शुक्रवार, 12 नवंबर 2021

रवि अरोड़ा की नजर से.....

 क्या है /  रवि अरोड़ा


अभी अभी एक मित्र ने कल्याणी पश्चिम बंगाल में हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विशाल रैली का एक वीडियो भेजा है । इस चुनावी रैली में अपार भीड़ को देख कर मोदी जी गदगद नज़र आ रहे हैं और मंच से भीड़ को कह रहे हैं कि आपका इतनी बड़ी संख्या में आना मेरे लिये बड़े सौभाग्य की बात है । कोरोना के मामले में पाँचवे स्थान पर पहुँच चुके पश्चिम बंगाल की इस रैली में न प्रधानमंत्री ने मास्क पहन रहा है और न ही हजारों की भीड़ ने । कहना न होगा कि दो गज़ की दूरी वाला प्रधानमंत्री का डायलोग तो उनकी उपस्थिति में भी अर्थहीन दिखाई दे रहा था । सच बताऊँ तो मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि आसपास चल क्या रहा है ? क्या यह चार्ली चैपलिन की हास्य फ़िल्म द ग्रेट डिकटेटर अथवा द सर्कस जैसा कुछ है या फिर त्रासदी लेखन के पितामह विलियम शैक्सपियर का नाटक हैमलेट अथवा आथेलो मेरे इर्दगिर्द खेला जा रहा है । आँखों के सामने ऐसी ऐसी भयावह त्रासदी हो रही हैं कि पूरा अस्तित्व डावाँडोल हुआ जा रहा है और कभी कभी इस त्रासदी में विद्रूपताओं का भी ऐसा दीदार हो रहा है कि रुलाई के माहौल में भी हँसी आ घेरती है । पता नहीं हम लोग हमेशा से ही इतने मूर्ख थे या हाल ही के वर्षों में हमे ऐसा बना दिया गया है अथवा मान लिया गया है । जो भी हो अपने पल्ले तो वाक़ई कुछ भी नहीं पड़ रहा । चुपचाप तमाशा देख रहे हैं और मुसीबत यह है कि टिक कर देखा भी नहीं जा रहा ।


कोरोना हर दूसरे घर में दिखाई दे रहा है मगर सरकारी आँकड़ा उतना भी नहीं जितना मेरे मोहल्ले का है । कोरोना प्रोटोकोल से ही कम से कम दस शव रोज़ हिंडन श्मशान घाट पर जलाये जा रहे हैं और सामान्य रूप से भी तीन गुना लाशें यहाँ रोज़ाना पहुँच रही हैं मगर सरकारी आँकड़ा हिलने को भी तैयार नहीं है । हमें कार में अकेले बैठने पर भी मास्क लगाना है और देश के प्रधानमंत्री-गृहमंत्री को लाखों की भीड़ में भी इसकी कोई ज़रूरत नहीं । सामान्य आदमी शादी में पचास और अंत्येष्टि में बीस से अधिक लोगों को नहीं बुला सकता मगर कुम्भ में लाखों लोगों को भी जाना हो तो कोई पाबंदी नहीं । चुनावी रैलियों के लिये तो पैसे देकर भीड़ जुटाई जा सकती है । जब दस पाँच हज़ार मरीज़ थे तब पत्ता भी खड़कने नहीं दिया और अब ढाई लाख मरीज़ का सरकारी आँकड़ा रोज का  है तो महीनों लम्बे चुनाव कराये जा रहे हैं । अस्पतालों में बेड नहीं , दवा की दुकानों पर ज़रूरी दवा नहीं , आक्सीजन और वेंटिलेटर के लिये वीवीआईपी भी धक्के खा रहे हैं मगर पूरी की पूरी केंद्र सरकार बंगाल में दीदी ओ दीदी का गीत गा रही है । श्मशान घाटों पर लम्बी लम्बी क़तारें हैं और पहली बार वहाँ टोकन बँट रहे हैं मगर सरकार नाम की चिड़िया कहाँ फुर्र है किसी को पता नहीं ।


समझ नहीं आ रहा कि जब अस्पताल बढ़ाने चाहिए थे तब कोई आदमी दाढ़ी बढ़ा रहा था । जब वैक्सींन और रेमडीसिवर हमें मिलनी चाहिये थी तब कोई महात्मा गांधी और नेलसन मंडेला बनने के चक्कर में उसे निर्यात करवा रहा था । जब अस्पतालों के लिये पैसे जुटाने चाहिये थे तब कोई मंदिर के लिये घर घर जाकर रसीद कटवा रहा था । अजब हालात हैं पब्लिक क़ोरोना से लड़ रही है और नेता चुनाव लड़ रहे हैं । बच्चे एग्ज़ाम नहीं दे सकते मगर नेता लाखों की भीड़ वाली रैलियाँ कर सकते हैं । लूट के नये अड्डों अस्पतालों को खुली छूट है । नेता अफ़सर इस डर से चुप हैं कि हमें कुछ हुआ तो यही माई-बाप होंगे । जीएसटी कलेक्शन का आँकड़ा हर महीने बताते हैं मगर प्रधान मंत्री केयर फ़ंड का कुछ पता नहीं । पता नहीं कैसा कोमेडी शो चल रहा है कि पिछले साल जो बंदा रोज़ टीवी पर आकर हमें डराता था इस साल वो ख़ुद ही निडर हुआ घूम रहा है । अजी साहब सही सही बताओ तो .. करना क्या है ?


