गुरुवार, 30 अगस्त 2012

विकीलीक्स और नेट की खोजी पत्रकारिता / पीयूष पांडे



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पीयूष पांडे
अमेरिका की मशहूर टाइम पत्रिका ने चंद साल पहले इस वेबसाइट के उद्देश्य और काम को देखते हुए लिखा था-“ ये साइट भविष्य में सूचना कानून की स्वतंत्रता की तरह ही महत्वपूर्ण पत्रकारीय औजार बन सकती है।” टाइम के लिखे ये शब्द अब साइट पर विकीलीक्स की ब्रांडिंग करते हैं। लेकिन, इन शब्दों का अर्थ एक बार फिर पूरी दुनिया ने बीते सोमवार को जाना-समझा। विकीलीक्स डॉट ओआरजी की साइट पर अफगानिस्तान में जारी जंग के बीते छह सालों का कच्चा चिट्ठा करीब 90 हजार पेजों के रुप में रखा गया तो पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया। अमेरिकी रक्षा विभाग के गोपनीय दस्तावेजों के जरिए साफ हो गया कि पाकिस्तान का खुफिया संगठन आईएसआई तालिबान के सबसे बड़े मददगार रहे हैं और अभी भी बने हुए हैं।
विकीलीक्स के भंडाफोड़ के बाद अमेरिकी सरकार तमतमायी हुयी है। उसका रक्षा विभाग हिल गया है क्योंकि ये दस्तावेज आतंकवाद से लड़ने की अमेरिकी रणनीति पर ही सवाल उठा रहे हैं। वह जिसके भरोसे यह लड़ाई लड़ रहा था, वही दुश्मन से मिला हुआ है। गोपनीय दस्तावेजों के लीक होने से अमेरिका की जबरदस्त किरकिरी हुई है, लिहाजा उसने विकीलीक्स के ‘खुलासे’ को संघीय कानून का उल्लंघन बता डाला है।
दिलचस्प है कि चंद दिन पहले अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन इस बात से परेशान था कि विकीलीक्स अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट से सम्बंधित तमाम क्लासिफाइड केबल्स की जानकारी अपनी वेबसाइट पर डालने वाली हैं, जिसके सामने आने से अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो सकता है। पर नींद उड़ायी अफगानिस्तान जंग से संबंधित दस्तावेजों ने। लेकिन, सवाल अमेरिका का नहीं, विकीलीक्स का है। भंडाफोड़ पत्रकारिता को नया पैनापन देती साइबर दुनिया की एक अदद वेबसाइट कई हुकूमतों को नागवार गुजर रही है। दरअसल, यह एक ऐसी वेबसाइट है जो उन महत्वपूर्ण दस्तावेजों को सामने लाने की कोशिश करती है, जिन्हें दुनिया भर की सरकारें छिपाती फिरती हैं। वेबसाइट का काम विभिन्न सरकारों के उन गुप्त दस्तावेजों को प्रकाशित करना है, जिन्हें दुनिया भर के राजनैतिक कार्यकर्ताओं, सरकारी कर्मचारियों और खोजी पत्रकारों ने हासिल किया है।
जुलाई 2007 से अपने काम को अंजाम देने में जुटी विकीलीक्स अपनी कार्यप्रणाली में बेहद लोकतांत्रिक है। यहां गोपनीय दस्तावेज भेजने वाली की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाती है। लोग ऑनलाइन अथवा पोस्ट के जरिए दस्तावेज भेज सकते हैं। इन दस्तावेजों की प्रामाणिकता की एक टीम बारीकी से जांच करती है। आलम यह कि आवश्यक हुआ तो फॉरेंसिक जांच तक की जाती है। इसके बाद दस्तावेज को ऑनलाइन कर दिया जाता है। विकीपीडिया की तर्ज पर विकीलीक्स का नाम जरुर है, लेकिन यहां पोस्ट किए दस्तावेज को आम लोग संपादित नहीं कर सकते।
विकीलीक्स अपने आप में एक क्रांतिकारी सोच है। आस्ट्रेलियाई मूल के जुलियन असांजे ने इस सोच को अमली जामा पहनाया। हालांकि, लाइवलीकडॉटकॉम और क्रिप्टोमडॉटओआरजी जैसी कुछ साइट्स पहले भी इस तरह के सनसनीखेज रहस्योद्घाटन करती रही हैं, लेकिन विकीलीक्स ने गोपनीय दस्तावेजों को लीक करने के अंदाज को ही बदल डाला। विकीलीक्स ने पूरी दुनिया की सरकारों और प्रशासन को अपने खुलासे की जद में ले लिया। नतीजा-चीन में साइट पर पाबंदी है, जबकि थाइलैंड-अमेरिका समेत कई मुल्कों की नज़र में साइट खटक रही है।
इंटरनेट की ताकत ने विकीलीक्स को ऐसे पंख दिए हैं, जिससे उसकी परवाज़ लगातार ऊंची हो रही है। वैसे, बात विकीलीक्स की भी नहीं है। इंटरनेट ने खोजी पत्रकारिता को वो धार दे दी है, जिसके खोने की बात लगातार कही जा रही थी। इसी साल अप्रैल में अमेरिका के कोलंबिया स्कूल ऑफ जर्नलिज़्म ने 94वें पुलित्जर पुरस्कारों का ऐलान किया तो पहली बार ऑनलाइन समाचार साइट के महत्व पर खास मुहर लग गई। खोजी पत्रकारिता की श्रेणी में एक अवॉर्ड “प्रो पब्लिका डॉट ऑर्ग” को दिया गया है। पेशे से डॉक्टर और न्यूरोसाइंस में पीएचडी कर चुकीं शेरी फिंक ने प्रो पब्लिका के लिए एक खोजी रिपोर्ट तैयार की थी। इस रिपोर्ट में उन्होंने खुलासा किया था कि किस तरह कैलिफोर्निया में कैटरीना तूफान के वक्त न्यू ऑर्लिन्स नर्सिंग होम में मौजूद डॉक्टरों ने अफरातफरी के बीच बुजुर्ग मरीजों को प्राणघातक दवा दे दी। नर्सिंग होम में बिजली नहीं थी। जेननेटर बंद हो चुका था। अस्पताल का बाहरी दुनिया से संपर्क कट गया था। जीवन रक्षक उपकरणों की कमी पड़ने लगी तो डॉक्टरों ने यह तरीका आजमाया। सबसे पहले प्रो पब्लिका पर आई इस रिपोर्ट को कुछ रेडियो स्टेशनों ने प्रसारित किया और कैटरीना तूफान से मची तबाही की चौथी बरसी पर न्यूयॉर्क टाइम्स ने पूरी रिपोर्ट को फिर प्रकाशित किया, जिसने सारी दुनिया का ध्यान खींचा। इस मामले में नए सिरे से जांच शुरु हुई।
प्रो पब्लिका को पुलित्जर मिलने की अहमियत सिर्फ इसलिए नहीं है क्योंकि पहली बार किसी समाचार साइट को इतना प्रतिष्ठित अवॉर्ड मिला। अहमियत इसलिए अधिक है क्योंकि प्रो पब्लिका किसी बड़े समाचार पत्र अथवा टेलीविजन चैनल की वेबसाइट नहीं है। यह एक स्वतंत्र और गैर व्यवसायिक न्यूज साइट है, जो लगातार सामाजिक सरोकारों की रिपोर्ट देती रहती है।
1998 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और मोनिका लुइंसकी मामले का खुलासा ड्रजरिपोर्टडॉटकॉम ने किया था। भारत में भी तहलकाडॉटकॉम ने मैच फिक्सिंग से लेकर रक्षा घोटालों तक कई अहम मामलों का खुलासा किया। लेकिन, प्रो पब्लिका के गैर व्यवसायिक मॉडल ने सामाजिक मसलों या आम लोगों के हितों की पत्रकारिता करने वाली वेबसाइट्स को नयी राह दिखा दी है।
लेकिन, इस कड़ी में विकीलीक्स बिलकुल अलग पायदान पर खड़ी है, जो साल दर साल सनसनीखेज खुलासे कर रही है। 2007 नवंबर में विकीलीक्स पर अमेरिका की कुख्यात गुआंतनामो जेल के अमानवीय हालात के बारे में एक आधिकारिक रिपोर्ट लीक की गई थी। 238 पेजों की इस रिपोर्ट (जेल मैनुअल) में गुआंतनामो जेल में कैदियों को लाने और रखने संबंधी खेदजनक परिस्थितियों से लेकर वहां हो रहे जिनेवा समझौते के खुले उल्लंघन तक का ब्यौरा था। अगस्त 2008 में विकीलीक्स ने ही केन्या के पूर्व शासक डेनियल अलाप मोई के परिवार वालों द्वारा किए गए एक अरब यूरो से अधिक के गबन संबंधी 110 पेज की एक गोपनीय जांच रिपोर्ट भी उजागर कर दी थी, जिससे केन्या की राजनीति में भारी उथल-पुथल मच गई थी। जूरिख के जूलियस बायर बैंक को भी विकीलीक्स ने जबरदस्त झटका दिया जब उसने वहां बेनामी खाते रखने वाले अनेक लोगों का ब्यौरा प्रकाशित कर दिया। हाल में जूलियन असान्जे ने अमेरिका में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके हेलीक़ॉप्टर पर सवार अमेरकी सैनिकों द्वारा बगदाद की सड़कों पर चल रहे निर्दोष इराकी नागरिकों के मारे जाने का वीडियो जारी करके सनसनी फैला दी थी। अब अफगानिस्तान में जारी जंग से जुड़े सनसनीखेज दस्तावेजों ने बखेड़ा खड़ा किया है। दिलचस्प है कि पेंटागन का ही अनुमान है कि विकीलीक्स के पास रक्षा विभाग के तमाम गोपनीय दस्तावेज या तो हैं या पहुंचने वाले हैं।
