पत्रकारिता (मीडिया) का प्रभाव समाज पर लगातार बढ़ रहा है। इसके बावजूद यह पेशा अब संकटों से घिरकर लगातार असुरक्षित हो गया है। मीडिया की चमक दमक से मुग्ध होकर लड़के लड़कियों की फौज इसमें आने के लिए आतुर है। बिना किसी तैयारी के ज्यादातर नवांकुर पत्रकार अपने आर्थिक भविष्य का मूल्याकंन नहीं कर पाते। पत्रकार दोस्तों को मेरा ब्लॉग एक मार्गदर्शक या गाईड की तरह सही रास्ता बता और दिखा सके। ब्लॉग को लेकर मेरी यही धारणा और कोशिश है कि तमाम पत्रकार मित्रों और नवांकुरों को यह ब्लॉग काम का अपना सा उपयोगी लगे।
गुरुवार, 28 जुलाई 2022
बुधवार, 27 जुलाई 2022
बदलने वाले शिवलिंग*/ कृष्ण मेहता
प्रस्तुति - रेणु दत्ता / आशा सिन्हा
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रोज 3 बार बदलता है शिवलिंग
धौलपुर का यह शिवलिंग दिन में 3 बार अपना रंग बदलता है। शिवलिंग का रंग दिन में लाल, दोपहर को केसरिया और रात को सांवला हो जाता है। ऐसा क्यों होता है इसका जवाब अब तक किसी वैज्ञानिक को नहीं मिल सका है।
कई बार मंदिर में रिसर्च टीमें आकर जांच-पड़ताल कर चुकी हैं। फिर भी इस चमत्कारी शिवलिंग के रहस्य से पर्दा नहीं उठ सका है
भगवान शिव को वेदों और शास्त्रों में परम कल्याणकारी और जगदगुरू बताया गया है।
यह सर्वोपरि तथा सम्पूर्ण सृष्टि के स्वामी हैं। भारत में एक भगवान शिव ही ऐसे हैं जिन्हें कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और गुजरात से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक सभी समान रूप से पूजते हैं. भगवान शिव की मान्यता भी पूरे भारत में समान ही है।
आइये आज पढ़ते हैं शिव भगवान के एक ऐसे चमत्कारिक शिवलिंग की बारे में जो दिन में तीन बार अपना रंग बदलता है. इस मंदिर की महिमा और महत्त्व का आज तक लोगों को पता नहीं होने की वजह से लोग यहाँ कम संख्या में ही पहुँच पाते हैं।
अगर आप भगवान शिव के ‘अचलेश्वर महादेव’ मंदिरो को खोजते हैं तो आप इस नाम से पूरे भारत में कई मंदिरों को देख सकते हैं. किन्तु यदि आप चमत्कारिक, रंग बदलने वाले शिवलिंग को खोजते हैं तो आप राजस्थान के धौलपुर जिले में स्थित ‘अचलेश्वर महादेव’ मन्दिर के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं. धौलपुर जिला राजस्थान और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित है।
यह इलाका चम्बल के बीहड़ों के लिये भी प्रसिद्ध है। कभी यहाँ बागी और डाकूओं का राज हुआ करता था. इन्ही बीहड़ो में मौजूद है, भगवान अचलेश्वर महादेव का मन्दिर। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है यहां स्थित शिवलिंग दिन मे तीन बार रंग बदलता है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है।
सुबह के समय इसका रंग लाल रहता है तो दोपहर को केसरिया और रात को यह चमत्कारिक शिवलिंग श्याम रंग का हो जाता है। इस शिवलिंग के बारें में एक बात और भी प्रसिद्ध है कि इस शिवलिंग का अंत आज तक कोई खोज नहीं पाया है।
आसपास के लोग बताते हैं कि बहुत साल पहले इस शिवलिंग के रंग बदलने की घटना का पता लगाने के लिए खुदाई हुई थी. तब पता चला कि इस शिवलिंग का कोई अंत भी नहीं है. काफी खोदने के बाद भी इस शिवलिंग का अंत भी नहीं हुआ. तबसे इस शिवलिंग की महिमा और भी बढ़ चुकी है।
अचलेश्वर महादेव के रंग बदलने के पीछे कौन-सा विज्ञान है इस बात के लिए पुरातत्व विभाग भी यहाँ कार्य कर चुका है लेकिन सभी इस ईश्वरीय शक्ति के सामने हार मान चुके हैं।
मंदिर की महिमा का व्याख्यान करते हुए पुजारी बताते हैं कि यहाँ से भक्त खाली नहीं जाते हैं. खासकर युवा लड़के और लड़कियां यहाँ अपने करियर, नौकरी और विवाह संबंधित समस्याओं के साथ आते हैं और यह भगवान शिव की महिमा ही है कि वह सबकी मुरादे पूरी भी करते हैं।
साथ ही साथ पुजारी यह भी बताते हैं कि इस मंदिर का महत्त्व तो हज़ारों सालों से जस का तस है किन्तु फिर भी बहुत अच्छी संख्या में भक्त इसलिए नहीं आ पाते हैं क्योकि यहाँ आने वाला रास्ता आज भी कच्चा और उबड़-खाबड़ है।
आज भी यह एक रहस्य ही है कि इस शिवलिंग का उद्भव कैसे हुआ और कैसे ये अपना रंग बदलता है. भगवान अचलेश्वर महादेव का यह मन्दिर हजारों साल पुराना बताया जाता है। यह शिवलिंग एक प्राचीन चट्टान से बना हुआ है और देखने से ऐसा भी प्रतीत होता है कि जैसे किसी पहाड़ को काटकर यहाँ रख दिया गया है।
अब आप इसे चाहें तो भगवान का चमत्कार भी बोल सकते हो और यदि विज्ञान को मानते हो तो इस बात का पता लगाने के लिए इस पहेली पर काम भी कर सकते हो।
बात चाहे जो भी हो किन्तुयदि आप कभी धौलपुर (राजस्थान) जायें तो एक बार भगवान ‘अचलेश्वरमहादेव’ के दर्शनों का लाभअवश्य उठायें.
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टूटी झरना शिव मंदिर रामगढ़ झारखंड
झारखंड के रामगढ़ में एक मंदिर ऐसा भी है जहां भगवान शंकर के शिवलिंग पर जलाभिषेक कोई और नहीं स्वयं मां गंगा करती हैं. मंदिर की खासियत यह है कि यहां जलाभिषेक साल के बारह महीने और चौबीस घंटे होता है. यह पूजा सदियों से चली आ रही है. माना जाता है कि इस जगह का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है. भक्तों की आस्था है कि यहां पर मांगी गई हर मुराद पूरी होती है.अंग्रेजों के जमाने से जुड़ा है इतिहास
झारखंड के रामगढ़ जिले में स्थित इस प्राचीन शिव मंदिर को लोग टूटी झरना के नाम से जानते है. मंदिर का इतिहास 1925 से जुड़ा हुआ है और माना जात है कि तब अंग्रेज इस इलाके से रेलवे लाइन बिछाने का काम कर रहे थे. पानी के लिए खुदाई के दौरान उन्हें जमीन के अन्दर कुछ गुम्बदनुमा चीज दिखाई पड़ा. अंग्रेजों ने इस बात को जानने के लिए पूरी खुदाई करवाई और अंत में ये मंदिर पूरी तरह से नजर आया.शिव भगवान की होती है पूजा मंदिर के अन्दर भगवान भोले का शिव लिंग मिला और उसके ठीक ऊपर मां गंगा की सफेद रंग की प्रतिमा मिली. प्रतिमा के नाभी से आपरूपी जल निकलता रहता है जो उनके दोनों हाथों की हथेली से गुजरते हुए शिव लिंग पर गिरता है. मंदिर के अन्दर गंगा की प्रतिमा से स्वंय पानी निकलना अपने आप में एक कौतुहल का विषय बना है.
मां गंगा की जल धारा का रहस्य
सवाल यह है कि आखिर यह पानी अपने आप कहा से आ रहा है. ये बात अभी तक रहस्य बनी हुई है. कहा जाता है कि भगवान शंकर के शिव लिंग पर जलाभिषेक कोई और नहीं स्वयं मां गंगा करती हैं. यहां लगाए गए दो हैंडपंप भी रहस्यों से घिरे हुए हैं. यहां लोगों को पानी के लिए हैंडपंप चलाने की जरूरत नहीं पड़ती है बल्कि इसमें से अपने-आप हमेशा पानी नीचे गिरता रहता है. वहीं मंदिर के पास से ही एक नदी गुजरती है जो सूखी हुई है लेकिन भीषण गर्मी में भी इन हैंडपंप से पानी लगातार निकलता रहता है.
दर्शन के लिए बड़ी संख्या में आते हैं श्रद्धालु
लोग दूर-दूर से यहां पूजा करने आते हैं और साल भर मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है. श्रद्धालुओं का मानना हैं कि टूटी झरना मंदिर में जो कोई भक्त भगवान के इस अदभुत रूप के दर्शन कर लेता है उसकी मुराद पूरी हो जाती है. भक्त शिवलिंग पर गिरने वाले जल को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं और इसे अपने घर ले जाकर रख लेते हैं. इसे ग्रहण करने के साथ ही मन शांत हो जाता है और दुखों से लड़ने की ताकत मिल जाती है.
मंगलवार, 26 जुलाई 2022
ललित मोदी क़ो क्या बदल पाएंगी सुष्मिता सेन / विवेक शुक्ला
ललित मोदी अपने घर वालों से लड़ता रहा है. उसकी अपने पिता कृष्ण कुमार मोदी से कभी नहीं बनी. माँ से उसका केस सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. उसकी जिंदगी की कहानी तफ़सील से. आप पढ़ और सुन सकते हैं
मोदी ने जब अपने से दसेक साल बढ़ी और पहले से विवाहित दो बच्चों की मां मीनल से शादी करने की इच्छा के बारे में अपने उद्योगपति पिता कृष्ण कुमार मोदी और मां बीना मोदी को बताया था, तो कहते हैं कि मोदी खानदान में सबके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई थी।
कृष्ण कुमार मोदी ने ललित मोदी को दो टूक शब्दों में कह दिया था कि अगर उन्होंने इस तरह का कोई कदम उठाया, तो वे उन्हें अपनी सारी संपति से बेदखल कर देंगे। एक परंपरावादी मारवाड़ी परिवार को यह कतई स्वीकार नहीं था ललित मोदी एक शादी-शुदा महिला को मोदी खानदान की बहू बनाकर ले आएं। पर जिद्दी ललित मोदी नहीं माने। ललित मोदी ने मीनल को अपनी पत्नी बनाया।
लेकिन मोदी खानदान में क्लेश से बचने के लिए ललित मोदी तब ही मुंबई शिफ्ट कर गए। वे अपने पिता के पैडर रोड वाले एक फ्लैट में रहने लगे। ललित मोदी के माता-पिता मीनल से इसलिए अलग से नाराज थे, क्योंकि वह किसी पार्टी में बीना मोदी से मिली थी। वहां दोनों में मित्रता हुई। उसके बाद मीनल मोदी खानदान के महल जैसे साउथ दिल्ली के महारानी बाग स्थित बंगले में आने लगी। वहां पर ही उसकी ललित मोदी से भी मुलाकात होने लगी। वह मुलाकातें प्यार में बदल गईं और फिर दोनों में तमाम कसमें-वादे हुए शादी से पहले। दोनों के बीच 17 अक्तूबर 1991 को विवाह हो गया। उसमें गिनती के ही लोग मौजूद थे।
आगे बढ़ने से पहले मीनल के माजी पर नजर डालेंगे। मीनल के सिंधी मूल के पिता पेस्सु आसवानी का नाइजीरिया में बिजनेस था। वे बिजनेस के सिलसिले में लंदन आते जाते थे। आसवानी की दो पुत्रियां थीं। छोटी पुत्री मीनल ने नाइजीरिया में रहने वाले जैक सगरानी नाम के मुस्लिम बिजनेसमैन से शादी कर ली। जैक भी लंदन, दुबई, न्यूयार्क में घूमता था। वह एक बार सऊदी अरब में गया तो उसे वहां पर किसी घोटाले के सिलसिले में पकड़ लिया गया। उसे जेल हो गई। वह मीनल के पास तब भी नहीं था जब मीनल पहली बार लंदन में मां बन रही थी। मीनल ने बेटी को जन्म दिया। बेटी का नाम करीमा रखा गया। इसके बाद मीनल और जैक के बीच तलाक भी हो गया और मीनल दिल्ली शिफ्ट कर गई। वह यहां की हाई सोसायटी में मूव करने लगी।
मीनल दिल्ली में मोदी परिवार के ए-1 महारानी बाग वाले बंगले में आने-जाने लगी। यहां पर ही ललित उसकी जिंदगी में आए। मोदी खानदान के करीबी कहते हैं कि ललित मोदी की मनमानी से कृष्ण कुमार मोदी सदमें में आ गए। मोदी खानदान ने तय किया कि ललित मोदी को कृष्ण कुमार मोदी ग्रुप की शानदार कंपनी गोडफ्रे फिलिप के निदेशक मंडल में रख दिया जाए ताकि उन्हें हर महीने एक तय राशि मिलती रहे। इसके अलावा, ललित मोदी से हर तरह के संबंध तोड़ दिए गए। गोडफ्रे फिलिप भारत की सिगरेट का उत्पादन करने वाली विल्स के बाद सबसे बड़ी कंपनी है।
बहरहाल, ललित मोदी के साथ मुंबई में उनकी पत्नी मीनल और उसकी पुत्री करीमा भी रहने लगे। ललित मोदी को लगातार अपने पिता से हर माह पैसा मिल ही रहा था। इसलिए उसकी जिंदगी शानदार तरीके से कट ही रही थी।
मुंबई में रहते हुए ललित मोदी क्रिकेट की दुनिया में दिलचस्पी लेने लगे। अब उन्हें भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसाई) में कोई पद पाने की भी इच्छा होने लगी। कहते हैं, तब उनकी राजस्थान की उस समय की चीफ मिनिस्टर वसुंधरा राजे सिंधिया ने मदद की। सिंधिया की मार्फत ललित मोदी देखते ही देखते राजस्थान क्रिकेट संघ में खास हो गए। वे बीसीआईआई की अंदुरूनी सियासत में शरद पवार खेमें में शामिल हो गए। यही वह समय था जब उन्होंने भारत में आईपीएल का आगाज किया। साल था 2008। आईपीएल ने भारतीय क्रिकेट का चेहरा-मोहरा बदल दिया। उसका श्रेय ललित मोदी को मिलने लगा। पर उसी दौर में ललित मोदी पर तमाम घोटाले करने के आरोप भी लगने लगे। जब लगा कि उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएग तो वह 2010 में लंदन भाग गए। वे तब से वहां पर ही
देखिए वक्त कैसे घूमता है। इस बीच, ललित मोदी की पहली पत्नी से पुत्री करीमा का भारत के शिखर उद्योगपति विवेक बर्मन के पुत्र गौरव से अफेयर हो जाता है। जिस स्थिति से ललित मोदी गुजरे थे मीनल से विवाह के वक्त, उसी स्थिति से दो-चार होना पड़ा गौरव को। डॉबर ग्रुप के चेयरमेन विवेक बर्मन ने अपने पुत्र से दूरी बना ली जब वह करीमा से शादी करके ही माना। वह अपनी पुत्री की शादी में नहीं थे। वे तब तक लंदन पहुंच चुके थे। ललित मोदी के पिता कृष्ण कुमार मोदी का सन 2019 में नई दिल्ली निधन हो गया था। वह तब भी अपने पिता की अंत्येष्टि में शामिल होने के लिए दिल्ली नहीं आये थे। तब एक उम्मीद थी कि वे शायद पिता के अंतिम बार दर्शन करने आएंगे।
कृष्ण कुमार मोदी ने अपने पिता गुजरमल मोदी की 1974 में मृत्यु के बाद मोदी उद्योग समूह को संभाला था। हालांकि आगे चलकर उसमें बंटवारा हुआ। कृष्ण कुमार मोदी की मृत्यु के बाद उनके समूह की कंपनियों को उनके छोटे पुत्र समीर और पुत्री चारू मोदी संभालते हैं। कृष्ण कुमार मोदी ने एक बार इस लेखक को फिक्की सभागार में एक इंटरव्यू के दौरान बताया था मोदी कुनबे का सरनेम गर्ग है, पर मोदी लिखते हैं।
ललित मोदी का तो अपनी मां बीना मोदी के साथ ही संपति विवाद चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने सन 7 दिसंबर 2021 कोदोनों मां- बेटे को सलाह दी थी कि वे मिल-बैठकर अपने सारे मसले हल कर लें। बीना मोदी की तरफ से अभिषेक मनु सिंघवी और हरीश साल्वे पैरवी कर रहे थे।
मतलब साफ है कि ललित मोदी की अपने घर वालों से कभी बनी ही नही। कहते हैं, वे मिनट-मिनट में आवेश में आकर किसी पर भी चीखने लगते हैं। हो सकता है कि सुष्मिता सेन के साथ रहकर वे नरम पड़ें।
अगर बात सुष्मिता सेन की करें तो वह राजधानी के वसंत कुंज के मिडिल क्लास परिवार से आती है। सुष्मिता सेन के पिता एयरफोर्स में थे। सुष्मिता सेन ने एयर फोर्स स्कूल में पढ़ाई की थी। सुष्मिता सेन 1994 में जब मिस यूनिवर्स बनी थीं तब उसका परिवार वसंत कुंज में ही रहता था।
-ललित मोदी और सुष्मिता सेन की फोटो सोशल मीडिया में वायरल होते ही वसंत कुंज में सुष्मिता सेन के कुछ पड़ोसियों को उनके बचपन के दिन याद आने लाजिमी थे। सुष्मिता सेन जब मिस यूनिवर्स बनी थी तो उसके घर के आगे लोग खड़े हो जाते थे उसका दीदार करने के लिए। सुष्मिता सेन का परिवार अब भी वसंत कुंज में रहता है। वहां उसकी सहेलियों के परिवार अब भी रहते हैं। उसकी सहेलियों की शादियां हो चुकी हैं। वह दुर्गा पूजा के मौके पर दिल्ली आती है, तो वसंत कुंज में अपने पेरेनेट्स के साथ ही रहती है।
अपनी शर्तों पर जिंदगी गुजारने वाली सुष्मिता
सुष्मिता सेन 1994 की मिस यूनिवर्स बनने के बाद बॉलीवुड में चली गईं थीं। वहां उन्होंने मैं हूं ना,दस्तक, बीवी नंबर वन, फिजा जैसी फिल्मों में अहम किरदार निभाए। उन्होंने 1997 में महेश भट्ट की फिल्म दस्तक से फिल्मी दुनिया में दस्तक दी थी । दस्तक को सफलता नहीं मिली। पर उनके काम को सबने सराहा। दूसरी फिल्म जोर भी नहीं चली। डेविड धवन की फिल्म बीवी नंबर वन में सुष्मिता सेन ने बीवी नंबर टू का रोल किया और यह उनकी पहली हिट फिल्म साबित हुई। इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस अवार्ड भी मिला। अब देखने वाली बात है कि वो गुस्सैल ललित मोदी को कितना नरम बनाती हैं.
नीचे क्लिक करके सुन भी सकते हैं.
किस राष्ट्रपति की बेटी-दामाद की हुई थी हत्या / विवेक शुक्ला
डॉ.शंकर दयाल शर्मा देश के 25 जुलाई 1992 – 25 जुलाई 1997 तक नवें राष्ट्रपति रहे। उन्होंने राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव में जॉर्ज गिल्बर्ट स्वेल को पराजित किया था। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को पहली बार 1996 में प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलवाई थी। बुद्धिमान और अति विनम्र डॉ.शंकर दयाल शर्मा 1971 में भोपाल सीट से लोकसभा के सदस्य बने और इस तरह उनका दिल्ली से संबंध बन गया। वे 1974 में केन्द्रीय संचार मंत्री बने।
उनके राष्ट्रपति बनने से पहले उनकी बेटी गीतंजली माकन और दामाद ललित माकन की आतंकियों ने कीर्ति नगर में उस समय हत्या कर दी थी जब ये दोनों घर के बाहर थे। यह घटना 31 जुलाई, 1985 की है। ललित माकन साउथ दिल्ली से कांग्रेस के लोकसभा सदस्य थे। वे कांग्रेस के नेता अजय माकन के चाचा थे। जब ये जघन्य कांड हुआ था तब डॉ. शंकर दयाल शर्मा आंध्र प्रदेश के राज्यपाल थे। हत्या का कारण 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए दंगे में माकन की भूमिका को बताया जाता है।ललित माकन सहित अन्य कांग्रेसी नेताओं पर सिखों के खिलाफ दंगा भड़काने के आरोप थे।
31 जुलाई 1985 को कीर्ति नगर में मौजूद अपने निवास पर लोगों से मुलाकात के बाद माकन अपनी कार में बैठ रहे थे तभी मौके पर स्कूटर व ऑटो से आए तीन आतंकियों ने उन पर गोलियों की बौछार कर दी। इस घटना में ललित माकन, उनकी पत्नी गीतांजलि व सहयोगी बाल किशन की मौत हो गई थी जबकि सुरेश मलिक घायल हो गए थे।
बहरहाल, इस भयानक हत्याकांड के कई सालों के बाद डॉ. शर्मा भारत के राष्ट्रपति बने। वे सच्चे गांधीवादी थे। गांधी जी की जयंती और पुण्यतिथि पर वे और उनकी पत्नी श्रीमती विमला शर्मा राजघाट और गांधी स्मृति और दर्शन में अवश्य पहुंचते थे।
डॉ.शंकर दयाल शर्मा का निधन और कंधार कांड
डॉ.शंकर दयाल शर्मा का 26 दिसंबर 1999 में राजधानी में जब निधन हुआ तो देश कंधार कांड से जूझ रहा था। दरअसल इंडियन एयरलाइंस के विमान के अपहरण की घटना के बाद सारा देश हाईजैक विमान में सवार यात्रियों और क्रू मेंबर्स की कुशलता की प्रार्थना कर रहा था। सरकार भी कोशिश कर रही थी कि सारा मामला शांति से हल हो जाए। इसे कंधार कांड के रूप में याद किया जाता है। 24 दिसंबर 1999 को नेपाल से दिल्ली आ रहे एयर इंडिया के विमान का आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया था। विमान में 176 यात्रियों और 11 क्रू मेंबर थे। जब यह सारा मामला चल रहा था तब डॉ. शंकर दयाल शर्मा का निधन हुआ तो उनकी मृत्यु की खबर को कोई खास तवज्जो नहीं मिली। कारण यह था कि उस समय सारे देश की निगाहें सरकार और अपहरणकर्ताओं के बीच चल रही बातचीत पर टिकी हुई थी। अपहरणकर्ता 3 खूंखार आतंकवादियों की रिहाई की मांग कर रहे थे। अंत में भारत सरकार को तीनों आतंकवादियों को छोड़ना पड़ा था।
डॉ.शंकर दयाल शर्मा और राष्ट्रपति भवन दिवस
डॉ.शंकर दयाल शर्मा को राष्ट्रपति भवन को छोड़ने के बाद सफदरजंग रोड में सरकार ने बंगला आवंटित कर दिया था। वे जब तक राष्ट्रपति भवन में रहे वे वहां के स्कूल के बच्चों और उधर के स्टाफ से मिलते-जुलते रहे। वे हर साल 1 फरवरी को राष्ट्रपति भवन दिवस में भी भाग लेते थे। इस दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम और राष्ट्रपति भवन के स्टाफ और उनके परिवारजनों के बीच खेल कूद प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं। उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी श्रीमती विमला शर्मा उस बंगले में सपरिवार 2020 तक रहीं। विमला शर्मा का 15 अगस्त 2020 में 93 वर्ष की आयु में निधन हो गया था। विमला शर्मा जी बाद में भी राष्ट्रपति भवन में होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लेती थीं। उनकी शख्सियत बेहद सरल और गरिमामयी थी। वह टेलीफोन पर भी बात कर लेती थी। उनसे बात करके लगता था कि मानो आप अपनी मां से बात कर रहे हों।
Vivek Shukla, Navbharat Times, 16vJuly, 2020
कनॉट प्लेस में वो कौन
आप लोदी रोड से कनॉट प्लेस जाते हुए आईएनए मार्केट के रास्ते सफदरजंग एयरपोर्ट को पार करते हुए जनपथ की तरफ बढ़ते हैं। जनपथ के गोल चक्कर से आप जब आगे निकलते हैं,तो आपको वेस्टर्न कोर्ट और ईस्टर्न कोर्ट भी दिखाई दे जाते हैं। जनपथ खत्म होते ही आप आ जाते हैं उस कनॉट प्लेस में, जिसका डिजाइन बनाया था रोबर्ट टोर रसेल (1888-1972) ने। सिर्फ कनॉट प्लेस का ही नहीं बनाया था डिजाइन उन्होंने। टोर ने लोदी रोड के डबल स्टोरी फ्लैट्स,सफदरजंग एयरपोर्ट, वेस्टर्न कोर्ट तथा ईस्टर्न कोर्ट, तीन मूर्ति को भी डिजाइन तैयार किया था। रसेल को गुजरे हुए इस साल आधी सदी हो रही है,पर उनकी कृतियों पर दिल्ली जितना चाहे फख्र कर सकती है।
अप्रतिम आर्किटेक्ट रसेल ने सन 1929 में कनॉट प्लेस का डिजाइन बना लिया था। इसके बाद इसका निर्माण शुरू हुआ और यह 1933 तक बन गया। रसेल ने कनॉट प्लेस का डिजाइन ग्रिगेरियन स्टाइल का रखा है। इसमें डिजाइन सिमेट्रिकल (एक-सा) होता है। आप नोटिस कर सकते हैं कि सारे कनॉट प्लेस का डिजाइन एक समान है। कनॉट प्लेस पूरी तरह से सफेदरंग का है। रसेल की अधिकतर इमारतें सफेद रंग में है। बारह ब्ल़ॉकों में बंटा हुआ कनॉट प्लेस 1743 गोलाकार स्तंभों पर खड़ा है। आप इसमें सात रास्तों से पहुंच सकते हैं।रसेल विंडो शॉपिंग करने वालों को घूमने का पर्याप्त स्पेस देते हैं।
एक बात साफ कर दें कि साल 1960 के बाद कनॉट प्लेस में जनपथ,शंकर मार्केट,मोहन सिंह प्लेस, पालिका बाजार वगैरह बने। जाहिर है, इनका रोबर्ट टोर रसेल से कोई लेना-देना नहीं था। उन्होंने कुछ प्राइवेट भवनों का भी डिजाइन किया था। इनमें पटौदी स्थित पटौदी हाउस भी है। इफ्तिखार अली खान पटौदी के आग्रह पर रोबर्ट टोर रसेल ने पटौदी हाउस को डिजाइन किया था। कहा जाता है कि भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान पटौदी कनॉट प्लेस के आकर्षक डिजाइन से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने रसेल को अपने पटौदी हाउस का डिजाइन करने की जिम्मेदारी सौंप दी थी। उस समय भारत में काम कर रहे ब्रिटिश आर्किटेक्ट फ्री लासिंग भी किया करते थे। पटौदी कनॉट प्लेस को बचपन से ही देख रहे होंगे। उनका जन्म दरियागंज के पटौदी हाउस में ही हुआ था। तो जाहिर है, पटौदी ने भी कनॉट प्लेस को कई बार नापा होगा।
रोबर्ट टोर रसेल ने कनॉट प्लेस के डिजाइन पर काम करने से पहले तीन मूर्ति ( पहले फ्लैग स्टाफ हाऊस ) का डिजाइन तैयार करके आर्किटेक्ट के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे। उनकी रचनाधर्मिता को सब मान रहे थे। रसेल ने एडविन लुटियंस के साथ मिलकर 1,3,5,7 रेस कोर्स रोड ( अब लोक कल्याण मार्ग) के बंगलों के भी डिजाइन बनाए। राजीव गांधी ने साल सन 1984 में प्रधानमंत्री बनने के बाद इन सब बंगलों को एक करके प्रधानमंत्री निवास के रूप में तब्दील कर लिया था।
रोबर्ट टोर रसेल सीपीडब्लूडी यानी केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग के चीफ आर्किटेक्ट थे। वे भारत आने से पहले ब्रिटिश सरकार की सेवा में थे। रोबर्ट टोर रसेल के पिता एस.बी. रस्सेल भी आर्किटेक्ट थे। इसलिए माना जा सकता है कि पिता से प्रभावित होकर रोबर्ट टोर रसेल ने भी आर्किटेक्ट बनने के संबंध में सोचा होगा। वे सन 1919 में भारत आते हैं। उनके लिए सन 1929 से सन 1933 का समय बेहद खास रहा। इस दौरान वे तीन मूर्ति भवन,वेस्टर्न- ईस्टर्न कोर्ट वगैरह के भी डिजाइन बनाते हैं। वे भारत में लगभग 22 सालों तक अतुल्नीय काम करने के बाद सन 1941 में सरकारी सेवा से रिटायर हो जाते हैं। उसके बाद वे वापस अपने देश चले जाते हैं। हालांकि उनके जाने के बाद उनके डिजाइन पर लोदी रोड के सरकारी घर बनते हैं। यह सन 1946 की बात है। इसे दिल्ली में गोरों की तरफ से बनाई अंतिम आवासीय कॉलोनी माना जाता है। कमाल की कॉलोनी है।
वे ब्रिटेन वापस लौटने के बाद ब्रिटिश सरकार के हाउसिंग मामलों के सलाहकार बन जाते हैं। रोबर्ट टोर रसेल साल 1954 में पूरी तरह से रिटायर हो जाते हैं और शेष जीवन अपनी पत्नी इथेल हैच के साथ गुजारते हैं। उनका एक पुत्र और पुत्री भी थे। रोबर्ट टोर रसेल का 1972 में निधन हो गया था। अब कभी कनॉट प्लेस जायें तो उन्हें एक बार याद अवश्य कर लें।
Vivek Shukla,
Navbharattimes, 21 July, 2022
गुरुवार, 21 जुलाई 2022
विजयनगर सम्राट महाराज कृष्ण देवराय
'हमारी विभूतियाँ ‘ में हम आज चर्चा करेंगे विजय नगर साम्राज्य के महान शासक कायस्थ कुल गौरव महाराजा कृष्ण देवराय की :
महान राजा कृष्ण देवराय का जन्म 16 फरवरी 1471 ईस्वी को कर्नाटक के हम्पी में हुआ था। उनके पिता का नाम तुलुवा नरसा नायक और माता का नाम नागला देवी था। उनके बड़े भाई का नाम वीर नरसिंह था।
राजा कृष्ण देवराय के पूर्वजों ने एक महान साम्राज्य की नींव रखी जिसे विजयनगर साम्राज्य (लगभग 1350 ई. से 1565 ई.) कहा गया। देवराय ने इसे विस्तार दिया और मृत्यु पर्यंत तक अक्षुण बनाए रखा। विजयनगर साम्राज्य की स्थापना इतिहास की एक कालजयी घटना है। 'विजयनगर' का अर्थ होता है 'जीत का शहर'। सम्राट कृष्ण देवराय की ख्याति उत्तर के चित्रगुप्त मौर्य, पुष्यमित्र, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, स्कंदगुप्त, हर्षवर्धन और महाराजा भोज से कम नहीं है। जिस तरह उत्तर भारत में महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी महाराज, बाजीराव और पृथ्वीराज सिंह चौहान आदि ने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया था, उसी तरह दक्षिण भारत में राजा कृष्ण देवराय और उनके पूर्वजों ने अपनी मातृभूमि की रक्षा और सम्मान को बचाने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था।
कृष्ण देवराय के दरबार में तेलुगु साहित्य के 8 सर्वश्रेष्ठ कवि रहते थे, जिन्हें 'अष्ट दिग्गज' कहा जाता था। अष्ट प्रधान या अष्ट दिग्गजों की मंत्रिपरिषद समाज के रक्षण कार्य पर दृष्टि रखती थी। सेना और गुप्तचर सीधे राजा के अधीन थे। राजा तक प्रजा की सीधे पहुंच थी और कोई भी व्यक्ति निश्चित समय पर राजा को अपनी वेदना सुना सकता था। कृष्ण देवराय कन्नड़ भाषी क्षेत्र में जन्मे ऐसे महान राजा थे, जिनकी मुख्य साहित्यिक रचना तेलुगु भाषा में रचित थी। कृष्ण देवराय तेलुगु साहित्य के महान विद्वान थे। उन्होंने तेलुगु के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अमुक्त माल्यद’ या 'विस्वुवितीय' की रचना की। उनकी यह रचना तेलुगु के पांच महाकाव्यों में से एक है। कृष्ण देवराय ने संस्कृत भाषा में एक नाटक ‘जाम्बवती कल्याण’ की भी रचना की थी। इसके अलावा संस्कृत में उन्होंने 'परिणय’, ‘सकलकथासार– संग्रहम’, ‘मदारसाचरित्र’, ‘सत्यवधु– परिणय’ भी लिखा।
सम्राट का साम्राज्य अरब सागर से लेकर बंगाल की खाड़ी तक भारत के बड़े भूभाग में फैला हुआ था जिसमें आज के कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, केरल, गोhवा और ओडिशा प्रदेश आते हैं। महाराजा के राज्य की सीमाएं पूर्व में विशाखापट्टनम, पश्चिम में कोंकण और दक्षिण में भारतीय प्रायद्वीप के अंतिम छोर तक पहुंच गई थीं। हिन्द महासागर में स्थित कुछ द्वीप भी उनका आधिपत्य स्वीकार करते थे। उनके राज्य की राजधानी हम्पी थी। हम्पी के एक और तुंगभद्रा नदी तो दूसरी ओर ग्रेनाइड पत्थरों से बनी प्रकृति की अद्भुत रचना देखते ही बनती है। इसकी गणना दुनिया के महान शहरों में की जाती है। हम्पी मौजूदा कर्नाटक का हिस्सा है।
कृष्ण देवराय के राज्य में आंतरिक शांति होने के कारण प्रजा में साहित्य, संगीत और कला को प्रोत्साहन मिला। जनता भी स्वतंत्रता से जीवनयापन करती थी, जिसके कारण कुछ लोग विलासी भी हो गए थे। मदिरालयों और वेश्यालयों पर कराधान होने के कारण इनका व्यापार स्वतंत्र था। अत्यधिक स्वतंत्रता का जनता ने खूब लाभ उठाया। जनता के बीच राजा लोकनायक की तरह पूजे जाते थे। सम्राट कृष्णदेव राय को 1529 में हम्पी में मृत्यु हो गई।
बुधवार, 20 जुलाई 2022
आवाज़ : 75 साल से जन जन की आवाज़ हैं यह अख़बार
आवाज़ के 75 साल
75 साल के सफर की कुछ रोचक दिलचस्प बातें'
शीर्षक से यह आलेख धनबाद से प्रकाशित हिंदी दैनिक 'आवाज: के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित है (21.07.22).
विजय केसरी
किसी भी अखबार के लिए 75 वर्षों का सफर तय करना कोई मामूली बात नहीं होती है। आवाज, बिना रुके, बिना डरे, बिना झुके बीते 75 वर्षों से निरंतर प्रकाशित होता रहा रहा है। आवाज का नियमित प्रकाशन, किसी इतिहास रचने से कम नहीं है। बीते 75 वर्षों के दौरान आवाज ने कई उतार और चढ़ाव देखे। आवाज इन उतारा और चढ़ाओं को पार करते हुए अपनी गति से आगे बढ़ता ही चला जा रहा है । आवाज के प्रकाशन के 75 वर्षों के सफर की कई दिलचस्प बातें हैं, जिसे पत्र के सभी शुभचिंतकों को जानना चाहिए। आवाज के निर्माण में सिर्फ आवाज परिवार टीम का ही अवदान है, अगर ऐसा कहता हूं, तो यह बात पूरी तरह बेमानी होगी। आवाज के निर्माण में पाठकों, विज्ञापन दाताओं, और सुभचिंतकों के सहयोग ना मिले होते तो शायद 75 वर्षों का सफर तय कर यहां तक पहुंचना संभव नहीं हो पाता ।
आवाज एक निष्पक्ष व निर्भिख पत्र के रूप में अपनी पहचान बनाने में सफल रहा है। आवाज ने पत्रकारिता के मूल्य साथ कभी भी कोई समझौता नहीं किया है । आवाज, लोकतंत्र के एक सच्चे प्रहरी के तौर पर बीते 75 वर्षों से अपने कर्तव्य का निर्वहन करता चला आ रहा है । मैंने पूर्व के आलेख में यह बताने की कोशिश की थी कि आवाज भारत की आजादी के साथ ही बड़ा होता चला जा रहा है। देश की आजादी का 75 वां वर्ष, अमृत महोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर आवाज भी अपने प्रकाशन का 75 वर्ष मना रहा है ।
जिस कालखंड में आवाज का प्रकाशन प्रारंभ हुआ था, आजादी का दौर था। भारत को आजादी कुछ ही दिनों में मिलने वाली थी। ब्रह्मदेव सिंह शर्मा एक वरिष्ठ पत्रकार के साथ स्वाधीन भारत के मजबूत पक्षधर थे । 1947 में आवाज के संस्थापक संपादक बिल्कुल युवा थे। वे स्वामी विवेकानंद के विचारों से बहुत हद तक प्रभावित थे । स्वामी विवेकानंद की तरह ही इनका मत था, 'उठो जागो और तब तक आगे बढ़ते रहो, जब तक मंजिल ना मिल जाए'। इस विचार को आत्मसात कर ब्रह्मदेव शर्मा, आवाज जैसे हिंदी पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया था । इधर आजादी के लिए गोष्ठियां आयोजित हो रही थी, तो दूसरी ओर ब्रह्मदेव सिंह शर्मा अपने कुछ खास मित्रों के साथ धनबाद से एक हिंदी दैनिक पत्र निकालने पर विचार कर रहे थे। उनके पास कोई पूंजी नहीं थी। सीमित संसाधन थै, और ना ही अखबार संचालन का कोई अनुभव था । लेकिन दिल हौसला और जोश था। अखबार की शुरुआत कैसे की जाए ?
इस विषय पर अपने साथियों से प्रतिदिन बात कर रहे थे। सबसे पहले उन्होंने हिंदी अखबार का नाम क्या होगा ? पर विचार किया था। कई नाम बिचारा आए। अंत में सबों ने मिलकर आवाज नाम को फाइनल किया था। अखबार का आवाज नाम सबों को बहुत पसंद आया था। अब रही बात अखबार के प्रकाशन का, कैसे प्रारंभ किया जाए ?
अखबार का प्रवेशांक कैसा हो ? उन्होंने इस निमित्त अपने सहयोगी मित्रों के साथ बातचीत करना प्रारंभ किया था। अखबार प्रकाशन की रूपरेखा बन गई।
उस कालखंड में दिल्ली, कोलकोता, बंगाल से हिंदी, अंग्रेजी और बंगला के अखबार धनबाद आते थे । उन अखबारों की मौजूदगी में बिना संसाधन व पूंजी के बिना आवाज का प्रकाशन करना था। आवाज के संस्थापक संपादक इन तमाम कमियों को नजरअंदाज कर प्रवेशांक का विमोचन कैसे हो ? उन्होंने इस विषय पर बातचीत करना प्रारंभ कर दिया था। बहुत मुश्किल से एक मुद्रण के मालिक से बातचीत हुई।, उसने ट्रेडील पर आवाज को छापने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया । अब ब्रह्मदेव सिंह शर्मा, कुछ पढ़े लिखे नौजवानों को इस प्रकाशन से जोड़ा । उन्होंने अपने सहयोगियों से अपने अपने क्षेत्र के समाचार लाने के लिए आग्रह किया था। ब्रह्मदेव सिंह शर्मा , आवाज के एक साथ संपादक, प्रकाशक, समाचार संकलन कर्ता, विज्ञापन प्राप्तकर्ता और मुद्रण करता भी बन गए थे।
जिस सुबह आवाज के प्रवेशांक का विमोचन होना था, उस रात उन्होंने खुद से ट्रेडिल मशीन चलाया था। आवाज की प्रवेशांक की प्रतियां जब ब्रह्मदेव सिंह शर्मा के हाथों में आई थी, तब उनकी खुशी का कोई ठिकाना ना था । उनकी इतने दिनों की मेहनत रंग ले आई थी । इसके लिए उन्होंने दिन रात एक कर दिया था । आवाज का विमोचन शानदार तरीके से हुआ था । इस विमोचन समारोह में धनबाद के कई राजनीतिक नेता व कार्यकर्ता सम्मिलित हुए थे । उस समय आज की तरह राजनीति के क्षेत्र में यह दलगत स्थिति नहीं थी। इस विमोचन समारोह में पहुंचने वाले सभी नेतागण, कार्यकर्ता एवं अन्य लोग आजाद भारत को शीघ्र अति शीघ्र बनते देखना चाह रहे थे । सबों ने मुक्त कंठ से आवाज के प्रवेशांक की प्रशंसा की थी। सबों ने कहा था कि यह अखबार कोयलांचल के लिए जरूर कुछ बड़ा करेगा। ब्रह्मदेव सिंह शर्मा, सबों की बातें शुभ रहे थे। इन बातों का उन पर यह असर हुआ, अखबार का स्वरूप कैसा होगा ? अखबार कौन सी खबरों को आवाज में प्राथमिकता दे ? इन बातों को समझने का उन्हें अवसर प्राप्त हुआ। आवाज अपने नाम के अनुरूप शोषित, पीड़ित, दलित और अभिवंचित और मजदूरों की एक सशक्त आवाज बंन सका । मुद्रण कर्मचारियों के कभी-कभी अनुपस्थिति रहने पर ब्रह्मदेव सिंह शर्मा खुद अपने हाथों से ट्रेडिंल मशीन चलाया करते थे । ताकि समय पर आवाज का अंक निकल पाए। उन्हें अंक के निकालने में किसी भी तरह का विलंब बर्दाश्त नहीं था।
देखते ही देखते आवाज का दस वर्षों का समय बीत चुका था। बिना पूंजी और सीमित संसाधन के अखबार प्रकाशन प्रारंभ हुआ था। आवाज परिवार टीम की हिम्मत मेहनत रंग लाई । अब इलेक्ट्रिक युक्त ट्रेडिल मशीन से आवाज का सपना प्रारंभ हो गया था। आवाज के संपादक मंडल में दस से ज्यादा उप संपादक कार्यरत थे । पूरे कोयलांचल में संवादाता दिन रात आवाज के लिए काम कर रहे थे। इन तमाम उपलब्धियों के साथ आवाज आगे बढ़ता जा रहा था।
अभी भी आवाज के समक्ष कई बड़ी चुनौतियां थी। दिल्ली, कोलकाता और बिहार से आने वाले अखबारों के मुद्रण में जो सुविधाएं थी, उससे आवाज बहुत पीछे था। दिल्ली एवं अन्य प्रांतों की खबरों के लिए आवाज में टेलीप्रिंटर लग चुके थे। विदेश की खबरों के लिए भी आवाज को टेलीप्रिंटर ही एक मात्र सहारा था। आवाज के मुख्य कार्यालय के रिपोर्टर रेडियो के माध्यम से देश-विदेश की ताजा तरीन खबरें प्राप्त करते थे,। रिपोर्टर इन खबरों को सबसे पहले हाथों से लिखते थे, उसके बाद कम्पोजिंग होता था। तब जाकर ट्रेडिल मशीन पर खबरें छपती थी । पाठकों तक खबरें पहुंचाने के लिए आवाज की पूरी टीम को कड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी ।
उस जमाने में आज की तरह लिखने वाले भी कम थे। अखबार हेतु आर्टिकल अथवा संवाद मंगाने का एकमात्र माध्यम डाकघर ही था। आवाज, इस दौर में संपूर्ण देश के लेखकों तक अपनी पहुंच बनाने में सफल रहा था । देश भर से आवाज को आर्टिकल प्राप्त हो रहे थे, वहीं दूसरी ओर ब्रह्मदेव सिंह शर्मा कोयलांचल के लेखकों के आलेखों को छापना प्रारंभ किया थ। इसका असर यह हुआ कि कोयलांचल से कई लेखक उभर कर सामने आए । बाद के काल खंड इनमें से कई लेखक विभिन्न राजनीतिक पार्टियों से जुड़कर विधायक, सांसद और मंत्री तक बने थे ।
आवाज पूरी निर्भीकता के साथ हर अंक का प्रकाशन करता चला आ रहा था। जैसे-जैसे मुद्रण प्रणाली में तब्दिलियां होती गईं, आवाज भी बिना विलंब किए इन तब्दिलियों को स्वीकार करता गया। आवाज, पत्र प्रकाशन की बेहतरी के लिए हर तब्दीली को स्वीकार किया था।
हाथ से चलने वाले ट्रेडिल मशीन से आवाज की शुरुआत हुई थी। आज आवाज बिल्कुल आधुनिक ऑफसेट मशीन में छप रहा है। यह आवाज की पूरी टीम की मेहनत का प्रतिफल था। आवाज ने इस क्षेत्र से लीडरशिप को भी विकसित किया था। दिल्ली, कोलकाता और पटना से प्रकाशित होने वाले अखबारों में स्थानीय नेताओं के वक्तव्य को बहुत कम जगह मिल पाती थी । आवाज में ऐसे नेताओं को दिल खोलकर छापा । आवाज ने स्थानीय नेताओं को आगे बढ़ने में भरपूर सहयोग दिया था। इस क्षत्र में जो भी मजदूर संगठन बने, स्थानीय नेतागण राजनीति में जो अपनी पहचान बनाए, उन सबों के प्रारंभिक दिनों के संघर्ष में कहीं ना कहीं आवाज जुड़ा रहा था।
आवाज ने 75 वर्षों का सफर तय किया है। 100 वर्ष पूरा होने में सिर्फ 25 वर्ष शेष है, अगर आवाज को अपने पाठकों, विज्ञापन दाताओं और शुभचिंतकों से इसी तरह के सहयोग मिलता रहेगा तो यह भी दिन दूर नहीं है।
विजय केसरी,
(कथाकार/ स्तंभकार)
पंच मंदिर चौक, हजारीबाग - 825 301.
मोबाइल नंबर :-92347 99550.
पत्रकार और साहित्यकार में अंतर / अनूप शुक्ला
#पत्रकार और #साहित्यकार होने में अंतर है , जबकि अक्सर दोनों को एक समझ लिया जाता है ....
दोनों को एक समझने के कारण हैं -- दोनों लेखन कर्म से जुड़े हैं , दोनों अभिव्यक्ति के माध्यम का प्रयोग करते हैं , दोनों अपनी अभिव्यक्ति को प्रकाशित या प्रसारित करते हैं , दोनों की लेखन कर्म के प्रति प्रतिश्रुति होती है , दोनों समाज और मानवता के मूल्यों के प्रति समर्पित होते हैं और दोनों अपने समय की चेतना के वाहक होते हैं ....
#पत्रकारिता साहित्य की तुलना में अपेक्षाकृत नया पेशा है । दुनिया भर में पत्रकारिता का प्रचलन कई चीजों से जुड़ कर और उनके कारण परवान चढ़ा ---- आधुनिकता , पूंजीवाद , व्यक्तिवाद , लोकतंत्र , प्रौद्योगिकी व छापाखाना जैसे अनेक तत्वों ने पत्रकारिता को अपरिहार्य बना दिया । आधुनिककाल से पूर्व पत्रकारिता की परिकल्पना और संकल्पना असंभव थी । जहाँ जहाँ और जैसे जैसे आधुनिकता , पूंजीवाद और लोकतंत्र पहले आया , वहाँ वहाँ और वैसे वैसे पत्रकारिता का उद्भव और विकास होता चला गया । जहाँ ये परिवर्तन देर से हुए , वहाँ पत्रकारिता को भी आने में समय लगा ....
#साहित्य की स्थिति पत्रकारिता से कुछ अलग है । साहित्य मानव , मानव समाज और उसके भाषा रूपों से जुड़ा हुआ है , इसलिए यह समाज और भाषा की उत्पत्ति के साथ ही अस्तित्व में आ गया । अलग अलग कालखंडों में साहित्य के स्वरुप व प्रकृति में जरूर अंतर आता गया , समय के साथ साहित्य में काफी बदलाव भी आता गया , लेकिन समाज और भाषा के किसी भी दौर में इसे अनुपस्थित नहीं देखा गया । इसीलिए साहित्य के साथ #शाश्वतता और #सार्वभौमिकता का बोध जुड़ गया , जबकि पत्रकारिता अपनी प्रकृति के कारण #तात्कालिकता से अधिक संपृक्त हो गई ....
पत्रकारिता अपने पेशागत चरित्र के कारण आजीविका का माध्यम बनी , जबकि साहित्य किसी भी दौर में जीविकोपार्जन का सशक्त आधार नहीं बन पाया । साहित्यकारों को प्रायः हर युग में जीविकोपार्जन के लिए साहित्येतर माध्यमों पर निर्भर रहना पड़ा । सामंतवादी युग में उनके पास राज्याश्रित या धर्माश्रित ( लोकाश्रित ) होने के सीमित विकल्प थे , लेकिन आधुनिक पूंजीवादी युग ने इन विकल्पों को कई गुना बढ़ा दिया . इस युग में जो विकल्प बढ़े , उनमे से दो प्रमुख थे ----
( एक ) पत्रकारिता ,
और
( दो ) प्राध्यापकी ।
ज्यादातर साहित्यकार इन्हीं दो विकल्पों से जुड़ कर अपने आजीविका संबंधी असुरक्षाबोध से मुक्त हुए ....
इन दो विकल्पों में भी पत्रकारिता का #ग्लैमर अलग और अधिक था तथा साहित्य की प्रकृति के अनुकूल था । हिन्दी में तो प्रारंभिक दौर में अधिकांश साहित्यकार घोषित या अघोषित पत्रकार अवश्य थे । वे अधिकांशतः अपना पत्र निकालते थे और उस पत्र के #पीर_बावर्ची_भिश्ती_खर भी स्वयं होते थे ....
समय के साथ जब पत्रकारिता के स्वरुप में अंतर आया । बड़े बड़े औद्योगिक घराने , संस्थान और प्रतिष्ठान अखबार और पत्रिकाएं निकालने लगे , तो लिखने के हुनर में माहिर कवि और लेखक पत्रकार के रूप में उनका अंग बन गए । वे समान भाव से पत्रकारिता और साहित्यकारिता करने लगे और देखते देखते #कवि_पत्रकार नामधारी एक नया वर्ग तैयार हो गया ....
वे #पत्रकारिता_जगत_में_साहित्यकार और #साहित्य_जगत_में_पत्रकार का #रुतबा और #प्रतिष्ठा अर्जित करने लगे । पत्रकारिता से जुड़ जाने पर साहित्य जगत में उनकी माँग कई गुना बढ़ गई और इसी के साथ साहित्य में उनकी महत्वाकांक्षा भी .........
सच तो यह है कि साहित्य और पत्रकारिता दो भिन्न क्षेत्र हैं , जिनमें लेखन का समान तत्व विद्यमान है , लेकिन लेखन की समानता दोनों को एक नहीं बनाती ; जरूरत इस बात की है कि एक क्षेत्र की महत्ता का इस्तेमाल दूसरे क्षेत्र में प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए न होने पाए .... साहित्यिक क्षेत्र में प्रतिष्ठा का आधार साहित्यिक लेखन हो और पत्रकारिता क्षेत्र में प्रतिष्ठा का आधार पेशेवर दक्षता !
#अनूप_शुक्ल
मेरी हस्तिनापुर की आधिकारिक यात्रा / .मनु लक्ष्मी मिश्र .
