बुधवार, 31 मार्च 2021

सयुंक्त किसान मोर्चा (प्रेस नोट) संघर्ष के 125 वां दिन, 31 मार्च 2021

*सयुंक्त किसान मोर्चा( प्रेस नोट)/125 वां दिन, 31 मार्च 2021


कल सयुंक्त किसान मोर्चा की आमसभा में निम्न निर्णय लिए गए


1. 5 अप्रैल को FCI बचाओ दिवस मनाया जाएगा जिस दिन देशभर में FCI के दफ्तरों का घेराव किया जाएगा।


2. 10 अप्रैल को 24 घण्टो के लिए केएमपी ब्लॉक किया जाएगा।


3. 13 अप्रैल को वैशाखी का त्यौहार दिल्ली की सीमाओं पर मनाया जाएगा।


4. 14 अप्रैल को डॉ भीम राव अम्बेडकर की जयंती पर सविंधान बचाओ दिवस मनाया जाएगा।


5. 1 मई मजदूर दिवस दिल्ली के बोर्डर्स पर मनाया जाएगा। इस दिन सभी कार्यक्रम मजदूर किसान एकता को समर्पित होगा।


6. मई के पहले पखवाड़े में संसद कूच किया जाएगा। इसमें महिलाएं, दलित-आदिवासी-बहुजन, बेरोज़गार युवा व समाज का हर तबका शामिल होगा। यह कार्यक्रम पूर्ण रूप से शांतमयी होगा। अपने गावों शहरों से दिल्ली के बॉर्डर तक लोग अपने वाहनों से आएंगे। इसके बाद दिल्ली के अनेक बॉर्डर्स तक पैदल मार्च किया जाएगा। निश्चित तारीख की घोषणा आने वाले दिनों में कर दी जाएगी।


आज की प्रेस कॉन्फ्रेंस में गुरनाम सिंह चढूनी, प्रेम सिंह भंगू, सतनाम सिंह अजनाला, रविंदर कौर, संतोख सिंह, बूटा सिंह बुर्जगिल, जोगिंदर नैण व प्रदीप धनकड़ मौजूद रहे।


त्रिवेन्द्रम में No Vote for BJP/NDA के बैनर लगा रहे किसान नेता बीजू व अन्य नेताओं पर भाजपा आरएसएस के कार्यकर्ताओं द्वारा हमला किया गया व उनको पीटा गया। हम इसकी कठोर शब्दो मे निंदा करते है व इस व्यवहार का विरोध करते है। किसान मोर्चा ने आह्वान किया है कि जनता भाजपा के खिलाफ वोट करें।


मिट्टी सत्याग्रह यात्रा के तहत यात्रियों को दांडी में किसानों द्वारा 100 गांव की मिट्टी तथा बारदोली में 50 गाँव से लाई गई मिट्टी सौंपी गई। उमराची में यात्रा का स्वागत किया गया। यात्रियों ने  बताया कि मोदी सरकार किसानों की मिट्टी (जमीन) छीनकर पूँजीवादियों को सौंपना चाहती है।  इसके खिलाफ यह यात्रा निकाली जा रही है। किसान आंदोलन के दौरान देश की मिट्टी को बचाने के लिए 320 से ज्यादा किसान शहीद हुए हैं। शहीद स्मारक बनाकर उन्हें याद करने के लिए यह यात्रा गांधी जी की प्रेरणा से निकाली जा रही है।

यात्रा को उमराची में गुजरात पुलिस ने रोक दिया। देश का  किसान लोकतंत्र बचाने की लड़ाई को लड़ रहा है।


मिट्टी सत्याग्रह की दूसरी यात्रा नर्मदा बचाओ आंदोलन और जन आंदोलन के राष्ट्रीय समन्वय की नेत्री मेधा पाटकर के नेतृत्व में मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले में राजघाट से शुरू की गई। मिट्टी सत्याग्रह यात्रा में शामिल  नर्मदा घाटी के किसान, मजदूर, मछुआरों के प्रतिनिधि गांधी समाधि, राजघाट (कुकरा) बड़वानी से रतलाम, मंदसौर होकर राजस्थान के डूंगरपुर जाएंगे, जहां पर दोनों यात्राएं मिलेगी तथा दिल्ली बॉर्डर (शाहजहांपुर, टिकरी, गाजीपुर, सिंघू) की ओर बढ़ेंगी।


तमिलनाडु के कन्याकुमारी के नजदीक मनाकुडी में किसानों व मछुआरों की एक बड़ी महापंचायत आयोजित की गई। इस रैली में हज़ारों की संख्या में किसान, मजदूर व मछुआरे शामिल हुए। कई क्षेत्रीय मुद्दों समेत राष्ट्रीय मुद्दों पर हुई इस पंचायत में लोगों ने कहा कि वे चुनावो ने भाजपा व उसके सहयोगियों को सबक सिखायेंगे। इस कार्यक्रम में 300 से ज्यादा नावों ने समुद्र में काले झंडे दिखाकर सरकार के खिलाफ अपना विरोध जताया।


*आज गाजीपुर बॉर्डर पर संयुक्त किसान मोर्चा गाजीपुर बॉर्डर की ओर से प्रेस वार्ता करके एक परिपत्र जारी किया गया जिसमें बताया गया है कि:* 


 *इन कानूनों में काला क्या है*

- किसान एमएसपी की मांग क्यों कर रहे हैं, 

- गन्ना किसानों पर व समय पर भुगतान पर क्या खराब असर पड़ेगा, 

- इन कानूनों का बंटाईदारों व पशुपालकों पर क्या असर है 

- बिजली बिल से क्या परेशानी होने  जा रही है

तथा 

- सरकार द्वारा कानूनों को स्थगित करने पर किसानों का क्या विरोध है।


इस परिपत्र की प्रति संलग्न है।



- डॉ दर्शन पाल

*सयुंक्त किसान मोर्चा*

मंगलवार, 30 मार्च 2021

युगांतर’ के संपादक राम दहिन ओझा का स्मरण /कृपाशंकर चौबे

 ‘युगांतर’ के संपादक राम दहिन ओझा का स्मरण / कृपाशंकर चौबे


स्वाधीनता के सशस्त्र संग्राम में पहली शहादत मंगल पाण्डेय ने दी थी तो अहिंसावादी आन्दोलन में पहली शहादत रामदहिन ओझा नामक पत्रकार ने दी। इतिहासकार दुर्गा प्रसाद गुप्त ने शहीद राम दहिन ओझा की स्मृति में निकली शहीद स्मारिका में जनक्रांति की पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुए लिखा है, “मंगल पाण्डेय की शहादत के 73 वर्ष बाद 1931 में सत्याग्रह आन्दोलन के दौरान पहली शहादत पत्रकार रामदहिन ओझा ने दी थी। इस तरह सशस्त्र आन्दोलन और अहिंसावादी आन्दोलन दोनों में शहादत देने का गौरव बलिया जनपद को मिला।” इतिहासकार दुर्गा प्रसाद गुप्त ने यही बात अपनी पुस्तक ‘बलिया में सन बयालीस की जनक्रांति’ में भी लिखी है। प्रसिद्ध नारायण सिंह ने ‘लखनऊ जेल के प्रसिद्ध राजनीतिक कैदी’ नामक किताब में मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू और मदन मोहन मालवीय के साथ राम दहिन ओझा का उल्लेख किया है। यह किताब 1924 में यानी राम दहिन ओझा के जीवन काल में ही आ गई थी। अंग्रेज सरकार राम दहिन ओझा से इस कदर भयाक्रांत रहती थी कि उन्हें इस जेल से उस जेल में भेजती रहती थी। राम दहिन ओझा (1901-1931) स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के साथ ही बड़े पत्रकार तथा कवि थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद के बाँसडीह में 1901 की महाशिवरात्रि को हुआ था। स्कूली शिक्षा वहीं हुई। कुछ बड़ा होने पर आगे की पढ़ाई के लिए पिता राम सूचित ओझा उन्हें कलकत्ता ले गए। कलकत्ता महानगर तब क्रांतिकारियों की भूमि के रूप में विख्यात था। वहां की आबोहवा ने रामदहिन ओझा को स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़ने की प्रेरणा दी। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से संपर्क साधा और कलकत्ता, बलिया और गोरखपुर को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। आजादी के लिए प्रेरक लेखनी और ओजस्वी भाषण की कीमत उन्हें बंगाल और बाद में बलिया और गाजीपुर से निष्कासन के रूप में चुकानी पड़ी। सन् 1921 में महात्मा गांधी की अपील पर बलिया में जो सात सत्याग्रही जेल गए थे, उनमें रामदहिन ओझा सबसे कम उम्र के थे। इन सत्याग्रहियों को महात्मा गांधी ने सप्तर्षिमण्डल की संज्ञा दी थी। 11 मार्च, 1921 को बलिया के कलक्टर ने रामदहिन ओझा को जिला छोड़ने का आदेश दिया। वे बलिया छोड़कर गाजीपुर आ गए लेकिन वहाँ भी वे जल्द ही अंग्रेज सत्ता के लिए सिरदर्द बन गए। 15 अप्रैल, 1921 को गाजीपुर के कलक्टर ने भी उन्हें जिला बदलने का आदेश दे दिया। उसके एक महीने बाद 16 मई, 1921 को उन्हें भारतीय दण्ड विधान की धारा 347 और 395 के तहत गिरफ्तार कर छह महीने के कठोर कारावास की सजा दी गई। उनकी तीसरी गिरफ्तारी 3 जनवरी, 1922 को हुई और उन्हें एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई। इन गिरफ्तारियों के बाद उन्हें कई जेलों में रखा गया। तीसरी गिरफ्तारी से छूटने के बाद राम दहिन ओझा कलकत्ता चले गए और पत्रकारिता करने लगे। राम दहिन ओझा ‘युगान्तर’ के सम्पादक बन गए। राम दहिन ओझा की पुण्यतिथि पर आज शाम चार बजे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय  कला केंद्र ने एक वेबिनार का आयोजन किया है जिसमें पत्रकारिता के इतिहास के विशेषज्ञ कृष्ण बिहारी मिश्र, विजय दत्त श्रीधर, अच्युतानंद मिश्र, राम बहादुर राय, हरिवंश, प्रभात ओझा और रमेश गौड़ भाग लेंगे। एक संक्षिप्त वक्तव्य मेरा भी होगा। कार्यक्रम का सजीव प्रसारण Indira Gandhi National Centre for the Arts के फेसबुक पेज पर किया जाएगा। गांधी युग की पत्रकारिता में रुचि रखनेवाले कार्यक्रम से जुड़ सकते हैं.

आत्मकथ्य / अरविंद कुमार सिंह

 आदरणीय मित्रों, /  अरविंद कुमार  सिंह


भारतीय संसद में राज्य सभा में नेता प्रतिपक्ष श्री मल्लिकार्जुन खरगेजी के मीडिया सलाहकार की भूुमिका में मैने अपना कामकाज संभाल लिया है। कुछ मित्रों को यह खबर अपने स्त्रोतों से पता चल गयी थी और उन्होंने फेसबुक पर इसे डाल दिया था। लेकिन मेरा मत था कि जब तक नियुक्ति की आधिकारिक प्रति राज्य सभा सचिवालय से नहीं मिल जाती, मेरे अपने तरफ से कोई टिप्पणी करना उचित नहीं। 

वैसे तो पत्रकारिता करते लंबा समय हो गया है। कई भूमिकाओं में काम किया। स्टिंगर से लेकर संपादक तक। नगर पालिका से लेकर संसद तक। तमाम दिग्गज राजनेताओं से संवाद रहा और उनका स्नेह मिला। खरगेजी एक जमीनी और आज के दौर के वरिष्ठतम नेताओं में हैं। इस इरादे से मैं उनकी टीम का हिस्सा बना कि उनके विराट अनुभव से ज्ञान भंडार विस्तृत होगा और बहुत कुछ सीखने समझने को मिलेगा।  बेशक यह सहज भूमिका नहीं है लेकिन हमारे जीवन में रेलवे मंत्रालय के कुछ सालों को छोड़ दें तो ऐसे चुनौती भरे मौके आते रहे हैं। 

भारतीय संसद के साथ मेरा जुड़ाव एक पत्रकार के तौर पर 1989 के दौरान हुआ जब विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बनी। कई अखबारों का प्रतिनिधित्व करते हुए वहां आना-जाना बना रहा। ऐसा नहीं है कि लोक सभा की गैलरी में नहीं गया लेकिन चंद मौकों पर ही। अन्यथा लगातार राज्य सभा को ही देखा। लोक सभा टीवी निकला तो भी गेस्ट के तौर पर जाता रहा। 

लेकिन जब श्री गुरदीप सिंह सप्पल Gurdeep Singh Sappal के नेतृत्व में एक राज्य सभा टीवी Rajya Sabha Television का जन्म हुआ तो उसके आरंभिक काल में मै जुड़ कर संसद का अंग बना। ज्वाइन किया तो कई नेताओं का नाम उछाला गया कि इन्होने सिफारिश की होगी। लेकिन सच बात तो यह थी इसमें मेरे पत्रकार मित्र फिरोज नकवी का ही बड़ा योगदान था जो अपने साथ मेरा भी फार्म भर आए थे। बुलावा आया , बहुत कठिन इंटरव्यू हुआ। एक से एक संसदीय मामलों के जानकार बैठे थे लेकिन मैं चुन लिया गया। अब दिक्कत यह थी कि  रेलवे मंत्रालय मुझे रिलीव करने को तैयार नहीं था। चार महीने की कोशिश के बाद मैने 1 अगस्त 2011 को जब राज्य सभा टीवी ज्वाइन किया तो वहां बाकायदा कामकाज चालू हो गया था। हालांकि साजो सामान जुटने की प्रक्रिया थी। लंबा किस्सा फिर कभी। 

चयन के बाद गुरदीपजी से पहली मुलाकात हुई तो मैने अपनी दुविधा उनको बता दी कि मैने टीवी मेंं कभी काम किया नहीं है। उनका कहना था कि आपका चयन आपके संसदीय ज्ञान के आधार पर हुआ है, वही हमें चाहिए। और आपके पास तो कुछ और विषयों का भी ज्ञान है। बहुत सी बातें हैं, राज्य सभा टीवी इतिहास का विषय बन चुका है। मुझ जैसे इतिहास के विद्यार्थी के जिम्मे यह काम भी है कि मैं राज्य सभा टीवी के इतिहास को लिखूं और लिखूंगा भी क्योंकि काफी काम कर चुका हूं और मानता हूं जो सप्पलजी ने जो टीम बनायी थी, शायद ही पत्रकारिता के इतिहास में फिर वैसी टीम जुट सके और उनके जैसा नेतृत्व मिल सके जिसका सबसे अधिक समय सबको जोड़ कर रखने में बीतता रहा हो। मैं इस मामले मेें भाग्यशाली रहा कि उस 2013 में संसदीय मामलों का एक विभाग मेरे नेतृत्व मेें बना जिसमें कई दायित्वों के साथ संसद और विधान सभाओं के मामले भी शामिल थे उसका नेतृत्व मैने कई। कई देशों की यात्रा का मौका भी मिला।  

राज्य सभा टीवी में हमारे वरिष्ठ श्री राजेश बादल Rajesh Badal जी ने हमें टीवी पत्रकारिता के बारे में बहुत कुछ सिखाया और समझाया और मेरी बहुत सी चर्चित स्पेशल रिपोर्ट में उनका बड़ा योगदान है। शायद लोगों को हैरानी लगे, लेकिन वहां इतनी आजादी रही कि आखिरी कुछ रिपोर्टों को छोड़ दें तो मेरी कोई भी रिपोर्टं कभी किसी वरिष्ठ सहयोगी ने प्रिव्यू नहीं की और न ही स्क्रिप्ट देखी। जो कुछ देखा गया वह स्क्रीन पर ही।  जो देखा कभी मैने तो कभी हमारी साथी Mamtha Mamtha ने जिनके जिम्मे शूटिंग से लेकर प्रोडक्शन जैसे कई काम थे। हमारे सभी कैमरामैन साथी और वीटी एडीटर मेरे प्रति बेहद उदार और मेरी तकनीकी अज्ञानता की ढाल बने रहे। साथी इरफान Syed Mohd  Irfan की आवाज मेरे अधिकतर कार्यक्रमों की जान रही। श्री विनीत दीक्षित, कुरबान अली, Neelu Vyas Thomas जैसे प्रतिभाशाली सहयोगी मिले जिनके विराट अनुभव और ज्ञान भंडार से मैने खुद को संपन्न किया। यही नही मेरे तमाम आयोजनों में नौकरशाही की अड़चनों को दूर करने में Chetan Dutta जी का बहुत सहयोग मिला। मैने उनके जैसा प्रशासनिक क्षमता वाला व्यक्ति नहीं देखा जो घड़ी देखे बिना हमेशा काम करते रहे और विभिन्न विषयों की व्यापक समझ और ज्ञान के नाते चैनल को उन्नत बनाते में हमेशा सहयोग करते रहे। गुरदीपजी और इनका प्रयास था कि राज्य सभा टीवी पब्लिक ब्राडकास्टिंग की दुनिया में कुछ नया करे। लेकिन शायद उनको भी यह अंदाज नहीं था कि यह 10 साल के सफर में ऐसा शानदार इतिहास बना देगा कि लोग इसके योगदान को याद रखेंगे। बातें बहुत हैं और दस्तावेजों के साथ बात कहने की अपनी आदत है। आगे विस्तार से लिखूंगा। लेकिन इस बात को लिखते समय एक शानदार संस्था के इतिहास बनने की तकलीफ भी हो रही है, जिसकी संस्थापक टीम का मैं सदस्य रहा। प्रधान संपादक के तौर पर श्री राहुल महाजन ने इसे संभालने की कोशिश की और हम लोगों की आजादी बरकरार रखी थी। बातें बहुत सी याद आ रही हैं, लेकिन प्रयोजन अलग है इस नाते यहीं विराम। राज्य सभा टीवी उस रूप में न हो लेकिन लोकतंत्र के शानदार इतिहास के सफर में राज्य सभा अपना योगदान दे रही है। 

अब मेरे सामने नयी भूमिका और नयी चुनौतियां हैं। लेकिन ऐसे मौके मुझे एक नयी ताकत देते हैं। वह ताकत मेरे मित्रों की हैं जो हर अच्छे और बुरे मौैकों पर मेरी ढाल बन कर खड़े मिलते रहे हैं। आज फिर मुझे आप सभी की जरूरत है। उम्मीद है कि मेरे मित्र और अग्रज उसी भाव से मेरे साथ खड़े होंगे।

सरस्वती का नया अंक

 इतिहास को समेटता 'सरस्वती' का नया अंक

       अपनी ऐतिहासिकता को पुनर्जागृत और नये सिरे से  पारिभाषित करते हुए 'सरस्वती' का नया अंक जनवरी-मार्च 2021(युग प्रवर्तक सम्पादक:महावीर प्रसाद द्विवेदीपुनर्नजागरण ,प्रधान संपादक:देवेन्द्र शुक्ल,प्रबन्ध निदेशक:सुप्रतीक घोष) आज ही मिला।इस अंक ने उस विश्वास को पुख्ता किया है कि अब हम उस बारीक तार से जरूर जुड़े रहेंगे जो कल हमारा अतीत था-गौरव और दर्प से लबरेज।जिस पर हमें हर काल में नाज था,रहेगा।

      यह अंक उन रामानन्द चट्टोपाध्याय(चटर्जी) की पवित्र स्मृति को समर्पित है जो भारतीय पत्रकारिता की उस परम्परा के अग्रदूत थे जो उज्ज्वल थी,अप्रतिम थी,अद्वितीय थी,असाधारण थी।जिसने हिंदी पत्रकारिता की अस्मिता को पहचान दी।यही पहचान आज उसकीं पूंजी है।

       रामानन्द चटर्जी इतिहास का वह उजला कालखण्ड हैं जो आज गायब होती सम्पादक की सत्ता को सम्मान सहित सुरक्षित रखे रहे।तब हिंदी पत्रकारिता में न साख का संकट था,न विश्वास का।'प्रवासी'(1901),'मॉडर्न रिव्यू'(1917) और 'विशाल भारत' (1928)के मालिक रामानन्द चटर्जी सम्पादक की स्वतंत्रता,उसके विवेक के प्रबल पक्षधर थे।वे अपने संपादक बनारसीदास चतुर्वेदी की बेहद इज्जत करते थे।यही वजह थी कि हिन्दू महासभा के सूरत अधिवेशन की कोई खबर 'विशाल भारत' में नहीं छपी तो मालिक ने विनम्रतापूर्वक संपादक से पूछा भर।संपादक ने साफ साफ कहा,'वह आपकी विचारधारा हो सकती है,प्रतिबद्धता हो सकती है पर मेरी नजर में खबर नहीं।' यह भी कि जब उनके अपनों ने रामानन्द जी से कहा,'आपके अखबार में आपकी खबर नहीं?' तब उस बड़े आदमी ने दो टूक लहजे में कहा,'संपादक के विवेक पर मुझे कभी कोई संदेह न था,न है।'

     यह था हमारा इतिहास।इसी इतिहास पुरुष पर केंद्रित है यह अंक।इस इतिहास पुरुष पर जिसे गांधी 'ऋषि' कहते थे शंकरी प्रसाद,कृपाशंकर चौवे, रामबहादुर राय, जयश्री पुरवार,आरती स्मित के सारगर्भित लेख हैं।

    पुण्य स्मरण,कविताएं,कहानी,ललित निबन्ध,गजल,भाषा चिंतन,अनूदित कविताएं,इतिहास व पुरातत्व व डॉ उषारानी राव की पुस्तक चर्चा सहित इस अंक में वह सामग्री  है जो आज के दौर में बहुत जरूरी है।

    ऐसा अंक जो फिर जाग्रत करता है इतिहास के एक जरूरी नायक की यश गाथा।

कालजयी संपादक दुर्गाप्रसाद मिश्र / कृपाशंकर चौबे

 'उचितवक्ता' के अनन्य संपादक दुर्गाप्रसाद मिश्र /कृपाशंकर चौबे

डॉ. श्रीरमण मिश्र के सौजन्य से मुझे उत्तर उन्नीसवीं शताब्दी के अत्यन्त तेजस्वी समाचार पत्र 'उचितवक्ता' की फाइल देखने और समाचार पत्र पढ़ने का सुयोग मिला। पं. दुर्गाप्रसाद मिश्र के संपादन में यह अखबार सात अगस्त 1880 को निकला था। इसका आदर्श वाक्य था, 'हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः ' यानी इस संसार में ऐसा व्यक्ति मिलना कठिन है, जो आपके हित के लिए भी बोले और उसकी वाणी में कठोरता भी न हो, अर्थात् हितकारी बात मधुरता के साथ प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति दुर्लभ होते हैं। इसी भावना से उचित परामर्श देने में पं. दुर्गाप्रसाद मिश्र का कोई जवाब न था। 'उचितवक्ता' ने 12 मई 1883 को देशी पत्रकारों को सलाह दी थी, "देशी सम्पादको! सावधान!! कहीं जेल का नाम सुनकर कर्तव्य विमूढ़ मत हो जाना, यदि धर्म की रक्षा करते हुए यदि गवर्नमेंट को सत्परामर्श देते हुए जेल जान पड़े तो क्या चिन्ता है। इससे मान हानि नहीं होती है। हाकिमों के जिन अन्याय आचरणों से गवर्नमेण्ट पर सर्वसाधारण की अश्रद्धा हो सकती है उनका यथार्थ प्रतिवाद करने में जेल तो क्या यदि द्वीपांतरित भी होना पड़े तो क्या बड़ी बात है? क्या इस सामान्य विभीषिका से हमलोग अपना कर्तव्य छोड़ बैठे?" उचित-अनुचित विवेक के चलते 'उचितवक्ता' के सम्पादक ने 'उचितवक्ता' के क्रोड़-पत्र में 'भारतमित्र' तक को खूब खरी-खोटी सुनायी थी और 'भारतमित्र' सम्पादक को सम्पादकीय धर्म और नैतिकता समझाई थी। 15 जुलाई 1881 के 'भारतमित्र' में एक पत्र प्रकाशित हुआ था जिसमें स्वच्छ वेद निन्दा' थी। उस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए 'उचितवक्ता' ने लिखा था, 'भारतमित्र' के सम्पादक को ऐसा छापने का ही क्या अधिकार है? क्या पत्र सम्पादक का यही कर्तव्य है कि जो आवे सो छापना वाह जी वाह!

'उचितवक्ता' ने अपनी सम्पादकीय टिप्पणियों में जातीय प्रश्न को बड़ी निर्भीकता से उठाया या। प्रथम वर्ष के 15 वें अंक में सम्पादकीय टिप्पणी का शीर्षक है-'भारत दिनोंदिन क्यों दरिद्र हुआ जाता है।' 11 सितम्बर 1880 के अंक की सम्पादकीय टिप्पणी में कहा गया है कि भारत-वर्ष की दयनीय दशा का एकमात्र कारण ब्रिटिश शोषण है : "भारतवर्ष को अँग्रेज राज-पुरुषों ने शोषण कर लिया है। इसे ऐसा दुहा है कि, यह अब इसके शरीर में रक्त मांस का लेशमात्र भी नहीं रहा।

दुर्गाप्रसाद मिश्र ने अपने संपादकीय धर्म का निर्वाह लगातार घाटा उठाकर भी पूरा किया। उचितवक्ता' के 26 मई 1891 के अंक में पं. दुर्गांप्रसाद मिश्र ने लिखा है, "जिस समय मैंने 'भारतमित्र' को जन्म दिया था, जिस समय 'सारसुधानिधि' को निकालने का उद्योग मैंने किया था, तब बहुत घाटा हुआ था। प्रथम ‘उचितवक्ता' सुनियम और सुदृढ़ता से चलता रहा, यद्यपि ग्राहकों की नादेहन्दी आरम्भ ही से बनी रही तथापि उद्योग और अध्यवसाय के बल से चलाया गया।

 

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जीटी रोड पर कोस मीनारों व सर्वे मीनार का वजूद संकट में / अरविंद कुमार सिंह

 ग्रैंड ट्रंक रोड (जीटी रोड) पर कोस मीनारों व सर्वे मीनार का अस्तित्व खत्म होता जा रहा है- अशोक बालियान  चेयरमैन, पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन  

     हमे अपने ग्रह जनपद मुज़फ्फरनगर में मंसूरपुर के पास बेगराजपुर इण्डस्ट्रीयल एरिया में  पुरानी मीनार पर जाने का अवसर मिला। इस मीनार के पास जनपद मुज़फ़्फ़रनगर निवासी श्री नीरज केडिया की फ़ैक्टरी है और उन्होंने हमें इसके बारे में बताया था।यह मीनार लगभग 30 फीट से भी अधिक ऊंची है और ईंटों और चूने के साथ बनी हुई है। इसके निर्माण में लाखोरी ईंटों का प्रयोग किया गया है। इस मार्ग पर मौर्य काल से ही कोस मीनारें बनाने की परंपरा शुरू हुई थी, लेकिन शेर शाह सूरी काल व मुगल काल में इनकी संख्या में खूब वृद्धि हुई। ये मीनारें सौदागरों-मुसाफिरों की आरामगाहों के हिसाब से भी तैयार की गईं थी और उनके करीब सरायें बनवाई गईं थी।

    उस काल में हर कोस (करीब 3.2 किलोमीटर) पर एक मीनार बनाई जाती थी। करीब 30 फीट ऊंची इन मीनारों से राहगीर स्थान की दूरी का अंदाजा लगाते थे। इनका एक अहम काम डाक व्यवस्था में मदद करना भी था। हर कोस मीनार पर एक सिपाही घोड़े के साथ मौजूद रहता था। यह सिपाही राज संदेश अगली मीनार तक ले जाता और फिर वहां से अगला उसे आगे ले जाता था। ये समय का फेर है, अब कोस मीनारें खुद पनाह की मोहताज हो गई हैं।

    ग्रैंड ट्रंक रोड के नाम से मशहूर यह मार्ग, मौर्य साम्राज्य के दौरान अस्तित्व में था और प्राचीन काल में इसे उत्तरापथ कहा जाता था। ये गंगा के किनारे बसे नगरों को, पंजाब से जोड़ते हुए, ख़ैबर दर्रा पार करती हुई अफ़ग़ानिस्तान के केंद्र तक जाती थी। चंद्रगुप्त मौर्य ने यूनानी राजनयिक, मेगस्थनीज की आज्ञा से इस राजमार्ग के रखरखाव के लिए अपने सैनिकों को अलग-अलग जगहों पर तैनात किया था। इस मार्ग का पुनःनिर्माण शेर शाह सूरी द्वारा किया गया था। और इसके बाद 17वीं वीं सदी में इस मार्ग का ब्रिटिश शासकों ने फिर से पुनर्निर्माण किया और इसका नाम बदलकर ग्रैंड ट्रंक रोड कर दिया था। उन्होंने भी सर्वे मीनारों का निर्माण कराया था। इन मीनारों से भूमि की नपाई होती थी।

    राष्ट्रीय राजमार्ग से हट कर बेगराजपुर इण्डस्ट्रीयल एरिया में एक छोटा सा स्तूप जैसी सर्वे मीनार होने की बात से ही यहाँ के अधिकतर लोग अनजान है, क्योकि यहाँ कोई साईंन बोर्ड आदि भी नहीं लगा हुआ है, इसलिए बिना जानकारी के यहाँ कोई जाता भी नही है। भारत में ग्रैंड ट्रंक रोड को ही आधुनिक राष्ट्रीय राजमार्ग में परिवर्तित कर दिया गया था। आज जी.टी. रोड 2,500 किलोमीटर (लगभग 1,600 मील) से अधिक लंबा है।   

    जनपद मुज़फ्फरनगर का इतिहास बहुत पुराना है। मुज़फ्फरनगर सदर तहसील के मांडी नाम के गाँव में हड़प्पा कालीन सभ्यता के पुख्ता अवशेष मिले हैं। हडप्पा सभ्यता से आए हुए लोगों ने यहां भी बस्तियां बसाकर रहना शुरू कर दिया था। जनपद मुज़फ्फरनगर सन 1824 से पहले सहारनपुर जिले का हिस्सा था।  जनपद सहारनपुर सन 1803 में मराठों से अंग्रेजों के पास चला गया था। गांव सौरम में स्थित 17 वी शताब्दी मे बनी सर्वखाप पंचायत की पक्की चौपाल अनेकों एतिहासिक निर्णयो की साक्षी बनी है।

    हमारी संस्था पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन चाहती हैं कि इस धरोहर को सुरक्षा मिले, इन पर रोशनी हो, रंग-रोगन हो, ताकि ऐतिहासिक धरोहर को देखकर नई पीढ़ी को इतिहास की जानकारी मिले।जनपद मुज़फ्फरनगर ऐसी कई अन्य एतिहासिक धरोहर भी मिल सकती हैं, इसलिए हमारी खोज जारी रहेगी।

रविवार, 28 मार्च 2021

हकीम साहब का होली मिलन / विवेक शुक्ला

 होली मिलन हकीम साहब का /  विवेक शुक्ला 


अब उस होली मिलन की बस यादें ही रह गईं हैं। अब कौन आपको इस दिल्ली में बार-बार फोन करके होली मिलन में भाग लेने की दावत देता है।

हकीम अब्दुल हामिद साहब के निमंत्रण की कौन अनदेखी कर सकता था। उनकी शख्सियत ही इस तरह की थी। दिल्ली उनका आदर करती थी। हकीम साहब हमदर्द दवाखाना के संस्थापक थे,जो रूहफजा शर्बत बनाती है। हकीम साहब 1960 से कुछ पहले पुरानी दिल्ली को छोड़कर चाणक्यपुरी के कौटिल्य मार्ग में शिफ्ट कर गए थे।


उन्होंने अपने नए घर में आते ही होली और ईद मिलन का सिलसिला चालू कर दिया था। उनके होली मिलन में आम-खास सब शामिल रहते थे। वे मेहमानों का स्वागत करने के लिए मेन गेट के पास ही बैठ जाते थे। हकीम साहब के साथ उनके पाकिस्तान में चले गए छोटे भाई हकीम सईद साहब भी होते थे। वे होली मिलन में भाग लेने खासतौर से पाकिस्तान से आते थे। वे जब पाकिस्तान के सिंध प्रांत के गवर्नर थे, तब उनकी हत्या कर दी गई थी।


अभी होली मिलन परवान ही चढ़ने लगता था, तब तक हकीम साहब के पड़ोसी और भारतीय वायु सेना के मार्शल अर्जन सिंह, इंदिरा गांधी के लंबे समय तक सलाहकार रहे पी.एन.हक्सर और उर्दू के शायर गुलजार देहलवी वगैरह भी वहां पर पहुंच जाते थे। 

इस बीच, कंवरजी या बंगला स्वीट हाउस की दिव्य  गुझिया, बर्फी, भांति- भांति के कबाब, शीतल पेय वगैरह मिलने लगता था। सारा माहौल खुशनुमा रहता, चारों तरफ ठहाके लग रहे होते थे। उस होली मिलन में मंत्री, संतरी, उद्योगपति सब साथ-साथ होते थे। वहां पर होली मिलन के बहाने एक तरह से समाजवादी व्यवस्था बन जाती थी।


हकीम साहब कहते थे कि उन्हें होली और ईद बहुत प्रिय है। वे चाहते हैं कि उनके सब अपने इन दोनों मौकों पर उनके साथ ही रहे। वे किस्सों-कहानियों का खजाना थे। 94 साल की उम्र में हकीम साहब का 1999 में निधन हुआ तो उनका होली और ईद मिलन कुछ साल चलने के बाद बंद हो गया। हकीम साहब के परिवार ने उस रिवायत को आगे बढ़ाने की जरूरत महसूस नहीं की। वे आपस में पैसे और अरबों रुपए की प्रॉपर्टी के लिए लड़ने लगे।

 हकीम साहब के ना रहने के बाद से ही उसमें पहले वाली गर्मजोशी का अभाव आने लगा था। मेहमानों की उपस्थिति भी तेजी से घटने लगी थी। आखिर मेजबान  पहले जैसा नहीं रहा था। 


फोटो - श्रीमती इन्दिरा गांधी के साथ हकीम साहब जामिया हमदर्द यूनिवर्सिटी में । हकीम साहब ने ही इस यूनिवर्सिटी को खड़ा किया था।

शनिवार, 27 मार्च 2021

बोलती आलम आरा 1931

 🌹#आलमआरा (1931 फ़िल्म )


आलमआरा 1931 में बनी हिन्दी भाषा और भारत की पहली सवाक (बोलती) फिल्म है। 

इस फिल्म के निर्देशक अर्देशिर ईरानी हैं।

 ईरानी ने सिनेमा में ध्वनि के महत्व को समझते हुये, आलमआरा को और कई समकालीन सवाक फिल्मों से पहले पूरा किया। आलम आरा का प्रथम प्रदर्शन मुंबई के मैजेस्टिक सिनेमा में 14 मार्च 1931 को हुआ था।

 यह पहली भारतीय सवाक इतनी लोकप्रिय हुई कि "पुलिस को भीड़ पर नियंत्रण करने के लिए सहायता बुलानी पड़ी थी ।

💐निर्देशक  अर्देशिर ईरानी

💐लेखक  जोसेफ डेविड- मुंशी जहीर 

🌺अभिनेता

💐मास्टर विट्ठल

💐जुबैदा

💐पृथ्वीराज कपूर


🎼संगीतकार

💐फ़िरोज़शाह मिस्त्री

💐बहराम ईरानी


आलमआरा एक राजकुमार और बंजारन लड़की की प्रेम कथा है। यह जोसफ डेविड द्वारा लिखित एक पारसी नाटक पर आधारित है। जोसफ डेविड ने बाद में ईरानी की फिल्म कम्पनी में लेखक का काम किया।। फिल्म में एक राजा और उसकी दो झगड़ालू पत्नियां दिलबहार और नवबहार है। दोनों के बीच झगड़ा तब और बढ़ जाता है जब एक फकीर भविष्यवाणी करता है कि राजा के उत्तराधिकारी को नवबहार जन्म देगी। गुस्साई दिलबहार बदला लेने के लिए राज्य के प्रमुख मंत्री आदिल से प्यार की गुहार करती है पर आदिल उसके इस प्रस्ताव को ठुकरा देता है। गुस्से में आकर दिलबहार आदिल को कारागार में डलवा देती है और उसकी बेटी आलमआरा को देशनिकाला दे देती है। आलमआरा को बंजारे पालते हैं। युवा होने पर आलमआरा महल में वापस लौटती है और राजकुमार से प्यार करने लगती है। अंत में दिलबहार को उसके किए की सजा मिलती है, राजकुमार और आलमआरा की शादी होती है और आदिल की रिहाई ।

फिल्म और इसका संगीत दोनों को ही व्यापक रूप से सफलता प्राप्त हुई, फिल्म का गीत "दे दे खुदा के नाम पर" जो भारतीय सिनेमा का भी पहला गीत था और इसे अभिनेता वज़ीर मोहम्मद खान ने गाया था, जिन्होने फिल्म में एक फकीर का चरित्र निभाया था, बहुत प्रसिद्ध हुआ।

 उस समय भारतीय फिल्मों में पार्श्व गायन शुरु नहीं हुआ था, इसलिए इस गीत को हारमोनियम और तबले के संगीत की संगत के साथ सजीव रिकॉर्ड किया गया था।


फिल्म ने भारतीय फिल्मों में फिल्मी संगीत की नींव भी रखी, फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ने कहा फिल्म की चर्चा करते हुए कहा है, "यह सिर्फ एक सवाक फिल्म नहीं थी बल्कि यह बोलने और गाने वाली फिल्म थी जिसमें बोलना कम और गाना अधिक था। इस फिल्म में कई गीत थे और इसने फिल्मों में गाने के द्वारा कहानी को कहे जाने या बढा़ये जाने की परम्परा का सूत्रपात किया।"

तरन ध्वनि प्रणाली का उपयोग कर, अर्देशिर ईरानी ने ध्वनि रिकॉर्डिंग विभाग स्वंय संभाला था। फिल्म का छायांकन टनर एकल-प्रणाली कैमरे द्वारा किया गया था जो ध्वनि को सीधे फिल्म पर दर्ज करते थे। क्योंकि उस समय साउंडप्रूफ स्टूडियो उपलब्ध नहीं थे इसलिए दिन के शोरशराबे से बचने के लिए इसकी शूटिंग ज्यादातर रात में की गयी थी। शूटिंग के समय माइक्रोफ़ोन को अभिनेताओं के पास छिपा कर रखा जाता था।

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बुधवार, 24 मार्च 2021

अखबारों की भाषा / शिवनारायण

 अखबारों की भाषा / शिवनारायण 

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माननीयों की करतूत से बिहार शर्मसार होगा, पर हम तो अखबारों की भाषा से शर्मसार हैं !

जब हम छात्र थे,तो शिक्षक अच्छी भाषा सीखने के लिए अखबार पढ़ने की सलाह देते थे। क्या यही सलाह आज के छात्रों को दिया जा सकता है? अब देखिए,आज के दैनिक भास्कर के पहले पेज के मुख्य हेडिंग में ही व्याकरणिक दोष किस कदर मुंह चिढ़ा रहा है!

      'माननीयों! आपकी करतूत से बिहार शर्मसार'। इस हेडिंग का दोष देखें। हिंदी व्याकरण में संबोधन के तीन नियम बताए गए हैं--(१)आकारांत एकारांत में बदल जाता है।जैसे, माता--माते!,पिता--पिते! आदि। (२)ईकारांत इकारांत  में बदल जाता है।जैसे,सखी--हे सखि! आदि।  (३)ओं या यों से अनुस्वार हट जाता है।जैसे,भाइयो एवं बहनो,मुझे वोट दीजिए!  आदि।

       आप समझ सकते हैं कि इन नियमों के आलोक में यहां 'माननीयो' पर अनुस्वार नहीं होगा। परंतु व्याकरण के नियमों से हिंदी अखबारों को क्या लेना ?

हिंदी अखबारों में भाषाई दोष आम बात हो गई है।एक समय था जब  भाषा की साधना पत्रकारिता का मूल हुआ करती थी और इसी कारण पत्रकारिता और साहित्यकारिता (हिंदी सेवा) में अंतर नहीं किया जाता था।पर अब ?

        भाषा  की साधना का पत्रकारिता में आज कोई अर्थ नहीं रह गया है।इस कारण संपादक का मान भी नहीं रहा। हिंदी के अखबार भी अपराध, राजनीति आदि तक ही संकुचित हो कर रह गये। पहले ८ पेज के 'आर्यावर्त' को पढ़ने में घंटे भर का समय लग जाता था,जबकि आज २८-२८ पेज के अखबार २० मिनट में निबट जाते हैं।

आज की पत्रकारिता में आया यह अंतर उसका ह्रास है या विकास,इसपर अलग अलग राय हो सकती है, किंतु यह तो मानना ही पड़ेगा कि आज भी तत्त्वत: या अंतत: भाषा की साधना ही अच्छी पत्रकारिता का मूल्य है ! अखबारों द्वारा इस ओर भी ध्यान दिया जाना चाहिए!👌✌️🙏

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मंगलवार, 23 मार्च 2021

दारा सिंह की सुनी अनसुनी कथाएं

 यादो_के_झरोखों_से दारा सिंह 


अपने ज़माने के विश्व प्रसिद्ध #फ्रीस्टाइल पहलवान और प्रसिद्ध अभिनेता थे। दारा सिंह 2003-2009 तक राज्यसभा के सदस्य भी रहे। उन्होंने खेल और मनोरंजन की दुनिया में समान रूप से नाम कमाया और अपने काम का लोहा मनवाया। यही वजह थी कि उन्हें अभिनेता और पहलवान दोनों तौर पर जाना जाता था। 

आज उनके जन्मदिन पर नज़र डालते हैं उनके अनछुए पहलुओं पर....


