शनिवार, 25 अगस्त 2012

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना और उनकी पत्रकारिता / संजय द्विवेदी



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हिंदी पत्रकारिता ऐतिहासिक सम-सामयिक परिदृश्य

पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी ने एक स्थान पर लिखा है कि पत्रकारिता को युगों की अवधि में ठीक-ठीक निश्चित करना कोई आसान काम नहीं है । एक युग दूसरे युग से मिलजुल जाता है । की पत्र एक युग में आरंभ होता है, दूसरे युग में उसका यौवन प्रस्फुटित होता है और संभवतः तीसरे युग में उसका अंत भी हो जाता है

वास्तव में हिंदी पत्रकारिता का तार्किक और वैज्ञानिक आधार पर काल विभाजन करना कुछ कठिन कार्य है । सर्वप्रथम राधाकृष्ण दास ने ऐसा प्रारंभिक प्रयास किया था । उसके बाद विशाल भारतके नवंबर 1930 के अंक में विष्णुदत्त शुक्ल ने इस प्रश्न पर विचार किया, किन्तु वे किसी अंतिम निर्णय पर नहीं पहुंचे । गुप्त निबंधावली में बालमुकुंद गुप्त ने यह विभाजन इस प्रकार किया

प्रथम चरण सन् 1845 से 1877
द्वितीय चरण सन् 1877 से 1890
त्तीय चरण सन् 1890 से बाद

डॉ. रामरतन भटनागर ने अपने शोध प्रबंध द राइज एंड ग्रोथ आफ हिंदी जर्नलिज्मकाल विभाजन इस प्रकार किया है

1.
आरंभिक युग 1826 से 1867
2.
उत्थान एवं अभिवृद्धि
प्रथम चरण (1867-1883) भाषा एवं स्वरूप के समेकन का युग
द्वितीय चरण (1883-1900) प्रेस के प्रचार का युग

3.
विकास युग
प्रथम युग (1900-1921) आवधिक पत्रों का युग
द्वितीय युग (1921-1935) दैनिक प्रचार का युग

4.
सामयिक पत्रकारिता – 1935-1945
उपरोक्त में से तीन युगों के आरंभिक वर्षों में तीन प्रमुख पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ, जिन्होंने युगीन पत्रकारिता के समक्ष आदर्श स्थापित किए । सन् 1867 में कविवचन सुधा’, सन् 1883 में हिन्दुस्तानतथा सन् 1900 मेंसरस्वतीका प्रकाशन है ।

काशी नागरी प्रचारणी द्वारा प्रकाशितहिंदी साहित्य के वृहत इतिहासके त्रयोदय भाग के तृतीय खंड में यह काल विभाजन इस प्रकार किया गया है

प्रथम उत्थान सन् 1826 से 1867
द्वितीय उत्थान सन् 1868 से 1920
आधुनिक उत्थान सन् 1920 के बाद

ए हिस्ट्री आफ द प्रेस इन इंडियामें श्री एस नटराजन ने पत्रकारिता का अध्ययन निम्न प्रमुख बिंदुओं के आधार पर किया है

1.
बीज वपन काल
2.
ब्रिटिश विचारधारा का प्रभाव
3.
राष्ट्रीय जागरण काल
4.
लोकतंत्र और प्रेस

डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र ने हिंदी पत्रकारिताका अध्ययन करने की सुविधा की दृष्टि से यह विभाजन मोटे रूप से इस प्रकार किया है

1.
भारतीय नवजागरण और हिंदी पत्रकारिता का उदय (सन् 1826 से 1867)
2.
राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रगति- दूसरे दौर की हिंदी पत्रकारिता (सन् 1867-1900)
3.
बीसवीं शताब्दी का आरंभ और हिंदी पत्रकारिता का तीसरा दौर इस काल खण्ड का अध्ययन करते समय उन्होंने इसे तिलक युग तथा गांधी युग में भी विभक्त किया ।

डॉ. रामचन्द्र तिवारी ने अपनी पुस्तक पत्रकारिता के विविध रूपमें विभाजन के प्रश्न पर विचार करते हुए यह विभाजन किया है

1.
उदय काल – (सन् 1826 से 1867)
2.
भारतेंदु युग – (सन् 1867 से 1900)
3.
तिलक या द्विवेदी युग – (सन् 1900 से 1920)
4.
गांधी युग – (सन् 1920 से 1947)
5.
स्वातंत्र्योत्तर युग (सन् 1947 से अब तक)

डॉ. सुशील जोशी ने काल विभाजन कुछ ऐसा प्रस्तुत किया है
1.
हिंदी पत्रकारिता का उद्भव – 1826 से 1867
2.
हिंदी पत्रकारिता का विकास – 1867 से 1900
3.
हिंदी पत्रकारिता का उत्थान – 1900 से 1947
4.
स्वातंत्र्योत्तर पत्रकारिता – 1947 से अब तक

उक्त मतों की समीक्षा करने पर स्पष्ट होता है कि हिंदी पत्रकारिता का काल विभाजन विभिन्न विद्वानों पत्रकारों ने अपनी-अपनी सुविधा से अलग-अलग ढंग से किया है । इस संबंध में सर्वसम्मत काल निर्धारण अभी नहीं किया जा सका है । किसी ने व्यक्ति विशेष के नाम से युग का नामकरण करने का प्रयास किया है तो किसी ने परिस्थिति अथवा प्रकृति के आधार पर । इनमें एकरूपता का अभाव है । अध्ययन की सुविदा के लिए हमने डॉ. सुशीला जोशी द्वारा किए गए काल विभाजन के आधार पर विश्लेषण किया है (जो अग्रलिखित पृष्ठों पर है)

उद्भव काल

हिंदी पत्रकारिता का उद्भव काल (1826 से 1867)

कलकत्ता से 30 मई, 1826 को उदन्त मार्तण्डके सम्पादन से प्रारंभ हिंदी पत्रकारिता की विकास यात्रा कहीं थमी और कहीं ठहरी नहीं है । पंडित युगल किशोर शुक्ल के संपादन में प्रकाशित इस समाचार पत्र ने हालांकि आर्थिक अभावों के कारण जल्द ही दम तोड़ दिया, पर इसने हिंदी अखबारों के प्रकाशन का जो शुभारंभ किया वह कारवां निरंतर आगे बढ़ा है । साथ ही हिंदी का प्रथम पत्र होने के बावजूद यह भाषा, विचार एवं प्रस्तुति के लिहाज से महत्वपूर्ण बन गया ।

पत्रकारिता जगत में कलकत्ता का बड़ा महत्वपूर्ण योगदान रहा है । प्रशासनिक, वाणिज्य तथा शैक्षिक दृष्टि से कलकत्ता का उन दिनों विशेष महत्व था । यहीं से 10 मई 1829 को राजा राममोहन राय ने बंगदूतसमाचार पत्र निकाला जो बंगला, फारसी, अंग्रेजी तथा हिंदी में प्रकाशित हुआ । बंगला पत्र समाचार दर्पणके 21 जून 1834 के अंक प्रजामित्रनामक हिंदी पत्र के कलकत्ता से प्रकाशित होने की सूचना मिलती है । लेकिन अपने शोध ग्रंथ में डॉ. रामरतन भटनागर ने उसके प्रकाशन को संदिग्ध माना है ।बंगदूदतके बंद होने के बाद 15 सालों तक हिंदी में कोई पत्र न निकला ।

बनारस अखबार वं सुधाकर

उत्तर-प्रदेश से गोविन्द नारायण थत्ते के सम्पादन में जनवरी, 1845 में बनारस अखबारका प्रकाशनन आरंभ हुआ । इसके संचालक राजा शिव प्रसाद सितारेहिन्द थे । बहुत से लोग इसे ही हिंदी का पहला अखबार मानते हैं, परंतु यह हिंदी भाषी क्षेत्र का प्रथम समाचार पत्र माना जा सकता है । इसमें देवनागरी लिपि के प्रयोग के बावजूद अरबी व फारसी के शब्दों की भरमार थी, जिसे समझना साधारण जनता के लिए कठिन था। पंडित अंबिका प्रसाद वाजेपयी लिखतेहैं – ‘बनारस अखबार की निकम्मी भाषा का उत्तरदायित्व यदि किसी एक पुरुष पर है तो वे राजा शिव प्रसाद सिंह हैं ।

1850
में बनारस से ही तारा मोहन मैत्रेय के संपादन में सुधाकरपत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ । यह पत्र साप्ताहिक था तथा बंगला एवं हिंदी दोनों में प्रकाशित होता था । भाषा की दृष्टि से सुधाकरको हिंदी प्रदेश का पहला पत्र कहना चाहिए । 1853 में यह पत्र सिर्फ हिंदी में छपने लगा।

बनारस अखबारएवं सुधाकरके बाद मार्तण्ड’ (11 जून, 1846), ज्ञान दीपक (1846), मालवा अखबार (1894), जगदीपक भास्कर (1849), सामदण्ड मार्तण्ड (1850), फूलों का हार (1850), बुद्धिप्रकाश (1852), मजहरुल सरुर (1852), ग्वालियर गजट (1853), आदि पत्र निकले । मुंशी सदासुखलाल के संपादन में आगरा से बुद्धि प्रकाश नामक यह पत्र पत्रकारिता के दृष्टि से ही नहीं वरन भाषा व शैली की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है । प्रख्यात समालोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उसकी भाषा की प्रशंसा करते हुए लिखा है – “बुद्धि प्रकाश की भाषा उस समय की भाषा को देखते हुए बहुत अच्छी होती थी ।

समाचार सुधावर्षण

अब धीरे-धीरे हिंदी पत्रों की संख्या बढ़ने लगी । लोगों की दृष्टि पत्रकारिता की ओर उन्मुख हुई । सन् 1854 में कलकत्ता से श्यामसुंदर सेन के संपादन में हिंदी के पहले दैनिक समाचार पत्र समाचार सुधावर्षणका प्रकाशन हुआ । यह द्विभाषीय पत्र था, तथा हिंदी व बंगला में छपता था । अपनी निर्भीकता एवं प्रगतिशीलता के कारण उसे कई बार अंग्रेजी सरकार का कोपभाजन भी बनना पड़ा ।

1855
में सर्वहितकारक’ (आगरा) और प्रजा हितैषीका प्रकाशन हुआ । 1857 में एकमात्र पत्र निकला जिसका नाम पयामे आजादीथा ।

पयामे आजादी

दिल्ली से फरवरी 1857 में प्रकाशित पयामे आजादी का प्रकाशन प्रसिद्ध क्रान्तिकारी अजीमुल्ला खां ने किया था । इसके प्रकाशक एवं मुद्रक नवाब बहादुर शाह जफर पौत्र केदार बख्त थे । यह पत्र पहले उर्दू में निकला, बाद में हिंदी में भी इसका प्रकाशन हुआ । इस पत्र में सरकार विरोधी सामग्री होती थी । इस पत्र ने दिल्ली की जनता में स्वतंत्रता प्रेम की आग फूंक दी । इसी पत्र में भारत का तत्कालीन राष्ट्रीय गीत छपा था, उसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार थीं

हम हैं इसके मालिक, हिंदुस्तान हमारा ।
पाक वतन है कौम का जन्नत से भी प्यारा ।।
आज शहीदों ने तुझको, अहले वतन ललकारा ।
तोड़ो गुलामी की जंजीरें, बरसाओ अंगारा ।।