विश्वविद्यालय के कृषि विकास के.न्द्र हस्तिनापुर का आधिकारिक विजिट आदरणीय वाइस चांसलर महोदय, रजिस्ट्रार , डीन डायरेक्टर तथा केरल, आंध्र प्रदेश, बंगलौर, दिल्ली आदि से आए वैज्ञानिकों के साथ किया गया। मीटिंग के उपरांत हस्तिनापुर स्थित जैन मंदिर का भ्रमण कार्यक्रम निश्चित हुआ।मन प्रसन्न हो गया। अत्यधिक गर्मी और बहुत कम समय होने के कारण हमारा कार्यक्रम सीमित रहा पर हस्तिनापुर देखने के लिए पूरा एक दिन आवश्यक है।
हस्तिनापुर के विषय में बता दूं कि जिला मेरठ से 37 किमी एवं दिल्ली से 100 किमी की दूरी पर स्थित है, जो मेरठ-बिजनौर रोड से जुड़ा हुआ है। यह स्थान राजसी, भव्यता, शाही संघर्षों एवं महाभारत के पांडवों और कौरवों के रियासतों का सक्षात गवाह है। विदुर्र टीला, पांडेश्वर मंदिर, बारादरी, द्रोणादेश्वर मंदिर, कर्ण मंदिर, द्रौपदी घाट एवं कामा घाट आदि जैसे स्थल पूरे हस्तिनापुर में फैले हुए हैं। हस्तिनापुर जैन श्रद्धालुओं के लिए भी काफी प्रख्यात है।
वास्तुकला के विभिन्न अद्भुत उदाहरण एवं जैन धर्म के विभिन्न मान्यताओं के केंद्र भी यहां पर भ्रमण योग्य हैं, जैसे जम्बुद्वीप जैन मंदिर, श्वेतांबर जैन मंदिर, प्राचीन दिगंबर जैन मंदिर, अस्तपद जैन मंदिर एवं श्री कैलाश पर्वत जैन मंदिर आदि। जंबुद्वीप में सुमेरू पर्वत एवं कमल मंदिर एवं मंदिर का पूरा परिसर भ्रमण योग्य है, हस्तिनापुर सिख समुदायों के लिए भी एक बड़ा मान्यता का केंद्र है, क्योंकि यह पंच प्यारे भाई धर्म सिंह का जन्म स्थल भी है, जो गुरु गोविंद सिंह जी के पांच शिष्यों में से एक थें। सिख धर्म के लिए सैफपुर कर्मचनपुर का गुरुद्वारा श्रद्धालुओं के लिए बहुत बड़ा तीर्थ केंद्र है।
पवित्र एवं ऐतिहासिक स्थान होने के अतिरिक्त, हस्तिनापुर वन्यजीव के लिए भी काफी प्रख्यात है, क्योंकि यहां पास में अभ्यारण्य वनस्पति की विभिन्न प्रजातियों से सुसज्जित है एवं साथ ही वन्यजीव पर्यटन एवं एडवेंचर, ईको-टूरिज्म एवं संबंधित गतिविधियों का भी केंद्र है। हस्तिनापुर में रहने एवं खाने की बेहतर सुविधा भी उपलब्ध है। वन विभाग का रेस्ट हाउस एवं पी.डब्लू.डी. का अतिथि गृह भी यहां पर स्थित है, साथ ही जैन धर्मशाला भी स्थित है, जहां रुकने की बेहतर सुविधा उपलब्ध है।
श्री दिगंबर जैन बड़ा मंदिर, हस्तिनापुर में सबसे बड़ा जैन मंदिर है। यहां यह मान्यता है कि प्रमुख मंदिर सन् 1801 में निर्मित किया गया था, जिसका निर्माण राजा हरसुख राय के संरक्षण में हुआ था, जो सम्राट शाह आलम II के कोषाध्यक्ष थे। प्रमुख मंदिर में मुख्य देव 16वीं जैन तीर्थांकर, श्री शांतिनाथ, पद्मासन अवस्था में विराजमान हैं। यहां पर दोनो ओर 17वें एवं 18वें तीर्थांकर, श्री कुंठुनाथ एवं श्री अरानाथ की मूर्तियां भी स्थापित है।
यहां इसी परिसर में दर्जनों की संख्या में अन्य मंदिर एवं ऐतिहासिक इमारतें भी स्थापित हैं, जिनमें से ज्यादातर को 20वीं शताब्दी के बाद बनाया गया। श्री दिगंबर जैन मंदिर तीर्थ क्षेत्र समिती जैन श्रद्धालुओं के लिए बहुत सी धर्मशालाओं का भी रखरखाव कर रही है। यहां पर अन्य बहुत सी सुविधाएं हैं, जैसे डाकघर, पुलिस सब-स्टेशन, जैन गुरुकुल एवं उदासीन आश्रम। इसके अतिरिक्त यहां आसपास विभिन्न आकर्षक पर्यटक स्थल भी हैं, जैसे जल मंदिर, जैन पुस्तकालय, आचार्य विद्यानंद संग्रहालय, 24 टंक्स एवं प्राचीन निशियाजी है, जो सब प्रमुख मंदिर से कुछ दूरी पर स्थित हैं।
कैलाश पर्वत रचना हस्तिनापुर
कैलाश पर्वत एक 131 फीट ऊंची इमारत है, जिसका निर्माण श्री दिगंबर जैन मंदिर हस्तिनापुर के तत्वावधान में किया गया है। यहां पर मुख्य देव ऋषभनाथ हैं, जो प्रथम तीर्थांकर थे। अप्रैल 2006 में कैलाश पर्वत का पंच-कल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव पूरा हुआ। कैलाश पर्वत परिसर में विभिन्न जैन मंदिर स्थापित, हैं, यात्री निवास, भोजनशाला, ऑडीटोरियम, हेलीपैड एवं बहुत से पर्यटक आकर्षण स्थल स्थित हैं।
बिहार में बिहारी जी की बालक से बाल पत्रकारिता की समृद्ध परम्परा
#रामलोचनशरणबिहारी और #बालक की #पत्रकारिता
रामलोचनशरण बिहारी (1891-1971) का बाल साहित्य की रचना और प्रकाशन में वही स्थान है जो गुजराती भाषा में आचार्य गिजूभाई को प्राप्त है। (हिन्दी साहित्य और बिहार, तृतीय खंड, पृष्ठ-502) यूनेस्को से जो शिक्षा-सम्बंधी सूचना प्रकाशित हुई थी, उसमें चौदह पुस्तकों के बीच आपकी भी एक पुस्तक की चर्चा है। (हिन्दी साहित्य और बिहार, तृतीय खंड, पृष्ठ 502, पाद टिप्पणी संख्या-2) बाल शिक्षा साहित्य में सर्वाधिक लोकप्रिय पुस्तक ‘मनोहर पोथी’ आप ही की रचना है। आपने बिहार में पढ़ाई जानेवाली प्रायः सभी कक्षाओं की पुस्तकों का मुद्रण एवं प्रकाशन किया।
‘बच्चे राष्ट्र के भावी कर्णधार है’, इस सिद्धंात को ध्यान में रखकर पुस्तक भंडार के मालिक रामलोचनशरण बिहारी (1891-1971) ने सन् 1925 ई. (एन. कुमार, जर्नलिज्म इन बिहार, पृष्ठ-76; रामजी मिश्र मनोहर, बिहार में हिन्दी पत्रकारिता का विकास, पृष्ठ 112 तथा हिन्दी साहित्य और बिहार, तृतीय खंड, पृष्ठ-502 पर ‘बालक’ मासिक पत्रिका का प्रकाशन वर्ष 1926 अंकित है।) में लहेरियासराय (दरभंगा) से ‘बालक’ सचित्र मासिक का प्रकाशन शुरू किया। आचार्य शिवपूजन सहाय ने निराला को पत्र (16. 2. 28) लिखने के लिए अपने जिस पैड का इस्तेमाल किया है, उस पर ‘बालक’ सचित्र मासिक छपा है। (रामविलास शर्मा, निराला की साहित्य साधना, भाग 3, पृष्ठ 12.)
'बालक' के आरंभिक संपादक श्री रामवृक्ष बेनीपुरी थे, बाद के दिनों में इसके संपादन का दायित्व बाबू शिवपूजन सहाय ने निबाहा। (एन. कुमार, जर्नलिज्म इन बिहार, पृष्ठ-76) ‘बालक’ के प्रवेशांक को वणिक प्रेस, कलकत्ता में मुद्रित कराया गया। तब वहीं ‘समन्वय’ में बाबू शिवपूजन सहाय कार्यरत थे। इसके आरंभिक दो अंक शिवपूजन सहाय द्वारा ही संपादित होकर उन्हीं की देखरेख में वणिक प्रेस में छपे थे। शिवजी को लिखे बेनीपुरी के पत्रों से ज्ञात होता है कि संपादन का सारा भार बेनीपुरी जी ने शिवजी पर छोड़ दिया था। यद्यपि पहले ढाई साल तक संपादक के रूप में बेनीपुरी का नाम ही छपता रहा। (मंगलमूर्ति, शिवपूजन सहाय, साहित्य अकादमी, पृष्ठ 96) 1925 से 28 तक बेनीपुरी जी बालक के प्रधान संपादक रहे। बालक की परिकल्पना में रामवृक्ष बेनीपुरी का बराबर की भागीदारी थी इसलिए इस्तीफा देते हुए उन्हें गहरा दुख हुआ। उन्होंने लिखा, ‘बालक के पन्ने-पन्ने में मेरा हृदय-रक्त था। हर आदमी अपनी बालक संतान से जो आशाएं रखता है, इस कागजी बालक से मैंने भी रखी थी।’
तीसरे अंक से ‘बालक’ बनारस के ज्ञानमंडल प्रेस से छपने लगा क्योंकि पुस्तक भंडार की सारी किताबें वहीं से छपती थीं। रामवृक्ष बेनीपुरी के बाद संपादक के रूप में नाम रामलोचनशरण बिहारी का जाने लगा हालांकि इसके संपादन का दायित्व बाबू शिवपूजन सहाय ही ने निबाहा। शांतिप्रिय द्विवेदी ने निराला को पत्र (11. 6. 1928) में लिखा कि बेनीपुरी ने ‘बालक’ और लहेरियासराय को छोड़ दिया। अब शिवपूजन जी एकच्छत्र सम्राट हैं। (निराला की साहित्य साधना, भाग 3, पृष्ठ 137-38 में उद्धृत) इस पत्रिका का संपादन शिवजी काफी श्रम और मनोयोग से करते। विनोदशंकर व्यास ने निराला को पत्र (15. 7. 27) लिखा, ‘‘शिवजी को अपने कार्य से छुट्टी नहीं मिलती, वह ‘बालक’ में ही व्यस्त रहते हैं।’’ (निराला की साहित्य साधना, भाग 3, पृष्ठ में उद्धृत।) संपादक के रूप में शिवजी का नाम केवल जनवरी, 1930 से जुलाई-अगस्त, 1930 तक छपा। रामलोचनशरण बिहारी ने सन् 1928 ई. में लहेरियासराय में एक प्रेस खोला, जिसका नामकरण ‘विद्यापति प्रेस’ किया। मई 1930 से बालक का मुद्रण विद्यापति प्रेस, लहेरियासराय में ही होने लगा। (मंगलमूर्ति, शिवपूजन सहाय, साहित्य अकादमी, 1994, पृष्ठ 96)
रामलोचनशरण बिहारी के संपादन में ‘सुन्दर-साहित्य-माला’ के अंतर्गत हिन्दी-पुस्तक-भंडार (लहेरियासराय, दरभंगा) से 1926 ई. (संवत् 1983 वि.) में ‘बिहार का साहित्य’ (पहला भाग) प्रकाशित हुआ था। इसमें बिहार प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रथम पांच सभापति (पंडित जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी, राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह, बाबू शिवनन्दन सहाय, पंडित सकलनारायण पाण्डेय एवं पंडित चन्द्रशेखरधर मिश्र) तथा पांच स्वागताध्यक्षों के भाषणों का संग्रह है। किताब के अंत में बालक पत्रिका (वार्षिक मूल्य 3 रुपये, प्रति मास 48 पृष्ठ और 30-32 चित्र) का विज्ञापन (नमूना) छपा था-‘‘आजतक हिन्दी में जितने बालोपयोगी पत्र निकल चुके हैं या निकलते हैं, उनसे इसमें अनेक विशेषताएं हैं। बंगला, मराठी, गुजराती, अंगेजी आदि उन्नत भाषाओं के बालोपयोगी पत्रों के सामने रखने योग्य अभी तक इसके सिवा कोई पत्र राष्ट्रभाषा हिन्दी में नहीं निकला। इसके अन्दर बालकों की ज्ञानवृद्धि और मनोरंजन के सभी प्रकार के साधन उपस्थित हैं। इसमें 16 स्थायी सचित्र शीर्षक हैं, जिनमें विविध शिक्षाप्रद सामयिक विषयों के समावेश किया गया है, जिनसे प्रति मास बालकों को भिन्न-भिन्न भांति की लाभदायक बातें मालूम हो जाती हैं। छपाई, सफाई, शुद्धता और सुन्दरता तथा भाषा की सरलता और विषयों के चुनाव पर इतना काफी ध्यान दिया जाता है कि इसका नियमित रूप से पढ़नेवाला बालक थोड़े ही दिनों में विविध उपयोगी ज्ञानों का भण्डार बन जायगा। ‘विज्ञान’, ‘बहादुरी की बातें’, ‘केसर की क्यारी’, ‘जीवजन्तु’, ‘इतिहास’, ‘अनोखी दुनिया’, ‘वह कौन है?’, ‘बुढ़िया की कहानी’, ‘पँचमेल मिठाई’, ‘पूछताछ’, ‘भला-चंगा’, ‘हँसी-खुसी’, ‘कहाँ और क्या’, ‘बालक की बैठक’, ‘बालचर’ और ‘संपादक की झोली’-इन 16 स्थायी शीर्षकों में से पहले में नवीन युग के चमत्कारपूर्ण आविष्कारों की चर्चा, दूसरे में वीर पुरुषों की अलौकिक करामातें, तीसरे में संसार के महापुरुषों के चुने हुए उपदेशपूर्ण वाक्य, चौथे में संसार के नाना प्रकार के जीवों का परिचय, पाँचवें में इतिहास की महत्त्वपूर्ण कथायें, छठे में संसार के अद्भुत समाचारों का संग्रह, सातवें में महापुरुषों की जीवनियाँ, आठवें में दिलचस्प जीवनियाँ, नवें में पाँच उन्नत भाषाओं के प्रसिद्ध पत्रों से चुने हुए बालोपयोगी विषयों का संकलन, दसवें में बालकों के चित्त में कौतूहल उत्पन्न करने वाले मनोरंजक प्रश्नों के उत्तर, ग्यारहवें में स्वास्थ्य सम्बन्धी जानने योग्य लाभदायक बातें तथा देशी और विदेशी पहलवानों की अनेक चित्रों से सुसज्जित जीवनियाँ, बारहवें में शुद्ध विनोदपूर्ण रसीले चुटकुले, तेरहवें में देश-देशान्तर का भौगोलिक वर्णन, चौदहवें में मनोहर बुझौवल और पहेलियाँ, पन्द्रहवें में सेवासमिति और स्काउटिंग सम्बन्धी बुद्धिवर्द्धक लेख तथा सोलहवें में बालकों को सम्पादक की ओर से दी गई अमूल्य शिक्षायें रहती हैं। उक्त सभी विषयों के समावेश के साथ-साथ इस बात का ध्यान रखा जाता है कि ऐसी एक बात भी न हो जिससे बालकों का वास्तविक हित न हो। यही कारण है कि सभी पत्रों और विद्वानों ने मुक्त कंठ से इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। यदि आप अपने बालकों का सच्चा कल्याण चाहते हैं, उनके जीवन को मंगल और आनन्द से भरपूर बनाना चाहते हैं, तो इस ‘बालक’ द्वारा उनके ज्ञान का खजाना भरिये।’’
आदर्श बालोपयोगी पत्र होते हुए भी ‘बालक’ का मूल कलेवर एक साहित्यिक पत्र का था। ‘भारतेंदु अंक’, ‘द्विवेदी-स्मृति अंक’ और ‘साहित्यांक’ जैसे विशेषांक इसके प्रमाण हैं। सामान्य अंकों में भी सामयिक साहित्यिक गतिविधियों, पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं संबंधी सूचनाएं छपा करती थीं। (मंगलमूर्ति, शिवपूजन सहाय, साहित्य अकादमी, 1994, पृष्ठ 96) जिन सात-आठ अंकों पर संपादक के रूप में शिवपूजन सहाय का नाम छपा उनमें ‘हिन्दी के समाचार पत्र’ शीर्षक स्तंभ में समसामयिक हिन्दी दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पत्रों का परिचय छपता था। हिन्दी साहित्य सम्मेलन के गोरखपुर में सम्पन्न हुए अधिवेशन के सभापति गणेशशंकर विद्यार्थी के महत्त्वपूर्ण भाषण का एक अंश ‘बालक’ के मार्च, 1930 के अंक में प्रकाशित हुआ था जिसकी कुछ पंक्तियां यहाँ उद्धृत की जा सकती हैं: ‘आयरलैंड के प्रसिद्ध नेता डी. वेलरा का स्पष्ट मत था कि यदि मेरे सामने एक ओर देश की स्वाधीनता रखी जाय और दूसरी ओर मातृभाषा, तो मैं मातृभाषा को लूँगा क्योंकि इसके बल से मैं देश की स्वाधीनता भी प्राप्त कर लूँगा।’ (मंगलमूर्ति, पूर्वोद्धृत, पृष्ठ 97 में उद्धृत)
हिन्दी का कोई भी छोटा-बड़ा ऐसा लेखक नहीं था जिसकी रचनाएँ बालक में न छपती थीं। दिनकर, प्रभात, आरसी, हंसकुमार तिवारी, नेपाली आदि की काव्य-प्रतिभा बालक के पृष्ठों में ही पल्लवित हुई। राष्ट्रीय स्तर की सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं ने इसकी हिन्दी-सेवा की भूरि-भूरि प्रशंसा की। गोपाल सिंह नेपाली की पहली कविता रामवृक्ष बेनीपुरी के संपादन में ही ‘बालक’ पत्रिका में छपी थी। शीर्षक की पंक्ति थी ‘भारत गगन के जगमग सितारे’। यह संभवतः 1926-27 की बात थी, और उस समय नेपाली तरुणाई के प्रवेश द्वार पर थे-उम्र कोई 15-16 वर्ष रही होगी। (सुरेश सलिल, कुछ गूंज हुई, कुछ गीत गए, आजकल: नवंबर 2011) राष्ट्रभाषा परिषद् की ‘परिषद पत्रिका’ (वर्ष 38, अंक 1-4, मार्च 2000, पृष्ठ 31) के अनुसार गोपाल सिंह नेपाली की उक्त कविता 1933 के ‘बालक’ में (पटना) में छपी बतायी जाती है जो सही नहीं है।
‘बालक’ ने स्वस्थ, सुरुचिपूर्ण एवं ज्ञानवर्धक बाल सामग्री की प्रस्तुति में एक प्रतिमान उपस्थित किया। सन् 1969 ई. में ‘बालक’ की प्रसार संख्या 22,000 थी। (यह आंकड़ा प्रेस इन इंडिया (1968-69), मिनिस्ट्री ऑफ इनफॉर्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग, गवर्नमेंट ऑफ इंडिया, नई दिल्ली से लिया गया है।) किसी भी साप्ताहिक या मासिक में सबसे ज्यादा इसी की बिक्री थी। (रामजी मिश्र ‘मनोहर’, बिहार में हिन्दी-पत्रकारिता का विकास, काशी प्रसाद जायसवाल शोध-संस्थान, पटना, 1998, पृष्ठ 135) इससे बिहार में सुरुचिपूर्ण बाल पत्रकारिता को बढ़ावा मिला। इन्होंने परियों की कहानियां, जानवरों का जीवन, कविताएं, चुटकुले, कार्टून, पौराणिक कथाएं तथा बच्चों के मन को भानेवाले लुभावने एवं आकर्षक चित्रों को छापकर बच्चों के मानसिक तथा बौद्धिक विकास में सहयोग किया। इनका महत्तम योगदान यह है कि इनसे बच्चों में साहित्यिक रुचि का विकास हुआ, उनकी भाषा-शक्ति बढ़ी, उनकी रुचियों का परिष्कार हुआ तथा उनके कोमल एवं भावुक मन में वैज्ञानिक ज्ञान की आशातीत वृद्धि हुई।
स्वतंत्रता से पहले रामलोचनशरण बिहारी की भूमिका अंग्रेजपरस्त की रही। मई, 1935 में जब सम्राट पंचम जार्ज की रजत जयन्ती मनाई गई थी, रामलोचनशरण बिहारी ने न केवल बहुत उत्साह के साथ उसमें योग दिया था बल्कि ‘बालक’ का रजत जयन्ती अंक बहुत सुन्दर निकाला था। कहने की आवश्यकता नहीं कि अपनी साज-सज्जा में यह जनवरी, 1935 के अपने ‘भारतेन्दु अंक’ से भी बीस था। सम्राट अष्टम एडवर्ड और षष्ठ जार्ज के अभिषेकोत्सव में भी आपने उसी उत्साह से सेवा की थी। उस अवसर पर भी बालक के द्वारा आपने राज्याभिषेक-महोत्सवों का सचित्र विवरण हिन्दी-संसार के सामने उपस्थित किया था। सम्राट पंचम जार्ज के स्वर्गारोहण के समय भी आपका शोक-प्रकाश बालक के विशेषांक में प्रकट हुआ था। (जयन्ती-स्मारक ग्रन्थ, पृष्ठ 712) सन् 1941 ई. के जून में रामलोचन शरण ‘बिहारी’ भी ‘रायसाहब’ की उपाधि से विभूषित किये गये। सम्राट पंचम जार्ज की रजत जयन्ती के अवसर पर सहयोग देने के कारण तत्कालीन सरकार ने आपको ‘जुबिली-मेडल’ प्रदान किया। सन् 1936 ई. में सम्राट षष्ठ जार्ज के राजतिलक के उपलक्ष्य में आपको ‘कॉरोनेशन-मेडल’ भी प्राप्त हुआ। (हिन्दी साहित्य और बिहार, तृतीय खंड, पृष्ठ 502)
मंगलवार, 19 जुलाई 2022
जब नेहरू ने माफ़ी मांगी / रेहान फ़ज़ल
जब नेहरू ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी से माफ़ी मांगी
रेहान फ़ज़ल
.भारतीय राजनीति में परस्पर शिष्टाचार के लगातार कम होते मामलों के बीच केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक क़ाबिलेतारीफ़ पहल की. उन्होंने इस साल का बजट पेश करने से पहले भारत के पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम से मुलाक़ात कर उनसे सलाह मशविरा करने की इच्छा जताई.