👉उन्होंने 1959 में पूर्व विश्व चैम्पियन जॉर्ज गार्डीयांका को पराजित करके कॉमनवेल्थ की विश्व चैम्पियनशिप जीती थी। बाद में वे अमरीका के विश्व चैम्पियन लाऊ थेज को पराजित कर फ्रीस्टाइल कुश्ती के विश्व चैम्पियन बने। 'सूरत सिंह रंधावा' और 'बलवंत कौर' के बेटे दारा सिंह का जन्म आज ही के दिन 19 नवंबर, 1928 को पंजाब के अमृतसर के धरमूचक (धर्मूचक्क या धर्मूचाक या धर्मचुक) गांव के जाट-सिक्ख परिवार में हुआ था। उस समय देश में अंग्रेज़ों का शासन था। 


👉अपनी किशोर अवस्था में दारा सिंह दूध व मक्खन के साथ 100 बादाम रोज खाकर कई घंटे कसरत व व्यायाम में गुजारा करते थे।


👉कम उम्र में ही दारा सिंह के घरवालों ने उनकी शादी कर दी। नतीजतन महज 17 साल की नाबालिग उम्र में ही एक बच्चे के पिता  बन गए, लेकिन जब उन्होंने कुश्ती की दुनिया में नाम कमाया तो उन्होंने अपनी पसन्द से दूसरी शादी सुरजीत कौर से की। दारा सिंह के परिवार में तीन पुत्रियाँ और तीन पुत्र हैं।


👉1983 में कुश्ती से रिटायरमेंट लेने वाले दारा सिंह ने 500 से ज़्यादा पहलवानों को हराया और ख़ास बात ये कि ज़्यादातर पहलवानों को दारा सिंह ने उन्हीं के घर में जाकर चित किया। उनकी कुश्ती कला को सलाम करने के लिए 1966 में दारा सिंह को #रुस्तम-ए-पंजाब और 1978 में #रुस्तम-ए-हिंद के #ख़िताब से नवाज़ा गया।


👉दारा सिंह ने क़रीब 36 साल तक अखाड़े में पसीना बहाया और अब तक लड़ी कुल 500 कुश्तियों में से दारा सिंह एक भी नहीं हारे, जिसकी बदौलत उनका नाम ऑब्जरवर न्यूजलेटर हॉल ऑफ फेम में दर्ज है। दारा सिंह की कुश्ती के दीवानों में भारत के #पहले प्रधानमंत्री #जवाहर लाल नेहरू समेत कई दूसरे प्रधानमंत्री भी शामिल थे। सही मायने में दारा सिंह कुश्ती के दंगल के वो शेर थे, जिनकी दहाड़ सुनकर बड़े-बड़े पहलवानों ने दुम दबाकर अखाड़ा छोड़ दिया।


👉लगभग 60 साल तक दारा सिंह ने हिंदुस्तान के दिल पर राज किया है। आज की पीढ़ी को शायद अंदाज़ा भी ना हो कि अखाड़े से अदाकारी के मैदान में उतरे दारा सिंह बॉलीवुड के पहले ही मैन माने जाते हैं। वो टारजन सीरीज़ की फ़िल्मों के हीरो रहे हैं। दारा सिंह अपनी मजबूत क़द काठी की वजह से फ़िल्मों में आए।


👉6 फीट 2 इंच लंबे इस गबरू जट्ट पर बॉलीवुड इस कदर फ़िदा हुआ कि पहलवान दारा सिंह बन गए अभिनेता दारा सिंह। दारा सिंह ने अपने समय की मशहूर अदाकारा #मुमताज़ के साथ हिंदी की स्टंट फ़िल्मों में प्रवेश किया और कई फ़िल्मों में अभिनेता बने। 


👉फ़िल्म अभिनेत्री मुमताज़ का कैरियर संवारने में भी सबसे बड़ा सहारा दारा सिंह का साथ ही साबित हुआ। मुमताज़ के साथ 16 फ़िल्मों में काम किया। 


👉मुमताज़ के साथ दारा सिंह की जोड़ी बनी 1963 में फ़िल्म 'फौलाद' से। शोख-चुलबुली मुमताज़ और #ही_मैन दारा सिंह की जोड़ी का जादू क़रीब पांच साल तक सिल्वर स्क्रीन पर छाया रहा। दारा सिंह और मुमताज़ ने 'वीर भीमसेन', 'हरक्यूलिस', 'आंधी और तूफान', 'राका', 'रुस्तम-ए-हिंद', 'सैमसन', 'सिकंदर-ए-आज़म', 'टारज़न कम्स टु डेल्ही', 'टारज़न एंड किंगकांग', 'बॉक्सर', 'जवां मर्द' और 'डाकू मंगल सिंह' समेत क़रीब डेढ़ दर्ज़न फ़िल्मों में साथ काम किया।


👉दारा सिंह की पहली फ़िल्म 'संगदिल' 1952 में रिलीज़ हुई, जिसमें दिलीप कुमार और मधुबाला मुख्य भूमिकाओं में थे। 1955 में वो फ़िल्म 'पहली झलक' में पहलवान बनकर आए, जिसमें मुख्य किरदार किशोर कुमार और वैजयंती माला ने निभाया था। कुश्ती और फ़िल्मों में एक साथ मौजूदगी दर्ज़ कराते रहे दारा सिंह की बतौर हीरो पहली फ़िल्म थी 'जग्गा डाकू', जिसके बाद वो बॉलीवुड के पहले एक्शन हीरो के तौर पर छा गए।


👉दारा सिंह की असल पहचान बनी 1962 में आई फ़िल्म #किंग_कॉन्ग’ से। इस फ़िल्म ने उन्हें शोहरत के आसमान पर पहुंचा दिया। ये फ़िल्म कुश्ती पर ही आधारित थी। किंग कांग के बाद 'रुस्तम-ए-रोम', 'रुस्तम-ए-बग़दाद', 'रुस्तम-ए-हिंद' आदि फ़िल्में कीं। सभी फ़िल्में सफल रहीं। मशहूर फ़िल्म आनंद में भी उनकी छोटी-सी किंतु यादगार भूमिका थी। उन्होंने कई फ़िल्मों में अलग-अलग किरदार निभाए हैं। वर्ष 2002  में 'शरारत', 2001 में 'फर्ज', 2000 में 'दुल्हन हम ले जाएंगे', 'कल हो ना हो', 1999 में 'ज़ुल्मी', 1999 में 'दिल्लगी' और इस तरह से अन्य कई फ़िल्में।


👉यही नहीं कई फ़िल्मों में वह #निर्देशक व #निर्माता भी बने। दारा सिंह ने कई हिंदी फ़िल्मों का निर्माण किया और उसमें खुद हीरो रहे।


👉बॉलीवुड में आज हर सुपरस्टार पर शर्ट खोलकर मसल्स दिखाने की जो धुन सवार है, उसका चलन शुरू हुआ था दारा सिंह के जरिए ही ।


👉कुश्ती के बाद दारा सिंह को सबसे ज़्यादा प्यार फ़िल्मों से ही रहा। उन्होंने मोहाली के पास #दारा_स्टूडियो बनाया और ढे़र सारी फ़िल्में भी। उन्होंने पहली फ़िल्म बनाई अपनी मातृभाषा पंजाबी  में 'नानक दुखिया सब संसार'। भक्ति भावना वाली यह फ़िल्म जबर्दस्त हिट रही। इसके बाद 'ध्यानी भगत', 'सवा लाख से एक लडाऊं' व 'भगत धन्ना जट्ट' आदि फ़िल्मों का निर्माण भी उन्होंने किया। दारा सिंह ने हिंदी और पंजाबी में 8 फ़िल्में निर्मित कीं, 8 फ़िल्मों का निर्देशन किया और 7 फ़िल्मों की कहानी भी खुद ही लिखी। सौ से ज़्यादा फ़िल्मों में अदाकारी कर चुके दारा सिंह की आख़िरी यादगार फ़िल्म थी 2007 में इम्तियाज अली की फ़िल्म 'जब वी मेट', जिसमें उन्होंने करीना कपूर के दादाजी का किरदार निभाया। वो आख़िरी दम तक फ़िल्मों में जुड़ा रहना चाहते थे, लेकिन बढ़ती उम्र और बिगड़ती सेहत साथ नहीं दे रही थी, लिहाज़ा दारा सिंह ने 2011 में लाइट-कैमरा और एक्शन को अलविदा कह दिया।


👉कोई एक किरदार कैसे किसी की मुकम्मल पहचान बदल देता है, इसकी मिसाल हैं दारा सिंह। सीरियल रामायण में हनुमान के किरदार ने उन्हें घर-घर में ऐसी पहचान दी कि अब किसी को याद भी नहीं कि दारा सिंह अपने ज़माने के 'वर्ल्ड चैंपियन पहलवान' थे। ये वो किरदार है, जिसने पहलवान से अभिनेता बने दारा सिंह की पूरी पहचान बदल दी। 1986 में रामानंद सागर के सीरियल रामायण में दारा सिंह हनुमान के रोल में ऐसे रच-बस गए कि इसके बाद कभी किसी ने किसी दूसरे कलाकार को हनुमान बनाने के बारे में सोचा ही नहीं। रामायण सीरियल के बाद आए दूसरे पौराणिक धारावाहिक महाभारत में भी हनुमान के रूप में दारा सिंह ही नज़र आए। 1989 में जब 'लव कुश' की पौराणिक कथा छोटे परदे पर उतारी गई, तो उसमें भी हनुमान का रोल दारा सिंह ने ही किया। 1997 में आई फ़िल्म 'लव कुश' में भी हनुमान बने दारा सिंह।


👉दारा सिंह का 84 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से 12 जुलाई 2012 को निधन हुआ। इस प्रकार एक सफल पहलवान, एक सफल अभिनेता, निर्देशक और निर्माता के तौर पर दारा सिंह ने अपने जीवन में बहुत कुछ पाया और साथ ही देश का गौरव बढ़ाया ।

साभार - भारतकोश ( ज्ञान का महासागर )

टीआरपी घोटाला मामला और व्हाट्सएप चैट लीक घोटाला

 #टीआरपी घोटाला मामला और  व्हाट्सएप चैट लीक मामले में रिपब्लिक भारत के मालिक और एंकर पत्रकार अर्णब गोस्वामी के खिलाफ मुंबई पुलिस ने चार्ज शीट दाखिल किया है जिसमें चैट की पूरी कॉपी शामिल है आप भी जानिए आखिर क्या है पूरा मामला।


रिपब्लिक भारत के मालिक और एंकर पत्रकार अर्णब गोस्वामी और पूर्व बार्क के अध्यक्ष पार्थ दासगुप्ता के बीच व्हाट्सएप चैट लीक हो जाने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल उठता है कि?


बालाकोट में हुए इतने बड़े स्ट्राइक की जानकारी आखिर किसने एक पत्रकार को दी और एक पत्रकार ने बार्क जैसे संस्थान के अध्यक्ष को दी।


महाराष्ट्र पुलिस की अपराध शाखा के अनुसार पार्थ दासगुप्ता टीआरपी घोटाले के मुख्य साजिशकर्ता थे। दासगुप्ता ने कई लोगों के साथ मिल कर कुछ खास टीवी समाचार चैनलों को वित्तीय लाभ पहुँचाने के लिए टीआरपी से छेड़छाड़ की। साथ ही मुंबई पुलिस ने अदालत में यह भी कहा था कि रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्णब गोस्वामी ने समाचार चैनल के दर्शकों की संख्या बढ़ाने के लिए दासगुप्ता को ‘‘लाखों रुपये’’ की कथित तौर पर रिश्वत दी थी।


अब कुछ सुलगते सवाल जिनका जवाब शायद सरकार और देश के जांच एजेंसियों के पास ना हो।


1. कोई भी ऐसे ऑपरेशन की जानकारी देश के प्रधानमंत्री गृह मंत्री, एनएसए चीफ, एयरफोर्स चीफ और रक्षा मंत्री के पास बस होता है यह जानकारी ऑपरेशन से पहले पायलट को भी पता नहीं होता तो यह जानकारी अर्णब गोस्वामी तक कैसे पहुंची?


2 अर्णब ने पार्थ दास गुप्ता को स्ट्राइक से 3 दिन पहले  23 फरवरी को यह कहा कि कुछ बड़ा होने वाला है तब पार्थ दास गुप्ता ने पूछा दाऊद तब अर्णब गोस्वामी ने जवाब दिया नहीं पाकिस्तान पर कुछ बड़ा होने वाला है और इससे देश की जनता में जोश आ जाएगा और उससे देश के बिग मैन को इस सीजन में चुनाव में बहुत फायदा होगा इससे हमारा भी बहुत फायदा होगा।


3 तो क्या अर्णब गोस्वामी पत्रकारिता छोड़कर मोदी को चुनाव जिताने में लगे हैं और क्या देश के प्रधानमंत्री और बीजेपी देश के जनता के भावनाओं से खेलते हुए चुनाव जीत रहे हैं? जब बालाकोट एयर स्ट्राइक की जानकारी एक पत्रकार को पहले से है साथ ही वह कहता है कि इससे देश की जनता में जोश आ जाएगा और चुनाव में बिगमैन को फायदा होगा तो क्या यह सभी प्रायोजित था ताकि देश की जनता के भावनाओं से खेलते हुए बीजेपी उपचुनाव जीत जाए।


4 और क्या लोकतंत्र की गरिमा बचाने के लिए बार्क के पूर्व अध्यक्ष और रिपब्लिक भारत के तत्कालीन मालिक अर्णब गोस्वामी के ऊपर official secret act 1923 के तहत एफ आई आर दर्ज होगा जिसमें कठोर से कठोर सजा का प्रावधान है।

फांसी के करीब पहली महिला शबनम का सच

 भारत के इतिहास में आजादी के बाद पहली बार होगी किसी महिला को फांसी,अनोखी प्रेम कहानी, जाने कौन है शबनम और क्या है पूरा मामला।👇👇👇


दरअसल मामला उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के बावन खेड़ी गांव का है जब एक अंधी प्रेम कहानी ने पूरे परिवार को लाशों में तब्दील कर दिया। प्रेम का परवान ऐसा चढ़ा कि सीधा अब फांसी के फंदे तक जाकर खत्म होगा। 


मामला बावन खेड़ी गांव का है 


 एक शबनम नाम की युवती गांव के ही एक सलीम नाम के युवक से प्रेम करती थी युवक भी छुप  छुपकर मिलने आया जाया करता था। लेकिन यह बात शबनम के परिवार वालों को मंजूर नहीं था। यह बात जानने के बाद आरोपी सलीम ने शबनम को पूरे परिवार की हत्या करने की सलाह दी और 14 अप्रैल 2008 की रात को सबसे पहले शबनम ने परिवार वालों को नींद की गोलियां दी और फिर नींद की गोलियां देने के बाद कुल्हाड़ी से  बारी बारी परिवार के 7 लोगों की हत्या कर दी जिसमें पिता सौकत, मां हाशमी, भाई अनीश, रसीद, फुफेरी बहन राबिया, भाभी अजुंब और 10 महीने का भतीजा अर्श थे। फिर इस मर्डर को नए मोड़ देने  की कोशिश की गई और सुबह होते ही शबनम ने पूरे मोहल्ले में शोर मचाना शुरू कर दिया, लेकिन एक मशहूर कहावत है ना कि कानून के हाथ लंबे होते हैं सारे मामले का खुलासा तब हुआ जब पुलिस को चाय पत्ती के डिब्बे में एक सिम कार्ड मिली और जब उस सिम कार्ड की डिटेल निकाली गई तब घटना की रात शबनम ने सलीम को 50 से ज्यादा बार कॉल किया था। यही कॉल डिटेल के माध्यम से मामले की विवेचना हुई तब सब दूध का दूध पानी का पानी हो गया। यह खूनी घटना सुबह होती तक पूरे देश और राज्य में अखबार की सुर्खियों में आ गई और तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती भी पीड़ित परिवार का जायजा लेने पहुंची थी। 


शबनम शादी से पहले ही सलीम के तरफ से प्रेग्नेंट हो चुकी थी और उन्होंने जेल में एक बच्चे को भी जन्म दिया जिसका नाम ताज है।

शबनम को 2008 में ही निचली अदालत ने फांसी की सजा सुना दी, लेकिन मामला आगे बढ़ते गया और 2015 में भी फांसी की सजा सुनाई गई अब मामला राष्ट्रपति के पास दया याचिका के लिए पहुंची थी उसे भी देश के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने खारिज कर दिया यह मांग शबनम के वकील, उनके दोस्त और उनके बेटे द्वारा की गई थी। दरअसल अनुच्छेद 72 के तहत भारत के राष्ट्रपति के पास  अधिकार होता है कि किसी भी आरोपी की फांसी या सजा को माफ कर सकते हैं।


 शबनम को मथुरा जेल में ही फांसी होगी इसके लिए बक्सर से फांसी में चढ़ाने के लिए रस्सी भी मंगा लिया गया है और निर्भया कांड के आरोपियों को मौत का रास्ता दिखाने वाले पवन जल्लाद ही शबनम को फांसी के फंदे पर चढ़ाएंगे।

सिमोन वेल (1909-43)

 वह संत थी, योद्धा थी, विचारक थी, कार्यकर्ता थी

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सिमोन वेल (1909-43) वामपंथी गतिविधियों से जुड़ी 20 वीं सदी की प्रख्यात राजनीतिक कार्यकर्ता और विचारक।  दूसरे महायुद्ध के दौरान उन्होंने फासीवाद के ख़िलाफ़  फ्रेंच प्रतिरोध दस्ते में काम किया और उनके निधन के बाद उनके लेखन का फ्रेंच और अंग्रेजी सामाजिक विचारों पर गहरा असर पड़ा है।'वेटिंग फ़ॉर गॉड',' ग्रेविटी एन्ड ग्रेस' , 'द नीड फ़ॉर रूट्स' मशहूर किताबें। सिमोन का व्यक्तित्व  बीसवीं सदी के वामपंथी बौद्धिको  के बीच  विलक्षण ही कहा जाएगा की उन्होंने मज़दूर चेतना, फासीवाद के प्रतिरोध के   संघर्ष , वंचितों और शोषितों  के प्रति गहरी संलग्नता और आध्यात्मिक चेतना को एक दूसरे से जोड़ दिया। एक साधन संपन्न घर में जन्म लेकर  और  पेशे से   शिक्षक होकर भी वे फैक्टरी कामगारों  के बीच रहीं, उन जैसा ही जीवन जिया, यातना,अपमान , अनिश्चितता,  अभाव, भूख, शोषण और  निर्धनता  के साथ अपने निजी ज़िन्दगी  को प्रत्यक्ष रूप से जोड़कर देखा। भूखे रहकर या   बहुत अल्प  भोजन  करते हुए अपनी दिनचर्या को संयोजित करना   उन्होंने बचपन से   सीख लिया था  ।  1933 में जर्मनी में हिटलर के सत्ता में आने के बाद सिमोन वेल  की गतिविधियां वामपंथी चेतना से जुड़े भूमिगत कार्यकर्ताओं   के बीच अधिकाधिक बढ़ती गईं।1936 में जनरल फ्रैंको के तानाशाही  के विरुद्ध छिड़े स्पेन के गृह युध्द  में वे अग्रिम दस्ते की जुझारू पत्रकार के रूप में कार्यरत रहीं।उनकी पुस्तक 'ऑपरेशन इन लिबर्टी'  के अधिकांश निबंध भी इन्हीं दिनों प्रकाश में आए जो आज संसार भर में चर्चित हैं।भूख और अभाव का उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा।24 अगस्त 1943 को 34 वर्ष की आयु में टीबी सेनेटोरियम में उनका निधन हुआ।

उनके निधन पर प्रख्यात कवि टी.एस. इलियट ने लिखा "वे चाहतीं तो संत  बन सकती थीं। लेकिन उन्होंने एक दूसरी राह  चुनी ।हर सम्भावित संत एक मुश्किल व्यक्ति ही  होता है। हम जैसे लेखकों की तुलना मे उन्होंने एक कठिन जीवन चुना,  उनकी  दुश्वारियां ज़्यादा थीं , और हममें से किसी से भी ताकत भी उनके भीतर ज़्यादा थी।उनके भीतर अपने वजूद की एक अतिमानवीय विनम्रता भी थी और एक अविश्वनीय ज़िद भी। "

सोमवार, 22 मार्च 2021

विस्मय कारी हैं औरंगाबाद महाराष्ट्र का मंदिर

 स्थापत्य कला का एक रहस्य 


   विश्वमे सबसे भव्य एक ही पत्थरसे तराशा गया इतना भव्य शिवालय या तो आजके विज्ञान संम्पन युगमे भारतीय स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है या फिर कोई दैवी शक्ति का चमत्कार । एक ही पहाड़ को तराश कर इस मंदिर का निर्माण करनेमे या यों 200 -300 साल की हजारो कारीगर की सतत निर्माण प्रक्रिया शुरू रादि होगी या फिर किवंदती अनुसार किसी राजवी की महारानी के संकल्प अनुसार सिर्फ सात दिनमे किसी उच्च कोटि के साधक की किसी दिव्य शक्तिने ये निर्माण किया हो सकता है ।

फ्रांस ,रशिया ओर अमेरिकन वैज्ञानिकों के मतानुसार ये मानव निर्मित नही पर कोई परलोक से आई कृपा है । पुरातत्व विदो के मतानुसार ये हजारो साल पहले के भारतीय शिल्प शास्त्र की देन है । समय के प्रवाह में ऐसे अद्भुत स्थानों के साथ अनेक कथाएं जुड़ जाती है ,पर इस मंदिर के शिवलिंग के दर्शन मात्रसे अनेक प्रकार की असाध्य बीमारी नष्ट हो जाती है ये हजारो मरीजो का स्वयम अनुभव है । इसलिए यहां की इस लोकवायका की राजा के स्वास्थ्य केलिए शिवजी की मन्नत मांगी और राजा स्वस्थ हो गए इस बात में कुछ तथ्य लगता है ।इस मंदिर की भव्यता ओर सुंदरता के सामने दुनिया के सात अजूबे नगण्य है । प्रसाशन द्वारा सुविधायुक्त पर्यटन व्यवस्था की जाय तो ये विश्वका सबसे आकर्षण केंद्र हो सकता है । 


   महाराष्ट्र के औरंगाबाद में धुश्मेश्वर क्षेत्रमे आये इस स्थान के कही और भी चमतकारी कहानियां सुनने को मिलती है । ये वही पत्थर है जो करोड़ों साल पहले धरती के गर्भ से लावे के रूप में निकला था और बाद में ठंडा होकर जमने से, इसने पत्थर का रूप लिया


कैलास मंदिर को U आकार में उपर से नीचे काटा गया है जिसे पीछे की तरफ से 50 मीटर गहरा खोदा गया है. पर आप सोचिये इतनी कठोर और मजबूत चट्टान को किस चीज़ से काटा गया होगा?..कुछ खोजकर्ताओं का कहना है कि इस प्रकार की जटिल संरचना का आधुनिक तकनीक की मदद से निर्माण करना आज भी असंभव है.