 इलाज माँग कर शर्मिंदा न करें  / रवि अरोड़ा



कल से सोशल मीडिया पर एक ख़ास क़िस्म के संदेश वायरल हो रहे हैं । इन संदेशों में नकारात्मकता न फैलाने की तागीद की जा रही है और कहा जा रहा कि कोरोना से जब लाखों लोग ठीक भी तो हो रहे हैं , उनकी बात क्यों नहीं की जा रही । किसी किसी मेसेज में तो उन लोगों की लानत-मलानत भी की जा रही है जो अस्पतालों में बेड, आक्सीजन, वेंटीलेटर और दवा की कमी का रोना रो रहे हैं । कोरोना से मरने की जानकारी देने वालों को भी आढे हाथों लिया जा रहा है । पहली नज़र में तो मुझे भी यह बात जमीं कि लुटने-पिटने की ख़बरों से वाक़ई मरीज़ों और उनके परिजनों का मनोबल टूटता है अतः माहौल में सकारात्मकता की ठंडी बयार तो बहनी ही चाहिये । फिर अचानक मन में सवाल कोंधा कि ऐसा क्या हुआ कि कल से पहले ऐसे संदेश कहीं दिखाई नहीं पड़े और अब अचानक आधे से अधिक संदेशों में कोरोना की विभीषिका और संसाधनों की कमी सम्बंधी ख़बरों को घेरा जा रहा है ? क्या यह अपनी कमियों को छुपाने के लिये सत्ता के आईटी सेल का खेल तो नहीं ? ऐसे में जब पूरी केंद्र सरकार बंगाल चुनाव में व्यस्त है और उसके वापिस लौटने में अभी समय है , तब तक कोरोना की बजाय उसकी ख़बरों को कंट्रोल करने का यह कोई सियासी खेल तो नहीं है ? माहौल में सकारात्मकता हो अच्छी बात है मगर अच्छी व्यवस्था हो इस पर भी तो बात हो । हो सकता है मेरी बात में भी नकारात्मकता ढूँढी जाये मगर व्यवस्था को आइना ही न दिखाया जाये , यह कहाँ की सकारात्मकता है ?


कल से खाँसी हो रही थी । डाक्टर ने कहा भाप लो और आक्सीजन लेवल चेक करते रहो । मेडिकल स्टोर पर गया तो पता चला कि स्टीमर आउट ओफ स्टाक है । ओक्सिमीटर भी उपलब्ध नहीं था । दुकानदार ने बताया कि 29 मार्च से बाज़ार से ये सामान लगभग ग़ायब है । बीस दिन पहले जो स्टीमर दो सौ रुपये का धक्के खा रहा था उसे होलसेलर अब साढ़े तीन सौ रुपये में दे रहे हैं और वह भी एडवांस पैसे लेकर । सात सौ रुपये का ओक्सीमीटर अब अट्ठारह में भी उपलब्ध नहीं है । नेबुलाईज़र भी दोगुनी क़ीमत पर मिल रहा है । कोरोना के चलते मशहूर हुई रेमेडिसिविर दवा की तो कोई क़ीमत ही नहीं । बीस हज़ार में भी उसकी वॉयल मिल जाये तो ग़नीमत है । अस्पताल वाले मरीज़ के परिजनों से कह रहे हैं कि आक्सीजन का इंतज़ाम ख़ुद करो वरना अपना पेशेंट कहीं और शिफ़्ट करा लो । वेंटिलेटर वाला बेड तो दूर दूर तक ढूँढे से नहीं मिल रहा । अपॉंट्मेंट के बावजूद कमी के चलते वैक्सींन नहीं लग रही । आरटी पीसीआर टेस्ट की किट तो ग़ायब हैं ही।


कोरोना को कोहराम मचाते हुए सवा साल हो गया , समझ नहीं आ रहा कि इस दौरान सरकार ने क्या तैयारी की ? कहाँ हैं सरकारी इंतज़ाम ? मुआफ़ कीजिये आपको लगेगा कि मैं भी नकारात्मकता फैला रहा हूँ । मगर सरकार का गिरेबाँ बचाने को झूठी सकारात्मकता कहाँ से लाऊँ ? कैसे उन नेताओं को क्षमा कर दूँ जो परेशान लोगों के फ़ोन नहीं उठा रहे और यदि उठा भी लें तो कह रहे हैं कि अस्पताल में बेड के अलावा कोई और बात हो तो बताओ । ऐसा लग रहा है जैसे पुराने मोहल्लों की किसी दुकान पर हम खड़े हों और जहाँ बड़ा बड़ा लिखा हो- उधार माँग कर शर्मिंदा न करें अथवा उधार प्रेम की कैंची है ।


  तुग़लक़ रिटर्न्स/ रवि अरोड़ा 



सन 1982 से लेकर 1990 तक मुझ पर थियेटर का भूत सवार था । आधा दर्जन नाटक लिखे और उनका निर्देशन भी किया । इक्का-दुक्का नाटक में अभिनय का मौक़ा भी हाथ से जाने नहीं दिया । उन दिनो दिल्ली स्थित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ( एनएसडी ) और श्रीराम सेंटर हम रंगकर्मियों के मक्का-मदीना ही थे अतः शामें वहाँ गुज़रतीं । हिंदी का शायद ही कोई चर्चित नाटक होगा जिसका मंचन वहाँ न देखा हो । उनमें से एक नाटक ऐसा भी था जिस पर बहुत बड़ा निर्देशक ही हाथ डालता था और वह था- तुग़लक़ । जाने माने लेखक, निर्देशक और अभिनेता गिरीश कर्नाड ने वर्ष 1964 में इसे मूलतः कन्नड़ भाषा में लिखा था और बाद में भारत की तमाम अन्य भाषाओं में ही नहीं अनेक विदेशी भाषाओं में भी इसका अनुवाद हुआ । इसके अनेक प्रदर्शन पुराना क़िला में खुले आसमान के नीचे भी हुए और उन दिनो आलम यह था कि दिल्ली के कलाप्रेमी बड़ी बेसब्री से इस नाटक के दोबारा प्रदर्शन का इंतज़ार करते थे । यूँ तो यह नाटक 14वीं सदी के मुस्लिम बादशाह मोहम्मद बिन तुग़लक़ के जीवन पर था मगर इसके बहाने कर्नाड साहब ने जवाहर लाल नेहरू को घेरा था । पंडित नेहरू ने भी देश के लिये बड़े बड़े सपने देखे थे और अनेक महत्वकांशी योजनाएँ शुरू की थीं मगर कर्नाड ने नेहरू का नाम लिये बिना तुग़लक़ के बहाने नेहरू की योजनाओं की सफलता-असफलता को टटोला था ।


स्कूल के दिनो में इस सनकी बादशाह तुग़लक़ के बाबत हम सबने पढ़ा ही है । उसकी पाँच प्रमुख मूर्खताओं से सम्बंधी सवाल तो हर साल परीक्षा में आना लाजमी ही होता था । आत्ममुग्ध तुग़लक़ ने अपनी राजधानी दिल्ली से दौलताबाद स्थानांतरित करने की घोषणा की थी और अपने साथ पैदल ही जनता को भी दो हज़ार किलोमीटर दूर दक्षिण स्थित दौलताबाद ले गया था । इस यातना दायक यात्रा में भूखे प्यासे हज़ारों बच्चे, बूढ़े , महिलायें और बीमार मारे गये । बाद में उसे अपने फ़ैसले पर दुःख हुआ तो उसने अपनी पुरानी राजधानी दिल्ली वापिस चलने का आदेश दे दिया और इस बार पहले से भी अधिक लोग मारे गये । उसने अपना नया सिक्का चला दिया और ख़ास बात यह कि चाँदी व ताम्बे के सिक्के की वेल्यू एक जितनी ही रख दी । नतीजा लोगों ने घर में ताम्बे के सिक्के बनाने शुरू कर दिये और चाँदी के भाव उसे चला कर मुल्क की अर्थव्यवस्था का भट्ठा बैठा दिया । उसने ज़बरदस्त टैक्स लगा दिये और आम नागरिकों की जेब ख़ाली होने से मुल्क में भुखमरी व्याप्त हो गई । मुस्लिम होने के बावजूद वह हिंदुओं का सबसे बड़ा ख़ैरख़्वाब स्वयं को कहता था और उसके अधिकांश फ़ैसले धर्म के आधार पर होते थे । उसने अपने पूर्ववर्ती बादशाह यानि अपने पिता का क़त्ल कर गद्दी हासिल की थी और अपने दुश्मनों को वह कभी मुआफ़ नहीं करता था । उसकी ख़ास बात यह भी थी कि वह अपनी मूर्खताओं को भी अपनी उपलब्धि क़रार देता था और उम्मीद करता था कि जनता उसकी जय जयकार करे । हास्यस्पद बात यह थी कि उसने नामी गिरामी ठगों को भी अपना वज़ीर बना दिया था ।