जिस दौर में अपने विरोधियों के लिए सामान्य शिष्टाचार तक निभाना नेताओं के लिए मुश्किल हो चला है, वहां जेटली कुछ नया नहीं करना चाहते थे. वो तो जाने अनजाने उस परंपरा को लाने की कोशिश कर रहे थे जिसकी ढेरों मिसाल भारतीय संसद में मौजूद है.
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कभी इसी भारतीय संसद में जवाहर लाल नेहरू भी थे, जो अपने विरोधी श्यामा प्रसाद मुखर्जी से माफ़ी मांगने तक की हिम्मत रखते थे.
भारतीय राजनीति में शिष्टाचार पर रेहान फ़ज़ल का विश्लेषणअपना बजट पेश करने से पहले वित्त मंत्रीक्लिक करें अरुण जेटली ने पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम से सलाह मशविरा करने की पूरी कोशिश की. यह अलग बात है कि ये मुलाक़ात संभव नहीं हो सकी क्योंकि तब तक चिदंबरम पूरे बोरिया बिस्तर के साथ चेन्नई शिफ़्ट हो चुके थे.
यह पहला उदाहरण नहीं था जब भारतीय राजनीतिज्ञों ने विरोधी राजनेताओं के प्रति बेहतरीन आचरण और शालीनता के उदाहरण पेश किए हैं. 1957 में जब अटल बिहारी वाजपेई पहली बार लोकसभा में चुन कर आए तो क्लिक करें जवाहरलाल नेहरू उनके भाषणों से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि एक दिन ये युवा सांसद भारत का नेतृत्व करेगा.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया के पूर्व संपादक इंदर मल्होत्रा एक दिलचस्प क़िस्सा सुनाते हैं, "श्यामाप्रसाद मुखर्जी नेहरू की पहली सरकार में मंत्री थे. जब नेहरू-लियाक़त पैक्ट हुआ तो उन्होंने और बंगाल के एक और मंत्री ने इस्तीफ़ा दे दिया. उसके बाद उन्होंने जनसंघ की नींव डाली. आम चुनाव के तुरंत बाद दिल्ली के नगरपालिका चुनाव में कांग्रेस और जनसंघ में बहुत कड़ी टक्कर हो रही थी. इस माहौल में संसद में बोलते हुए श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कांग्रेस पार्टी पर आरोप लगाया कि वो चुनाव जीतने के लिए वाइन और मनी का इस्तेमाल कर रही है."
नेहरू ने मांगी माफ़ीइस आरोप का नेहरू ने काफ़ी विरोध किया. इस बारे में इंदर मल्होत्रा बताते हैं, "जवाहरलाल नेहरू समझे कि मुखर्जी ने वाइन और वुमेन कहा है. उन्होंने खड़े होकर इसका बहुत ज़ोर से विरोध किया. मुखर्जी साहब ने कहा कि आप आधिकारिक रिकॉर्ड उठा कर देख लीजिए कि मैंने क्या कहा है. ज्यों ही नेहरू ने महसूस किया कि उन्होंने ग़लती कर दी. उन्होंने भरे सदन में खड़े हो कर उनसे माफ़ी मांगी. तब मुखर्जी ने उनसे कहा कि माफ़ी मांगने की कोई ज़रूरत नहीं है. मैं बस यह कहना चाहता हूँ कि मैं ग़लतबयानी नहीं करूँगा."
1984 के चुनाव प्रचार के दौरान जादवपुर से मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार सोमनाथ चटर्जी के पैर छू कर एक महिला ने उनसे आशीर्वाद मांगा. बाद में सोमनाथ चटर्जी ये सुन कर हतप्रभ रह गए कि ये महिला और कोई नहीं, उस सीट से उनकी क्लिक करें प्रतिद्वंदी ममता बनर्जी थी जो अंतत: इस सीट पर विजयी हुईं.
उसी तरह एक दूसरे के प्रबल प्रतिद्वंदी होते हुए भी ज्योति बसु, एबीए ग़नी खाँ चौधरी को अपने परिवार का सदस्य मानते थे और बरकत दा को ‘शाहेब’ कह कर पुकारते थे. उनकी बहन हर दो सप्ताह पर ज्योति बसु के लिए बिरयानी भेजा करती थीं. कभी-कभी किन्हीं कारणों से अगर बिरयानी नहीं पहुँच पाती थी तो ज्योति बसु उन्हें फ़ोन कर कहा करते थे, "पठाओ नी केनो."
रशीद क़िदवई भी राजीव गाँधी की अपने विरोधी अटलबिहारी वाजपेई के प्रति दरियादिली की एक दिलचस्प कहानी बताते हैं.
राजीव की दरियादिलीरशीद बताते हैं, "1984 के लोकसभा चुनाव में अटलबिहारी वाजपेई अपना चुनाव हार गए थे. उन्हें अपने इलाज के लिए अमरीका जाना था, जहाँ इलाज कराना अब की तरह पहले भी बहुत मंहगा हुआ करता था. राजीव गाँधी ने उन्हें अपना विरोधी होते हुए भी संयुक्त राष्ट्र जाने वाले भारतीय प्रतिनिधिमंडल का सदस्य बना कर भेजा. 1991 में जब राजीव गाँधी की हत्या हो गई तो उनको श्रद्धांजलि देते हुए वाजपेई ने ख़ुद ये स्वीकार किया कि राजीव ने उनके इलाज के लिए उन्हें अमरीका भेजा था."
क्लिक करें भारतीय जनता पार्टी के शासन के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और उस समय केंद्रीय मंत्री प्रमोद महाजन के बीच तीखी नोकझोंक हो गई. गवर्नेंस नाऊ के संपादक अजय सिंह पत्रकार दीर्घा से ये नज़ारा देख रहे थे.
अजय सिंह कहते हैं, "मैं उस समय हाउस में था. मुझे याद है चंद्रशेखर ने प्रमोद महाजन से कहा कि आप मंत्री बनने के लायक़ नहीं हैं. इस पर प्रमोद महाजन ने तुनक कर जवाब दिया कि आप प्रधानमंत्री बनने के लायक़ नहीं थे. ये सुनना था कि वाजपेई और आडवाणी दोनों सन्न रह गए कि प्रमोद ने यह क्या कह दिया. लेकिन अगले दिन प्रमोद महाजन गए और उन्होंने चंद्रशेखर से सरेआम माफ़ी मांगी."
अजय सिंह का मानना है कि पहले की पीढ़ी के नेताओं में प्रतिद्वंदिता होते हुए भी एक दूसरे के प्रति सम्मान का भाव हुआ करता था जो अब नहीं रहा. वर्तमान प्रधानमंत्री ने जब अपना पद संभाला तो वो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलने तो गए लेकिन क्लिक करें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के यहाँ वो नहीं गए. उसकी पृष्ठभूमि भी यही है कि सोनिया गाँधी ने भी नरेंद्र मोदी के प्रति कटुता का भाव रखा.
नेहरू-पटेल की तकरार
यूँ तो जवाहरलाल नेहरू और क्लिक करें सरदार पटेल में वैचारिक मतभेद थे लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि इन दोनों में एक दूसरे के प्रति सम्मान में कोई कमी थी. इंदर मल्होत्रा याद करते हैं कि इन दोनों के बीच कई मामलों में विरोध हुआ करता था लेकिन कभी भी दोनों ने एक दूसरे के प्रति सख़्त शब्द का प्रयोग नहीं किया.
इंदर मल्होत्रा बताते हैं, "एक बार कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव हो रहा था. आचार्य कृपलानी को पंडित जी सपोर्ट कर रहे थे और पुरषोत्तम दास टंडन जिन्हें नेहरू बिल्कुल पसंद नहीं करते थे, सरदार पटेल के उम्मीदवार थे, जो बाद में जीते भी. असम से फ़ख़रुद्दीन अली अहमद और वहाँ के मुख्यमंत्री चालिहा दिल्ली आए हुए थे. उनसे पटेल ने पूछा कि असम में लोग किसे वोट देने जा रहे हैं. इस पर फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने कहा कि सच्चाई ये है कि जो पंडित जी हमसे कहेंगे वो हम करेंगे."
इंदर मल्होत्रा आगे बताते हैं, "तब पटेल बोले ज़रूर करो, बिल्कुल करो लेकिन एक बात याद रख लो, नेहरू न तो दोस्तों के लिए कुछ करते हैं और न ही दुश्मनों का कुछ बिगाड़ पाते हैं जबकि मैं दोस्तों को कभी भूलता नहीं और दुश्मनों को कभी छोड़ता नहीं. फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने जब ये बात नेहरू को बताई तो नेहरू ने कहा कि पटेल बिल्कुल सही कह रहे हैं."
ये तो रही विरोधियों की बात. दो नज़दीकी दोस्तों नेहरू और मौलाना आज़ाद के बीच भी तहज़ीब के उच्चतम मापदंडों का इस्तेमाल होता था.
इंदर मल्होत्रा एक और दिलचस्प क़िस्सा बताते हैं, "नेहरू और पटेल बहुत पास-पास रहते थे. नेहरू उनसे मिलने पैदल ही उनके घर जाते थे. उन्होंने पटेल को कह रखा था कि जब भी आप मुझसे मिलना चाहें, मुझे कहला भेजें, मैं ख़ुद ही आपसे मिलने आऊंगा. मौलाना आज़ाद का घर थोड़ा दूर था. इसलिए नेहरू अक्सर उनसे मिलने या गपशप करने के लिए कार से जाते थे. जब भी उन्हें मौलाना को फ़ोन करना होता था, वो ख़ुद ही उनका नंबर डायल करते थे."
बीते जमाने की बातमल्होत्रा आगे बताते हैं, "एक बार नेहरू बेहद व्यस्त थे, इसलिए उन्होंने अपने सचिव मथाई से मौलाना का नंबर डायल करने के लिए कह दिया. मौलाना ने फ़ोन उठाते ही कहा, जवाहरलाल क्या तुम्हारी उंगलियों में दर्द होने लगा है जो तुम किसी और से फ़ोन मिलवाने लगे हो. नेहरू इसका मतलब समझ गए और हंसते हुए बोले मौलाना आगे से ये ग़ुस्ताख़ी नहीं होगी."
इस तरह के न जाने कितने क़िस्से हैं! क्लिक करें 1971 के युद्ध के बाद अटल बिहारी वाजपेई का इंदिरा गांधी की तुलना दुर्गा से करना, ममता बनर्जी का ज्योति बसु का हालचाल पूछने अस्पताल जाना या अमरीका से परमाणु समझौता करने से पहले मनमोहन सिंह का बृजेश मिश्रा से सलाह मशविरा करना... वग़ैरह वग़ैरह.
