से केदरनाथ और बद्रीनाथ भी यहां मौजूद हो गए। 84 कोस के अंदर राजस्थान की सीमा पर मौजूद पहाड़ पर केदारनाथ का मंदिर है। इसके अलावा गुप्त काशी, यमुनोत्री और गंगोत्री के भी दर्शन यहां श्रद्धालुओं को होते हैं। तत्पश्चात यशोदा मैया व नन्दबाबाने उनकी परिक्रमा की। तभी से ब्रज में चौरासी कोस की परिक्रमा की शुरुआत मानी जाती है।


यह यात्रा 7 दिनों में पूरी होती है, ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा में आने वाले स्थान इस प्रकार है।


मथुरा से चलकर....

1. मधुवन

2. तालवन

3. कुमुदवन

4. शांतनु कुण्ड

5. सतोहा

6. बहुलावन

7. राधा-कृष्ण कुण्ड

8. गोवर्धन

9. काम्यक वन

10. संच्दर सरोवर

11. जतीपुरा

12. डीग का लक्ष्मण मंदिर

13. साक्षी गोपाल मंदिर

14. जल महल

15. कमोद वन

16. चरन पहाड़ी कुण्ड

17. काम्यवन

18. बरसाना

19. नंदगांव

20. जावट

21. कोकिलावन

22. कोसी

23. शेरगढ

24. चीर घाट

25. नौहझील

26. श्री भद्रवन

27. भांडीरवन

28. बेलवन

29. राया वन

30. गोपाल कुण्ड

31. कबीर कुण्ड

32. भोयी कुण्ड

33. ग्राम पडरारी के वनखंडी में शिव मंदिर

34. दाऊजी

35. महावन

36. ब्रह्मांड घाट

37. चिंताहरण महादेव

38. गोकुल

39. लोहवन

40. वृन्दावन के मार्ग में आने वाले तमाम पौराणिक स्थल हैं।


।। जय जय श्री राधेश्याम  ।।


 🌼सत्य सनातन धर्म की जय 🌼

बुधवार, 1 जून 2022

आज़मगढ़ में मुलायम क़ो कठोर जमीन की तलाश / अरविंद कुमार सिंह

 नज़रिया/ आकलन :

पहले निष्कासन का दंश, अब यशवंत को आजमगढ़ से सांसद बनाने की सोच रही है भाजपा? 


० दिल्ली दूर है या पास, यह तो यशवंत का सियासी भविष्य तय करेगा, लेकिन आज योगी फेक्टर उनके पक्ष में है.


० सपा से डिम्पल और बसपा से जमाली हो सकतें हैं प्रत्याशी.


० विरोध और भाजपा से निष्कासन के बाद भी बेटे विक्रांत को आजमगढ़-मऊ क्षेत्र से एमएलसी बनाने में सफल


० चन्द्रशेखर की दीक्षा और संस्कार राजनीतिक पूंजी, तो योगी के बेहद करीबी लोगो में हैं यशवंत


@डॉ अरविंद सिंह

आजमगढ़  लोकसभा उपचुनाव की दुंदुभि बज चुकी है आगामी 23 जून को मतदान और 26 को मतगणना की तिथि तय है. सपा प्रमुख और आजमगढ़ के सांसद रहे अखिलेश यादव के विधान सभा चुनाव 2022 में करहल सीट से उत्तर प्रदेश के विधानसभा में पहुंचने पर उन्होंने आजमगढ़ लोकसभा सीट से इस्तीफा दे दिया था, जिससे रिक्त हुई इस लोकसभा सीट पर उपचुनाव होना है. सपा, बसपा और भाजपा से आधिकारिक प्रत्याशियों की सूची अभी आनी बाकी है, लेकिन जो सत्ता के गलियारों और दलीय सूत्रों के हवाले से कयास लगाएं जा रहे हैं और जो ख़बरें आ रही हैं, उसके मुताबिक सपा से मुलायम परिवार का ही कोई प्रत्याशी आ सकता है, बहुत संभव हो, उनकी बहु और अखिलेश की पत्नी डिम्पल यादव को भी आजमगढ़ के चुनावी समर में उतारा जा सकता है. क्योंकि विधानसभा की दसों सीट पर सपा का कब्जा है. लेकिन विधानसभा और लोकसभा के चुनाव में मुद्दे और प्राथमिकताओं में बहुत अंतर होता है.