कर्नाड साहब आप चले गये । ईश्वर आपको सद्गति प्रदान करे । काश आप जीवित होते तो यक़ीनन इन दिनो नया शाहकार तुग़लक़ रिटर्न्स लिख रहे होते । पहने वाले नाटक में तो आप ने केवल इशारे इशारों में सवाल उछाले थे मगर नये नाटक में तो शर्तियाँ गिरेबाँ में ही हाथ डालते । ऐसा करते भी क्यों नहीं हमारा आज का तुग़लक़ तो 14वीं सदी के तुग़लक़ से भी अधिक ‘वो’ है । ऐतिहासिक तुग़लक़ की पाँच मूर्खताएँ मशहूर हुईं और हमारे आज के इस तुग़लक़ की बेवक़ूफ़ियाँ तो थमने का नाम ही नहीं ले रहीं हैं ।


 आगे कुछ नहीं आता है / रवि अरोड़ा



कल ही प्रयागराज यानि इलाहाबाद से बाई रोड गाजियाबाद लौटा हूं । इस बार आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे से न होकर वाया कानपुर इटावा होते हुए घर वापिस आने का फैसला लिया था ।  बताया भी गया था कि स्टेट हाई वे बहुत अच्छा है और आप इससे जल्दी आगरा तक पहुंच जाओगे । मगर हुआ इसके विपरीत । गऊ माता की ऐसी कृपा हुई कि सुबह का निकला हुआ देर रात ही घर पहुंच सका । फतेहपुर से लेकर इटावा तक जहां देखो वहीं सड़क के बीचों बीच गौ वंश पसरा हुआ मिला । कानपुर से लेकर इटावा तक के  सफर में तो शायद ही कोई ऐसा पल गुजरा हो जिसमें गायों और सांडों के झुंड नज़र न आए हों । खास बात यह कि ये सभी गाय केवल हाई वे पर ही दिखीं । पता नहीं अपने खेतों को गौ वंश से बचाने के लिए किसानों ने उन्हें हाई वे पर छोड़ा था अथवा स्वयं गौ पालकों ने मगर गौ वंश का घर सा ही लगा स्टेट हाई वे । अगर मै कहूं कि जीवन में पहली बार इतनी गाय मैने अब देखीँ तो यह अतिश्योक्ति न होगी । सच कहूं तो दो सौ तीस किलोमीटर का यह सफर राम राम करते ही बीता । सोच कर भी डर लगा कि यदि गलती से भी किसी गाय को मेरी कार ने टक्कर मार दी तो गौ भक्त जनता न जाने मेरा क्या हाल करेगी । हालांकि हजारों हजार इन गायों का ट्रैफिक सेंस भी गजब का था और इंसानों से बेहतर तरीके से वे सड़क का इस्तेमाल करती दिखीं मगर फिर भी पांच घंटे के इस सफर में डर तो बना ही रहा । घर लौट कर अब हिसाब लगा रहा हूं कि न जाने क्या सोच कर इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज साहब ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की सलाह दी होगी ? 


प्रदेश की योगी सरकार की गायों को बचाने की योजना गायों पर ही भारी पड़ती नजर आ रही है । लोगबाग गाय पालने के लिए सरकार से नौ सो रुपया प्रति माह का अनुदान तो ले रहे हैं मगर चरने के लिए उन्हें खुले में ही छोड़ रहे हैं । कहना न होगा कि दो साल पहले शुरू हुई योगी सरकार की बेसहारा गौ वंश सहभागिता योजना और 109 करोड़ का शुरुआती बजट गायों को ही ले डूबा । आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में लगभग दो करोड़ पशु हैं और उनमें से बारह लाख आवारा हैं । इसके विपरीत गौ शाला केवल पांच सौ तेईस हैं । गाय की हत्या पर चूंकि प्रदेश में दस साल की सजा का अब प्रावधान है अतः हत्या तो उसकी आसानी से नही होती मगर जीते जी मारने की कोई मनाही नहीं है । गाय को प्रताड़ित करने पर तो सज़ा हो सकती है मगर किसी स्कूल में बंद भूखी मारने की पूरी छूट है । 


दुनिया में हर तरह के सर्वे होते हैं । कौन सा देश अथवा समाज सबसे अधिक सुखी है अथवा कौन से देश में शिक्षा अथवा औसत उम्र कितनी है । पता नहीं पाखंड पर कोई सर्वे क्यों नहीं होता । यकीनन ऐसा कोई सर्वे हुआ तो हमारा देश और हमारा समाज सबसे आगे खड़ा मिलेगा । स्कूली दिनों में पढ़ाया जाता था गाय हमारी माता है । बच्चे लोग इससे आगे की तुकबंदी करते हुए कहते थे आगे कुछ नहीं आता है । लगता है बचपन की पैरोडी ठीक थी।  वाकई हमें इतना तो पता है कि गाय हमारी माता है और मगर सच में आगे कुछ नही आता है ।