लेकिन हाल के दिनों में अभद्रता की संस्कृति ने भारतीय राजनीति में इस क़दर जड़ें जमाई हैं कि इस तरह की क्लिक करें शालीनता के उदाहरण गए ज़माने की बातें लगते हैं
आम आदमी की आवाज़ थे चंद्रशेखर / अरविंद कुमार singhb
संसद में आम आदमी की एक मजबूत आवाज थे चंद्रशेखरजी
आज पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखरजी पुण्यतिथि है। आज ही के दिन यानि 8 जुलाई 2007 को दिल्ली के अपोलो अस्पताल में उनका निधन हो गया था। 1983-84 के दौरान उनसे मेरा परिचय हुआ था और तबसे लगातार बना रहा। हालांकि उनसे भावनात्मक लगाव इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढाई के दौरान हुआ था लेकिन उनके बारे में वास्तव में जानने समझने का मौका मित्र कृपाशंकर चौबे से मिला। फिर संसद में उनको बहुत करीब से देखा समझा। तमाम मौकों पर उनके साथ देश के बहुत से हिस्सों में गया भी और काफी कुछ लिखा पढ़ा भी। संसद के गलियारों से गुजरते समय देखने वालों को स्वाभाविक हैरत होती थी कि जिस व्यक्ति के पास संगठन या सांसद नाम के हों उसका इतना सम्मान कैसे है।
ऐसा नहीं है कि चंद्रशेखरजी का राजनीतिक जीवन आरोपों से मुक्त था। उनके करीब रहने वाले तमाम लोगों पर सवाल लगते थे। उनके विचारों पर भी लगते थे लेकिन चंद्रशेखर ने कभी परदे की पीछे की राजनीति नहीं की। अच्छे हों या बुरे जो उनके साथ थे वे सामने थे। बागी बलिया का उनका तेवर जीवन भर कायम रहा। वे कांग्रेस और बीजेपी दोनों की राजनीति के विऱोधी थे और नयी आर्थिक नीति के बारे में उनके विचार कभी बदले नहीं। वे चिट्ठियां भी खूब लिखते थे और उसमें खरी खरी बातें लिखते थे। मेरे पास भी उनके हाथ से लिखी कई चिट्ठियां हैं। कभी मौका लगा तो साझा करूंगा।
चंद्रशेखरजी 1962 में प्रजा सोशलिस्ट पाटी से राज्यसभा सदस्य बने तो अपने पहले ही भाषण में पंडित जवाहर लाल नेहरू का मन मोह लिया। उनकी चंद्रशेखरजी से मुलाकात नहीं थी, लेकिन भाषण सुना तो पंडितजी ने बगल में बैठे राजा दिनेश सिंह से पूछ लिया कि ये दाढी वाला नौजवान कौन है ? नेहरूजी की किसी के बारे में अनायास पूछने की आदत नहीं थी। उन्होंने जान लिया था कि आने वाले समय में यह नौजवान नेतृत्वकारी भूमिका में होगा।
संसद में प्रवेश के साथ वे हमेशा आम आदमी के प्रवक्ता और देश की एक मजबूत आवाज बने रहे। उनकी राजनीतिक शक्ति भले सीमित रही हो लेकिन बुनियादी सवालों पर उऩकी आवाज दूर तक जाती थी। उनके कहे शब्दों के मायने होते थे। हर शब्द नाप-तौल कर बोलते थे। चंद्रशेखरजी बोलना आरंभ करते तो जैसे सन्नाटा पसर जाता था। हर कोई उऩकी कही बातों को आत्मसात करने की कोशिश करता था।वे संसदीय गरिमा के प्रतीक थे। उनकी संसदीय पारी लंबी और चार दशकों से अधिक समय की रही।
चंद्रशेखरजी संसद के दोनों सदनों में सदस्य रहे। इस दौरान अपने भाषणों और कार्यकलापों से संसदीय गरिमा को विस्तार दिया। उत्कृष्ट सांसद पुरस्कार की स्थापना के बाद वे आरंभिक व्यक्ति थे जिनको इससे नवाजा गया। समय के साथ बहुत बड़े-बड़े राजनेताओं के विचार बदलते रहे हैं लेकिन चंद्रशेखरजी अपनी कही बातों पर कायम रहे। धारा के खिलाफ खड़े रह कर वे वह सब कहने का साहस रखते थे जिससे उनका नुकसान भी होता है तो होता रहे। समाजवादी धारा के अपने साथियों के मदद के प्रति वे हमेशा तत्पर रहे।
वे मानते थे कि संसदीय लोकतंत्र को हम तभी सुचारू रुप से चला सकते हैं जब आपसी विचार विमर्श हो। और एक-दूसरे के विचारों को यथासंभव समाहित कर हम उसे आगे बढाएं। चंद्रशेखरजी ने ही संसद में पहली बार औद्योगिक घरानों के एकाधिकार के खिलाफ 1966 में आवाज उठायी। हालांकि तब वे कांग्रेस में आ चुके थे। इस मसले पर काफी हंगामा हुआ और हजारिका आयोग बैठा। राजाओं-महाराजाओं के प्रिवी पर्स की समाप्ति और बैंकों के राष्ट्रीयकरण में भी उनकी भूमिका रही। चंद्रशेखरजी के राजनीतिक आदर्श महान नायक आचार्य नरेंद्र देव थे।
1972 में उनका खुला टकराव उस दौर की परमशक्तिशाली नेत्री और प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से हुआ। यह उनका ही बूता था कि इंदिराजी का खुला विरोध करके भी वे शिमला में कांग्रेस की केंद्रीय चुनाव समिति और कांग्रेस कार्यसमिति के चुनाव में विजयी रही। एक दौर वो भी आया जब उन्होंने उन्होंने जेल का वरण किया लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों की राजनीति को तिलांजलि नहीं दी। चंद्रशेखऱजी ने देश के करीब सभी हिस्सों को बहुत करीब से देखा था। उनकी भारत यात्रा ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। 1983 में उन्होंने पैदल 4260 किमी की भारत यात्रा की थी तो तमाम हिस्सों की जमीनी हकीकत को करीब से देखा। 1945 से 2007 तक का चंद्रशेखरजी का राजनीतिक जीवन बताता है कि वे ताउम्र आम आदमी के प्रवक्ता बने रहे।
वे देश के उन चंद नेताओं में थे जिन्होंने भूमंडलीकरण और नयी आर्थिक नीति के दुष्प्रभावों पर सबसे पहले आवाज उठायी। पूर्व केंद्रीय मंत्री कल्पनाथ राय को जेल हुई तो उनके पक्ष में खड़े होने वाले वे पहले नेता थे। चंद्रशेखरजी प्रेस की आजादी के प्रबल पक्षधर थे। वे कहते भी थे कि मेरा पहला वक्तव्य 1954 में लखनऊ में प्रकाशित हुआ था। तबसे अब तक कोई बता दे कि हमने अपने किसी भी विषय में प्रकाशित खबर का खंडन किया हो। मैं सही मायनों में पत्रकारों की आजादी में विश्वास करता हूं।
चंद्रशेखर जी संवाद के पक्षधर थे। उन्होंने इसी सूत्र से तमाम अनसुलझी पहेलियों को सुलझाने की कोशिश की। मैने चंद्रशेखरजी की राजनीति को 1983-84 से काफी नजदीक से देखा। उनके साथ कई बार दौरों पर जाने का मौका भी मिला। कई बार बलिया और और भुवनेश्वरी आश्रम में भी गया। कई समारोहों को भी देखा। मीडिया उनके प्रति पूर्वाग्रही था लेकिन उसकी चंद्रशेखरजी ने कभी परवाह नहीं की। उनका राजनीतिक कृत्य मीडिया को केंद्र में रख कर होता ही नहीं था। वे अपने तरीके के अनूठे राजनेता थे। और आज के दौर में उनके विचार बहुत अधिक प्रासंगिक हैं और अंधेरे में दिशा देने का काम करते हैं।
© अरविंद कुमार सिंह
कभी निर्वासित तिब्बती सरकार की राजधानी रही मसूरी : अरविंद कुमार सिंह
31 मार्च 1959 को तिब्बत के धर्मगुरु दलाईलामा ने भारत में क़दम रखा था. 17 मार्च को वह तिब्बत की राजधानी ल्हासा से पैदल ही निकले थे और हिमालय के पहाड़ों को पार करते हुए 15
दिनों बाद भारतीय सीमा में दाखिल हुए थे. यात्रा के दौरान उनकी और उनके सहयोगियों की कोई ख़बर नही आने पर कई लोग ये आशंका जताने लगे थे कि उनकी मौत हो गई होगी। लेकिन यह सच नहीं था। वह अप्रैल 1959 में मसूरी आये।
और यहीं निर्वासित सरकार बनाई। बाद में 1960 में हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में निर्वासित तिब्बती सरकार की राजधानी स्थानांतरित हो गई थीं।
प्रधानमंत्री का भारत के सचिव स्तर के अफसर को निर्देश था कि, दलाई लामा की निर्वासित सरकार की राजधानी के लिए उन्हें जो जगह पसन्द हो
उसे उन्हें दिया जाय और पूरी मदद की जाय। कई जमीनें देखी गई। बहुत ढूढं हुई, अंतिम मुहर हिमाचल के धर्मशाला पर लगी। लेकिन मसूरी ने तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा और उनकी कैबिनेट को पहला आसरा दिया था। यहीं से साल भर सरकार चलाई गईं।1960 में तिब्बतियों का मसूरी में पहला स्कूल खुला। यहाँ हैप्पी वैली में आज भी करीब पांच हज़ार तिब्बती लोग निवास करते हैं। मसूरी के बाद नीचे दून घाटी में तिब्बती समुदाय का विस्तार हुआ।
देहरादून के क्लेमेंट टाउन में काफी संख्या में तिब्बती शरणार्थी रहते हैं. यहाँ एक गेलुग बौद्ध मठ है और उसके पास ही दूसरा पर बड़ा मठ है मिन्द्रोल्लिंग मठ. इनके तिब्बती शैली के भवन, स्तूप और गोम्पा बड़े ही सुंदर लगते हैं. यहाँ धार्मिक शिक्षा, पूजा के मंदिर और भिक्षुओं के रहने के स्थान हैं.
तिब्बती भाषा में मिन्द्रोल्लिंग शब्द का अर्थ है
याने पूर्ण मुक्ति का स्थान. पहला मिन्द्रोल्लिंग मठ 1676 में तिब्बत में स्थापित किया गया था. देहरादून में छठा मिन्द्रोल्लिंग मठ है जिसकी शुरुआत 1965 में की गई थी. इससे पहले 1959 में चीन तिब्बत में घुसपैठ कर गया था और मठ के लोगों को वहां से भागना पड़ा था. मिन्द्रोल्लिंग मठ बौध दर्शन के वज्रयान या तांत्रिक बौध धर्म का पालन करता है.
क्लेमेनटाउन स्थित बुद्घा टेंपल गार्डन में स्थित मोनेस्ट्री बौद्घ मोनेस्ट्री है। इस महान स्तूप की ऊंचाई 185 वर्ग फुट और चौड़ाई 100 फुट है। सभी के लाभ और विश्व शांति के लिए इस स्तूप का निर्माण 28 अक्टूबर 2002 में किया गया।
कुल्हान सहस्त्रधारा रोड़ स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ ड्राकांग कांग्यू काॅउसिल की 1985 में स्थापना की गई थी। यहाँ कई बार तिब्बति बौद्ध कांग्यू वंश के संस्थापक भगवान जिग्तेन सुमगाॅन जयंती, पुण्यतिथि मनाई जाती है। 2018 में राज्यपाल श्री केके पॉल ने भगवान जिग्तेन सुमगाॅन के परिनिर्वाण दिवस की 800 वीं वर्षगांठ पर आयोजित स्मृति कार्यक्रम में हिस्सा लिया था।
देहरादून में परेड ग्राउंड के बगल में तिब्बती मार्किट बड़ा प्रसिद्ध था। अतिक्रमण के तहत आज से आठ साल पहले इसके कुछ हिस्से को नगर निगम ने तोड़ दिया था। हालांकि अब भी मार्किट है लेकिन वह रौनक नहीं है जो 2010 तक होती थीं।
80, 90 के दशक में इसके सामने दून के अच्छे
अच्छे मार्किट फेल थे।तब दून का इतना विस्तार नहीं था। इसकी तुलना नई दिल्ली के कनॉट प्लेस के भूमिगत पालिका बाजार से होती थीं।
यह दलाई लामा की मर्सडीज़ कार है जो देहरादून में सुरक्षित रखी गई है।
शीशपाल गुसाईं
संसार का सबसे लंबा बस रुट कोलकाता से लंदन बस सेवा
क्या आप जानते हैं कि संसार का सबसे लम्बा बस रूट "कलकत्ता से लंदन" का था । इस रुट पर बस सेवा 15 अप्रैल 1957 को शुरू हुई थी, यह बस कलकत्ता से चल कर दिल्ली, अमृतसर, वाघा बॉर्डर, लाहौर (पाकिस्तान), काबुल, हैरात (अफगानिस्तान), तेहरान (ईरान), इस्तांबुल (तुर्की), जर्मनी, ऑस्ट्रिया, फ्रांस होतेहुए लगभग 7900 किलोमीटर का सफ़र तय करते हुए लंदन पहुंचती थी।
ये बस 1973 तक चलती रही । 1957 में इसका किराया 85 पौंड था और 1973 में बस सेवा बंद होने तक बढ़कर 145 पौंड हो गया था।
यह बस सेवा उस समय में दुनिया की सबसे लंबी बस यात्रा हुआ करती थी। काफी लंबा रास्ता होने के कारण गंतव्य तक पहुंचने में करीब 45 दिन का समय लग जाता था। इस बस सेवा को सिडनी की एक कंपनी अल्बर्ट टूर एंड ट्रेवल्स ने 1950 में शुरू की थी, जो 1973 तक जारी रही। इस बस के जाने का रूट भी बहुत दिलचस्प था। (साभार)
नोट- अगर किसी के पास इस यात्रा से संबंधित किसी का लिखा कोई अनुभव हो तो जरूर बताएं । इस यात्रा की कल्पना मात्र से मन रोमांचित हो उठता है ।
https://hindi.news18.com/photogallery/knowledge/kolkata-to-london-bus-service-45-days-comfortable-journey-in-1970-3165144.html
अव्यवस्थित लोकतंत्र और साहित्यिक पत्रकारिता -जगदीश्वर चतुर्वेदी
आजादी के बाद का साहित्यिक पत्रकारिता का परिदृश्य तकरीबन इकसार रहा है। पहले भी पत्रिकाओं का प्रकाशन निजी पहल पर निर्भर करता था, आज भी यही दशा है, पहले भी साहित्यिक पत्रिकाएं निकलती और बंद होती थीं,यही सिलसिला आज भी जारी है।अनियतकालीन प्रकाशन इसकी नियति है। अधिकतर साहित्यिक पत्रिकाएं निजी अर्थव्यवस्था यानी संपादक के निजी निवेश पर निर्भर हैं, ये पत्रिकाएं संपादकीय जुनून का परिणाम हैं। साहित्यिक पत्रिकाएं साहित्य का माहौल बनाती हैं। हिन्दी में पत्रिकाएं मूलतः गुट विशेष का प्रकाशन हैं,वे गुट विशेष के लेखकों को छापती हैं।
खासकर बुद्धिजीवीवर्ग में सन् 1970-71 के बाद सत्ता सुख का जो मोह पैदा हुआ उसने अधिकांश बड़े लेखकों को सत्ता के करीब पहुँचा दिया और इसका यह परिणाम निकला कि साहित्य और साहित्यकार की नई भूमिका का उदय हुआ। साहित्य अब परिवर्तनकामी कम और सत्ताकामी ज्यादा हो गया। आपातकाल इसका क्लासिक नग्नतम उदाहरण है। आपातकाल के बाद तो स्थितियां लगातार खराब ही हुई हैं। सत्ता के प्रतिष्ठानों के इर्दगिर्द साहित्यकारों को गोलबंद किया गया। कई व्यक्ति और संस्थान सत्ता के केन्द्र बनकर उभरे। इनके हस्तक्षेप के कारण साहित्य का स्वतंत्र विकास बाधित हुआ, साहित्यिक पत्रिकाएं मेनीपुलेशन और प्रमोशन का अस्त्र बन गयीं। चंद व्यक्ति महान बन गए,वे ही तय करने लगे कि कौन लेखक है और कौन लेखक नहीं है ! इस अर्थ में 1970-71 के बाद क्रमशः साहित्य की अवनति हुई ।
साहित्यिक विवेकवाद-
आज हमारे बीच में साहित्यिक पत्रिकाएं हैं,साहित्य भी है लेकिन संपादकीय विवेक नदारत है। विचारधारा है और उसके आधार पर धड़ेबंदी है,लेकिन साहित्यिक विवेकवाद गायब है। साहित्यिक पत्रिकाओं से संपादकीय विवेकवाद का नदारत होना बहुत बड़ी त्रासदी है। नियोजित बहसें हैं, प्रमोशन के लिए आलोचनाएं हैं, मांग-पूर्ति के आधार पर लिखा साहित्य है,किताबें हैं। स्वयं नामवर सिंह कह चुके हैं कि '' मैं फरमाइशी लेखक हूँ'' , वे यह भी रहस्य खोल चुके हैं कि उन्होंने '' कविता के नए प्रतिमान'' किताब को भारत भूषण अग्रवाल के कहने से साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए लिखा था।
साहित्य में इनदिनों लेखन के आधार पर छोटे-बड़े लेखक का फैसला नहीं हो रहा, बल्कि रुतबा,संपदा,ओहदा और सरकारी रसूख के आधार पर फैसले हो रहे हैं। लेखक की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण मूल्य नहीं है ,लेखक के सत्ता संबंध बड़ा मूल्य हो गया है,इसने साहित्यिक पत्रिकाओं में नए किस्म के नियोजित साहित्य विमर्श को प्रतिष्ठित किया है। जिसकी सत्ता में साख है ,वही बड़ा लेखक है। इसका परिणाम यह निकला कि लेखकों में सत्ता से जुड़ने की अंधी दौड़ शुरु हुई है। इसका सबसे बढ़िया केन्द्र बने अकादमिक संस्थान और लेखक संघ। इससे लेखक के कर्म और विचार में गहरी दरार पैदा हुई। लेखन का यथार्थ से संबंध खत्म हो गया। लेखन यानी शब्दों का उत्पादन इसका लक्ष्य है । आज लेखक है,साहित्यिक पत्रिकाएं हैं,संपादक भी है,लेकिन साहित्य का सामाजिक असर नहीं है, लेखक की कोई सामाजिक साख नहीं है। लेखक ने अपने सत्तासुख के कारण सभी किस्म के विमर्शों को प्रशंसा और प्रमोशन में संकुचित कर दिया, 'विचार मंथन' को 'साहित्यिक इवेंट' में तब्दील कर दिया।
साहित्य उत्पादक या प्रकाशक -
हिन्दी में साहित्यिक पत्रकारिता को अनेक लेखक प्रतिवादी पत्रकारिता मानते हैं, इस तरह की धारणा रखने वालों में सामान्य लेखक , दलित लेखक और स्त्री लेखिकाएं भी हैं। सामान्यतौर पर देखें तो हिन्दी का साहित्यिक पत्रकारिता का परिदृश्य वैविध्यपूर्ण है और इसमें विधागत समृद्धि भी है। इसका स्वैच्छिक पहलकदमी के आधार पर प्रकाशन होता रहा है। वाल्टर बेंजामिन के अनुसार प्रतिवादी या परिवर्तनकामी पत्रकारिता या साहित्य में अंतर्वस्तु महत्वपूर्ण नहीं है,महत्वपूर्ण है इसके उत्पादन की अवस्था। कईबार यह भी देखा गया है कि बेहतरीन क्रांतिकारी अंतर्वस्तु को श्रेष्ठतम –व्यावसायिक कला रुपों में पिरोकर पेश किया जाता है। इससे क्रांतिकारी कला का स्वरुप प्रभावित होता है। इसलिए यह सवाल नहीं करना चाहिए कि पार्टनर तेरी पॉलिटिक्स क्या है ? या साहित्य की राजनीति क्या है,यह सवाल ही गलत है।सवाल यह होना चाहिए कला के उत्पादन की राजनीति क्या है ? ज्योंही इस सवाल पर विचार करेंगे सही रुप में प्रतिवादी संस्कृति को परिभाषित कर पाएंगे। बेंजामिन तर्क देते हैं कि सही अर्थ में प्रतिवादी संस्कृति उत्पादन की विशेषज्ञतापूर्ण प्रक्रिया का अतिक्रमण करती है। दूसरे शब्दों में प्रतिवादी संस्कृति कलाकार और दर्शक,निर्माता और उपभोक्ता के बीच की विभाजन रेखा को कम करती है। छोटे-बड़े या ऊँच-नीच,श्रेष्ठ और निकृष्ट के श्रम विभाजन को खत्म करती है। वह सबको सृजन के लिए प्रेरित करती है। हमें इस समूची बहस को प्रोडक्ट केन्द्रित न बनाकर प्रोडक्शनकेन्द्रित बनाना चाहिए। वस्तुस्थिति यह है कि हिंदी पत्रिका संपादक साहित्य का उत्पादक नहीं बन पाया,लेकिन प्रकाशक बन गया।वह प्रोडक्ट बनाता है।
आधुनिककाल आने के साथ छापे की मशीन आई,लेखक की स्वायत्तता को सार्वजनिकतौर पर वैधता मिली,निजता और सार्वजनिकता के बीच में नए किस्म का वर्गीकरण हुआ जो पुराने वर्गीकरण से भिन्न था। पुराने जमाने में लेखक के अंदर निजी-सार्वजनिक का घल्लुघारा था। लेखक की स्वायत्तता पहलीबार नजर आई वह जो उचित समझे लिख सकता है ,इस अनुभूति को उसने प्रत्यक्ष वैधरुप में लागू किया। पहलीबार दो तथ्य सामने आए,इन दोनों तथ्यों की रोशनी में लेखन की परीक्षा होने लगी। पहला, लेखक का राजनीतिक नजरिया और दूसरा रचना की गुणवत्ता। लेखक के सही राजनीतिक नजरिए और साहित्यिक गुणवत्ता के बीच नए संबंध का जन्म हुआ। यह भी कहा गया कि राजनीति सही होगी तो अन्य चीजें भी दुरुस्त होंगी।
वाल्टर बेंजामिन का मानना है सामाजिक परिस्थितियां उत्पादन की अवस्था को तय करती हैं। और जब भौतिकवादी नजरिए से देखना आरंभ करते हैं तो विचार करते हैं कि सामाजिक संबंधों का तत्कालीन समय के साथ क्या संबंध था ? साहित्य के लिए यह महत्वपूर्ण सवाल है । बेंजामिन ने इसी प्रसंग में दो बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं, पहला सवाल, साहित्य का अपने समय के उत्पादन संबंधों के साथ क्या संबंध है ? क्या वह उनको स्वीकार करता है ? क्या वह प्रतिक्रियावादी है ? अथवा उसका नजरिया परिवर्तनकामी है ? या वह क्रांतिकारी है ? इन सवालों पर विचार करने के पहले हम इस सवाल पर सोचें कि अपने समय के उत्पादन संबंधों के प्रति क्या एटीट्यूट है ? उनका नीतिगत नजरिया क्या है ? यह सवाल असल में सामयिक उत्पादन संबंधों के परिप्रेक्ष्य में साहित्य की भूमिका के जुड़ा है .इसका प्रकारान्तर से ''तकनीक'' के सरोकारों से संबंध है.