1861
में हिंदी प्रदेश से चार पत्र निकले जिनमें सूरज प्रकाश’ (आगरा), ‘जगलाभ चिंतक’ (अजमेर), ‘प्रजाहित’ (इटावा), ‘ज्ञानदीपक’ (सिकंदरा) शामिल थे । इसके पश्चात 1863 में लोकमित्र’ (मासिक), ‘भारत खंडामृत’ (1864 – आगरा), ‘तत्वबोधिनी’ (1866 – बरेली), ‘ज्ञान प्रदायिनी पत्रिका’ (1866 – लाहौर), आदि पत्र प्रकाशित हुए । अब तक हिंदी में छपने वाले पत्रों की संख्या पर्याप्त हो चली थी, पर पाठकाभाव, अर्थाभाव के चलते ये जल्द ही काल-कवलित हो जाते थे । 1867 में कवि वचन सुधाका प्रकाशन एक क्रांतिकारी घटना थी । भारतेंदु हरीश चंद्र के संपादन में प्रकाशित इस पत्र ने हिंदी साहित्य व पत्रकारिता को नए आयाम दिए । डॉ. रामविलास शर्मा लिखते हैं – “कवि वचन सुधा क प्रकाशन कर भारतेंदु ने एक नए युग का सूत्रपात किया ।” 1867 मेंकवि वचन सुधाके अलावा वृतान्त विलास’ (जम्मू), ‘सर्वजनोपकारक’ (आगरा), रतन प्रकाश (रतलाम), विद्याविलास (जम्मू) का प्रकाशन हुआ ।

कास काल

हिंदी पत्रकारिता का विकास काल (1867-1900)

1867
तक विदेशी शिक्षा के कारण परम्परावादी विचारधारा का लोप हो रहा था, अतः अनेक समाज सुधारकों ने अपनी संस्थाएं कायम की और इसी शिक्षित वर्ग ने पत्रकारिता को नई दिशा प्रदान की । हिंदी पत्रकारिता का यह युग हिंदी गद्य-निर्माण का युग माना जाता है । इस युग के पत्रों में राजनीति, साहित्य, प्रहसन, व्यंग्य तथा ललित निबन्धों की संख्या अधिक रहती थी । इन पत्रों का एकमात्र उद्देश्य सामाजिक, कलुष प्रक्षालन और जातीय उन्नयन था । इस युग का नेतृत्व बाबू हरिशचन्द्र कर रहे थे । यह समय अंग्रेज अधिकारियों की गुलामी का था, परन्तु भारतेंदु जी निडर भाव से राजनैतिक लेख लिखकर जनता-जनार्दन को झकझोर रहे थे । यही कारण है कि यह युग भारतेंदु युग के नाम से भी प्रसिद्ध है । इस युग में अनेक महत्वपूर्ण पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ ।

हरिश्चन्द्र मैगजीन
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अक्टूबर, 1873 को काशी से भारतेंदु हरिश चन्द्र ने ही हरिश्चन्द्र मैगजीनको जन्म दिया । यह मासिक पत्रिका थी । इसमें पुरातत्व, उपन्यास, कविता, आलोचना, ऐतिहासिक, राजनीतिक, साहित्यिक तथा दार्शनिक लेख, कहानियाँ एवं व्यंग्य आदि प्रकाशित होते थे । लेकिन जब इसमें देशभक्तिपूर्ण लेख निकलने लगे तो इसे बंद कर दिया गया ।

बाला-बोधिनी पत्रिका’ 9 जनवरी, 1874 को भारतेंदु ने निकाली । यह पत्रिका महिलाओं की मासिक पत्रिका थी ।

हिंदी प्रदीप
1
सितम्बर, 1877 को बालकृष्ण भट्ट ने हिंदी प्रदीपनाम का मासिक पत्र निकाला । यह पत्र घोर संकट के बावजूद भी 35 वर्षों तक निकलता रहा । भारतेंदु जी ने इस पत्र का उद्घाटन किया । पत्रकारिता की दृष्टि से हींदी प्रदीप का जन्म हिंदी साहित्य के इतिहास में क्रांतिकारी घटना है । इसने हिंदी पत्रकारिता को एक नई दिशा प्रदान की । इसका स्वर राष्ट्रीयता, निर्भीकता तथा तेजस्विता का था, अतः सरकार इर पर कड़ी नजर रखती थी । इसमे हिंदी साहित्य और पत्रकारिता पर सामग्री रहती थी ।

भारत मित्र -
17
मई, 1878 को कलकत्त से यह पत्र प्रकाशित हुआ । जिस समय यह पत्र प्रकाशित हुआ, उस समय वहां से हिंदी का कोई भी पत्र नहीं निकलता था । यह बड़ा प्रसिद्ध और कर्मशील पत्र था । भारत मित्र के कुशल संपादन के कारण इसकी गणना अच्छे पत्रों में होने लगी थी । भारत मित्र की सबसे पहले वैतनिक संपादक पंडित हरमुकुन्द शास्त्री लाहौर से बुलाए गए । इस पत्र की आयु काफी रही । यह पत्र 37 वर्षों तक चला ।

सार सुधानिधि
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अप्रैल, 1879 को प्रकाशित सार सुधानिधि पंडित सदानन्दजी के सम्पादन में निकला । इसके संयुक्त संपादक पंडित दुर्गाप्रसाद, सहायक संपादक गोविन्द नारायण और व्यवस्थापक शम्भूनाथ थे । इसकी भाषा संस्कृत मिश्रित थी, अतः कुछ कठिन होती थी, पर साफ थी । लेख अच्छे गंभीर होते थे । यह पत्र राजनीति ही नहीं, अन्य विषयों का भी आलोचक था । यह पत्र राजनीति ही नहीं, अन्य विषयों का भी आलोचक था ।

सज्जन कीर्ति सुधाकर
ज्यों से निकलने वाला पहला हिंदी पत्र था, क्योंकि राज्यों के सभी पत्र उर्दू व हिंदी में निकलते थे, जिनमें उर्दू का ही प्रथम स्थान होता था । मेवाड़ के महाराणा सज्जनसिंह के नाम पर यह पत्र निकला था, यह पत्र 1879 में आगरा के पंडित बंशीधर वाजपेयी के सम्पादन में प्रकाशित हुआ ।

