मंगलवार, 28 अगस्त 2012

टैम के बोतल में टीआरपी का नशा / पुण्य प्रसून वाजपेयी




जाहिर है एक सवाल यहा हर किसी के मन में उठ सकता है कि टैम के मीटर की तरह कही सरकार की नीतियां भी विकास का खाका तो नहीं खींच रही। और विकास की नीतियों की तर्ज पर ही न्यूज चैनलों चलाने वाले भी अपना विकास तो नहीं देख रहे। यह सवाल इसलिये क्योकि अगर वाकई सरकार को लगने लगा है टैम के मीटर ने टीआरपी का नशा न्यूज चैनलो में ऐसा घोल दिया है जहा गांव से लेकर बीमार राज्य और हाशिये पर पडे बहुसंख्यक तबके से लेकर पिछडे समाज के सवालों को कोई जगह ही न्यूज चैनलों में नहीं मिल पा रही है । तो समझना यह भी होगा कि क्या सरकार की नीतियां भी टैम के मीटर से इतर इन्फ्रास्ट्रक्चर और विकास का कोई पैमाना समूचे देश के लिये खड़ा कर रही है। सरकार इस बात को लेकर खुश है कि दुनिया के सबसे बडे बाजार के तौर पर भारत की पहचान बढ़ती जा रही है। क्योंकि आज की तारीख में 25 करोड़ भारतीय नागरिक उपभोक्ता में तब्दील हो चुके हैं। जबकि देश सवा सौ करोड़ का है और बाकि सौ करोड के लिये सरकार के पास कोई नीति नहीं बल्कि राजनीतिक पैकेज की फेरहिस्त है।

खाद्द सुरक्षा विधेयक से लेकर पक्का घर, पानी, बिजली, स्वास्थ्य सेवा, रोजगार, वालिका जननी से लेकर शिक्षा देने की योजनाओ की दो दर्जन से ज्यादा की फेरहिस्त महात्मा गांधी ,नेहरु , इंदिरा से लेकर राजीव गांधी तक के नाम के साथ जोड़ कर परोसी जा चुकी है। और अब गरीबी के रेखा से नीचे वाले भूखे-नंगों के हाथ में मोबाइल देने का भी ऐलान होने वाला है। यानी सरकार के विकास के नजरिये में अगर उपभोक्ता महत्वपूर्ण है तो फिर टैम के मीटर भी उन्हीं शहरों को घेरे हुये है। और सरकारी योजनाओं के जरीये पैकेज के राजनीतिक ऐलान के जरीये जो कल्याण सत्ता देश के नागरिकों का करना चाहती है उसी तरह उपभोक्ता और बाजार से कटे लोग, समाज और क्षेत्र की खबरों को दिखाने के लिये दूरदर्शन तो है ही। असल में यह एक नजर है जो सरकार के दोहरे नजरिये पर अंगुली उठा सकती है। लेकिन सवाल न्यूज चैनलों का है और टैम के मीटर का है तो फिर सरकार के गिरेबान में झांकना जरुरी है कि क्या वाकई सरकार का नजरिया न्यूज चैनलो के जरीये देश की असल खबरों को दिखाना है या फिर चैनल धंघे वालों के हाथ में सौपकर कमाई के खेल को धंघे से अलग कर सरकार अपनी सच्चाई से पल्ला झाड़ना चाहती है। न्यूज चैनल चाहकर भी कोई पत्रकार शुरु नहीं कर सकता। चैनल के लाइसेंस के फार्म को भरने के लिये पत्रकार के पास संपत्ति के तौर पर बीस करोड़ होने चाहिये। जो असंभव है। पहले लाइसेंस के लिये महज तीन करोड़ का टर्नओवर दिखाने से काम चल जाता था। लेकिन अब कंपनी का टर्नओवर 20 करोड़ का होना चाहिये।
तो पहला सवाल है कि बीस करोड़ किसने पास होंगे। और जिनके पास बीस करोड़ होंगे वह न्यूज चैनल निकालने के लिये क्या सोच कर आयेंगे। बीते सात बरस में न्यूज चैनलों का लाइसेंस पाने वाले अस्सी फीसदी लोग बिल्डर, चिट-फंड चलाने वाले, रियल स्टेट के खेल में माहिर और भ्रष्टाचार या अपराध के जरीये राजनीति में कदम रख चुके नेता हैं। हरियाणा के पूर्व गृह राज्यमंत्री गोपाल कांडा के पास पांच चैनलों के लाइसेंस हैं। यह वही कांडा है जो एयर होस्टेज गीतिका शर्मा के सुसाइड करवाने के पीछे मुख्य आरोपी हैं। और अब उनके धंघो की फेरहिस्त खुल रही है कि कैसे सड़क से राज्य के गृह मंत्री तक की स्थिति में आ पहुंचे। गोपाल कांडा का न्यूज चैनल हरियाणा और यूपी में चलता है। धर्म का भी एक चैनल चल रहा है। दो लाइसेंस इनके पास पडे हुये हैं। और हरियाणा की सियासी तिकड़म में यह राज्य के मुख्यमंत्री हुड्डा को यह कहते रहे है कि चुनाव आने से पहले वह राष्ट्रीय न्यूज चैनल भी निकाल लेंगे। तब उनका कद भी बढ जायेगा और हुड्डा को भी राष्ट्रीय राजनीति में कद्दवर बनाने में उनका राष्ट्रीय चैनल लग जायेगा। इस तरह के नेताओं की फेरहिस्त देखे तो मौजूदा वक्त में करीब 27 न्यूज चैनलो के लाइसेंस इसी तरह के नेताओ के पास है, जो झारखंड से लेकर मुबंई तक और आंध्र प्रदेश से लेकर हिमाचल तक में न्यूज चैनल चला रहे। और 32 न्यूज चैनलों के लाइसेंस ऐसे ही नेताओं के पास पड़े हैं और वह न्यूज चैनल को सियासी धंघे में बदलने के लिये बैचेन है। वहीं दूसरी तरफ 18 न्यूज चैनल चीट-फंड के जरीये गांव गांव में लूट मचा रही कंपनियों के जरीये दिल्ली,यूपी, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ और उडीसा में चल रहे हैं। न्यूज चैनलों के 16 लाइसेंस लेकर चीट फंड वाले इंतजार कर रहे हैं कि अब धंघे के लिये न्यूज चैनल चलाने का वक्त आ गया है। इसी तरह देश भर में 19 न्यूज चैनलों के लाइसेंस रियल इस्टेट से जुड़े लोगों के पास है या सीधे बिल्डरो के पास हैं। कुछ निकाल रहे हैं। कुछ लाइसेंस बेच कर तीन करोड़ तक कमाना चाहते हैं। मौजूदा वक्त में करीब दो दर्जन से ज्यादा न्यूज चैनलों के लाइसेंस बाजार में बिकने को तैयार हैं। और इनकी कीमत ढाई से साझे तीन करोड़ तक की है। यानी लाइसेंस ले लिया और निकाल नहीं पा रहे हैं या फिर लाइसेंस लिया ही इसलिये क्योंकि 10 से 15 लाख के खर्चे में लाइसेंस लेकर तीन करोड में बेच दें। और बीस करोड़ के टर्नओवर की कंपनी दिखाने के खेल को करोड़ों के वारे-न्यारे में बदल कर शुरुआत ही धंधे से हो जाये।

तो पहला सवाल यही कि क्या सरकार वाकई टैम के जरीये हो रहे धंधे को रोकना चाहती है या फिर जिस धंधे को लाइसेंस देने के नाम पर उसने शुरु किया है और जो लाइंसेस लेकर अपने अपने धंधे को न्यूज चैनल के जरीये सौदेबाजी करना चाहते है और कर रहे है उस तरफ लोगों की नजर ना जाये, इसलिये नैतिकता का पाठ पढना चाह रही है। क्योंकि टैम से जुड़े टीआऱपी का खेल तो उसी केबल सिस्टम पर टिका है, जिस पर ज्यादतर राज्यों में सत्ताधारी राजनेताओं का ही कब्जा है। और किसी फिया की तरह चल रहे केबल नेटवर्क को किसी न्यूज चैनल के जुडने के लिये जिस तरह ब्लैक मनी देनी पड़ती है, वह अनएंकाउटेंड है। क्योंकि टैम मीटर असल में कैबल के जरीये देखे जा रहे न्यूज चैनलो की ही रिपोर्ट देता है। और केबल सिस्टम पर जिसका कब्जा होगा अगर वही किसी न्यूज चैनल को अपने क्षेत्र या राज्य में ना दिखाये तोफिर मीटर की रीडिंग में वह न्यूज चैनल आयेगा कैसे।
जाहिर है मुफ्त में तो कोई कैबल किसी न्यूज चैनल को दिखायेगा नहीं। खासकर तब जब न्यूज चैनलों की भरमार हो और सभी तमाशे को ही खबर मान कर परोस रहे हों। यानी कंटेंट की लड़ाई ही नहीं हो। तो कैबल से जुडने के लिये न्यूज चैनल को सालाना कोई एक रकम तो देनी ही होगी। और मौजूदा वक्त में अगर कोई राष्ट्रीय न्यूज चैनल आज शुरु होता है तो उसे देश भर से जुड़ने के लिये 30 से 35 करोड़ रुपये सिर्फ कैबल नेटवर्क से जुडने में लगेंगे । इसकी कोई रसीद कोई केबल वाला नहीं देता । यानी 30 से 35 करोड़ रुपया कहां से आया और न्यूज चैनल वाले ने इसे किसे दिया इसका कोई एकांउट नहीं होता। और संयोग से देश के सोलह टीआरपी वाले क्षेत्र या कहे टैम मिटर वाले प्रमुख 16 क्षेत्र के केबल पर और किसी की नहीं बल्कि राजनेताओं की ही दादागिरी है। यानी जिन केबल पर राजनीतिक सत्ताधारियो का कब्जा है, उनके खिलाफ कुछ भी हो जाये कोई न्यूज चैनल वाला खबर दिखा ही नहीं सकता। आजमाना हो तो पंजाब में प्रकाश सिंह बादल और छत्तिसगढ में रमन सिंह के खिलाफ कोई न्यूज चैनल हिम्मत करके दिखाये। जी वह चैनल केबल पर ब्लैकआउट हो जाता है। अगर इन सब के बावजूद सरकार को लगता है कि टैम का खेल रोकने से खबरे दिखायी जाने लगेगी, तो हरियाणा के हुड्डा और बिहार में नीतिश कुमार के मीडिया प्रेम को समझना जरुरी है। जो सरकार के प्रचार के बजट से ही खबरो के तेवर और कंटेट को जोड़ने की हैसियत रखते है, और अपने खिलाफ कुछ भी आन-एयर होने ही नहीं देते । यह स्थिति मध्यप्रदेश के शिवराजसिंह चौहान की भी है और राजस्थान के गहलोत भी इस ककहर को पढ़ने लगे हैं। यानी न्यूज चैनल के बीज में ही जब धंधा है तो फिर सवाल संपादक और मीडिया हाउस को लेकर भी उठ सकते हैं। और इनकी स्थिति को समझने के लिये सरकार के आर्थिक सुधार की हवा के रुख को समझना जरुरी है।
विकास को लेकर सहमति बनाने के लिये संपादक और मीडिया हाउस को भी अपने साथ खड़ा करने से हिचक नही रही और संपादक भी साथ खडा होने में हिचक नहीं रहा, क्योंकि संपादक की महत्ता या उसका कद संयोग से उसी धंधे से जा जुडा है जो कही टीआरपी तो कही सत्ता के साथ सहमती बनाने पर आ टिकी है। इसलिये सरकार के निशाने पर टैम के जरीये इस सच को समझना होगा कि आखिर देश में वाकई कोई ऐसा राष्ट्रीय न्यूज चैनल क्यो नहीं है जो देश के मुद्दों को लेकर जनमत बना सके और उसमें काम करने के लिये पत्रकार लालियत हो। और काम करने वाले पत्रकारों को लेकर देश में एक साख हो। जिसकी खबरों को देखकर लगे कि वाकई लोकतंत्र के चौथे खम्भे को तौर पर मीडिया है और वह सरकार की निगरानी कर रहा है। यह सिर्फ टैम के 80 हजार मीटर लगाने से तो होगा नहीं। बल्कि न्यूज चैनल के धंधे को खत्म करना होगा। क्या सरकार इसके लिये तैयार है।

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