क्या वो लोग जिन्होंने इस मंदिर को बनाया आज से भी ज्यादा आधुनिक थे?..

ये एक जायज सवाल है


यहाँ कुछ वैज्ञानिक आँकड़ों पर बात कर लेते हैं,..

पुरातात्विदों का कहना है कि इस मंदिर को बनाने के लिए 400,000 टन पत्थर को काट कर हटाया गया होगा और ऐसा करने में उन्हें 18 साल का समय लगा होगा .

माना की इस काम को करने के लिए वहाँ काम कर रहे लोग 12 घंटे प्रतिदिन एक मशीन की तरह कार्य कर रहे होंगे जिसमें उन्हें कोई ब्रेक या रेस्ट नहीं मिलता होगा वो पूर्ण रूप से मशीन बन गये होंगे .

तो अगर 400,000 टन पत्थर को 18 साल में हटाना है तो उन्हें हर साल 22,222 टन पत्थर हटाना होगा , जिसका मतलब हुआ 60 टन हर दिन और 5 टन हर घंटे .ये समय तो हुआ मात्र पत्थर को काट कर अलग करने का...

उस समय का क्या जो इस मंदिर की डिजाईन, नक्काशी और इसमें बनाई गयीं सैंकड़ों मूर्तियों में लगा होगा.


एक प्रश्न जो और है वो ये है कि जो पत्थर काट कर बाहर निकाला गया वो कहाँ गया?? उसका इस मंदिर के आसपास कोई ढेर नहीं मिलता..ना ही उस पत्थर का इस्तेमाल किसी दूसरे मंदिर को बनाने या अन्य किसी संरचना में किया गया,..

आखिर वो गया तो गया कहाँ??

क्या आप को अभी भी लगता है कि ये कारनामा आज से हजारों वर्ष पहले मात्र छेनी और हथौड़े की मदद से अंजाम दिया गया होगा.।राष्ट्रकूट राजाओं ने वास्तुकला को चरम पर लाकर रख दिया, जैसा कि बताया जाता है इस मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट वंश के राजा कृष्ण प्रथम(756 - 773) ने करवाया था.

यह मंदिर उस भारतीय वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है जिसका मुकाबला पूरी दुनिया में आज भी कोई नहीं कर सकता.


ये औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में भगवान शिव का मंदिर है...

जो एक पहाड़ को काटकर बनाया गया है और इसको बनाने में 200 साल लगे हैं।

अच्छे से अच्छा धरोहर हमारे देश मे हैं कभी इनपर ध्यान दीजिए।

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि भगवान शिव के इस मंदिर के रहस्य के बारें में आज भी मात्र 10 से 15 प्रतिशत हिन्दू ही जानतेहैं.लेकिन औरंगाबाद स्थित कैलाश मंदिर के बारें में बोला जाता है कि इस मंदिर का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि इसमें ईंट और पत्थरों का इस्तेमाल नहीं हुआ है.

एक पहाड़ी को इस तरह से काटा गया है कि आज एक पहाड़ी ही मंदिर है.

इस मंदिर को ऊपर से नीचे बनाया गया है.

जबकि आज इमारत हम नीचे से ऊपर बनाते हैं.


आज तक विज्ञान भी कैलाश मंदिर की इस सच्चाई का पता नहीं लगा पाया है कि किस तरह से और किस तरह की मशीनों से इस शिव मंदिर का निर्माण किया गया होगा.

भारत तो दूर की बात है अमेरिका, रूस के वैज्ञानिक भी ऐसा बोलते हैं कि इस मंदिर को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे मंदिर स्वर्ग से बना-बनाया ही उतारा गया हैं.

 वेदों में बौमास्त्र नामक एक अस्त्र लिखा गया गया है जो शायद इस तरह के निर्माण को कर सकता था. "

इस मंदिर के निर्माण में 40 हजार टन भारी पत्थर का निर्माण किया गया है तब जाकर 90 फीट ऊँचा मंदिर बना है.

वहीँ इस मंदिर को बनाने में कुछ 7000 लोगों ने काम किया है और 150 साल इस मंदिर को बनाने में लगे हैं.

औरंगाबाद का यह शिव मंदिर इतना शक्तिशाली बताया जाता है कि यहाँ कई तरह की बिमारियों का ईलाज शिव के दर्शन मात्र से ही खत्म हो जाते हैं ऐसा बताया जाता है.

वहीँ मंदिर में कई रहस्मयी गुफाएं हैं जहाँ कहते हैं कि शिव से जुड़े कई राज इन गुफाओं में हैं लेकिन आज इनको बंद कर रखा है।..


परम कृपालु शिवपिता की अमी दृष्टि से सर्व जगत स्वस्थ और अरोग्यमय बने यही प्रार्थना सह अस्तु ..श्री मात्रेय नम

मुधु ब्लवंत शेट्टी जिसको ख़ामोशी से लोग खौफ खाते the

 फ़िल्मी दुनिया का ऐसा चेहरा जिसकी सिर्फ ख़ामोशी पर्दे पर दहशत पैदा कर देती थी।


वो थे 'मुद्दु बाबू शेट्टी' उर्फ 'मुधू बलवंत शेट्टी' उर्फ 'एम बी शेट्टी'। जिन्हें हम सब 'शेट्टी' के नाम से जानते हैं। इनका जन्म १९३८ में मैंगलोर में हुआ था। इनकी पहली पत्नी का नाम विनोदिनी और दूसरी का नाम रत्ना था।


इनकी पढ़ाई में कोई दिलचस्पी नहीं थी। जिस कारण इनके पिता ने इनको मुंबई भेज दिया, कि वहाँ कोई काम सीख कर रोजी रोटी कमा लेंगे। यहाँ आ कर कुछ समय इन्होंने वेटर का काम किया। इसके बाद इनकी दिलचस्पी बॉक्सिंग में हुई। जिसमें क़रीब ८ सालों तक जुड़े रहे और कई टूर्नामेंट जीते।


फिल्मों में इनकी शुरुआत फ़िल्म 'हीर' से हुई , जिसमे ये फाइट इंस्ट्रक्टर थे। वो वक्त जब फिल्मों में स्टंट पर काफी जोर दिया जाता था, लेकिन जितने जरूरी स्टंट होते थे उतने जरूरी ही विलेन भी..यानि अगर बिना विलेन के फिल्म और हीरो की कहानी अधूरी ही मानी जाती थी। उसी दौर में एक ऐसा एक्टर हुआ जिसने विलेन के किरदार निभाकर ऐसा कॉम्टीशन पैदा किया कि विलेन का रोल प्ले करने वाले बाकी एक्टर भी डर गए।


एम बी शेट्टी ७० के दशक में पॉपुलर विलेन रहे और आगे चलकर बॉलीवुड के मशहूर स्टंटमैन बने। एम बी शेट्टी ने अपने करियर की शुरुआत फाइट इंस्ट्रक्टर के तौर पर की। इसके बाद वो एक्शन डायरेक्टर बने और फिर एक्टर। एम बी शेट्टी ने १९५७ में एक्टिंग में अपने कदम रखे। उन्होंने 'द ग्रेट गैंबलर', 'त्रिशूल' 'डॉन', 'कसमें वादे' जैसी दर्जनों फिल्मों में अपनी एक्टिंग का जौहर दिखाया।


एक्टिंग के अलावा एम बी शेट्टी ने कई फिल्मों में स्टंट कॉर्डिनेटर, फाइट कंपोजर, स्टंट कपोजर और स्टंट मास्टर के तौर पर काम किया। इन फिल्मों में 'जब प्यार किसी से होता है , 'कश्मीर की कली', 'सीता और गीता', 'डॉन' और 'द ग्रेट गैंबलर' जैसी फिल्में शामिल हैं।


एम बी शेट्टी जैसा एक्टर और स्टंट मास्टर ना तो कभी हुआ और ना ही कभी होगा, लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने जी-तोड़ मेहनत की। एम बी शेट्टी को एक्शन और स्टंट से इस कदर लगाव था कि वो अपने घर में चारों तरफ दुनिया के मशहूर विलेन की फोटो लगाए रहते, लेकिन एक हादसा ऐसा हुआ जिसने एम बी शेट्टी को सभी से दूर कर दिया। कहा जाता है कि अपने ही घर में फिसलकर गिर गए जिससे उन्हें काफी चोट लगी। एक तो पहले से ही स्टंट करने के दौरान उन्हें टांगों में काफी चोट लग चुकी थी। साथ ही वो शराब भी खूब पीते थे और इस सबका उन पर बुरा असर हुआ कि जब वो घर में फिसलकर गिरे तो उबर नहीं पाए और (२३ जनवरी १९८२) को इस दुनिया से विदा हो गए।


उनके बाद उनके घर के हालात काफी ख़राब हो गए। ऐसे में उनकी वाइफ रत्ना शेट्टी को आगे आना पड़ा और उन्होंने कुछ फिल्मों में अभिनय किया। 'अंत', 'यार-गद्दार' (१९९४) 'दरार'(१९९६), 'अफ़साना दिलवालों का'(२००१)


यहाँ आपको बताते चलें घर के हालात को देखते हुए एम बी शेट्टी और रत्ना शेट्टी के बेटे 'रोहित शेट्टी' ने १५ वर्ष की उम्र से फिल्मों में संघर्ष शुरू कर दिया। आज उनकी गिनती फ़िल्म जगत के सफलतम व मंहगे निर्देशकों में होती है।


जानकारी स्त्रोत : गूगल

अपने समय के सबसे अलग संगीतकार थे ओ पी नैय्यर

 ओपी नैयर का पूरा नाम ओंकार प्रसाद नैयर है। नैयर के बारे में कहा जाता है, वह संगीत और जिंदगी दोनों को अपनी शर्तों पर जीते थे। अक्खड़पन और सादगी ओपी नैयर की पहचान थी


ओपी नैयर के करियर की शुरुआत 1952 में हुई। नैयर को उनके पहले गाने के लिए 12 रुपए मिले। नैयर ने इसके बाद एक-एक कर हिट गाने देना शुरू किया। उनके गानों को लोग इस कदर पसंद करने लगे कि वह फिल्म में म्यूजिक देने के लिए 1 लाख रुपए तक चार्ज करने लगे। 


वहीं इस दौर में वह सबसे ज्यादा पैसे लेने वाले संगीतकार बन गए थे। इस बीच ओपी नैयर और गुरु दत्त की दोस्ती होती है। भारतीय फिल्म संगीत के चाहने वालों के बीच ओपी नैय्यर ऐसे म्यूज़िक डायरेक्टर के तौर पर याद किए जाते हैं, जिन्हें लोकप्रिय संगीत रचने में महारत हासिल थी। ओपी नैय्यर ने 50 और 60 के दशक में इतने कामयाब गीत कंपोज़ किए है कि उन्हें किसी लिस्ट में समेटना मुमकिन नहीं है…उनके गाने उड़े जब-जब ज़ु्ल्फें तेरी, ये देश है वीर जवानों का, लेके पहला पहला प्यार, बाबूजी धीरे चलना आज भी लोगों के दिलों मे बसते हैं।


ओपी नैयर का विवादों से भी खासा नाता रहा है। लता मंगेशकर के साथ उनके विवाद के किस्से काफी मशहूर हैं। दरअसल ओपी नैयर ने तय किया की वह कभी भी लता मंगेशकर के साथ काम नहीं करेंगे। ओपी नैयर ने हमेशा कहा कि लता जी की आवाज में पाकीजगी थी। उन्हें शोखी की जरूरत थी, जो आशा भोसले या शमशाद बेगम की आवाज में ज्यादा थी। ओपी नैयर ने इस दौर में बड़े दुश्मन बनाए। मोहम्मद रफी से भी उनकी अनबन हुई। दरअसल नैयर हर काम समय पर करना पसंद करते थे, एक दिन नैय्यर को एक गाना रफी के साथ रिकॉर्ड करना था। 


नैयर रफी साहब का इंतजार कर रहे होते हैं लेकिन रफी साहब समय से एक घंटा लेट पहुंचते हैं। नैयर इस बात को लेकर रफी से काफी झगड़ा करते हैं। दोनों की यह लड़ाई लगभग तीन साल तक चलती है। एक दिन रफी साहब अचानक नैयर के घर पहुंच जाते हैं। नैयर रफी को उनके घर पर देखकर भावुक होकर गले लगा लेते हैं और दोनों फिर से साथ हो जाते हैं। 28 जनवरी 2007 को ओपी नैयर दुनिया से रुखसत हो गए, लेकिन बीच के इन करीब 81 साल में उन्होंने  किया, उसे संगीत जगत हमेशा याद रखेगा।


Source -Amarujala

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भारतीय सिनेमा की पहली स्टार अभिनेत्री 'देविका रानी'

 भारतीय सिनेमा की पहली स्टार अभिनेत्री 'देविका रानी' अपने गर्म स्वभाव के चलते इन्हें 'ड्रैगन लेडी' भी कहा जाता था। जिस दौर में लड़कियों को घर से निकलने की इजाजत नहीं थी, उस दौर में उन्होंने अभिनेत्री बनकर लड़कियों के लिए नए रास्ते खोले।


'देविका रानी चौधरी' का जन्म ३० मार्च १९०८ को वाल्टेयर (विशाखापटनम) में हुआ था। वे विख्यात कवि श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर के वंश से सम्बंधित थीं, श्री टैगोर उनके चचेरे परदादा थे। देविका रानी के पिता कर्नल एम.एन. चौधरी मद्रास के पहले 'सर्जन जनरल' थे। उनकी माता का नाम श्रीमती लीला चौधरी था। स्कूल की शिक्षा समाप्त करने के बाद १९२० के दशक के आरंभिक वर्षों में देविका रानी नाट्य शिक्षा ग्रहण करने के लिये लंदन चली गईं और वहाँ वे 'रॉयल एकेडमी आफ ड्रामेटिक आर्ट' (RADA) और रॉयल 'एकेडमी आफ म्युजिक' नामक संस्थाओं में भर्ती हो गईं। वहाँ उन्हें 'स्कालरशिप' भी प्रदान किया गया। उन्होंने 'आर्किटेक्चर', 'टेक्सटाइल' एवं 'डेकोर डिजाइन' विधाओं का भी अध्ययन किया और 'एलिजाबेथ आर्डन' में काम करने लगीं। अध्ययन काल के मध्य देविका रानी की मुलाकात हिमांशु राय से हुई। हिमांशु राय ने देविका रानी को 'लाइट ऑफ एशिया' नामक अपने पहले प्रोडक्शन के लिया सेट डिजाइनर बना लिया। सन् १९२९ में उन दोनों ने विवाह कर लिया।


विवाह के बाद हिमांशु राय को जर्मनी के प्रख्यात यू॰एफ॰ए॰ स्टुडिओ में 'ए थ्रो ऑफ डाइस' नामक फिल्म बनाने के लिये निर्माता का काम मिल गया और वे देविका के साथ जर्मनी आ गये। देविका रानी जर्मन सिनेमा से बहुत इंस्पायर्ड थीं। जर्मन एक्ट्रेस मार्लिन डीट्रिच को वो काफी फॉलो करती थीं। उनकी एक्टिंग स्टाइल की तुलना ग्रेटा गार्बो से भी की गई। जिस कारण उन्हें ‘इंडियन गार्बो’ जैसे कॉम्प्लिमेंट भी दिए गए। 


हिमांशु राय ने जब वर्ष १९३३ में फ़िल्म कर्मा का निर्माण किया तो उन्होंने नायक की भूमिका स्वयं निभायी और अभिनेत्री के रूप में देविका रानी का चुनाव किया। यह किसी इंडियन द्वारा बनाई गई पहली अंग्रेजी संवादों वाली फिल्म थी। फ़िल्म में देविका रानी ने हिमांशु राय के साथ लगभग चार मिनट तक "लिप टू लिप" दृश्य देकर उस समय के समाज को अंचभित कर दिया। इसके लिए देविका रानी की काफ़ी आलोचना भी हुई और फ़िल्म को प्रतिबंधित भी किया गया। इस फ़िल्म ने अंतरराष्ट्रीय लोकप्रियता हासिल की और उन्हें प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचा दिया। यह यूरोप में रिलीज होने वाली अंग्रेज़ी भाषा में बनी पहली भारतीय फ़िल्म थी। जिसके लंदन में विशेष शो आयोजित किए गए और विंडसर पैलेस में शाही परिवार के लिए इसका विशेष प्रदर्शन भी किया गया।


मुंबई आकर देविका रानी और उनके पति हिमांशु राय ने मिलकर बांबे टाकीज़ स्टुडिओ की स्थापना की जो कि भारत के प्रथम फिल्म स्टुडिओं में से एक है। बांबे टाकीज़ को जर्मनी से मंगाये गये उस समय के अत्याधुनिक उकरणों से सुसज्जित किया गया। और वर्ष १९३५ में  फ़िल्म 'जवानी की हवा' का निर्माण किया, देविका रानी अभिनीत यह फ़िल्म सफल रही। अशोक कुमार, लीला चिटनिस, मधुबाला (बेबी मुमताज) आदि कलाकार फ़िल्म जगत को बांबे टाकीज़ की ही देन हैं। यूसुफ ख़ान को भी 'ज्वार-भाटा' में हीरो बनाकर 'दिलीप कुमार' नाम देविका रानी ने ही दिया।


१९३६ में आई फिल्म ‘अछूत कन्या’ में देविका ने एक दलित लड़की का किरदार निभाया और खुद इसमें गाना भी गाया। इस फिल्म के बाद उन्हें ‘फर्स्ट लेडी ऑफ इंडियन स्क्रीन’ और ‘ड्रीमगर्ल’ की उपाधि भी मिली। सरोजिनी नायडू उन दिनों देविका की फ्रेंड थीं। उनके ही कहने पर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ‘अछूत कन्या’ देखी। फिल्म देखकर वे काफी प्रभावित हुए। उन दिनों मुंबई के गवर्नर 'सर रिचर्ड टेंपल' भी उनके फैन थे। अछूत कन्या के अलावा किस्मत, शहीद, मेला जैसी तमाम लोकप्रिय फिल्मों का निर्माण वहाँ पर हुआ। अछूत कन्या उनकी बहुचर्चित फिल्म रही है क्योंकि वह फिल्म एक अछूत कन्या और एक ब्राह्मण युवा के प्रेम प्रसंग पर आधारित थी|


सन् १९४० में हिमांशु राय का निधन हो गया। देविका रानी ने बॉम्बे टॉकीज का पूरा कार्यभार संभाला। चीफ कंट्रोलर और डायरेक्टर के नाते उन्हें स्टूडियो मैनेजमेंट से लेकर बिजनेस तक सारा काम देखना पड़ा। फिर भी उन्होंने अपने निर्देशन में बनी किसी भी फिल्म का स्तर नहीं कम होने दिया। ‘पुनर्मिलन’, ‘किस्मत’ जैसी फिल्में उसी समय की देन हैं। हालांकि एक तरफ वे स्टूडियो का कार्यभार देख रही थी, तो दूसरी तरफ उनके मन में अभिनय को लेकर भी कश्मकश चल रही थी। और बॉम्बे टाकीज़ के साथ जुड़े सशधर मुखर्जी और अशोक कुमार अलग होके फिल्मिस्तान स्टूडियो से जुड़ गए।इन्हीं दिनों जब वे दिलीप कुमार की पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा’ (१९४४) के प्रोडक्शन पर काम कर रही थीं तब सेट के डिज़ाइन के लिए उनकी मुलाकात रूसी चित्रकार स्वेतोस्लाव रॉरिक से हुई। दोनों ने एक साल बाद १९४५ में शादी कर ली और कुछ समय बाद १९५४ में बॉम्बे टॉकीज बंद कर दी। फिल्मी कॅरिअर छोड़कर कुल्लू में रहने चली गईं फिर चार साल बाद ही बेंगलुरू शिफ्ट हो गईं।


उनकी प्रमुख फ़िल्में रहीं कर्मा (१९३३) जीवन-नैया (१९३४)जवानी की हवा (१९३५) जन्मभूमि (१९३६) अछूत कन्या (१९३६) सावित्री (१९३७) जीवन प्रभात (१९३७) इज्जत (१९३७) निर्मला (१९३८) वचन (१९३८) दुर्गा (१९३९) अंजान (१९४१) पुनर्मिलन (१९४०) हमारी बात (१९४३)


देविका रानी को भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार सहित दर्जनों सम्मान मिले। फ़िल्मों से अलग होने के बाद भी वह विभिन्न कलाओं से जुड़ी रहीं। वह नेशनल एकेडमी के अलावा ललित कला अकादमी, राष्ट्रीय हस्तशिल्प बोर्ड तथा भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद जैसी संस्थाओं से संबद्ध रहीं। इसके अलावा देविका रानी फ़िल्म इंडस्ट्री की प्रथम महिला बनी जिन्हें पद्मश्री से नवाजा गया। ९ मार्च १९९४ को देविका रानी रॉरिक का निधन हो गया।