उचित वक्ता
पंडित दुर्गाप्रसाद मिश्र ने 7 अगस्त, 1880 को उचित वक्ता को जन्म दिया । मीठी-मीठी कटारी मारने, व्यंग्य, मुंह चिढ़ाने में उचित वक्ता पंच का काम करता था । यह पत्र 15 वर्षों तक प्रकाशित हुआ । इसने इल्बर्ट बिल, प्रेस कानून, वर्नाक्यूलर एक्ट का बड़ी निर्भीकता से विरोध किया ।

भारत जीवन
बाबू रामकृष्ण वर्मा ने काशी से 3 मार्च 1884 को भारत जीवन प्रकाशित किया । यह पहले चार पृष्ठ का था, बाद में 8 पृष्ठों में छपने लगा । इसका वार्षिक मूल्य डेढ़ रुपया था । यह पत्र 30 वर्षों तक प्रकाशित हुआ । भारत जीवन सदा एक दब्बू अखबार रहा । स्वाधीनता पूर्व साहस से इसने कभी नहीं लिखा ।

हिन्दोस्थान
1885
में राजा रामपाल सिंह लन्दन से इसे कालाकांकर (प्रतापगढ़) ले आए और यहां इसके हिंदी, अंग्रेज संस्करण प्रकाशित होने लगे । यह उत्तर प्रदेश से महामना पंडित मदनमोहन मालवीय के संपादन में निकला । यह हिंदी क्षेत्र से प्रकाशित होने वाला प्रथम संपूर्ण हिंदी दैनिक पत्र था । इसके सहयोगी नवरतन प्रसिद्ध थे ।

शुभचिन्तक
1887
में जबलपुर से पंडित रामगुलाम अवस्थी के समपादन में शुभ-चिन्तक पत्र निकला । यह पत्र साप्ताहिक था । बाद में इसके संपादक हितकारिणी स्कूल के हैटमास्टर रायसाहब रघुवरप्रसाद द्विवेदी हो गए ।

हिंदी बंगवासी
हिंदी बंगवासी 1890 में कलकत्ता से पंडित अमृतलाल चक्रवर्ती के सम्पादन में निकला । यह एकदम नए ढंग का अखबार था । इस पत्र का अपना ऐतिहासिक महत्व है, क्योंकि सभी श्रेष्ठ पत्रकारों ने इसका सम्पादन कार्य किया था । जिनमें सर्वश्री बालमुकुन्द गुप्त, बाबूराव विष्णु पराड़कर, अम्बिका प्रसाद वाजपेयी, लक्ष्मीनारायण गर्दे आदि प्रमुख थे । यह पत्र दीर्घजीवी रहा । इस प्रकार यह पत्र हिंदी के वरिष्ठ पत्रकारों का प्राथमिक विद्यालय सिद्ध हुआ

साहित्य सुधानिधि
हिंदी बंगवासी के बाद मुजफ्फरपुर से जनवरी 1893 को बाबू देवकीनन्दन खत्री ने साहित्य सुधानिधि का प्रकाशन किया । इसके सम्पादक मण्डल में बड़े-बड़े साहित्यकार बाबू जगन्नाथदास रत्नाकर, बाबू राधाराम, राय कृष्णदास, बाबू कीर्तिप्रसाद धे ।

नागरी प्रचारिणी पत्रिका
यह पत्रिका 1896 में नागरी प्रचारिणी सभा ने त्रैमासिक रूप में प्रकाशित की थी । इसके सम्पाक बाबू श्यामसुन्दर दास, महामहोपाध्याय सुधाकर द्विवेदी, कालीदास और राधाकृष्ण दास थे । 1907 में यह मासिक पत्रिका हो गई और इसके सम्पादक श्यामसुन्दर दास, रामचन्द्र शुक्ल, रामचन्द्र शर्मा और वेणीप्रसाद बनाए गए ।

उत्थान काल

हिंदी पत्रकारिता का उत्थान काल (1900-1947)

सरस्वती
सन 1900 का वर्ष हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में महत्वपूर्ण है । 1900 में प्रकाशित सरस्वती पत्रिका अपने समय की युगान्तरकारी पत्रिका रही है । वह अपनी छपाई, सफाई, कागज और चित्रों के कारण शीघ्र ही लोकप्रिय हो गई । इसे बंगाली बाबू चिन्तामणि घोष ने प्रकाशित किया था तथा इसे नागरी प्रचारिणी सभा का अनुमोदन प्राप्त था । इसके सम्पादक मण्डल में बाबू राधाकृष्ण दास, बाबू कार्तिका प्रसाद खत्री, जगन्नाथदास रत्नाकर, किशोरीदास गोस्वामी तथा बाबू श्यामसुन्दरदास थे । 1903 में इसके सम्पादन का भार आचार्य महावर प्रसाद द्विवेदी पर पड़ा । इसका मुख्य उद्देश्य हिंदी-रसिकों के मनोरंजन के साथ भाषा के सरस्वती भण्डार की अंगपुष्टि, वृद्धि और पूर्ति करन था ।

इस प्रकार 19वी शताब्दी में हिंदी पत्रकारिता का उद्भव व विकास बड़ी ही विषम परिस्थिति में हुआ । इस समय जो भी पत्र-पत्रिकाएं निकलती उनके सामने अनेक बाधाएं आ जातीं, लेकिन इन बाधाओं से टक्कर लेती हुई हिंदी पत्रकारिता शनैः-शनैः गति पाती गई ।

हिंदी पत्रकारिता का उत्कर्ष काल

हिंदी पत्रकारिता का उत्कर्ष काल (1947 से प्रारंभ)

अपने क्रमिक विकास में हिंदी पत्रकारिता के उत्कर्ष का समय आजादी के बाद आया । 1947 में देश को आजादी मिली । लोगों में नई उत्सुकता का संचार हुआ । औद्योगिक विकास के साथ-साथ मुद्रण कला भी विकसित हुई । जिससे पत्रों का संगठन पक्ष सुदृढ़ हुआ । रूप-विन्यास में भी सुरूचि दिखाई देने लगी ।

