गुरुवार, 30 अगस्त 2012

पेटागन पेपर्स vs विकीलीक्स और तकनीक




विकीलीक्स
विकीलीक्स के नए दस्तावेज़ों ने फिर से हंगामा खड़ा कर दिया है
विकीलीक्स पर दस्तावेज़ जारी किए जाने को 'आपराधिक कार्रवाई' बताकर उसकी निंदा की गई है लेकिन खोजी पत्रकारिता के भविष्ट के रुप में उसकी तारीफ़ भी उतनी ही की गई है.
लेकिन एक बड़ा सवाल यह है आख़िर अमरीकी के सैन्य दस्तावेज़ विकीलीक्स के पास पहुँचे कैसे?
अफ़ग़ानिस्तान के युद्ध के बारे में वर्ष 2004 से 2009 तक के क़रीब 90 हज़ार दस्तावेज़ विकीलीक्स पर जारी किए गए हैं लेकिन जनहित में मुखबिर का काम करने वाली यह वेबसाइट अपने किसी स्रोत की पहचान ज़ाहिर नहीं करेगा.
अमरीकी सेना के इतिहास में पहली बार इतनी जानकारियाँ सार्वजनिक हुई हैं लेकिन यह तय है कि यह जानने की उत्सुकता सिर्फ़ अमरीका को नहीं होगी कि आख़िर यह हुआ कैसे?

जाँच

अपनी तमाम जानकारियों को सार्वजनिक करने से पहले विकीलीक्स ने तीन अख़बारों को ये दस्तावेज़ उपलब्ध करवा दिए थे, न्यूयॉर्क टाइम्स, डेर स्पीजेल और द गार्डियन.
सूचनाएँ लीक करने वाले तो हर समय रहे हैं लेकिन तकनीक ने इसे बहुत आसान कर दिया है
जेम्स लुइस, साइबर सेक्युरिटी विशेषज्ञ
मीडिया ने इन दस्तावेज़ों के आधार पर तो ताबड़तोड़ ख़बरें प्रकाशित करना शुरु कर दिया लेकिन साथ में ये सवाल भी पूछे गए कि इन जानकारियों का स्रोत कौन है? क्या यह एक ही व्यक्ति है?
अमरीकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन ने इसकी जाँच शुरु कर दी है.
विकीलीक्स की नीति है कि वह अपने स्रोत के बारे में कोई जानकारी नहीं देती. न तो यह कि कितने लोगों से यह जानकारी मिली और न ये कि ये जानकारियाँ उन्हें कब मिलीं.
अभी तक मीडिया जो अनुमान लगा रहा है उसके अनुसार इसके पीछे 22 वर्षीय ब्रैडली मैनिंग है जो सेना के लिए ख़ुफ़िया सामग्री का विश्लेषण करते रहे हैं और उन पर गोपनीय दस्तावेज़ों के साथ छेड़छाड़ करने और उन्हें लीक करने का आरोप है.
उन्हें इराक़ में काम करने के दौरान गिरफ़्तार किया गया था और इस समय वे क़ुवैत के बंदी गृह में हैं.
उन पर अमरीका के फ़ौजदारी क़ानून के तहत आठ और सैन्य क़ानून के तहत चार मामले दर्ज किए गए हैं.
स्पेशलिस्ट मैनिंग पर आरोप हैं कि उन्होंने कथित रुप से रक्षा मंत्रालय के सीक्रेट इंटरनेट प्रोटोकॉल सिस्टम (एसआईपीआर) में रखी गई जानकारियाँ लीक कीं.
लेकिन विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज कहते हैं, "जहाँ तक हमारी जानकारी में है इनमें से कोई भी सूचना स्पेशलिस्ट मैनिंग के ज़रिए प्राप्त नहीं हुई हैं."