देविका भारतीय रजतपट की पहली स्थापित नायिका रहीं जो अपने युग से कहीं आगे की सोच रखने वाली अभिनेत्री थीं और उन्होंने अपनी फ़िल्मों के माध्यम से जर्जर सामाजिक रूढ़ियों और मान्यताओं को चुनौती देते हुए नए मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं को स्थापित करने का काम किया था। उनकी हर फ़िल्म को क्लासिक का दर्जा हासिल है। विषय की गहराई और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी उनकी फ़िल्मों ने अंतरराष्ट्रीय और भारतीय फ़िल्म जगत् में नए मूल्य और मानदंड स्थापित किए। हिंदी फ़िल्मों की पहली स्वप्न सुंदरी और ड्रैगन लेडी जैसे विशेषणों से अलंकृत देविका को उनकी ख़ूबसूरती, शालीनता धाराप्रवाह अंग्रेज़ी और अभिनय कौशल के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जितनी लोकप्रियता और सराहना मिली उतनी कम ही अभिनेत्रियों को नसीब हो पाती है।


स्त्रोत ~ गूगल

उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ


 उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ का नाम भारत में शहनाई का एक पर्यायावाची है, इन्हें भारत में अब तक जन्मे सबसे बेहतरीन शास्त्रीय संगीतकारों में से एक माना जाता है। इस महान संगीतकार का जन्म बिहार के डुमराँव में 21 मार्च 1916 को हुआ था। बिस्मिल्लाह खाँ ने बिहार के डुमराँव रियासत में दरबारी संगीतकारों का एक वंश चलाने के लिए अपनी वंशावली की नींव रखी। बिस्मिल्ला खाँ को उनके चाचा अली बख्श ‘विलायतू’ से शिक्षा मिली, जो अपने आप में एक प्रतिष्ठित शहनाई वादक थे।


भारतीय शास्त्रीय संगीत में शहनाई को बहुत ही महत्व दिया गया और इस बदलाव का श्रेय अकेले बिस्मिल्लाह खाँ को ही जाता है। उन्होंने 15 अगस्त 1947 को दिल्ली में लाल किले पर शहनाई वादन किया, जो इनके सबसे ऐतिहासिक प्रदर्शनों में से एक है। उन्होंने 26 जनवरी 1950 को भारतीय गणतंत्र दिवस के अवसर पर भी अपनी शहनाई का प्रदर्शन किया।


अपने प्रदर्शन के साथ उन्होंने पूरे विश्व के दर्शकों का मन मोह लिया। वह अल्लाह और सरस्वती दोनों के उपासक थे। दो प्रमुख स्थानों वाराणसी शहर और गंगा नदी ने उनके जीवन पर काफी गहरा प्रभाव डाला। अपने जीवन में उन्होंने कई पुरस्कार और सम्मान प्राप्त किये थे। इनको 1956 में संगीत नाटक आकादमी अवार्ड, 1961 मे पद्म श्री, 1968 में पद्म भूषण और 1980 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।


भारतीय शास्त्रीय संगीत के इस गुरू को 2001 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने कन्नड़ फिल्म ‘सन्नादी अपन्ना’ में डॉ. राजकुमार के चरित्र में अपन्ना के लिए शहनाई वादन किया। इसके अलावा, इन्होंने सत्यजीत रे की फिल्म ‘जलसागर’ और हिन्दी फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ में अपनी शहनाई की भूमिका निभाई। 21 अगस्त 2006 को उनका निधन हो गया। केन्द्र सरकार ने उनके निधन पर एक दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया था।

अभिनय के राजकुमार थे कुलभूषण पंडित उर्फ़ राजकुमार

 हिंदी सिनेमा में यूँ तो तमाम अभिनेताओं ने अपने दमदार अभिनय का परिचय दिया, पर अपने दमदार अभिनय के साथ अपनी विशिष्ट संवाद अदायगी के लिए मशहूर सिर्फ एक ही अभिनेता थे, जिन्हें हम सब "राजकुमार" के नाम से जानते हैं। जिनका असली नाम "कुलभूषण पंडित था।


आज उनकी जयंती पर श्रद्धा सुमन , यूँ तो उनकी संवाद अदायगी और उनके अनोखे अंदाज के बारे में जितना लिखा जाय कम है,पारसी थियेटर की संवाद अदायगी को इन्होंने अपनाया और यही उनकी विशेष पहचान बनी। इनके द्वारा अभिनीत प्रसिद्ध फिल्मों में पैगाम, वक्त, नीलकमल, पाकीजा, मर्यादा, हीर रांझा, सौदागर आदि हैं।


राज कुमार का जन्म बलूचिस्तान (पाकिस्तान) में ८ अक्तूबर १९२६ को मध्यम वर्गीय कश्मीरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद राज कुमार बम्बई के माहिम पुलिस में बतौर दारोगा काम करने लगे। राज कुमार बम्बई के जिस थाने मे कार्यरत थे वहाँ अक्सर फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों का आना जाना लगा रहता था।

एक बार पुलिस स्टेशन में फिल्म निर्माता कुछ जरूरी काम के लिए आए हुए थे और वह राज कुमार के बातचीत करने के अंदाज से काफी प्रभावित हुए। उन्होंने राज कुमार को यह सलाह दी कि अगर आप फिल्म अभिनेता बनने की ओर कदम रखे तो उसमें काफी सफल हो सकते है। राज कुमार को फिल्म निर्माता की बात काफी अच्छी लगी। इसके कुछ समय बाद राज कुमार ने अपनी नौकरी छोड़ दी और फिल्मों में बतौर अभिनेता बनने की ओर अपना रुख कर लिया। १९५२ में प्रदर्शित फिल्म रंगीली मे सबसे पहले बतौर अभिनेता राज कुमार को काम करने का मौका मिला। १९५२ से १९५७ तक राज कुमार फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। फिल्म रंगीली के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली वह उसे स्वीकार करते चले गए। इस बीच उन्होंने अनमोल सहारा, अवसर, घमंड , नीलमणि, कृष्ण सुदामा जैसी कई फिल्मों र्मे अभिनय किया लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई।


१९५७ में प्रदर्शित महबूब खान की फिल्म मदर इंडिया में राज कुमार गांव के एक किसान की छोटी सी भूमिका में दिखाई दिए। हालांकि यह फिल्म पूरी तरह अभिनेत्री नरगिस पर केन्द्रित थी फिर भी राज कुमार अपनी छोटी सी भूमिका में अपने अभिनय की छाप छोडने में कामयाब रहे। इस फिल्म में उनके दमदार अभिनय के लिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय पुरुस्कार ऑस्कर के लिए नामांकित भी किया गया, इस सफलता के बाद राज कुमार बतौर अभिनेता फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गए।


१९५९ में प्रदर्शित फिल्म पैगाम में उनके सामने हिन्दी फिल्म जगत के अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे लेकिन राज कुमार ने यहाँ भी अपनी सशक्त भूमिका के जरिये दर्शकों की वाहवाही लूटी, इसके बाद दिल अपना और प्रीत पराई १९६०, घराना १९६१, गोदान १९६३, दिल एक मंदिर १९६४, दूज का चांद १९६४ जैसी फिल्मों में मिली कामयाबी के जरिये राज कुमार दर्शको के बीच अपने अभिनय की धाक जमाते हुए ऐसी स्थिति में पहुँच गये जहाँ वह फिल्म में अपनी भूमिका स्वयं चुन सकते थे। १९६५ में प्रदर्शित फिल्म काजल की जबर्दस्त कामयाबी के बाद राज कुमार बतौर अभिनेता अपनी अलग पहचान बना ली। बी.आर.चोपड़ा की फिल्म वक्त में अपने लाजवाब अभिनय से वह एक बार फिर से अपनी ओर दर्शक का ध्यान आकर्षित करने में सफल रहे।


फिल्म वक्त में राज कुमार का बोला गया संवाद "चिनाय सेठ जिनके अपने घर शीशे के होते है वो दूसरों पे पत्थर नहीं फेंका करते" और "चिनाय सेठ ये छुरी बच्चों के खेलने की चीज नहीं हाथ कट जाये तो खून निकल आता है" दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ।

फिल्म वक्त की कामयाबी से राज कुमार शोहरत की बुंलदियों पर जा पहुँचे। ऐसी स्थिति जब किसी अभिनेता के सामने आती है तो वह मनमानी करने लगता है और ख्याति छा जाने की उसकी प्रवृति बढ़ती जाती है और जल्द ही वह किसी खास इमेज में भी बंध जाता है। लेकिन राज कुमार कभी भी किसी खास इमेज में नहीं बंधे इसलिये अपनी इन फिल्मो की कामयाबी के बाद भी उन्होंने हमराज १९६७, नीलकमल १९६८, मेरे हूजूर १९६८, हीर रांझा १९७० और पाकीजा १९७१ में रूमानी भूमिका भी स्वीकार की जो उनके फिल्मी चरित्र से मेल नहीं खाती थी इसके बावजूद भी राज कुमार यहाँ दर्शकों का दिल जीतने में सफल रहे।


कमाल अमरोही की फिल्म पाकीजा पूरी तरह से मीना कुमारी पर केन्द्रित फिल्म थी इसके बावजूद राज कुमार ने अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों की वाहवाही लूटने में सफल रहे। फिल्म पाकीजा में राज कुमार का बोला गया एक संवाद "आपके पांव देखे बहुत हसीन हैं इन्हें जमीन पे मत उतारियेगा मैले हो जायेगें" इस कदर लोकप्रिय हुआ कि लोग राज कुमार की आवाज की नकल करने लगे।

 १९७८में प्रदर्शित फिल्म कर्मयोगी में राज कुमार के अभिनय और विविधता के नए आयाम दर्शकों को देखने को मिले। इस फिल्म में उन्होंने दो अलग-अलग भूमिकाओं में अपने अभिनय की छाप छोड़ी। अभिनय में एकरुपता से बचने और स्वयं को चरित्र अभिनेता के रूप में भी स्थापित करने के लिए राज कुमार ने अपने को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया।

इस क्रम में १९८० में प्रदर्शित फिल्म बुलंदी में वह चरित्र भूमिका निभाने से भी नहीं हिचके और इस फिल्म के जरिए भी उन्होंने दर्शको का मन मोहे रखा। इसके बाद राज कुमार ने कुदरत , धर्मकांटा, शरारा, राजतिलक ,एक नयी पहेली, मरते दम तक सूर्या, जंगबाज , पुलिस पब्लिक जैसी कई सुपरहिट फिल्मों के जरिये दर्शको के दिल पर राज किया।

१९९१ में प्रदर्शित फिल्म सौदागर में राज कुमार के अभिनय के नये आयाम देखने को मिले। सुभाष घई की निर्मित फिल्म सौदागर में दिलीप कुमार और राज कुमार वर्ष १९५९ में प्रदर्शित पैगाम के बाद दूसरी बार आमने सामने थे।

फिल्म में दिलीप कुमार और राज कुमार जैसे अभिनय की दुनिया के दोनो महारथी का टकराव देखने लायक था। फिल्म सौदागर में राज कुमार का बोला एक-एक संवाद "दुनिया जानती है कि राजेश्वर सिंह जब दोस्ती निभाता है तो अफसाने बन जाते हैं मगर दुश्मनी करता है तो इतिहास लिखे जाते है" आज भी सिने प्रेमियों के दिमाग में गूंजता रहता है। 


नब्बे के दशक में राज कुमार ने फिल्मों मे काम करना काफी कम कर दिया। इस दौरान राज कुमार की तिरंगा, पुलिस और मुजरिम, इंसानियत के देवता, बेताज बादशाह , जवाब, गॉड और गन जैसी फिल्में प्रदर्शित हुई।

उनका परिवार हमेशा मीडिया से दूर रहा, राजकुमार कुमार का विवाह एक फ्लाइट के दौरान मुलाकात हुई एयरहोस्टेस जेनिफ़र ( जेनिफ़र गायत्री पंडित ) से हुआ था। उनके दो पुत्र व एक पुत्री हैं पुरु राजकुमार , पाणिनि राजकुमार और वास्तविकता पंडित। 


अपने पुत्र पुरू राज कुमार को उन्होंने अपने आखरी समय में अपने पास बुला के कहा था, देखो मौत और जिंदगी इंसान का निजी मामला होता है। मेरी मौत के बारे में मेरे मित्र चेतन आनंद के अलावा और किसी को नहीं बताना। मेरा अंतिम संस्कार करने के बाद ही फिल्म उद्योग को सूचित करना।

राज कुमार ने दिल एक मंदिर और वक्त के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार प्राप्त किया। अपने संजीदा अभिनय से लगभग चार दशक तक दर्शकों के दिल पर राज करने वाले महान अभिनेता राज कुमार 3 जुलाई 1996 के दिन इस दुनिया को अलविदा कह गए।🙏🙏🙏🙏🙏


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गंध दूर करें इस तरह

 जूतों और पाँव के तलवों से आने वाली गंध दूर करने का देसी उपाय 


सन्तरे के छिलकों को फेंके नहीं, रात में इन्हें दुर्गन्ध मार रहे जूतों के अंदर रख दें, अगली सुबह इन छिलकों को फेंक दें, जूतों से दुर्गन्ध दूर हो जाएगी। छिलकों में पाए जाने वाले एसेंशियल ऑयल की वजह से पसीने और नमी से उपजे सूक्ष्मजीव भी मारे जाते हैं। जिनके पाँवों के तालुओं से गंध आती है उसे दूर करने का देसी उपाय भी जान लीजिए..चाय बनाकर चायपत्तियों को छानने के बाद फेंके नहीं। दिन भर में जितने बार भी चाय बने, पत्तियों को छानकर एकत्र करलें, रात सोने से पहले सारी चायपत्ती को बड़े बर्तन में उबालें और जब यह गुनगुना हो जाए तो अपने तलवों को इस पानी में करीब 20 मिनिट तक डुबोकर रखें। जो घर में चाय नहीं पीते वे चायपत्ती (20 ग्राम, करीब 4- 5 चम्मच) लेकर 1 लीटर पानी में 10 मिनिट उबालकर इसे तैयार कर सकते हैं। ऐसा सप्ताह में सिर्फ एक बार ही करें, एक महीने में समस्या से हमेशा का छुटकारा मिल जाएगा। चाय में टैनिक एसिड पाया जाता है जो कि पसीना रोकने में सक्षम होता है और इसमें त्वचा की कोशिकाओं को ड्राय करने का गुण होता है साथ ही दुर्गंधकारक सूक्ष्मजीवों को मार भी गिराता है।


#डॉ दीपक आचार्य /

प्रस्तुति - संत शरण 


रविवार, 21 मार्च 2021

पथरी का इलाज

 *पथरी के मरीज है तो यूं करें तुलसी का सेवन, जल्द मिलेगी राहत*

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शरीर में पोषक तत्व व पानी की कमी के कारण किडनी स्टोन की परेशानी हो सकती है। इसके कारण शरीर में असहनीय दर्द का भी सामना करना पड़ता है। मगर आयुर्वेद व पोषक तत्वों से भरपूर तुलसी का सेवन करके इस परेशानी से बचा जा सकता है। जी हां, गुणों से भरपूर किडनी स्टोन से छुटकारा दिलाने में बेहद माहिर होती है। तो चलिए आज हम किडनी स्टोन होने के कारण व इससे छुटकारा पाने के उपाय बताते हैं। 

*किडनी स्टोन होने का कारण*


- सही मात्रा में पानी ना पीना

- बार-बार यूरिन आना

- यूरिन समय जलन व खून आना

- ज्यादा मसालेदार व ऑयली चीजें खाना

- शरीर में कैल्शियम और कोलेस्ट्राल की मात्रा बढ़ जाना

- बार-बार बीमार होना व दवाई का जल्दी असर ना होना

- बैचेनी, मचली, उल्टी आना

*तुलसी में मौजूद पोषक तत्व*

तुलसी के पत्तों में विटामिन सी, आयरन, कैल्शियम, पोटैशियम, मैग्नीशियम, कैरीटीन, एंटी-ऑक्सीडेंट, एंटी-बैक्टीरियल आदि गुण होते हैं। ऐसे में इसके सेवन से किडनी स्टोन की समस्या दूर होने में मदद मिलती है। साथ ही किडनी स्वस्थ रहती है। तो चलिए जानते हैं किडनी स्टोन की परेशानी में तुलसी सेवन करने का तरीका...


1. तुलसी के 8-10 पत्तों को अच्छे से धो लें। फिर पैन में पानी व तुलसी पत्ते डालकर उबालें। पानी का रंग बदलने पर इसमें स्वाद अनुसार शहद मिलाकर हल्का गर्म पीएं। लगातार 6 महीने तक इसका सेवन करने से पथरी शरीर में गल जाएगी। इस तरह वह यूरिन के जरिए शरीर से बाहर आ जाएगी। 


2. इसके अलावा तुलसी की 1-2 ग्राम पत्तियां लेकर धो लें। अब इसे पीस कर इसमें थोड़ा सा शहद मिलाकर सेवन करें। इससे बिना किसी परेशानी व दर्द के किडनी स्टोर यूरिन के माध्यम से बाहर आने में मदद मिलेगी। 


*तुलसी के अन्य फायदे*


- एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-वायरल गुणों से भरपूर तुलसी की चाय या काढ़ा पीने से इम्यूनिटी बूस्ट होती है। ऐसे में सर्दी-खांसी, जुकाम आदि मौसमी बीमारियों से बचाव रहता है। 


- इसका सेवन करने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की परेशानी से राहत रहती है। 


- मुंह से बदबू आने की समस्या दूर होती है। 


- अनियमित पीरियड की समस्या से राहत मिलती है। 


- एंटी-एजिंग गुणों से भरपूर तुलसी स्किन संबंधी परेशानियों से भी छुटकारा दिलाती है। इसके लिए तुलसी की पत्तियों को पीस कर गुलाब जल में मिलाकर इसका पेस्ट बनाएं। तैयार पेस्ट को चेहरे व गर्दन पर 10-15 मिनट तक लगाएं। बाद में ताजे पानी से धो लें। इससे दाग-धब्बे, झाइयों, झुर्रियों, काले घेरे आदि से छुटकारा मिलेगा। 


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*हेमन्त किगंर *

लता और रफ़ी विवाद

 लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी का वो विवाद जिसकी वजह से इन दोनों ने क़रीब चार वर्ष तक साथ में गाने नहीं गाये।


अपनी आवाज से लाखों दिलों पर राज कर चुकी लता मंगेशकर को सन २००१ में देश का सर्वोच्च सम्मान 'भारत रत्न' दिया गया था। लता मंगेशकर ऐसी जीवित हस्ती हैं जिनके नाम से पुरस्कार दिए जाते हैं। लता मंगेशकर के लिए गाना पूजा के समान है इसलिए रिकॉर्डिंग के समय वो हमेशा नंगे पैर ही गाती हैं। आज भी लोग उन्हें पूजते हैं। वहीं हिन्दी सिनेमा के प्रसिद्ध गायक रफी के गाने सुनना उतना ही अच्छा लगता है, जितना भोर के समय कोयल की तान। रफी साहब में वो ख़ासियत थी जिसको पाने कि लिए शायद आज भी गायक लोग लालायित हैं। मस्ती भरा गाना हो या फिर दुख भरे नग्मे, भजन हो या कव्वाली, हर अंदाज में रफी साहब की आवाज दिल को छू जाती है। लता और रफी ने एक साथ कई सुपरहिट गाने गाए। आज हम आपको लता मंगेशकर का मोहम्मद रफी संग वो विवाद बताने जा रहे हैं जो बिल्कुल भी शालीन नहीं था।


''मोहम्मद रफी स्वयं ईश्वर की आवाज'' किताब में प्रयाग शुक्ल लिखते हैं लता ने यह बात कही है कि रफी के नाम का जिक्र आते ही वे उन दिनों में लौटने को मजबूर हो जाती हैं, जब एक सिंगर को, किसी गीत पर रॉयल्टी मिले या न मिले, के सवाल पर उनसे अपनी असहमति जाहिर की थी। एक गायिका के रूप में स्वर-साम्राज्ञी का दर्जा हासिल करने वाली लता, कई मामलों में लगातार अपने को असुरक्षित महसूस करती रही हैं। और उनका अहं भी ऐसा है कि जो भी उन्हें जरा-सा भी प्रतिद्वंद्वी नजर आया है, उसके प्रति वह उदार नहीं रही हैं, और इसमें अपनी बहन आशा भोसले तक को उन्होंने नहीं बख्शा है।


दरअसल गाने की रॉयल्टी के भुगतान के मुद्दे पर लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी के बीच इस कदर मतभेद उत्पन्न हो गए थे कि इन दोनों गायकों ने करीब चार वर्ष तक एक साथ गाना नहीं गाया। लता मंगेशकर का यह विचार था की सिंगर्स को रॉयल्टी मिलनी चाहिए, तो वहीं मोहम्मद रफ़ी ने जोर देकर कहा था कि एक बार गीत के रिकॉर्ड हो जाने के बाद, सिंगर का कोई अधिकार उस पर नहीं रह जाता। बहुत-से लोग ऐसे हैं, जो यह मानते हैं कि कलाकार के अधिकारों के लिहाज से लता अपनी जगह सही थीं। तो कईयों ने रफी का साथ दिया था।


