शनिवार, 25 अगस्त 2012

अतीत की पत्रकारिता से रूबरू होने का सुख


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(11:20:26 AM) 30, Nov, 2011, Wednesday

समाचार सुर्ख़ियो में
वेनेजुएला : शिक्षा में संगीत की भागीदारी
खामोश परिंदों का व्यापार
कहानी : उलझन
कहां ओझल हो गई विस्थापित महिलाएं
दिल्ली : हिन्दी फिल्मों के आइने से-37
कहानी : कितने इम्तिहान?
स्वतंत्रता से पूर्व की उर्दू कहानियों का परिदृश्य
स्वतंत्रता सेनानी और गांधीवादी बेटी
रवीन्द्रनाथ और भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की राष्ट्रीयता


 अंजू वर्मा
"हिंदी पत्रकारिता का प्रतिनिधि संकलन" ; संपादक : तरुशिखा सुरजन; प्रकाशक: राधाकृष्ण प्रकाशन; वर्ष: २०१०
पत्रकारिता की स्वाधीनता व संवाद की सीमाएं शायद इसके चौथे स्तंभ के रूप में मान्यताओं में अंतर्गुंफित है। पत्रकारिता की मिसाल आज भले ही नये संदर्भों में हो, लेकिन निवर्तमान पत्रकारिता का अपना महत्व है। आवश्यकता इस बात की है कि उस दौर की पत्रकारिता को बिना किसी पूर्वाग्रह के बाहर लाया जाए।
प्रस्तुत पुस्तक हिंदी पत्रकारिता का प्रतिनिधि संकलन का पत्रकारिता के इतिहास को जानने एवं समझने के लिए अत्यंत ही मूल्यवान है। इसमें हिंदी की आरंभिक पत्रकारिता एवं पत्रकारिता का जन्म क्यों हुआ,यह समझने में पुस्तक हमारी मदद करती है। आज हमारे समय एवं समाज को प्रभावित करने वाले कारकों में मीडिया यानी पत्रकारिता मात्र सूचनाओं एवं विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम मात्र नहीं है। यह अपने वृहत्तर उद्देश्यों में राष्ट्र की संस्कृति एवं समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान करती है। इस पुस्तक में आधुनिक पत्रकारिता के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर 21वीं सदी तक के महत्वपूर्ण पत्र लेखनों का संकलन किया गया है। यह संकलन क्रमवार है जिससे हमें पत्रकारिता के विकास को समझने में सहायता मिलती है। साथ ही साथ हम यह भी समझ सकते हैं कि पत्रकारिता का जन्म किन-किन उद्देश्यों को लेकर हुआ। स्वयं संपादक ने पुस्तक की भूमिका में लिखा है कि ''1826 में छपे पहले हिंदी पत्र उदंत मार्तण्ड से लेकर 90 के दशक तक की पत्र-पत्रिकाएं और उनसे जुड़े पत्रकार संपादक अपने हर लेख में आपको इस बात का अहसास कराएंगे।'' अत:21 वीं सदी की पत्रकारिता किन उद्देश्यों को लेकर चल रही है, आरंभिक पत्रकारिता से आज की पत्रकारिता में क्या साम्य या वैषम्य है, इस पुस्तक से इसे भी हम जान सकेंगे। पत्रकारिता के इतिहास का अवलोकन करें तो ज्ञान होता है कि भारतीय पत्रकारिता का इतिहास अब पूर्वाग्रहों में रहकर देखा-सुना जा रहा है अैर उसमें कुछ खास लोगों का महिमा-मंडन हो रहा है जबकि आजादी से पूर्व भारतीय पत्रकारिता  निष्ठा व ईमानदारी पर आधारित थी।
पुस्तक में संकलित निबंधों के विषय किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं। इसमें संकलित निबंध समाज के सभी वर्गों, समाजों से जुड़े हुए हैं। स्वतंत्रता आंदोलन, राजनीति, सामाजिक मुद्दे, नारी, युवा, आपातकाल, महात्मा गांधी, हिंदी भाषा व हिंदी साहित्य, खेल, विद्यार्थी व शिक्षा, श्रमिक व मजदूर, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मुद्दे आदि सब इस संकलन में शामिल हैं। इन निबंधों के आलोक में जब हम अपने समय की पत्रकारिता की तुलना करते हैं तो पाते हैं कि आज से पूर्व की पत्रकारिता उच्चतर उद्देश्यों से परिचालित है तथा वह उन समस्त शक्तियों का विरोध करती है जो मनुष्य के शोषण के निमित्त हो। इससे आम आदमी के हितों की रक्षा के लिए व्यापक जनजागृति फैलाने में पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान है। हिंदी पत्रकारिता का जन्म भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के समय ही हुआ। इसके पीछे यह उद्देश्य प्राथमिक था कि स्वतंत्रता आंदोलन की लड़ाई में व्यापक जनभागीदारी हो। इसके लिए अंग्रेजों के शोषण एवं अत्याचारों के विरुध्द जनमत एकत्र करने के लिए पत्रकारिता का सहारा लिया गया तथा पत्र-पत्रिकाओं में लेखन के माध्यम से व्यापक जन-समाज, राष्ट्र के आंदोलनकारियों ने अपने विचारों का प्रचार-प्रसार किया।
1873 में भारतेंदु हरिश्चंद्र हरिश्चंद्र मैग्जीन द्वारा अंग्रेजी सरकार पर प्रहार करते नजर आते हैं जिसका एक लंबा सिलसिला आगे आने वाले पत्र बनाते हैं। विशाल भारत में बनारसीदास चतुर्वेदी, नवयुग में सत्यदेव विद्यालंकार, सैनिक में कृष्णदत्त पालीवाल, प्रताप में गणेश शंकर विद्याथी, कलकत्ता समाचार में झाबरमल शर्मा, कर्मवीर में माखनलाल चतुर्वेदी, कमला में बाबूराव विष्णु पराड़कर, चांद, फांसी, अंक में आचार्य चतुरसेन शास्त्री, हंस में प्रेमचंद, प्रहरी में भवानी प्रसाद तिवारी जैसे कई नाम हैं जिन्होंने स्वाधीनता संग्राम को निश्चित रूप से प्रभावित किया है। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को जानने वाले सुधीजन इन पत्र-पत्रिकाओं के स्वतंत्रता प्राप्ति के लक्ष्य को प्राप्त करने में इनके योगदान से भलीभांति परिचित हैं।
संकलनकर्ता व संपादक ने पुस्तक में ऐसे लेखों का भी संकलन किया है, जो महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे अब तक हमारी दृष्टि में नहीं थे। स्वतंत्रता आंदोलन के समय लेखकों ने औपनिवेशिक शासन के शोषणकारी चरित्र का विरोध तो किया ही, साथ ही साथ उस समय के समाज में प्रचलित छुआछूत, तंत्र-मंत्र, जात-पांत, स्त्री शिक्षा तथा आपसी भेदभाव के खिलाफ भी लेखन किया, ताकि समाज में जागृति लाई जा सके। लेकिन इतिहास के विकास क्रम में इस तरह के लेखन तथा इनके उद्देश्यों को भुला दिया गया। आज हमारे समाज में स्त्री मुक्ति एवं स्त्रियों के अधिकारों की बात की जा रही है तथा यह आवश्यकता महसूस की जा रही है कि अगर हमें अपने राष्ट्र को विकसित राष्ट्रों की पंक्ति में खड़ा करना है तो स्त्रियों को भी शिक्षित एवं विकास की धारा में लाना आवश्यक है। भारतेंदु ने इस पर एक लेख 1 जनवरी 1874 में बाला बोधिनी में ''स्त्री तथा इंद्रजाल'' नाम से प्रकाशित किया है। इसमें स्त्रियों की मुक्ति एवं