शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

अखबार क्या सिर्फ पढ़ा जाता है, जो नेट से काम चल जाये?

मंगलवार, मार्च 15, 2011



रमेश बाबू के साथ आज हम चाय की दुकान पर बैठे थे, रमेश बाबू बातूनी आदमी और हम चुप रहने वाले, हमने अखबार उठा लिया और पढ़ने लगे.मगर रमेश बाबू ... वो कहाँ किसीको चुप रहने दें......कहने लगे कि--- का समीर बाबू... टीवी,मोबाईल, नेट के जमाने मे भी ई ..आर्ट फ़िलम की तरह अखबारे में घुसे रहते हैं ...कभी मौर्डनियाईयेगा कि नहीं? अख़बारों का अब भी कोई मतलब है?
बस, उनके ऐसे ही प्रस्न हमें बर्दाश्त नहीं होते तो हम कहे कि रमेश बाबू, मतलब काहे नहीं है जी अखबार का? यात्रा करना बिल्कुले छोड़ दिये का ? चप्पल काहे में लपेट के धरियेगा.. कपड़ों के बीच वी आई पी सूटकेस में?? बताईये बताईये..और जानिये कि अगर रेल( जैसा कि होइबे करता है ), विलम्ब से चल रही हो और पूरा स्टेशन यात्रियों से खचाखच भरा हो , तब बैठियेगा काहे पर?... कि खड़े खड़े ही आठ घंटा गुजार देंगे?... भीड़ एसन ही तो लग नहीं गई होगी?. आये दिन की पार्टी रैली में से एक यह भी है. सब दिल्ली जायेंगे. अब गई आपकी रिज़र्व सीट भी. उनसे झगड़ियेगा? गुंडा लोगों से..अरे नहीं नहीं, नेता लोगों से? वैसे तो एक ही बात है. तब काहे पर बैठ कर सफर करेंगे? यही अखबार न काम आयेगा…बोलिए....बोलिए ...
चलिए, नहीं जाईये कहीं घूमने फिरने..घर में ही गतियाये किताबें पढ़ते रहिये तो आले में बिना अखबार बिछाये किताबें सजाईयेगा? बताईये-इका.. कौनो आल्टरनेट है?.. और फिर उ... किताब पर तो जिल्द भी इसी से न चढ़ाते हैं कि भूरा पन्ना खरीद के लाते हैं??
गरमी का हालत नहीं देखे हैं का , रमेश बाबू? अभी करंट चला जाएगा तब पढ़ते रहियेगा किताब. बता दे रहे हैं.... कि तब ई अखबार ही काम आयेगा पंखा झलने के.
हमरे गांव की नुक्कड़ पर उ गुमटी वाला तो इसी की पूँगी बना कर चना/चबेना बेचता है सदियों से. काहे गरीब के पेट का ख्याल नहीं आया आपको?..चलिए, न आया होगा इतना संवेदनशील हृदय नहीं होगा. मरने दिजिये उसको भी भूखा. जब चना उगाने वालों को मरने दिये सब लोग, किसी के कान में जूं तक नहीं रेंगी तो इन बेचने वालों की क्या बिसात. इसी अखबार में न छपा था?-- कि कितने किसान आत्महत्या कर लिए थे? बताईये जरा कितने थे? टीवी न्यूज तो रिवाईंड नहीं न कर पायेंगे मगर पुराना अखबार तो बता ही देगा, जरा खोजिये तो.
जाने दिजिये, कहाँ मन खट्टा करियेगा मगर वो छुटकु तो घर में है न..जरा उसकी अम्मा से पूछियेगा...कितने काम आता है अखबार..केतन डायपर घर में खराब करियेगा केतन डायपर घर में खराब करियेगा जी गवैंठी शहरी लेखक...लिख लिख के और कविता गा कर टाटा बिड़ला तो नहिये हो जायेंगे. फिर कैसे अफोर्ड करियेगा? दो जून की रोटी आ रही है लिख लिख कर, इतना ही तरक्की लेखक के लिए एतिहासिक मानिये, कम से कम हिन्दी में और तनि ये भी पूछिएगा कि सिगड़ी काहे से जलाएगी?...और उ महंगावाला सारी...रेसमी के बीच में का धरती है?.....कभी देखे हैं? अउर कभी ड्रायक्लीन/प्रेस को कपड़ा दिए है का? उ धोबी का रखता है कपड़ा का बीच में? अउर जो कभी पिकनिक-विकनिक गए हो तो ई तो जानते ही होंगे कि काहे में खाए थे पूड़ी-सब्जी अउर जो पानी नहीं था तो हाथ भी तो साफ़ करे ही होंगे न....अब कहिए त..अखबारों का कोई मतलब है कि नहीं? ......
अच्छा ये बताईये रमेश बबू, उस रोज जब आप राधेश्याम जी के पिता जी की अर्थी के संग मुँह लटकाये गमगीन मरघटाई चले जा रहे थे, तो कहाँ से जाने थे?-- कि उनके पिता जी गुजर गये. अखबार से ही न... कि कोई लाऊड स्पीकर पर घोषणा हुई थी? या जी टी वी वाला दिखाया था?. जानते तो हैं आप कि जाना कितना जरुरी है, आप नहीं जायेंगे तो ऐसा हादसा सब के साथ होना है, कभी आप के साथ भी होगा तो क्या अकेले ढोकर ले जाईयेगा खुद को?या चलकर जाइयेगा ?.. . बिना अखबार पढ़े तो न जान पाईयेगा कि शहर में कब कौन पहचान का बैकुंठ के राजमार्ग पर चल पड़ा. कभी पुण्य तिथि मिस करियेगा तो कभी तेहरवीं. अकबका कर बस मुँह-बाये हाय हाय करते रहियेगा- कि हम तो जानबे नई करे ....