टेक्नॉलॉजी की भूमिका

चाहे जो भी हो, क्या एक व्यक्ति के लिए यह संभव था कि वह इतनी जानकारियाँ लीक कर सके, अगर नहीं तो वो कौन लोग थे जिन्होंने ये जानकारियाँ लीक कीं.
विकीलीक्स
विकीलीक्स ने हर जानकारी को घर-घर तक पहुँचा दिया है
लेकिन महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि यह किसने किया बल्कि अहम यह है कि यह कैसे किया गया.
इन दस्तावेज़ों के लीक होने में सबसे बड़ी भूमिका टेक्नॉलॉजी या तकनीक की है.
अगर बीस साल पहले से तुलना करके देखें तो आज ऐसा कुछ करना न केवल कठिन हो गया है बल्कि यह ख़तरों से भी भरा हुआ है.
जैसा कि विकीलीक्स ने भी कहा है, "इंटरनेट और क्रिप्टोग्राफ़ी जैसी तकनीकी विकास के साथ यह संभव हो गया है कि अब किसी महत्वपूर्ण दस्तावेज़ के लीक होने के ख़तरे को कम किया जा सके."
वर्ष 2006 में शुरु की गई इस वेबसाइट पर इस समय दस लाख से ज़्यादा दस्तावेज़ मौजूद हैं.
इसे दुनिया का पहला समाचार संस्थान कहा गया है जो किसी देश का नहीं है. विकीलीक्स के सर्वर स्वीडन और बेल्ज़ियम जैसे देशों में हैं क्योंकि वहाँ के प्रेस गोपनीयता क़ानून के तहत उसे सुरक्षा की गारंटी मिलती है.
इस वेबसाइट को शुरु करने के पीछे उद्देश्य था पारदर्शिता को बढ़ावा देना. इस बेससाइट पर कोई भी व्यक्ति कुछ भी सामग्री अपलोड कर सकता है. इन सामग्रियों की कुछ कार्यकर्ता जाँच करते हैं फिर इसे वेबसाइट पर प्रकाशित किया जाता है. ये सभी कार्यकर्ता पत्रकार हैं.
विकीलीक्स यह सुनिश्चित करती है कि यह जानकारी किसी को न मिल सके कि पीडीएफ़ फ़ाइल्स, वर्ड डॉक्युमेंट, स्कैनर और प्रिंटर का स्रोत क्या था जिससे कि सूचनाएँ भेजने वाले व्यक्ति की पहचान छिपी रह सके.

भविष्य का रास्ता

जूलियन असांज
जूलियन असांज ने अपने तकनीकी कौशल से अपने स्रोत की गोपनीयता सुनिश्चित की है
विकीलीक्स के काम करने का तरीक़ा भविष्य की पत्रकारिता और पारदर्शिता को रेखांकित करता है.
जानकारियाँ मिलने के बाद वेबसाइट कुछ अख़बारों से तालमेल करता है जिससे कि इस जानकारी को अधिकतम लोगों तक पहुँचाया जा सके.
इस बात पर क्या आश्चर्य कि विकीलीक्स ने कई दुश्मन भी पैदा कर लिए हैं और इनमें से कई चाहते होंगे कि विकीलीक्स न होता तो बेहतर था.
उदाहरण के तौर पर विकीलीक्स पर जारी एक दस्तावेज़ में अमरीकी सेना के ख़ुफ़िया विभाग ने कहा है कि किस तरह से विकीलीक्स देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा है और इसे किस तरह से नियंत्रित किया जा सकता है.
साइबर सेक्युरिटी विशेषज्ञ जेम्स लुइस कहते हैं कि अफ़ग़ान युद्ध पर जारी गए ये दस्तावेज़ 1971 में वियतनाम युद्ध पर जारी हुए पेंटागन पेपर्स की याद दिलाते हैं.
लेकिन वे कहते हैं कि इसमें एक अंतर यह है कि उस समय कुछ कागज़ात पत्रकारों को दिए गए थे लेकिन अब आप कहीं अधिक दस्तावेज़ देख सकते हैं और उसे पूरी दुनिया को अवगत करवा सकते हैं.
उनका कहना है, "सूचनाएँ लीक करने वाले तो हर समय रहे हैं लेकिन तकनीक ने इसे बहुत आसान कर दिया है."
जूलियन असांज कहते हैं कि हिम्मत से हिम्मत बढ़ती है और वे मानते हैं कि सोमवार को जो दस्तावेज़ जारी किए गए हैं, उससे और अधिक विसिल ब्लोअर्स या सूचनाएँ देने वाले लोग सामने आएँगे.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें