गुरुवार, 23 अगस्त 2012

अब रिपोर्टर् नहीं, शार्प शूटर्स चाहिए : रमेश नैयर


दिनेश चौधरी/भड़ास4मीडिया
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(रायपुर में नैयर साहब का मतलब सिर्फ रमेश नैयर होता है। कुलदीप नैयर जी में लगे नैयर नाम की समानता की वजह से यहां धोखे की कहीं कोई गुजांइश नहीं होती। रमेश नैयर साहब छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता के स्कूल की तरह रहे हैं।)
उनसे कलम चलाने की तमीज यहां के कितनों पत्रकारों ने हासिल की है, इसकी गिनती करना मुश्किल है। उनके स्कूल का एक नालायक विद्यार्थी मैं भी हूं जो बार-बार क्लास छोड़ कर भागता रहा। पर उनसे जुड़े हुए कछ वाकये हैं, जिनकी तफसील उनकी शख्सियत व कामकाज की शैली को बयान करने के लिये जरूरी हैं। मैं ‘अमृत संदेश’ छोड़ कर ‘भास्कर’ में आया था। ‘अमृत संदेश’ में हर वक्त कर्फ्यू जैसा लगा रहता था और लगता था कि किसी को भी हंसते-बोलते देख लिये जाने पर फौरन गोली मार दी जायेगी। नैयर साहब, जहां तक मुझे याद है, ‘दैनिक टिब्यून’, चंडीगढ से होकर रायपुर वापस आये थे। उनके नाम की बड़ी धाक थी, इसलिए थोड़ा डर स्वाभाविक था। पर उनकी कार्यशैली कभी बॉस जैसी नहीं रही। उल्टे हम लोगों के डर को भगाने के लिये वे रोचक किस्से सुनाते रहते।
एक किस्सा अब तक तक याद है।
आकाशवाणी के लिये कभी उन्होंने मायाराम सुरजन जी का इंटरव्यू लिया था। दूसरे दिन लोगों ने पूछा, ‘कैसा रहा?’ वे बोले, ”बहुत बढि़या, मैंने सिर्फ एक सवाल पूछा और पूरे समय सुरजन जी बोलते रहे। पैसे दोनों को बराबर मिले।”
ऐसे ही एक बार उन्होंने बताया कि किसी दिन टेलीप्रिंटर से रोल सही नहीं निकल रहा था। प्रिंट में खराबी थी। एजेंसी के दफ्तर में फोन लगाकर रोल भेजने की बात कही तो जवाब मिला कि कोई आदमी नहीं है। उन्हें जवाब दिया कि ”थोड़ी देर के लिये आप ही आदमी बन जायें।”
लेकिन हंसी-मजाक के इस माहौल में काम सीखने-सीखाने में कोई कोताही नहीं थी। एक-एक शब्द की शुद्धता की परख होती थी। एक बार ‘कार्रवाई’ व ‘काररवाई’ पर बड़ी लंबी बहस चली थी। फिल्ड-रिपोर्टिंग के लिये भेजने से पहले ही वे हमें आवश्यक दिशा-निर्देश देकर कार्य की जटिलता को आसान कर देते थे। एक बार बिलासपुर के पास जयराम नगर में जादू-टोने के फेर में एक साथ सात लड़कों ने आत्महत्या कर ली थी। संयोग की बात यह कि यह तत्कालीन शिक्षा मंत्री का इलाका था। यह एक बड़ी खबर थी लेकिन नैयर साहब को खरसिया जाना था जहां तत्कालीन मुखयमंत्री अर्जुन सिंह एक उपचुनाव में आकर फंस गये थे। उन्हें किसी सलाहकार ने बताया होगा कि आप खरसिया से चुनाव लड़ लें, आपके आने की भी जरूरत नहीं होगी और हम आपकी फोटो दिखाकर चुनाव जीत लेंगे। लेकिन यहां उनका सामना दिलीप सिंह जूदेव से हो गया और फोटो दिखाकर जीतने की बात तो दूर रही, अर्जुन सिंह को यहां अड्‌डा मारने के बाद भी एड़ी-चोटी एक करनी पड़ी। प्रदेश के बाहर से भी लोगों की निगाहें खरसिया पर टिकी हुई थीं। लिहाजा नैयर साहब ने मुझे एक और सहकर्मी के साथ जयराम नगर भेज दिया। कहा कि रिपोर्ट अच्छी हुई तो ‘रविवार’ में जायेगी अन्यथा इसे भास्कर भोपाल में भेजा जायेगा। तब रांची की तरह यहां भी सेठों के विवाद के कारण भास्कर की लॉंचिंग स्थगित थी। उन दिनों ‘रविवार’ में छपना एक बहुत बड़ा सपना था इसलिए रिपोर्ट तैयार करने में हमने अपनी पूरी सामर्थ्य झोंक दी थी।
