गुरुवार, 23 अगस्त 2012

मीडिया पर दीदी की दादागिरी



सत्ता का नशा बड़ा नशीला होता है. अफीम और हेरोइन के नशे से भी नशीला. सत्ता के शीर्ष पर बैठने वाले नेतागण अक्सर इस नशे में मदमस्त होकर मतवाले हाथी की तरह व्यवहार करते हैं. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आजकल इसी नशे की गिरफ्त में हैं. सत्ता का नशा उनपर इस कदर चढा हुआ है कि विपक्षी दलों पर निशाना साधते - साधते अब वे मीडिया को भी आड़े हाथों लेने लगी हैं. यह वही मीडिया है जिसने ममता बनर्जी को हाथों – हाथ लिया. पश्चिम बंगाल की सरकार और कुव्यवस्था के खिलाफ पूर्व में ममता के संघर्ष की पल – पल की कवरेज की. यह वही ममता बनर्जी हैं जो जबतक विपक्ष में रहीं तब तक सरकार की गलत नीतियों को जनता के सामने लाने के मामले में मीडिया की भूमिका की प्रशंसा करती रही. लेकिन अब वही मीडिया ममता की आँखों की किरकिरी बन गया है क्योंकि न्यूज़ चैनलों और अख़बारों में सरकार विरोधी खबरें छप रही हैं और ममता को यह मंजूर नहीं. वे चाहती हैं कि मीडिया में उनकी चरण वंदना हो, सरकार की तारीफ़ हो और विपक्षी दलों की भर्त्सना हो. इस चक्कर में ममता बनर्जी जो ‘दीदी’ के नाम से भी मशहूर हैं अब ‘दादा’ की तरह व्यवहार कर रही है. यानी दादागिरी पर उतारू हो गयी हैं. मीडिया को काबू में करने के लिए दबंगई दिखा रही है.

सबसे पहले एक कार्टून विवाद में एक प्रोफ़ेसर को उन्होंने जेल भिजवाया. प्रोफ़ेसर की खता इतनी सी थी कि उसने ममता बनर्जी और उनके मंत्रियों पर बने कार्टून को और लोगों से शेयर किया था. अम्बिकेश महापात्र नाम के प्रोफेसर के खिलाफ भारतीय दंड संहिता और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया . कार्टून सत्यजीत रे की फिल्म 'सोनार केल्ला' पर आधारित है, जिसमें ममता और रेल मंत्री मुकुल राय को पार्टी के सांसद दिनेश त्रिवेदी से निपटने के तरीकों पर चर्चा करते हुए दिखाया गया है. हालाँकि बाद में प्रोफ़ेसर निजी मुचलके पर रिहा हो गए. लेकिन ममता बनर्जी यहीं नहीं रुकी. फेसबुक पर प्रकाशित उस कार्टून को भी हटाने की कवायद शुरू की गयी. बंगाल की सीआईडी ने फेसबुक को पत्र लिखकर कहा है कि वह अपनी साइट से वह चारों चित्र हटाए जिसमें सीएम ममता बनर्जी का मजाक उड़ाया गया है. सीआईडी ने फेसबुक से उस कंप्यूटर का आईपी पता भी पूछा है जिसके जरिए फेसबुक पर यह आपत्तिजनक तस्वीरें अपलोड की गई. ऐसा पहली बार हुआ जब किसी सरकार ने एक कार्टून को लेकर फेसबुक से ऐसी मांग की. हालाँकि ममता के इस कदम की घोर भर्त्सना हुई, लेकिन ममता के रूख में कोई परिवर्तन नहीं दिखा. भारतीय प्रेस परिषद् के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू ने ‘कार्टून’ विवाद पर टिप्पणी करते हुए कहा कि, ‘मुझे लगता है कि ममता बनर्जी को अधिक परिपक्वता दिखानी चाहिए थी. वह अब सड़क पर लड़ाई नहीं लड़ रही हैं, वह एक मुख्यमंत्री हैं. उनका ये व्यवहार पूरी तरह से अस्वीकार्य है.’

