बुधवार, 23 नवंबर 2022

एशियाड 82- 19 नवंबर, जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम / विवेक शुक्ल

 

रेत की तरह फिसल गया वक्त और चार दशक गुजर गए जब राजधानी में 19 नवंबर,1982 को नवें एशियाई खेलों का शुभाऱंभ हुआ था। क्या समां था उस दिन दिल्ली का। सब तरफ एशियाई खेलों के आयोजन का असर दिखाई दे रहा था। उस दिन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने  एशियाई खेलों का जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में उदघाटन किया था। इस अवसर पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, एशियाई खेलों की आयोजन समिति के अध्यक्ष बूटा सिंह, दिल्ली के उप राज्यपाल जगमोहन वगैरह भी वहां पर मौजूद थे। वह इंदिरा जी का जन्म दिन भी था। इसलिए उन्हें अलग से शुभकामनाएं भी मिल रही थीं। उन गौरवशली पलों के साक्षी बने थे स्टेडियम में बैठे एक लाख दर्शक, खिलाड़ी और आयोजन से जुड़े इंजीनियर, आर्किटेक्ट वगैरह लोग। इसके साथ ही देश के करोड़ों खेल प्रेमी अपने टीवी सेटों में एशियाई खेलों के उदघाटन समारोह को देख रहे थे। स्वतंत्र भारत में खेलों का वह सबसे भव्य आयोजन था। इससे पहले भारत ने 1951 में पहले एशियाई खेल आयोजित किए थे। पर वे 1982 के एशियाई खेलों की तुलना में बहुत छोटे थे। बेशक, दिल्ली के चौतरफा विकास के लिए  निर्णायक रहे थे 1982 के एशियाई खेल। तब यहां  अनेक स्टेडियम, फ्लाईओवर, खेल गांव, नई-नई सड़कें, बसों के रूट बने थे। दिल्ली पहली बार कायदे से विकास होता देख रही थी। तब यहां पर निर्माण कार्यों के लिए बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और उड़ीसा से हजारों श्रमजीवी आए थे। वे फिर यहां पर ही बस गए थे। बेशक, उन खेलों के बाद दिल्ली का चेहरा कहीं अधिक समावेशी होकर उभरा था।


पीटी उषा,1982, जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम


उड़न परी पीटी उषा को देश ने 1982 के एशियाई खेलों के दौरान ही पहली बार जाना था। हालांकि पीटी उषा ने 1980 के मास्को ओलंपिक खेलों में भाग लिया था। पर दिल्ली और देश ने उन्हें कायदे से पहली बार जवाहरलाल नेहरु स्टेडियम में देखा था। पीटीउषा 100 मीटर की स्पर्धा में फाइनल में पहुंच कर एक तरह से बता दिया था कि वह अब लंबे समय तक ट्रैक पर राज करेंगी। 100 मीटर स्पर्धा के फाइनल को देखने के लिए जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम खचाखच भरा हुआ था। रेस के आरंभ होते ही पीटी उषा ने बढ़त बना ली थी। वह शेष प्रतियोगियों से आगे दौड़ रही थीं। पर फिर अचानक से वह पिछड़ने लगीं। रेस खत्म होने से पहले वह किसी तरह से दूसरे स्थान पर आ गईं और अंत में सिल्वर मेडल जीतने में सफल रहीं। उस स्पर्धा का गोल्ड फिलीपींस की लिडिया डि वेगा ने जीता था। उसके बाद पीटी उषा ने लिडिया डि वेगा को कई प्रतियोगिताओं में शिकस्त दी थी। पीटी उषा चालीस सालों के बाद फिर से उस दिल्ली में बतौर सांसद के लौटी हैं, जिधर उन्होंने अपने जीवन के पहले ही एशियाई खेलों में शानदार प्रदर्शन किया था।


किसने किया था एशियाड 82 का विरोध


 राजधानी में एशियाई खेलों से पहले उसके आयोजन के समय को लेकर कुछ लेखक, रंगकर्मी, विद्यार्थी  नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से विरोध भी जता रहे थे। अंजली देशपांडे ने एशियाई खेलों के आयोजन में पैसे को पानी की तरह से बहाने के खिलाफ ‘सफेद अप्पू’ नाम से एक नाटक लिखा। उसका निर्देशन युवा रंगकर्मी हरि ने किया था। उसमें प्रमथेश अंबष्टा, शैलजा शिवसुब्रमणयम ( कैंम्ब्रिज यूनिवर्सिटी), जोसेफ मथाई, अशोक प्रसाद ( कोलोरोडो यूनिवर्सिटी) अनिरुद्ध देशपांडे ( डीयू), एम.पी. सिंह, संजय बरनेला वगैरह ने भाग भी लिया था। अब इनमें से अधिकतर देश-विदेश के विश्व विद्लायों में पढ़ा रहे हैं। सफेद अप्पू के शो राजधानी के विभिन्न इलाकों के साथ-साथ फरीदाबाद में भी खेले गए थे। उन्हें दर्शकों ने खूब सराहा था। अंजली देशपांडे कहती हैं कि हम लोग खेल प्रेमी रहे हैं। हमारा विरोध तब इस बात को लेकर था कि एशियाई खेलों के आयोजन पर पैसा बहुत फूंका जा रहा था। हिंदी- अंग्रेजी, दोनों भाषाओँ में समान अधिकार से उपन्यास लिखने वाली अंजली देशपांडे कहती हैं कि हमारा सवाल देश की प्रथामिकता को लेकर था। हम सवाल पूछ रहे थेकि देश को बेहतर स्कूल और अस्पताल चाहिए न कि बड़े-बड़े स्टेडियम।


 


कितना उत्साह-उमंग था राजधानी में


 एशियाई खेल 19 नवंबर से लेकर 4  दिसम्बर 1982 तक हुए थे। राजधानी दिल्ली में युद्ध स्तर पर निर्माण कार्य चल रहे थे। आजादी के बाद देश पहली बार इतना बड़ा कोई अंतरराष्ट्रीय स्तर का आयोजन कर रहा था। जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, कऱणी सिंह स्टेडियम, छत्रसाल स्टेडियम, इंद्रप्रस्थ स्टेडियम ( अब इंदिरा गांधी स्टेडियम) वगैरह का निर्माण एशियाई खेलों के लिए ही हो रहा था। कनॉट प्लेस, शंकर मार्केट, युसुफ जई मार्केट, खान मार्केट,लोदी रोड मार्केट आदि की सफेदी हो रही थी। मेरिडियन होटल, ललित होटल, मौर्या शेरटन तब ही बने थे। खेलगांव मार्ग पर खेल गांव को पूरा करने का काम दिन-रात चला था। 1982 में आयोजित एशियाई खेलों को एशियाड- 82 कहा गया था। इसके आयोजन के चलते पहले से बने हुए नेशनल स्टेडियम, शिवाजी स्टेडियम, तालकटोर स्टेडियम को विश्व स्तरीय बनाया गया था। सड़कों का चौड़ीकरण हुआ और नए-नए फ्लाईओवर भी बने। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन का अजमेरी गेट की तरफ का गेट तब ही बनाया गया। इस कारण थामसन रोड में एक कब्रिस्तान और बहुत सारे सरकारी घरों को तोड़ा गया।


 क्या आपको याद है अप्पू


भारत सरकार ने एशियाड 82 के मद्देनजर 25 पैसे के दो नए सिक्के जारी किए थे। जिनमें से एक सिक्के के एक तरफ जंतर- मंतर और दूसरे सिक्के के एक तरफ अप्पू अंकित होता था। इन खेलों का शुभंकर अप्पू नामक एक शिशु हाथी था। वास्तविक जीवन में "कुट्टिनारायणन" नामक यह हाथी एक दुर्घटना में अपनी टाँग तुड़वा बैठा जब वह एक सैप्टिक टंकी में गिर गया और जिसके कारण अततः उसकी मृत्यु हो गई।उसी दौरान दिल्ली के प्रगति मैदान मे अप्पूघर का भी निर्माण हुआ था।


 एशियाड 82 के बहाने रंगीन टीवी की दस्तक


दिल्ली एशियाई खेलों का जब श्रीगणेश हुआ तो देश ने उसे रंगीन टीवी सेटों पर देखा। इससे पहले अक्तूबर के महीने से ही रंगीन टीवी की बुकिंग चालू हो गई थी। weston टीवी के ग्रेटर कैलाश के शो रूम में हर रोज दर्जनों लोग रंगीन टीवी की बुकिंग करवा रहे थे। तब रंगीन टीवी की कीमत 40 हजार रुपये से अधिक थी। जो आज के लिहाज से देखा जाए तो लाखों रुपये होगी। उस दौर में रंगीन टीवी खरीदना बड़ी उपलब्धि माना जाता था। तब लोगों के पास आज की तरह से पैसा तो नहीं था। सरकार ने टीवी बनाने वाली कंपनियों को रंगीन टीवी को बनाने के लिए जरूरी उपकऱणों के इम्पोर्ट की अनुमति दी थी। दूरदर्शन सिर्फ जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम, इंद्रप्रस्थ स्टेडियम(  अब इंदिरा गांधी स्टेडियम) तथा तालकटोरा स्वीमिंग पूल में हो रहे मैचों की ही रंगीन कवरेज कर रहा था। भारत-पाकिस्तान के बीच खेला गया हॉकी फाइनल मैच भी ब्लैक एंड व्हाइट ही दिखाया गया था।


 रिंग रेलवे का सफर


राजधानी में 1982 में एशियाई खेलों के आयोजन के दौरान सड़कों, स्टेडियमों और दूसरे इंफ्रास्ट्कचर के विकास तथा विस्ताUर के अलावा उत्तर रेलवे ने रिंग रेलवे को भी नये सिरे से शुरू किया था। इरादा यही था ताकि विभिन्न स्टेडियमों में आने-जाने वाले खेल प्रेमी और दूसरे लोग रिंग रेलवे की मदद से अपनी मंजिल पर आराम से पहुंच सकें। एक ट्रेन 80 मिनटों में 19 स्टेशनों का सफर तय कर लेती थी। इन स्टेशनों में मिन्टो ब्रिज, हजरत निजामउद्दीन, सदर बाजार, किशन गंज, दया बस्ती, सरदार पटेल मार्ग, चाणक्यपुरी, सेवा नगर, लाजपत नगर आदि स्टेशन शामिल थे। तब एक रुपये में सारे सफर की टिकट मिल जाती थी। बच्चों की टिकट मात्र 50 पैसे में मिल रही थी। महीने का पास 24 रुपये में और स्टुडेंस पास 12 रुपये में बन रहा था। रिंग रेलवे के तब के किराए की तुलना आज मेट्रो रेल के किराए से कीजिए। समझ आ जाएगा कि तब से लेकर अब तक कितनी बदल गई है दुनिया। हालांकि एशियाई खेलों के समय तो रिंग रेलवे में पर्याप्त संख्या में मुसाफिर सफर कर रहे थे, पर बाद में इसे फिर मुसाफिर मिलने बंद से हो गए थे।


1982 से डीटीसी का रूट नंबर 615


डीटीसी ने भी 1982 के एशियाई खेलों के मद्देनजर राजधानी में कई नए रूट शुरू किए थे। उनमें एक रूट नंबर 615 भी। रूट नंबर 615 का सफर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन (अजमेरी गेट) से पूर्वांचल हॉस्टल के बीच शुरू हुआ। डीटीसी ने इन 40 सालों के दौरान अपने अनेक रूट बंद किए और नए चालू किए, पर 615 बदस्तूर जारी है। हां, कुछ साल पहले इसे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की बजाय मिन्टो रोड टर्मिनल से शुरू किया जाने लगा। जब रूट नंबर 615 शुरू हुई तब  किसी ने सोचा भी नहीं था कि इस रूट से जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में पढ़ने-पढ़ाने वालों का एक भावनात्मक रिश्ता बन जाएगा। उनकी इससे तमाम यादें जो जुड़ी हैं। जेएनयू की कई पीढ़ियों ने इसमें सफर किया है। जेएनयू से बाहर निकलने से लेकर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन समेत बहुत सी जगहों में जाने के लिए रूट नंबर 615 एकमात्र सहारा रही है। यह बस सुपर बाजार, सिंधिया रोड, ईस्टर्न कोर्ट, नेशनल म्यूजियम, सफदरजंग रोड,लक्ष्मी बाई नगर,सरोजिनी नगर,आर.के.पुरम, मुनीरका गांव, वसंत विहार वगैरह होते हुए गोदावरी हॉस्टल और पूर्वांचल हॉस्टल पर पहुंचती है। और 20 मिनट के बाद 615 फिर से निकल पड़ती है अपनी मंजिल पर। ये करीब-करीब नामुमकिन है कि इसके  सफर में जेएनयू के कुछ या काफी छात्र न बैठे हो।


प्रकाश पदुकोण क्यों आए थे मॉडर्न स्कूल में


प्रकाश पादुकोण 1982 के एशियाई खेलों में भारत की तरफ से खेल नहीं रहे थे। उसके कुछ तकनीकी कारण थे। पर वे तब तक आल इंग्लैंड बैडमिंटन चैंपियन बन चुके थे। सारी दुनिया उन्हें उच्च कोटि के बैडमिंटन स्टार के रूप में पहचान रही थी। वे भी अपनी हर जगह गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करवाते थे। वे विवादों से परे रहते थे। एशियाई खेलों के विधिवत उदघाटन से पहले बैडमिंटन मुकाबलों में भाग लेने वाले देशों के खिलाड़ी मॉडर्न स्कूल बाराखंभा रोड के बैडमिंटन हॉल में प्रेक्टिस कर रहे थे। उन्हें वहां पर तमाम बैडमिंटन प्रेमी देख रहे थे। सारा माहौल बेहद खुशनुमा था। तब वक्त रहा होगा दिन के करीब तीन बजे का। तब ही प्रकाश पादुकोण भारतीय टीम के कुछ खिलाड़ियों के साथ हॉल में प्रवेश करते हैं। उनके आते ही सारा हॉल तालियों से गूंजने लगता है। यह खाकसार भी वहां पर था। सभी देशों के खिलाड़ी और उनके कोच प्रकाश पादुकोण की तरफ बढ़ते हैं। सबको प्रकाश पादुकोण का आटोग्राफ चाहिए था। तब तक सेल्फी का दौर आने में लंबा वक्त  शेष था। प्रकाश पादुकोण ने दस-बीस आटोग्राफ दिए। उसके बाद हाथ जोड़ लिए। फिर वे भारतीय टीम के साथ अभ्यास करने लगे।


 विवेक शुक्ला, नवभारत टाइम्स, 19 नवंबर, 2022


मंगलवार, 22 नवंबर 2022

झारखंड' राजनीतिक अस्थिरता के 'कलंक' से कब मुक्त होगा ? / विजय केसरी

 

( 22 नवंबर, झारखंड विधानसभा स्थापना दिवस पर विशेष )


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हम सबों का प्यारा झारखंड 22 वर्षों का युवा हो चुका है।  लंबे संघर्ष के बाद झारखंड अलग प्रांत का गठन हो पाया था।  उम्मीद थी कि झारखंड अलग प्रांत निर्माण के बाद झारखंड वासियों के दिन सुधरेंगे। वर्षों से उपेक्षित झारखंड में चतुर्दिक विकास की गंगा बहेगी। लोगों को रोजगार मिलेगा।  प्रांत वासियों का पलायन रुकेगा। लेकिन ऐसा कुछ भी होता दिख नहीं रहा है ।  झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता के कारण चतुर्दिक विकास पर ग्रहण लग गया है। सन 2000 में जब झारखंड अलग प्रांत का गठन हुआ था, तब ही इसके माथे पर राजनीतिक अस्थिरता की रेखाएं उकेर दी गई थीं। 2000 में एनडीए की मिली जुली सरकार बनी थी।  बाबूलाल मरांडी इस प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री बने थे । प्रारंभ में सब कुछ ठीक ही चल रहा था, लेकिन सरकार गठन के 6 महीने बाद ही आपसी खींचातानी शुरू हो गई थी।  एनडीए में शामिल दलो के मंत्रियों और नेताओं के आए दिन एक दूसरे के विरुद्ध बयान अखबारों में छपने लगे थे।  सरकार में शामिल सभी मंत्री अपने अपने मन के हो गए थे।

 झारखंड में एनडीए की मिली जुली सरकार जरूर थी, लेकिन कोई किसी की बातों को सुनने को तैयार नहीं था।  जदयू के वरिष्ठ नेता गौतम सागर राणा को  एनडीए सरकार का पहला संयोजक बनाया गया था । सरकार बेहतर ढंग से चले । झारखंड में चतुर्दिक विकास हो। इस निमित्त उन्होंने एनडीए में शामिल सभी मंत्रियों की कई बैठकें आयोजित की थी। मंत्रियों और नेताओं के फालतू बयान बाजी बंद हो।  सरकार बेहतर तालमेल के साथ चले । ऐसा उन्होंने एक  प्रयास भी किया था, लेकिन उनका यह  प्रयास असफल ही सिद्ध हुआ था।  आपसी खींचातानी के कारण मात्र 27 महीने में ही झारखंड की पहली बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व में बनी सरकार चली गई  थी। फिर अर्जुन मुंडा इस राज्य के मुख्यमंत्री बने थे।  वे भी आपसी खींचातानी के कारण अपना कार्यकाल पूरा कर नहीं पाए थे। झारखंड अलग प्रांत के अगुआ शिबू सोरेन एक बार कुछ दिनों के लिए ही झारखंड के मुख्यमंत्री बन पाए थे।  झारखंड में सरकारें बनती गईं,  कुछ साल और कुछ महीने  चल कर ही समाप्त होती गई थी। झारखंड वासियों के उम्मीद के विपरीत प्रांत की सरकारों के चलने के कारण सभी विकास के कामों में ग्रहण लग गया । यह सब कुछ राजनीतिक अस्थिरता की कोख से जन्म ले रहा था।

