गुरुवार, 23 अगस्त 2012

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया : तलाश भारतीय मॉडल की




पोस्टेड ओन: 5 Oct, 2011 जनरल डब्बा में
अपने शुरूआती दौर में यूरोप और अमरीका में पैदा हुआ नवीन मीडिया यानी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, जहां दुनियां के पैमाने पर एक मजबूत प्रतिक्रिया के रूप में लिया गया, वहीं भारत में मीडिया मुद्दों का उभार अपने शुरूआती दौर में एक अद्द संचार के अलावा कुछ नहीं था। कुछ गंभीर विश्लेषकों, समाज-विज्ञानियों, चिंतकों यानी बुद्धिजीवियों ने थोड़ा ज्या्दा गंभीर होकर भारत में भी मीडिया मुद्दों के उभार को स्थामपित सामाजिक मूल्यों के खिलाफ एक प्रतिक्रिया के अलावा कुछ नहीं माना.
सत्‍तर के दशक में पत्रकारिता के मूल मुद्दों के साथ-साथ मीडिया के हक में सवाल को तत्कालीन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संगठनों ने जब उठाना शुरू किया था तब तक मीडिया शब्दे न तो उतना प्रचलित हुआ था, और न ही शुद्ध अमरीकी-यूरोपीय मीडिया दृष्टिकोण ऐसे संगठनों के बीच विकसित हो पाया था। अस्सी के दशक के नवीन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भारतीय संस्करण का तत्कालीन इतिहास रचता है और इस दशक के अंत तक विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दृष्टिकोणों के स्थानीय विस्तार का क्षितिज भारत में फैलता नजर आता है। नब्बे के दशक के शुरू होने से पूर्व ही भारतीय संस्कृति-मूल्य-परंपरागत प्रतीकों के जरिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का स्थाननीय यानी भारतीय प्रारूप तलाशने की कोशिश का विस्तार होता है और भारतीय इतिहास में मीडिया बिंबों को तलाशने की कोशिश भी होती है। नब्बे के दशक के बीचोबीच खड़ा भारतीय मीडिया एक साथ कई ज्वलंत प्रश्नों से जूझ रहा है। ऐसा लगता है कि इस समय भारत में मीडिया चिंतन लगभग हर स्तर पर, एक पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया के दौर से गुजर रहा है।
प्रश्न यह है कि विभिन्न मीडिया नजरियों की सही-सही व्याख्या भारतीय समाज की स्था्नीकृत विशेषताओं, सांस्कृतिक, पारिस्थितिक, पर्यावरण और भौगोलिक राजनीतिक आदि के संदर्भ में, संभव है क्या। यदि हां तो संभावनाएं और प्रासंगिकताएं आखिर क्या और कैसी हैं
मीडिया ढेर सारे ऐसे प्रश्नों से जूझ रहा है, अपने लगभग 20 साल की उम्र में। ढाई दशक एक व्यक्ति की उम्र का यौवनकाल होता है, लेकिन एक उम्र के लिहाज से यह शैशवकाल भी हो सकता है और प्रौढ़ावस्था भी। वह इस बात पर निर्भर है कि मीडिया के मुद्दे क्या हैं, मुद्दों की प्रकृति क्या है, मुद्दे का हरपक्षीय कैनवास कितना सीमित या विस्तृत है। इस मानदंडों के आधार पर भारतीय समाज में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए 20-25 वर्ष शैशवकाल से ज्यादा कुछ नहीं. किंतु यदि यह शैशवकाल है तो एक शिशु गंभीर और बुनियादी सवालों से जूझ कैसे रहा है। क्याम भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया समय से पहले परिपक्व् होना चाहता है. यह 20-25 साल नवीन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की उम्र है, न की संपूर्ण मीडिया की. सवाल तो यह भी है कि अगर ऐसा है तो नवीन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की उम्र संपूर्ण मीडिया के समकक्ष आंकी ही क्यों जाए। यह तो बात दुनिया के पैमाने पर भी लागू होती है. भारत में मीडिया दृष्टिकोण (जिसे भले ही मीडिया का दर्जा न मिला हो) तो यहां की संस्कृति में मौजूद रहा है. तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पैदाइश जब नहीं हुई थी, तो क्या भारत में या दुनिया में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जैसा जज्बा, संस्कृति, व्यवहार आदि था ही नहीं, मैं इतिहास की गलियों में भटककर वहां से मीडिया या मीडिया की उत्पत्ति को तलाशने की बात नहीं करता. मेरा मतलब सिर्फ यह है कि आज भारतीय मीडिया को इस बुनियादी सवाल से जूझने की जरूरत है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से उधार ली गई संस्कृति के वाहक मीडिया चिंतन, विश्लेषण और कार्यपद्धति को जिसकी असफलताएं दुनियां के तथाकथित विकासशील देशों में पिछले डेढ़ दशको में साबित की जा चुकी हैं, यहां से अपनी जमीन से कैसे अलग करना है। 20 वर्ष की उम्र में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को इस बुनियादी सवाल से जूझना है कि भारत में मीडिया का भारतीय मॉडल क्या होना चाहिए।
अब यह कहने का वक्त गुजर चुका है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रारूप ने भारतीय मीडिया की अधकचरी संस्कृति को ओढ़ने-बिछाने वाले एक छोटे से तबके को भले ही कुछ दे दिया हो, एक आम भारतीय समाज के लिए उसका कोई मूल्य या महत्व नहीं। यह ‘क्लास’ का मीडिया ‘मास’ का मीडिया बन ही नहीं सकता। तो भारत की मीडिया के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दावों, विश्लेषणों, व्यारख्याओं की प्रासंगिक तस्वीर कैसी होनी चाहिए, यह सबसे गंभीर और बुनियादी सवाल 20 वर्ष की उम्र में एक औसत भारतीय मीडिया की तरह वक्त से पहले परिपक्‍व हो चली भारतीय मीडिया की आंखों में चस्पां है।

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