लता रॉयल्टी का भुगतान किए जाने के पक्ष में थीं और इस विषय को निर्माताओं के समक्ष भी उठाया। उन्हें उम्मीद थी कि इस विषय पर रफी उनका समर्थन करेंगे जो उचित भी था। लेकिन मोहम्मद रफी ने वो कह दिया जो किसी को उम्मीद ही नहीं थी। वह तो लता ही थीं, जिन्होंने यह निर्णय ले लिया था कि अब वह रफी के साथ नहीं गाएंगी, जो निस्संदेह उस वक्त देश के श्रेष्ठतम पुरुष गायक थे। इस बारे में रफी ने एक सधा हुआ जवाब दिया था कि अगर उनको मेरे साथ गाने में दिलचस्पी नहीं है, तो फिर मुझे भी कोई ऐतराज़ नहीं है।


रफी और लता दोनों ही साधारण आर्थिक स्थितियों वाली पृष्ठभूमि के थे। जब भुगतान की राशि बड़ी हो, तो उसे नजरअंदाज करना आसान नहीं था। जहां तक मोहम्मद रफी का सवाल है, उनके लिए सहानुभूति और संवेदना ही बड़ी चीजें थीं। स्थिति तब और बिगड़ गई, जब दो दिग्गजों ने एक-दूसरे के साथ गाना बंद कर दिया। जब लता की जगह सुमन कल्याणपुर को जगह मिलने लगी तो लता जी परेशान हुईं और उन्होंने शंकर-जयकिशन से संपर्क किया कि वह रफी के साथ उनका समझौता करा दें। बाद में दोनों की करीब चार साल की लड़ाई खत्म हुई और इस घटनाक्रम के बाद दोनों ने फिल्म 'पलकों की छांव में' एक साथ गाना गाया।


विवाद तब और गहराया जब लता मंगेशकर ने मोहम्मद रफी के इंतक़ाल के बाद ये कहना शुरू किया कि रफी ने उनसे लिखित माफी मांगी थी। रफी के बेटे शाहिद को यह बात नागवार गुजरी और उन्होंने कहा कि मेरे वालिद साहब तो इतने पढ़े-लिखे थे ही नहीं कि ऐसी कोई चिट्ठी लिखते, वह तो कभी कुछ पढ़ते भी नहीं थे, सिवाए उन गीतों के जो एक कागज़ पर लिखकर उन्हें दे दिए जाते थे, गाने के लिए। शाहिद ने यह भी कहा कि अगर ऐसी माफी वाली कोई चिट्ठी लता के पास है भी तो वह उन्हें दिखानी चाहिए नहीं तो वह उन पर मानहानि का मुकद्दमा दायर करेंगे।


अपूर्वा राय (amarujala.com)

कबतक होगा सपना साकार मुख्यमंत्री जी

 *जापानी इंसेफलाइटिस और दिमागी बुखार पर ताला लगाएगी योगी सरकार*

 

*फ्लोराइड,आर्सेनिक से होने वाली बीमारियों के ताबूत में आखिरी कील ठोंकने की तैयारी*


*प्रदेश में हर घर नल योजना के तीसरे और चौथे चरण की शुरू हुई तैयारी*


*नमामि गंगे,भू जल विभाग ने शुरू की तीसरे और चौथे चरण की तैयारी*


*लखनऊ 20 मार्च*


जापानी इंसेफलाइटिस और दिमागी बुखार का खौफ यूपी में हमेशा के लिए खत्‍म होगा। योगी सरकार फ्लोराइड और आर्सेनिक से होने वाली बीमारियों के ताबूत में आखिरी कील ठोंकने की तैयारी में है। राज्‍य सरकार ने हर घर नल योजना के तीसरे और चौथे चरण की तैयारी शुरू कर दी है। तीसरे और चौथे चरण में राज्‍य सरकार जापानी इंसेफलाइटिस और दिमागी बुखार के लिए चिन्हित इलाकों के साथ ही फ्लोराइड और आर्सेनिक वाले क्षेत्रों में शुद्ध पेयजल सप्‍लाई करेगी।


नमामि गंगे विभाग ने इसके लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं। तीसरे चरण की प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को चिन्हित कर लिया गया है। चौथे चरण के लिए भी सर्वे का काम लगभग पूरा कर लिया गया है। राज्‍य सरकार ने इन इलाकों में युद्ध स्‍तर पर पानी सप्‍लाई व्‍यवस्‍था शुरू करने के निर्देश अफसरों को दिए हैं। तीसरे चरण पूर्वांचल और मध्‍य यूपी के कई बड़े जिलों को शामिल किया गया है।


जल जीवन मिशन के तहत प्रदेश में चल रही हर घर नल योजना को चार चरणों में पूरा किया जाना है। पहला चरण बुंदेलखंड में, दूसरा विंध्‍य क्षेत्र में शुरू हो चुका है। तीसरे चरण में जापानी इंसेफेलाइटिस व दिमागी बुखार से पीड़ित क्षेत्र और चौथे में फ्लोराइड और आर्सेनिक ग्रसित गंगा तटीय क्षेत्र में पानी सप्‍लाई पहुंचाने का काम होना है। गौरतलब है कि भारत सरकार के  जल जीवन मिशन के तहत राज्‍य सरकार बुंदेलखंड में करीब 2185 करोड़ रुपये की लागत से 12 परियोजनाओं पर काम कर रही है। गत जून में शुरू हुई हर घर नल योजना के जरिए योगी सरकार बुंदेलखंड में ग्रामीण क्षेत्र की लगभग 67 लाख की आबादी को घर में स्‍वच्‍छ पेय जल उपलब्ध कराने में जुटी है । 


इसका सबसे ज्यादा फायदा इन इलाकों की महिलाओं को होगा, जो पीने के लिए दूर-दूर से पानी लेकर आती हैं ।  झांसी, ललितपुर और महोबा को पहले चरण में रख कर योगी सरकार हर घर जल योजना पर काम कर रही है। योजना पर झांसी समेत ललितपुर और महोबा में तेजी काम चल रहा है । पाइप लाइन बिछाने के साथ ही नदियों और डैमों के पानी को स्‍वच्‍छ करने की योजना पर भी काम शुरू हो गया है । झांसी में 1627.94 करोड़ की लागत वाली 10 योजनाएं नदी के पानी पर आधारित होंगी । ललितपुर में 1623.47 करोड़ की लागत वाली 16 सरफेस वाटर रिसोर्स और 12 भूजल (ग्राउंड वाटर) आधारित पाइप पेयजल योजनाएं होंगी । वहीं महोबा में 1219.74 करोड़ की लागत से 364 गांवों तक पानी पहुंचाया जाएगा ।


*41 लाख ग्रामीणों को मिलेगा साफ पानी* 


विंध्‍य क्षेत्र के सोनभद्र और मिरजापुर में भी राज्‍य सरकार ने हर घर जल पहुंचाने का काम शुरू कर दिया है। योजना के जरिये योगी सरकार विंध्‍य के 41 लाख से ज्‍यादा ग्रामीणों तक स्‍वच्‍छ जल पहुंचाने के लिए युद्ध स्‍तर पर जुट गई है। केंद्र सरकार की हर घर नल योजना के तहत योगी सरकार मिरजापुर के 1606 गांवों में पाइप के जरिये पेय जल सप्‍लाई शुरू करेगी । इस योजना से केवल मिर्जापुर के 2187980 ग्रामीणों को सीधा फायदा होगा । सोनभद्र के 1389 गांवों के 1953458 परिवार पेय जल सप्‍लाई योजना से जुड़ जाएंगे । सोनभद्र में झील और नदियों के पानी को शुद्द करके पीने के लिए सप्‍लाई किया जाएगा ।

इस धपेली के पेट मे कौन कौन छिपा हैं?/ आलोक कुमार

 क्या देशमुख अकेले खाते पचाते हैं ?


गृहमंत्री अनिल देशमुख को उगाही से सालाना 1200 करोड़ रूपये चाहिए ? इतनी बड़ी रकम क्या वह अकेले खाते या पचा लेते ? अगर नहीं तो किस किस से बांटकर खाते ताकि बात बनी रहती और हाज़मा नहीं बिगड़ता.वह दो साल से महाराष्ट्र के गृहमंत्री हैं.


महाराष्ट्र की सियासत में उछलने वाला यह अगला संभावित सवाल है. संभव है सियासी तोड़जोड़ में यह असली सवाल ही गुम हो जाए. कोई नया गुल खिले और अनिल देशमुख जिनको खिलाने के लिए आतुर थे वही बादशाह बन चमक जाए.


देशमुख का रिकॉर्ड पलट रहा हूं, तो नज़र आता है कि परमवीर सिंह के ख़त बम से पहले भी इनको पोल खोल की चेतावनी  मिल चुकी है.बीते साल अप्रैल की बात है.अपनी ईमानदारी का हवाला देते हुए पूर्व आईएएस अधिकारी आनंद कुलकर्णी ने लिखा था. वह उचित समय पर गृहमंत्री देशमुख की किरदानियों को सार्वजनिक  करने वाले हैं. कुलकर्णी जी चुप क्यों रह गए. और कौन से उचित समय का इंतजार कर रहे हैं, यह जांच एजेंसीज के लिए जानने का विषय है.आनंद कुलकर्णी महाराष्ट्र विद्युत  रेगुलेटरी कमीशन के चेयरमैन रहे हैं.


भ्रष्टतम की दौड़ में शामिल गृहमंत्री देशमुख पहली बार 1995 में निर्दलीय विधायक बन सियासत की मैदान में उतरे.शिक्षा व कल्चर के राज्यमंत्री बने.शिवसेना -बीजेपी से ज्यादा नहीं बनी तो मंत्री पद छोड़ पवार साहब के एनसीपी में शामिल हो गए.


साहेब की कृपा बनी. 2001 में कैबिनेट मंत्री बन खाद्य,आबकारी और ड्रग के आकर्षक कमाई वाला मंत्रालय सम्हाला. आगे पीडब्लूडी जैसे विभाग के मंत्री बने. बांद्रा-वर्ली सी लिंक इनके कार्यकाल में बना लेकिन उद्घाटन से ऐन पहले फेरबदल कर दिए गए. फिर 2014 में अपने भतीजे से विधायकी चुनाव हारे लेकिन साहेब के विश्वासपात्र बने रहे.


प्रतिफल  2019 में मिला. अगाडि की सरकार बनी तो भतीजे अजीत पवार के बजाय गृहमंत्री जैसा अति महत्वपूर्ण पद  अनिल देशमुख को देना पसंद किया गया. यह पसंद अब अपनी कीमत वसूल रहा है.

शनिवार, 20 मार्च 2021

हज़ारीबाग़ और जेपी आंदोलन / विजय केसरी

 'जे.पी. आंदोलन 1974 हजारीबाग' आंदोलनकारियो के संघर्ष की महागाथा ( विराट ) गाथा


युवा आंदोलनकारियों को समर्पित 'जे.पी आंदोलन  1974 हजारीबाग'  शीर्षक से एक ऐतिहासिक महत्त्व की पुस्तक का लोकार्पण हजारीबाग के जैन भवन में संपन्न हुआ। यह पुस्तक समग्रता में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन पर आधारित है । जे.पी. आंदोलन की शुरुआत कैसे हुआ ? यह आंदोलन किस प्रकार संपूर्ण देश में फैला ?  खासकर देशभर के छात्रों का इस आंदोलन में कैसे प्रवेश हुआ ? आदि मन में उठते प्रश्नों पर यह पुस्तक स्पष्ट जवाब देती नजर आती है।  जे.पी. की आवाज को दबाने की जबरदस्त कोशिश की गई थी। आज भी जे.पी की बातें सकल समाज को संदेश देती नजर आ रही है। उन पर केंद्र सरकार के लाख दमन चक्र चले, इसके बावजूद भी उनके आंदोलन को दबाया नहीं जा सका। बल्कि आंदोलन धीरे धीरे कर बढ़ता ही चला गया ।

तत्कालीन इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा आपातकाल की घोषणा की गई थी। बावजूद यह आंदोलन रूका नहीं, बल्कि इसकी चिंगारी और तेज होती गई । अंततः तानाशाह इंदिरा सरकार को आपातकाल समाप्त कर चुनाव की घोषणा करनी पड़ी थी । सत्ता परिवर्तन के इस आंदोलन में देशभर के छात्रों की महती भूमिका रही थी। देश की आजादी के बाद छात्रों का राजनीति में प्रवेश एक नई राजनीति का सूत्रपात हुआ था । लोकनायक  जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया था। आज की बदली राजनीतिक परिदृश्य में  संपूर्ण क्रांति की जरूरत महसूस की जा रही है। 

' जे .पी आंदोलन 1974 हजारीबाग' शीर्षक से यह पुस्तक 1974 जे.पी आंदोलन में हजारीबाग के छात्रों एवं अन्य आंदोलनकारियों की भूमिका पर आधारित है। इस पुस्तक की खासियत यह है कि 1974 आंदोलन के लगभग सभी भूले बिसरे हजारीबाग के आंदोलनकारियों की गौरव गाथा को समाहित किया गया है।

 कई आंदोलनकारी आज इस दुनिया में नहीं रहे । उनके प्रति भी यह पुस्तक श्रद्धांजलि अर्पित करती  है।  यह पुस्तक दो खंडों में प्रकाशित है।  पहले भाग में  लेख , गजल और कविताओं को जगह दी गई है। पहले भाग की सामग्रियों  पर चर्चा करने से पूर्व यह लिखना जरूरी समझता हूं कि युवा आंदोलनकारियों के लंबे संघर्ष के बाद सत्ता परिवर्तन संभव हो पाया था ।

आज ये आंदोलनकारी युवा से वृद्धावस्था की ओर प्रवेश कर गए हैं।  इस आंदोलन में उनकी क्या भूमिका रही ? वे इस आंदोलन में किस तरह सक्रिय रहे ?  वे कैसे इस आंदोलन से जुड़े ? वे कैसे पढ़ाई लिखाई छोड़ कर दिन रात आंदोलन में व्यस्त हो गए? कैसे परिवार के लोगों से नजरें बचाकर आंदोलन में सक्रिय होते थे ? जब पहली पहली बार लोकनायक जयप्रकाश नारायण से मिले, तब उन्हें कैसा अनुभव हुआ ?  आदि कई ऐसी रोचक बातें इस पुस्तक में दर्ज है।

इस  पुस्तक का प्रथम पृष्ठ बेहद ही रोचक और ऐतिहासिक महत्व का है । प्रथम पृष्ठ पर हजारीबाग जन आंदोलन - 15 अगस्त 1974 वीर कुंवर सिंह मैदान में गांधी का अंतिम व्यक्ति स्व० मानकी महतो द्वारा झंडोत्तोलन का एक दृश्य है। इस चित्र में छात्र गण राष्ट्रीय ध्वज को सैल्यूट कर रहे हैं । यह दृश्य देखकर मन साहस से भर उठता है। साथ ही प्रथम पृष्ठ पर सभी को अभिवादन करते हुए लोकनायक जयप्रकाश नारायण की एक तस्वीर भी ऊपर लगी हुई है।

B इस पुस्तक के अंतिम पृष्ठ पर सप्ताहिक 'दिनमान' (1977) की एक तस्वीर भी अंकित है। यह भी तस्वीर एक ऐतिहासिक महत्व की बन गई है । जनता पार्टी, चुनाव में विजयी होने के बाद  जयप्रकाश नारायण जी के साथ पटना में विचार विमर्श करते हुए की तस्वीर है।  लगभग सभी चेहरे युवा छात्रों के हैं। सभी  चेहरे सत्ता परिवर्तन की चाहत से ओतप्रोत हैं।

 इस पुस्तक के संपादक मंडल के सदस्य गौतम सागर राणा, प्रभात रंजन, संजय सरण, हरीश श्रीवास्तव और संतोष सत्यार्थी हैं। संपादक मंडल के सभी सदस्य 1974 छात्र आंदोलन के सक्रिय आंदोलन कर्मी रहें। तब से लेकर आज तक ये सभी किसी ना किसी राजनीतिक दल में रहकर अपनी अहम भूमिका निभाते चले आ रहे हैं।

 विशेष रूप से मैं गौतम सागर राणा की चर्चा कर रहा हूं। आज वे देश के जाने-माने नेता है।  उन्होंने  लोकनायक जयप्रकाश नारायण से समाजवाद की सीख ली । जब बिहार में कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में सरकार बनी , तब वे बगोदर विधानसभा से विधायक निर्वाचित हुए। दो बार यहीं से निर्वाचित हुए।  फिर बिहार विधानसभा के सदस्य बने। राज्य सरकार एवं केंद्र सरकार की  विभिन्न समितियों के सदस्य के रूप में अपनी महती भूमिका निभाते चले आ रहे हैं । गौतम सागर राणा इस पुस्तक के प्राक्कथन में दर्ज किया है कि 'हजारीबाग में आंदोलनकारियों की सक्रियता व सघनता इतनी अधिक थी कि इससे निपटने के लिए बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स के अधिकारी व जवानों की प्रतिनियुक्ति की गई थी ।


 शहर में बीएसएफ के जवान गश्त करते थे । आंदोलनकारियों पर नियंत्रण स्थानीय पुलिस के बस के बाहर था। बीएसएफ के एक कमांडेंट  पांडेय जी थे। वे बीएसएफ फोर्स के इंचार्ज थे ।अनेकों बार हमारी बैठकों में सम्मिलित हो जाते और हमारी बातें सुनते। कभी छुपकर तो कभी सामने आकर'। आगे उन्होंने दर्ज किया है कि जेपी आंदोलन की शुरुआत कैसे हुई ? उन्होंने लिखा है कि 'सर्वप्रथम गुजरात में अपनी मांगों के समर्थन में छात्रों ने आंदोलन प्रारंभ किया ।जे. पी को छात्रों ने गुजरात बुलाया । गुजरात छात्र आंदोलन से प्रेरणा लेकर बिहार एकीकृत में भी छात्रों ने आंदोलन की शुरुआत की।

 आंदोलन सक्रियता से प्रारंभ हुआ । छात्रों ने सम्मिलित रूप से जेपी से अनुरोध किया कि वे इस आंदोलन का नेतृत्व करें।  जेपी ने अहिंसा आदि शर्तों के पर आंदोलन का नेतृत्व करना स्वीकार किया'। जे .पी के नेतृत्व संभालते ही यह आंदोलन देखते ही देखते चंद दिनों में राष्ट्रव्यापी बन गया । 

इस पुस्तक में एक लेख 'तानाशाही नहीं सहो' शीर्षक  से दर्ज है । यह लेख पटना के 1974 आंदोलन के एक छात्र नेता अख्तर हुसैन जी ने लिखा है। उन्होंने लिखा है कि 'आज युवा छात्र के सामने फिर से यह सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या यह सरकार तानाशाह नहीं हो सकती ?

 यह सही है कि जनता पार्टी की सरकार आने से हमें तत्कालिक तानाशाही से मुक्ति मिल गई ।पर सारी व्यवस्था पुरानी जैसी ही है।  जिससे मूल समस्या कभी भी खत्म नहीं हो सकती।  सारी पुरानी व्यवस्था जब तक रहेगी , तब तक हमेशा तानाशाही की प्रवृतियां रहेगी ही। जनता पार्टी की सरकार से कहीं भी ऐसी आशा नहीं बंध रही है  कि पुरानी व्यवस्था पर जोर नहीं होगा' । अख्तर हुसैन जी ने अपने छोटे से आलेख में बहुत बड़ी बात कहने की कोशिश की है।


पुस्तक के दूसरे भाग में जयप्रकाश आंदोलन के  दस्तावेज सैद्धांतिक आयाम  व जे . पी के व्याख्यान को प्रस्तुत किया गया है। इस खंड में कुल 12 लेख प्रकाशित हैं  सभी ऐतिहासिक महत्व के लेख हैं। ' गांधी होने का अर्थ', 'गांधी और जयप्रकाश', 'अधनंगा फकीर', 'अंतिम व्यक्ति' जैसे शीर्षकों के माध्यम से लोकनायक जयप्रकाश नारायण के व्यक्तित्व और कृतित्व के साथ  संपूर्ण क्रांति के आह्वान को बहुत ही मजबूती के साथ स्थापित करता नजर आता  है।


विजय केसरी,

(कथाकार / स्तंभकार),

पंच मंदिर चौक, हजारीबाग - 825 301,

मोबाइल नंबर - 92347 99550.

यूँही मस्त नग़मे लुटाता रहूं / महेन्द्र कपूर

 तुम अगर साथ देने का वादा करो !

मैं यूँही मस्त नग़मे लुटाता रहूं ...