बेंजामिन के अनुसार '' साहित्यिक तकनीक'' की अवधारणा के आधार पर देखेंगे तो पाएंगे कि साहित्यिक उत्पाद (प्रोडक्ट) सीधे सामाजिक या भौतिक मूल्यांकन के लिए उपलब्ध रहता है। साथ ही साहित्यिक तकनीक की अवधारणा के आधार द्वंद्वात्मक ढ़ंग से विवेचन को आरंभ किया जा सकता है। इसके जरिए साहित्य की रुप और अंतर्वस्तु की निरर्थक बहस से भी बचा जा सकता है।इसके अलावा प्रवृत्ति और गुणवत्ता के निर्धारकों की खोज की जा सकती है। बेंजामिन के अनुसार कृति की राजनीतिक प्रवृत्ति में साहित्यिक गुणवत्ता और साहित्य प्रवृत्ति शामिल है। साहित्य प्रवृत्ति में साहित्यिक तकनीक की प्रगति या प्रतिगामिता भी समाविष्ट है।
साहित्य के उत्पादन पर विचार करते समय इसकी अनिवार्य अवस्था पर भी सोचें । साहित्य किस तरह की अनिवार्य परिस्थितियों में पैदा हो रहा है। इससे लेखन की ठोस परिस्थितियों का पता चलेगा ,यह भी पता चलेगा कि लेखक के पास व्यवहार में कितनी स्वायत्तता है। इस समूची प्रक्रिया पर नजर रखते हुए सही राजनीति और प्रगतिशील साहित्यिक तकनीक के अन्तस्संबंध को समझने में मदद मिलेगी। मसलन्, साहित्यिक पत्रिकाएं लेखक –पाठक को सूचित कर रही हैं ,विवेचन पेश किया जा रहा है। लेखक परिस्थितियों में हस्तक्षेप कर रहा है या दर्शक मात्र है ? हिन्दी पत्रिकाओं में लिखने वाले अधिकांश लेखक रुढ़िबद्ध नजरिए और रुढ़िबद्ध शैली के शिकार हैं। सवाल यह है कि क्या रुढ़िबद्ध लेखन के जरिए सामाजिक परिवर्तन संभव है ? इस तरह के लेखन का किस पर और कितना असर होता है ? इस तरह के लेखन ने लेखक और पाठ के बीच में अलगाव पैदा किया।
'एक्टविज्म ' या प्रतिगामिता -
साहित्यिक पत्रकारिता और खासकर वामपंथी साहित्यिक पत्रकारिता पर बुर्जुआ प्रेस के विकास का क्या असर हुआ है इस पर भी विचार करने की जरुरत है । मुश्किल यह है कि वाम पत्रिकाएं हस्तक्षेप के औजार की तरह इस्तेमाल होती रही हैं, यही काम इन दिनों दलित पत्रिकाएं भी कर रही हैं। इन पत्रिकाओं में बुर्जुआ अवस्था के स्वाभाविक रुझानों और प्रवृत्तियों को लेकर कोई गंभीर विवेचन नजर नहीं आता। ये सल में 'एक्टिविज्म' की पत्रिकाएं हैं,इनकी सतह पर दिखने वाली राजनीतिक प्रवृत्ति क्रांतिकारी लगती है लेकिन असल में वो प्रति-क्रांतिकारी भूमिका अदा करती है। मसलन् , दलित साहित्य पर हिन्दी पत्रिकाओं के अनेक विशेषांक आए हैं,तमाम दलित पत्रिकाएं छप रही हैं। इनकी समग्रता में क्या भूमिका उभरकर सामने आ रही है ? इनकी संस्कारगत सहानुभूति दलित के साथ है लेकिन वे इसके आगे उसे देख ही नहीं पा रहे हैं। उनके पास दलितमुक्ति का कोई ब्लू-प्रिंट नहीं है। ये सभी पत्रिकाएं 'एक्टिविज्म' की केटेगरी में आती हैं। इनमें शाब्दिक जनतंत्र के सहारे दलित के प्रति सहानुभूति पैदा करने की कोशिश की जा रही है।इसी शब्दकेन्द्रिकता के सहारे ही बुद्धिजीवियों का समूचा तंत्र खड़ा है। वे 'एक्टिविज्म' के जरिए साहित्य की द्वंद्वात्मक प्रक्रिया पर पर्दा डाले रखना चाहते हैं। बेंजामिन के शब्दों में कहें तो इस तरह के लेखन की अंतर्वस्तु सामूहिक है लेकिन रुप प्रतिक्रियावादी है। फलतः ऐसी रचनाओं का असर क्रांतिकारी नहीं हो सकता।
अनेक साहित्यिक पत्रिकाओं और लेखकों में सामूहिकताबोध बार-बार व्यक्त हुआ है। लेकिन पत्रिकाएं व्यक्तिगत प्रयासों से ही निकल रही हैं, सामूहिक प्रयासों से निकलने वाली पत्रिकाएं नगण्य हैं। राजनीतिक हालात की पार्टी नीति के अनुरुप व्याख्याएं करना या सत्ताधारी वर्गों के द्वारा प्रक्षेपित मसलों पर लिखना,क्रांतिकारी काम नहीं है,बल्कि प्रति-क्रांतिकारी कार्य है।
कायदे से हमें कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य में रुपान्तरण की प्रक्रिया और रुपान्तरण के क्रांतिकारी उपकरणों का पता होना चाहिए। हमें उत्पादक एपरेट्स और रुपान्तरण के रुपों का ज्ञान होना चाहिए। हमें इस बात का पता रहना चाहिए कि बुर्जुआ एपरेटस में क्रांतिकारी कलाओं और साहित्य रुपों को आत्मसात करके रुपान्तरित करने की अद्भुत क्षमता होती। हम सोचें कि हमारे तमाम किस्म के क्रांतिकारी लेखकों- संगीतकारों आदि को फिल्मी दुनिया ने कैसे हजम कर लिया ? वाम लेखक मनोरंजन का साधन कैसे बन गया ?
राजनीतिक नजरिया-
हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता के प्रसंग में यह सवाल उठाया ही जा सकता है कि साहित्यिक पत्रिका का कोई राजनीतिक नजरिया है या नहीं, पत्रिका की राजनीतिक समझ के साथ उसमें प्रकाशित सामग्री का किस तरह का संबंध है ? सही राजनीति के तहत निकने वाली पत्रिकाओं की गुणवत्ता और खराब राजनीति या राजनीतिविहीन नजरिए से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं के चरित्र में किस तरह का फर्क होता है। हिन्दी में तीन तरह की पत्रिकाएं हैं पहली कोटि में वे पत्रिकाएं आती हैं जिनका राजनीतिक नजरिया है,दूसरी कोटि में वे पत्रिकाएं आती है जिनका कोई राजनीतिक नजरिया नहीं है,जबकि तीसरीकोटि में वे पत्रिकाएं आती हैं जिनका तदर्थवादी राजनीतिक नजरिया है।
साहित्यिक पत्रिकाओं की कहानी उनके मालिक-संपादक के आर्थिक पहलु के बिना पूरी नहीं होती, हमारे यहां कभी यह ध्यान ही नहीं दिया गया कि पत्रिका का आर्थिक बोझ संपादक कैसे उठाता है ? पत्रिकाओं में संपादक के आर्थिक संकट के विस्तृत ब्यौरे गायब हैं। हमने स्वतंत्र तौर पर भी कभी संपादक की आर्थिक बर्बादी को पत्रिकाओं में विषयवस्तु नहीं बनाया । पत्रिकाओं की आर्थिक बर्बादी की न तो दलों को चिंता है और न सरकार को ।
पत्रिकाओं के सर्कुलेशन का एक आयाम वितरण और डाक-व्यवस्था के मूल्य सिस्टम से जुड़ा है। सरकार ने कभी सोचा ही नहीं कि पोस्टल-चार्ज ज्यादा रहेगा तो साहित्य का सर्कुलेशन इससे प्रभावित हो सकता है। हमारे सांसदों ,लेखकों और प्रकाशकों ने भी कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया ।
साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रकाशन परिदृश्य की बुनियादी समस्या यह है कि संपादकों में अधिकतर पेशेवर नजरिया नहीं रखते । पेशेवर नजरिए के आधार पर पत्रिका का प्रकाशन नहीं करते। वे पूंजीवादी प्रकाशन प्रणाली के आदिम रुपों का इस्तेमाल करते हैं और आदिम वितरण प्रणाली पर निर्भर हैं। इसके कारण वे बड़े पैमाने पर अपना विकास नहीं कर पाए हैं। दुखद यह है कि साहित्यिक पत्रिका प्रकाशन की मददगार संरचनाएं समाज में एकसिरे से गायब हैं ।
साहित्यिक पत्रिकाएं ज्यादा से ज्यादा फलें-फूलें इसके लिए जरुरी है कि उनको सरकारी विज्ञापन प्राथमिकता के आधार पर राज्य और केन्द्र सरकार दे। साथ ही पत्रिकाओं को मिलनेवाले चंदे पर आयकर में राहत दी जाय। डीएवीपी और राज्य सरकारों के सरकारी विज्ञापनों के 25फीसदी विज्ञापन अनिवार्यतः साहित्यिक पत्रिकाओं को दिए जाएं। इसके अलावा विभिन्न मंत्रालयों से प्राथमिकता के आधार 25फीसदी विज्ञापन साहित्यिक पत्रिकाओं को दिए जाएं। पत्रिकाओं के पोस्टल वितरण के लिए सरल कानूनी व्यवस्था की जाय और पत्रिका वितरण को मुफ्त पोस्टल सुविधा दी जाय।
साहित्यिक पत्रिकाएं हमेशा से बड़े के खिलाफ छोटे की जंग रही हैं। बड़े कम्युनिकेशन या प्रतिष्ठानी कम्युनिकेशन और साहित्यिक कम्युनिकेशन के बीच में अंतर्विरोध रहा है, शासकवर्ग और साहित्यिक पत्रिकाओं के बीच अंतर्विरोध रहा है। इस अंतर्विरोध को विस्तार देने की जरुरत है।
लेखक-
हिन्दी का साहित्यिक पत्रिकाओं ने लेखक की किस तरह की इमेज निर्मित की है और लेखक को वे किस रुप में देखते हैं,यह सवाल विचारणीय है। दुखद यह है कि आपातकाल के दौरान लेखक के दायित्व पर अमूर्तन में बातें हो रही हैं, ''आलोचना'' ( जुलाई-दिसम्बर1975) को नमूने रुप में देख सकते हैं। आपात्काल के दौरान या उसके पहले या बाद में लेखक की सबसे बड़ी भूमिका है कि लेखक मात्र लेखक नहीं रहा बल्कि लेखक अब राजनीतिक कार्यकर्ता बनकर सामने आता है, सत्ता का पुर्जा बनकर सामने आता है,साहित्य में राजनीति छा जाती है, यह सिलसिला 1960-61 के बाद से ही सामने आने लगा था,'प्रलेसं' की विरासत से इसका गहरा संबंध है।
साहित्य,साहित्यकार और राजनीति में संबंध का होना अच्छी बात है लेकिन इस क्रम में दलीय राजनीति का पक्षधर बन जाना लेखक की सबसे बुरी बात है। लेखक के लिए देश की जनता के हितों और अधिकारों से ज्यादा अपने दलीय आग्रहों से मोह पैदा हो गया, लोकतंत्र से बड़ा दल हो गया,राजनीति हो गयी, समाज के कटु-यथार्थ की बजाय उसने दलीय राजनीतिक यथार्थ को प्रमुखता देने का मन बना लिया ,न्याय की बजाय उसने सत्ता के हितों के इस या उस पहलू पर केन्द्रित होकर लिखना पसंद किया। इसने लेखक को पूरी तरह राजनीति के मातहत बना दिया।
मजेदार बात यह है कि लेखक आया था राजनीति को दिशा देने लेकिन व्यवहार में राजनीति ने लेखक को दिशा देना आरंभ कर दिया। इससे लेखक का राजनीतिक और नैतिक पतन हुआ। लेखक के इस तरह के पतन में राजनीतिक आग्रहों के अलावा आर्थिक कारणों की बड़ी भूमिका रही है। लेखक ने कभी गंभीरता से अपने आर्थिक कारणों की सार्वजनिक विवेचना ही नहीं की। लेखक के संकट का बुनियादी कारण आर्थिक है । यह संकट राजनीति का नहीं है यह साहित्य या विज्ञान का भी पैदा किया संकट नहीं है। इसके कारण हमारे समाज में लेखक का आकर्षण घटा है। दूसरी ओर तुलनात्मक तौर पर वैज्ञानिक, समाजविज्ञानी आदि के प्रति आकर्षण बढ़ा है।
इस प्रसंग में मुझे उ.रा.अनन्तमूर्ति का ''भारतीय लेखकःअस्मिता की खोज'' नाम से दिया गया भाषण याद आ रहा है। यह भाषण उन्होंने अरविंद शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिया था और आपातकाल के दौरान ही ''आलोचना'' पत्रिका ने इसे छापा था। यह भाषण अनेक महत्वपूर्ण बिंदुओं पर रोशनी डालता है। खासकर इस सवाल को बारीकी से उठाता है कि भारतीय लेखक की पहचान क्य़ा है ? लेखक की पहचान लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों से बनती है।जब लोकतंत्र पर हमले हो रहे हों,अभिव्यक्ति की आजादी छीन ली गयी हो, ऐसे में लेखक का सबसे पहला सवाल तो अभिव्यक्ति की आजादी के अपहरण से ही जुड़ा होगा , लेकिन अनंतमूर्ति को यह सवाल दिखाई ही नहीं दिया। इसी तरह आपातकाल में ''आलोचना'' पत्रिका ने कोई संपादकीय नहीं लिखा ,संपादक नामवर सिंह ने कोई निबंध इस प्रसंग में नहीं लिखा, मजेदार बात यह है लेखक आरिगपूड़ी का ''आलोचना '' ( अप्रैल-जून-1976) में '' लेखक का दायित्व'' शीर्षक से लेख छपा है लेकिन आपातकाल का कहीं जिक्र तक नहीं है। मैनेजर पांडेय का लेख छपा है शीर्षक है '' समकालीन इतिहास-विरोधी साहित्य-चिन्तन'', विजेन्द्र का '' समकालीन कविता और सामाजिक यथार्थ'' नामक लेख है, इस तरह के और भी कई लेख हैं लेकिन कहीं पर भी आपातकाल का कोई जिक्र तक नहीं है। गोया, आपातकाल कोई घटना ही न हो । सबसे रोचक बात यह कि जिस समय आपातकाल लगा यानी 25जून1975 के दिन उसके तत्काल बाद आलोचना ने धूमिल की स्मृति में विशेषांक निकाला ,धूमिल की मौत 10फरवरी 1975 को हुई थी,इस पूरे अंक में आपातकाल का जिक्र नहीं है, राजनीति से इस तरह की दूरी या अलगाव क्या किसी भी तर्क से स्वीकार्य है ? इस अंक में धूमिल की सात अप्रकाशित कविताएं छपी हैं,इनमें दो कविताएं ''प्रजातन्त्र के विरुद्ध'', और '' खेवली'' । ''खेवली '' कविता में कवि ने लिखा है- '' वहां न जंगल है न जनतंत्र / भाषा और गूंगेपन के बीच कोई /दूरी नहीं है/ ... और अब तो ऐसा वक्त आ गया है कि सच को भी सबूत के बिना /बचा पाना मुश्किल है।'' ,इस अंक में धूमिल पर काशीनाथ सिंह,विनोद भारद्वाज,विश्वनाथ त्रिपाठी,गोविन्द उपाध्याय,रामकृपाल पाण्डेय,रामवक्ष,विष्णु चन्द्र शर्मा के लेख हैं ,लेकिन किसी में भी आपातकाल पदबंद तक का जिक्र नहीं है। यह अंक चूंकि आपातकाल के तत्काल बाद आया था,इसमें किसी भी रुप में आपातकाल का जिक्र न होना हमें सोचने को विवश करता है कि हम किस तरह की साहित्यिक पत्रकारिता विकसित करना चाहते हैं ? क्या साहित्यिक पत्रकारिता का सामयिक राजनीति से संबंध होना चाहिए ? क्या साहित्यिक पत्रकारिता को राजनीति से दूर रहना चाहिए ? क्या साहित्यिक पत्रिकाओं में सिर्फ साहित्य और उसके विधारुपों पर ही सामग्री होनी चाहिए या फिर उसमें इतिहास,संस्कृति,अर्थशास्त्र आदि विषयों पर भी सामग्री होनी चाहिए।
