गुरुवार, 23 अगस्त 2012

रास्ते से भटक गयी मीडिया




राम बहादुर राय, संपादक, प्रथम प्रवक्ता
पेड न्यूज को लेकर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने दो लोगों की एक कमेटी बनाई है। इसने 70 पेज की रिपोर्ट तैयार की है। इस रिपोर्ट में पेड न्यूज की समस्या से निपटने पर विचार होगा।
मेरा मानना है कि पेड न्यूज से निपटने के लिए व्यवस्था में कुछ बदलाव की जरुरत है। सबसे पहले जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन की आवश्यकता है। निर्वाचन आयोग को यह अधिकार होना चाहिए कि उसके पास जो शिकायतें आती हैं उसपर कार्रवाई भी कर सके। जब मैं नवभारत टाइम्स का संवाददाता था उस समय राजीव गांधी का नाम बोफोर्स घोटाले में आया था। विश्वनाथ प्रताप सिहं इस मुद्दे को लेकर देश भर में अभियान चला रहे थे। वी पी सिहं जहां भी जाते थे उस समय मैं कुछ अन्य अखबारों के संवाददाताओं से साथ वहां-वहां जाता था। मीडिया ने बेफोर्स को लेकर राजीव गांधी जैसे इमानदार व्यक्ति के खिलाफ जनमत तैयार कर दिया, एक ऐसा मुद्दा जिसकी जांच अभी भी चल रही है। बोफोर्स को लेकर राजीव गांधी के खिलाफ जो अभियान चला उससे भाषाई पत्रकारिता में एक बदलाव आया। 1989 में हिंदी की भाषाई पत्रकारिता ने यह बात समझ ली कि वह जनमत भी बना सकती है। उसके पहले जनमत बनाने का ठेका अंग्रेजी का था। यह पहला चुनाव था जब भारत की हिंदी मीडिया को अपनी ताकत का एहसास हुआ था। जिस दिन भारत की मीडिया ने इस बात को समझ लिया उसको नशा हो गया। उसको लगा कि हम चाहें तो सरकार बना सकते हैं, प्रधानमंत्री बना सकते हैं उसे हटा सकते हैं। इस नशे ने जो विकृति पैदा की उससे मीडिया रास्ते से भटक गयी। उसके नतीजें ने हमको चौंका दिया है।
आजकल अखबारों में राज्य सरकारों द्रारा दिये जा रहे विज्ञापन भी न्यूज की तरह आ रहें। लेकिन उसमें कहीं भी पाठक को इस बात की सूचना नही दी जा रही है कि वह विज्ञापन है। संकट व्यक्ति का नहीं पत्रकारिता की साख का है। अब इसे बचाने लिए सरकार के दरबार में खटखटाना होगा। कानून से जितना हो सके वह ठीक है, वरना सड़क पर भी उतरना होगा। पत्रकारिता बचेगी तो लोकतंत्र बचेगा वरना लोकतंत्र नहीं बचेगा तो पत्रकारिता भी नहीं बचेगी।

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