इसके पहले ममता बनर्जी सरकार ने सरकारी मदद प्राप्त पुस्तकालयों में अंग्रेजी और अधिक प्रसार संख्या वाले बंगाली अखबारों पर प्रतिबंध लगा दिया था. अब इन पुस्तकालयों में केवल आठ चुने हुए अखबार ही उपलब्ध रहेंगे. आदेश के अनुसार, सार्वजनिक पुस्तकालयों में केवल संवाद, प्रतिदिन, सकालबेला, खबर 365 दिन, एकदिन, दैनिक स्टेट्समैन (सभी बंगाली), सन्मार्ग (हिन्दी), अखबार-ए-मुशरिक और आजाद हिन्द (दोनों उर्दू) अखबार ही उपलब्ध रहेंगे. इसके अलावा माकपा के मुखपत्र ‘गणशक्ति’ पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया. इसपर माकपा नेता सीताराम येचुरी ने कहा कि यह आदेश सेंशरशिप से भी खतरनाक है और इसमें ‘फासीवाद’ का रंग है. वाकई में यह मीडिया के प्रति तानाशाही रवैये की इंतहां है जहाँ अखबार भी सरकार की मर्जी से पढ़ने होंगे.

अखबार तो अखबार न्यूज़ चैनलों के मामले में भी सलाह देने से ममता नहीं चूँकि. उन्होंने राज्य के लोगों को टीवी पर खबरें न देखने की नसीहत दे डाली. उन्होंने अपने बयान में कहा कि लोगों को टीवी चैनलों पर खबरें देखने की बजाय संगीत सुनना चाहिए. ममता ने कहा, सीपीएम के दो-तीन चैनल हैं जो आपको नहीं देखने चाहिए. उनको देखने की बजाय संगीत सुनें. ऐसे चैनल राज्य सरकार की छवि खराब करने के लिए झूठी खबरें प्रसारित कर रहे हैं. ऐसे समाचार चैनलों पर झूठी खबरें देखने की बजाए मनोरंजन चैनलों को देखना चाहिए. मीडिया और दर्शकों को नसीहत देने से भी ममता बनर्जी का मन नहीं भरा तो उन्होंने सरकारी अखबार और चैनल लाने का एलान कर दिया. उन्होंने घोषणा करते हुए कहा कि उनकी सरकार अपना अखबार और चैनल शुरू करेगी ताकि इसके कार्यों को उचित तरीके से लोगों के सामने पेश किया जा सके.

लेकिन क्या ऐसा करने से सरकार विरोधी खबरें दब जायेंगी? सोशल मीडिया के ज़माने में ऐसा होना नामुमकिन ही जान पड़ता है. ममता को यह समझना चाहिए कि मीडिया के प्रति उनका यह रवैया उनके सारे किये – कराये पर पानी फेर सकता है. पूर्व में उत्तरप्रदेश में मायावती और बिहार में लालू प्रसाद यादव मीडिया के साथ ऐसा व्यवहार कर उसका प्रतिफल भोग चुके हैं. ये दोनों जब सत्ता में थे तो पत्रकारों के साथ उनका व्यवहार बेरुखी भरा होता था. लेकिन अब एक ऐसा ज़माना आया जब मीडिया ने ही इनको तड़ीपार कर दिया. आगे चलकर ममता बनर्जी के साथ भी कहीं ऐसा ही न हो. वैसे ममता बनर्जी ही क्या बाकी नेताओं की भी यही फितरत होती है, जबतक मीडिया उनकी तारीफ़ करता है तबतक बहुत अच्छा लगता है. मीडिया के तारीफों के पूल बांधते, वे नहीं अघाते. लेकिन जैसे ही सत्तासीन होते हैं और कामकाज को लेकर मीडिया आलोचना करने लगता है तो वही नेता बिफर पड़ते हैं और अपने – अपने तरीके से मीडिया को दबाने के लिए दबंगई शुरु कर देते हैं. कुछ बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार की शैली में विज्ञापन देकर मीडिया को दबाने की कोशिश करता है तो कोई ममता बनर्जी की तरह दीदी से दादा बनकर मीडिया से दबंगई करता है. लेकिन ऐसी कोशिशें अक्सर नाकाम ही होती है. ममता बनर्जी जितनी जल्दी समझ लें, उनके लिए बेहतर होगा.
( मूलतः साप्ताहिक पत्रिका 'इतवार'  में प्रकाशित)

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