: उसका भी खाना खराब / रवि अरोड़ा


उर्दू के मशहूर शायर अब्दुल हमीद अदम मेरे पसंदीदा शायर हैं । उनका मुरीद मैं तीन वजह से हूं । पहली वजह है कि वे उस कस्बे तलवंडी में पैदा हुए जहां के बाबा नानक थे । दूसरी वजह यह है कि वे मेरे आदर्श प्रगतिशील आंदोलन से तपे शायर थे और तीसरी वजह है उनका यह कालजई शेoर -  दिल खुश हुआ मस्जिद ए वीरां को देख कर , मेरी तरह खुदा का भी खाना खराब है । अब इस मुए कोरोना ने मुझ जैसे लाखों करोड़ों का खाना खराब तो  किया ही है । किसी ने अपनों को खोया तो किसी ने सेहत गंवाई । किसी का काम धंधा चौपट हुआ तो किसी का रोज़गार गया । अपनी सामाजिक,धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं के चलते हमें हर बात के लिए ईश्वर को जिम्मेदार मानते का युगों से अभ्यास रहा है सो अब इस दौरे खाना खराबी में अपने इष्ट को बरी भी लोग बाग कैसे कर पा रहे हो होंगे । जाहिर है कि ऐसे में जब ईश्वर की भी खाना खराबी की कोई खबर मिले तो वहां ध्यान जाना स्वाभाविक ही है ।


 वैसे सकता हो कि यह मेरी दिमागी खलिश हो मगर इसे सिरे से खारिज तो शायद आप भी न कर सकें । खलिश यह है कि देश दुनिया में धर्म की दुकानें अब खतरे में हैं । हालांकि खतरे में तो धर्म भी है मगर अपनी बात के केंद्र मे इसे रख कर मैं आपको नाराज नहीं करना चाहता । पिछले डेढ़ साल से जब से कोरोना की आमद हुई है , अधिकांश धार्मिक स्थलों पर ताले लटक रहे हैं । दुर्गा पूजा, गणेश प्रतिमा विसर्जन, रामलीलाएं, कुंभ मेले, कांवड़ , अमरनाथ , चारधाम और जगन्नाथ रथयात्राओं पर तो ग्रहण लग ही गया है मजार और उर्स भी वीरान हो चले हैं।  हैरानी की बात यह है कि जिन धार्मिक स्थलों पर जाने की कोई पाबंदी नहीं है , वहां भी उतने लोग नही जा रहे जितने पहले जाते थे । नतीजा बड़े बड़े धार्मिक स्थल घाटे में हैं और उन्हें अपना खर्च निकालना भारी पड़ रहा है । और तो और देश का सबसे अमीर पद्मनाभ स्वामी मंदिर भी नुकसान में है । कल ही खबर आई है कि तिरुवंतपुरम स्थित इस मंदिर में रोजाना का चढ़ावा खर्च के लगभग आधा है । हो सकता है केरल में कोरोना के भारी प्रकोप के चलते यह मंदिर खाली पड़ा हो मगर उत्तराखंड में तो कोरोना नहीं है , वहां की चार धाम यात्रा क्यों पहले ही दिन वीरान रही ? अन्य धार्मिक स्थल भी अभी तक क्यों सूने हैं ? 


हमारे मुल्क में सभ्यता की शुरुआत से ही धर्म एक बड़ा बिजनेस मॉड्यूल रहा है । अगर इसे हम अपना सबसे पहला व्यवसाय कहें तो शायद अतिशोक्ति नही होगी । खेती, टेक्सटाइल और आई टी सेक्टर के बाद सबसे बड़ा रोजगार का साधन भी धर्म, उसके केंद्र और उन पर आश्रित व्यवसाय ही हैं । कहना न होगा कि कोरोना ने सब की हवा खराब कर दी है । खास बात यह कि महामारी ने कोई भेदभाव नहीं किया । आस्तिकों को भी उतना लपेटा जितना नास्तिकों को । अब आक्सीजन अथवा इलाज के बिना अपनों को मरते देख कर किसी आस्तिक का भक्ति भाव और मजबूत हुआ होगा, ऐसा नहीं हो सकता । बेशक लोग बाग हरि इच्छा को स्वीकार किए बैठे हों मगर उसके समक्ष नतमस्तक तो वे कदापि नहीं हुए होंगे । अपनो के लिए मांगी गई मन्नतें भी जब स्वीकार नहीं हुईं तो वह भी अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई होंगी । जाहिर है ऐसे में धार्मिक स्थलों में भीड़ कम होने की वजह लोगों की डगमगाई आस्था भी थोड़ी बहुत जरूर होगी ।


मैं कतई उम्मीद नहीं कर रहा कि आप मेरी बात से सहमत हों । आपकी तरह मुझे भी पूरी उम्मीद है कि धार्मिक स्थानों पर कोरोना के खत्म होने के बाद पुनः भीड़ भाड़ होने लगेगी और तमाम धार्मिक स्थल फिर से गुलज़ार होंगे मगर फिर भी आज के हालात को देखते हुए तो आप भी अदम साहब को दाद देने से अपने कैसे रोक पाएंगे जिन्होंने दशकों पहले ही मस्जिद की वीरांनगी में खुदा की खाना खराबी पहचान ली थी ।


