रविवार, 26 अगस्त 2012

रघुवीर सहाय


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रघुवीर सहाय
रघुवीर सहाय
पूरा नाम रघुवीर सहाय
जन्म 9 दिसंबर, 1929
जन्म भूमि लखनऊ, उत्तर प्रदेश
मृत्यु 30 दिसंबर, 1990
मृत्यु स्थान दिल्ली
पति/पत्नी विमलेश्वरी सहाय
कर्म-क्षेत्र लेखक, कवि, पत्रकार, सम्पादक, अनुवादक
मुख्य रचनाएँ लोग भूल गये हैं, आत्महत्या के विरूद्ध, हंसो हंसो जल्दी हंसो, सीढियों पर धूप में आदि
भाषा हिन्दी, अंग्रेज़ी
विद्यालय लखनऊ विश्वविद्यालय
शिक्षा एम. ए. (अंग्रेज़ी साहित्य)
पुरस्कार-उपाधि साहित्य अकादमी पुरस्कार (लोग भूल गए हैं)
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी रघुवीर सहाय 'नवभारत टाइम्स', दिल्ली में विशेष संवाददाता रहे। 'दिनमान' पत्रिका के 1969 से 1982 तक प्रधान संपादक रहे। उन्होंने 1982 से 1990 तक स्वतंत्र लेखन किया।
इन्हें भी देखें कवि सूची, साहित्यकार सूची
हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध साहित्यकार रघुवीर सहाय (जन्म- 9 दिसंबर, 1929 लखनऊ - मृत्यु- 30 दिसंबर, 1990 दिल्ली) की गणना हिंदी साहित्य के उन कवियों में की जाती है जिनकी भाषा और शिल्प में पत्रकारिता का प्रभाव होता था और उनकी रचनाओं में आम आदमी की व्यथा झलकती थी। रघुवीर सहाय एक प्रभावशाली कवि होने के साथ ही साथ कथाकार, निबंध लेखक और आलोचक थे। वह प्रसिद्ध अनुवादक और पत्रकार भी थे। उन्हें वर्ष 1982 में उनकी पुस्तक 'लोग भूल गये हैं' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। उनकी अन्य पुस्तकें 'आत्महत्या के विरूद्ध', 'हंसो हंसो जल्दी हंसो' और 'सीढियों पर धूप में' भी काफी चर्चित रहीं। सहाय का सम्बंध उस पीढी से था जो स्वतंत्रता के बाद काफी सारी आकांक्षाओं के साथ पली-बढी थी। सहाय ने उन्हीं आकांक्षाओं को अपनी कविताओं में व्यक्त किया है। सहाय की गिनती ऐसे कवियों में भी की जाती है जो प्रेरणा के लिए अतीत में झांकने के बजाय भविष्योन्मुखी रहना पसंद करते थे।
जन्म

रघुवीर सहाय का जन्म 9 दिसंबर, 1929 को लखनऊ में हुआ। उन्होंने 1955 में विमलेश्वरी सहाय से विवाह किया।
शिक्षा

रघुवीर सहाय 1951 में 'लखनऊ विश्वविद्यालय' से अंग्रेज़ी साहित्य में एम. ए. किया और साहित्य सृजन 1946 से प्रारम्भ किया। अंग्रेज़ी भाषा में शिक्षा प्राप्त करने पर भी उन्होंने अपना रचना संसार हिंदी भाषा में रचा। 'नवभारत टाइम्स के सहायक संपादक तथा 'दिनमान साप्ताहिक के संपादक रहे। पश्चात स्वतंत्र लेखन में रत रहे। इन्होंने प्रचुर गद्य और पद्य लिखे हैं। रघुवीर सहाय 'दूसरा सप्तक के कवियों में हैं।[1]
कार्यक्षेत्र

रघुवीर सहाय दैनिक 'नवजीवन' में उपसंपादक और सांस्कृतिक संवाददाता रहे। 'प्रतीक' के सहायक संपादक, आकाशवाणी के समाचार विभाग में उपसंपादक, 'कल्पना'[2] तथा आकाशवाणी[3], में विशेष संवाददाता रहे। 'नवभारत टाइम्स', दिल्ली में विशेष संवाददाता रहे। समाचार संपादक, 'दिनमान' में रहे। रघुवीर सहाय 'दिनमान' के प्रधान संपादक 1969 से 1982 तक रहे। उन्होंने 1982 से 1990 तक स्वतंत्र लेखन किया।
रचना के विषय

सहाय ने अपनी कृतियों में उन मुद्दों, विषयों को छुआ जिन पर तब तक साहित्य जगत में बहुत कम लिखा गया था। उन्होंने स्त्री विमर्श के बारे में लिखा, आम आदमी की पीडा ज़ाहिर की और 36 कविताओं के अपने संकलन की पुस्तक 'आत्महत्या के विरूद्ध' के जरिए द्वंद्व का चित्रण किया। सहाय एक बडे और लंबे समय तक याद रखे जाने वाले कवि हैं। उन्होंने साहित्य में अक्सर अजनबीयत और अकेलेपन को लेकर लिखी जाने वाली कविताओं से भी परे जाकर अलग मुद्दों को अपनी कृतियों में शामिल किया। सहाय राजनीति पर कटाक्ष करने वाले कवि थे। मूलत: उनकी कविताओं में पत्रकारिता के तेवर और अख़बारी तजुर्बा दिखाई देता था। भाषा और शिल्प के मामले में उनकी कविताएं नागार्जुन की याद दिलाती हैं। अज्ञेय की पुस्तक 'दूसरा सप्तक' में रघुवीर सहाय की कविताओं को शामिल किया गया। उस दौर में तीन नाम शीर्ष पर थे - गजानन माधव मुक्तिबोध फंतासी के लिए जाने जाते थे, शमशेर बहादुर सिंह शायरी के लिए पहचान रखते थे, जबकि सहाय अपनी भाषा और शिल्प के लिए लोकप्रिय थे।[4]
शैली

शब्द भण्डार की दृष्टि से रघुवीर सहाय का चिंतन, उनकी रचनायें और अभिव्यक्ति पक्ष कहानियों के माध्यम से सशक्त बनकर प्रकट हुआ है। कथाकार ने अपनी कहानियों के माध्यम से भाषा का पारम्परिक मोह त्यागकर सरल और बोलचाल की भाषा, जो आम आदमी के समीप होती है, का उपयोग अपनी कहानियों में बखूबी किया है। रघुवीर सहाय की कहानियां हमें यह संदेश देती है कि भाषा के विविध स्तरों का यथोचित उपयोग कैसे किया जाये। रघुवीर सहाय ने अपनी अधिकतर कहानियों की विषय-वस्तु के रूप में राजनीति, राष्ट्र, महिलाओं, शोषितों, पीड़ितों, सामाजिक सम्बन्धों एवं जन समस्याओं सम्बन्धी विषयों की प्रकृति को विशेष स्थान दिया है। रघुवीर सहाय की कहानियों में मोटर, फ़िल्म, चीक, भूख, कुण्ठा, रोटी से लेकर झोपड़ी, आग तथा संस्कृत जैसे शब्दों का उल्लेख किया गया है। अतः निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि रघुवीर सहाय की कहानियों में शब्द भण्डारों का अथाह सागर समाहित है।[5]
मुहावरों का प्रयोग

रघुवीर सहाय ने अपनी कहानियों में मुहावरों एवं कहावतों का प्रयोग किया है। साहित्य में रोचकता एवं सौन्दर्य वृद्धि के लिये इनका बहुत ही महत्व है -

न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी
आधा तीतर आधा बटेर
अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता
'जीवन में मृत्यु नहीं होती
मृत्यु तो ममत्व का दूसरा नाम है
सदैव सत्य बोलो
गाँवों का उजड़ना और शहरों का उखड़ना
गुलामी के मजे और आज़ादी का भय
नारी शक्ति की मूर्त्त मूर्ति है
फूल से फूल की शोभा है' आदि मुहावरों का सुंदर प्रयोग किया है।[5]
कहानियों में संवाद योजना

रघुवीर सहाय की कहानियों में संवाद योजना सामान्य बातचीत एवं भाषा की सम्प्रेषणीयता के कारण यथार्थ का बोध कराती हैं। विजेता कहानी के एक उदाहरण द्वारा इसे समझा जा सकता है -

'मैं सब ठीक कर दूँगा, तुम डरो नहीं।'
'तुम कर ही क्या सकते हो?' वह बोली।
'क्यों, जब मैं एक काम कर सकता हूँ तो दूसरा भी कर सकता हूँ। .......... तुम घबराती क्यों हो ? सिर्फ तुम्हें थोड़ी सी तकलीफ होगी।'

* इसी तरह रघुवीर सहाय की एक कहानी 'चालीस के बाद प्रेम' का उदाहरण भी दिया जा सकता है-

'श्यामलाल जी ने कहा बिल्ली है।'
'आपकी बिल्ली है?' नौजवान ने पूछा।
श्यामलाल ने कहा - 'जी हाँ, मेरी बिल्ली है।'
'पुलिया के नीचे चली गई है?'

* 'सीमा के पार का आदमी' नामक कहानी में संवाद योजना को भाषा की सरलता का एक उदाहरण देखा जा सकता है-

'तो क्या आपने उन सबको भूखा-प्यासा मार डाला, यानी भूखे-प्यासे को गोली से मार डाला?'
'नहीं जनाब, आखिर उनको अकल आई और उन्होंने समर्पण किया मगर इस शर्त पर कि हम शर्त पर कि हम उनकी जान बख्श देंगें।'
'और आपने उनकी जान बख्श दी?'
'जी हाँ, हमने उन्हें कत्ल नहीं किया। हम उनकी इज्जत कर रहे थे, क्योंकि वे आखिरी दम तक लड़े थे।'[5]
वाक्य विन्यास

रघुवीर सहाय ने अपनी कहानियों में वाक्य विन्यास के रूढ़ नियमों से अपने को दूर रखा। रघुवीर सहाय ने अपने वाक्य विन्यास के माध्यम से अपनी कहानियों को एक नया आयाम दिया। हालांकि उनकी कहानियाँ वैयक्तिक होने के कारण उन्हें पूर्णतया समझ पाना तो कठिन है किन्तु सामान्यतः कहा जा सकता है कि वे सभी प्रयोगों के लिये सभी प्रकार के वाक्यों के प्रयोग को योग्य मानते है। किसी दृश्य को जब वह क्रमिक बिम्बों का रूप देना चाहते है तो उनके व्याकरण चिह्नों का प्रयोग द्वारा लम्बे वाक्यों का प्रयोग उन्हें उपर्युक्त लगता है। लगता है जैसे सब कुछ सहज स्वाभाविक रूप से सामने आ रहा है। वास्तव में उनका विषय उसमें आई भावना और विचारधारा तथा उसे प्रकट करने की अत्यन्त संक्षिप्त वाक्य रचना भी पर्याप्त रूप से दिखाई देती है। जो दृढ़ और ठण्डी भंगिमा से शक्ति पाकर नग्न यथार्थ की भयावहता तथा संश्लिष्ट मानव रागों की उत्कटता व्यंजित करता है। सच्चिदानन्द वात्स्यायन अज्ञेय के अनुसार -

अपने छायावादी समवयस्कों के बीच बच्चन की भाषा जैसे एक अलग अस्वाद रखती थी और शिखरों के की ओर न ताककर शहर के चौक की ओर उन्मुक्ति, उसी प्रकार अपने विभिन्न मतवादी समवयस्कों के बीच रघुवीर सहाय भी चट्टान पर चढ़ नाटकीय मुद्रा में बैठने का मोह तोड़ साधारण घरों की सीढ़ियों पर धूप में बैठकर प्रसन्न है।[6] यह स्वस्थ भाव उनकी कहानियों को एक स्निग्ध मर्मदर्शिता दे देता है। जाड़ों के घाम की तरह तात्क्षणिक गरमाई भी है और एक उदार खुलापन जिसको हम दे दिये जाते हैं। जैसे वाक्य विन्यास आलोच्य कहानीकारों की कहानियों में जगह-जगह दिखाई देते हैं।

भाषा शैली
हँसो हँसो जल्दी हँसो (पुस्तक का आवरण पृष्ठ)

रघुवीर सहाय जी की भाषा को गद्य और पद्य में विभाजित करना एक दुष्कर कार्य है। वह परम्परागत रूप से अर्जित किये गये मानक गद्य को गद्य नहीं रहने देते और उनका पद्य-पद्य नहीं रह जाता। भाषा को अपने तरीके से तोड़ना शब्दों को नए अर्थ अनुषंगों से जोड़ना, वाक्य रचना में व्याकरण के मानकों की अवहेलना हर कहीं, उनकी हर विधा में देखी जा सकती है। कहानी के एक अनुच्छेद को अगर पंक्तियों में विभाजित करके शब्दों के क्रम को जरा इधर-उधर टुकड़े-टुकड़े करके लिख दिया जाय तो वह कविता हो जाएगा और कविता को गद्य के धारा प्रवाह रूप में समेंट लिया जाय तो वह किसी कहानी का अनुच्छेद बन जाएगा।

रघुवीर सहाय जी की भाषा इतनी प्रयोगात्मक है कि उसने अपनी विधात्मक अस्मिताओं को बिसरा दिया है। कहानी की भाषा कविता के निकट और कविता की भाषा कहानी के निकट दिखाई देती है, इसीलिए रघुवीर सहाय जी की उन कहानियों में जहाँ ज़िन्दगी अपने पूरे क़द में व्यक्त हुई है, भाषा अधिक ठोस, सार्थक और यथार्थ है। जैसे इस कथात्मक सूक्ति में एक साथ ही कविता, कहानी और निबन्ध की भाषाएँ सिमट गईं हैं - गरीबी और गिरावट का एक दिन होता है, जब आदमी अपने से जरा मज़बूत आदमी से डरने लगता है। इसको लोग कर्तव्य और संतुलन कहते हैं।

* कहानियों में काव्य भाषा का प्रयोग

'आकाश नील से धोए भीगे वसन की भांति स्वच्छ है। साड़ी में टँके सितारों की तरह तारे जगमगा रहे हैं। उनमें न कोई क्रम है न कोई शैली। उच्छृंखलता में भी कितना सौन्दर्य है।'

* मुहावरेदार भाषा का प्रयोग देखिये -

'मैंने सोचा बस मगर इसे ही काफी अफसोस की बात होनी चाहिए क्योंकि एक तो गाड़ी वैसे ही ठचर-मचर हो रही थी, ऊपर से इस नट के गिर जाने से वह बिल्कुल ठप हो जाएगी, क्या कहावत है वह गरीबी में आटा गीला कितना दर्द है इस कहावत में और कितनी सीधी चोट है। आटा जरूरत से ज़्यादा गीला हो गया और अब दुखिया गृहिणी परात लिए बैठी है उसे सुखाने को आटा नहीं है। यानी आटा है मगर रोटियाँ नहीं पक सकती।'

* भाषा का उत्कृष्ट रूप -

'रूखे सूखे केश क्यों बिखरे हैं ? सफेद आँखे क्यों फटी पड़ रही हैं ? छाती की हड्डियाँ क्यों उभरती आ रही है ? कोई समझेगा ? है कोई पीड़ा का मर्मज्ञ ? विडंबना का महाकाव्य लिखने वाला आदि कवि कहाँ है ?'
कवि या कथाकार

रघुवीर सहाय जी पहले कवि थे, बाद में कहानीकार इसलिए उनकी मूल संवेदना कवि की है। जिस प्रकार वह नितांत भिन्न प्रकार के कवि हैं, उसी प्रकार भिन्न प्रकार के कहानीकार भी थे। रघुवीर सहाय जी ने अपनी कहानियों में गद्य को जगह-जगह तोड़ा है और एक नए किस्म का गद्य लिखने की कोशिश की है। इसमें उनकी कहानी के गद्य की भाषा अधिक अभिव्यक्तिपूर्ण और सर्जनात्मक हो गई है। 'प्रेमिका' कहानी की कुछ पंक्तियां हैं -

‘‘क्या दिन थे वह भी या वह भी क्या दिन थे। हम दोनों भागे हुए थे। गनीमत यह थी कि किसी लक्ष्य को लेकर नहीं भागे थे और दोनों के दो घर में जहाँ रात या दिन के किसी समय हम लौट जा सकते थे। वह रोज घर से भागते और रोज घर के लोगों के पास स्वीकृत हो जाते, यहां तक कि अपनी बड़ी बहन के पास भी जो उसके और मेरे प्रेम में सबसे बड़ी बाधा थी। स्कूल के रास्ते से मैं उसे रोज उड़ा ले जाता। सारे दिन उसके साथ निरूद्देश्य खेलकर उसे फिर से वहीं छोड़ आता जहां से शुरू किया था।’’

रघुवीर सहाय सर्वथा नए शिल्प और नई भाषा में कहानियां लिखते हुए कहानी लिखने के अपने बड़े उद्देश्य को कभी नहीं भूलते। वे अपनी कहानियों के माध्यम से पाठकों में परिवर्तन की इच्छा और सामर्थ्य पैदा करना चाहते हैं। इसीलिए अपनी कहानियों के द्वारा उनकी कोशिश एक संपूर्ण मनुष्य बनाने की होती है। उन्होंने अपने अंतिम कथा संग्रह का नाम ही रखा था, ‘जो आदमी हम बना रहे हैं।’ इस कहानी संग्रह का समर्पण वाक्य था, किशोर को जो तरूण हो रहे हैं।’’ तरूण के रूप में निर्मित हो रहे किशोरों से रघुवीर सहाय जी का यह जुड़ाव यों ही नहीं है। वे जानते हैं कि तरूण बनते किशोर को एक ऐसे आदमी के रूप में आसानी से ढाला जा सकता है जो समता, न्याय और अपने अधिकारों के लिए आसानी से जागरूक हो। जो आदमी हम बना रहे हैं कि भूमिका में उन्होंने इन मूल्यों से अपनी कथा रचना के रिश्ते को रेखांकित करने का प्रयास किया है। स्पष्टतः कहानी की रचना प्रक्रिया की यह शल्य क्रिया कोई कोरा बुद्धि विलास या खिलंदड़ापन नहीं था। रचना को जीवन के कितने क़रीब लाकर उसकी सांस का स्पंदन और उसकी ऊष्मा को अनुभव किया जा सकता है ? आखिर कितने क़रीब ? ‘मेरे और नंगी औरत के बीच’ इसी को व्यक्त करती कहानी है। जैसे -

‘‘हम दोनों फिर आमने-सामने बैठे हुए थे। इस बार वह घोर जाड़े में बिना किसी दूसरे वस्त्र के ठिठुरी हुई एक स्त्री थी और मैं अपने कोट की गरमाई में लगभग समपृरक्त एक पुरूष जिसके हृदय में केवल एक इच्छा थी या कि वह विचार था या भावना थी नहीं जानता पर जो कुछ थी वह एक भी उसे ओढ़ा दूँ अपना कम्बल, यह मैंने, बाद में जाना जब देखा कि अपना कम्बल मैं नहीं ओढ़े हूँ। बाद में मैंने यह भी जाना कि जिस इच्छा से समस्त शरीर और संपूर्ण मन एकाकर हो गया है और जो मेरे जीवन के संपूर्ण अनुभवों में से संपूर्णतम है वह स्वयं अमर नहीं है जिस क्षण उसे कार्यरूप मिलेगा वह क्षय हो जाएगी। पर मुझे वह अमर करेगी और मुक्त रखेगी और स्वयं मर जाएगी, मैंने संतोष से कहा।’’

शैली

शमशेर बहादुर के अनुसार रघुवीर सहाय ने भी शैली को व्यक्तित्व का अंश माना है। व्यक्तित्व के साथ ही शैली का विकास होता है। शैली का विकास होते-होते वह दिन भी आता है कि बिना नाम मुहर के भी लाखों के बीच व्यक्तित्व की ही तरह शैली भी आप से आप पहचानी जा सकती है। छोटे-छोटे वाक्य, चलते फिरते मुहावरें, साफ सुधरे शब्द यहाँ तक कि छोटे से छोटे पैराग्राफ को भी उत्तम उपादान माना है। शैली अभ्यास खोजती है और व्यक्तित्व के निर्माण की तरह शैली का निर्माण भी प्रारम्भ से कुछ पथ प्रदर्शन चाहता है। रघुवीर सहाय की शैली पर उनके व्यक्तित्व की स्पष्ट छाप है उपर्युक्त गुण उनकी शैली में मिल जाते है। रघुवीर सहाय की कहानियों में विभिन्न शैलियों के रूप दृष्टिगोचर होते हैं। भावात्मक शैली, काव्यात्मक शैली, व्यंग्य विनोद शैली, लाक्षणिक शैली, प्रतीकात्मक शैली, आत्मकथात्मक शैली, डायरी शैली, चित्रात्मक शैली, संस्मरणात्मक शैली, अलंकारिक शैली, मनोवैज्ञानिक शैली, खोजपूर्ण शैली इत्यादि।

* वर्णनात्मक शैली का एक उदाहरण रघुवीर सहाय की एक रचना में देखा जा सकता है -

‘‘बर्फ़ सड़कों पर फुटपाथों पर और दरवाजों के सामने ढ़ेर भी ज़्यादातर सफेद कहीं-कहीं धूल से मैली मगर कहीं-कहीं दूध से उज्ज्वल। मस्क्वा की और सड़कों की तरह वह भी चौड़ी और साफ थी रद्दी या कचड़ा का एक टुकड़ा भी उस पर नहीं था। फुटपाथ पर पत्रहीन वृक्षों के थालों में काली भींगी मिट्टी तक साफ दिखती थी। हवा में धूल का कहीं नाम तक नहीं था। स्कूल से लौटते लड़के लड़कियाँ सौदे के बाजार जाती औरतें और नौजवान पुरूष फुटपाथ पर चलते हुये एक अजनबी हिन्दुस्तानी को देखने के लिये क्षण भर ही सिर उठाते, अन्यथा वे अपने में मस्त थे।

* प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन -

जैसे फल पकता है, पूरब की दिशा लाल होने लगी और फिर प्रभात हुआ। रेत में फँसी हुई नौका की भाँति पश्चिमी का चाँद उधर उस कोने में आधे उजले आकाश में धँसा हुआ था।

* रघुवीर सहाय की रचनाओं में भावात्मक शैली का एक उदाहरण देखा जा सकता है। भावात्मक शैली रघुवीर सहाय के नाटकों, कहानी, उपन्यास, यात्रा साहित्य आदि सभी विधाओं में देखने को मिल जाते हैं।

रूद्ध स्वर पश्चाताप है इस प्रकार भूल मानकर सरल रामू की माँ मैं समझ गया मैं भूल कर रहा था। तुम ठीक कहती हो मैं किसी भी वर्ग समाज से नहीं डरूँगा। मैं तो केवल आदमी हूँ जिसे जीवित रहना है। क्योंकि उसने जीवित रहने के लिये ही जन्म लिया है। यदि मैं स्वयं भूख से मर जाऊँ तो यह खुद मेरे लिये लज्जा की बात होगी। फिर मुझ पर तुम्हारा जिम्मा है, उठो, दिया जलाओ, मुझे घर में अंधेरा अच्छा नहीं लग रहा है।

शब्द संयोजन

रघुवीर सहाय ने अपनी कहानियों में देशी-विदेशी और देशज शब्दों का प्रयोग खुलकर किया है। रघुवीर सहाय की भाषा साधारण जनसमूह द्वारा समझे जा सकने वाली हिन्दी है। वह उसके संस्कृतनिष्ठ होने को जनता से अलग कर दिया समझते है। पत्रकार होने के कारण उनकी भाषा लोकभाषा है जनभाषा है या कहें की अखबारी भाषा है। जिसका प्रयोग आपकी कहानियों में सर्वत्र दिखाई पड़ता है। इसलिये अरबी एवं फारसी की शैली आपकी भाषा में घुल मिल गई है। आपकी कहानियों में हिन्दी, अंग्रेजी, बंगाली तथा उर्दू आदि शब्दों का प्रयोग मिलता है।[5]
निधन

रघुवीर सहाय का निधन 30 दिसंबर 1990 को नई दिल्ली में हुआ।
प्रकाशित रचनाएँ

कविता संग्रह

दूसरा सप्तक,
सीढ़ियों पर धूप में,
आत्महत्या के विरूद्ध,
हँसो हँसो जल्दी हँसो,
कुछ पते कुछ चिट्ठियाँ,
एक समय था।

कहानी संग्रह

रास्ता इधर से है,
जो आदमी हम बना रहे हैं ।

निबंध संग्रह

दिल्ली मेरा परदेस,
लिखने का कारण,
ऊबे हुए सुखी,
वे और नहीं होंगे जो मारे जाएँगे,
भँवर लहरें और तरंग,
अर्थात।

इनके अलावा दर्जनों अनुवाद किये हैं।

सम्मान

रघुवीर सहाय को 1982 में लोग भूल गए हैं कविता संग्रह पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था।

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