देखबे करता हूँ कि आप सिनेमा भी बड़े शौक से देखते हैं- आँख मिचका मिचका कर. आखिर तीन घंटे का समय बिना किसी से मूंह छिपाये गुजर भी जाता है, बिना ग्लानि के. तब बताईये कि कहाँ देखियेगा कि कौन सिनेमा कहाँ खेला जा रहा है. टॉकिज टॉकिज तो नहिये घूमियेगा अपनी खटारा स्कूटर लेकर बीबी को बैठाये.
किसी को हम तो खैर नहीं बतायेंगे आपके बारे में मगर आप तो हमें बता ही दिजिये कि सब कर लेंगे मगर सट्टे का नम्बर कहाँ से मिलायेंगे?. हम तो सुने हैं कि पिछले ३० दिन के नम्बर से आप चार्ट बना कर अगले दिन का बड़ा सिद्ध नम्बर निकालते हैं, उसका क्या?
वैसे आपको बता देते है कि ऐसा किसी प्रिंट मिडिया के पत्रकार से मत कह दिजियेगा. उनको बड़ी ठेस पहुँचेगी. आप क्या समझते हैं कि कहीं और वो क्लर्की कर लेंगे. पगार तो बराबर की पा ही जायेंगे मगर वो जो पुलिस और सरकारी अधिकारियों को चमका कर गठरी पाते थे वो क्या आप देंगे? अरे, खुद का तो ठिकाना नहीं, उनको क्या दिजियेगा? उत्ती मोटी गठरी देने लायक जो आप होते तो एसन बात करते भला? और जो देते भी त गठरी को कपड़ा में लपेटते का?
एक बात और बतायें रमेश बाबू, कभी किसी मध्यम वर्गीय भले मानस से पूछियेगा. वो भले ही १५० रुपया अखबार खरीदने में खर्च कर देता हो महिने भर में मगर तीन महिने बाद जब उसे रद्दी वाले को झीक झीक कर के बेच कर ६० रुपये पाता है, उस वक्त उसको जिस आलोकिक सुख की अनुभूति होती है?... वो अद्वितीय है. अह्हा!! आनन्दम आनन्दम!! क्या उसका यह जरा सा सुख भी छीन कर ही मानियेगा?
चौराहा सूना करवाईयेगा क्या? आधा लोग तो चाय-पान की दुकान पर सुबह इक्कठा ही इसलिए होता है कि फ्री का अखबार पढ़ लिया जायेगा. एक पन्ना तू, एक मैं और फिर बदल कर. फिर उस पर चर्चा. कितना अच्छा लगता है चहल पहल देखे है? चौराहे पर. मगर आप कहाँ बर्दाश्त कर पा रहे हैं. न खुदे रौनक पैदा करते है, न कौनो रौनक बच रहने देना चाहते हैं.
कभी सोचे है कि बड़े सरकारी अधिकारी दफ्तर जा कर क्या करेंगे अगर अखबार नहीं आयेगा? मख्खी मारेंगे क्या? मख्खी मारने की तनख्वाह मिलती है भला?और जो उनको नाक-कान में सरसराहट हुई तो बैठे-बैठे .... कितना जरुरी है उनके लिए अखबार.
और फिर जरा ऊँचा दिखने की आपकी ख्वाहिश तो जाने कबकी मर गई है. मरी क्या, थी ही नहीं मगर जिनमें है, उनको तो अंग्रजी का फायनेनशियल टाईम पढ़ते पढ़ते पब्लिक पलेस में जगह जगह अंडरलाईन करने दिजिये. उनकी अभिजात्यता से भी कौनो दुश्मनी है क्या? उ क्या बिगाड़े हैं आपका?
क्या क्या बताया जाये आपको रमेश बाबू, सारे नेता लोगों की रैली में चार ठो लोग इक्कठा हो जायें बिना अखबार के तो बहुत बड़ी बात मानियेगा. कहिये तो लिख कर दे दें.
अच्छा रमेश बाबू, जरा गंभीरता से सोचियेगा कभी कि जवान बिटिया के लिए लड़का तलाशते असफल थका हारा मजबूर बाप अपनी माँ और बीबी के ताने या फिर बेटे की स्कूल की बड़ी फीस चुकाने के बाद खाली जेब लिए अपने बेटे से नये फैशन को वाहियात बताते नई जिन्स के लिए नकारता खीजा हुआ मध्यमवर्गीय बाप, इसी अखबार में तो मुँह छिपा कर अपनी हताशा और खीज को ढांक अपने मुखिया होने की रक्षा करता है.
ये वो ही अखबार है जो हर भिनसारे दुनिया भर के बड़े बड़े दुखों को मुख्य पृष्ट पर छाप कर लोगों को अहसास दिलाता है कि तुम्हारा दुख कितना छोटा है और उन्हें हौसला देता है अपने दुखों को भूल एक और दिन हिम्मत से जीने का.
कितनी बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी निभाता है हमारा यह अखबार.
यह भला कभी भी अपनी प्रासंगिगता खो सकता है?
आप नहीं न समझ पायेंगे!!! रमेश बाबू!! आप तो चाय पिजिये!

Akhbaar

वो

रोज मुझे पढ़ती है
कभी मेरे दुख
कभी खुशियाँ
कभी रंगीनियाँ
तो कभी
काले हर्फों में दर्ज
मेरे अवसाद
और
फिर
सर झटक कर
मगन हो जाती है
अपनी किसी और दुनिया में...
अखबारों की भला उम्र ही कितनी होती है!!!
-समीर लाल ’समीर’

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