रविवार, 26 अगस्त 2012

भारतीय पत्रकारिता कोश ( पत्रकारिता की खोज )

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on Monday, 21 November 2011 12:05   
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बलराम काफ्का के साहित्य की चर्चा के दौरान हिंदी और जर्मन साहित्य के बीच सेतु का काम करने वाले हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय के प्रो. लोठार लुत्से ने कहा था कि काफ्का के जर्मन या चेकभाषी लेखक होने की बजाय हम उन्हें यूरोपीय लेखक के रूप में देखना ज्यादा पसंद करते हैं। ऐसे ही आज की पत्रकारिता को हमें भारतीय पत्रकारिता के रूप में देखने की जरूरत है। यह भी देखने की जरूरत है कि दुनिया की पत्रकारिता के इतिहास में भारत का स्थान कहां है? इसे जानने के लिए पत्रकार विजयदत्त श्रीधर ने भारतीय पत्रकारिता कोश तैयार किया है, जिसके जरिये हम हिंदी समेत सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता के इतिहास और अखबारों में छपने वाले विज्ञापनों के इतिहास का जायजा ले सकते हैं।
इतिहासवेत्ता डॉ. भगवतशरण उपाध्याय ने दशपुर (मंदसौर) में कुमार-गुप्त-बंधुवर्मा काल के एक शिलालेख को संसार का प्रथम विज्ञापन मानते हुए लिखा है- देश के कुछ रेशम बुनकरों ने लगभग 1500 वर्ष पूर्व अपना संघ बनाया और व्यापार-विस्तार की संभावना को ध्यान में रखते हुए मालवा पहुंचे और दशपुर में बस गए। इन व्यापारियों ने दशपुर में विशाल सूर्य मंदिर बनवाया। व्यापारियों ने उसके शिलालेख का उपयोग रेशम के वस्त्रों की बिक्री बढ़ाने के लिए विज्ञापन के रूप में किया। इस शिलालेख में संस्कृत भाषा में सम्राट तथा उसके गोप्ता (गवर्नर) की प्रशंसा की गई। फिर नगर की समृद्धि की कहानी कही और इसी में आसानी से पढ़े जाने योग्य अपने उत्पादों के विज्ञापन का भी सुंदर वर्णन किया है। उस विज्ञापन में कहा गया है- स्ति्रयां चाहे युवावस्था की कांति से युक्त हों या सोने के हार, पान एवं पुष्पसज्जा सेसुसज्जित हों, तब भी वे जब तक सुंदर वस्त्र धारण नहीं करतीं, तब तक अपने प्रिय के प्रेम को नहीं पातीं, क्योंकि वस्त्र से ही समस्त पृथ्वी शोभायमान है। इस तरह विज्ञापन कला का उद्भव इस शिलालेख के साथ होना माना जा सकता है। श्रीधर कहते हैं कि पौराणिक आख्यानों के देवर्षि नारद हमारी सृष्टि के आदि पत्रकार ठहरते हैं। उन्होंने लोकमंगल की कामना से सूचना-संदेशों के संप्रेषण का कर्म पहले पहल निभाया था।
यहां लोकमंगल की भावना महत्वपूर्ण तत्व है। आधुनिक काल में दुनिया भर के रेडियो और टेलीविजन आंखों देखा हाल दिखा-सुनाकर कितनी ही पीठ थपथपा लें, परंतु उन्हें अपनी जड़ें महाभारत के संजय में तलाशनी ही होंगी। यह वही संजय हैं, जिन्होंने दूर हस्तिनापुर में बैठकर कुरुक्षेत्र के मैदान में लड़े जा रहे महाभारत का आंखों देखा हाल नेत्रहीन कुरुराज धृतराष्ट्र को सुनाया था। वृत्तांत प्रस्तुत करने में संजय ने न कौरव पक्ष और न पांडव पक्ष को बख्शा, श्रीकृष्ण को भी नहीं। जो हुआ,जैसा हुआ, जस का तस सुनाया। संवाददाता का आदर्श भी यही है। पुस्तक के अनुसार, वर्ष 618 में चीन में दुनिया के प्रथम समाचार पत्र पीकिंग गजट का प्रकाशन होने के साक्ष्य मिलते हैं। पीकिंग गजट के आरंभिक स्वरूप में राजदरबार संबंधी समाचार कुछ लोग कागज पर हाथ से लिख लेते थे और उसे तख्ते पर चिपकाते थे। फिर उसे पीकिंग शहर में गली-गली दिखाते फिरते थे। सर्वसाधारण से जो कुछ उन्हें मिल जाता था,उसी पर वे बसर करते थे। धीरे-धीरे मुख्य समाचार छापकर बांटे जाने लगे। इस तरह पीकिंग गजट का जन्म हुआ, जिसका स्थानीय नाम किन बो है, जिसका अर्थ है राजधानी की खबरें देने वाला। सबसे पुराना अखबार अब तक चीन का किन बो (पीकिंग गजट) माना जाता था, लेकिन पुस्तक कहती है कि किन बो नहीं, चिंग पाओ संसार का सबसे पुराना अखबार है। चीन की राजधानी पीकिंग से प्रकाशित होने वाला चिंग पाओ सरकारी अखबार है। किन बो को छपते हुए एक हजार वर्ष ही बीते हैं, जबकि चिंग पाओ 1400 वर्षो से छप रहा है। बहरहाल यह तय है कि समाचार पत्रों और पत्रकारिता का जन्म चीन में ही हुआ था। 1621 में लंदन में एक पन्ने का अखबार प्रकाश में आया, जिसे कोरेंटो नाम दिया गया। 1628 में वेस्ट मिंस्टर क्लर्क में पहली स्थानीय खबर संसदीय कार्यवाही की छपी। इसी प्रक्रिया का विकसित स्वरूप यूरनल्स के रूप में सामने आया, जो स्थानीय घटनाचक्र की दैनंदिन रिपोर्ट के रूप में छपने लगा। 1655 में ऑक्सफोर्ड गजट के साथ पत्रकारिता के नए युग का सूत्रपात हुआ। इसका संपादन मडिमैन करते थे। यह पहला आवधिक पत्र था। इसका प्रकाशन सप्ताह में दो बार होता था। 24 अंकों के प्रकाशन के पश्चात यह लंदन गजट बन गया, जो बीसवीं शताब्दी तक प्रकाशित होता रहा। साहित्यिक पत्रकारिता का श्रीगणेश फ्रांस में हुआ।
वर्ष 1665 में फ्रांस की संसद के सदस्य डेनिस डि सैलो ने राजधानी पेरिस से जर्नल डिस सेवंट्स नामक साहित्यिक पत्र निकाला। 29 जनवरी, 1780 को ईस्ट इंडिया कंपनी के मुलाजिम जेम्स आगस्टस हिकी ने कोलकाता से भारत के प्रथम अंग्रेजी समाचार साप्ताहिक बंगाल गजट आर कैलकटा जनरल एडवरटाइजर (हिकीज गजट) का प्रकाशन किया। भारतीय भाषा का पहला पत्र बंगाल गजट 15 मई, 1818 को कोलकाता से निकला। इसके संपादक हारुचंद्र राय और प्रकाशक गंगा किशोर भट्टाचार्य थे। उर्दू का पहला अखबर जाम-ए-जहांनुमा 22 मार्च, 1822 को मुंशी सदासुख मिर्जापुरी के संपादन में कोलकाता से प्रकाशित हुआ। एक जुलाई, 1822 को मुंबई से गुजराती पत्र मुंबई समाचार निकला। वर्तमान में यह एशिया का सबसे पुराना और जीवित समाचारपत्र है। हिंदी का पहला साप्ताहिक पत्र उदंत मार्तड 30 मई, 1826 को कोलकाता से युगल किशोर शुक्ल ने प्रकाशित किया। इस कोश के पहले खंड में भारत में पत्रकारिता के उभरने के साथ भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता पर प्रकाश डालते हुए इसके जरिये उभरी जातीय चेतना और समाज सुधार की चर्चा की गई है। भारतीय पत्रकारिता कोश को उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है जिसका भारत की सभी भाषाओं में अनुवाद होना चाहिए। इस प्रयास की जितनी तारीफ की जाए,कम होगी।
साभार-जागरण

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