देखो एक नदी जा रही है  /रवि अरोड़ा



सोशल मीडिया पर सुबह से डॉटर्स डे के मैसेज छाए हुए हैं । इन मैसेज के बीच हौले से किसी ने नदी दिवस का भी मैसेज भेज दिया । याद आया अरे आज तो नदी दिवस भी है । हालांकि ये दिवस विवस अपने समझ में नहीं आते और मुझे अच्छी तरह पता है कि ये बाजार के टोटके भर होते हैं । पश्चिम से आई इस संस्कृति को पश्चिम ने ही नाम दिया है हॉलमार्क डे । माना जाता है कि ग्रीटिंग कार्ड बेचने वाली कंपनी हॉलमार्क ने ही ऐसे दिवसों की इजाद की थी । इस दिन कार्ड खरीदने की फुर्सत भी लोगों के पास हो इसलिए ही इतवार को ही अधिकांश ऐसे दिवस मनाए जाते हैं । इसी कड़ी में डॉटर्स डे और रिवर डे सितंबर के चौथे रविवार को मनाए जाते हैं । हो सकता है दिवसों के इन बाजारी टोटकों के आप हिमायती न हों मगर पता नहीं क्यों मुझे इनमें कोई खास खराबी नज़र नहीं आती । धर्म और सस्कृति के नाम पर यूं भी तो हजार खुराफातें हम करते ही हैं , ऐसे में दो चार दिन और ये पाखंड कर लिया तो क्या फर्क पड़ता है । 


खैर , बेटी और नदी के संदेश मिले तो न जाने क्यों मन उनके बीच तुलना सी करने लगा । हैरानी हुई कि इन दोनों के बीच समानताएं ही समानताएं हैं । सच कहूं तो एक में ऐसा कुछ भी नहीं जो दूसरी में न हो । दुनिया की तमाम संस्कृतियां नदियों के इर्द गिर्द जन्मी तो वे महिलाएं यानी बेटियां ही थीं जिन्होंने उन्हें सुरक्षित रखा । हमारी अपनी भारतीय संस्कृति में तो नदी को मां का ही दर्जा दिया गया जो स्वयं एक बेटी भी है । हम नदियों को पूजते हैं तो कन्याओं के भी पांव बघारते हैं । दोनो ही हमारे जीवन को संवारती हैं और फिर भी अनुशासित रहते हुए  युग युगांतर से अपने लक्ष्य की ओर बिना रुके बढ़ती रहती हैं । बेशक हम लोग इन दोनों के मार्ग में रोड़े अटकाते रहते हैं और उनके अस्तित्व को तरह तरह के बांध बनाकर चुनौतियां देते रहते हैं मगर फिर भी उनके प्रवाह को हम स्थाई तौर पर कभी  बाधित नही कर पाते । हां हमारी खुआफातें बढ़ें तो अपने तट तोड़ना दोनो को आता है । अब उनकी अठखेलियों को हम उनकी जीवंतता न मान कर यदि कुछ और कहने लगें तो यह उनके प्रति ज्यादती न होगी तो और क्या होगी ? दुर्भाग्य ही है कि आज के हालात दोनों के लिए अच्छे नहीं हैं । नदियां खतरे में हैं तो बेटियां भी कहां सुरक्षित हैं । अखबार रंगे रहते हैं बेटियों के प्रति अत्याचार की खबरों से । नदी भी कोई साफ सुथरी अब कहां बची ? दोनो के लिए खतरा हैं वे लोग जो उन्हें अपनी संपत्ति समझते हैं ।  दोनो के लिए उनके अपने ही खतरा हैं । वही दुश्मन हैं जो सुरक्षा का दावा करते हैं । क्या विडंबना है कि हमारी बेटियों और हमारी नदियों दोनो का भाग्य भी हूबहू एक जैसा ही है । 


बैठा हिसाब लगा रहा हूं कि कुदरत ने भी बेटियों और नदियों को एक ही पाले में क्यों रखा है ? जिन संस्कृतियों ने बेटियों की कद्र नहीं की उनको कुदरत ने नदियां भी तो नहीं दीं । जिन्होंने अपनी बेटियों का सम्मान नहीं किया उनके हिस्से नदियां भी तो मैली ही आईं । जहां जहां बेटियों के रास्ते रोक गए उन मुल्कों और संस्कृतियों के हिस्से की नदियां भी अपने महासागर तक कहां पहुंची और किसी खारे पानी की झील अथवा रेत में खुद को गर्क करती नज़र आईं ? वैसे अगर मेरी बात आपको भाषण जैसी न लगे तो आप एक प्रयोग करना । कोई नदी दिखे तो समझना किसी की बेटी है और कोई बेटी दिखे तो मन ही मन कहना देखो एक नदी जा रही है । इससे दोनो का भला होगा ।



