शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

इंटरनेट की भाषा


 

हिंदी वेबसाइट के पाठक आम हिंदी पाठकों से इस मायने में थोड़े अलग हैं कि वे हमेशा विशुद्ध साहित्यिक रुचि रखने वाले पाठक नहीं हैं. वे हिंदी वेबसाइट पर आते हैं तो उसके कई अलग-अलग कारण होते हैं.

•वे विदेशों में बसे हैं और अपनी पहचान नहीं खोना चाहते इसलिए अपनी भाषा से जुड़े रहना चाहते हैं.

•हिंदी पहली भाषा है और वे अंग्रेज़ी के मुक़ाबले हिंदी को सरल और सहज मानते हैं और समझते हैं.

•वे अंग्रेज़ी की वेबसाइटें भी देखते हैं और अक्सर हिंदी से उसकी तुलना करते हैं.

ये पाठक चाहे जो भी हों लेकिन एक बात तय है कि वे भारी-भरकम शब्दों के प्रयोग या मुश्किल भाषा से उकता जाते हैं और जल्दी ही साइट से बाहर निकल जाते हैं.

उन्हें बाँधे रखने के लिए ज़रूरी है कि साइट का कलेवर आकर्षक हो, तस्वीरें हों, छोटे-छोटे वाक्य हों, छोटे पैराग्राफ़ हों और भाषा वह हो जो उनकी बोलचाल की भाषा से मेल खाती हो.

इंटरनेट की भाषा साहित्यिक भाषा से इस मायने में अलग है कि उसको सहज और सरल बनाने के लिए ज़रूरत पड़े तो अँग्रेज़ी के प्रचलित शब्दों का भी इस्तेमाल करना पड़ सकता है. जैसे कोर्ट, शॉर्टलिस्ट, अवॉर्ड, प्रोजेक्ट, सीबीआई, असेंबली आदि.

कोशिश रहती है कि उसी रिपोर्ट में कहीं न कहीं इनके हिंदी पर्यायवाची शब्द भी शामिल हों लेकिन लगातार न्यायालय, पुरस्कार, परियोजना, केंद्रीय जाँच ब्यूरो लिखना पाठक को क्लिष्टता का आभास दिला सकता है.

इसी तरह उर्दू के शब्द भी जहाँ-तहाँ इस्तेमाल हो ही जाते हैं. इनाम, अदालत, मुलाक़ात, सबक़, सिफ़ारिश, मंज़ूरी, हमला आदि ऐसे ही कुछ शब्द हैं. इंटरनेट पर कैसी भाषा का इस्तेमाल हो इसके लिए बस यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि पढ़ने वाले को डिक्शनरी खोलने की ज़रूरत न पड़े और पढ़ते समय उसे ऐसा महसूस हो जैसे यह उसकी अपनी, रोज़मर्रा इस्तेमाल होने वाली भाषा है.

इंटरनेट एक नया और इंटरएक्टिव माध्यम है. यानी दोतरफ़ा संवाद का माध्यम है. बीबीसी हिंदी डॉटकॉम की भाषा-शैली की गाइड बनाते वक़्त हमने सबसे पहले इस बात को ध्यान में रखा कि उसके पाठक दुनिया भर में फैले हैं. वे भले ही हिंदी पढ़ते और समझते हैं लेकिन नई टैक्नॉलॉजी के अनेक रास्ते उनके सामने खुले हैं.

उन्हें बाँधने के लिए ज़रूरी है कि बीबीसी हिंदी डॉटकॉम की भाषा ऐसी हो जो उन्हें अपनी लगे. वाक्य छोटे और आसान हों. शीर्षक यानी हेडलाइंस आकर्षक हों. अँगरेज़ी के आम शब्दों की छौंक से अगर बात और सहज होती हो तो कोई हर्ज नहीं.

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