आजादी के बाद पत्रकारिता के क्षेत्र में अपूर्व उन्नति होने पर भी यह दुख का विषय है कि आज हिंदी पत्रकारिता विकृतियों से घिरकर स्वार्थसिद्धि और प्रचार का माध्यम बनती जा रही है । परन्तु फिर भी यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि भारतीय प्रेस की प्रगति स्वतंत्रता के बाद ही हुई ।

यद्यपि स्वातंत्र्योत्तर पत्रकारिता ने पर्याप्त प्रगति कर ली है किन्तु उसके उत्कर्षकारी विकास के मार्ग में आने वाली बाधाएं भी कम नहीं हैं । पत्रकारिता एक निष्ठापूर्ण कर्म है और पत्रकार एक दायित्वशील व्यक्ति होता है । अतः यदि हमें स्वच्छ पत्रकारिता को विकसित करना है तो पत्रकारिता के क्षेत्र में हुई अनधिकृत घुसपैठ को समाप्त करना होगा, उसे जीवन मूल्यों से जोड़ना होगा, उसे आचरणिक कर्मों का प्रतीक बनाना होगा और प्रचारवादी मूल्यों को पीछे धकेल कर पत्रकारिता को जीवन, समाज, संस्कृति और कला का स्वच्छ दर्पण बनाना होगा, पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत व्यक्तियों को अतीत से शिक्षा लेकर वर्तमान को समेटते हुए भविष्य का दिशानिर्देशन भी करना चाहिए ।

स्वतंत्रता प्राप्ति के आसपास यानी दो-चार वर्ष आगे-पीछे कई दैनिक, साप्ताहिक पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ । जिसमें कुच तो निरंतर प्रगति कर रही हैं तथा कुछ बंद हो गई हैं ।

प्रमुख पत्रों में नवभारत टाइम्स (1947), हिन्दुस्तान (1936), नवभारत (1938), नई दुनिया (1947), आर्यावर्त (1941), आज (1920), इंदौर समाचार (1946), जागरण (1947), स्वतंत्र भारत (1947), युगधर्म (1951), सन्मार्ग (1951), वीर-अर्जुन (1954), पंजाब केसरी (1964), दैनिक ट्रिब्यून, राजस्थान पत्रिका (1956), अमर उजाल (1948), दैनिक भास्कर (1958), तरूण भारत (1974), नवजीवन (1974), स्वदेश (1966), देशबंधु (1956), जनसत्ता 1903), रांची एक्सप्रेस, प्रभात खबर आदि शामिल हैं ।

इसमें तरूण भारत और युगधर्म का प्रकाशन बंद हो चुका है । शेष निरन्तर प्रगति कर रहे हैं । साप्ताहिक पत्रों में ब्लिट्ज (1962), पाञ्चजन्य (1947), करंट, चौथी दुनिया (1986), संडे मेल (1987), संडे आब्जर्वर (1947), दिनमान टाइम्स (1990) प्रमुख रहे । इनमें से पाञ्चजन्य के अलावा सभी बंद हो चुके हैं ।

प्रमुख पत्रिकाओं में धर्मयुग (1950), साप्ताहिक हिन्दुस्तान (1950), दिनमान (1964), रविवार (1977), अवकाश 1982), खेल भारती (1982), कल्याण (1926), माधुरी (1964), पराग (1960), कादम्बिनी (1960), नन्दन (1964), सारिका (1970), चन्दामा (1949), नवनीत (1952), सरिता (1964), मनोहर कहानियां (1939), मनोरमा (1924), गृहशोभा, वामा, गंगा (1985), इंडिया टुडे (1986), माया हैं । इनमें से दिनमान, रविवार, अवकाश, पराग, गंगा, माधुरी अब बंद हो चुकी हैं । इनमें से दिनमान ने नई प्रवृत्तियां प्रारंभ की थी । अतिथि सम्पादक की परम्परा प्रारम्भ की, जिसमें कई राजनेता, साहित्यकार व कलाप्रेमी अतिथि सम्पादक बने । वहीं रविवार खोजपूर्ण रिपोर्टिंग के लिए विख्यात रहा है ।

समसामयिक पत्रकारिता का परिदृश्य



अखबार की दुनिया इन दिनों कासी बेचैन है । बाजार के दबाव और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच उलझी अखबारी दुनिया नए रास्तों की तलाश में है । तकनीक की क्रांति, अखबारों का पढ़ता प्रसार, संचार के साधनों की गति ने इस समूची दुनिया को जहां एक स्वप्नलोक में तब्दील कर दिया है वहीं पाठकों से उसकी रिश्तेदारी को व्याख्यायित करने की आवाजें भी उठने लगी हैं ।

ज्यादा पृष्ठ और ज्यादा सामग्री देकर भी आज अखबार अपने पाठक से जीवंत रिश्ता जोड़ने में स्वयं को क्यों असफल पा रहे हैं, यह भी मीडियाकर्मियों के सामने एक बड़ा सवाल है । क्या बात है कि पहले पाठक को अपने खास अखबार की आदत लग जाती थी । वह उसकी भाषा, प्रस्तुति और संदेश से एक भावनात्मक जुड़ाव महसूस करता था, अब वह आसानी से अपना अखबार बदल लेता है । हिंदी क्षेत्र में समाचार पत्र विक्रेता मनचारा अखबार दे देते हैं और अब उसका पाठक किसी खास अखबार की तरफदारी में खड़ा नहीं होता । क्या हिंदी क्षेत्र के अखबार अपनी पहचान ख रहे हैं ? क्या उनकी अपनी विशिष्टता का लोप हो रहा है ? जाहिर है पाठक को सारे अखबार एक से दिखने लगे हैं । जनसत्ता जैसे प्रयोग भी अपनी आभा खो रहे हैं । बात सिर्फ यहीं तक नहीं है, हिंदी क्षेत्र में पत्रकारिता आज भी मिशन और प्रोफेशन की अर्थहीन बहस के द्वन्द से उबरकर कोई मानक नहीं गढ़ पा रही है । जबकि बदलती दुनिया के मद्देनजर ऐसी बहसें अप्रासंगिक और बेमानी हो उठी हैं ।

