Posted on June 27, 2010 by Updesh Awasthee
अमेरिका की वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के सेंट लुई कैंपस में भाषा विज्ञान के प्रफेसर डॉ. एम. जे. वारसी मूल रूप से बिहार के रहने वाले हैं। अब तक भाषा विज्ञान से जुड़े उनके 25 शोधपत्र और अनेक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। यूनिवर्सिटी आफ बर्कले ने उन्हें हाल ही में सम्मानित किया है। उसके बाद अमेरिका में भाषा विज्ञान के मामले में भारत की कद बढ़ी है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवसिर्टी (एएमयू) के छात्र रह चुके डॉ. वारसी से यूसुफ किरमानी की बातचीतआपकी किताब लैंग्वेज एंड कम्युनिकेशन की काफी चर्चा हो रही है। आप मीडिया के लिए किस तरह की भाषा का सुझाव देना चाहते हैं?
मैंने इसी विषय से जुड़ा पेपर वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के लिए तैयार किया था। बाद में इस पर किताब लिखने का प्रस्ताव मिला। इस किताब में मैंने इस बात को उठाया है कि मीडिया की भाषा कैसी होनी चाहिए और चूंकि मीडिया सीधे आम आदमी से जुड़ा है तो इसके इस्तेमाल की क्या तकनीक होनी चाहिए। मैंने एक बात खासतौर पर रेखांकित की है कि मीडिया की भाषा साहित्यिक नहीं होनी चाहिए। उसमें उन शब्दों का ही इस्तेमाल हो जिसे सोसायटी ने अपना लिया है। मसलन आपके दफ्तर का चपरासी यह नहीं बोलेगा कि साहब आज कार्यालय नहीं आएंगे। वह यही कहेगा कि साहब आज ऑफिस नहीं आएंगे। मैंने एक और बात पर जोर दिया है कि वाक्य बहुत लंबे नहीं होने चाहिए। वाक्य लंबे होने से वह लेख या खबर बोझिल हो जाती है। अमेरिका के कई अंग्रेजी अखबार पहले इन सब चीजों की परवाह नहीं करते थे लेकिन अब उन्होंने भी इस तरफ ध्यान देना शुरू कर दिया है।
बतौर भाषा वैज्ञानिक आप भारत को किस स्थिति में पाते हैं?
भाषा के नजरिए से भारत दुनिया का सबसे धनी देश है। अमेरिका और अन्य देशों में लोग मुझसे बातचीत के दौरान इस बात पर हैरानी जताते हैं कि इतनी भाषाएं और संस्कृति होने के बाद भी यह देश कैसे सरवाइव कर रहा है। यहां की भाषा और संस्कृति से पूरी दुनिया में इसकी अलग पहचान है।
कहा जा रहा है कि ग्लोबलाइजेशन और शहरीकरण के कारण भारत में कम बोले जानी वाली भाषाओं का विकास नहीं हो सका। आपको क्या लगता है?
यह बात सही है। अगर भाषा खो गई तो सब कुछ खो जाएगा। भारत के किसी भी वर्ग या समाज की पहचान काफी हद तक उसकी भाषा से भी होती है। जिन भाषाओं के बोलने वाले कम लोग बचे हैं, उनकी पहचान कर उन्हें संरक्षण दिया जाना बेहद जरूरी है। समय आ गया है कि भारत सरकार अपनी देखरेख में भाषाई सर्वेक्षण कराए। देश के भाषा विज्ञानियों को इसके लिए सरकार पर दबाव बनाना चाहिए।
अगर भाषा विज्ञान का इतना ही महत्व है तो इसे करियर के साथ क्यों नहीं जोड़ा जाता?
बहुत अच्छा सवाल है। देखिए, भारत में सिर्फ सेंट्रल और कुछ राज्यों की यूनिवर्सिटी में ही इसकी पढ़ाई होती है। कई सेंट्रल यूनिवर्सिटीज में तो यह ग्रैजुएशन लेवल पर और कहीं पोस्ट ग्रैजुएशन लेवल पर पढ़ाई जाती है। मैं आपको अपना अनुभव बता रहा हूं। एएमयू से अब तक जितने भी लोग लिंग्विस्टिक में पीएचडी या एमफिल कर निकले हैं वे तमाम यूरोपीय देशों और अमेरिका में अपने ज्ञान का लोहा मनवा रहे हैं। मैं किन-किन देशों का नाम लूं। लिंग्विस्टिक के लोगों की वहां बड़ी संख्या में जरूरत है। लेकिन भारत जैसा विशाल देश भी उतने लोग वहां नहीं भेज पा रहा। वैसे पश्चिम देशों की यूनिवर्सिटीज में भी लिंग्विस्टिक की पढ़ाई हो रही है लेकिन भारतीय भाषाओं के लिए भाषा विज्ञानियों की बहुत ज्यादा जरूरत है।
तो यह बताइए कि कमी कहां है, क्या करने की जरूरत है?
सरकार और यूजीसी को जरूरी कदम उठाने होंगे। वे बीए या एमए की पढ़ाई को लिंग्विस्टिक के साथ भी जोड़ दें। अगर कोई स्टूडेंट एमए उर्दू या एमए हिंदी करता है तो उसकी मार्केट वैल्यू उतनी नहीं है, लेकिन उसके साथ उसमें अगर लिंग्विस्टिक को भी जोड़ दिया जाए तो वह एक प्रफेशनल डिग्री के साथ मार्केट में आएगा और अपनी अलग जगह बना लेगा। भारत में लिंग्विस्टिक की ज्यादा मार्केटिंग न होने की वजह से इसका महत्व न तो यूजीसी को समझ में आ रहा है न ही प्राइवेट यूनिवर्सिटियों को। आप जब तक भाषा को भी साइंस नहीं मानेंगे, हालात ऐसे ही रहेंगे। इसे साइंस मानने और गंभीरता से लेने पर ही इसमें करियर की अपार संभावनाएं पैदा होंगी।
12 Jun 2010, 0045 hrs IST,नवभारत टाइम्स
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