हिंदी सिनेमा के महान गायक व असाधारण आवाज़ के धनी महेन्द्र कपूर की आवाज में एक अद्धभुत सा फोक जोन था और इसी कारण उनके गाए देशभक्ति गीत लोगों के दिल के बेहद करीब हैं।


इस महान गायक का जन्म ९ जनवरी १९३४ को अमृतसर में हुआ , महेंद्र कपूर को बचपन से ही गायिकी का शौक था और उनका यही शौक उन्हें मुम्बई तक ले आया था। गायिकी की दुनिया में पहचान बनाने के लिए उन्होंने काफी मेहनत की और कई महान लोगों के शार्गिद के रूप में काम किया। उन्होंने संगीत की अपनी प्रारंभिक शिक्षा हुस्नलाल-भगतराम, उस्ताद नियाज अहमद खान, उस्ताद अब्दुल रहमान खान और पंडित तुलसीदास शर्मा से हासिल की।


उनकी किस्मत तब चमकी जब मर्फी रेडियो की ओर से आयोजित एक कॉन्टेस्ट के वे विजेता बने। इसके बाद उन्होंने फिल्मी सफर की शुरुआत की और १९५३ में आई फिल्म ‘मदमस्त’ के साहिर लुधियानवी के गीत ‘आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए नाशाद आया’ को गाया। साल १९५८ में प्रदर्शित वी. शांताराम की फिल्म नवरंग में महेन्द्र कपूर ने सी.रामचंद्र के संगीत निर्देशन में ‘आधा है चंद्रमा रात आधी’ से बतौर गायक अपनी पहचान बना ली। इसके बाद महेन्द्र कपूर ने सफलता की नई उंचाइयों को छुआ और एक से बढक़र एक गीत गाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।


उनका गाया मेरे देश की धरती.... गीत सुनने पर लगता है जैसे वह किसी ठेठ पंजाबी गांव से गाया जा रहा हो. उनकी आवाज में वह बात थी जो श्रोताओं को पंजाब के गांवों, खेतों और ढाबों में ले जाती थी और यही कारण है कि उनके गाए देशभक्ति गीत बेहद लोकप्रिय हुए। मनोज कुमार की फिल्म उपकार का गीत मेरे देश की धरती., पूरब और पश्चिम का गीत भारत का रहने वाला हूं जैसे महेन्द्र कपूर के लिए ही लिखे गए हों।


महत्वपूर्ण बात है कि महेन्द्र कपूर ने रफी, तलत महमूद, मुकेश, किशोर कुमार, हेमंत कुमार जैसे चर्चित गायकों के दौर में सफलता हासिल की। यह वह दौर था जब लोग रफी और किशोर दा के अलावा किसी तीसरे की आवाज को सुनना खास पसंद नहीं करते थे।


महेन्द्र कपूर के यादगार गीतों में गुमराह फिल्म का चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाए हम दोनों., हमराज का नीले गगन के तले धरती का प्यार पले., किसी पत्थर की मूरत से., तुम अगर साथ देने का वादा करो. जैसे कई गाने शामिल हैं, लेकिन देशभक्ति गीत और उनकी आवाज जैसे एक-दूसरे के पूरक थे। महेन्द्र कपूर बी आर चोपड़ा के पसंदीदा गायकों थे। उनकी धूल का फूल, हमराज, गुमराह, वक्त, धुंध जैसी तमाम फिल्मों को अपनी आवाज दी और तमाम भजन भी गाये, इसके अलावा उनकी आवाज से सजा महाभारत का शीर्षक गीत अथ श्रीमहाभारत कथा.....श्रोताओं के जेहन में आज भी ताजा है।


महेंद्र कपूर को १९६८ में “उपकार” फिल्म के गीत मेरे देश की धरती सोना उगले.. के लिए सर्वश्रेष्ठ पा‌र्श्व गायक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। इसके अलावा तीन फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड भी मिले।


पहला १९६३ में “गुमराह” फिल्म के गीत चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं.. 

दूसरा १९६७  में “हमराज” फिल्म के नीले गगन के तले.. 

तीसरा १९७४ में "रोटी कपड़ा और मकान" के और नहीं बस और नहीं . .

बाद में उन्हें पद्मश्री और महाराष्ट्र सरकार के लता मंगेशकर सम्मान से भी नवाजा गया।


२७ सितंबर, २००८ को दिल का दौरा पड़ने से महेन्द्र कपूर का निधन हो गया और भारतीय फिल्म संगीत जगत के एक सितारे का अंत हो गया.


स्त्रोत : गूगल

कोविड -19 (कोरोना) : क्या सच क्या झूठ

 BREAKING NEWS : / इटली ने किया मृत कोरोना मरीज का पोस्टमार्टम, से हुआ बड़ा खुलासा 

इटली विश्व का पहला देश बन गया है जिसनें एक कोविड-19 से मृत शरीर पर अटोप्सी  (पोस्टमार्टम) किया और एक व्यापक जाँच करने के बाद पता लगाया है कि वायरस के रूप में कोविड-19 मौजूद नहीं है, बल्कि यह सब एक बहुत बड़ा ग्लोबल घोटाला है। लोग असल में “ऐमप्लीफाईड ग्लोबल 5G इलैक्ट्रोमैगनेटिक रेडिएशन (ज़हर)” के कारण मर रहे हैं।


इटली के डॉक्टरों ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के कानून का उल्लंघन किया है,जो कि करोना वायरस से मरने वाले लोगों के मृत शरीर पर आटोप्सी (पोस्टमार्टम) करने की आज्ञा नहीं देता ताकि किसी तरह की वैज्ञानिक खोज व पड़ताल के बाद ये पता ना लगाया जा सके कि यह एक वायरस नहीं है,बल्कि एक बैक्टीरिया है जो मौत का कारण बनता है, जिस की वजह से नसों में ख़ून की गाँठें बन जाती हैं यानि इस बैक्टीरिया के कारण ख़ून नसों व नाड़ियों में जम जाता है और यही मरीज़ की मौत का कारण बन जाता है।

इटली ने इस वायरस को हराया है,ओर कहा है कि “फैलीआ-इंट्रावासकूलर कोगूलेशन (थ्रोम्बोसिस) के इलावा और कुछ नहीं है और इस का मुक़ाबला करने का तरीका आर्थात इलाज़ यह बताया है……..

ऐंटीबायोटिकस (Antibiotics tablets}

ऐंटी-इंनफ्लेमटरी ( Anti-inflamentry) और

ऐंटीकोआगूलैटस ( Aspirin) को लेने से यह ठीक हो जाता है।

ओर यह संकेत करते हुए कि इस बीमारी का इलाज़ सम्भव है ,विश्व के लिए यह संनसनीख़ेज़  ख़बर इटालियन डाक्टरों द्वारा कोविड-19 वायरस से मृत लाशों की आटोप्सीज़ (पोस्टमार्टम) कर तैयार की गई है। कुछ और इतालवी वैज्ञानिकों के अनुसार वेन्टीलेटर्स और इंसैसिव केयर यूनिट (ICU) की कभी ज़रूरत ही नहीं थी। इस के लिए इटली में अब नए शीरे से प्रोटोकॉल जारी किए गए है ।

CHINA इसके बारे में पहले से ही जानता था मगर इसकी रिपोर्ट कभी किसी के सामने उसने सार्वजनिक नहीं की ।

कृपया इस जानकारी को अपने सारे परिवार,पड़ोसियों, जानकारों,मित्रों,सहकर्मीओं को साझा करें ताकि वो कोविड-19 के डर से बाहर निकल सकें ओर उनकी यह समझ मे आये कि यह वायरस बिल्कुल नहीं है बल्कि एक बैक्टीरिया मात्र है जो 5G रेडियेशन के कारण उन लोगो को नुकसान पहुँचा रहा है जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम है । यह रेडियेशन इंफलामेशन और हाईपौकसीया भी पैदा करता है। जो लोग भी इस की जद में आ जायें उन्हें Asprin-100mg और ऐप्रोनिकस या पैरासिटामोल 650mg लेनी चाहिए । क्यों…??? ….क्योंकि यह सामने आया है कि कोविड-19 ख़ून को जमा देता है जिससे व्यक्ति को थ्रोमोबसिस पैदा होता है और जिसके कारण ख़ून नसों में जम जाता है और इस कारण दिमाग, दिल व फेफड़ों को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती जिसके कारण से व्यक्ति को सांस लेने में दिक्कत होने लगती है और सांस ना आने के कारण व्यक्ति की तेज़ी से मौत हो जाती है।

इटली के डॉक्टर्स ने WHO के प्रोटोकॉल को नहीं माना और उन लाशों पर आटोप्सीज़ किया जिनकी मौत कोविड-19 की वजह से हुई थी। डॉक्टरों ने उन लाशो की भुजाओं,टांगों ओर शरीर के दूसरे हिस्सों को खोल कर सही से देखने व परखने के बाद महसूस किया कि ख़ून की नस-नाड़ियां फैली हुई हैं और नसें थ्रोम्बी से भरी हुई थी,जो ख़ून को आमतौर पर बहने से रोकती है और आकसीजन के शरीर में प्रवाह को भी कम करती है जिस कारण रोगी की मौत हो जाती है।इस रिसर्च को जान लेने के बाद इटली के स्वास्थ्य-मंत्रालय ने तुरंत कोविड-19 के इलाज़ प्रोटोकॉल को बदल दिया और अपने पोज़िटिव मरीज़ो को एस्पिरिन 100mg और एंप्रोमैकस देना शुरू कर दिया। जिससे मरीज़ ठीक होने लगे और उनकी सेहत में सुधार नज़र आने लगा। इटली स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक ही दिन में 14000 से भी ज्यादा मरीज़ों की छुट्टी कर दी और उन्हें अपने अपने घरों को भेज दिया।

स्रोत: इटली स्वास्थ्य मंत्रालय

शुक्रवार, 19 मार्च 2021

परम संतोषी विश्व चैंपियन/ विवेक शुक्ला

 अशोक दीवान मार्च का महीना आते ही साल 1975 में चले जाते हैं। उस साल की 15 मार्च उनके और भारतीय हॉकी के लिए किसी सपने से कम नहीं थी।


 उस दिन भारत-पाकिस्तान का विश्व कप हॉकी चौंपियनशिप का फाइनल मैच मलेशिया की राजधानी कुआलालम्पुर के मर्डेका स्टेडियम में खेला गया था। उन्हें मैच वाले दिन कप्तान अजितपाल सिंह ने बता दिया था कि उन्हें आज फाइनल मैच खेलना है। अशोक दीवान तब लगभग 20 साल के थे।

 उन्हें अपने कप्तान की बात को सुनकर कुछ पलों के लिए यकीन ही नहीं हुआ। विश्व कप का फाइनल खेलना कोई सामान्य बात तो नहीं थी। फिर वे टीम के पहले गोल कीपर भी नहीं थे। पहले गोलकीपर लेशले फर्नांडीज थे।


अशोक दीवान को अच्छी तरह से पता था पाकिस्तान की टीम में इस्लाउद्दीन, अख्तर रसूल,शहनाज शेख, समीउल्लाह जैसे मारक आक्रामक फारवर्ड हैं। ये किसी भी टीम की रक्षा पंक्ति को भेदने की काबिलियत रखते थे। उन्हें फाइनल मैच में खेलने का मौका उनके सेमी फाइनल में मलेशिया टीम के खिलाफ  जुझारू प्रदर्शन के कारण ही मिला था।

 उस मैच में अशोक दीवान और असलम शेऱ खान को खेल के अंतिम क्षणों में मैदान में उतारा गया था। तब भारत 1-2 के अंतर से मैच में पिछड़ रहा था। इन्होंने खेल का रुख बदल दिया था। 

पहले असलम शेर खान, फिर हरचरण सिंह के गोल और अशोक दीवान ने जिस तरह से मलेशिया के हमलों को रोका था वह अब भारतीय हॉकी के सुनहरे दौर का हिस्सा हैं।

खैर,दर्शकों से खचाखच भरे स्टेडियम में फाइनल मैच शुरू हुआ। दर्शकों में मलेशिया में बसे हजारों भारतवंशी भी थे। अशोक दीवान अपने साथी खिलाड़ियों के साथ विश्वास से लबरेज थे। फाइनल जीतने के इरादे से भारतीय टीम मैदान में उतरी थी।

 दिल्ली यूनिवर्सिटी और  उत्तर रेलवे की टीम से खेलते हुए अपनी क्षमताओं से हॉकी के शैदाइयों को प्रभावित कर चुके अशोक दीवान ने मन ही मन फैसला कर लिया कि फाइनल में पाकिस्तान को सफल नहीं होने देंगे। 

उनके इस्पाती जज्बों से भारतीय टीम मैनेजमेंट वाकिफ भी था। पर पाकिस्तान ने मैच शुरू होने के कुछ देर के बाद एक गोल करके बढ़त बना ली। लेकिन, उसके बाद अशोक दीवान ने पाकिस्तान के लगातार हमलों को निरस्त किया। वे गोल पोस्ट के आगे चट्टान बनकर खड़े हो गए। इस बीच, भारत की तरफ से सुरजीत सिंह ने बराबरी का और अशोक कुमार ने दूसरा गोल करके भारत को बढ़त दिलवा दी थी। यह बढ़त अंत तक बनी रही।

 तो इस तरह भारत हॉकी विश्व कप जीत पाया। भारतीय टीम सिंगापुर होते हुए भारत वापस आई। विश्व विजेता टीम का सारे भारत में स्वागत हुआ। 


सरकार ने विजयी टीम के खिलाड़ियों को पेट्रोल पंप देने की पेशकश की। अजितपाल सिंह ने सादिक नगर में और असलम शेऱ खान ने पंखा रोड में पेट्रोल पंप लिए।


 पर अशोक दीवान ने पेट्रोल पंप लेने के बारे में सोचा ही नहीं। अशोक दीवान कहते हैं कि मुझे तो पता ही नहीं था कि पेट्रोल पंप कैसे लेते हैं। मेरे घर वालों ने भी पेट्रोल पंप लेने के बारे में कोई उत्साह नहीं दिखाया।

 उन्हें तो रत्तीभर भी अफसोस नहीं कि वे पेट्रोल पंप नहीं ले सके। एक विश्व चैंपियन का परम संतोषी होना हैरान भी करता है। सच में अब उनके जैसे सीधे-सरल मनुष्यों की प्रजाति विलुप्त हो रही है।

Vivek Shukla 

Navbharatimes 18 March 2021


गुरुवार, 18 मार्च 2021

सभी पत्रकारों के लिए सूचनार्थ


 नरेंद्र भंडारी: /ऑनलाइन / डिजिटल मीडिया के साथियो,


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  ऑनलाइन / डिजिटल मीडिया के साथियो के लिये विशेष । 


Regards

नरेंद्र भंडारी , 

राष्ट्रीय  महासचिव, 

 वर्किग जॉर्नलिस्ट्स ऑफ इंडिया

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 न्यूज़ फ़ैलाने वाले लोगों से सावधान रहें  सभी पत्रकार : अनूप चौधरी 

नई दिल्ली : वर्किग जर्नलिस्ट ऑफ़ इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष की अगुआई में आज एक मीटिंग हरियाणा भवन के मिडिया सेंटर में रखी गईं जिसमे वर्किग जर्नलिस्ट ऑफ़ इंडिया (WJI) दिल्ली ऒर राष्ट्रीय कार्यकारणी द्वारा पत्रकारों के हित ऒर उथान के लिए किये गए कार्यो की समीक्षा की गईं जिसमे राष्ट्रीय उपाध्यक्ष संजय उपाध्याय ने बताया की WJI  ने पत्रकारों के हित में बहुत अग्रणी काम किये है जिसमे सबसे पहले भारत सरकार से डिजिटल मिडिया को मान्यता दिलाना मील का पत्थर साबित हो रहा है अब सोशल मीडिया  पर कार्यरत पत्रकार अपने आप को उपेक्षित महसूस नहीं करते राष्ट्रीय महा सचिव नरेन्द्र भंडारी ने बताया की यूनियन के द्वारा किये गए कार्यो की एक जानकारी फोल्डर के माध्यम से दिल्ली ऒर देश के पत्रकारों के समक्ष जल्दी ही प्रस्तुत की जाएगी आने वाले कुछ दिनों में वर्किग जर्नलिस्ट ऑफ़ इंडिया अपने सदस्यों के लिए एक ग्रुप इंश्योरेंस देने जा रही है जो विल्कुल निःशुल्क होगा कोरोना काल में पत्रकारों को बहुत ही परेशानी का सामना करना पड़ा है लिहाज़ा ये ग्रुप इंश्योरेंस बहुत उपयोगी होगा राष्ट्रीय अध्यक्ष अनूप चौधरी ने कहा की कुछ पत्रकार जानबूझकर फेक न्यूज़ फैला रहें है हमें ऐसे पत्रकारों से सावधान रहना होगा देश का नागरिक ऒर पत्रकार होने के नाते हमारी जिम्मेदारी है की हमारे लिए राष्ट्र प्रथम होना चाहिए वर्किग जर्नलिस्ट ऑफ़ इंडिया की दिल्ली यूनिट के अध्यक्ष संदीप शर्मा ऒर महासचिव देवेंद्र सिंह तोमर ने बताया की दिल्ली यूनिट द्वारा जल्दी ही एक मीडिया डायरेक्टरी जारी की जाएगी जो पत्रकारिता क्षेत्र के लिए मील का पत्थर साबित होगी महासचिव दिल्ली देवेंद्र सिंह तोमर ने कहा की हम पत्रकारों की तमाम मांगो को लेकर एक महीने तक जन प्रतिनिधयों ज्ञापन देने का काम कर रहें है ज्ञापन में दी हुई मांगों को मांगे जाने तक हमारा यह अभियान जारी रहेगा यदि पत्रकारों की मांगों को नहीं माना गया तो वर्किग जर्नलिस्ट ऑफ़ इंडिया  अप्रेल महीने से बड़े  पैमाने पर सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ेगी  मीटिंग में राष्ट्रीय अध्यक्ष अनूप चौधरी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष संजय उपाध्याय राष्ट्रीय महासचिव नरेंद्र भंडारी के आलावा दिल्ली यूनिट के अध्यक्ष संदीप शर्मा  महासचिव  देवेंद्र सिंह तोमर वरिष्ठ उपाध्यक्ष  सुदीप सिंह उपाध्यक्ष प्रमोद गोस्वामी. अशोक धवन कोषाध्यक्ष नरेन्द्र धवन के अलाबा धर्मेंद्र भदौरिया अशोक सक्सेना ईश मलिक लक्ष्मण इन्दोरिया विजय वर्मा राजेश तंवर प्रीतपाल सिंह मौजूद रहे

नरगिस जी के बारे मे कुछ दिलचस्प जानकारियां

 नरगिस जी जुड़ी कुछ दिलचस्प जानकारियां

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3 मई, 1981 को नरगिस जी ने दुनिया को अलविदा कहा था . कैंसर की बीमारी थी. नरगिस राज्यसभा के लिए नॉमिनेट और पद्मश्री पुरस्कार पाने वाली पहली हीरोइन थीं. नरगिस की एक्टिंग का जलवा यूं समझिए कि 1968 में उन्हें बेस्ट एक्ट्रेस का पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला. नरगिस के बचपन का नाम फातिमा राशिद था. करियर की शुरुआत तलाश-ए-हक फिल्म में बतौर चाइल्ड एक्टर की. उम्र थी महज 6 साल.


पहली बार नरगिस को लीड रोल मिला 1942 में. फिल्म का नाम था तमन्ना. लेकिन नरगिस को जिस फिल्म की वजह से लोग आज भी याद करते हैं वो है मदर इंडिया. ऑस्कर में फॉरेन लेंगुएज कैटेगिरी में चुनी जाने वाली पांच फिल्मों में मदर इंडिया चुनी गई. उस साल का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला था मदर इंडिया को.


नरगिस और राज कपूर की मुलाकात एकदम फिल्मी अंदाज में हुई थी. राजकपूर किसी फिल्म के सिलसिले में नरगिस की मां से मिलने गए थे. जद्दनबाई घर पर नहीं थीं. नरगिस उस समय पकौड़ियां तल रही थीं. जब नरगिस ने दरवाजा खोला तो उनके हाथों में बेसन लगा हुआ था, जो नरगिस के गाल पर भी लग गया था. राजकपूर को नरगिस का यह भोलापन भा गया.


नरगिस से पहली बार मिलते वक्त राज कपूर ने खुद को इंट्रो पृथ्वीराज कपूर के बेटे के रूप में दिया. लेकिन नरगिस राज कपूर को फिल्मों में देख चुकी थीं. राज कपूर को नरगिस के साथ अपनी पहली मुलाकात जिंदगी भर याद रही. इस असल किस्से को राजकपूर ने बॉबी फिल्म के एक सीन में हूबहू उतार दिया.


राज कपूर और नरगिस दोनों की पहली फिल्म आग थी. दोनों ने साथ में 16 फिल्में कीं. ज्यादातर फिल्मों को दर्शकों ने खूब पसंद किया. 9 सालों तक पर्दे पर राज-नरगिस की ये जोड़ी हिट बनी रही.


मुहब्बत के दुश्मन हर दौर में थे. नरगिस की मां जद्दनबाई को अपनी बेटी नरगिस की मुहब्बत रास नहीं आई. इसकी वजह से बरसात फिल्म के जो सीन कश्मीर में शूट किए जाने थे, उन्हें खंडाला और महाबलेश्वर में ही शूट करना पड़ा.


आवारा फिल्म की शूटिंग के दौरान एक गाने को फिल्माने के लिए ही राजकपूर ने 8 लाख रुपये खर्च कर दिए. जबकि पूरी फिल्म पर तब तक 12 लाख रुपये ही खर्च हुए थे. कहते हैं इसकी वजह से जब फिल्म ओवरबजट हो गई तो नरगिस ने अपने गहने बेचकर राज कपूर की मदद की. नरगिस का राजकपूर के लिए प्यार ही था कि फिल्म को सफल बनाने के लिए नरगिस ने उस जमाने में बिकिनी पहनी. रूस, चीन और अफ्रीकी देशों में भी फिल्म खूब चली.


नरगिस और राजकपूर शादी करना चाहते थे. पर राज कपूर के पिता पृथ्वीराज कपूर इसके सख्त खिलाफ थे. नरगिस और राजकपूर के बीच इतनी मुहब्बत थी कि नरगिस महाराष्ट्र के तत्कालीन गृहमंत्री मोरारजी देसाई से इसलिए मिलने चली गईं थीं, ताकि राजकपूर से शादी का कोई कानूनी रास्ता निकल सके.