झारखंड विधान सभा अपने स्थापना काल से ही हर वर्ष किसी एक विधायक को उनके बेहतर आचरण और विधानसभा की कार्रवाई में पूर्ण सहयोग देने के निमित्त सर्वश्रेष्ठ विधायक सम्मान प्रदान कर अलंकृत करता रह रहा है।  लेकिन यह झारखंड विधानसभा के लिए दुर्भाग्य की बात है कि पक्ष और विपक्ष के विधायकों ने ऐसा कोई विशिष्ट उदाहरण विधानसभा में नहीं प्रस्तुत किया, जिससे यह प्रतीत हो कि विधानसभा के बहुमूल्य समय का सदुपयोग हुआ हो।  झारखंड विधानसभा के स्थापना के बाद ही चाहे एनडीए की सरकार हो, चाहे यूपीए की सरकार हो, चाहे झारखंड मुक्ति मोर्चा की सरकार हो, चाहे एक निर्दलीय विधायक की सरकार हो, किसी ने भी विधानसभा के बहुमूल्य समय को बर्बाद होने से नहीं बचा पाया।  बल्कि आरोप-प्रत्यारोप में ही विधानसभा के बहुमूल्य समय बर्बाद होता रह रहा है।  विधायक गण चाहते तो विधानसभा में चर्चा के दौरान झारखंड की बुनियादी समस्याओं पर बेहतर ढंग से उठाते, बेहतर ढंग से बातचीत करते । बहस करते। समस्याओं के स्थाई निराकरण के लिए कोई स्थाई हल ढूंढ पाते । 

झारखंड की हरियाली बीते 22 वर्षों में बहुत ही कम हुई है। झारखंड का नाम झारखंड इसलिए पड़ा था कि यह प्रदेश  पेड़ पौधों की हरियाली से भरी पड़ी थी  । इस प्रदेश में खनिज संपदा के बाद पेड़ पौधे ही संपदा के रूप में मौजूद हैं।  बीते 22 वर्षों के दरमियान वन विभाग द्वारा संचिकाओं पर झारखंड की हरियाली को बरकरार रखने के लिए करोड़ों रुपए खर्च किए गए।  लेकिन जमीनी स्तर पर परिणाम क्या सामने आया ?  पढ़कर और सुनकर घोर आश्चर्य होगा। बीते 22 वर्षों में जंगलों की अवैध कटाई ने झारखंड की पहचान ही मिटाती चली जा रही है।  बीते दिनों झारखंड के विभिन्न जिलों में लकड़ी की कटाई के कई अवैध आरा मील हजारीबाग, चतरा, कोडरमा, रांची  आदि जिलों में पकड़े गए। आरा मीलों में करोड़ों रुपए के लकड़ी जप्त किए गए।  अब सवाल यह उठता है कि जब वन विभाग वन रोपण का कार्य गांव - गांव में जा कर रही है, तब इन गांवों में इतनी संख्या में ये अवैध आरा मील कैसे चल रहे थे ? ये आरा मील किसकी देखरेख में चल रहे थे ?  इन आरा मीलों ने मिलकर झारखंड के जंगलों की सूरत ही बिगाड़ कर रख दी है। पकड़े गए इन अवैध आरा मिलों के विरुद्ध क्या कार्रवाई हुई ? चूंकि झारखंड में एक मजबूत सरकार नहीं रहने के कारण संबंधित आरा मिलो एवं इनके सूत्रधारों पर ढंग से कानूनी कार्रवाई नहीं की गई। फलत: इस वन लूट में शामिल अधिकारी, व्यवसाई और सरकार में शामिल मंत्री खुले रूप से घूम रहे हैं।

 झारखंड की राजनीतिक अस्थिरता का आलम यह रहा कि मधु कोड़ा जैसे एक निर्दलीय विधायक झारखंड के मुख्यमंत्री बने थे।  विचारणीय बात यह है कि एक निर्दलीय विधायक झारखंड के हित में निष्पक्ष होकर  कैसे फैसला ले सकता है ? उसकी कुर्सी तो दलिया विधायकों की मुट्ठी में कैद होती है।  मधु कोड़ा  मुख्यमंत्री के रूप में एक के बाद एक  संचिकाओं के ऊपर दस्तखत करते चले जा रहे थे, ये सारे दस्तखत किसी न किसी दबाव में जरूर हुए थे।  जब उनकी कुर्सी चली गई, तब उनके द्वारा किए गए दस्तखत पर बातें उठी थीं।  इन बातों ने उन्हें जेल तक पहुंचा दिया था।  झारखंड के 14 वर्ष राजनीतिक अस्थिरता में ही बीत गए थे । 14 वर्षों के बाद झारखंड में पहली बार रघुवर दास के नेतृत्व में एनडीए सरकार अस्तित्व में आई थीं। बीते 22 वर्षों के दरमियान रघुवर दास की पहली सरकार थी, जिसने किसी रूप में अपना 5 वर्षों का कार्यकाल पूरा किया था।  झारखंड की जनता ने पांच वर्षों के बाद रघुवर दास की सरकार को अलविदा कह दिया था।  हाल के कुछ दिनों में जो समाचार आ रहे हैं, उससे पता चलता है कि रघुवर दास सरकार में शामिल पांच मंत्रियों के खिलाफ ईडी अर्थात प्रवर्तन निदेशालय ने समन भेज कर ईडी दफ्तर बुलाया है। उनके खिलाफ ईडी ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाया है।  ईडी रघुवर दास  सरकार में शामिल इन पांचों मंत्रियों से  पूछताछ करने जा रही है।  17 नवंबर को राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को ईडी ने समन भेज कर पूछताछ के लिए दफ्तर बुलाया था।  साढ़े नौ घंटे तक मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से ईडी ने खनन विभाग के 1000 करोड़ों रुपए एवं मनी लॉन्ड्रिंग से संबंधित आरोप पर उनसे पूछताछ की है । इस पूछताछ से यह स्पष्ट हो जाती है कि  झारखंड के खनिज संपदा की भरपूर ढंग से लूट हुई है।‌ प्रदेश में जो भी सरकारें आईं, किसी न किसी रूप में अस्थिर ही रहीं । अब तक झारखंड में जो भी सरकारें बनी, किसी ने भी झारखंड को खनिज संपदा की लूट से बचा नहीं पाई।  मुख्यमंत्री और मंत्री इसके घेरे में आते रह रहे हैं।

 पिछले दिनों झारखंड के वरिष्ठ नेता सरयू राय ने यह कहा है कि जब ईडी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से पूछताछ के लिए बुला सकती, तब पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास से क्यों नहीं पूछताछ के लिए बुलाती है ।  सरयू राय के उक्त वक्तव्य का आशय यह है कि रघुवर दास की सरकार भी झारखंड के खनिज लूट में शामिल रही है। झारखंड लूट ने प्रांत के विकास को ग्रहण दिया है।

किसी भी  राज्य के विकास के लिए 22 वर्षों का समय कम नहीं होता है।  लेकिन अब तक  झारखंड एक लूट का  ही बना रहा।  जिसे जब भी अवसर मिला, झारखंड को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ा।  राजनीतिक अस्थिरता के कारण झारखंड के अधिकारी भी बेलगाम हो गए । झारखंड के अधिकारी अपनी मनमर्जी से प्रशासनिक कार्य पूरा करते हैं।  यह झारखंड का दुर्भाग्य ही है कि झारखंड के लूट में झारखंड के बड़े बड़े अधिकारी शामिल रहे हैं।  उदाहरण के तौर पर पूजा सिंघल जो इस प्रांत के विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर आसीन रहीं। आज पूजा सिंघल  मनी लांड्रिंग और आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के केस में रांची जेल में बंद है। इसके अलावा झारखंड के कई वरीय पदाधिकारियों के विरुद्ध भी मुकदमे चल रहे हैं।  झारखंड का चतुर्दिक विकास तभी संभव होगा, जब झारखंड के एक-एक विधायक पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ विधानसभा के संकल्प के अनुरूप आचरण करेंगें।  झारखंड को सुंदर बनाने के लिए सबसे पहले झारखंड को लूटना बंद करें। झारखंड की खनिज संपदा और हरियाली पर झारखंड वासियों का हक है।  झारखंड वासियों ने आप सबों को मत देकर विधायक, मंत्री और मुख्यमंत्री बनाया हैं । राज्य के प्रति आप सबों की नैतिक जवाबदेही बनती है कि  राज्य के विकास के लिए ईमानदारी पूर्वक पहल करें।  राजनीतिक अस्थिरता के कारण झारखंड के विकास पर ग्रहण लग गया है।  यह तभी दूर होगा, जब इमानदारी पूर्वक  पहल किया जाएगा। झारखंड को  एक मजबूत और इमानदार सरकार की  जरूरत है, जो राज्य वासियों के हित में फैसला लें । राज्य के उद्यमिता विकास, हरियाली, खेतों में पानी, झारखंड से उत्पादित वस्तुओं से संबंधित उद्योगों का निर्माण प्रदेश में करें, बेरोजगारों को नौकरी दे सके, ऐसी एक मजबूत सरकार की झारखंड में जरूरत है। है। इस निमित्त झारखंड वासियों को अपने अपने मत का प्रयोग धर्म, जात पात से ऊपर उठकर  करने की जरूरत है । ऐसे लोगों को चुनकर विधानसभा में भेजने की जरूरत है, जो झारखंड के विकास को गति दे सके।


विजय केसरी,

( कथाकार/स्तंभकार )

 पंच मंदिर चौक, हजारीबाग -  825 301,

मोबाइल नंबर  :-9234799550.

सोमवार, 21 नवंबर 2022

ईडी द्वारा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से पूछताछ के निहितार्थ

 


विजय केसरी


बीते सात घंटे से अधिक समय से प्रांत के मुख्यमंत्री से ईडी कार्यालय में पूछताछ चल रही है।  मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के ईडी कार्यालय पहुंचते ही  मुख्य  दरवाजा  बंद कर दिया गया था । सुरक्षा के भारी इंतजाम किए गए हैं । अंदर ईडी के वरीय पदाधिकारियों की टीम मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से पूछताछ कर रहे  हैं। पूछताछ के दौरान क्या - क्या प्रश्न पूछे गए हैं । यह बात अभी सामने नहीं आ पाई  है। यह पूछताछ  झारखंड की  यूपीए सरकार की स्थिरता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।  पूछताछ के दौरान अगर ईडी को कुछ ऐसी बातें हाथ लग जाती हैं, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि अवैध खनन एवं मनी लॉन्ड्रिंग मामले में हेमंत सोरेन भी संलिप्त हैं।  तब  यह यूपीए सरकार की स्थिरता पर ही ग्रहण लगने जैसा होगा। 

 उम्मीद थी कि दो-तीन घंटे ही ईडी द्वारा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से सवाल पूछे जाएंगे । लेकिन  समय बढ़ता ही चला जा रहा है, यह किसी भी सूरत में झारखंड की यूपीए सरकार के लिए अच्छा संकेत नहीं है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जिस जोश  खरगोश के साथ अपने घर से निकल कर ईडी कार्यालय पहुंचे थे, जल्द ही ईडी के सवालों से छुटकारा पा लेंगे । लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता चला जा रहा है,  यूपीए सरकार के लिए यह पूछताछ एक  बड़ी समस्या बनती चली जा रही है।  जबकि हेमंत सोरेन सरकार के सारे मंत्री,  विधायक गण एवं कार्यकर्ताओं में उत्साह जरूर दिख रहा है । परन्तु  विलंब होने के साथ उनके उत्साह में भी कमी आती जा रही है। अब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के जवाब पर ही सारी बातें निर्भर करती हैं, कि वे अपने जवाब से ईडी के अधिकारियों को कितना संतुष्ट कर पाते हैं ?

अभी दो दिन भी नहीं बीते होंगे , जब झारखंड प्रांत ने अपना 22 वां स्थापना दिवस बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया।  इस अवसर पर प्रांत के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने बहुत ही बढ़ चढ़कर अपनी बातों को रखा।  उन्होंने केंद्र सरकार पर यह आरोप भी मढ़ा कि उनकी सरकार को केंद्र सरकार गिराना चाहती है। साथ ही  राज्य के महामहिम राज्यपाल महोदय भी उनकी सरकार को अपदस्थ करना चाहते है। इस तरह के कई और बड़े गंभीर राजनीतिक आरोप केंद्र सरकार पर राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने लगाया । हेमंत सोरेन ने यहां तक केंद्र सरकार पर आरोप मढ़ा डाला कि सरकारी एजेंसियों का घोर दुरुपयोग किया जा रहा है ।। झारखंड के स्थापना समारोह में देश के महामहिम राष्ट्रपति महोदया भी आई  थीं। यह झारखंड  प्रांत के लिए बड़ी गर्व की बात है।  यह पहला अवसर था कि झारखंड के स्थापना समारोह में देश के राष्ट्रपति शिरकत लिए हों। लेकिन देश  के माननीय राष्ट्रपति महोदया सिर्फ बिरसा मुंडा की जन्मभूमि उलीहातू के कार्यक्रम में सम्मिलित हुईं । वहां वह बिरसा मुंडा के परिवार वालों से मिलीं । उन्होंने राज्य सरकार के सरकारी कार्यक्रमों में भाग न  लेकर जरूर  एक राजनीतिक प्रश्न खड़ा कर चली गईं ।  जिसकी व्यापक चर्चा भी हो रही है ।  राज्य के मुख्यमंत्री सहित अन्य मंत्री गण दबे स्वर में इस बात की चर्चा कर रहे हैं।  राष्ट्रपति महोदय के स्थापना दिवस के सरकारी कार्यक्रम में भाग ना लेने से ही अंदाजा लग गया था कि स्थापना दिवस के बाद झारखंड में जरूर कुछ अनहोनी होने वाला है। और यह आशंका सच  साबित हो गई । अब इस पूछताछ का क्या परिणाम सामने आता है  ? कुछ ठीक से कहा नहीं जा सकता है। क्योंकि सारी बातें मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के ईडी द्वारा पूछे गए सवाल-जवाब पर  निर्भर  करता है।

एक हजार करोड़ के खनन घोटाले में पूछताछ के लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन आज दोपहर करीब 11.50 बजे  से हिनू एयरपोर्ट रोड स्थित ईडी आफिस पहुंचे। सीएम के अंदर जाते ही ईडी आफिस का गेट बंद कर दिया गया था। अंदर कार्यालय में ईडी के अफसरों ने उनसे पूछताछ शुरु कर दी। जानकारी के अनुसार श्री सोरेन से साहेबगंज में हुए खनन घोटाले में उनके विधायक प्रतिनिधि की संलिप्तता से लेकर कोलकाता के व्यवसायी अमित अग्रवाल के साथ उनके व्यवसायिक रिश्ते से जुड़े दर्जनों प्रश्न हेमंत सोरेन से किये गये। पूछताछ के बीच में वहीं सीएम हाऊस से खाना मंगवाकर हेमंत सोरेन ने दोपहर का भोजन भी लिया। इस दौरान हिनू चौक से लेकर सीएम हाऊस तक झामुमो कार्यकर्ता जुटे रहें। सीएम के पहुंचने के पहले ईडी आफिस की सुरक्षा बढ़ा दी गई थी। ईडी गेट से हिनू चौक तक सुरक्षा बेहद कड़ी कर दी गई है।

अवैध खनन और मनी लॉन्ड्रिंग केस में हो रही पूछताछ

हेमंत सोरेन के तार अवैध खनन और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ने का आरोप है। 8 जुलाई को ईडी ने हेमंत सोरेन के करीबी पंकज मिश्रा के घर पर छापेमारी की थी। यहां से एजेंसी को हेमंत सोरेन की बैंक पासबुक, साइन किए हुए दो चेक और चेक बुक मिली है। सितंबर में चार्जशीट दाखिल करते हुए एऊ ने बताया था कि जांच में उसे अवैध खनन में एक हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की हेराफेरी होने के सबूत मिले हैं।

राजधानी में सुरक्षा के किये गये पुख्ता इंतजाम, निषेधाज्ञा लागू

रांची। ईडी आॅफिस में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पेशी को देखते हुए राजधानी में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किये गये हैं। ईडी आॅफिस के आसपास एयरपोर्ट रोड में निषेधाज्ञा लगा दिया गया है। ईडी आॅफिस के बाहर जिला पुलिस के अलावा सीआरपीएफ की टीम ने भी सुरक्षा व्यवस्था की कमान संभाल रखा है। रांची पुलिस के 200 जवानों को तैनात किया गया है। वहीं सीआरपीएफ की एक टीम ईडी दफ्तर में तैनात है। रांची एसडीओ दीपक दूबे ने एयरपोर्ट रोड व उसके आसपास 100 मीटर के दायरे में निषेधाज्ञा लागू कर वहां किसी तरह Mकी भीड़ लगाना प्रतिबंधित कर दिया है। झामुमो कार्यकर्ताओं द्वारा रैली निकाले जाने की संभावना के मद्देनजर राजधानी के चौक चौराहों पर सुरक्षा बढा दी गयी है। रांची एसएसपी खुद सड़क पर उतरकर सुरक्षा व्यवस्था में लगे हैं।

उम्मीद थी कि झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी।  लेकिन उस पर ग्रहण लगने की संभावना ज्यादा दिख रही है । यह झारखंड के लिए दुर्भाग्य की बात है ।  झारखंड 22 वर्ष का जरूर हो गया है,लेकिन  अस्स्थिरता का कलंक इसके माथे से अभी तक मिटा  नहीं है। झारखंड, अलग प्रांत निर्माण के बाद 14 वर्षों तक राजनीतिक अस्थिरता में बीता था। झारखंड में अब तक सिर्फ एनडीए की रघुवर दास की सरकार अपना पांव साल का कार्यकाल पूरा कर पाई थी । लोगों को उम्मीद थी कि हेमंत सोरेन की यूपीए सरकार अपना 5 साल  का कार्यकाल पूरा करेगी।‌ लेकिन इस पर भी ग्रहण लगने जा रहा है।

 जिस तरह से ईडी हेमंत सोरेन पर आरोप माढ़ी है, इससे प्रतीत होता है कि उसके पास हेमंत सोरेन के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं। चूंकि  हेमंत सोरेन वर्तमान में झारखंड के मुख्यमंत्री हैं । ईडी इस बात को बखूबी जानती है । मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए आरोप लगाना ,पूछताछ करना, बड़ी बात होती है।  बहुत ही सोच समझ कर यह कार्य ईडु कर रही है।   7 घंटे से अधिक समय बीतने को है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का ईडी कार्यालय से बाहर नहीं आए हैं। उनके बाहर नहीं आने से कई नए सवाल जन्म ले रहे है । एक तरफ उनके ऊपर ईडी द्वारा संगीन आरोप लगाए गए हैं।  वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग के बंद लिफाफे में क्या पैगाम है ?  यह पैगाम क्या गुल खिलाएगा ? यह भी देखना बाकी है । मिलाजुला कर यूपीए सरकार के लिए ये सारी घटनाएं कोई गंभीर संकट और चुनौती की ओर इशारा कर रही है।  जानकारों का कहना है कि झारखंड की यूपीए सरकार में भारी फेरबदल होने की संभावना है।‌ मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को अपनी कुर्सी गंवानी भी पड़ सकती है।  वहीं दूसरी ओर इस मुख्यमंत्री की कुर्सी कौन काबिज होंगे ?  इस पर भी अटकलें लगनी शुरू हो गई है।  इस राजनीतिक चर्चाओं के बीच झारखंड के माथे लगे राजनीतिक अस्थिरता की लकीरें और भी लंबी होती चली जा रही है।  यह प्रांत के लिए अच्छी बात नहीं है । किसी प्रांत के मुख्यमंत्री रहते हुए उस प्रांत के ही राजधानी में उनके खिलाफ एक केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय द्वारा पूछताछ की जा रही हो, राज्य की राजनीति के लिए बेहद खेद जनक बात है। इससे प्रांत की प्रतिष्ठा धूमिल हो रही है । अब यह सब कुछ मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के जवाब पर निर्भर करता है कि प्रांत के माथे लगे इस कलंक को कैसे धो  पाते हैं। 


विजय केसरी,

( कथाकार स्तंभकार )

पंच मंदिर चौक ,हजारीबाग - 825 301,

 मोबाइल नंबर  :-92347 99550.

