शनिवार, 15 मई 2021

लॉक डाउन कथा -2 / सुनील बादल

 स्मृति शेष / आइ एम गोइंग : पीएन सिंह


रांची दूरदर्शन केंद्र की स्थापना जब हुई थी तब इसके नगर भवन स्थित अस्थाई कार्यालय में एक लंबे और बहुत ही हंसमुख हाजिर जवाब अधिकारी से परिचय हुआ जो जींस पैंट के ऊपर खादी का कुर्ता पहनते थे !  जीवंतता ऐसी कि अधिकारी कम और एंकर ज्यादा लगते थे। तब मैं दैनिक रांची एक्सप्रेस में एक नियमित कॉलम लिखता था जिसमें आकाशवाणी और दूरदर्शन के अलावा नाटकों की समीक्षा हुआ करती थी । दूरदर्शन चूंकि प्रारंभिक दौर में था तो समीक्षा भी एक-एक पंक्ति पढ़ी जाती थी और मैं कमियों के बारे में बहुत निडर होकर लिखा करता था जिस के कारण कई बार उन से मेरी बहस भी हुई । खास तौर पर भाषा की शुद्धता को लेकर मैं टिप्पणियां करता था।  उन्होंने मुझे उदाहरण दिया था कि आपने फणीश्वर नाथ रेणु जी की पुस्तक मैला आंचल पढ़ी है मैंने कहा कि मैला आंचल एक अलग पृष्ठभूमि में है और दूरदर्शन से लोग हिंदी सीख सकते हैं जैसे अखबारों से सीखते हैं । बहुत गंभीर बातें होती थीं, लेकिन उन्होंने कभी भी इसको अपने अहं पर नहीं लिया और मुझे कहा कि आप भी एंकरिंग करिए तब मुझे पता चला कि एंकरिंग करना, कंपेयरिंग करना बहुत आसान काम नहीं होता था। तब स्थितियां बहुत विपरीत हुआ करती थीं। एसी दूरदर्शन का जो था बहुत आवाज करता था इस वजह से रिकॉर्डिंग के समय उसे बंद कर दिया जाता तब पसीने में डूबे हुए विशेषज्ञ और एंकर दोनों साफ साफ दिखाई पड़ते थे। तब रांची दूरदर्शन में सैटेलाइट अपलिंकिंग के सुविधा नहीं थी और कार्यक्रमों को कैप्सूल बनाकर कैसेट हवाई जहाज से दिल्ली भेजे जाते थे जिसमें कई बार खास तौर पर चूंकि प्रसारण की समयावधि कम हुआ करती थी और रांची के टाइम में अन्य कार्यक्रम राष्ट्रीय स्तर पर आ जाते थे,तब नाटकों के दूसरे भाग को पहले प्रसारित कर दिया जाता था और पहला भाग एक दिन के बाद प्रसारित होता था इस पर जब मैंने टिप्पणी की तो उन्होंने दूरदर्शन का पक्ष बहुत ही बढ़िया से रखा और बताया कि दूरदर्शन का प्रसारण कोई बहुत आसान नहीं हुआ करता था। स्टूडियो कहीं और अर्थ स्टेशन कहीं और हुआ करता था। बाद में मैं आकाशवाणी और दूरदर्शन से जुड़ गया और बहुत सारे अधिकारियों से बहुत कुछ सीखा जिसमें पीएन सिंह भी थे, उन से जो अच्छी बात सीखीं कि विनम्रता और सहजता से अपनी बातें कैसे रखी जाती हैं ! 

बाद में उनका स्थानांतरण पटना हो गया और बीच-बीच में उनसे बातें होती रहती थी उसके बाद दिल्ली चले गए अचानक एक दिन दूरदर्शन के मुख्यालय में उनसे मुलाकात हो गई वर्षों बाद लगा नहीं कि एक डेढ़ दशक के बाद में उनसे मिल रहा हूं वही विनम्रता वही सहजता और वही आत्मविश्वास । मूल रूप से बिहार निवासी थे, आकाशवाणी प्रयागराज में मेरे मित्र हैं उनके वह संबंधी भी हुआ करते थे उन्होंने उनके बारे में बहुत कुछ बताया कि वह बहुत ही अच्छा लिखते भी थे स्वयं नाटक भी करते थे और जब मैं सासाराम में आकाशवाणी  में था तो पटना दूरदर्शन के वह कार्यक्रम प्रमुख हुआ करते थे। नव वर्ष पर बहुत ही अनूठे कार्यक्रम स्वयं प्रस्तुत करते थे और जिस स्तर का कार्यक्रम को स्वयं करते थे वैसा बहुत कम लोग कर पाते हैं । उन्होंने कभी किसी को नीचा दिखाने की कोशिश नहीं की एक बड़ी लकीर खींच कर लोगों को प्रेरित किया कि इस तरह से करना चाहिए।

पटना दूरदर्शन के निदेशक के रूप में जब काम कर रहे थे तो मैंने एक पैरवी के लिए फोन किया थोड़ा सकुचाते हुए लेकिन उन्होंने पूरे धैर्य से मेरी बातें सुनी और उन्हें लगा कि मैं एक सही व्यक्ति की पैरवी कर रहा हूं उन्होंने यह नहीं कहा कि वह कर देंगे क्या क्या होना चाहिए उन्होंने सिर्फ हां हूं कहा लेकिन मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि उन्होंने उस व्यक्ति को पूरा समय दिया उनकी बातें सुनी और उस समस्या का समाधान भी कर दिया । अवकाश प्राप्त करने के बाद दिल्ली शिफ्ट हुए तो वहां पर भी मेरे एक वरिष्ठ पत्रकार मित्र के पड़ोसी बने और आज जाते-जाते भी अपनी जीवंतता से रुला गए जब उन्होंने अपने अंतिम तीन शब्द व्हाट्सएप पर लिखा 'आई एम गोइंग' । जीवन के अंतिम मिनट में भी  यह जीवंतता बहुत कम लोगों में देखी जाती है । दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार मित्र राय तपन भारती ने बताया कि एकमात्र पुत्र आलाप के चार दिन पहले कोरोना से गुजर जाने के बाद वह टूट चुके थे और कोरोना से जो संघर्ष उनका चल रहा था उसमें उन्होंने अपनी पराजय स्वीकार कर ली थी लेकिन जीवंतता  बरकरार रखी। अंतिम प्रणाम।

1 टिप्पणी: