मंगलवार, 28 अगस्त 2012

भारतीय प्रेस कानून और भारतीय संविधान की विशेषताएँ



Programme: 
Year / Semester: 
1st Semester
Objective: 
पत्रकारिता के छात्र के लिए भारतीय संविधान का प्रारम्भिक ज्ञान अपरिहार्य है। इसके बिना कोई भी पत्रकार अपना दायित्व सुचारू ढंग से निभा नही सकता। इस इकाई का उद्देश्य भारतीय संविधान का एक सरल परिचय करवाना है ताकि पत्रकारिता के छात्र को संविधान का अर्थ समझने में आसानी हो।
Credits: 
4

खण्ड-()

इकाई -1 भारतीय संविधान की अवधारणा

Concept of Indian Constitution

भारत का संविधान, भारत के संविधान की विशेषताएँ भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकार, राज्य के नीति निर्देशक तत्व

इकाई -2 प्रेस की स्वतन्त्रता और कानून

Freedom & law of Press

प्रेस की स्वतन्त्रता प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रताः ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता संसद का विशेषाधिकार प्रेस की स्वतन्त्रता से सम्बद्ध कुछ महत्वपूर्ण विषय, संेसरशिप अपकीर्ति कॉपीराइट

इकाई -3 प्रेस विषयक अधिनियम

Press Related Act

प्रेस परिषद् और इसके उद्देश्य प्रेस विषयक प्रमुख कानून प्रेस एवं पुस्तक रजिस्ट्रीकरण अधिनियम 1867 शासकीय गुप्त बात अधिनियम 1923 औषधि और चमत्कारिक उपचार (आक्षेपणीय विज्ञापन) अधिनियम 1954 युवक व्यक्ति (अपहानिकर प्रकाशन) अधिनियम 1956 प्रतिलिप्याधिकार अधिनियम 1957 महिलाओं का अशिष्ट रूपण प्रतिषेध अधिनियम-1986 मानहानि अधिनियम

खण्ड-()

इकाई -1 सूचना प्रौद्योगिकी से सम्बन्धित एवं अन्य मीडिया कानून

साइबर व केबल माध्यम: वर्तमान परिप्रेक्ष्य साइबर व केबल कानून दि केबल टेलीविजन नेटवर्क (रेग्यूलेशन) एक्ट 1995 सूचना प्रोद्योगिकी कानून 2000 अन्य मीडिया कानून: श्रमजीवी पत्रकार और अन्य समाचार पत्र, कर्मचारी अधिनियम 1955, प्रसार भारतीय अधिनियम 1990 सिनेमेटोग्राफ एक्ट 1952

इकाई -2 नैतिकता के नियमों की आवश्यकता पत्रकारिता में आचार संहिता की आवश्यकता और उसका प्रभाव।

Need for code of ethics, important existing Codes & their Effectiveness

पत्रकारिता में आचार संहिता, कानून तथा आचार संहिता, प्रेस आयोग प्रेस परिषद और आचार संहिता पत्रकारिता से सम्बन्धित अन्य आचार संहिताएं, पत्रकारिता तथा विज्ञापन के सम्बन्ध में आचरण के विभिन्न मानक

इकाई-3 सूचना का अधिकार अधिनियम 2005

Right To Information Act. 2005

सूचना का अधिकार: परिचय, क्या है सूचना का अधिकार, अधिनियम 2005 सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया, सूचना के अधिकार के प्रमुख प्रावधान क्या करें यदि सूचना न मिले या प्राप्त जानकारी से सन्तुष्ट न हों मीडिया और सूचना का अधिकार
Suggested Readings: 
  1. बाबेल, डॉ0 बसंतीलाल : पत्रकारिता एवं प्रेस विधि (सिद्धान्त और व्यवहार) सुविधा लॉ हाउस, भोपाल।
  2. मिश्र, अखिलेश : पत्रकारिताः मिशन से मीडिया तक, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली।
  3. मेहता, आलोक : पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखा, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, (2005)
  4. रयाल, राकेश चन्द्र : पत्रकारिता एक परिचय, विन्शर पब्लिकेशन, देहरादून, उत्तराखण्ड
  5. Basu, DD Introduction to the Constitution of India, Prentice Hall of India New Delhi 1985.
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Some Case Law on the Use of Social Media

by Jane Ginn
For this post I’m going to continue on with the social media theme. Let’s now take a look at some of the emerging case law in the U.S.
A Few Cases
I recently did some research on case law that had been published at the International Association of Chiefs of Police (IACP) Social Media site. There were several cases cited that may be of interest to regular users of social media. I’ll summarize some of the key cases below:
Blogging as a Tool: Ranck v. Rundle (2009)
In a Federal case tried in the U.S. District Court in the Southern District of Florida a prosecuting attorney by the name of Ranck wrote a memo on a police shooting where he identified possible problems with the investigation. He was later removed from the investigation. He then made a blog post that referenced the details that he had originally conveyed in the memo to his superiors. He was subsequently suspended for 30 days. The case was based on whether or not his First Amendment rights had been violated by the suspension since he made the blog post as a private citizen. The court ruled in favor of the employer. Here is a link to a summary of the case.
Sexual Harassment on an Online Bulletin Board: Blakey v. Continental Airlines (2000)
In this case a female pilot sued her employer for sexual harassment and a hostile working environment. Messages had been posted on a Crew Members Forum accessed by all pilots and hosted by Compuserve; however a link was provided to the Forum from the company’s management portal. The case went to the NJ State Supreme Court. The findings of the court appeared to come down to a jurisdictional issue as to venue, rather than the subject matter of the case. Here is a link to the Supreme Court decision.  The decision in the Appellate Court laid out the facts of the case more succinctly. Blakey v. Continental Airlines, Inc., 992 F.Supp. 731 (D.N.J.1998); Blakey v. Continental Airlines, Inc., 2 F.Supp.2d 598 (D.N.J.1998)
Here Blakey was awarded $875,000 in damages.
Online Threat Made on MySpace Page in Murder Trial: Antoine Levar Griffin v. State of Maryland (2010)
In this case an appellant who had been convicted of second degree murder as well as several other violent crimes had made threats to a girlfriend who subsequently made a post to her MySpace page. She documented the threatening behavior. The decision was based on whether or not the material was admissible in court with proper authentication. The State Appellate Court in Maryland ruled in favor of the lower court and allowed the evidence. A PDF of the decision is given here:
Posting by Law Officer on Arrest of Singer: Cromer v. Lexington/Fayette Urban County Gov. (2009)
In this case a Lexington, KY police officer made the DUI arrest of singer John Michael Montgomery. The officer them made several derogatory posts on his MySpace page regarding the event and also posted a photograph of himself and the singer at the time of the arrest. The officer was later fired for misconduct. The Trial Court and the Court of Appeals both ruled in favor of the action of the police department. The summary is given here:
Conclusion
This was by no means an exhaustive search, but it did show a general trend. The trend is that the rulings by the courts have generally been in favor of prudent decision-making. It also shows that there is now precedence set on the use of information from social media sites as proper evidence in a legal case if proper authentication is presented. In each case it was shown that one of the parties was not in compliance with stated policy that had been communicated by the other party before the event in question.
The moral of this story is: really read those policies on your obligations when you join a company and when the management team sends you updates. It is good to know your obligations regarding your use of social media.
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सोशल मीडिया की सीमा ?