आज अखबार के प्रकाशन में लगने वाली भारी पूंजी के चलते इसने उद्योग का रूप ले लिया है । ऐसे में उसमें लगने वाला पैसा किस प्रकार मिशनरी संकल्पों का वाहक बन सकता है ? यह तंत्र अब सीधा अखबार प्रकाशक के हित लाभ से जुड़ गया है । करोड़ों की पूंजी लगाकर बैठे किसी अखबार मालिक से धर्मदा कार्य की अपेक्षा नहीं पालनी चाहिए । व्यवसायीकरण का यह दौर पत्रकारिता के सामने चुनौती जरूर दिखता है, पर रास्ता इससे ही निकलना होगा । पत्रकारिता का भला-बुरा जो कुछ भी है वह मुख्यतः समाचार पत्र के प्रकाशक की निर्धारित की गई रीति-नीति पर निर्भर करता है । ऐसे में समाचार-विचार के संदर्भ में अखबार मालिक की रीति-नीति को चुनौती भी कैसे दी जा सकती है । समाचार पत्रों का प्रबंधन यदि संपादक की संप्रभुता को अनुकूलित कर रहा है तो आप विवश खड़े देखने के अलावा क्या कर सकते हैं । यह बात भी काभी हद तक काबिले गौर है कि पत्रकार अपनी भूमिका और दायित्वों पर बहस करने के बजाय समाचार पत्र मालिक की भूमिका के बारे में ज्यादा बातें करते हैं ।

हम देखें तो पता चलता है कि अखबार की घटती स्वीकार्यता एवं संपादक के घटते कद ने मालिकों की सीमाएं बढ़ा दी हैं । अखबार अगर वैचारिक अधिष्ठान का रास्ता छोड़कर बाजार की हर सड़ी-गली मान्यताओं को स्वीकारते जाएंगे तो यह खतरा तो आना ही था । आज मालिक-संपादक के रिश्तों की तस्वीर बदल चुकी है । आज का रिश्ता प्रतिस्पर्धा और अविश्वास का रिश्ता है । अवमूल्यन दोनों तरफ से हा है हिंदी पत्रकारिता पर सबसे बड़ा आरोप यह है कि वह आजादी के बाद अपनी धार खो बैठी । समाज के विभिन्न क्षेत्रों में आए अवमूल्यन का असर उस पर भी पड़ा जबकि उसे समाज में चल रहे सार्थक बदलाव के आंदोलनों का साथ देना था । मूल्यों के स्तर पर जो गिरावट आई वह ऐतिहासिक है तो विचार एवं पाठकों के साथ उसके सरोकार में भी कमी आई है । साधन सम्पन्नता एवं एक राजनीतिक एवं आर्थिक शक्ति के रूप में विकसित होने के बावजूद पत्रकारिता का क्षेत्र संवेदनाएं खोता गया, जो उसकी मूल पूंजी थे । यही कारण है कि लोग बीबीसी की खबरों पर तो भरोसा करते हैं पर अपने अखबार पर से उन्हें भरोसा कम हुआ है । हिंदी पत्रकारिता की दुनिया बाबूराव विष्णुराव पराड़कर, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, अम्बिका प्रसाद वाजपेयी जैसे तमाम यशस्वी पत्रकारों की बनाई जमीन पर खड़ी है, पर इन नामों औरइनके आदर्शं को हमने बिसरा दिया। अपने उज्ज्वल और क्रंतिकारी अतीत से कटकर अंग्रेजी पत्रकारिता का जूठन उठाना और खाना हमारी दिनचर्या बन गई है । हिंदी में विचार दारिद्रयका संकट गहराने के कारण पत्रकारिता में अनुवादी लालोंकी पूछ-परख बढ़ गई है । आजादी के पूर्व हमारी हिंदी पट्टी की पत्रकारिता सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलनों से जुड़कर ऊर्जा प्राप्त करती थी । आज वह जनांदोलनों से कटकर मात्र सत्ताधीशों की वाणी एवं सत्ता संघर्ष का आईना भर रह गई है । ऐसे में अगर अखबारों एवं पाठकों के बीच दूरियां बढ़ रही हैं तो आश्चर्य क्या है ? अगर आप पाठकों एवं उनके सरोकारों की चिंता नहीं करते तो पाठक आपकी चिंता क्यों करेगा ? ऊँचे प्रतिष्ठानों, विशालकाय छलाई मशीनों, विविध रंगों तथा आकर्षक प्रस्तुति के साथ छपने के बावजूद अखबार अपनी आभा क्यों को रहे हैं यह सवाल हमारे लिए एक बड़ी चुनौती है । अकेला आपातकाल का प्रसंग गवाह है कि कितने पत्रकार पेट के बल लेट गए थे । इस दौर में जैसी रीढ़विहीनता और केंचुए सी गति पत्रकारों ने दिखाई थी उस प्रसंग को हम सब भले भूल जाएं, देश कैसे भूल सकता है ? सारे कुछ के बावजूद अखबार कभी सिर्फ उद्योग की भूमिका में नहीं रह सकते । व्यापार के लिए भी नियम और कानून होते हैं । व्यापार के नाम पर भी ग्राहक को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता । आजादी के बाद हमारे अखबार अपनी सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना से दूर हटे हैं ।

स्वतंत्रता मिलने के बाद राजनीतिक नेताओं, अफसरों, माफिया गिरोहों की सांठगांठ से सार्वजनिक धन की लूटपाट एवं बंदरबांट में देश का कबाड़ा हो गया, पर हिंदी के अखबारों की इन प्रसंगों पर कोई जंग या प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिलती । उल्टे एसे घृणित समूहों-जमातों के प्रति नरम रुख अपनाने एवं उन्हें सहयोग देने के आरोप पत्रकारों पर जरूर लगे । सत्ता प्रतिष्ठानों के प्रति ऐसी समर्पण भावना ने न सिर्फ हिंदी क्षेत्र पत्रों की गरिमा गिराई वरन पूरे व्यवसाय को कलंकित किया । इसी के चलते अखबारों में आम जनता की आवाज के बजाय सत्ता की राजनीत और उसके द्वन्द प्रमुखता पाते हैं ।