विएतनाम युद्ध के दौरान डेनियल एलिसबर्ग ने पेंटागन पेपर्स को सार्वजनिक कर न केवल दुनिया को अमेरिकी सच बताया था बल्कि युद्ध को खत्म करने में अहम भूमिका निभाते हुए कई जिंदगियों को बचाया था। विकीलीक्स उसी तर्ज पर काम कर रही है, और उसका मकसद है कि दुनिया के सभी देशों की सरकारें पारदर्शी हों। हालांकि, गोपनीय दस्तावेजों को लीक करना कितना सही है-इस पर बहस की बड़ी गुंजाइश है।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने पेंटागन पेपर्स मामले में कहा था-केवल स्वतंत्र और टोकाटोकी से मुक्त प्रेस ही सरकार की कारगुजारियों का खुलासा कर सकती है। इसमें कोई शक नहीं कि आज मीडिया के सामने स्वतंत्रता और पारदर्शिता को लेकर बड़ा संकट है। यह संकट अमेरिका से लेकर भारत के मीडिया तक सब जगह है। लेकिन, इंटरनेट ने इस स्वतंत्रता को बचाने में अहम भूमिका अदा की है। निश्चित तौर पर इंटरनेट ने विकीलीक्स और तमाम दूसरी खोजी वेबसाइट्स को यह आजादी दी है कि वो अपने काम को बखूबी अंजाम दे सकें। विकीलीक्स का ताजा खुलासा इसका बेहतरीन उदाहरण है।
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  • 28/08/2012
    इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग साईट्स एक बार फिर चर्चा में मुद्दा असम में हुई समस्या और भारत के कई शहरो से उत्तर पूर्व के निवासियों का पलायन सरकार ने इसके लिए इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर फ़ैली अफवाहों और भडकाऊ तस्वीरों को दोषी माना और कार्यवाही करते हुए 245 वेबसाइट-वेब पन्नों को ब्लॉक कर दिया गया|आश्चर्यजनक रूप से तेजी दिखाते हुए सरकार के इस  फैसले के बाद अमरीकी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता विक्टोरिया नूलैंड बयान दिया  कि अमरीका इंटरनेट की आजादी के पक्ष में है
  • 27/08/2012
     एन. के. सिंह, वरिष्ठ पत्रकार
    लगभग डेढ़ दशक से कमरतोड़ वितरण खर्च से हांफते हुए भारतीय न्यूज़ चैनलों को डिजिटलाइजेशन के क्रांतिकारी कदम से केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एक बड़ी राहत देने का काम किया है। 
  • 21/08/2012
     राजीव रंजन, शोध- छात्र, पत्रकारिता बीएचयू
    वर्तमान में दुनिया वेब-जगत के घेरे में है। जरूरी जानकारियाँ, महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ और घटनाओं के त्वरित सन्देश तेजी से भौगोलिक सीमाओं का अतिक्रमण कर रहे हैं। आज वेबपसंदी लोगों का अन्र्तजाल से याराना है। टेक्सट, इमेज, ग्राफिक्स, एनिमेशन, आॅडियो, वीडियो इत्यादि के साथ रोज का उठना-बैठना है। समाचारपत्र और टेलीविज़न चैनल भी इसी होड़ में शामिल हैं। 
  • 14/08/2012
     आशीष तिवारी, पत्रकार  
    क्कीसवीं सदी के भारत में मीडियावी चश्मे से देखने पर अब दो हिस्से साफ नजर आते हैं। एक है भारत जो आज भी गांवों में बसता है और दूसरा है इंडिया जो चकाचैंध भरे शहरों में रहता है। मंथन का केंद्र बिंदु मीडिया की भूमिका हो तो प्रिंट और इलेक्ट्रानिक को अलग अलग कर लेना वैचारिक रूप से सहूलियत भरा हो सकता है। 
  • 08/08/2012
    देव नाथ , समाचार संपादक, अमर भारती
    बात बात में नैतिकता कि शेखी बघारने वाले चैनल जब कामुक कार्यक्रम के लिए फ़िल्मी कलाकारों से फूहड़ हरकते करवाते हैं तब ये भूल जाते हैं कि नैतिकता क्या होती है। दूसरों में मीन मेख निकालने वाले कभी खुद के लिए कोई मापदंड निर्धारित करेँगे,शायद नहीं।

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