: जहां जा रही है दुनिया / रवि अरोड़ा



मैने सन 1978 में एम एम एच कॉलेज में एडमिशन लिया था । पता चला कि कॉलेज में एक लड़का नशेड़ी है और स्मैक पीता है । घर वाले डर गए कि कहीं हमारा लड़का भी उसकी सोहबत में न पड़ जाए । यार दोस्तों के घर वालों की भी रातों की नींद उड़ी हुई थी । किसी तरह प्रिंसिपल तक शिकायत पहुंचाई गई और दबाव बनाकर उस लड़के को कॉलेज से निकलवाया गया । हालांकि उस दौरान कुछ ऐसे लड़के भी पहचान मे आए थे जो शराब पीते थे । बेशक तब शराबी ऐसे ही कुख्यात होते थे जैसे अब शराब न पीने वाले 

 मगर फिर भी उन्हें जैसे तैसे सभ्य समाज में जगह मिल ही जाती थी । सो वे बच गए । उधर, कुछ साल पहले बेटे को नोएडा की एक जानी मानी यूनिवर्सिटी में एडमिशन दिलवाया । अपने मां बाप की तरह मैंने भी बेटे से पूछा कि कालेज में कोई लड़का नशा तो नही करता ? बेटे ने हैरानी से मुझे देखा और बताया कि हर चौथा लड़का लड़की नशा करते हैं । बकौल उसके नशे का सामान खरीदने कहीं दूर भी नहीं जाना पड़ता और कालेज के गेट पर ही सब कुछ मिल जाता है । नोएडा ही नहीं मुंबई, पूना , बंगलुरु , चंडीगढ़ जैसे किसी बड़े शहर का नाम लो, सब जगह एक जैसी हालत है । 


फिल्म स्टार शाहरुख खान के बेटे के नशे से कनेक्शन और अडानी ग्रुप के मुंद्रा पोर्ट पर अब तक की सबसे बड़ी नशे की खेप के पकड़े जाने जैसी खबरों का आपस में कोई संबंध होता है या नही यह तो मुझे नहीं पता मगर इतना जरूर पता है कि ऐसी खबरों से अब कोई भूचाल नही आता । फिल्म स्टार और उनके बच्चे तो नशा करते ही हैं । पैसे वालों के बच्चे रेव पार्टियां नहीं करेंगे तो और कौन करेगा ? ज्यादा पैसा कमाने के लिए बड़े लोगों को सभी तरह के  दंद फंद करने ही पड़ते हैं , यह अब हम मान कर चलते हैं । जिनकी ऊपर तक पहुंच हो उनके पाप भी पाप नहीं होते , यह भी अब हमने स्वीकार कर लिया है । बेशक खबरें मिलें कि पंजाब जैसे कुछ राज्यों की राजनीति को ताकत नशे के कारोबार से मिलती है और वहां का हर तीसरा नौजवान नशा करता है मगर फिर भी अब यह कोई खबर नहीं है । एक जमाना था जब किसी बदमाश को जेल भेजने का कोई और तरीका न मिले तो पुलिस उसके पास स्मैक की पुड़िया दिखा देती थी मगर अब जब स्मैक ही कोई खास चीज नहीं रही तो पुलिस को भी अपने तरीके बदलने पड़े । 


दुनिया हमारे देखते देखते बदल गई । आधुनिक और सामाजिक व्यक्ति बनने के लिए आजकल जैसे शराब पीना जरूरी हो चला है , उसी तरह आने वाले वक्त में चरस, गांजा, अफीम , हेरोइन और कोकीन जैसे पदार्थों को स्वीकृति मिलती दिखाई पड़ रही है । गांजा को वैध करने को लेकर तो आजकल पूरी दुनिया में मुहीम चल रही है । कनाडा और अमेरिका के अधिकांश राज्यों के अलावा अनेक देशों में अब यह खुलेआम बिकता है ।  एमेजॉन जैसी दुनिया की बड़ी कंपनियां भी इसकी ऑन लाइन बिक्री की वकालत कर रही हैं । भारत पर भी कुछ ऐसा ही दबाव है । वाइस जैसे दुनिया के मशहूर न्यूज पोर्टल ने हाल ही में भारत में नशे के कारोबार का जो खुलासा किया है उससे भी गांजा समर्थकों को और बल मिला है । अफगानिस्तान पूरी दुनिया को नशा सप्लाई करता है और तालिबान की आर्थिक रीढ़ अफीम की  खेती ही है , यह जानते हुए भी तालीबानी सरकार को मान्यता देने को बड़े बड़े देश उतावले हो रहे हैं । क्या आपको अब भी कोई संदेह है कि दुनिया कहां जा रही है ?