पोस्टेड ओन: 23 Apr, 2012 सोशल इश्यू में
सोशल मीडिया जिसे आज आम जनता एक सूचना के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने लगी है आज एक ऐसी बहस में उलझ कर रह गया है कि उसे भारत जैसे देश में कितनी स्वतंत्रता दी जानी चाहिए क्योंकि इसकी ताक़त को कुछ लोग ऐसे कामों में प्रयोग करने लगे हैं जिसका किसी भी तरह से समर्थन नहीं किया जा सकता है. इस मामले पर ताज़ा बहस की शुरुवात प्रेस काउन्सिल के चेयरमैन जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने की है क्योंकि उनका मानना है कि जब तक आज़ादी के साथ सोशल मीडिया पर कानूनी लगाम नहीं लगायी जाएगी तब तक देश में किसी की भी इज्ज़त सुरक्षित नहीं है. इसका उदहारण हाल ही में जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद के साथ एक केन्द्रीय मंत्री पर अनुचित दबाव बनाने के लिए जिस तरह से एक सीडी से छेड़छाड़ की गयी और उसे कोर्ट के निर्देश के बाद भी सोशल मीडिया पर जारी कर दिया गया उसके बाद इस तरह की आशंकाओं को भी बल मिला है कि कोई भी किसी को भी बदनाम करने के लिए इस तरह की हरकतें कर सकता है ? अब यह देश को तय करना है कि आने वाले समय में इस तरह की घटनाओं और हरकतों से किस तरह से निपटना चाहिए इस बारे में साइबर एक्सपर्ट लोगों की राय भी लेनी चाहिए और दुनिया के अन्य देशों में अगर इस तरह की हरकतों पर नियंत्रण लगाने की कोशिशें हुई हैं या कोई कानून है तो उनका भी अध्ययन किया जाना चाहिए और उसके बाद किसी नियंत्रित करने वाले कानून को बनाया जाना चाहिए.
इस तरह की बहस सबसे पहले केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने शुरू की थी तब उनके उन सुझावों को ऐसा माना गया था कि जैसे सरकार पूरे सोशल मीडिया पर ही पाबन्दी लगाने जा रही है यहाँ तक इन्हीं विभिन्न सोशल मीडिया के विभिन्न स्थानों पर उनका भी आपत्तिजनक तरीके से मज़ाक उड़ाया गया था. जबकि उस समय उनके कहने का तात्पर्य भी कुछ इस तरह का ही था क्योंकि वे भी सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और उन्होंने उस समय कुछ विचार करके ही इस बात को कहा होगा. अब जब प्रेस के मामलों को देखने के लिए गठित प्रेस काउन्सिल के चेयरमैन की तरफ़ से ही इस तरह की बात कही जा रही है तो उसके ख़िलाफ़ कोई क्यों नहीं बोल रहा है ? जस्टिस काटजू ने यह बहुत ही सामयिक बात कही है कि सोशल मीडिया को आज़ादी के साथ जिम्मेदारियों का भी एहसास होना चाहिए क्योंकि जब कोर्ट ने मना किया था तो इस तरह से क्यों इस सीडी को जारी किया गया ? क्या इसे जारी करने वाले लोगों के इसमें छेड़छाड़ करने को मान लेने के बाद भी इसे जारी करना उचित था इससे तो यही लगता है कि इसके पीछे किसी और का शातिर दिमाग़ काम कर रहा था ? हालाँकि कोर्ट में मामले के होने से यह आपत्तिजनक सीडी जल्दी ही हटा दी गयी पर मसला तो वहीं पर रह गया है क्योंकि इसे एक चेतावनी के तौर पर देखा जाना चाहिए और इसे राजनैतिक चश्में के बजाय सामाजिक संतुलन और मर्यादाओं के सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए.
इस तरह की किसी भी आपत्तिजनक किसी भी सामग्री रोक लगाने के लिए कोई कानून तो देश में होना ही चाहिए और उसका कड़ाई से पालन कराया जाना चाहिए क्योंकि इस शक्ति का दुरूपयोग अनामित लोग समाज में घृणा फ़ैलाने के लिए भी कर सकते हैं या फिर किसी संवेदनशील मसले पर इस तरह से कुछ भी जारी करके देश के सामाजिक ताने बाने को तोड़ने का काम भी कर सकते हैं. अभी इसका जो स्वरुप दिखाई दे रहा है वह व्यक्तिगत आक्षेपों तक ही सीमित है पर इस बात की कौन गारंटी ले सकता है कि आने वाले समय में इसका किसी धार्मिक या सामाजिक विवाद में दुरूपयोग नहीं किया जायेगा ? देश में इस बारे में कानून इतने कड़े होने चाहिए कि सोशल मीडिया चलाने वाली कम्पनी पर भी इस की कुछ ज़िम्मेदारी डाली जाये हालांकि यह उतना आसान काम नहीं होगा क्योंकि इस तरह की कम्पनियां यह कहकर बचने की कोशिश करती हैं कि उन पर देश के कानून लागू नहीं होते हैं पर अब देश में कानून ऐसे होने चाहिए कि भले ही सोशल मीडिया कम्पनी के ख़िलाफ़ सीधी कार्यवाही संभव न हो पर इन्टनेट प्रदाताओं को एक आदेश के ज़रिये उस पूरे सोशल मीडिया को अस्थायी रूप से रोकने के आदेश देने का हक़ तो सरकार के पास होना ही चाहिए. इस तरह के अधिकारों का दुरूपयोग सरकार में बैठे लोग भी कर सकते हैं पर जागरूकता के इस दौर में कोई भी सरकार इस तरह के कदम नहीं उठाना चाहेगी. सरकार द्वारा इस अधिकार का दुरूपयोग करने से कम से कम देश की सामजिक समरसता पर कोई दुष्प्रभाव तो नहीं पड़ेगा और किसी भी सरकार से निपट लेने का अधिकार हर भारतीय नागरिक के पास मौजूद है.
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है
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