अखबारों की बड़ी जिम्मेदारी थी कि वे आम पाठकों के पास तक पहुंचते और उनसे स्वस्थ संवाद विकसित करते । कुच समाचार पत्रों ने ऐसे प्रयास किए भी किंतु यह हिंदी क्षेत्र की पत्रकारिता की मूल प्रवृत्ति न बन सकी । मुख्यधारा की हिंदी पत्रकारिता ने मूलतः शहरी मध्य वर्ग के पाठकों को केन्द्र में रखकर अपना सारा ताना-बाना बुना । इसके चलते अखबार सिर्फ इन्हीं पाठकों के प्रतिनिधि बन कर रह गए और समाज का एक बड़ा तबका जो गरीबी, अत्याचार एवं व्यवस्था के दंश को झेल रहा है, अखबारों की नजर से दूर है । ऐसे में अखबारों की संवेदनात्मक ग्रहणशीलता पर सवालिया निशान लगते हैं तो आश्चर्य क्या है ? इस संदर्भ में आप अंग्रेजी अखबारों की तुलना हिंदी अखबारों से करके प्रसन्न हो सकते हैं और यह निष्कर्ष बड़ी आसानी से निकाल सकते हैं कि हम हिंदी वाले उनकी तुलना में ज्यादा संवदनाओं से युक्त हैं । परंतु अंग्रेजी पत्रकारिता ने तो पहले ही बाजार की सत्ता और उसकी महिमा के आगे समर्पण कर दिया है । अंग्रेजी के अपने खास पाटक वर्ग के चलते उनकी जिम्मेदारियां अलग हैं । उनके केन्द्र में वैसे भी मनुष्य तो नहीं ही है । किन्तु भारत जैसे विविध स्तरों पर बंटे देश में हिंदी अखबार की जिम्मेदारी बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है । क्योंकि अगर हम व्यापक पाठक वर्ग की बात करते हैं तो हमार जिम्मेदारियां अंग्रेजी अखबारों के मुकाबले बड़ी हैं । वस्तुतः हिंदी अखबारों कोअपनी तुलना भाषाई समाचार पत्रों से करनी चाहिए । जो आज स्वीकार्यता के मामले में अपने पाठकों के बीच खासे लोकप्रिय हैं । यहां अंग्रेजी पत्रों का वैचारिक योगदान जरूर हिंदी पत्रों के लिए प्रेरणआ बन सकता है । इस पक्ष पर हिंदी के पत्र कमजोर साबित हुए हैं । हिंदी अखबारों में वैचारिकता एवं बोद्धिकता का स्तर निरंतर गिरा है । अब तो गंभीर समझे जाने अखबार भी अश्लील एवं बेहूदा सामग्री परोसने में कोई संकोच नहीं करते और यह सारा कुछ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आतंक में हो रहा है । इस आतंक में आत्मविश्वास खोते संपादक एवं उनके अखबार कुछ भी छापने पर आमादा हैं । सनसनी, झूठ और अश्लीलता उन्हें किसी भी चीज से परहेज नहीं है ।
सत्ता से आलोचनात्मक विमर्श रिश्ता बनाने एवं जनता की आवाज उस तक पहुंचाने के बजाय अखबार उनसे रिश्तेदारियां गांठने में लगे हैं । प्रायः अखबारों पर उसके पाठकों के बजाय विज्ञापनदाताओं एवं राजनेताओं का नियंत्रण बढ़ता जा रहा है । खबरपालिका की अंदरुनी समस्याओं को हल करने एवं उनके बीच से रास्ता निकालने के बजाय आत्म-समर्पण जैसी स्थितियों को विकल्प माना जा रहा है । ऐसे में पाठक और अखबार के रिश्ते मजबूत हो सकते हैं ? कोई अखबार या उसकी आवाज कैसे पाठकों के दिल में उतर जाएगी ? उत्पाद बन चुका सुबह का अखबार तभी अपनी आभा खोकर शाम तक रद्दी की टोकरी में चला जाता है । अखबार सार्वजनिक सवालों पर बहस का वातावरण बनाने में विफल रहे हैं । भाषा के सवाल पर हिंदी अखबार खासे दरिद्र हैं । सहज-सरल भाषा के प्रयोग का नारा पत्रकारों के लिए शब्दों के बचत की प्रेरणा बन गया है । ऐसे में तमाम शब्द अखबारों से गायब हो गए हैं । इसका एक बहुत बड़ा कारण है भाषा के प्रति हमारा अल्पज्ञान एवं उसके प्रति लापरवाही है । दूसरा बड़ा कारण हमारा बौद्धिक कहा जाने वाला वर्ग अखबारों से कट सा गया है । उसने अखबारों को बेवजह की चीज मान लिया है । हिंदी पत्रकारिता में विचारशीलता के लिए कम हो आई जगह से पाठकों को वैचारिक नेतृत्व मिलना बंद हो गया । इस बौद्धिक नेतृत्व के अभाव ने भी पाठक एवं अखबार के रिश्तों को खासा कमजोर किया । संवेदनाएं कम हुई, राग घटा एवं शब्दों की महत्ता घटी । बौद्धिकों ने हिंदी क्षेत्र की पत्रकारिता पर दबाव बनाने के बजाय इस क्षेत्र को छोड़ दिया । फलतः आज हमारे पास सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय’, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय, राजेन्द्र माथुर, श्रीकांत वर्मा, प्रभाष जोशी जैसे संपादकों का दर अतीत की बात बन गई है ।

यह बात खासी महत्वपूर्ण है कि हिंदी पत्रकारिता का वैचारिक अधिष्ठान एवं श्रीगणेश ऐसा है कि व जनसंघर्षों में ही फल-फूल सकती है । अब रास्ता यही है कि अखबार की पूंजी से घृणा करने के बजाय ऐसे रिश्तों का विकास हो, जिसमें देश का बौद्धिक तबका भी अपना मिथ्याभिमान छोड़कर अखबार की दुनिया का हमसफर बने । क्योंकि तकनीकी चमक-दमक अखबार की प्रस्तुति को बेहतर बना सकती है, उसमें प्राण नहीं भर सकती ।