रवि अरोड़ा की नजर स....

 पता नहीं ऐसा होगा भी या नहीं /  रवि अरोड़ा



दुनिया में इंसानी आबादी के आठ सौ करोड़ तक पहुंचने की खबर आपकी निगाह से भी गुजरी होगी। इसी ख़बर के साथ नत्थी यह जानकारी भी आप तक अवश्य पहुंची होगी कि अगले कुछ महीनों में आबादी के लिहाज़ से हम चीन को भी पीछे छोड़ दे देंगे। जाहिर है कि इतनी बड़ी ख़बर होगी तो उस पर राजनीति भी होगी। शायद यही वजह है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड और जनसंख्या नियंत्रण कानून जैसे मुद्दे फिर हवाओं में हैं। यकीनन देश भक्त और लोकतंत्र में विश्वास रखने वाला हरेक नागरिक इन कानूनों का स्वागत ही करेगा । इसमें कोई दो राय भी नहीं कि देश की बढ़ती आबादी पर नियंत्रण और जाति धर्म से ऊपर उठ कर सबके समान लोकतांत्रिक अधिकार समय की जरूरत हैं मगर इनकी आड़ लेकर किसी खास धर्म को मानने वालों को निशाना बनाना कहां तक उचित है ?  बेशक आजादी के बाद से देश में मुस्लिमों की जनसंख्या तेजी से बढ़ी है मगर क्या इसका कारण केवल उनका धर्म ही था ? अशिक्षा और बदहाल आर्थिक स्थिति का क्या इससे कोई लेना देना नहीं ? देश के हित में जो भी आवश्यक हो, वह हर कानून बनना ही चाहिए मगर क्या उसके लिए सही कारणों पर चर्चा नहीं होनी चाहिए ? 


मोदी सरकार ने 2021 में प्रस्तावित जनगणना अभी तक नहीं कराई है। इसे अब कब कराया जायेगा , यह किसी को नहीं मालूम। सरकार ने इसे न कराने का कारण कोरोना संकट को बताया था जबकि कोरोना काल में हुई जन हानि का सही सही आकलन करने के लिए यह बेहद जरूरी थी । यह जनगणना यदि हुई होती तो यह भी स्पष्ट हो जाता कि मुल्क में आबादी बढ़ने का असली कारण अशिक्षा और गरीबी ही है। धर्म के पैमाने से इतर जो राज्य गरीब हैं वहां आबादी तेजी से बढ़ी और जो संपन्न हैं वहां कमोवेश कम बढी। यकीनन आजादी के बाद 1951 में हुई पहली जनगणना के मुकाबिल मुसलमानों के प्रतिशत में अब तक चार फीसदी का इजाफा हुआ है मगर देश में शिक्षा तक सभी वर्गों की पहुंच के चलते अब यह इजाफा लगभग थम सा गया है और हिंदुओं के 1. 94 फीसदी के मुक़ाबिल उनका प्रतिशत 2. 36 तक सिमट गया है। नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार गरीब और अशिक्षित राज्यों के हिंदुओं का प्रतिशत शिक्षित और तुलनात्मक रूप से संपन्न राज्यों के मुस्लिमों से ज्यादा है। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश में हिन्दुओं की जन्मदर 2.29 प्रतिशत है जबकि तमिलनाडू के मुस्लिमों में यह मात्र 1. 93 ही है। साफ नज़र आ रहा है कि आबादी का धर्म से नहीं अशिक्षा और आर्थिक स्थिति से लेना देना है । आंकड़े गवाह हैं कि देश में 25 फीसदी मुस्लिम महिलाएं अभी भी अनपढ़ हैं और मात्र बीस फीसदी ने ही बारहवीं तक पढ़ाई की है। समाज की 47 फीसदी महिलाओं की गर्भनिरोधक तक पहुंच भी नहीं है। मुस्लिम महिलाओं में रोजगार का आंकड़ा तो और भी बदनुमा है मगर आबादी बढ़ने के इन असली कारणों पर देश में चर्चा ही नहीं होती। बेशक धार्मिक मान्यताओं को एक दम बरी नहीं किया जा सकता मगर असली कारण धर्म ही होता तो साल 1951 में जिस कौम की महिलाएं 5. 9 तथा वर्ष 1992 में 4. 4 और 2015 में 2.6 की दर से बच्चे पैदा कर रही थीं, वे घटते घटते अब 2. 36 की दर तक न पहुंचती।

 पिछले सत्तर सालों में हिन्दुओं ने भी लगभग इसी अनुपात में अपनी जनसंख्या पर नियंत्रण का प्रयास किया है। अब हो सकता है कि ये सभी आंकड़े आपकी आंखों के आगे कोई सुनहरी तस्वीर पेश करते हों मगर हमें सोचना होगा कि केवल शिक्षा देने भर से पूरी तरह बढ़ती आबादी पर नियंत्रण नहीं पाया जा सकता । आर्थिक हालात सुधरने भी बेहद जरूरी हैं मगर जब देश के अस्सी करोड़ नागरिकों को मुफ्त के अनाज पर जिंदा रखा जा रहा हो तो पता नहीं ऐच्छिक लक्ष्य कैसे हासिल होगा ? अनुमान है कि साल 2047 में अपने चरम यानि एक अरब 61 करोड़ की ऊंचाई से पहले हमारी आबादी नीचे नहीं आयेगी। मगर आज के आर्थिक हालातों को देख कर तो यह आशंका होती है कि तब भी ऐसा हो पायेगा अथवा नहीं।

गुरुवार, 17 नवंबर 2022

जयपुर स्थापना दिवस

 जयपुर स्थापना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं


जयपुर शहर भरत देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान की राजधानी है जयपुर को पिंक सीटी अथवा गुलाबी नगरी के नाम से भी जाना जाता है ! जयपुर शहर की स्थापना कुशवाहा/ कछवाहा राजवंश व आमेर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने 1727 में की थी ! यूनेस्कों द्वारा जुलाई  वर्ष 2019 में जयपुर को वर्ल्ड हैरिटेज सीटी का दर्जा दिया गया है !


जयपुर जिसे गुलाबी नगरी के नाम से जाना जाता है, भारत में राजस्थान राज्य की राजधानी है ! आमेर के तौर पर यह जयपुर नाम से प्रसिद्ध प्राचीन राजवाड़े की भी राजधानी रहा है ! जयपुर अपनी समृद्ध भवन निर्माण परम्परा सरत - संस्कृति और अपनी ऐतिहासिक समृद्धि के लिए प्रसिद्ध है ! यह शहर तीन ओर से अरावली पर्वतमाला से घीरा हुआ है ! जयपुर शहर की पहचान यहाँ के भब्य महलों और पुराने घरों में लगे धौलपुरी पथ्थरों से होती है जो यहाँ के स्थापत्य कला को खुब दर्शाती है !


सत्रहवीं शताब्दी में जब मुगल बादशाह अपनी ताकत खोने लगे तो समुचे भारत में आराजकता सिर उठाने लगी

ऐसे दौर में राजपूताना की आमेर रियासत एक बड़े ताकत के रूप में उभरी जाहिर है की महाराजा सवाई जयसिंह जी को तब मीलोंके दायरे में फैली अपनी रियासत छोटी लगने लगी थी और इस तरह से महाराजा सवाई जयसिंह जी ने जयपुर शहर की कल्पना राजधानी के रूप में की थी !


महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने जयपुर शहर बसाने से पहले इसकी सुरक्षा की काफी चिंता की थी और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ही सात मजबूत दरवाजों की किलाबंदी की गयी थी ! महाराजा सवाई जयसिंह जी ने हालांकि मराठों के हमलों की चिंता से अपनी राजधानी की सुरक्षा के लिए चारदीवारी बनवाई थी, लेकिन शायद उन्हें मौजूदा समय की सुरक्षा समस्याओं का भान नहीं था !


इतिहास के पुस्तकों जयपुर के इतिहास के अनुसार यह भारत देश का पहला पुरी योजना पद्धति से बसाया हुआ शहर था !

             

     !! जयपुर स्थापना दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं !!

        