रिपोर्ट तैयार की और नैयर साहब के कक्ष में पहुंचे। वे खरसिया की अपनी रिपोर्ट लिख रहे थे। सारा सरकारी अमला अर्जुन सिंह के पीछे लगा हुआ था। पैसे पानी की तरह बहाये जा रहे थे और इसके जवाब में जूदेव की ओर से उस समय का एक लोकप्रिय फिल्मी गाना जगह-जगह बज रहा था। नैयर साहब को गीत याद नहीं आ रहा था। उन्होंने मुझसे पूछा। फिल्मी गानों का मेरा ज्ञान शून्य था। नैयर साहब ने प्यार से डांटा कि ”फिल्में नहीं देखते, रिपोर्टिग क्या खाक करोगे?” इस बीच नवीन ने सिर खुजलाते हुए गाना याद किया। मुखड़ा था, ”हमरे बलमा बेईमान हमें पटियाने आये हैं, चांदी के जूते से हमें जूतियाने आये हैं।” नैयर साहब ने नोट किया और हमारी रिपोर्ट पर निगाह डाली। पहली ही नजर में एक गलती पकड़ी। मैंने लिखा था ‘वह कड़ाके की धूप में घर से बाहर निकला…’।’ नैयर साहब ने तुरंत सुधार किया और कहा कि ‘कड़ाके की ठंड होती है, धूप चिलचिलाती है।’ पूरी रिपोर्ट पढ़ी और कहा कि इसे भोपाल भेज देते हैं। मैं कलकत्ता भेजे जाने की उम्मीद कर रहा था। मैंने थोड़ी निराशा से पूछा कि रिपोर्ट में क्या खराबी है? नैयर साहब ने कहा कि ”कोई खराबी नहीं हैं, पर बेहतर बनाने की गुंजाइश तो होती है न?” नवोदित पत्रकारों को हतोत्साहित किये बगैर उनकी खामियों को बताने का यह उनका तरीका था।
कुल मिलाकर माहौल कुछ ऐसा था कि नैयर साहब को भी नहीं मालूम होगा -या उन्होंने नोट नहीं किया होगा – कि उनके कैबिन के मेज की दराज से कीमती सिगरेट कहां गायब हो जाती थीं? ‘संडे ऑब्जर्वर’ में नैयर साहब को सिगार पीते हुए देखा था पर भास्कर में उनका ब्रांड शायद ‘डनहिल’ या ऐसा ही कुछ था। कत्थे रंग की यह सिगरेट, मुझे अब तक याद है, मेरा एक साथी उनकी दराज से उड़ा लिया करता था और इस शरारत के पीछे एक अपनेपन का भाव होता था, अधिकार का भाव होता था और स्वंतत्रता-बोध का उद्‌घोष होता था कि ”देखो, यहां के राज में संपादक और ट्रेनी एक ही ब्रांड की सिगरेट पीते हैं।”
बहरहाल, युगधर्म, नवभारत, क्रानिकल, ट्रिब्यून, दैनिक भास्कर, संडे ऑब्जर्वर, समवेत शिखर, हितवाद आदि अनेक अखबारों में पत्रकारिता व संपादकी के बाद अब नैयर साहब अपना पूरा समय केवल लिखने में लगा रहे हैं। हालांकि स्वास्थ्य बहुत बेहतर न होने के कारण दिन में दो-तीन घंटे ही लिख पाते हैं। बीच में एक अरसा वे छत्तीसगढ ग्रंथ अकादमी में भी रहे। मैं ‘इप्टा’ के अपने मित्र मनोज के साथ उनके घर पहुंचा तो वे अकेले ही थे। लिहाजा चाय -वगैरह बनाने की जेहमत भी खुद उन्होंने ही उठायी। पूर्ववत्‌ स्नेह के साथ मिले। बिल्कुल अनौपचारिक माहौल में उनसे हुई बातचीत इस प्रकार है–
जिस दौर में आप पत्रकारिता में आये और आज के दौर में आप क्या फर्क महसूस कर रहे हैं? इसी में यह भी जोड़ना चाहूंगा कि पत्रकारिता आपका चुनाव था या संयोगवश इसमें आना हुआ?