इस प्रसंग में सबसे बड़ा सवाल यह है कि साहित्यिक पत्रिकाओं ने किस तरह का लेखक निर्मित किया है? हमारा लेखक कैसा है ? उसकी मनोरचना और सामाजिक संरचना किस तरह की है ? आजादी के बाद पैदा हुए लेखक और पहले वाले लेखक में क्या अंतर है ? अनंतमूर्ति ने लिखा है आजादी के पहले के अनुभव से गुजरे लेखक '' आजादी की लड़ाई में शरीक थे और सोचते थे कि वे लोग भारत की आजादी की लड़ाई में शरीक थे और सोचते थे कि भारत की जनता के साथ उनका भाग्य भी जुड़ा है जबकि स्वतंत्रता के बाद की पीढ़ी भारत की जनता के साथ ऐसा कोई तादात्म्य महसूस नहीं करती है। वे स्वयं यह महसूस करते थे कि उन्होंने ऐसा बहुत कुछ लिखा है जो केवल लिजलिजा,भावुकताभरा और पुनर्जागरणवादी है। मुझे तो उनके हाथ से बुनी खादी के कपड़ों तक से ईर्ष्या है जो गाँधीजी के जमाने में एक समतावादी प्रतीक थे लेकिन आज ऐसा नहीं है क्योंकि वैसे कपड़े आज हमारे भ्रष्ट राजनेताओं द्वारा पहने जाते हैं। हम आज ऐसा आत्मविश्वास नहीं रखते कि हम एक साथ पूरी समग्रता से वैयक्तिक और सार्वजनीन हो सकते हैं। किसी भी महान कलासर्जना के लिए ऐसा आत्मविश्वास आवश्यक है। इसी का परिणाम है कि हम केवल 'रीएक्ट' करते रहते हैं,'क्रीएट' नहीं करते हैं। हम निहायत असंगत चीजों की हिमायत करते हैं या फिर इसी की प्रतिक्रिया में उस अधिकारिक भारतीय ग्रामीण की प्रशंसा करते हैं –यह सब हमारी अपनी अनिश्चितताओं को मुखौटा पहनाने के लिए । ''(आलोचना,जुलाई-दिसम्बर,1975,)
यह सही है कि पुराने लेखक के पास स्वाधीनता संग्राम का अनुभव था, उस दौर की संवेदनाएं थीं जिनके आलोक में वह लोकतंत्र को देखता था, लेकिन मुश्किल यह है कि यह वह लेखक है जिसने अपने स्वभाव और नजरिए का पूरी तरह लोकतांत्रिकीकरण नहीं किया था। वह लोकतंत्र की चुनौतियों से अनभिज्ञ था। इस लेखक के पास गंभीर सामाजिक नजरिया था लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों की जटिलता और उनके निर्माण की प्रक्रियाओं से अनभिज्ञ था। वह लोकतंत्र में अपने पुराने उपनिवेशविरोधी वैचारिक नजरिए के साथ दाखिल हुआ और इस नजरिए के लेखकों को जल्द ही शीतयुद्धीय राजनीति ने अपनी गिरफ्त में ले लिया। शीतयुद्धीय राजनीति की गिरफ्त से लेखक कैसे मुक्त हो इसे न तो रामविलास शर्मा जानते थे और न अज्ञेय ही जानते थे, जबकि दोनों के पास साम्राज्यविरोधी नजरिया था।फलतः लेखक के जीवन में लोकतंत्र को लेकर सही समझ पैदा होने की बजाय संशय और अनिश्चितता पैदा हुई । त्रासद पहलु था कि लेखक रह रहा था लोकतंत्र में लेकिन पुराने साम्राज्यवादविरोघी भावबोध के साथ ,साम्राज्यवाद विरोधी भावबोध को उसने लोकतांत्रिक भावबोध में रुपान्तरित नहीं किया।यही वह बिन्दु हैं जहां पर हम लोकतंत्र पर हमले के समय नामवर सिंह जैसे लेखक को असहाय पाते हैं,रामविलास शर्मा जैसे विचारक को गूंगा पाते हैं। एक अन्य समस्या यह है कि हमने लोकतंत्र और लेखक के रिश्ते की नये दौर और नई सामग्री के आलोक में ठीक से कभी मीमांसा ही नहीं की। लोकतंत्र-साहित्य और साहित्यकार के अंतस्संबंध पर विचार ही नहीं किया, उलटे लोकतंत्र को हिकारत,तिरस्कार और उपेक्षा के भाव से देखा। इसने लेखक को लोकतंत्र में रहने के बावजूद लोकतंत्र के प्रति बेगाना बना दिया ।
अनंतमूर्ति ने लिखा है '' नयी भारतीय अस्मिता का उभार नये और पुराने के मिश्रण से नहीं उठा है बल्कि दोनों के साथ जीने से जो द्वंद्व पैदा होता है उससे उठा है और यही द्वंद्व हमारी भाषाओं की प्रतिभा का बीज है !'' सवाल नए और पुराने के द्वंद्व का नहीं है, सवाल यह है कि लोकतंत्र में लेखक किस तरह की द्वंद्ववादी प्रक्रियाओं से गुजरता है ? द्वंद्ववादी प्रक्रियाएं किस तरह का लेखक निर्मित करती हैं ? क्या लेखक इस प्रक्रिया से बाकिफ है ?
अनंतमूर्ति ने दो साहित्यों के बीच तीन तरह के संबंधों की चर्चा की है। उन्होंने लिखा है '' पहला मालिक और नौकर का; दूसरा बराबरी का सम्बन्ध;तीसरा एक विकसित देश और विकासमान देश के बीच का सम्बन्ध जैसा पहले सम्बन्ध का उदाहरण गोरे लोगों का काले लोगों पर अपनी संस्कृति थोपने का तरीका,जैसाकि अमेरिका में हुआ है। फिर भी कोई भी आरोपण पूरी तरह से सफल से नहीं हो सकता जैसे संगीत में,साहित्य में काले लोगों की अल्पसंख्यक संस्कृति ऐसे किसी रचनात्मक बिन्दु को सुरक्षित रख सकती है जिसका कि असर पूरे देश के साहित्य पर हो। अंग्रेजी और फ्रांसीसी साहित्य का मिलाप दूसरी तरह के सम्बन्ध का उदाहरण है। जब एक फ्रांसीसी इतिहासकार अंग्रेजी साहित्य का इतिहास लिखता है तो यह सम्भव है कि उसको प्रत्येक महत्वपूर्ण अंग्रेजी लेखक के पीछे कोई फ्रांसीसी लेखक नजर आये। ''
''तीसरी तरह का सम्बन्ध पहले दो सम्बन्धों से कुछ ज्यादा जटिल है। मैं पूर्व-पश्चिम के सम्बन्ध जैसे जुमले का प्रयोग न करके आर्थिक विभाजनों के अन्तर्गत ऐसे सम्बन्धों को समझना चाहता हूँ क्योंकि उस तरह के जुमलों में जन्मी विचार पद्धतियाँ बहुधा सीधीसादी होती हैं। जैसाकि मेरी बात से स्पष्ट है इसका परिणाम या तो सीधी नकल है या कोरा कंजरवेटिज्म । क्योंकि मैं भारत में जन्मा हूं सिर्फ इसीलिए मैं यह सोचने से इन्कार करताहूँ कि टॉल्सटॉय या कि शेक्सपियर के बारे में सोचना कोई अपराध हैअथवा मेरी अपनी भाषा के महाकवि के बारे में सोचते नहीं। जब मैं यह कहता हूँ तो मुझे इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि मेरी अपनी भाषा के उपन्यासकार कारन्थ के उपन्यास हालाँकि वे विश्वसाहित्य के समकक्ष नहीं रखे जा सकते जिनकी मैं प्रशंसा करता हूँ,लेकिन फिर भी मेरे लिए उनके उपन्यास ही मेरी संवेदना को निर्मित करने में ज्यादा प्रासंगिक हैं ।''
साहित्य में जिन तीन सम्बन्धों के बारे में अनंतमूर्ति ने लिखा है ,वे तीनों सम्बन्ध अपनी जगह सही हैं। लेकिन इसमें एक खास किस्म का स्थानीयतावाद भी है। साहित्य कम से कम स्थानीयतावादी नहीं होता। उसमें देशज भाषा की परंपराएं होती हैं और उनसे लेखक बनता है, प्रभाव ग्रहण करता है, यह सच है कि कारन्थ का उपन्याकार के रुप में अनंतमूर्ति पर असर ज्यादा होगा.लेकिन आधुनिककाल में साहित्य रुपों से लेकर नजरिए तक लेखक पर ग्लोबल परंपराएं और ग्लोबल वैचारिक संघर्ष असर डालते हैं। लेखक की संवेदना मात्र स्थानीय साहित्य से निर्मित नहीं होतीं,यह सही है कि स्थानीय ज्यादा प्रासंगिक होता है लेकिन लेखक के लिए स्थानीय वह भी है जो उसके युग का नहीं है। मसलन् ऐतिहासिक उपन्यास में लेखक मात्र स्थानीय तक सीमित नहीं रहता।उसे वर्तमान के आलोक में लंबी उड़ान भरनी पड़ती है।
अनंतमूर्ति ने सही कहा कि '' पाश्चात्य साहित्य का प्रभाव या तो वस्तुस्थिति के साथ हमारी शिरकत को और भी मजबूत बना सकता है और या फिर हमारी समस्याओं की ओर से हमारे ध्यान और हमारी प्रासंगिकता को कहीं दूर उड़ा ले जा सकता है।यही समस्या की जड़ है-तब फिर अच्छे सम्बन्ध कैसे संभव हैं ? क्या कभी दो समान लोगों के प्रगाढ़ सम्बन्ध तब तक सम्भव हैं जबकि ऐसा प्रयास केवल इकतरफा हो ? अमेरिका को हमारे गुरुओं की जरुरत है,लेकिन क्या वह कभी हमारे कवियों और उपन्यासकारों की जरुरत महसूस करेगा और उनको उतना महत्त्व देगा जितना कि हम अमरीकी लेखकों को देते हैं ? उन्हें ऐसा महत्त्व देना भी जरुरत से ज्यादा है,और यह हमारी दूसरी समस्या है कि हम पाश्चात्य देशों की राय के प्रभाव में आकर बिना किसी आलोचनात्मक दृष्टिकोण के अमरीकी लेखकों को स्वीकार लेते हैं। ''
भारतीय लेखकों में ''पीछे देखनेवाले,इधर-उधर देखने वाले अथवा आगे देखने वाले ' लेखक पाए जाते हैं। अनंतमूर्ति ने लिखा- '' पीछे देखनेवाले लोग इस भ्रान्ति को पालते हैं कि समस्याओं के समाधान भूतकाल को लौटाने में ही हैं।(लेकिन हमारे भूतकाल का कौन-सा पहलू ? ये पुनर्जागरणवादी लोग इस मामले में भी बहुत ही काइयां हैं; ये लोग हमारे भूतकाल के उस संशयवादी और विवेकवादी पहलू को बिलकुल अनदेखा कर देते हैं ।) अगर उच्चवर्गीय भारतीयों की यह स्थिति है तो कॉसमोपोलीटन लोग हमेशा इधर-उधर देखते हैं सोचते हैं,हम अमेरिका जैसे होंगे ? रुस जैसे होंगे ? ब्रिटेन जैसे ? याकि फ्रान्स जैसे ? वे लोग भी भारत के विरासती वैभव के बारे में बहुत बढ़-चढ़कर बोलते हैं,फिर भी अपना बौद्धिक भोजन पाश्चात्य देशों से प्राप्त करते हैं। वे लोग वियतनाम में अमरीकी अत्याचारों को लेकर चिन्तित हो सकते हैं लेकिन वे अपने ही प्रान्त में आंध्र प्रदेश के जमींदारों के द्वारा गरीब हरिजनों की झोपड़ियाँ जला देने पर कुछ नहीं बोलते हैं। वे गिंसबर्ग के विरोध की सराहना करते हैं ,उनके सारे भद्दे तरीकों की सराहना करते हैं,लेकिन जब एक बहुत ही ईमानदार मगर उग्र विधानसभा सदस्य ने एक भ्रष्टमंत्री को चप्पलों से पीटा तो वे सहसा चौंक गए, इसलिए कि यह उनको असभ्य तरीका लगा। वे लोग हिप्पियों की पोशाक पहनते हैं मगर कपड़ा वह विदेशी टेरीलीन होता है। ''
लेखक को भारत के विकास के लिए क्या करना चाहिए या क्या सोचना चाहिए । अनंतमूर्ति ने लिखा है '' एक अग्रदर्शी भारतीय को मानवता के मेलजोल के लिए काम करना होगा जो केवल नयी वैज्ञानिक एवं तकनीकी उपलब्धियों और नये राजनैतिक एवं आर्थिक ढ़ाँचे से ही सम्भव हो सकेगा,जोकि पुनःअंतःसंबंधित है। ''
अधीर लेखक और गुमशुदा पाठक-
मौजूदा दौर हम सबके लिए गंभीर समस्याएं लेकर आया है। साहित्यिक पत्रिकाएं छप रही हैं, साहित्य भी छप रहा है, लेकिन साहित्य का कोई असर समाज पर नजर नहीं दिख रहा।हम सोचें साहित्य क्यों प्रभावहीन हो गया ? पहले साहित्य या कलाओं में कोई चीज दाखिल होती थी तो अन्य कला रुपों में उसका असर दिखता था समाज में वैचारिक विमर्श में असर नजर आता था । विगत तीस सालों में तेजी से आमलोगों में अधीरता का विकास हुआ है। नया लेखक अधीर है। पाठक सोया हुआ है। दूसरी ओर साहित्य सृजन और आलोचना , संस्कृति और राजनीति आदि के बीच में संबंध पूरी तरह कट चुका है । अखबारों की अंतर्वस्तु ने एक नए माहौल को जन्म दिया है,अब अखबार में जो छपा है वो सच है,इससे लेखन में यह भाव पैदा हुआ है कि मैंने जो लिखा है वह सच है। लेखक अपने लिखे को लेकर अधीर है, बेचैन है,बहुत जल्दी स्वीकृति चाहता है,यश चाहता है, इसे साहित्य की नई अग्नि कह सकते हैं। इसमें घी का काम किया है पाठक की सुप्तावस्था ने । बेचैन लेखक और सुप्त पाठक का नया संबंध उबरकर सामने आया है। आज के पाठक की सुप्त मानसिक अवस्था को निर्मित करने में मीडिया की बड़ी भूमिका रही है। यह पाठक चाहता है कि अखबारों में उसके हितों का ख्याल रखा जाय। मीडिया का पाठक जब मीडिया का उपभोग करता है तो वह और कुछ नहीं करता बल्कि सिर्फ उपभोग करता है। अखबार के पाठक को रोज अपना भोजन चाहिए, उसे रोज अपने हितों की अभिव्यंजना पढ़ने या देखने की आदत हो गयी है और यही उसकी अधीरता का मूल स्रोत भी है। पाठक की अधीरता का अखबार के संपादकों ने नए स्तंभों का आरंभ करके खूब दोहन किया है। वे विभिन्न स्तंभों के जरिए पाठक की अधीरता,जिज्ञासाओं और सवालों के समाधान पेश करते रहते हैं। इस क्रम में अबाधित और लक्ष्यहीन ढ़ंग से सूचनाओं की बारिस हुई है और पाठक ने बिना सोचे बिचारे प्रक्षेपित सूचनाओं को हजम भी किया है। इस क्रम में पाठक में सामंजस्य और समझौते की भावना पैदा हुई है। हल्का और सतही लेखन क्रमशः पाठक की रुचि का अंग बन गया । फार्मूलाबद्ध लेखन पाठक का अंग बन गया और इसने गंभीर लेखन की अखबारों से छुट्टी कर दी।नए लेखन सिस्टम में शब्द तय हैं और स्थान तय है। अंतर्वस्तु को अब तयशुदा स्थान के लिहाज से पेश करना होता है । वे रचनाएं ज्यादा पढ़ी जा रही हैं जो गंभीर नहीं हैं। गंभीर रचना के पाठक क्रमशः कम होते जा रहे हैं। इसका असर साहित्य पर भी पडा है। साहित्यिक पत्रिकाओं के पाठक कम हुए हैं। साहित्यिक पत्रिकाओं में हलके लेखन की मांग बढ़ी है। साहित्य में हलके साहित्य की मांग बढ़ी है।
बड़े पैमाने पर बुद्धिजीवी खासकर मीडियाजनित बुद्धिजीवी बेचैन आत्मा की तरह समाज में मंडराते दिखते हैं। आज लेखक की आत्मा, अंतरात्मा, ईमानदारी,निष्ठा, प्रतिबद्धता,साहित्यिकता आदि का कोई मूल्य नहीं है। आज ऐसा लेखक निर्मित हुआ है जो हर किस्म के समझौते करने को तैयार है। हर चीज के साथ समझौता करने के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं इसे वह महसूस ही नहीं करता। इसलिए वह बार बार अपनी असफलता का रोना रोता रहता है वह नहीं जानता कि वह असफल क्यों हो रहा है ? सच यह है कि हमने साहित्य की महिमा और शक्ति को ठंड़े बस्ते में बंद करके विज्ञान,समाजविज्ञान,दर्शन आदि का महिमामंडन किया है। अब हम साहित्य में एक ही चीज खोजते हैं वह है पैसा,अफसोस यह है कि वह भी मिलता नहीं है! फलत:हमने साहित्य की खोज बंद कर दी है।
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