                     सूर्यवंशी आदर्श कुशवाहा

मंगलवार, 15 नवंबर 2022

[11/1, 14:40] .: करतारपुर से लौट कर ( भाग दो ) रवि अरोड़ा अमृतसर से भारतीय सीमा के लिए हमने टैक्सी का सहारा लिया। आमतौर पर सभी को यही करना पड़ता है। सार्वजनिक परिवहन का कोई जरिया है नहीं और बाहर से आया कोई व्यक्ति पराए शहर में अपना वाहन भला कहां से लाएगा ? लौटते समय भी सीमा पर कोई वाहन मिलता नहीं इसलिए शाम तक के लिए ही सबको टैक्सी बुक करनी पड़ती है । ज़ाहिर है कि यह काम खर्चीला होता है। लगभग 65 किलोमीटर की एक तरफ की यात्रा और दिन भर सवारी का इंतज़ार करने के कम से कम तीन हजार तो टैक्सी वाले वसूलते ही हैं। अमृतसर से अजनाला होते हुए भारत पाक सीमा पर पहुंचते समय सड़क की हालत को देख कर कतई नहीं लगा कि हम किसी बहुप्रचारित यात्रा पर जा रहे हैं और इस यात्रा के नाम पर देश के नेताओं ने खूब सुर्खियां बटोरी हैं। बेशक यह कॉरिडोर खुले हुए तीन साल हो चुके हैं मगर भारत की ओर सड़कों पर अभी तक काम चल रहा है। दो स्थानों पर छोटे पुल बन रहे थे तो कम से कम तीन जगह सड़क की मरम्मत का काम चल रहा था । हालांकि वापसी में टैक्सी चालक ने कोई दूसरा मार्ग पकड़ा मगर मुख्य मार्ग की हालत देख कर तो मन खिन्न ही हो गया। करतारपुर कॉरिडोर की पहला निशान बॉर्डर से सात किलोमीटर पहले ही दिखाई दिया जहां नई चार लेन सड़क का निर्माण किया गया है। साल 2019 की 26 नवंबर को मोदी जी ने यहीं पर इस कॉरिडोर का शिलान्यास किया था । यह सड़क हमें सीधा इमिग्रेशन सेंटर तक ले गई। यहां पहुंच कर तो ऐसा लगा जैसे हम किसी हवाई अड्डे पर आ गए हों। हवाई अड्डा भी ऐसा जो कई मामलों में दिल्ली हवाई अड्डे के टर्मिनल 3 को मात दे । हवाई अड्डे जैसी ही कदम कदम पर जांच और विदेश यात्रा के लिए की जाने वाली सारी औपचारिकताएं। नियमानुसार एक व्यक्ति केवल ग्यारह हज़ार रूपए ही करतारपुर ले जा सकता है मगर मेरे बच्चों ने खरीदारी को कुछ ज्यादा ही पैसे रख लिए थे सो वापिस जाकर टैक्सी चालक को अतिरिक्त पैसे सौंपने पड़े। हालांकि घोषित रूप से जरूरी प्रपत्रों में पासपोर्ट शामिल नहीं है मगर पासपोर्ट, आधार और यात्रा के लिए मिले इलैक्ट्रोनिक ट्रैवल ऑथोराईजेशन के बिना यात्रा नहीं हो सकती। चूंकि पाकिस्तान में पोलियो का प्रकोप है इसलिए हमें पोलियो की दवा भी पिलवाई गई। एक अलग काउंटर पर प्रति दिन के यात्रियों का रोजनामचा लिखा जा रहा था । हम उस काउंटर पर दोपहर के लगभग एक बजे पहुंचे थे तो मैंने देखा कि मेरा यात्री संख्या 63 था । यानि मेरे परिवार के अतिरिक्त उस समय तक मात्र साठ अन्य यात्री करतारपुर साहेब गए थे । उधर, सुरक्षा कर्मी हमें बार बार चेता रहे थे कि आप लोग बहुत लेट हो गए हैं और हमें वहां से हर सूरत चार बजे तक वापिस आना होगा । हालांकि घोषित रूप से शाम छह बजे तक तीर्थयात्री करतारपुर साहेब रुक सकते हैं मगर अनुपालन साढ़े चार बजे तक के हिसाब से ही कराया जा रहा है । इतना बड़ा गुरुद्वारा जो देश दुनिया की ढाई करोड़ से अधिक सिख बिरादरी और उससे भी अधिक संख्या में नानक नाम लेवा आबादी की श्रद्धा का केन्द्र हो और उसके दर्शनाभिलाषी मात्र 63 लोग ? और वह भी इतने बड़े त्यौहार के अवसर पर ? ऐसा कैसे हो सकता है कि 70 किलोमीटर दूर स्थित गोल्डन टैंपल में रोजाना लाखों लोग देश दुनिया से पहुंचते हों और लगभग उतने ही प्रसिद्ध और एक तरह से उससे भी अधिक ऐतिहासिक महत्व वाले इस गुरूद्वारे में मात्र 63 की संख्या ? क्या यह पाकिस्तान का कोई ढकोसला है और उसने दुनिया को दिखाने के लिए तो कॉरीडोर खोल दिया और जमीनी स्तर पर हमें वहां की सरकार आने नहीं देती ? क्या कम संख्या में श्रद्धालुओं के करतारपुर जाने के लिए हमारी ही सरकार जिम्मेदार है और क्या वही कदम कदम पर अड़चने लगाती है? आखिर क्या वजह है कि आठ सौ करोड़ रूपए खर्च होने के बावजूद इस कॉरिडोर का लाभ नहीं लिया जा रहा ? इस कॉरिडोर के उद्घाटन के समय दोनो देश की सरकारों ने दावा किया था कि फिलहाल पांच हजार यात्री प्रतिदिन करतारपुर आयेंगे और बहुत जल्द यात्रियों की संख्या दस हजार कर दी जाएगी और वास्तव में यात्रियों की संख्या इतनी कम ? सवाल बहुत बड़ा था और मेरा पूरा दिन इसी से जूझने में बीता । क्रमश : [11/2, 15:30] .: करतारपुर से लौट कर ( भाग तीन ) रवि अरोड़ा भारतीय इमिग्रेशन सेंटर पर सीमा सुरक्षा बल का कड़ा पहरा था । हालांकि गिनती तो नहीं की जा सकी मगर सुरक्षा कर्मियों समेत तमाम स्टाफ और सफाई कर्मियों को मिला लें तो कम से कम दो ढाई सौ लोग तो जरूर रहे होंगे। भारतीय टीम द्वारा हमें इलेक्ट्रिक वाहन के मार्फत सीमा पर स्थित पाकिस्तान इमिग्रेशन सेंटर तक पहुंचाया गया । बेशक तमाम अन्य सुविधाओं की तरह यह भी निशुल्क थी। पाकिस्तान पहुंचते ही लोग, भाषा, पहनावा और व्यवहार एक दम बदल गया । भारतीय कर्मचारी में जहां हमें इस यात्रा पर भेजने के लिए कोई उत्साह नहीं था वहीं मात्र सौ मीटर दूर पाकिस्तानी चेहरों पर बला की मुस्कान थी। चूंकि मेरे पूर्वज पश्चिमी पंजाब के ही रहने वाले थे अतः स्थानीय पंजाबी भाषा में सिद्धस्त होने का लाभ मैंने उठाया और उनकी ज़बान में खूब गपशप की । हमारे प्रपत्रों की जांच की मात्र औपचारिकता ही उधर निभाई गई । हां यह जरूर था कि प्रति यात्री बीस डॉलर की दर से उन्होंने हमसे फीस अवश्य वसूली। इसके बाद यहां भी छह सीट वाली उनकी एक इलैक्ट्रिक गाड़ी मौजूद थी जो हमें लेकर करतारपुर के लिए चल दी । हालांकि भारत की तरह यहां भी अनेक एसी बसें खड़ी थीं मगर तीन लोगों के लिए भला बस की भी कोई क्या जरूरत महसूस करता । सुंदर और साफ सुथरी सड़क पर धीरे धीरे हमारा वाहन करतारपुर साहेब की ओर बढ़ रहा था। सड़क के दोनो ओर कंटीले तारों की बाड़ थी । दूर दूर तक कोई आबादी अथवा यातायात भी नहीं था । लगभग एक किलोमीटर आगे बढ़ते ही रावी नदी आ गई । यह वही नदी है जिसके किनारे कभी मेरे पूर्वज रहा करते थे । उनका पैतृक शहर ओकाड़ा भी वहां से मात्र डेढ़ सौ किलोमीटर दूर था । ज़ाहिर है कि रावी को देखते ही मन पंजाब की उन कथाओं में खो गया जिसे सुनते सुनते मैं बड़ा हुआ हूं। रावी नदी पार करते ही करतारपुर का दरबार साहेब गुरुद्वारा नज़र आना शुरू हो गया । इस पूरे क्षेत्र को बाबा नानक ने ही आबाद किया था । रावी के किनारे ही उनका वह आध्यात्मिक स्थल था जहां अब गुरुद्वारा है। रावी के किनारे ही उनका अंतिम संस्कार किया गया था। बताते हैं कि उस जगह पर उनकी समाधि भी थी मगर नदी के धारा बदलने से वह स्थान पानी में समा गया । हालांकि इस ऐतिहासिक गुरुद्वारा में भी बाबा नानक की समाधि है मगर उसके बाबत अनेक अन्य कथाएं हैं। जैसे जैसे हम गुरुद्वारे के निकट पहुंच रहे थे , उसके बडे़ आकार का एहसास हो रहा था । फिलवक्त यह गुरुद्वारा 42 एकड़ भूमि पर विकसित है मगर पाकिस्तान सरकार ने उसके लिए पूरे चार सौ एकड़ भूमि अधिग्रहित की है। गुरूद्वारा परिसर के लिए अधिग्रहित जमीन कितनी बड़ी है इसका अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि अयोध्या के निर्माणाधीन राम मंदिर का परिसर कुल सत्तर एकड़ है। खैर, गुरूद्वारा परिसर में एक गाइड हमारा इंतजार कर रहा था। वह स्थानीय पर्यटन विभाग का कर्मचारी था । उसने हमें पूरे परिसर के बाबत विस्तार से बताया और फिर हमें भ्रमण के लिए अकेला छोड़ दिया । सबसे पहले हम परिसर के केन्द्र में बने गुरुद्वारे में ही गए । बेशक पूरा परिसर बहुत बड़ा है मगर इस गुरुद्वारे का मूल स्वरूप सुरक्षित रखने की गरज से उसमे कोई खास छेड़छाड़ नहीं की गई है। पहली मंजिल पर जहां गुरू ग्रंथ साहब का प्रकाश हो रहा है वह कमरा तो मात्र बीस फुट बाई पच्चीस फुट का ही है और उसने एक वक्त में बामुश्किल पचास आदमी ही खड़े हो सकते हैं। गुरुद्वारे में माथा टेक कर हम लोग पूरे परिसर को देखने निकले तो वहां एक से बढ़ कर एक चौंकाने वाली चीजें हमें नजर आईं। क्रमश: [11/3, 15:28] .: करतारपुर साहेब से लौट कर ( भाग चार ) रवि अरोड़ा करतारपुर गुरुद्वारा परिसर में श्रद्धालुओं के लिए देखने योग्य एक से बढ़ कर एक चीजें हैं। सबसे महत्वपूर्ण तो बाबा नानक की मजार ही है जो पिछले पांच सौ सालों से यहां श्रद्धा का बड़ा केन्द्र है। सिख और हिंदू संगत के अतिरिक्त स्थानीय मुस्लिम आबादी भी इस मजार पर बड़ी संख्या में माथा टेकने आती है। बाबा नानक के जीते जी ही मुस्लिमों ने उन्हें पीर की संज्ञा दे दी थी और आज भी वे स्थानीय मुस्लिम आबादी के दिलों में बसते हैं। यह मजार ठीक वहीं है जहां बाबा नानक ने अपना शरीर छोड़ा था। पास में ही रहट युक्त एक कुंआ भी है। बताया जाता है कि इसी से बाबा अपने खेतों की सिंचाई करते थे। गुरुद्वारे के जीर्णोद्धार के समय पांच सौ साल पुराना एक और कुआं मिला था और माना गया कि यह भी बाबा नानक से संबंधित है। पाकिस्तान सरकार ने सिक्खों की परम्परा के अनुरूप परिसर में सरोवर का भी निर्माण करवाया है। हालांकि सिख धर्म की मान्यताओं के अनुरूप स्त्रियों और पुरुषों के लिए एक ही सरोवर न बनवा कर दोनो के लिए अलग अलग सरोवर बनवाए गए हैं। जाहिर है कि इस मामले में सिक्ख नहीं इस्लामिक जीवन शैली को तरजीह दी गई है। परिसर में बहुत बड़ा लंगर हॉल भी है जहां एक साथ दो हजार लोग बैठ कर भोजन कर सकते हैं। लगभग इतने ही यात्रियों के ठहरने को भी कमरे और डॉरमेट्री वहां है । अब इस कॉरीडोर का निर्माण और गुरुद्वारे का जीर्णोद्धार राजनेताओं ने कराया है तो जाहिर है कि राजनीति भी यहां अपने पदचिन्ह छोड़ गई है। पाकिस्तान सरकार ने दावा किया था कि करतारपुर दुनिया का सबसे बड़ा गुरुद्वारा बनने जा रहा है। अपनी इस घोषणा को यथार्थवादी दिखाने को उसने गुरुद्वारे के लिए कुल 1450 एकड़ भूमि चिन्हित की थी मगर अधिग्रहण अभी तक मात्र चार सौ एकड़ भूमि का ही हुआ है। दावा किया गया था कि गुरुद्वारे के पास पांच सितारा होटल और अन्य सुविधाएं भी होंगी मगर इमरान खान सरकार के गिरने के बाद पाकिस्तान में अब इनका नामलेवा भी कोई नहीं बचा है। पाकिस्तान में कुल 195 बडे़ गुरुद्वारे हैं और लगभग सभी का संचालन और देखभाल पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी करती है मगर करतारपुर साहेब से कमेटी को दूर ही रखा गया है और स्वयं सरकार इसका संचालन कर रही है। यहां तक कि नौ सदस्यीय संचालन समिति में एक भी सिख नहीं है। सबसे बड़ी राजनीतिक शरारत तो स्वयं इमरान ख़ान सरकार ने की और गुरुद्वारे के ठीक बगल में एक चबूतरा सा बना कर उसपर एक बोर्ड लगा दिया कि साल 1971 की लड़ाई में भारत ने इस गुरुद्वारे को नष्ट करने के लिए यहां एक बम फेंका था मगर गुरू महाराज की कृपा से गुरुद्वारे का रत्ती भर भी नुकसान नहीं हुआ । पाकिस्तान की यह हरकत वहां आए हरेक नानक नाम लेवा को नागवार गुजरती होगी मगर इसका कोई खास विरोध अभी तक नहीं हुआ है । भला यह कोई कैसे मान सकता है कि भारतीय सेना, जिसमें सिख बड़ी तादाद में हैं, वह अपने इतने महत्त्वपूर्ण धर्मस्थल को नष्ट करने की चेष्टा करेगी। खैर, इसके बाद हम लोग लंगर हॉल में गए जहां हमारे अतिरिक्त बस दो दंपति और थे । साफ सुथरी शानदार रसोई में तैयार किया गया लजीज़ भोजन हमारे सामने था और मैं दावे से कह सकता हूं कि यह भोजन भारत के किसी भी बड़े से बड़े गुरुद्वारे में परोसे गए लंगर से रत्ती भर भी कमतर नहीं था। क्रमश: [11/4, 15:06] .: करतारपुर से लौट कर ( भाग पांच ) रवि अरोड़ा करतारपुर साहेब में सबसे अधिक जो बात आकर्षित करती है, वह है पाकिस्तानियों का हम भारतीयों के प्रति व्यवहार। वे लोग भारतीयों से ऐसे मिलते हैं जैसे मेले में बिछड़े दो भाई हों। शनिवार और इतवार को सैंकड़ों की तादाद में पाकिस्तानी इस गुरुद्वारे में केवल भारतीयों से मिलने की गरज से ही आते हैं। निकट का सबसे बड़ा शहर है नारोवाल और वहां के लोग सबसे अधिक यहाँ पहुंचते हैं। हालांकि लाहौर और फैसलाबाद समेत कराची जैसे बड़े शहरों के लोग भी इसी उद्देश्य से यहां आते हैं। भारतीयों के लिए कोई मिठाई लेकर आता है तो कोई घर से लजीज़ खाना बनवा कर लाता है। भारतीयों को देखते ही पाकिस्तानी अदब से दुआ सलाम जरूर करता है। हालांकि वहां के हिंदू पुरुष भी अब पठानी सलवार कुर्ता पहनते हैं और हिंदू महिलाएं भी सिर ढक कर रखती हैं मगर फिर भी हाव भाव से साफ पता चलता है कि उनमें अधिकांश मुस्लिम होते हैं। भारतीयों के साथ हाथ मिलाने और उनके साथ तस्वीर खिंचवाने का भी पाकिस्तानियों में अच्छा खासा क्रेज है। पता नहीं मुझे क्या सनक हुई कि मैं मिलने वाले हर पाकिस्तानी से उसके शहर का नाम पूछने लगा । मुझे रावलपिंडी, लाहौर,मुल्तान, सरगोधा, गुजरात ( वहां का एक बड़ा शहर) टोबा टेक सिंह, नारोवाल, सियालकोट, कराची और कुछ अन्य शहरों के लोग मिले। इन सभी से मैंने टूटी फूटी ही सही मगर उनके जिले की बोली के अनुरूप पंजाबी में बात की। पंजाबी की इन तमाम उपबोलियों में बात करने का मुझे बचपन से ही शौक है। सराइकी भाषा भी काम चलाऊ बोल लेता हूं जो पाकिस्तान के एक बड़े भूभाग में बोली जाती है अतः स्थानीय लोगों से संवाद करने में मुझे कोई दिक्कत नहीं आई। भाषा का लाभ लोगों से खुल कर कुछ उगलवाने में भी काम आया । वैसे सच तो यह ही है कि स्थानीय लोग हम भारतीयों से बात करने को उत्सुक रहते हैं और मुझ जैसे बतरसी लोगों से तो आसानी से ही खुल जाते हैं। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि सभी पाकिस्तानी यहां हम लोगों से मिलने ही आते हैं, धार्मिक भाव से भी बड़ी संगत यहां पहुंचती है। यह भी सच है कि ऐसे लोग जिनके पाकिस्तान में रिश्तेदार अथवा मित्र हैं और चाह कर भी उन्हें वहां जाने का वीजा नहीं मिलता वे उन्हें करतार पुर साहेब बुला लेते हैं और बिना किसी झंझट के दोनो देशों के ये लोग पूरा दिन यहां साथ बिताते हैं। अखबारों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार बंटवारे में बिछड़े आठ परिवार भी इस गुरुद्वारे की बदौलत अब तक आपस में मिल चुके हैं। पूरा परिसर घूमने के बाद हम लोग चारदीवारी के भीतर ही बनाए गए छोटे से बाजार में पहुंचे। वहां लगभग बीस अस्थाई दुकानें हमें नजर आईं। कोई कपड़े बेच रहा था तो कोई लकड़ी का सामान। किसी दुकान पर मुल्तान का डिब्बा बंद मशहूर कराची हलवा बिक रहा था तो किसी पर महिलाओं के श्रृंगार की वस्तुएं अथवा स्मृति चिन्ह। लाहौर निवासी एक दुकानदार एहसान से मैंने जब यह कहा कि तुम्हारे पास नया क्या है, ये सब जो तुम बेच रहे हो वह तो हमें भारत में भी मिल जायेगा । इस पर उस दुकानदार ने कुछ ऐसा कहा कि मैं उसे गले लगाने से खुद को रोक नहीं पाया । लगभग तीस पैंतीस वर्षीय यह दुकानदार एहसान बोला- वीर जी यह प्यार आपको वहां नहीं मिलेगा । क्रमश: [11/5, 15:38] .: करतारपुर से लौटकर ( अंतिम भाग ) रवि अरोड़ा हर बात को कुरेद कुरेद कर जानने की जिज्ञासा और अखबार नवीसी के अनुभव का परिणाम यह हुआ कि दोपहर होते तक गुरुद्वारे का एक सुरक्षा कर्मी मुझे इंटरव्यू दे रहा था । नारोवाल निवासी इस सुरक्षा कर्मी आसिफ़ से मैं मूलत: यही जानना चाहता था इतना बड़ा गुरुद्वारा, इतनी बड़ी लागत, सीमा के दोनो ओर हुई भरपूर राजनीति और जम कर प्रचार प्रसार के बावजूद यहां भारतीयों की आमद इतनी कम क्यों है ? इस पर आसिफ़ का कहना था कि पाकिस्तान सरकार तो चाहती है मगर भारत सरकार ही अपने लोगों को यहां भेजने में रोड़े अटकाती है। बकौल उसके पाकिस्तान सरकार ने भारत से कई बार कहा है कि अपने लोगों को वह केवल आधार कार्ड के मार्फत ही भेज दे मगर भारत की ओर से पासपोर्ट के बिना यहां आने का आवेदन ही नहीं किया जा सकता । इसके अतिरिक्त भारत में पुलिस और अन्य विभागों की जांचों के चलते भी अनेक आवेदक चाह कर भी यहां नही आ पाते । आसिफ के अनुसार पाकिस्तान सिख गुरूद्वारा प्रबंध कमेटी ने भी भारत से अनुरोध किया है कि सभी ऐच्छिक श्रद्धालुओं को वह वहां भेजे और इसके लिए पाकिस्तान सरकार बीस डॉलर के अपने प्रवेश शुल्क को भी मुआफ करने को तैयार है। आसिफ़ ने ही बताया कि पाकिस्तान सरकार की ओर से यहां लगभग एक हजार लोग विभिन्न कार्यों के लिए रोजाना तैनात रहते हैं। लगभग साढ़े सात सौ तो स्थानीय सीमा सुरक्षा बल के ही जवान हैं और बाकी सभी सेवादार हैं। भारत की ओर भी सैंकड़ों लोगों की तैनाती मैं देख कर आया था । यानि दोनो सरकारों की ओर से लगभग डेढ़ हजार सरकारी स्टाफ का खर्च और भारतीय श्रद्धालुओं की संख्या मात्र उंगलियों पर गिनने योग्य ? आसिफ और अन्य लोगों ने बताया कि यहां केवल सौ डेढ़ सौ भारतीय ही रोज आते हैं। हां शनिवार और इतवार को जरूर यह संख्या दोगुनी हो जाती है। बेशक बैसाखी और गुरुपर्व आदि पर दो ढाई हजार भारतीय यहां पहुंचते हैं मगर उनमें अधिकांश वही होते हैं जो बकायदा वीजा लेकर वाघा बॉर्डर से पाकिस्तान आए हुए होते हैं । उन दिनों में भी करतारपुर कॉरीडोर से आने वालों की संख्या चार सौ पार नहीं करती। यानि जिस उद्देश्य से यह कॉरीडोर बनाया गया वह कहीं पीछे छूट गया । सिख धर्म के प्रथम गुरु बाबा नानक के बारे में अधिक न जानने वालों को बता दूं कि बाबा की मृत्यु के पश्चात उनके मुरीद मुसलमानों ने उनके फूल जहां दफनाए थे उसी जगह करतारपुर का गुरुद्वारा दरबार साहेब है और जहां हिंदुओं ने उनका अंतिम संस्कार किया वह जगह भारत के गुरुदासपुर जिले में है और वहां पर डेरा बाबा नानक गुरुद्वारा है। दोनो गुरुद्वारों में मात्र सात किलो मीटर की दूरी है। बंटवारे के समय अंग्रेज अफसर रेडक्लिफ की बेवकूफी से एक ही महत्व के दो स्थान अलग अलग देशों में चले गए । उधर, पाकिस्तान सरकार ने तो अपने गुरूद्वारे की काया पलट कर दी है मगर भारत का गुरुद्वारा डेरा बाबा नानक सदियों से अभी भी इसके इंतजार में है। भारत के सिख करतार पुर साहेब बिना वीजा के जा सकते हैं मगर पाकिस्तान के सिक्खों को डेरा बाबा नानक गुरुद्वारे के दर्शन को अभी भी वीजा लेना पड़ता है। हालांकि अपने अपने देश से श्रद्धालु दूसरे देश के गुरुद्वारे को दूरबीन से देखते रहते हैं मगर उनकी मांग है कि इस कॉरीडोर से दोनो गुरुद्वारों को जोड़ा जाए ताकि बाबा नानक की स्मृतियां वे और अच्छे से संजो सकें। आगामी आठ नवम्बर को बाबा नानक का जन्म दिवस है । क्या ही अच्छा हो कि इस अवसर पर दोनो देश की सरकारें करोड़ों नानक नाम लेवा संगत को यह तोहफा दे सकें। समाप्त

 [11/1, 14:40] .: करतारपुर से लौट कर 

( भाग दो )


रवि अरोड़ा

अमृतसर से भारतीय सीमा के लिए हमने टैक्सी का सहारा लिया। आमतौर पर सभी को यही करना पड़ता है। सार्वजनिक परिवहन का कोई जरिया है नहीं और बाहर से आया कोई व्यक्ति पराए शहर में अपना वाहन भला कहां से लाएगा ? लौटते समय भी सीमा पर कोई वाहन मिलता नहीं इसलिए शाम तक के लिए ही सबको टैक्सी बुक करनी पड़ती है । ज़ाहिर है कि यह काम खर्चीला होता है। लगभग 65 किलोमीटर की एक तरफ की यात्रा और दिन भर सवारी का इंतज़ार करने के कम से कम तीन हजार तो टैक्सी वाले वसूलते ही हैं। अमृतसर से अजनाला होते हुए भारत पाक सीमा पर पहुंचते समय सड़क की हालत को देख कर कतई नहीं लगा कि हम किसी बहुप्रचारित यात्रा पर जा रहे हैं और इस यात्रा के नाम पर देश के नेताओं ने खूब सुर्खियां बटोरी हैं। बेशक यह कॉरिडोर खुले हुए तीन साल हो चुके हैं मगर भारत की ओर सड़कों पर अभी तक काम चल रहा है। दो स्थानों पर छोटे पुल बन रहे थे तो कम से कम तीन जगह सड़क की मरम्मत का काम चल रहा था । हालांकि वापसी में टैक्सी चालक ने कोई दूसरा मार्ग पकड़ा मगर मुख्य मार्ग की हालत देख कर तो मन खिन्न ही हो गया।


