शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

अखबार [कविता] - पवन कुमार चंदन




चन्द पन्नों मे सिमटा
विस्तृत संसार
दैनिक अखबार
दुनिया को
देखने समझने का रास्ता सा
सुबह का नाश्ता सा

कभी कड़्वा, कभी कसैला
कभी तीखा-कभी विषैला
हां साहमे हमने इस
अखबारी नाश्ते के
बहुत स्वाद चखे हैं
कुछ भूल गये
कुछ याद रखे हैं

आप कहेंगें
ना मिर्च ना मासाला
सफेद कागज़ पर प्रिंट काला
मात्र खबरों का हवाला
फिर स्वाद कैसा

पर साहब
हम आपको समझा देंगें
लीजिये, सुनिये

मुखपृष्ठ खून से सना होगा
अमन चैन नदारद
उग्रवाद घना होगा

पूरे अखबार का
ये आलम होगा
बेवक्त चटकी चूड़ियो का
काँलम होगा
हत्याओं की खूंडियों पर
शीर्षक तने होंगें
सभी शब्द खून से सने होंगें
अपने वैधव्य का
स्वागत करती
नारियों की तस्वीरें
अनाथ हुए बच्चों की
सिसकियां और तकदीरें
सुरक्षा व्यवस्था लड़्खड़ाती हुई
हर मौत उसके खिल्लियां उड़ाती हुई
न उठ सकने वाले
कड़े कदम का आश्वासन
अपनी
कार्य कदम का आश्वासन
अपनी
कार्य कुशलता पर हंसता कुशास

आप कहेंगें ये तो खबरें हैं
स्वाद कहां है
अरे भाई
इन खबरों में ही
स्वाद भरा है
वरना
अखबार में
क्या धरा है...?

17 टिप्पणियाँ:

  1. पंकज सक्सेना says
    आप कहेंगें ये तो खबरें हैं
    स्वाद कहां है
    अरे भाई
    इन खबरों में ही
    स्वाद भरा है
    वरना
    अखबार में
    क्या धरा है...?

    क्या बात कही है।
    रचना सागर says
    पूरे अखबार का
    ये आलम होगा
    बेवक्त चटकी चूड़ियो का
    काँलम होगा
    हत्याओं की खूंडियों पर
    शीर्षक तने होंगें
    सभी शब्द खून से सने होंगें
    अपने वैधव्य का
    स्वागत करती
    नारियों की तस्वीरें
    अनाथ हुए बच्चों की
    सिसकियां और तकदीरें
    सुरक्षा व्यवस्था लड़्खड़ाती हुई
    हर मौत उसके खिल्लियां उड़ाती हुई
    न उठ सकने वाले
    कड़े कदम का आश्वासन
    अपनी
    कार्य कदम का आश्वासन
    अपनी
    कार्य कुशलता पर हंसता कुशासन

    गंभीर अभिव्यक्ति।
    निधि अग्रवाल says
    बहुत अच्छी कविता है। सचमुच अखबारनवीसों को लगता है कि सनसनी न हो तो आखिर अखबार में धरा क्या है?
    नंदन says
    इन खबरों में ही
    स्वाद भरा है
    वरना
    अखबार में
    क्या धरा है...?

    अखबार कैसे निस्सार होते जा रहे हैं कविता प्रस्तुत कर रही है। बधाई पवन जी।
    अनुज says
    प्रवाह बहुत अच्छा है और बात गंभीर है।
    दिव्यांशु शर्मा says
    इसी मंच पर नयी कविता पर एक सार्थक बहस चल रही है .. आप की कविता उस बहस को एक dimension दे सकती है ... जहाँ एक मुलायम सी गत्यात्मकता इसमें साँस लेती है , वहीं ये आजाद नज़्म सी भी दिखायी पड़ती है .. बेहद खूबसूरत ..
    उपभोक्तावाद और बाज़ारवाद का असर पत्रकारिता पर भी हुआ ही है . हमारे दैनिक समाचार पत्र एक "strategic pornography" के शिकार हो गए हैं .. जो कि कभी सनसनी तो कभी सेक्स तो कभी सेंसेक्स बन कर मुख पृष्ठों पर फैल गयी है ... पत्रकारिता की जीर्ण आत्मा के चीत्कार को आप ने बखूबी काग़ज़ पर उतारा है ....
    शुक्रिया
    दृष्टिकोण says
    आपकी कविता आज को दिखाती है। कविता सशक्त है।
    संगीता पुरी says
    आप कहेंगें ये तो खबरें हैं
    स्वाद कहां है
    अरे भाई
    इन खबरों में ही
    स्वाद भरा है
    वरना
    अखबार में
    क्या धरा है...?
    पता नहीं , आजकल खबरें ऐसी होती हैं या खबर देनेवाले।
    अविनाश वाचस्पति says
    अखबारों को व्‍यंजन
    बतलाने वाले इस
    चंदन को वंदन।
    राजीव तनेजा says
    आज के हालात पर तगड़ा...हैवीवेट टाईप कटाक्ष...
    sanju says
    अच्छी कविता...
    मोहिन्दर कुमार says
    अखबार पर आपके आचार विचार सुन कर अच्छा लगा.. सचमुच उपहार की पेकिंग तो महज दिखावा है.. मूल्य तो उपहार का ही होता है :
    Omprakash says
    सारे टिप्‍पणीकार
    बहस में हिस्‍सा
    ले रहे हैं
    इस पर कम
    टिप्‍पणियां आने
    का यही कारण है।

    कवि महोदय
    रुकावट के लिए
    खेद है।

    इस कविता को
    कल के अंक में
    पुन: प्रकाशित
    किया जाएगा
    ताकि खूब सारी
    टिप्‍पणियां आ सकें।

    आदेशानुसार
    साहित्‍यशिल्‍पी टीम प्रबंधन
    Vijay Kumar Sappatti says
    pavan ji , aapki ye kavita padhkar aaj ke yug ki sacchai saamne aa gayi .. in fact yahi to hota hia aaj ke akhbaaron mein ..
    bahut sundar rachana.

    aapko bahut badhai ..

    vijay
    www.poemsofvijay.blogspot.com
    yogesh samdarshi says
    अच्छी कविता...
    सुशील कुमार says
    लाजबाब भाई साहब। आपकी कविता पर देर टिप्पणी करने के लिये क्षमा चाहता हूँ।...सुशील कुमार।
    pawanchandan says
    साहित्‍य शिल्‍पी का धन्‍यवाद जिनके कारण ये रचना आप लोगों तक पहुंच पायी है। आपकी प्रतिक्रियांए मुझे हौसला देंगी। आप सब सम्‍माननीय जनों को आभार।

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