नरगिस के भाई अख्तर हुसैन ने एक बार उनसे कहा कि राजकपूर लगातार हीरो पर केंद्रित फ़िल्में बनाकर उनका गलत फायदा उठा रहे हैं. धीरे-धीरे गलतफहमियां बढ़ीं और दोनों के रिश्ते में दरार पड़ने लगी. राजकपूर जब 1954 में मॉस्को गए तो अपने साथ नरगिस को भी ले गए. लोगों ने वहां नरगिस को राजकपूर की बीवी समझ. चारों तरफ बस राजकपूर की ही पूछ थी. इससे दोनों के बीच इगो की तकरार हुई जो इतनी बढ़ी कि यात्रा आधी छोड़कर नरगिस इंडिया लौट आईं. हालांकि वादा था तो नरगिस ने ‘जागते रहो’ की शूटिंग पूरी की. लेकिन RK स्टूडियो बैनर के साथ ये नरगिस की आखिरी फिल्म थी.


इसके बाद जब नरगिस ने 1957 में महबूब खान की मदर इंडिया साइन की तो राजकपूर को बताया तक नहीं. मदर इंडिया की शूटिंग के दौरान सेट पर आग लग गई. सुनील दत्त ने अपनी जान पर खेलकर नरगिस को बचाया और दोनों में प्यार हो गया. मार्च, 1958 में दोनों की शादी हो गई. दोनों के तीन बच्चे हुए, संजय, प्रिया और नम्रता. साल 1981 में 3 मई को नरगिस दुनिया छोड़ गईं !!


अविनाश विवेक

बुधवार, 17 मार्च 2021

आज भी यादों मे जीवित हैं वर्मा मालिक

 वर्मा मलिक की पुण्यतिथि: गीतकार, हर शादी में बजता है जिसका गाना 🌺🌺


हिंदी फिल्मी दुनिया के एक सदी से ज्यादा के इतिहास में कई गीतकार और संगीतकारों ने अपने गीत-संगीत से फिल्मों के आंगन को गुल-ओ-गुलज़ार किया है। इस लंबे सफर में बहुत से गीतकार ऐसे रहे, जिन्होंने तुलनात्मक तौर पर बेहद कम लिखा, लेकिन उनकी सफलता का एवरेज कहीं उससे ज्यादा है। ऐसे ही एक बेमिसाल गीतकार का नाम है, वर्मा मलिक। वर्मा मलिक का नाम जेहन में आते ही, उनके कई सदाबहार गाने जबान पर आ जाते हैं। खास तौर पर शादी के मौके पर उनके दो गीत आज भी जरूर बजते हैं। पहला, ‘‘आज मेरे यार की शादी है…’’(फिल्म-आदमी सड़क का) और दूजा, ‘‘चलो रे डोली उठाओ कहार..’’ (फिल्म-जानी दुश्मन)। देश में इन दोनों गानों का मर्तबा शादी-एंथम जैसा है। हर शादी में इन गीतों का बजना लाजिमी रहता है। आमफहम जबान में लिखे गये ये गाने, हिंदुस्तानी शादी की दो अहम रस्मों बरात और बेटी की विदाई की बेला के वक्त उमड़ने वाले दिली जज्बात की नुमाइंदगी करते हैं। हर एक को लगता है कि ये जज्बात उसी के हैं।


एक गीतकार के लिए इससे बड़ा सम्मान भला कौन सा हो सकता है ? फिल्मी दुनिया के आगाज में जितने भी बड़े गीतकार शकील बदायुनी, हसरत जयपुरी, कमर जलालाबादी, प्रेम धवन, साहिर लुधियानवी आदि आए, उनमें से ज्यादातर की जबान उर्दू और पंजाबी थी। इनमें से कई को तो देवनागरी लिपि भी नहीं आती थी। बावजूद इसके गर उनके गाने सुनें, तो जरा भी अहसास नहीं होता कि इन गीतकारों का हिंदी जबान में तंग हाथ है। वर्मा मलिक की भी मादरी जबान पंजाबी थी और उस ज़माने के एतबार से उनकी पूरी पढ़ाई उर्दू जबान में हुई। पंजाबी फिल्मों में गीत लिखकर, उन्होंने अपने करियर की इब्तिदा की, लेकिन अपनी लगन और मेहनत से आगे चलकर उन्होंने हिंदी में इस कदर दस्तरस हासिल की, कि उनका शुमार हिंदी के कामयाब गीतकारों में होता है। जिन लोगों ने वर्मा मलिक का ये गाना ‘‘प्रिय प्राणेश्वरी, सिद्धेश्वरी यदि आप हमें आदेश करें’’ (फ़िल्म-हम तुम और वो) सुना है, वे मान ही नहीं सकते कि वर्मा मलिक को कभी हिंदी नहीं आती थी। इस गाने में उन्होंने हिंदी के इतने क्लिष्ट शब्द इस्तेमाल किए हैं कि अहसास होता है, जैसे वे हिंदी साहित्य के कोई आचार्य या कवि हैं।


13 अप्रैल, 1925 को अविभाजित भारत के फिरोजपुर जो कि अब पाकिस्तान में है, में जन्मे वर्मा मलिक का असल नाम बरकत राय मलिक था। उन्हें बचपन से ही संगीत और कविताओं का शौक था। उन्होंने शुरूआत भक्ति गीतों को लिखने से की। बरकत राय मलिक की नौजवानी का दौर, आजादी की जद्दोजहद का दौर था। इस दौर से मुतास्सिर होकर वे भी कांग्रेस के सरगर्म मेंबर बन गए। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत और उसके जोर-ओ-जुल्म के खिलाफ गीत लिखे। कांग्रेस के जलसों में वे जब भी शिरकत करते, अवाम को अपने गीत सुनाते। उनकी इन इंकलाबी सरगर्मियों का अंजाम यह हुआ कि वे अंग्रेज हुक्मरानों की नजर में आ गए। उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। मगर जल्द ही उनकी रिहाई हो गई। वजह, उनका नाबालिग होना। बहरहाल, हजारों-हजार देशवासियों की कुर्बानियों के बाद देश आजाद हुआ। लेकिन आजादी मुल्क के बंटवारे के तौर पर मिली। देश में चारों और साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे।


इन दंगों में लाखों लोग प्रभावित हुए। बरकत राय मलिक के परिवार ने भी दंगों से अपनी जान बचाकर दिल्ली में पनाह ली। जिंदगी जब पटरी पर आई, तो गम-ए-रोजगार की चिंता सताने लगी। बरकत राय मलिक को जो हुनर आता था, उन्होंने उसी में अपना करियर बनाने का मन पक्का कर लिया। मौसीकार हंसराज बहल के भाई बरकत राय के अच्छे दोस्त थे। उनकी सिफारिश पर बरकत राय ने मायानगरी मुंबई की राह पकड़ी। मुंबई पहुंचकर, वे हंसराज बहल से मिले। बहल, उनके गीत लिखने की काबिलियत से काफी मुतासिर हुए और उन्होंने बरकत राय को पंजाबी फ़िल्म ’लच्छी’ में गीत लिखने का चांस दे दिया। फिल्म के साथ-साथ इसके गाने भी हिट हुए। पहली ही फिल्म की कामयाबी के बाद, उनके पास काम की कोई कमी नहीं रही। वे पंजाबी फ़िल्मों के हिट गीतकार बन गए।


इसी दौरान बरकत राय मलिक के दोस्तों ने उन्हें अपना नाम बदलने का मशविरा दिया और इस तरह बरकत राय मलिक, वर्मा मलिक हो गए। फ़िल्मी दुनिया में आगे चलकर वे इसी नाम से पहचाने जाने लगे। मौसीकार हंसराज बहल के साथ वर्मा मलिक ने ‘यमला जट’ समेत तीन पंजाबी फ़िल्मों में काम किया। उन्होंने तकरीबन 40 पंजाबी फ़िल्मों में गीत लिखे और यह सभी गीत काफी पसंद किए गए। ‘छाई’, ‘भांगड़ा’, ‘दो लच्छे’, ‘गुड्डी’, ‘दोस्त’, ‘मिर्ज़ा साहिबान’, ‘तकदीर’, ‘पिंड दी कुड़ी’, ‘दिल और मोहब्बत’ आदि वे सुपर हिट फिल्में हैं, जिनमें वर्मा मलिक ने गाने लिखे। गाने लिखने के अलावा उन्होंने दो-तीन फ़िल्मों के संवाद लिखे, संगीत दिया और इतनी ही फ़िल्मों का निर्देशन भी किया।


उनकी जिंदगी अच्छी कट रही थी, मगर छठा दशक शुरू होते-होते मुंबई में पंजाबी फ़िल्मों का बाज़ार एक दम खत्म हो गया। जिसका असर गीतकार वर्मा मलिक पर भी पड़ा। उन्हें काम मिलना बंद हो गया। हालांकि पंजाबी फिल्मों में काम करने के दरमियान वर्मा मलिक ने कुछ हिंदी फिल्मों ‘चकोरी’ (साल-1949), ‘जग्गू’ (साल-1952), ‘श्री नगद नारायण’ (साल-1955) और ‘मिर्जा साहिबान’ (साल-1957) में गाने लिखे थे, मगर उन्हें उतना मौका नहीं मिला, जितने कि वे उसके हकदार थे। लिहाजा वे पंजाबी फिल्मों में ही रमे रहे। पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री के बंद होने से वर्मा मलिक के सामने एक बार फिर, नये सिरे से जिंदगी जीने की चुनौती आन पड़ी। कुछ अरसे तक उन्होंने कोई काम नहीं किया। साल 1967 में संगीतकार ओ. पी. नैयर ने उन्हें फिल्म ‘दिल और मोहब्बत’ के गाने लिखने का मौका दिया। इस फिल्म का गीत ‘‘आंखों की तलाशी दे दे मेरे दिल की हो गयी चोरी’’ काफी मकबूल हुआ। बावजूद इसके वर्मा मलिक की किस्मत उनसे रूठी रही। हिंदी फिल्मों में काम मिलना, उनके लिए मुश्किल बना रहा।


गर्दिश के दिनों में एक रोज वे फेमस स्टूडियो के सामने से गुज़र रहे थे, अचानक उन्हें अपने दोस्त निर्माता-निर्देशक मोहन सहगल की याद आयी। वे उनसे मिलने पहुंचे, तो बातों-बातों में संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी का ज़िक्र छिड़ा। मोहन सहगल ने उनसे कल्याणजी-आनंदजी से मुलाकात करने को कहा। उस वक्त फिल्मी दुनिया की यह हिट संगीतकार जोड़ी निर्माता-निर्देशक-अदाकार मनोज कुमार की फिल्म ‘उपकार’ का संगीत तैयार कर रही थी। वर्मा मलिक जब उनसे मिलने पहुंचे, तो मनोज कुमार भी वहां मौजूद थे। वे उन्हें पहले से जानते थे और उनके पंजाबी गीतों के मुरीद भी थे। वर्मा मलिक ने उन्हें अपने कुछ गीत सुनाए, जिसमें एक गीत मनोज कुमार को बेहद पसंद आया। उन्होंने अपनी फ़िल्म ’उपकार’ के लिये यह गीत उनसे ले लिया। मगर किस्मत अभी वर्मा मलिक का और इम्तिहान ले रही थी। फिल्म में इस गीत की वाजिब सिचुएशन न होने की वजह से गाना इस्तेमाल नहीं हो पाया।


मगर मनोज कुमार गाने को संभाल कर रखे रहे। जब फिल्म ‘यादगार’ बनने की बारी आई, तो उन्होंने इस गाने को कुछ बदलाव के बाद फिल्म में इस्तेमाल किया। संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी ने गाने की जितनी शानदार धुन बनाई, उतने ही बेहतरीन अंदाज में इसे मुकेश ने गाया। फिल्म के गाने जब रिलीज हुए, तो यह गाना ‘‘बातें लंबी मतलब गोल, खोल न दे कहीं सबकी पोल, तो फिर उसके बाद इकतारा बोले तुन तुन’’ सुपर हिट साबित हुआ। देश की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक दशा पर तीखा कमेंट करता यह गाना, जनता को खूब पसंद आया। फिल्म की कामयाबी से गीतकार वर्मा मलिक की किस्मत भी चमक उठी। उनके पास अब काम की कोई कमी नहीं रही। वर्मा मलिक ने भी इस मौके का फायदा उठाया और एक के बाद एक उनकी कई फिल्मों के गाने सुपर हिट हुए। ’पहचान’, ’बेईमान’, ’अनहोनी’, ’धर्मा’, ’कसौटी’, ’विक्टोरिया न. 203’, ’नागिन’, ’चोरी मेरा काम’, ‘हम तुम और वो’, ‘जानी दुश्मन’, ‘शक’, ‘दो उस्ताद’, ‘कर्त्तव्य’, ’रोटी कपड़ा और मकान’, ’संतान’, ‘बेरहम’, ‘हुकूमत’, ’एक से बढ़कर एक’ आदि वे फिल्में हैं जिनमें वर्मा मलिक के मधुर गाने शामिल हैं।


सत्तर का पूरा दशक गीतकार वर्मा मलिक के नाम रहा। इस दहाई में फिल्मी दुनिया के सबसे बड़े और प्रसिद्ध अवार्ड ‘फिल्मफेयर अवार्ड’ से उन्हें दो बार नवाजा गया। पहली बार साल 1971 में फिल्म ’पहचान’ के गीत ‘‘सबसे बड़ा नादान वही है’’ के लिए, उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का अवार्ड मिला। गीत इतना लोकप्रिय हुआ कि इसी गाने के लिए मुकेश को सर्वश्रेष्ठ गायक और संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला। दो साल बाद साल 1973 में इस टीम ने फिर फिल्म ’बेईमान’ में अपने गीत-संगीत से जादू जगाया। ‘‘जय बोलो बेइमान की जय बोलो’’ गाने के लिये वर्मा मलिक की झोली में सर्वश्रेष्ठ गीतकार का अवार्ड आया। उन्होंने आगे भी मनोज कुमार की फिल्मों ‘सन्यासी’ एवं ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ के गाने लिखे। जिसमें साल 1974 में आई ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ के गाने जबर्दस्त हिट हुए। ‘‘तेरी दो टकियाँ दी नौकरी, मेरा लाखों का सावन जाए’’ के अलावा ‘‘बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गयी’’ गाने ने तो पूरे देश में धूम मचा दी। लोग उस वक्त बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी से परेशान थे। ऐसे शिकस्ता माहौल में जब यह गाना आया, तो जैसे अवाम की आवाज़ बन गया। उन्हें लगा कि कोई तो है, जिसने उनके दर्द को अल्फाजों में पिरो दिया है। गाने के तीखे बोलों और जनता में इसके असर को देखते हुए, सरकार ने कुछ अरसे तक इस पर पाबंदी भी लगाई। लेकिन पाबंदी का उल्टा असर हुआ। गाना और भी ज्यादा लोकप्रिय हो गया।


वर्मा मलिक ने अपने फिल्मी करियर में संगीतकार शंकर-जयकिशन, कल्याणजी-आनन्दजी, लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल, सोनिक ओमी, जयदेव, आर. डी. बर्मन, बप्पी लाहिरी, चित्रगुप्त और राम लक्ष्मण जैसे संगीतकारों की धुनों पर एक से बढ़कर एक गीत लिखे। संगीतकार सोनिक-ओमी के साथ उनकी जोड़ी खूब जमी। उन्होंने करीब 35 फिल्मों में एक साथ काम किया। इस जोड़ी ने सबसे पहले साल 1970 में आई फिल्म ’सावन भादो’ का गीत-संगीत तैयार किया। फिल्म सुपर हिट रही। सच बात तो यह है कि फिल्म के हिट होने में इसके गीत-संगीत का बड़ा रोल था। खास तौर पर ‘कान में झुमका चाल में ठुमका कमर पे चोटी लटके’’ और ‘‘सुन सुन ओ गुलाबी कली तेरी मेरी’’ गानों ने तो कमाल कर दिखाया। आज भी ये गाने जब भी रेडियो पर बजते हैं, मन झूमने-मचलने लगता है। साल 1976 में आई फिल्म ‘नागिन’, और साल 1979 में आई ‘जानी दुश्मन’ और ‘कर्तव्य’ में लिखे वर्मा मलिक के गाने भी खूब चले। संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के बेहतरीन संगीत से सजे उनके इन गानों ‘‘तेरे संग प्यार में नहीं तोड़ना’’, ‘‘तेरे इश्क का मुझ पे हुआ ये असर’’ (फिल्म-नागिन), ‘‘तेरे हाथों में पहना के चूड़ियां’’, ‘‘ले मैं तेरे वास्ते सब छोड़ के’’ (फिल्म-जानी दुश्मन), ‘‘कोई आएगा, लाएगा दिल का चैन’’, ‘‘चंदा मामा से प्यारा मेरा मामा’’ (फिल्म-कर्तव्य) ने तहलका मचा दिया।


वर्मा मलिक ने अपने गानों से अकेले देशवासियों का मनोरंजन ही नहीं किया, बल्कि जब भी उन्हें मौका मिला अपने गीतों से सामाजिक संदेश दिया। सरल अल्फाजों में अवाम को एक सीख दी। आम आदमी की समस्याएं, परेशानियां और सुख-दुःख उनके गीतों में अक्सर मुखर हो उठते थे। व्यंग्यात्मक शैली में गीत कहने का उनका अपना अलग अंदाज़ था। ‘यादगार’, ‘पहचान’, ‘बेईमान’, ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ फिल्म के शीर्षक गीत इस बात की निशानदेही करते हैं। वर्मा मलिक बेहद होनहार नग्मा निगार थे। नग्मे लिखने में उनका कोई सानी नहीं था। निर्देशक, संगीतकार जैसे ही फिल्म सिचुएशन बताते, वे तुरंत गीत का मुखड़ा लिख देते थे। इतना ही नहीं संगीत की भी उन्हें अच्छी समझ थी। उनके कई सुपर हिट गानों की धुन खुद उन्होंने ही बनाई थी। यह बात अलग है कि इसका क्रेडिट उन्हें कभी नहीं मिला। वर्मा मलिक अवामी गीतकार थे। उनके गानों की बेशुमार कामयाबी के पीछे उनके गीतों की जबान थी। जो हर एक के समझ में आसानी से आ जाती थी। सहज, सरल जबान में वे बड़ी-बड़ी बातें कह जाते थे।


उनके इन मानीखेज गीतों का कोई जवाब नहीं। मिसाल के तौर पर उनके कुछ गीतों के अंतरों पर नजर डालिए, ‘‘बेईमानी से ही बनते, हैं बँगले बाग बगीचे/सर से ऊपर पंखे, चलते पाँव तले गलीचे/रीत रिवाज धर्म और मजहब दब जाते हैं नीचे/बेईमान सबसे आगे और दुनिया पीछे पीछे/मेहनत से बने ना कुटिया, अरे छोड़ो बात मकान की/जय बोलो बेईमान की’’ (फ़िल्म बेईमान), ‘‘राम न करे मेरे देश को/कभी भी ऐसा नेता मिले/जो आप भी डूबे देश भी डूबे/जनता को भी ले डूबे/वोट लिया और खिसक गया/जब कुर्सी से चिपक गया/तो फिर उसके बाद उसके बाद/एक तारा बोले तुन तुन तुन तुन/क्या कहे ये तुमसे सुन सुन (फिल्म-यादगार), ‘‘ग़रीब को तो बच्चे की पढ़ाई मार गई/बेटी की शादी और सगाई मार गई/किसी को तो रोटी की कमाई मार गई/कपडे़ की किसी को सिलाई मार गई/किसी को मकान की बनवाई मार गई/जीवन दे बस तीन निशान/रोटी कपड़ा और मकान/ढूंढ-ढूंढ के हर इंसान/खो बैठा है अपनी जान/जो सच सच बोला, तो सच्चाई मार गई/और बाक़ी कुछ बचा, तो महँगाई मार गई।’’, ‘‘तकदीर के कलम से कोई बच ना पाएगा’’ (फिल्म-बेरहम) वर्मा मलिक के इन गानों को लिखे हुए चार दशक से ज्यादा का अरसा हो गया, लेकिन ये गाने आज भी प्रासंगिक हैं। इन्हें सुनने के बाद ऐसा लगता है कि ये गाने आज के हालात पर ही हैं।


हिंदी फिल्मों में अपने छोटे से करियर में वर्मा मलिक ने कई सदाबहार गीत लिखे। जो आज भी सुनने वालों के कानों में मधुर रस घोलते हैं। उन्हें जागरूक करते हैं। लेकिन हर शख्स का एक दौर होता है और फिर वह दौर, सुनहरा अतीत हो जाता है। हिंदी सिनेमा में आठवें दशक में अमिताभ बच्चन का जमाना आया। फिल्मों में उनकी एंग्री यंग मैन की छवि के मुताबिक एक्शन बढ़ा, तो गीत-संगीत हाशिये पर चला गया। ऐसे में वे गीतकार और संगीतकार भी गुमनामी के साये में चले गए, जिन्होंने फिल्मी दुनिया में अपने गीत-संगीत के मेयार से कभी समझौता नहीं किया। इस दरमियान वर्मा मलिक पर एक सानेहा और गुजरा, उनकी शरीक-ए-हयात का इंतकाल हो गया। फिल्मी दुनिया में बदलाव और इस वाकियात का असर वर्मा मलिक पर इतना पड़ा कि उन्होंने फिल्मों से अपनी दूरी बढ़ा ली। अपनी जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव, सफलता-असफलता का स्वाद चखने वाला यह गीतकार 15 मार्च, 2009 को इस दुनिया से जुदा हो गया।


(वरिष्ठ पत्रकार जाहिद खान का लेख।)

फ़िल्मी पोस्टर / राजा बुंदेला

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