–नहीं, मिल गया था इसलिए नहीं आये थे। बिल्कुल चुनकर आये थे। मैं भिलाई में लेक्चरर था और उससे आधी तनख्वाह पर यहां अखबार में आया था। जबकि आर्थिक-माली हालत घर की भी अच्छी नहीं थी, मेरी भी नहीं थी लेकिन ऐसा लगता था कि ये एक ऐसा माध्यम है जिससे हम अपनी बात कह सकते हैं। देश को, समाज को बदलने का, कुछ करने का जो एक जज्बा था, उसके लिए लगता था कि यह एक मंच बन सकता है, इसलिए आये। और इसमें असुरक्षा के बावजूद, सारे अभावों के बावजूद एक जज्बा बना रहा और लिखते रहे…. करते रहे। पत्रकार उस समय पढ़ते थे। जितनी भी बड़ी पत्रिकायें होती थीं, हिंदी की, अंग्रेजी की वे पढ़ी जाती थीं। मैं तो खैर, दिनमान से भी पहले आ गया था। धर्मयुग व हिंदुस्तान वगैरह थे, अंग्रेजी की पत्रिकायें थीं वे सब पढ़ी जाती थीं और कोई घटना होने पर वहां पहुंचा करते थे। जनजातीय क्षेत्रों में, आदिवासी इलाकों में, जन-आंदोलनों में, श्रमिक-आंदोलनों में हिस्सेदारी पत्रकार उस समय किया करते थे वो अपने आप में बड़ी स्फूर्तिदायक बात हुआ करती थी। कहीं भी दुर्घटना हुई और रात को दो बजे भी मालूम हुआ तो निकल पड़ते थे। साधन चाहे जो मिल जायें।
एक घटना मुझे अभी तक याद है। खोंगसरा के पास एक रेल दुर्घटना हुई थी। दो बजे रात को ही खबर मिली। उस समय बिलासपुर के संस्करण नहीं हुआ करते थे। तो अखबार के बंडलों की जो जीप जाती थी, उसी में सवार हो गये। वहां से थोड़ा पहले पता लगा कि खोंगसरा के लिये कौन-सा रास्ता मुड़ता है। फिर आगे चलकर जब रास्ता बंद हो गया तो मुझे याद है एक साथी रेल पटरी के ऊपर मोटर साइकिल दौड़ाकर ले गये और वहां तक पहुंचे … ये एक जज्बा होता था।
ऐसी ही एक घटना 25 मार्च 1966 की है। मैं उस समय नया-नया ही आया था युगधर्म में। पता चला बस्तर में गोली चली है और प्रवीण चंद्र भंजदेव को मार दिया गया है। उस समय बस्तर जाने के लिये आठ-नौ घंटे लगते थे। जो कुछ भी साधन मिल पाये उससे देर रात को ही हम लोग निकले और दोपहर बाद, बल्कि शाम को वहां तक पहुंच पाये। अखबार वालों को वहां जाने नहीं दे रहे थे, पत्रकारों के जाने की मनाही थी। कुछ परिचय के लोग किसी तरह बचते-बचाते ले गये और वो रिपोर्ट तैयार की।
तो उस समय की पत्रकारिता में मूल्य थे। अखबारों के मालिक तब भी थे और उनके प्रति आम श्रमजीवी पत्रकारों का गुस्सा होता था और आरोप होता था कि ये लोग शोषण करते हैं। लेकिन वो कम से कम कलम के धनी होते थे। पढ़ते थे और मूल्यांकन करते थे कि कोई अच्छी पत्रकारिता कर रहा है तो उसे खुद जाकर बुला लायें। सौदेबाजी पैसों की नहीं होती थी, लेकिन जहां लिखने की सुविधा अधिक हो, जहां आपकी बातों को काटा न जा रहा हो, उनका चुनाव होता था। मुझे अच्छी तरह से स्मरण है कि युगधर्म एक प्रकार की वैचारिक प्रतिबद्धता का अखबार था, राष्ट्रीय स्वयं संघ से जुड़ा था, लेकिन हमारी रिपोर्ट्‌स्‌ को कभी भी काटा-छांटा नहीं गया। इसी तरह क्रानिकल व नवभारत में भी हमने जो कुछ भी लिखा, वो छपता था। उस पर प्रतिक्रिया भी होती थी। एक छोटे से छोटे समाचार पर भी लोग पत्र के माध्यम से या दूसरे तरीकों से अपनी प्रतिक्रिया देते थे तो अपने आप में एक संतोष होता था। हालांकि आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती थी। कुछ बेचारे तो ऐसे भी होते थे जिन्हें क्लर्की नहीं मिली, या मास्टरी नहीं मिली तो प्रूफ रीडर में आ गये या अखबार में दूसरे कामों में लग गये और वे अर्थाभाव का रोना भी रोते थे। पर ज्यादातार लोग ऐसे होते थे जो प्रतिबद्धता के कारण या एक तरह की दीवानगी के कारण यहां आते थे और चूंकि वे खुद होकर इस व्यवसाय को चुनते थे इसलिए शिकवे-शिकायत की गुंजाइश बहुत कम होती थी।
हम लोगों के जमाने में भाषा के संस्कारों पर बड़ा जोर हुआ करता था। उस समय सिर्फ एक ही समाचार सेवा हुआ करती थी और वो प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया या पीटीआई थी। तो युगधर्म वालों को एक ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो अंग्रेजी से अनुवाद भी कर सके और जो समाचारों की भाषा को भी समझता हो। अब चूंकि मैंने अंग्रेजी में एम.ए. किया था व लिखता था इसलिए मुझे ऑफर दिया गया। लेकिन मैं जहां पर नौकरी में था वहां 300 के करीब मिलते थे और युगधर्म में मुझसे कहा गया कि 165 रूपये दिये जायेंगे। फिर भी मैं चला आया। हालांकि थोड़ी दुविधा भी थी और घर के लोगों से सलाह भी नहीं की। ये कहना पड़ेगा कि मेरे माता-पिता ने भी इसका प्रतिवाद नहीं किया कि क्यों इतनी अच्छी नौकरी छोड़ कर चले आये? तो अर्थाभावों के कारण संकट तो रहता था लेकिन सामाजिक प्रतिष्ठा बड़ी व्यापक थी। प्रशासन में व राजनीतिक गलियारों में भी पत्रकारों की पूछ-परख ज्यादा होती थी या पूछ-परख से बेहतर शब्द होगा कि धाक ज्यादा थी…..
* कह सकते है कि उनका रूतबा खूब हुआ करता था…..
–हां रूतबा भी कह सकते हैं जो कि अर्थाभाव के बावजूद हुआ करता था। इसके बाद मुझे चंडीगढ में दैनिक ट्रिब्यून में काम करने का मौका मिला जहां पत्रकारिता का बड़ा मूल्य था। बहुत मूल्यों वाली पत्रकारिता वहां हुआ करती थी। सबसे अच्छी बात यह कि समाचारों की निष्पक्षता व उनके सामाजिक -आर्थिक सरोकारों पर बड़ा जोर हुआ करता था। मैं जब दिनमान के लिये लिखा करता था.. पहले तो अज्ञेय जी थे तो उनके समय में मैं बहुत थोड़ा छपा था… फिर रघुवीर सहाय आये तो कोई रिपोर्ट जब हम भेजते थे तो वे उस समाचार से जुड़े सामाजिक-आर्थिक पहलुओं पर बड़ा जोर दिया करते थे। उनका कहना होता था कि समाचारों के संदर्भ में हमें राजनेताओं के इंटरव्यू नहीं चाहिये। घटना से जुड़े सामान्य व्यक्ति की बात – जो सत्य से ज्यादा निकट है-हमारे लिये ज्यादा महत्वपूर्ण है। ये भी देखिये कि समाचारों के भेजने के बाद क्या घटनाक्रम बनता है और उस संदर्भ में समाजशास्त्रियों के, अर्थशास्त्रियों के, घटना से जुड़े लोगों के, उनके परिजनों के व समाज के प्रबुद्ध लोगों के इंटरव्यू लीजिये और घटना के सामजिक-आर्थिक पक्ष को उजागर कीजिये। प्रशासन से भी बात होती थी।
उदाहरण के तौर जब बैलाडीला में गोली चली तो समाचार के भेजने के बाद भी हम कई दिनों तक जंगलों में घूमते रहे कि कहीं हडि्‌डयों के अवशेष तो नहीं पड़े हैं या कहीं राख दिखाई पड़ती थी तो जली हुई लाशों का शुबहा होता था। तो इसका असर ये होता था कि रिपोर्ट का प्रभाव बड़ा व्यापक होता था और संसद तक में उसकी गूंज होती थी। लोग प्रतिक्रिया व्यक्त करते थे। पाठकों के पत्र आते थे। ये धीरे-धीरे कम होने लगा..
किस दौर में …
–1995-96 के आस-पास। इससे पहले 1990 में अखबारों में पूंजी के आने से स्पर्धा का सिलसिला शुरू हुआ। जब बाजार की ताकतें अखबारों में आने लगीं तब उनकी प्राथमिकतायें बदलने लगीं। उनका जोर अखबार में लगनी वाली मशीनों पर, मार्केटिंग के नेटवर्क पर ज्यादा होने लगा। पत्रकारिता में जो एक तरह की कशिश होती थी, या स्वयं पत्रकार को जो एक चिंता होती थी कि व्यक्ति के साथ, समाज के साथ कहीं कोई अन्याय हो रहा है तो उसका प्रतिकार किया जाना है, ये लगातार कम होता चला गया…..
सरोकारों की इस कमी के लिये भी पूंजी ही जिम्मेदार थी, या ऐसा पत्रकारों की ओर से ऐसा हुआ?

–शुरुआत पूंजी से ही हुई। अखबारों में बड़ी पूंजी के आने के बाद ये काम धीरे-धीरे हुआ। क्योंकि मैं जब तक अखबार में था – 2003 तक – तब तक ऐसा कोई वाकया नहीं हुआ कि मेरे लिखे को कभी काटा गया हो…
With Thanx: www.Bhadash4media.com

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