वहीं बसपा में पुनः वापसी कर चुके शाह आलम उर्फ़ गुड्डू जमाली ने घरवापसी से पहले ही उपचुनाव के लिए ताल ठोक दिया था, इसके पहले वे बसपा में रहते हुए मुबारकपुर सीट से लगातार विधायक रहे हैं, पार्टी ने उन्हें विधानमंडल दल का नेता भी बनाया था.

 2022 के विधानसभा के चुनाव में उन्हें यह सीट गंवानी पड़ी. वे आजमगढ़ लोकसभा सीट पर पहले भी बसपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े और मुलायम सिंह यादव के लिए मुश्किलें खड़ी कर चुके हैं. बहुत संभव है इस उपचुनाव में बसपा उन्हें एकबार फिर अपना प्रत्याशी बना, चुनावी मैदान में उतार दे.

वहीं देश और दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा से अनेक नामों पर चर्चा चल रही है, लेकिन जिस नाम पर लोग ज्यादा गंभीर हैं, वह योगी के बेहद करीबी एमएलसी यशवंत सिंह हैं.18 वीं विधानसभा के चल रहे बजट सत्र में भी विधानसभा के भीतर योगी के बेहद करीबी लोगों में शामिल यशवंत की एक फोटो सोशल मीडिया में भी खुब वायरल हो रही है. जिसमें योगी और वित्तमंत्री के साथ यशवंत सिंह भी हैं. यह फोटो वित्त बजट पेश करने जाते समय की है.

उच्च पदस्थ सूत्रों की माने तो योगी ने यशवंत सिंह को आजमगढ़ लोकसभा सीट से उपचुनाव में उतारने का मन बना लिया है. पार्टी का भी एक धड़ा ऐसा चाहता है, देखने वाली बात यह होगी की पार्टी की आम सहमति यशवंत सिंह को लेकर कब तक बन पाती है.


०आखिर कौन हैं यशवंत सिंह और क्या है उनकी राजनीतिक जमीन? :


देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के दारुलशफा का बी- ब्लॉक का 37/38 कमरा यूँ तो उत्तर प्रदेश के राज्य सम्पत्ति विभाग की सम्पत्ति है. लेकिन इसकी पहचान पिछले कई दशक से दूसरी है- यहाँ जो जनप्रतिनिधि रहता है, उसे दशक भर पहले अपनी आंखों से देखा था- एक-एक कमरे में जाना और वहाँ क्षेत्र और देहात या दूसरे जिलों से भी अपने कार्य के लिए आयी जनता एवं आगंतुकों से यह पूछना-' कि वह भोजन की है या नहीं, सोने के लिए विस्तर मिला है की नहीं, उसे किस तरह की मदद की जरूरत है.' और फिर यह जनसेवक उसकी मदद कर देता, बिना यह जाने की वह किस जाति, धर्म या क्षेत्र से ताल्लुक रखता है, वह उसका वोटर भी है या नहीं. तीन या चार सौ किमी दूर राजधानी में कोई आप से इस अपनेपन से यदि पूछता है और यह क्रम नियमित चलता है तो उसे आप किस नज़र से देखेंगे. आप की नज़र और नज़रिया चाहे जो हो, लेकिन यह साधारण से दिखने वाला असाधारण जनप्रतिनिधि कोई और नहीं हमारे समय के भाजपा से निष्कासित एमएलसी यशवंत सिंह हैं, जिसने भाजपा और सपा के दिग्गज प्रत्याशियों के बीच निर्दल अपने पुत्र विक्रांत सिंह रिशू को एमएलसी बना कर आजमगढ़- मऊ स्थानीय निर्वाचन क्षेत्र में बहुतों की राजनीतिक ताकत और चाणक्य बनने के सपनों को पानी फेर दिया. 