हिंदी क्षेत्र में एक नए प्रकार के पाठक वर्ग का उदय हुआ है जो सचेत है और संवाद को तैयार है । वह तमाम सूचनाओं के साथ आत्मिक बदलाव वाला अखबार चाहता है । वह सच के निकट जाना चाहता है । इसलिए चुनौती महत्व की है और यह जंग हिंदी अखबारों को पाठकों के साथ जुड़कर ही जीतनी होगी । क्योंकि लाख नंगेपन से भी अखबार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का मुकाबला नहीं कर सकता । इसके लिए उसमें एक संवेदना जगानी होगी जो अपने पाठकों से संवाद करे, बतियाए, उन्हें रिक्त न छोड़े । अपने युग की चुनौतियों, बाजार के गणित का विचार करते हुए अखबार खुद को तैयार करें यह समय की मांग है । हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में एक नैतिक एवं सांस्कृतिक आंदोलन ही इस शून्य को भर सकता है ।

मुख पत्र-पत्रिकाएं और पत्रकार



आधुनिक समय मे पत्रकारिता का जितना विस्तार हुआ है, वह उतनी ही वैविध्यपूर्ण भी हुई है । पत्रकारों ने अपने निरंतर प्रयासों से हिंदी की पत्रकारिता को एक ऊँचाई और गंभीरता दी है । इस दौर के यशस्वी संपादक के रूप में अज्ञेय, धर्मवीर भारती, राजेन्द्र माथुर ने अपनी अलग जगह बनाई, तो क्षेत्रीय पत्रों से जुड़े राहुल बारपुते (नई दुनिया), कर्पूरचंद्र कुलिश (राजस्थान पत्रिका), अशोक जी (स्वतंत्र भारत), की ऊँचाई कम करके नहीं आंकी जा सकती । इसके अलावा प्रभाष जोशी (जनसत्ता), राजेन्द्र अवस्थी (कादम्बिनी), अरुण पुरी (इण्डिया टुडे), जयप्रकाश भारती (नन्दन), सुरेन्द्र प्रताप सिंह (रविवार एवं नवभारत टाइम्स), उदयन शर्मा (रविवार एवं सण्डे आब्जर्वर) पत्रकारिता में सर्वथा एक नई प्रवृत्ति के वाहक बने ।5

इसके अलावा डॉ. नंदकिशोर त्रिखा, दीनानाथ मिश्रा, विष्णु खरे, महावीर अधिकारी, प्रभु चावला, राजवल्लभ ओझा, जगदीशप्रसाद चतुर्वेदी, चंदूलाल चंद्राकर, मृणाल पांडेय, शिव सिंह सरोज, घनश्याम पंकज, राजनाथ सिंह, नरेन्द्र मोहन, गणेश मंत्री, रामगोपाल माहेश्वरी, विश्ववाथ, बनवारी, राहुल देव, रामबहादुर राय, राधेश्याम शर्मा, भानुप्रताप शुक्ल, तरुण विजय, रघुवीर सहाय, मायाराम सुरजन, रूसी के करंजिया, नंदकिशोर नौटियाल, आलोक मित्र, अवध नारायण मुद्गल, राजेन्द्र यादव, डॉ. हरिकृष्ण देवसरे, गिरिजाशंकर त्रिवेदी, शीला झुनझुनवाला, सूर्यकांत बाली, आलोक मेहता, रहिवंश, अभय छजलानी, राजेन्द्र शर्मा, रामाश्रय उपाध्याय, अच्युतानंद मिश्र, विश्वनाथ सचदेव, गुरुदेव काश्यप, रमेश नैयर, बाबूलाल शर्मा, यशवंत व्यास, नरेन्द्र कुमार सिंह, महेश श्रीवास्तव, जगदीश उपासने, मुजफ्फर हुसैन, अश्विनी कुमार, रामशरण जोशी, दिवाकर मुक्तिबोध, ललित सुरजन, मधुसूदन आनंद, मदनमोहन जोशी, बबन प्रसाद मिश्र, रामकृपाल सिंह जैसे तमाम पत्रकारों की साधना वं नैरंतर्य के चलते हिंदी पत्रकारिता आज इस मुकाम पर पहुंची है । उसके विचार प्रस्तुति एवं जनधर्मी स्वरूप को बनाए रखने में इन पत्रकारों का प्रभाव भुलाया नहीं जा सकता ।

धर्मयुग एवं दिनमान तो इस संदर्भ में पत्रकारिता के स्कूल साबित हुए, जहां से युवा पत्रकार एवं प्रखर पत्रकारों की टोली सामने आई । क्षेत्रीय पत्रों में नई दुनिया (इंदौर), राजस्थान पत्रिका (जयपुर), स्वतंत्र भारत (लखनऊ), दैनिक जागरण (कानपुर), अमर उजाला (आगरा), बेहतर स्कूल साबित हुए । हमारे तमाम बड़े एवं राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार इन संस्थाओं की उपज रहे ।

सन्दर्भ

1.
पत्रकारिता का इतिहास एवं जनसंचार माध्यम, डॉ. संजीव भानावत (पृ. 21,22,23)
2.
समाचार पत्रों का इतिहास, अम्बिका प्रसाद वाजपेयी (पृ. 94-95)
3.
हिंदी पत्रकारिता विकास और विविध आयाम, डॉ. श्रीमती सुशीला जोशी (पृ. 24,25,26.27.28)
4.
हिंदी पत्रकारिता, डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्रा (पृ. 23)
5.
आधुनिक पत्राकारिता, डॉ. अर्जुन तिवारी (पृ. 149)
6.
भारतेन्दु युगीन हिंदी पत्रकारिता, डॉ. वंशीधर लाल (पृ. 80-85)

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