करतारपुर कॉरिडोर की पहला निशान बॉर्डर से सात किलोमीटर पहले ही दिखाई दिया जहां नई चार लेन सड़क का निर्माण किया गया है। साल 2019 की 26 नवंबर को मोदी जी ने यहीं पर इस कॉरिडोर का शिलान्यास किया था । यह सड़क हमें सीधा इमिग्रेशन सेंटर तक ले गई। यहां पहुंच कर तो ऐसा लगा जैसे हम किसी हवाई अड्डे पर आ गए हों। हवाई अड्डा भी ऐसा जो कई मामलों में दिल्ली हवाई अड्डे के टर्मिनल 3 को मात दे । हवाई अड्डे जैसी ही कदम कदम पर जांच और विदेश यात्रा के लिए की जाने वाली सारी औपचारिकताएं। नियमानुसार एक व्यक्ति केवल ग्यारह हज़ार रूपए ही करतारपुर ले जा सकता है मगर मेरे बच्चों ने खरीदारी को कुछ ज्यादा ही पैसे रख लिए थे सो वापिस जाकर टैक्सी चालक को अतिरिक्त पैसे सौंपने पड़े। हालांकि घोषित रूप से जरूरी प्रपत्रों में पासपोर्ट शामिल नहीं है मगर पासपोर्ट, आधार और यात्रा के लिए मिले इलैक्ट्रोनिक ट्रैवल ऑथोराईजेशन के बिना यात्रा नहीं हो सकती। चूंकि पाकिस्तान में पोलियो का प्रकोप है इसलिए हमें पोलियो की दवा भी पिलवाई गई। एक अलग काउंटर पर प्रति दिन के यात्रियों का रोजनामचा लिखा जा रहा था । हम उस काउंटर पर दोपहर के लगभग एक बजे पहुंचे थे तो मैंने देखा कि मेरा यात्री संख्या 63 था । यानि मेरे परिवार के अतिरिक्त उस समय तक मात्र साठ अन्य यात्री करतारपुर साहेब गए थे । उधर, सुरक्षा कर्मी हमें बार बार चेता रहे थे कि आप लोग बहुत लेट हो गए हैं और हमें वहां से हर सूरत चार बजे तक वापिस आना होगा । हालांकि घोषित रूप से शाम छह बजे तक तीर्थयात्री करतारपुर साहेब रुक सकते हैं मगर अनुपालन साढ़े चार बजे तक के हिसाब से ही कराया जा रहा है । इतना बड़ा गुरुद्वारा जो देश दुनिया की ढाई करोड़ से अधिक सिख बिरादरी और उससे भी अधिक संख्या में नानक नाम लेवा आबादी की श्रद्धा का केन्द्र हो और उसके दर्शनाभिलाषी मात्र 63 लोग ? और वह भी इतने बड़े त्यौहार के अवसर पर ? ऐसा कैसे हो सकता है कि 70 किलोमीटर  दूर स्थित गोल्डन टैंपल में रोजाना लाखों लोग देश दुनिया से पहुंचते हों और लगभग उतने ही प्रसिद्ध और एक तरह से उससे भी अधिक ऐतिहासिक महत्व वाले इस गुरूद्वारे में मात्र 63 की संख्या ? क्या यह पाकिस्तान का कोई ढकोसला है और उसने दुनिया को दिखाने के लिए तो कॉरीडोर खोल दिया और जमीनी स्तर पर हमें वहां की सरकार आने नहीं देती ? क्या कम संख्या में श्रद्धालुओं के करतारपुर जाने के लिए हमारी ही सरकार जिम्मेदार है और क्या वही कदम कदम पर अड़चने लगाती है? आखिर क्या वजह है कि आठ सौ करोड़ रूपए खर्च होने के बावजूद इस कॉरिडोर का लाभ नहीं लिया जा रहा ? इस कॉरिडोर के उद्घाटन के समय दोनो देश की सरकारों ने दावा किया था कि फिलहाल पांच हजार यात्री प्रतिदिन करतारपुर आयेंगे और बहुत जल्द यात्रियों की संख्या दस हजार कर दी जाएगी और वास्तव में यात्रियों की संख्या इतनी कम ? सवाल बहुत बड़ा था और मेरा पूरा दिन इसी से जूझने में बीता ।

क्रमश :

[11/2, 15:30] .: करतारपुर से लौट कर

( भाग तीन )


रवि अरोड़ा

भारतीय इमिग्रेशन सेंटर पर सीमा सुरक्षा बल का कड़ा पहरा था । हालांकि गिनती तो नहीं की जा सकी मगर सुरक्षा कर्मियों समेत तमाम स्टाफ और सफाई कर्मियों को मिला लें तो कम से कम दो ढाई सौ लोग तो जरूर रहे होंगे। भारतीय टीम द्वारा हमें इलेक्ट्रिक वाहन के मार्फत सीमा पर स्थित पाकिस्तान इमिग्रेशन सेंटर तक पहुंचाया गया । बेशक तमाम अन्य सुविधाओं की तरह यह भी निशुल्क थी। पाकिस्तान पहुंचते ही लोग, भाषा, पहनावा और व्यवहार एक दम बदल गया । भारतीय कर्मचारी में जहां हमें इस यात्रा पर भेजने के लिए कोई उत्साह नहीं था वहीं मात्र सौ मीटर दूर पाकिस्तानी चेहरों पर बला की मुस्कान थी। चूंकि मेरे पूर्वज पश्चिमी पंजाब के ही रहने वाले थे अतः स्थानीय पंजाबी भाषा में सिद्धस्त होने का लाभ मैंने उठाया और उनकी ज़बान में खूब गपशप की । हमारे प्रपत्रों की जांच की मात्र औपचारिकता ही उधर निभाई गई । हां यह जरूर था कि प्रति यात्री बीस डॉलर की दर से उन्होंने हमसे फीस अवश्य वसूली। इसके बाद यहां भी छह सीट वाली उनकी एक इलैक्ट्रिक गाड़ी मौजूद थी जो हमें लेकर करतारपुर के लिए चल दी । हालांकि भारत की तरह यहां भी अनेक एसी बसें खड़ी थीं मगर तीन लोगों के लिए भला बस की भी कोई क्या जरूरत महसूस करता । 


सुंदर और साफ सुथरी सड़क पर धीरे धीरे हमारा वाहन करतारपुर साहेब की ओर बढ़ रहा था। सड़क के दोनो ओर कंटीले तारों की बाड़ थी । दूर दूर तक कोई आबादी अथवा यातायात भी नहीं था । लगभग एक किलोमीटर आगे बढ़ते ही रावी नदी आ गई । यह वही नदी है जिसके किनारे कभी मेरे पूर्वज रहा करते थे । उनका पैतृक शहर ओकाड़ा भी वहां से मात्र डेढ़ सौ किलोमीटर दूर था । ज़ाहिर है कि रावी को देखते ही मन पंजाब की उन कथाओं में खो गया जिसे सुनते सुनते मैं बड़ा हुआ हूं। रावी नदी पार करते ही करतारपुर का दरबार साहेब गुरुद्वारा नज़र आना शुरू हो गया । इस पूरे क्षेत्र को बाबा नानक ने ही आबाद किया था । रावी के किनारे ही उनका वह आध्यात्मिक स्थल था जहां अब गुरुद्वारा है। रावी के किनारे ही उनका अंतिम संस्कार किया गया था। बताते हैं कि उस जगह पर उनकी समाधि भी थी मगर नदी के धारा बदलने से वह स्थान पानी में समा गया । हालांकि इस ऐतिहासिक गुरुद्वारा में भी बाबा नानक की समाधि है मगर उसके बाबत अनेक अन्य कथाएं हैं। जैसे जैसे हम गुरुद्वारे के निकट पहुंच रहे थे , उसके बडे़ आकार का एहसास हो रहा था । फिलवक्त यह गुरुद्वारा 42 एकड़ भूमि पर विकसित है मगर पाकिस्तान सरकार ने उसके लिए पूरे चार सौ एकड़ भूमि अधिग्रहित की है। गुरूद्वारा परिसर के लिए अधिग्रहित जमीन कितनी बड़ी है इसका अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि अयोध्या के निर्माणाधीन राम मंदिर का परिसर कुल सत्तर एकड़ है। 


खैर, गुरूद्वारा परिसर में एक गाइड हमारा इंतजार कर रहा था। वह स्थानीय पर्यटन विभाग का कर्मचारी था । उसने हमें पूरे परिसर के बाबत विस्तार से बताया और फिर हमें भ्रमण के लिए अकेला छोड़ दिया । सबसे पहले हम परिसर के केन्द्र में बने गुरुद्वारे में ही गए । बेशक पूरा परिसर बहुत बड़ा है मगर इस गुरुद्वारे का मूल स्वरूप सुरक्षित रखने की गरज से उसमे कोई खास छेड़छाड़ नहीं की गई है। पहली मंजिल पर जहां गुरू ग्रंथ साहब का प्रकाश हो रहा है वह कमरा तो मात्र बीस फुट बाई पच्चीस फुट का ही है और उसने एक वक्त में बामुश्किल पचास आदमी ही खड़े हो सकते हैं। गुरुद्वारे में माथा टेक कर हम लोग पूरे परिसर को देखने निकले तो वहां एक से बढ़ कर एक चौंकाने वाली चीजें हमें नजर आईं।

क्रमश:

[11/3, 15:28] .: करतारपुर साहेब से लौट कर

( भाग चार )


रवि अरोड़ा

करतारपुर गुरुद्वारा परिसर में श्रद्धालुओं के लिए देखने योग्य एक से बढ़ कर एक चीजें हैं। सबसे महत्वपूर्ण तो बाबा नानक की मजार ही है जो पिछले पांच सौ सालों से यहां श्रद्धा का बड़ा केन्द्र है। सिख और हिंदू संगत के अतिरिक्त स्थानीय मुस्लिम आबादी भी इस मजार पर बड़ी संख्या में माथा टेकने आती है। बाबा नानक के जीते जी ही मुस्लिमों ने उन्हें पीर की संज्ञा दे दी थी और आज भी वे स्थानीय मुस्लिम आबादी के दिलों में बसते हैं। यह मजार ठीक वहीं है जहां बाबा नानक ने अपना शरीर छोड़ा था। पास में ही रहट युक्त एक कुंआ भी है। बताया जाता है कि इसी से बाबा अपने खेतों की सिंचाई करते थे। गुरुद्वारे के जीर्णोद्धार के समय पांच सौ साल पुराना एक और कुआं मिला था और माना गया कि यह भी बाबा नानक से संबंधित है। पाकिस्तान सरकार ने सिक्खों की परम्परा के अनुरूप परिसर में सरोवर का भी निर्माण करवाया है। हालांकि सिख धर्म की मान्यताओं के अनुरूप स्त्रियों और पुरुषों के लिए एक ही सरोवर न बनवा कर दोनो के लिए अलग अलग सरोवर बनवाए गए हैं। जाहिर है कि इस मामले में सिक्ख नहीं इस्लामिक जीवन शैली को तरजीह दी गई है। परिसर में बहुत बड़ा लंगर हॉल भी है जहां एक साथ दो हजार लोग बैठ कर भोजन कर सकते हैं। लगभग इतने ही यात्रियों के ठहरने को भी कमरे और डॉरमेट्री वहां है । अब इस कॉरीडोर का निर्माण और गुरुद्वारे का जीर्णोद्धार राजनेताओं ने कराया है तो जाहिर है कि राजनीति भी यहां अपने पदचिन्ह छोड़ गई है।


पाकिस्तान सरकार ने दावा किया था कि करतारपुर दुनिया का सबसे बड़ा गुरुद्वारा बनने जा रहा है। अपनी इस घोषणा को यथार्थवादी दिखाने को उसने गुरुद्वारे के लिए कुल 1450 एकड़ भूमि चिन्हित की थी मगर अधिग्रहण अभी तक मात्र चार सौ एकड़ भूमि का ही हुआ है। दावा किया गया था कि गुरुद्वारे के पास पांच सितारा होटल और अन्य सुविधाएं भी होंगी मगर इमरान खान सरकार के गिरने के बाद पाकिस्तान में अब इनका नामलेवा भी कोई नहीं बचा है। पाकिस्तान में कुल 195 बडे़ गुरुद्वारे हैं और लगभग सभी का संचालन और देखभाल पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी करती है मगर करतारपुर साहेब से कमेटी को दूर ही रखा गया है और स्वयं सरकार इसका संचालन कर रही है। यहां तक कि नौ सदस्यीय संचालन समिति में एक भी सिख नहीं है। सबसे बड़ी राजनीतिक शरारत तो स्वयं इमरान ख़ान सरकार ने की और  गुरुद्वारे के ठीक बगल में एक चबूतरा सा बना कर उसपर एक बोर्ड लगा दिया कि साल 1971 की लड़ाई में भारत ने इस गुरुद्वारे को नष्ट करने के लिए यहां एक बम फेंका था मगर गुरू महाराज की कृपा से गुरुद्वारे का रत्ती भर भी नुकसान नहीं हुआ । पाकिस्तान की यह हरकत वहां आए हरेक नानक नाम लेवा को नागवार गुजरती होगी मगर इसका कोई खास विरोध अभी तक नहीं हुआ है । भला यह कोई कैसे मान सकता है कि भारतीय सेना, जिसमें सिख बड़ी तादाद में हैं, वह अपने इतने महत्त्वपूर्ण धर्मस्थल को नष्ट करने की चेष्टा करेगी। खैर, इसके बाद हम लोग लंगर हॉल में गए जहां हमारे अतिरिक्त बस दो दंपति और थे । साफ सुथरी शानदार रसोई में तैयार किया गया लजीज़ भोजन हमारे सामने था और मैं दावे से कह सकता हूं कि यह भोजन भारत के किसी भी बड़े से बड़े गुरुद्वारे में परोसे गए लंगर से रत्ती भर भी कमतर नहीं था।

क्रमश:

[11/4, 15:06] .: करतारपुर से लौट कर

( भाग पांच )


रवि अरोड़ा

करतारपुर साहेब में सबसे अधिक जो बात आकर्षित करती है, वह है पाकिस्तानियों का हम भारतीयों के प्रति व्यवहार। वे लोग भारतीयों से ऐसे मिलते हैं जैसे मेले में बिछड़े दो भाई हों। शनिवार और इतवार को सैंकड़ों की तादाद में पाकिस्तानी इस गुरुद्वारे में केवल भारतीयों से मिलने की गरज से ही आते हैं। निकट का सबसे बड़ा शहर है नारोवाल और वहां के लोग सबसे अधिक यहाँ पहुंचते हैं। हालांकि लाहौर और फैसलाबाद समेत कराची जैसे बड़े शहरों के लोग भी इसी उद्देश्य से यहां आते हैं। भारतीयों के लिए कोई मिठाई लेकर आता है तो कोई घर से लजीज़ खाना बनवा कर लाता है। भारतीयों को देखते ही पाकिस्तानी अदब से दुआ सलाम जरूर करता है। हालांकि वहां के हिंदू पुरुष भी अब पठानी सलवार कुर्ता पहनते हैं और हिंदू महिलाएं भी सिर ढक कर रखती हैं मगर फिर भी हाव भाव से साफ पता चलता है कि उनमें अधिकांश मुस्लिम होते हैं। भारतीयों के साथ हाथ मिलाने और उनके साथ तस्वीर खिंचवाने का भी पाकिस्तानियों में अच्छा खासा क्रेज है। 


पता नहीं मुझे क्या सनक हुई कि मैं मिलने वाले हर पाकिस्तानी से उसके शहर का नाम पूछने लगा । मुझे रावलपिंडी, लाहौर,मुल्तान, सरगोधा, गुजरात ( वहां का एक बड़ा शहर)  टोबा टेक सिंह, नारोवाल, सियालकोट, कराची और कुछ अन्य शहरों के लोग मिले। इन सभी से मैंने टूटी फूटी ही सही मगर उनके जिले की बोली के अनुरूप पंजाबी में बात की। पंजाबी की इन तमाम उपबोलियों में बात करने का मुझे बचपन से ही शौक है। सराइकी भाषा भी काम चलाऊ बोल लेता हूं जो पाकिस्तान के एक बड़े भूभाग में बोली जाती है अतः स्थानीय लोगों से संवाद करने में मुझे कोई दिक्कत नहीं आई। भाषा का लाभ लोगों से खुल कर कुछ उगलवाने में भी काम आया । वैसे सच तो यह ही है कि स्थानीय लोग हम भारतीयों से बात करने को उत्सुक रहते हैं और मुझ जैसे बतरसी लोगों से तो आसानी से ही खुल जाते हैं। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि सभी पाकिस्तानी यहां हम लोगों से मिलने ही आते हैं, धार्मिक भाव से भी बड़ी संगत यहां पहुंचती है। यह भी सच है कि ऐसे लोग जिनके पाकिस्तान में रिश्तेदार अथवा मित्र हैं और चाह कर भी उन्हें वहां जाने का वीजा नहीं मिलता वे उन्हें करतार पुर साहेब बुला लेते हैं और बिना किसी झंझट के दोनो देशों के ये लोग पूरा दिन यहां साथ बिताते हैं। अखबारों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार बंटवारे में बिछड़े आठ परिवार भी इस गुरुद्वारे की बदौलत अब तक आपस में मिल चुके हैं।


पूरा परिसर घूमने के बाद हम लोग चारदीवारी के भीतर ही बनाए गए छोटे से बाजार में पहुंचे। वहां लगभग बीस अस्थाई दुकानें हमें नजर आईं। कोई कपड़े बेच रहा था तो कोई लकड़ी का सामान। किसी दुकान पर मुल्तान का डिब्बा बंद मशहूर कराची हलवा बिक रहा था तो किसी पर महिलाओं के श्रृंगार की वस्तुएं अथवा स्मृति चिन्ह। लाहौर निवासी एक दुकानदार एहसान से मैंने जब यह कहा कि तुम्हारे पास नया क्या है, ये सब जो तुम बेच रहे हो वह तो हमें भारत में भी मिल जायेगा । इस पर उस दुकानदार ने कुछ ऐसा कहा कि मैं उसे गले लगाने से खुद को रोक नहीं पाया । लगभग तीस पैंतीस वर्षीय यह दुकानदार एहसान बोला- वीर जी यह प्यार आपको वहां नहीं मिलेगा । 

क्रमश:

[11/5, 15:38] .: करतारपुर से लौटकर

( अंतिम भाग )


रवि अरोड़ा

हर बात को कुरेद कुरेद कर जानने की जिज्ञासा और अखबार नवीसी के अनुभव का परिणाम यह हुआ कि दोपहर होते तक गुरुद्वारे का एक सुरक्षा कर्मी मुझे इंटरव्यू दे रहा था । नारोवाल निवासी इस सुरक्षा कर्मी आसिफ़ से मैं मूलत: यही जानना चाहता था इतना बड़ा गुरुद्वारा,  इतनी बड़ी लागत, सीमा के दोनो ओर हुई भरपूर राजनीति और जम कर प्रचार प्रसार के बावजूद यहां भारतीयों की आमद इतनी कम क्यों है ? इस पर आसिफ़ का कहना था कि पाकिस्तान सरकार तो चाहती है मगर भारत सरकार ही अपने लोगों को यहां भेजने में रोड़े अटकाती है। बकौल उसके पाकिस्तान सरकार ने भारत से कई बार कहा है कि अपने लोगों को वह केवल आधार कार्ड के मार्फत ही भेज दे मगर भारत की ओर से पासपोर्ट के बिना यहां आने का आवेदन ही नहीं किया जा सकता । इसके अतिरिक्त भारत में पुलिस और अन्य विभागों की जांचों के चलते भी अनेक आवेदक चाह कर भी यहां नही आ पाते । आसिफ के अनुसार पाकिस्तान सिख गुरूद्वारा प्रबंध कमेटी ने भी भारत से अनुरोध किया है कि सभी ऐच्छिक श्रद्धालुओं को वह वहां भेजे और इसके लिए पाकिस्तान सरकार बीस डॉलर के अपने प्रवेश शुल्क को भी मुआफ करने को तैयार है। 


आसिफ़ ने ही बताया कि पाकिस्तान सरकार की ओर से यहां लगभग एक हजार लोग विभिन्न कार्यों के लिए रोजाना तैनात रहते हैं। लगभग साढ़े सात सौ तो स्थानीय सीमा सुरक्षा बल के ही जवान हैं और बाकी सभी सेवादार हैं। भारत की ओर भी सैंकड़ों लोगों की तैनाती मैं देख कर आया था । यानि दोनो सरकारों की ओर से लगभग डेढ़ हजार सरकारी स्टाफ का खर्च और भारतीय श्रद्धालुओं की संख्या मात्र उंगलियों पर गिनने योग्य ? आसिफ और अन्य लोगों ने बताया कि यहां केवल सौ डेढ़ सौ भारतीय ही रोज आते हैं। हां शनिवार और इतवार को जरूर यह संख्या दोगुनी हो जाती है। बेशक बैसाखी और गुरुपर्व आदि पर दो ढाई हजार भारतीय यहां पहुंचते हैं मगर उनमें अधिकांश वही होते हैं जो बकायदा वीजा लेकर वाघा बॉर्डर से पाकिस्तान आए हुए होते हैं । उन दिनों में भी करतारपुर कॉरीडोर से आने वालों की संख्या चार सौ पार नहीं करती। यानि जिस उद्देश्य से यह कॉरीडोर बनाया गया वह कहीं पीछे छूट गया ।


सिख धर्म के प्रथम गुरु बाबा नानक के बारे में अधिक न जानने वालों को बता दूं कि बाबा की मृत्यु के पश्चात उनके मुरीद मुसलमानों ने उनके फूल जहां दफनाए थे उसी जगह करतारपुर का गुरुद्वारा दरबार साहेब है और जहां हिंदुओं ने उनका अंतिम संस्कार किया वह जगह भारत के गुरुदासपुर जिले में है और वहां पर डेरा बाबा नानक गुरुद्वारा है। दोनो गुरुद्वारों में मात्र सात किलो मीटर की दूरी है। बंटवारे के समय अंग्रेज अफसर रेडक्लिफ की बेवकूफी से एक ही महत्व के दो स्थान अलग अलग देशों में चले गए । उधर, पाकिस्तान सरकार ने तो अपने गुरूद्वारे की काया पलट कर दी है मगर भारत का गुरुद्वारा डेरा बाबा नानक सदियों से अभी भी इसके इंतजार में है। भारत के सिख करतार पुर साहेब बिना वीजा के जा सकते हैं मगर पाकिस्तान के सिक्खों को डेरा बाबा नानक गुरुद्वारे के दर्शन को अभी भी वीजा लेना पड़ता है। हालांकि अपने अपने देश से श्रद्धालु दूसरे देश के गुरुद्वारे को दूरबीन से देखते रहते हैं मगर उनकी मांग है कि इस कॉरीडोर से दोनो गुरुद्वारों को जोड़ा जाए ताकि बाबा नानक की स्मृतियां वे और अच्छे से संजो सकें। आगामी आठ नवम्बर को बाबा नानक का जन्म दिवस है । क्या ही अच्छा हो कि इस अवसर पर दोनो देश की सरकारें करोड़ों नानक नाम लेवा संगत को यह तोहफा दे सकें। 

समाप्त

सांप डसने के बाद इलाज का रामबाण उपाय*

 सावधान?


जिन इलाकों में आज से बारिस शुरू हुईं हैं  उन इलाके के लोगों को मेरा एक सुझाव ।


बरसात होने के कारण सांप बाहर आते हैं क्योंकि उनके बिल में पानी भर जाता है ।


*सांप डसने के बाद इलाज का रामबाण उपाय*


आपको मालूम होगा की सांप डसने से उसके दो दांत का निशान दिखाई देते हैं।दो दांतों से वह विष मनुष्य के शरीर में यानि जहर छोड़ता है। वह विष रक्त के द्वारा हृदय तक जाता है। उसके बाद पूरे शरीर में पहुंचता है। सांप शरीर में कहीं भी डसने के बाद वह विष पहले हृदय तक जाता है  उसके बाद पूरे शरीर में फैलता है। यह विष पूरे शरीर में पहुंचने के लिए कम से कम तीन घंटे का समय लगता है। यानि कि जिस व्यक्ति को सर्प दंश हुआ है वह व्यक्ति तीन घंटे

तक नहीं मरेगा।जब मस्तिष्क के साथ साथ पूरा शरीर में विष पहुंचेगा तभी वह व्यक्ति मरेगा।

वह व्यक्ति को बचाने के लिए आपके पास तीन घंटे का समय है,इस तीन घंटे में आप बहुत कुछ कर सकते हो।यह बहुत अच्छा है।


आप क्या कर सकते हैं,,,?


एक दवाई आप अपने घर पर हमेशा रख सकते हैं


*यह औषधि होम्योपैथिक है तथा सस्ती है*


उसका नाम है 

*NAJA २००* 

यह दवाई है


 किसी भी होम्योपैथिक दवाई की दुकान पर आसानी से मिल जाती है। इस दवाई से आप कम से कम सौ लोगों की जान बचा सकते हैं। तथा इसकी कीमत सिर्फ  

*50 रूपये*से भी कम 

है।

*NAJA* नाजा यह दवाई विश्व का सबसे ख़तरनाक जहरीला सांप का ही जहर से बनाया गया है। 


उस सांप का नाम है 

 *क्रॅक*. 

इस सांप का विष सबसे घातक माना गया है, यह विष दूसरे सांप का विष उतारने के लिए काम आता है। 


इस दवाई का एक बूंद जीभ में रखें, और दस मिनट के बाद फिर दूसरी बूंद रखें। फिर तीसरी बार एक बूंद फिर दस मिनट के बाद रखें।ऐंसा तीन बार करके छोड़ दें।


बस इतना करके उस व्यक्ति, प्राणी,जीव, जन्तु, पशु, पक्षी, जानवरों आदि का प्राण बचा सकते हैं।

साभार

भाईयो अपने गांव के मित्र मंडली नाते रिश्तेदारों तक अवश्य शेयर करें ।।


🙏🏼🙏🏼🚩🚩🇮🇳🇮🇳

शुक्रवार, 11 नवंबर 2022

अलविदा रजनी कुमार: दिए दिल्ली को शानदार स्कूल / विवेक शुक्ला

 

     जोयस मारर्गेट जोनस सन 1948 में डॉ.य़ुधिष्ठर कुमार से शादी करने के बाद हो गईं थीं रजनी कुमार। उनकी शादी उस दिन हुई थी जिस दिन महात्मा गांधी की हत्या हुई थी। यानी 30 जनवरी 1948 को। इसलिए शादी किसी तरह हो गई थी।  दोनों लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में साथ-साथ पढ़ते थे। शादी के बाद दिल्ली आ गए। ईस्ट पटेल में रहने लगे। रजनी कुमार पटेल नगर के सलवान स्कूल में पढ़ाने लगीं। कुछ वर्षों के बाद उन्होंने अपने पति और ससुर से गुजारिश की कि वह अपना स्कूल खोलना चाहती हैं।  पति और ससुर का साथ और सहयोग मिला और उन्होंने ईस्ट पटेल नगर के अपने घर के एक हिस्से में नर्सरी की कक्षाएं शुरू करते हुए एक स्कूल खोला। स्कूल का नाम रखा स्प्रिंगडेल्स स्कूल। उन्हीं रजनी कुमार का गुरुवार को निधन हो गया। वो 99 साल की थीं।


क्यों गईं घर घर 

     रजनी कुमार ने पटेल नगर, राजेन्द्र नगर, पूसा रोड, रामजस रोड वगैरह में घर-घर जाकर लोगों से कहा कि वे अपने बच्चे उनके स्कूल में भेजे। उन्होंने फिर पूसा रोड में स्प्रिंगडेल्स स्कूल खोला और फिर धौला कुआं में भी शुरू किया। राजधानी में ना जाने कितने श्रेष्ठ स्कूल खुलते रहे है, पर रजनी कुमार के स्प्रिंगडेल्स स्कूल ने श्रेष्ठता की नई इबारत लिखी।


 युद्ध के विरूद्


रजनी कुमार और उनके पति य़ुधिष्ठर कुमार वामपंथी विचारों से प्रभावित थे।  उन्होंने अपने स्कूल में निर्धन परिवारों के बच्चों को बड़े स्तर पर दाखिले देने शुरू किए। ये उन दिनों की बातें हैं जब गरीब-गुरुबा के बारे में कोई सोचता भी नहीं था। रजनी कुमार ने समाज के दबे-कुचले वर्गों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को हमेशा समझा। रजनी कुमार को अपने भावी पति के साथ ब्रिटेन में रहते हुए भारत में अंग्रेजी शासन तथा स्वाधीनता आंदोलन के बारे में विस्तार से समझ आई। दोनों पति-पत्नी दूसरे विश्व युद्ध में एशिया और अफ्रीका में हुए विनाश से बहुत आहत थे। इसलिए वे युद्ध के विरूद्ध हमेशा खड़े रहे।


शरणार्थी हुए परिवारों की बेटियां


यूनाइडेट नेशंस के ताशकंद स्थित दफ्तर में सलाहकार आशिता मित्तल कहती हैं कि रजनी कुमार स्प्रिंगडेल्स स्कूल के हरेक बच्चे की प्रोगेस पर नजर रखा करती थीं। इसलिए बच्चे भी उन्हें अपने टीचर या प्रिंसिपल से अधिक अभि भावक  ही मानते थे। स्प्रिंगडेल्स स्कूल की स्टुडेंट रहीं आशिता मित्तल कहती हैं कि रजनी कुमार ने अपने स्कूल को धर्मनिरपेक्षता और  विश्वबंधुत्व के आधार पर ख़ड़ा किया।  रजनी कुमार ने एक बार बताया था कि उन्होंने 1950 से 1955 तक सलवान एजुकेशन ट्रस्ट स्कूल के लड़कियों के स्कूल को स्थापित किया और आगे बढ़ाया। उस दौर में उनके स्कूल में आसपास रहने वाले परिवारों की कन्याएं आती थीं। ये अधिकतर देश के विभाजन के कारण शरणार्थी हुए परिवारों की बेटियां थीं। उनसे बात करके रजनी कुमार ने शरणार्थी परिवारों के विस्थापन को गहराई से समझा था। उन बेटियों को शिक्षा के साथ-साथ सुरक्षा का भाव, प्रेम तथा पीठ थपथपाने वाला कोई चाहिए था। रजनी कुमार ने इस काम को बखूबी निभाया था।

 दिल के करीब अफ्रीका 

 रजनी कुमार के दिल के बहुत करीब था अफ्रीका। उन्होंने 1971 में अपने स्कूल में अफ्रीक क्लब की स्थापना की थी। वो अफ्रीका, खासतौर पर दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की अमानवीय नीति का कसकर विरोध करती थीं। दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर डॉ. अनिरुद्ध देशपांडे को याद है जब उनके स्कूल में अफ्रीका क्लब से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किये जाते थे। रजनी कुमार ने स्कूल में कुछ अफ्रीकी शिक्षक भी नियुक्त किये थे। उनकी विश्व दृष्टि थी। उसके चलते उनके स्कूल के स्टुडेंट्स और टीचर भी दुनिया को बेहतर तरीके से जानने लगे। उन्हें रंगभेद के कोढ़ के बारे में जानकारी मिली। रजनी कुमार के अफ्रीका प्रेम के चलते उन्हें 2005 में दक्षिण अफ्रीका सरकार ने सम्मानित भी किया था। रजनी कुमार 1976 में पति की कैंसर से मृत्यु से निराश तो हुईं थीं पर उन्होंने अपने को संभालते हुए अपना सारा समय बच्चों को बेहतर नागरिक बनाने में लगा दिया।

Vivekshukladelhi@gmail.com,  Navbharattimes, 11 October, 2022

बुधवार, 9 नवंबर 2022

दलाल मीडिया की बेशर्मी का हाल

 श्रीनिवास-

पतन की कोई तो सीमा होगी, पत्रकारिता के पतन का यह शर्मनाक दौर… कथित प्रमुख न्यूज चैनलों पर ‘भारत जोड़ो यात्रा’ का एक तरह से बहिष्कार कुछ अजीब नहीं लगता? आप कांग्रेस को नापसंद कर सकते हैं. आप उसकी नीतियों से असहमत हो सकते है. राहुल गांधी आपको नकारा लग सकता है. लेकिन एक पत्रकार होने के नाते किसी जरूरी खबर को गायब कैसे कर देंगे? क्या ‘भारत जोड़ो यात्रा’ सचमुच इतना ही महत्वहीन कार्यक्रम है, कि आपने जान लिया कि उसके प्रति आपके शोताओं- दर्शकों की कोई रुचि नहीं है?

या तो कुछ नहीं दिखाएँगे; या उसमें कुछ नकारात्मक खोज निकालेंगे! कुछ चैनल तो भाजपा आईटी सेल का भोंपू ही बन गए हैं. जब कभी यह निजाम बदलेगा, मीडिया की अच्छे-बुरे काम, उनकी  कारगुजारिर्यों का लेखा-जोखा तो दर्ज होगा ही. जब भी इस दौर की मीडिया का इतिहास लिखा जायेगा, कहाँ पाए जायेंगे ये चैनल और इनके भाजपाई कर्यकर्तानुमा पत्रकार?

इमरजेंसी के दौरान भी अनेक ‘बड़े’ पत्रकार और संपादक इंदिरा गांधी के सामने नतमस्तक हो गये थे. उस स्थिति का कलां करते हुए आडवाणी जी ने कहा था- सरकार ने झुकने कहा था और पत्रकार दंडवत करने लगे.

फिर भी माना जा सकता है कि तब एक स्पष्ट खौफ था. गिरफ्तारी का डर भी था शायद. कितने रीढ़विहीन थे वे ‘यशश्वी’ सम्पादक कि इमरजेंसी में हो रहे विकास का समर्थन करने के बाद सरकार बदलते ही प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से मिल कर अपनी भूल  (इमरजेंसी का समर्थन करने की) के लिए क्षमा मांग ली.

संभवतः माध्यम वर्ग के बहुतेरे जुबानी क्रांतिकारियों का मूल चरित्र ही यही है. 

लेकिन आज तो अधिकतर पत्रकार बिना पार्टी (भाजपा) में शामिल हुए उसके कार्यकर्त्ता की तरह व्यवहार करने लगे हैं! लेकिन मेरे ख्याल से ऐसा  सिर्फ भय या किसी प्रलोभन के कारण नहीं हो रहा है, ये सभी ‘हिंदू राष्ट्र निर्माण’ के लिए जारी महायज्ञ में शामिल हो  हैं. और शायद इनको विश्वास हो कि ऐसा होगा ही, कि फिर कभी ऐसा दिन नहीं आएगा, जब कोई उनसे इस दौर में उनके छिछोरेपन, उनकी निर्लज्जता पर कोई सवाल करेगा. 

पत्रकारों का दलाली करना, कमीशन खाना, खबर छापने या दबाने के लिए पैसे लेना – यह सब तो कमोबेश हमेशा चलता रहा है. लेकिन यह एक अलग किस्म का पतन है.

क्या सचमुच यह दौर यूं ही चलता रहेगा? मीडिया यूं ही बेशर्म और  सत्ता की चाकर बनी रहेगी. और नीचे और नीचे गिरती जायेगी? इस पतन की कोई सीमा तो होगी. इस घुटन का कभी तो अंत होगा? कभी ‘पत्रकार’ कहलाने में थोड़े गर्व का अनुभव होता था. हालाँकि तब भी पत्रकारों का  गैजरूरी महिमामंडन होता था, जो अच्छा नहीं लगता था. लेकिन अब तो पटकार पत्रकार कहलाना अपमानजनक लगने लगा है!  

श्रीनिवास

रांची


सोमवार, 7 नवंबर 2022

आजमगढ़ विश्वविद्यालय में शोधपीठों की भी स्थापना हो वाइस चांसलर साहब!

 आजमगढ़ विश्वविद्यालय में शोधपीठों की भी स्थापना हो वाइस चांसलर साहब!