दरअसल यह जीत केवल विक्रांत भर की नहीं है, यह उस सोच और सिद्धांत की भी जीत है, जिसे यशवंत ने अपने राजनीतिक गुरु चन्द्रशेखर से संस्कारों में पाया. वक्त़ चाहे जितना नाजुक हो, हालात चाहे जितना मुश्किल भरा हो, परिस्थितियों का डटकर, और निडर होकर सामना करना चाहिए. अपनी गैरत और अस्मत की कीमत पर सोने का ताज भी मिले तो उसे लात मार देना चाहिए. 

तमाम विरोधों और दल से निष्कासन के बाद भी मिली जीत और इस जीत का जश्न मनाने से पहले यशवंत को जानने की कोशिश भी करनी चाहिए, खासतौर पर आज की पीढ़ी को, जिसे सबकुछ तत्क्षण और तत्काल चाहिए. इंतज़ार और संघर्ष जिनके लिए गैरजरूरी चीज लगती है. जिस विक्रांत को आज सभी एमएलसी के रूप में जान रहे हैं. कोई पांच बरस पहले तक उनकी पहचान कुछ खास लोगों तक ही थी, मऊ जिले की सुल्तानपुरी क्षेत्र से जब उन्होंने महाप्रधानी के लिए पर्चा भरा तो यही यशवंत, जो उनके पिता भी हैं, पूरे चुनाव में प्रचार करना तो दूर आजमगढ़ और मऊ में पग तक नहीं रखा, मुख्यालय लखनऊ छोड़ा तक नहीं, कारण उन्होंने तय कर दिया था- अगर किसी को चुनावी प्रक्रिया और राजनीति में आना है तो उसे अपने हिस्से का संघर्ष स्वयं करना होगा, अपने  पांव के छाले और दर्द को स्वयं महसूसना होगा. वह चाहे मेरा पुत्र ही क्यों न हो.. और उनके बेटे ने पूरे चुनाव में डगर-डगर पग -पग अपने क्षेत्र को मापा, लोगों से समर्थन और आशीर्वाद मांगा... और महाप्रधान बन गया.

बेटे की मेहनत देख.. यशवंत के अतीत के दिन बहुतों को याद आ जाते हैं- जब एक नौजवान इंजीनियर देश की सेवा के लिए चन्द्रशेखर जी के आह्वान  पर राजनीति में आता है. मुबारकपुर विधानसभा को पैदल चल अपने पगों से माप देता है. एक चप्पल जो सुबह पहनते शाम तक टूट जाती, इतना पैदल चलते, चिरैयाकोट के विजई, जहानागंज के भानू (जो अब होमगार्ड में हैं) , स्कूटर पर बैठकर क्षेत्र में निकल जातें,लोगों से मिलते, शाम को दूर कहीं गांव देहात में बत्तियां जलती दिखाई देती या बाजा बजता सुनाई देता तो वहा पहुंच जाते और भानु लोगों के बीच परिचय कराते- ये यशवंत सिंह है, युवा हैं, राजनीति में आए हैं. लपसीपुर के रघुपति सिंह और समेंदा के सुभाष सिंह, ने यशवंत सिंह का आखिरी समय तक साथ दिया. और यशवंत ने अपने लोगों का भरपूर साथ और समर्थन ही नहीं किया बल्कि सामर्थ्यवान भी बनाया. सुभाष सिंह के न रहने पर अरविंद सिंह भले यशवंत सिंह के निकट पहुंच गयें लेकिन उनके जीवित रहते अरविंद सिंह ने भी सठियांव  ब्लॉक से सुभाष को बड़े भाई सा मान दिया.

जब देश में आपातकाल लगा तो यशवंत इंदिरा गाँधी के तानाशाही के खिलाफ संघर्ष किया और एक लंबा समय जेल में बिताया. लोकतंत्र सेनानी यशवंत के जीवन में परिस्थितियां बस दलों का आगमन होता रहा लेकिन उनके दिल में सदा अपनों के लिए पीड़ा और चिंता रही. उनके मूल सिद्धांतों में कोई खास परिवर्तन नहीं दिखा. वे पहले भी विचारों से सोशलिस्ट थे और आज भी. धर्म से ऊपर मानवता को हमेशा से तरजीह दिया. एक बार जब वे समाजवादी पार्टी में थे, और उनके एम एल सी का कार्यकाल समाप्त हो रहा था. पार्टी के संसदीय दल की बैठक मुलायम सिंह के अध्यक्षता में हो रही थी. यशवंत सिंह की सीट पर प्रोफेसर रामगोपाल यादव किसी अपने को एम एल सी बनवाने की रणनीति पर थे. बैठक में शिवपाल यादव, रामगोपाल यादव, अखिलेश यादव और सभी प्रमुख नेतागण उपस्थित थे. यशवंत को यह ख़बर लगी.

उन्होंने राज भैया को फोन किया- कहां हैं..? 

उत्तर मिला- रामायण ( राजा भैया की कोठी). पार्टी कार्यालय पहुंचिए. फिर क्या तमतमाये यशवंत, राजा भैया और गाडियों का काफिला सीधे विक्रमादित्य मार्ग पहुंचा. पहुंचते ही मुलायम सिंह यादव खड़े हो गयें और राजा भैया व यशवंत को बैठने के लिए बोले- राजा वह सूची मांगी जो आज इस बैठक में फायनल हो गयी थी. यशवंत सिंह के नाम के आगे रामगोपाल के रिश्तेदार का नाम था. राजा ने उसे क्रास करके उस स्थान पर फिर यशवंत सिंह लिख दिया और बोला-

नेता जी से- किसी को कोई दिग्गत..? कोई और बोलता, मुलायम सिंह ने वक्त की नब़्ज पकड़ी और बोले-- नहीं राजा भैया.. आप लोगो ने कहा हो गया. शायद यह नहीं होता तो उसी दिन समाजवादी पार्टी टूट जाती. यशवंत, राजा भैया, अरविंद सिंह गोप और सूबे क्षत्रिय समाज के बड़े राजनेता ओं ने तय कर लिया था. लेकिन धरती पुत्र मुलायम सिंह हवाओं का रूख पकड़ने में सदैव से माहिर रहे.

  जीवन में सफलता भले न मिले लेकिन उसूलों से समझौता कभी नहीं किया. जिस भाजपा से उन्हें एमएलसी चुनाव में बागी होने का आरोप लगा कर दल से निकाला गया. दरअसल

उस दल में योगी आदित्यनाथ के कारण आएं. उनकी ईमानदारी और राष्ट्रीय भावना को देखकर. यही कारण है कि उन्होंने योगी जी को सीएम के पहले कार्यकाल के लिए अपनी एमएलसी सीट छोड़ दिया. यह अलग बात है कि योगी आदित्यनाथ और भाजपा ने उन्हें फिर से एमएलसी बना दिया.

जिस विक्रांत सिंह की जीत के लिए रणनीति बनी थी और वह एमएलसी बन गयें, उस विक्रांत के विवाहोत्सव में स्वयं योगी आदित्यनाथ गोरखपुर पहुंचकर आशीर्वाद दिए थे.

दारूलशफा  का चन्द्रशेखर चबूतरा आज भी अपने नेता चन्द्रशेखर की याद में उन्हीं सिद्धांतों के साथ हर आगंतुक की सेवा करने के लिए तत्पर रहता है. जिसके संचालक और संवाहक यशवंत सरीखे शिष्य हैं. भाजपा यशवंत सिंह और  विक्रांत सिंह का उपयोग किस रूप में करती है यह तो वक़्त बताएगा लेकिन योगी आदित्यनाथ से संबंधों की तासीर किसी से छिपी नहीं है...और उसी कड़ी में इस उपचुनाव में आजमगढ़ लोकसभा सीट पर उन्हें प्रत्याशी बनाया जा सकता है.

यशवंत सिंह की भी आखिरी सियासी हसरत देश की सबसे बड़ी पंचायत में पहुंचने की है. जिसे वे अपनों के बीच कई बार साझा कर चुके हैं. अब यशवंत के लिए दिल्ली दूर है या पास यह तो वक्त बताएगा, लेकिन दिल्ली पहुंचने की पहली बांधा टिकट पाने की है, जिसे सूत्रों के मुताबिक उन्होंने लगभग पार कर लिया है..

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