  


मुंह किधर है / रवि अरोड़ा


आज सुबह व्हाट्स एप पर किसी ने मैसेज भेजा कि हिंदुओं बाबा का ढाबा तो तुमने प्रचार करके चला दिया । बंद हो रही गीता प्रेस के लिए ऐसा कुछ क्यों नहीं करते ?  याद आया कि साल भर पहले भी गीता प्रेस संबंधी ऐसे मैसेज खूब आए थे और फिर अचानक बंद भी हो गए । अर्से बाद फिर इन्हें शुरू किया गया है । अब ऐसे मैसेज कौन शुरू करता है और क्यों करता है , यह तो मुझे नही पता मगर इतना जरूर पता है कि कम से कम अभी कुछ दशक तक तो गीता प्रेस जैसी किसी संस्था को कोई खतरा नही है । आगे की ऊपर वाला जाने ।


बचपन में जब कभी रेलगाड़ी का सफर करने का मौका मिलता और ट्रेन के आने में अभी समय होता तो समय काटने के लिए बुक स्टॉल से बेहतर कोई जगह नहीं दिखती थी । तब भी सैंकड़ों किताबों के बीच गीता प्रेस की हिंदू दर्शन संबंधी किताबें दूर से ही नजर आती थीं । लोगों की रुचि कहिए अथवा इन किताबों की सस्ती कीमत , ये बिकती भी खूब थीं । बाद में भारतीय दर्शन में गहरी रुचि होने के कारण मैं भी गीता प्रेस की किताबें खरीदने लगा । यही नहीं एक बार गोरखपुर गया तो गीता प्रेस के परिसर में चक्कर भी लगा आया । जानकर हैरानी हुई थी कि गीता प्रेस लागत से भी आधी कीमत पर अपनी किताबें बेचती है और बावजूद इसके अब तक साठ करोड़ से अधिक किताबें बेच भी चुकी है । इनमें अकेले गीता की ही बारह करोड़ प्रतियां बिक चुकी हैं । आज भी यह प्रेस पचास हजार से अधिक किताबें रोज़ाना छापती है । वहां जाकर ही पता चला था कि सन 1923 में राजस्थान के एक सेठ जय दयाल गोयन्दका ने इसे शुरू किया था और यह प्रेस उन्हीं की नीति के अनुरूप न तो कोई विज्ञापन लेती है और वहां न ही कोई अनुदान स्वीकार किया जाता है । किताबों की छपाई में हुए नुकसान की भरपाई यह प्रेस अपने औषधालय और कपड़े के व्यापार से पूरा करती है । गीता प्रेस की किताबें पन्द्रह भाषाओं में छपती हैं और इसकी पत्रिका कल्याण के वार्षिक ग्राहक भी ढाई लाख से अधिक हैं । रोचक तथ्य यह है कि पिछली बार जब गीता प्रेस के बंद होने के समाचार सोशल मीडिया पर छाए तो खैरख्वाह लोगों ने बिना मांगे ही प्रेस के बैंक खाते में रुपए ट्रांसफर करने शुरू कर दिए । चूंकि अनुदान लेने की पॉलिसी गीता प्रेस की नहीं है अतः उसने तंग आकर एलान किया कि कृपया हमें पैसे न भेंजे । लोग बाग फिर भी नहीं माने तो प्रेस को अपना वह बैंक खाता ही ब्लॉक करना पड़ा ।


गीता प्रेस की किताबों के आप पक्षधर हों , यह जरूरी नहीं । उसकी सभी किताबें पठनीय हैं , ऐसा मैं भी नहीं मानता । पुरातन भारतीय परंपराओं को पुनर्जीवित करने के मोह में उसने बहुत कुछ कूड़ा भी छापा है । स्त्रियों के प्रति हेय नजरिए और मनुवादी सोच वाली ये किताबें आने वाले समय में गीता प्रेस के लिए अवश्य ही मुसीबत बनेंगी ।  सच कहूं तो गीता प्रेस ही नही ऐसी तमाम संस्थाएं एक खास किस्म के खतरे में हैं और यह खतरा है बुद्धिमता के विरोध यानि एंटी इंटेलेक्टुइज्म का । बेशक अब धर्म कर्म का दिखावा बढ़ा है मगर धर्म संबंधी ज्ञान खतरे में है । गूढ़ बातें किसी को नहीं सुहातीं । वैसे भी जब कलावा बांधने, टीका लगा लेने, जल चढ़ाने और मंगल वार को गुलदाने का प्रसाद बांटने भर से ही काम चल जाता हो तो वेद, पुराण उप निषादों में कौन दिमाग खपाये । सयाने कहते भी तो हैं कि गाड़ी जिस और जा रही हो , मुंह उधर करके बैठना चाहिए । अब यह तो सत्य है कि गाड़ी कम से कम उधर तो नहीं जा रही , जिधर गीता प्रेस वाले लोग ले जाना चाह रहे हैं ।



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