@ अरविन्द सिंह 


पिछले दिनों सुहेलदेव राज्य विश्वविद्यालय आजमगढ़ के कुलपति प्रोफेसर पीके शर्मा जी से एक सौहार्द मुलाक़ात उनके विश्वविद्यालय के अस्थाई कार्यालय में हुई। साथ में थे मुबारकपुर विधानसभा क्षेत्र के लोकप्रिय विधायक अखिलेश यादव। इसके पहले उनसे दो मुलाकातें और हुईं थीं, पहली इसी कार्यालय में, तो दूसरी स्थानीय गरुण  होटल में उनके नागरिक अभिनंदन में, उनके सम्मान में माल्यार्पण करने लिए मुझे संचालक द्वारा सामने से बुलाया गया था। 

सामान्य शिष्टाचार भेंट के बाद उन्होंने कहा - 'पिताजी के निधन का समाचार मिला, तेरहवीं में अचानक से कहीं शायद बाहर जाने से आ नहीं सका।' 

इस दौरान विभिन्न विषयों पर बातचीत होती रही, विशेषकर विश्वविद्यालय की गरिमा, शैक्षिक स्तर और उसकी भविष्य की परियोजनाओं पर। विश्वविद्यालय की उपाधि का मूल्यांकन देश और दुनिया में एक बड़े और मूल्यपरक शैक्षिक केन्द्र के रूप में हो, इसकी उपाधि को सम्मान मिले और सबसे बड़ी बात जो मेरे द्वारा उठाया गया कि-संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं की तैयारी में विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों से कितनी मदद मिल पाएगी। यह बहुत ही जरूरी सवाल है, क्यों कि एक विद्यार्थी -जो अपने जीवन का 3-4 या05-6 बरस या उससे भी अधिक समय उपाधियों के लिए विश्वविद्यालय को जब देगा,तो इन उपाधियों के पाठ्यक्रम उसके कंप्टीशन में कितनी मदद दे सकेंगे, इस पर भी विश्वविद्यालय के शिक्षा परिषद और कुलपति महोदय को ध्यान देना होगा।  एक राज्य विश्वविद्यालय के रुप में इलाहाबाद विश्वविद्यालय जब पूरब का आक्सफोर्ड बन सकता है तो आजमगढ़ का यह राज्य विश्वविद्यालय, क्या उस तरह की गरिमा और महानता को छू भी सकता है? यह सवाल भी और चुनौती भी।

दरअसल, यह संभव है इसके शिल्पकारों और परिकल्पकों की विराट और महान सोच पर,  उसके महान उद्देश्यों पर,। उनके त्याग और समर्पण पर।  इस पर ध्यान देना चाहिए विश्वविद्यालय अभियान के मित्रों और विश्वविद्यालय प्रशासन दोनों को। अन्यथा की स्थिति में यह भी एक उपाधि वितरण केन्द्र बन कर एक महाविद्यालय की गरिमा को भी नहीं छू पाएगा।

यद्यपि आज कल कुलपतियों की नियुक्ति राजनीतिक हो रहीं हैं, लेकिन आज़मगढ के कुलपति प्रोफेसर पीके शर्मा जी एक कुशल कृषि वैज्ञानिक और योग्य परिकल्पक हैं।

अपनी विशेषज्ञता से वे कृषि क्षेत्र में इस विश्वविद्यालय की भूमिका को अग्रणी रखना चाहते हैं, जिससे कृषि और उससे जुड़े उद्योगों का विस्तार हो, यहां के कृषकों के जीवन में खुशहाली आएं। इस निमित्त वे विश्वविद्यालय कैंपस से सटे कुछ और जमीन चाह रहे हैं, 15-20 एकड़ भी मिल जाए तो भी एग्रीकल्चर फार्मिंग और एजूकेशन हब बना सके। अगर सटे न मिले सके तो 1-2 किमी की दूरी पर भी मिल सके तो यह परियोजना जमीं पर उतरती नज़र आएंगी।

उन्होंने बताया कि इस विश्वविद्यालय में लगभग सभी आधुनिक पाठ्यक्रमों को रखा गया है, पत्रकारिता को भी रखा गया है।

यह उनकी दूरदर्शिता और अनुभव की उपज है। इसी के साथ आजमगढ़ उनसे यह भी अपेक्षा रखता है कि- आजमगढ़ की पौराणिकता, ऐतिहासिकता, साहित्यिकता और आजादी के आंदोलन में योगदान आदि विषयों पर गहन अध्ययन के लिए -1- महापंडित राहुल सांकृत्यायन शोधपीठ, 2- गुरुभक्त सिंह भक्त शोध पीठ, 3-अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध शोध पीठों की स्थापना पर भी पहल करें।

निश्चित ही यह विश्वविद्यालय अपने उद्देश्यों को लेकर शिक्षा जगत में एक नया हस्तक्षेप कर सकेगा।

हार्दिक शुभकामनाएं के साथ!

अंत में -

''वतन की रेत मुझे एड़ियां रगड़ने दें/ 

      मुझे यकीं हैं पानी यहीं से निकलेगा।''

एक खूबसूरत लेख

 सुशोभित-

पिछले दिनों ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ में एक बहुत ही ख़ूबसूरत लेख पढ़ा। फिर सोचने लगा कि हमारे अख़बारों में वैसे लेख क्यों नहीं छपते। लेख बूढ़े, उम्रदराज़ दरख़्तों के बारे में था। वैसे बूढ़े, उम्रदराज़ दरख़्त- जो बहुत क़द्दावर भी हों। साइंस की ज़ुबान में इन्हें एल्डरफ़्लोरा और मेगाफ़्लोरा कहेंगे। लेखक जेरेड फ़ार्मर बतला रहे थे कि दुनिया में हज़ारों साल पुराने दरख़्त मौजूद हैं, लेकिन वो धीरे-धीरे नष्ट हो रहे हैं। हमें उन्हें बचाना चाहिए। क्यों?

केवल इसलिए नहीं कि वो बहुत पुराने हैं और गुज़रे वक़्त की एक शानदार यादगार हैं। बल्कि इसलिए भी कि उनके भीतर वैसी जेनेटिक सूचनाएँ संकलित हैं, जो बेशक़ीमती हैं। वे पेड़ अतीत में ऐसे अवसर पर पनपे थे, जब उनके लिए परिवेश अनुकूल था- वैसी परिस्थितियाँ शायद सदियों तक फिर न दोहराई जा सकें। वे अतीत और भविष्य के बीच एक पुल की तरह हैं। और सबसे बड़ी बात यह कि वे अपने आसपास के इकोलॉजिकल सिस्टम को सपोर्ट करते हैं। पर्यावरणविद् मेग लोमैन ने अकारण ही वृक्षों के माध्यम से संचालित होने वाले पारिस्थितिकी-तंत्र को आठवें महाद्वीप की संज्ञा नहीं दी थी।

क्योंकि पेड़ बहुत मिलनसार होते हैं। यारबाश होते हैं। वे समूह में रहना पसंद करते हैं। जिन्हें हम जंगल कहते हैं, वे दरख़्तों की बस्तियाँ हैं। कवियों और शायरों को लगता है कि पेड़ अपने पत्तों की खड़खड़ाहट से आपस में गुफ़्तगू करते हैं। हक़ीक़त यह है कि पेड़ पत्तों नहीं जड़ों के ज़रिये बात करते हैं और यह सच है। पीतर वोल्लेबेन ने इसी को वुड-वाइड-वेब कहा था। जितना पुराना पेड़ होगा, उतना ही उसका कम्युनिकेशन सिस्टम पुख़्ता होगा और वो अपने आसपास के नौजवान दरख़्तों की बढ़त में मददगार होगा। जेरेड फ़ार्मर इन्हें मदर-ट्री कहते हैं। ये अपने आसपास के सब्ज़े को पालते-पोसते हैं। आपने साल के किसी वृक्ष को अकेला नहीं देखा होगा, वो समूह में ही पनपते हैं। शालवन कहलाते हैं। तनहाई में वो मर जाते हैं।

लेकिन अपने लेख में जेरेड फ़ार्मर ने चिंता जतलाई कि बूढ़े दरख़्त एक-एक कर मर रहे हैं और किसी को फ़िक्र नहीं है। हाल के दिनों में दुनिया में ऐसे पूरे-पूरे जंगल जलकर ख़ाक हो गए, जिनमें तीन हज़ार साल पुराने तक पेड़ थे। इनमें आग-प्रतिरोधक सेकोइआस भी शामिल थे, जो दुनिया के सबसे भीमकाय पेड़ माने जाते हैं। अकाल के दौर में फलने-फूलने वाले ग्रेट बेसिन के ब्रिस्टलकोन पाइन पेड़ भी नष्ट हो गए हैं। ये पेड़ पांच हज़ार साल तक जीवित रह सकते हैं। दक्षिण अमेरिका में सूखे के चलते बाओबा पेड़ नष्ट हो गए। माउंट लेबनॉन के सेडार वृक्ष, जो दीर्घायु होने के पुरातन प्रतीक हैं, बढ़ते तापमान और रूखेपन के आगे जवाब दे रहे हैं। न्यूज़ीलैंड के कौरी हों या इटली के सदियों पुराने ओलिव- ये तमाम बीमारियों के शिकार होकर दम तोड़ रहे हैं। यों तो पृथ्वी का ट्री-कवर हाल के सालों में बढ़ा है। लेकिन वो तमाम पेड़ नौजवान हैं। बूढ़े दरख़्त दिन-ब-दिन घटते जा रहे हैं।

ये लेख इतना ख़ूबसूरत था कि मैं देर तक इसके बारे में सोचता रहा। फिर लेखक जेरेड फ़ार्मर के बारे में तहक़ीक़ात की। क्या ही आश्चर्य कि उनकी नई किताब इसी ताल्लुक़ में आई है। किताब का नाम है- ‘एल्डरफ़्लोरा : अ मॉडर्न हिस्ट्री ऑफ़ एन्शेंट ट्रीज़’। सुदूर पेन्सिलवेनिया में कोई अमरीकी बूढ़े, उम्रदराज़ दरख़्तों की फ़िक्र में घुल रहा है, उनके बारे में मालूमात हासिल करके किताब लिख रहा है, ये जानकर मुझे तसल्ली मिली और जेरेड के लिए दिल में इज़्ज़त का हरा बूटा उग आया। ये धरती जितनी इंसानों की है, उससे कम दरख़्तों, नदियों, पहाड़ों, परिंदों और जानवरों की नहीं है- यही तालीम और तहज़ीब सबसे बुनियादी है। ये नहीं है तो आप एजुकेटेड और सिविलाइज़्ड नहीं कहला सकेंगे।



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रविवार, 6 नवंबर 2022

एक जिन्दादिल बुजुर्ग पत्रकार का यूं चलें जाना! / @ डॉ अरविन्द सिंह

 

माटी से बनी शरीर कल माटी में मिल गयी।जिस तमसा के तट को उन्होंने अपनी कर्मस्थली बनाया, कल उसी तमसा की अविरल धारा में विलीन हो गयें। पंचभूतों से बनी काया पंचभूतों में मिल गयी। इधर काफी दिनों से मुलाक़ात नहीं हो पायी थी,कल जब उनके निधन की सूचना मिली तो मन में अकुलाहट होने लगी,एक जिन्दादिल और हस्सास व्यक्ति इस धरा धाम को अलविदा कह अगले यात्रा पर निकल पड़ा। सहाय जी आजमगढ़ के आकाशवाणी के संवाददाता ही नहीं थे, बल्कि एक कस्बाई नगर आजमगढ़ की पहचान भी बन गये थे। कितनी स्मृतियां और यात्राएं उनके साथ जुड़ी थीं। अपने समय के सबसे प्रभावशाली पत्रकार थे। बनवारी लाल जालान, पंडित अमर नाथ तिवारी और श्रीनाथ सहाय जैसों का समय आजमगढ़ के पत्रकारिता के इतिहास को रेखांकित करने वाला कालखंड था। तब कलेक्टर और कप्तान उनसे मिलने उनके घर या कार्यालयों में आया करते थें, आज की तरह पत्रकारिता का पतन नहीं हुआ था।छपे हुए शब्दों में तलवार सी धार हुआ करती थी और पत्रकारों की रीढ़ बिल्कुल सीधी।

उस कालखंड में एक इंटरमीडिएट कॉलेज का अध्यापक भी समाचारपत्रों की दुनिया और इसके जादुई शब्द संसार से जुड़ा, संन्मार्ग जैसे पत्रों में बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं देने वाले श्रीनाथ सहाय आजमगढ़ की पत्रकारिता में आकाशवाणी से जुड़े। वे पहले ऐसे संवाददाता थें, जिन्हें एक साथ समाचार पत्र संन्मार्ग और आकाशवाणी दोनों से मान्यता मिली थी। 

जब भी कलेक्ट्रेट तरफ आते तो फोन करते अरविन्द जी!  आफिस में हैं। उत्तर मिलता हां तो, सीढ़ियां चढ़ शार्प रिपोर्टर के दफ़्तर में आते। इधर सन-2019 में उनकी स्वतंत्र पत्रकार की मान्यता की पूरी पत्रावली एक सप्ताह मेहनत करके तैयार किया। न केवल तैयार किया बल्कि उनकी और मेरी दोनों की राज्य मुख्यालय की प्रेस मान्यता एक साथ हुई। इस दिशा में आप कह सकते हैं कि वे आजमगढ़ के पहले मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार थें। अपनी पहचान और व्यवहार कुशलता से वे आजमगढ़ के बाहर भी प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी थे। वे भारत सरकार के भारी उद्योग मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य भी रहे और इस समिति के बैठकों में प्रतिभाग करने देश के विभिन्न राज्यों में जाया करते थे। उन यात्राओं में गंगटोक और मुन्नार की यात्रा हमने साथ साथ किया था। उन यात्राओं में गोरखपुर के आकाशवाणी और दूरदर्शन के निदेशक रहे डॉ उदयभान जी भी रहे। अब दोनों स्मृतिशेष हो गयें हैं।

लगभग 80 के सहाय जी की खिलखिलाहट और उद्दात मन किसी बच्चे के मानिंद चहक उठता था। प्रतिदिन एक घंटे पूजा करने के बाद ही अन्न ग्रहण करते चाहे घर पर हों,या बाहर। 

एकबार लखनऊ में मिल गयें बोले-अरविन्द जी, मेरे शरीर की जांच करा दीजिए। फिर क्या बलरामपुर अस्पताल में उन्हें दिखाया गया और वहीं भर्ती हुए। हालांकि उन्हें तकलीफ कुछ भी नहीं थी। रात बोले- अरविन्द जी, यह नंबर निधि का है, जरा फोन लगा कर उसे बता दीजिए कि मेरी तबियत बहुत खराब है, भर्ती हूं।

न चाहते हुए भी उनकी इस जिद्द के आगे झुकना पड़ा और फोन करके बताया। कुछ देर बाद उनकी लड़की आयीं। फिर उन्हें पकड़ कर रोएं। इस उम्र में शायद उन्हें अपनों की आत्मीयता और प्रेम चाहिए था। 

दूसरे दिन पत्रकार मित्र सतीश रघुवंशी भी बनारस से मिलने आए।

आजमगढ़ के डीएबी पीजी कॉलेज के प्रबंधक और पदाधिकारी रहें डॉ श्रीनाथ सहाय एक संघर्षशील व्यक्तित्व का नाम है, प्रबंधतंत्र की लड़ाई वे विश्वविद्यालय से लेकर राजभवन तक लड़े। आखिरी समय में भी उनकी मर्जी से ही नया प्रबंध तंत्र आबाद हुआ था। शायद बूढ़ापे और बूढ़ी हड्डियों की नरमी महसूस करने लगे थे।

इधर लगभग एक महिने से तबियत कुछ खराब ज़रूर थी, लेकिन इतना जल्दी चले जाएंगे यह किसी ने नहीं सोचा था। जिस दिन निधन हुआ उस शाम 7 बजे के लगभग बोलते बतियाते अस्पताल में गयें। उनकी केयरटेकर काजल ने बताया कि हमें विश्वास ही नहीं हुआ कि नाना जी हमें छोड़कर चलें जाएंगे। ठीक एक घंटे बाद 8 बजे उन्होंने लखनऊ के एक अस्पताल में आखिरी सांस ली। कल जब उनके हरिऔध नगर कालोनी स्थित आवास पर पहुंचे तो लगा अभी बोल पड़ेंगे!  लेकिन गहरी नींद में सोया यह कलमकार अब कहां उठ पाता। रंगकर्मी Santosh Srivastav Srivastav  संतोष श्रीवास्तव, मित्र Mahendra Kumar Singh  महेंद्र सिंह और विधायक मित्र Akhilesh Yadav Mubarakpur  अखिलेश यादव के बीच उनकी स्मृतियों को याद किया गया। 

उनकी स्मृतियों को, उनके साथ बिताए समय को,और उस जिन्दादिल इंसान को भावभीनी श्रद्धांजलि!!

फेक न्यूज के खिलाफ एनयूजेआई का राष्ट्रव्यापी अभियान जारी -रासबिहारी

 


भोपाल में 6-7 नवंबर को होगा पत्रकारों का राष्ट्रीय सम्मेलन


भोपाल, 5 नवम्बर।

 देश में वर्तमान समय में फेक न्यूज बड़ी समस्या बन गई है जो ना केवल पत्रकारिता के लिए खतरनाक है बल्कि समाज एवं राष्ट्रविरोधी ताकतों को भी मजबूत करती है अत: पत्रकारों को फेकन्यूज के खिलाफ खड़ा होने की जरूरत है. नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) देशव्यापी जनजागरण अभियान चला रही है. इस आशय की जानकारी आज एक पत्रकार वार्ता में एनयूजेआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री रासबिहारी ने दी. श्री रासबिहारी भोपाल में एनयूजेआई के दो दिवसीय सम्मेलन एवं कार्यसमिति की बैठक में भाग लेने आए हैं. 

