मंगलवार, 30 नवंबर 2021

गज़नबी औऱ चंदेल शाशक

 वह शासक जिसने महमूद गजनवी का दो दो बार सामना किया -


चंदेल शासक धंग के बाद उसका पगज़न्वीत्र विद्याधर (1019-1029 ईस्वी) शासक बना। वह चंदेल शासकों में सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। उसके शासन काल की घटनाओं का उल्लेख हमें तत्कालीन लेखों में मिलता है।


इस्लामिक लेखक विद्याधर का नंद तथा विदा नाम से भी उल्लेख करते हैं।


इब्न उल अतहर लिखता है कि उसके पास सबसे बड़ी सेना थी तथा उसके देश का नाम खजुराहो था।


1019 ईस्वी में महमूद ने कन्नौज के प्रतिहार शासक राज्यपाल के ऊपर आक्रमण किया। राज्यपाल ने डरकर बिना युद्ध किये ही आत्मसमर्पण कर दिया। जब विद्याधर को इस घटना का पता चला तो वह अत्यंत क्रुद्ध हुआ तथा उसने राज्यपाल को दंडित करने का निश्चय किया। इस्लामिक लेखक इब्न-उल-अतहर बताता है, कि विद्याधर ने कन्नौज पर आक्रमण किया तथा एक दीर्घकालीन युद्ध के बाद वहाँ के राजा राज्यपाल की इस कारण हत्या कर दी थी, कि वह महमूद के विरुद्ध भाग खड़ा हुआ तथा अपना, राज्य उन्हें समर्पित कर दिया था। इस विवरण की पुष्टि अभिलेखों से भी होती है।


ग्वालियर के कछवाहा नरेश चंदेलों के सामंत थे। इस वंश के विक्रम सिंह के दूबकुंड लेख (1088 ईस्वी) से पता लगता है, कि उसके एक पूर्वज अर्जुन ने विद्याधर की ओर से युद्ध करते हुये कन्नौज के राजा राज्यपाल को मार डाला था। चंदेल वंश का एक लेख महोबा से भी मिलता है, जिससे भी विद्याधर द्वारा राज्यपाल के मारे जाने की बात पुष्ट होती है।


राज्यपाल का वध करने से विद्याधर की ख्याति चारों ओर फैल गयी तथा वह उत्तर भारत का सार्वभौम सम्राट बन गया था। कन्नौज में विद्याधर ने अपनी ओर राज्यपाल के बेटे त्रिलोचनपाल को राजा बनाया तथा उसने विद्याधर की अधीनता स्वीकार की थी। अन्य हिन्दू राजाओं ने भी विद्याधर का लोहा मान लिया था। यह महमूद गजनवी को खुली चुनौती थी, जिसका सामना करने के लिये वह प्रस्तुत हुआ।


1019-20 ईस्वी में चंदेलों पर महमूद गजनवी का प्रथम आक्रमण हुआ था। इस्लामिक इतिहासकारों के अनुसार दोनों के बीच किसी नदी के किनारे भीषण युद्ध हुआ, किन्तु इस युद्ध का कोई परिणाम नहीं निकला था। इस युद्ध में विद्याधर ने राजनैतिक सूझ-बूझ का परिचय दिया तथा रात्रि के अंधकार में युद्ध-स्थल उपयुक्त न होने के कारण अपनी सेना को हटा लिया। महमूद गजनवी भी गजनी वापस लौट गया।


महमूद गजनवी ने 1022 ईस्वी में चंदेल शासक विद्याधर पर दूसरी बार आक्रमण किया था। सबसे पहले उसने ग्वालियर के दुर्ग का घेरा डाला, जो चार दिनों तक चलता रहा। अंत में दुर्गपाल ने 35 हाथियों की भेंट कर उससे पीछा छुड़वाया। उसके बाद उसने कालिंजर के दुर्ग का घेरा डाला। शक्ति तथा अभेद्यता में वह दुर्ग संपूर्ण हिन्दुस्तान में बेजोड़ था। ऐसा लगता है, कि महमूद दुर्ग को जीत नहीं सका तथा दोनों में संधि हो गयी। तथा महमूद गजनवी गजनी वापस चला गया। इसके बाद उसने चंदेल राज्य पर दुबारा आक्रमण नहीं किया तथा दोनों राज्यों में शांति बनी रही।


महमूद गजनवी के अलावा चंदेल शासक विद्याधर ने मालवा के परमार शासक भोज तथा कलचुरि शासक गांगेयदेव को भी पराजित किया था।


इस प्रकार हम कह सकते हैं, कि विद्याधर अपने समय का महान शासक था। उसके पितामह धंग ने जिस विशाल साम्राज्य का निर्माण किया था, विद्याधर ने अपने वीरतापूर्वक कृत्यों द्वारा उसे गौरवान्वित कर दिया।


डॉ. मजूमदार ने लिखा है कि विद्याधर ही ऐसा अकेला भारतीय नरेश था जिसे इस बात का गौरव प्राप्त है की उसने सुल्तान महमूद की विजय पिपासा प्रवृत्ति को दृढ़ता पूर्वक रोका और उस सहानुभूतिशून्य विजेता के द्वारा विवेकशून्य विनाश से अपने राज्य को बचा लिया। 1029 ई. में विद्याधर का देहान्त हो गया।


स्रोत - प्राचीन भारत का इतिहास तथा संस्कृति, लेखक- के.सी.श्रीवास्तव

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