उल्लेखनीय है कि एनयूजेआई का दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन एवं कार्यसमिति की बैठक में भाग लेने के लिए देश के 24 राज्यों के प्रतिनिधि भोपाल आ चुके हैं. पटेल नगर, रायसेन रोड स्थित होटल कैलाश रेसीडेंसी में आयोजित सम्मेलन में जिन मुद्दों पर प्रमुख रूप से चर्चा होना है उनमें फेक न्यूज के खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान से पूरे देश के पत्रकारों को जोडऩा, पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करने की मांग, प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया के स्थान पर मीडिया कौंसिल का गठन, राष्ट्रीय मीडिया आयोग का गठन एवं राष्ट्रीय पत्रकार रजिस्टर बनाने की मांग के साथ पत्रकारों को रेल यात्रा में दिये जाने वाले को पुन: आरंभ किये जाने की मांग शामिल है. पत्रकारों की स्वास्थ्य बीमा एवं पत्रकार सम्मान निधि एकजाई कर राष्ट्रीय स्तर पर एकरूपता कायम करने की मांग पर चर्चा करने के साथ केन्द्र एवं राज्य सरकारों से मांग की जाएगी. 

एनयूजेआई के 6 एवं 7 नवम्बर को होने जा रहे इस सम्मेलन में मध्यप्रदेश के राज्यपाल श्री मंगूभाई पटेल, मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह एवं भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री श्री कैलाश विजयवर्गीय को अतिथि आमंत्रित किया गया है. विभिन्न प्रांतों से आये 4 सौ प्रतिनिधियों के साथ ही प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य द्वय श्री प्रसन्ना मोहंती (उड़ीसा) एवं श्री प्रज्ञानंद चौधरी (बंगाल) विशेष रूप से शामिल हो रहे हैं. 

दो दिवसीय सम्मेलन एवं राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक का आयोजन  जर्नलिस्ट्स यूनियन ऑफ मध्यप्रदेश(जम्प) द्वारा किया जा रहा है. सम्मेलन से संबंधित जानकारी जम्प के प्रदेश अध्यक्ष खिलावन चंद्राकर एवं महासचिव प्रदीप तिवारी ने दिया एवं बताया कि इस वृहद आयोजन की तैयारियां पूर्ण कर ली गई है.

जॉर्ज के उत्थान पतन की कहानी / संजीव आचार्य

 

विंसेंट जॉर्ज और स्व अर्जुन सिंह का  जन्मदिन 5 नवम्बर...

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काँग्रेस पार्टी में सबसे शक्तिशाली एड्रेस 10, जनपथ और वहां के निवासी राजीव-सोनिया गांधी परिवार के बाद सबसे प्रभावशाली व्यक्ति रहे निजी सचिव विंसेंट जॉर्ज। 1984 से 2004 तक "जॉर्ज साहब "( जैसा काँग्रेस के बड़े-छोटे नेता उनको बोलते थे) का अखण्ड जलवा रहा। 

1974 में केरल से नौकरी की तलाश में दिल्ली आए वी जॉर्ज डिग्रीधारी स्टेनोग्राफर हैं। दिग्गज काँग्रेस नेता कमलापति त्रिपाठी के निजी टायपिस्ट रहते हुए संजय गांधी की नजरों में चढ़े और फिर उनकी असमय मृत्यु होने तक उनके साथ थे। फिर राजीव गांधी ने उन्हें अपने साथ ले लिया।  इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री नियुक्त किए गए। वहीं से शुरू हुआ जॉर्ज का जलवे का सफर। प्रधानमंत्री के निजी सचिव, उनके साथ हर समय रहने वाले। जाहिर है, सत्ता साकेत में अहम किरदार बन कर उभरे। 

सारे बड़े नेता जिन्हें राजीव गांधी से मिलना होता था, उन्हें जॉर्ज के दरबार में माथा टेकना जरूरी था। अर्जुन सिंह का जन्मदिन भी जॉर्ज के साथ 5 नवम्बर को होता है। यही कारण था कि दोनों के बहुत प्रगाढ़ सम्बन्ध थे। राजीव गांधी के दरबार में कैप्टन सतीश शर्मा, अरुण नेहरू, अरुण सिंह, शीला दीक्षित, माधवराव सिंधिया,पी चिदंबरम जैसे दिग्गज थे। ऐसे में अर्जुन सिंह को जॉर्ज ने  बहुत मदद की। 

पी वी नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री काल में एक मौका ऐसा आया कि दस जनपथ के विश्वासपात्र जॉर्ज को कर्नाटक से मार्गरेट अल्वा के स्थान पर राज्यसभा भेजने का संदेश राव तक पहुंचा। राव ने गांधी परिवार के करीबी  ब्यूरोक्रेट  वजाहत हबीबुल्लाह के जरिये सोनिया से पुछवाया की क्या जॉर्ज को राज्यसभा में भेजना उनकी इच्छा है? सोनिया ने कहा कि योग्यता और उपयोगिता के आधार पर वह फैसला करें। राव ने जॉर्ज के प्रस्ताव को दरकिनार करते हुए मार्गरेट अल्वा को टिकट दे दिया।

इस घटना के बाद जॉर्ज ने अर्जुन सिंह और नारायण दत्त तिवारी के राव विरोधी रुख को बड़ी बगावत में बदलवा दिया। तिवारी काँग्रेस बन गई। नटवर सिंह, शीला दीक्षित भी इसमें शामिल थे। इसे दस जनपथ का समर्थन है यह सन्देश फैलाने का काम जॉर्ज ने किया। मैं उन दिनों काँग्रेस कवर करने वाले संवाददाता के बतौर हर घटनाक्रम का साक्षी रहा। विंसेंट जॉर्ज से मेरे भी अच्छे सम्बन्ध थे। 

जॉर्ज की ही काबिलियत थी कि पहले गांधी परिवार और राव में खाई चौड़ी की, फिर उनके खिलाफ बगावत करवाई। राव के मनोनीत सीताराम केसरी को काँग्रेस अध्यक्ष पद से शर्मनाक घटनाक्रम के तहत हटाने, सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनवाने की पूरी मुहिम के सूत्रधार जॉर्ज थे। सोनिया के अध्यक्ष बनने के बाद जॉर्ज एक तरह से कार्यकारी अध्यक्ष हो गए थे। बहुत शक्तिशाली। बस यहीं से अहमद पटेल की सीन में एंट्री हुई! अम्बिका सोनी, शीला दीक्षित और कैप्टन सतीश शर्मा ये सब इस एक बात पर सहमत थे कि निजी सचिव को आलाकमान नहीं बनने देना चाहिए। शिकायतें, चुगली, सब शुरू हुआ। 

और आखिरकार सीबीआई ने जब जॉर्ज पर आय से अधिक संपत्ति का केस दर्ज किया, सबने मिलकर सोनिया को समझाया और जॉर्ज दस जनपथ के शक्तिशाली ऑफिस से बाहर हो गए। कहने को आज भी वह सोनिया गांधी के निजी सचिव हैं, लेकिन उनका न केवल रुतबा खत्म हो गया, बल्कि राहुल गांधी के अपना सचिवालय बनाने के बाद जॉर्ज हाशिये पर चले गए।

मीडिया और रंगकर्मी राजनारायण बिसारिया नहीं रहे

 बीबीसी हिंदी के लोकप्रिय प्रसारक और हिंदी के वरिष्ठ कवि, गीतकार, मीडिया और रंगकर्मी राजनारायण बिसारिया नहीं रहे। वे 93 वर्ष के थे और दिल का दौरा पड़ने के कारण पिछले कुछ दिनों से अस्पताल में थे। बीबीसी से सेवानिवृत्त होने के बाद बिसारिया जी दिल्ली लौट गए थे और ‘परम्परा’ नाम की साहित्यिक संस्था चलाते थे। वे छह वर्षों तक प्रसार भारती बोर्ड के मानद सदस्य भी रहे।


बीबीसी में काम करते हुए मैंने बिसारिया जी से बहुत कुछ सीखा। पत्रकारिता के अफ़रा-तफ़री के माहौल में उनकी शांत और सहज भाव से काम करने की शैली से बड़ा सुकून मिलता था। सामयिक चर्चाओं के दैनिक कार्यक्रमों के अलावा बिसारिया जी ने बरसों तक सांस्कृतिक चर्चा और बालजगत जैसे लोकप्रिय साप्ताहिक कार्यक्रम भी किए जिन पर उनकी रचनात्मकता और साहित्यिक शैली की छाप स्पष्ट दिखाई देती थी।


बिसारिया जी ने बीबीसी के पूर्व प्रसारक और उपन्यासकार जॉर्ज ऑरवेल के कालजयी व्यंग्यात्मक उपन्यास Animal Farm का रेडियो नाट्य रूपांतर ‘जानवरों का बाड़ा’ लिखा और निर्देशित किया था जिसमें काम करना एक यादगार अनुभव था। अनुभव में दशकों वरिष्ठ होने के बावजूद उनका व्यवहार बेहद दोस्ताना और गर्मजोशी भरा रहता था जिसकी वजह से हम नौसिखिए लोग भी बेतकल्लुफ़ी से काम कर लेते थे।


मध्य प्रदेश के भिण्ड शहर में जन्मे बिसारिया जी की प्रारंभिक शिक्षा गूना और मुरैना में हुई थी। ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज से हिन्दी में एम ए करने के बाद उन्होंने प्रयाग जाकर डॉ रामकुमार वर्मा के निर्देशन में शोध कार्य किया। परंतु इस बीच उनका मन दूसरी ओर मुड़ गया और शोधपत्र लिखे बिना ही वे श्रेष्ठ साहित्यकारों के बीच लेखन कार्य में जुट गये। उनके कई लेख 'आलोचना' पत्रिका में प्रकाशित हुए। 


संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आकाशवाणी में नियुक्ति के बाद उन्होंने जालंधर, जयपुर, इलाहाबाद, पोर्टब्लेयर और फिर से आकाशवाणी जयपुर में प्रोड्यूसर और कार्यक्रम अधिकारी के पदों पर काम किया। प्रशासनिक कार्य के साथ-साथ उन्होंने अपना प्रसारण और लेखन का कार्य जारी रखा। साथ ही वे कविताएँ लिखते और काव्य सम्मेलनों में भाग भी लेते रहे।


अपनी रचनाशीलता के कारण दूरदर्शन में चयनित होकर उन्होंने ऊँचे पदों की ज़िम्मेदारियों का निर्वाह किया। साथ ही 'श्री अरविन्द की सावित्री' के एक सर्ग का हिन्दी में रूपान्तरण व निर्देशन' एवं 'सुब्रह्मण्यम भारती' के गीतों का हिन्दी रूपांतरण भी किया। उनके मंचनों में 'अमृतसर सिफ़्ती दा घर' शीर्षक से किया 'ध्वनि प्रकाश' दिग्दर्शन भी शामिल है जिसे आँचलिक ही नहीं वरन राष्ट्रीय समाचार पत्रों में भी लोकप्रिय रंगकर्म का आदर्श माना गया। श्रीनगर और दिल्ली के दूरदर्शन केंद्रों के निदेशक रहने के बाद वे बीबीसी हिंदी के प्रसारक बनकर लंदन आए।


लंदन से दिल्ली लौट कर उन्होंने अपना पूरा ध्यान कविता लेखन और ‘परम्परा’ के संचालन पर लगाया। उनके दो कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। ‘कुछ देह - कुछ विदेह’ और ‘समय की रोशनी में’ जो दो खंडों में है। उनकी कविताओं को पढ़कर स्पष्ट हो जाता है उनकी रचनाशीलता का आयाम बड़ा होने के साथ-साथ वैविध्य पूर्ण भी है। उन्होंने कम लिखा है पर जो भी लिखा, सारपूर्ण लिखा है। उनकी एक लंबी कविता ‘ग्रामवधू की विदा’ पचास के दशक में लोकप्रिय हुई थी और साहित्य चर्चा का का विषय बनी थी। उसकी कुछ पंक्तियाँ आज उनकी विदाई पर बरबस याद आ रही हैं:


विदा की घड़ी है,

कि ढप ढप, ढपाढप

बहे जा रहे ढोल के स्वर पवन में

बधू सी जतन से सजाई हुई सी

लजाई हुई सी, पराई हुई सी

खड़ी है सदन में…


बिसारिया जी मूलतः एक गीतकार थे। पर उनकी चुस्त बयानी कई बार ग़ज़ल का तेवर भी अपनाती नज़र आती है। भावानुरूप उनकी कवितायें कभी गीत कभी ग़ज़ल का आकार लेती हैं। जैसे:


कुछ कहूँ मैं और तुम उत्तर न दो, 

मैं नहीं इसके लिये तैयार था। 

सिर्फ़ सम्मोहन रहा या प्यार था 

कुछ नहीं मालूम पहली बार था। 

एलबम तुम याद का मेरे लिये, 

मैं जिसे तुम पढ़ चुकी अख़बार था।.


शब्दों में मार्मिक अभिव्यक्ति उनका अतिरिक्त गुण हैं, जिसे संग्रह की तमाम कविताओं में आदि से अंत तक सुना और पहचाना जा सकता है। उनकी छोटी-छोटी कविताओं का चुटीला अंदाज बहुत मोहक है। परम्परा' की विकास यात्रा की स्मृतियों और उपलब्धियों को केन्द्र में रखते हुए बिसारिया जी ने 'परम्परा एक पड़ाव' पुस्तक का सम्पादन भी किया जो उनके सम्पादन कौशल और प्रतिभा का उत्कृष्ट उदाहरण है। अंतिम साँस तक उनके मन ने उन्हें रुकने या थकने की इजाजत नहीं दी। मन की इसी ज़िद को वे इन पंक्तियों में व्यक्त कर गए हैं:


थका-थका है पूरा तन

अभी और चलने का मन।

भले मना कर दें ये घुटने

साँस भले ही लगे टूटने

उठे भले ही एक चरण

अभी और चलने का मन।


बिसारिया जी अपनी यात्रा समाप्त करके अनंत की एक और यात्रा पर निकल गए हैं। ईश्वर पुष्पा जी और उनके परिवार को यह असह्य दुःख सहने की शक्ति दे और दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान देकर चिरशांति प्रदान करे। 

भावभीनी श्रद्धांजलि 🙏


https://www.prabhatkhabar.com/national/famous-bbc-hindi-broadcaster-rajnarayan-bisaria-passes-away-in-the-age-of-93-vwt

गुरुवार, 3 नवंबर 2022

अरुण खरे को विनम्र श्रद्धांजलि

 

मूल रूप से बांदा के रहने वाले और करीब चार दशक तक दिल्ली के पत्रकारिता जगत में सक्रिय रूप से कलम चलाने वाले *श्री अरुण खरे* का आज शाम करीब आठ बजे बांदा में निधन हो गया। वह कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। ईश्वर उन्हें अपने श्री चरणों में स्थान दें। वि शांति: 🙏🙏


बांदा जिले के मूल निवासी अरुण खरे ने वर्ष 1978 से नवजीवन, लखनऊ से हिंदी पत्रकारिता में अपना कैरियर शुरू किया था।  इलाहाबाद के ‘भारत’, दैनिक आज, मध्ययुग, दैनिक भास्कर झांसी में रहे। 1986 में वे दिल्ली आए। अमर उजाला फिर वीर अर्जुन से जुडे़। वर्ष 1996 में कुबेर टाइम्स में सेवाएं दीं। वर्ष 2000 में वे हरिभूमि से जुडे।


बहुत याद आओगे दोस्त....

दधिबल यादव 

भारत में कितने तरह के चुनाव होते हैं

भारत एक लोकतांत्रिक देश है अथार्त यहाँ पर जनता का राज है, अपने देश की आबादी लगभग 130 करोड़ है, यहाँ पर देश हित के अहम निर्णय  सब लोग मिल-जुलकर नहीं ले सकते है, इसलिए प्रतिनिधि चुनने के लिए चुनाव का आयोजन किया जाता है | यही प्रतिनिधि जीतने के बाद संसद, विधानसभा आदि में बैठकर जनता की तरफ से निर्णय लेते हैं | इस पेज पर भारत में चुनाव कितने प्रकार के होते हैं, के विषय में बताया जा रहा है |

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भारत में चुनाव कितने प्रकार के होते हैं?

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भारत में चुनाव कितने प्रकार के होते हैं (Types of Election in India)?

भारत में 4 प्रकार के चुनाव होते है |

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लोकसभा (Lok Sabha)

इसे सामान्य चुनाव भी कहा जाता है | पार्लियामेंट चुनाव में 543 लोकसभा सीटों के लिए चुनाव का आयोजन किया जाता है | लोकसभा की सबसे अधिक 80 सीटें यूपी में है तथा सबसे कम सीटें सिक्किम, नगालैंड और मिजोरम में एक-एक सीट है | इन्हीं सीटों के लिए चुनाव का आयोजन किया जाता है |

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राज्य सभा (Rajya Sabha)

राज्य सभा के प्रत्याशियों का चुनाव सीधे जनता के द्वारा नहीं कराया जाता है, इस चुनाव में लोक सभा और विधान सभा के चुने हुए प्रतिनिधि मिलकर राज्य सभा के सदस्य को चुनते है, राज्य सभा को उच्च सदन के रूप में जाना जाता है |

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विधानसभा चुनाव (Assembly elections)

विधानसभा चुनाव को असेंबली इलेक्शन कहा जाता है | इसके माध्यम से राज्यों में सरकारें बनती हैं | सामान्यतः राज्य के क्षेत्रफल के अनुसार हर राज्य में विधानसभा सीटें निर्धारित की जाती है | विधानसभा चुनाव हर राज्य में अलग-अलग समय पर आयोजित किये जाते है |

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पंचायत या नगर निगम चुनाव (Panchayat or Municipal Corporation Election)

पंचायत या नगर निगम चुनाव को लोकल बॉडीज इलेक्शन भी कहा जाता है | इसके द्वारा गांवों में ग्राम पंचायत और शहरों में नगर निगम परिषद सदस्यों या पार्षदों का चुनाव कराया जाता है |

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यहाँ पर हमनें भारत में चुनाव कितने प्रकार के होते हैं के विषय में जानकारी उपलब्ध करायी है, यदि इस जानकारी से सम्बन्धित आपके मन में किसी प्रकार का प्रश्न आ रहा है, अथवा इससे सम्बंधित अन्य कोई जानकारी प्राप्त करना चाहते है, तो कमेंट बाक्स के माध्यम से पूँछ सकते है,  हम आपके द्वारा की गयी प्रतिक्रिया और सुझावों का इंतजार कर रहे है |

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