स्त्री शिक्षा पर बल तो दिया ही गया है साथ ही इसमें पढ़े-लिखे उन व्यक्तियों को भी खरी-खोटी सुनाई गई है जो स्त्रियों की मुक्ति के पक्षधर नहीं है। जो मूर्ख है वह तो किसी भांति स्त्रियों को पढ़ने-लिखने देते भी हैं, परंतु  जो पंडित लोग हैं वे तो स्त्रियों को न पढ़ाने में और भी हठ करते हैं और न जाने अपने वंश के लोगों को मूर्ख देखकर रात-दिन उनकी संगत में उनसे कैसे रहा जाता है क्योंकि विद्वानों को तो कभी मूर्ख का साथ अच्छा नहीं लगता। नीतियों में कहा भी गया है कि बंदरों और रीछों के साथ पर्वताें में फिरना अच्छा, पर मूर्खों के साथ स्वर्ग में इंद्र के भवन में भी रहना अच्छा नहीं, उस पर विशेष यह है कि अपने को बड़ा चतुर अैर रसिक मानते हैं पर घर में मूर्ख स्त्री देख कर लाज नहीं करते। लाज तो आज 21वीं सदी के लोगों के अंदर भी नहीं आई है। आज भी वे नारी को ताड़न के अधिकारी ही मानते हैं तथा नवीन ज्ञान-विज्ञान का प्रयोग कन्या भ्रूण को ही समाप्त करने में कर रहे हैं। अत: इस परिवेश में आधुनिक पत्रकारिता का यह दायित्व बनता है कि वह इस प्रकार की रूढ़ि समाप्त करने के लिए आगे आए। इस परिवेश में आधुनिक पत्रकारिता का यह उद्देश्य है कि वह इस प्रकार की प्रवृत्तियों के विरुध्द जनता को जागृत करे जैसे भारतेंदु सरीखे पत्रकारों ने अपने समय की कुप्रवृत्तियों का विरोध किया।
इस प्रकार के लेखों का संग्रह प्रस्तुत पुस्तक में किया गया है। इसमें उन लेखों के निबंधों का भी संकलन किया गया है जिनका लेखन बहुत ही महत्वपूर्ण है, लेकिन वे चर्चा में अधिक न होने के कारण आसानी से सुलभ नहीं थे। यहां विस्तृत रूप से उक्त लेखकों एवं उनकी कृतियों का विशद विवेचना संभव नहीं है। इनमें से महत्वपूर्ण लेखकसंपादक निम्न हैं: श्रीकांत ठाकुर विद्यालंकार, शरद जोशी, इंद्र विद्यावा-चस्पति, बांके बिहारी भटनागर, मायाराम सुरजन, कपूर चंद कुलीश, डोरीलाल अग्रवाल, अक्षय कुमार जैन, राजेंद्र माथुर, रामगोपाल माहेश्वरी, नारायण चतुर्वेदी, कृष्ण कुमार मिश्र, रामचरण जोशी, राहुल बारपुते, महावीर अधिकारी, पंडित रामाश्रय उपाध्याय, राजेंद्र माथुर, आरआर खाडिलकर, कमलापति त्रिपाठी, माता सेवक पाठक, जगेश्वर प्रसाद खलीश, सुरेंद्र बालपुरी आदि। इन्होंने समाज में प्रचलित सभी विषयों पर अपना लेखन किया है तथा सुसंस्कृत समाज के निर्माण के लिए महत्वपूर्ण प्रयत्न अपने लेखन के माध्यम से किया है। इन्होंने अपने समय एवं समाज के विसंगतियों, शोषण, हिंसा अत्याचार को भी जनता के सामने रखा है जिससे इन कुप्रवृत्तियों के विरूध्द जनमत बनाया जा सके तथा आमजन में जागृति उत्पन्न की जा सके।
इस तरह से हम पत्रकारिता के उस रूप से भी परिचित होते हैं जो हमारे सामने अनुपस्थित थी तथा लेखों के काल-क्रमानुसार प्रस्तुति के कारण हम सामाजिक विकास में आने वाले चुनौतियों के बारे में भी जानकारी प्राप्त कर लेते हैं।  इस पुस्तक के माध्यम से व्यापक सामाजिक दृष्टिकोण का भी हमें पता चलता है। साथ ही साथ पत्रकारिता के इतिहास की भी जानकारी हमें प्राप्त होती है। इतिहास मात्र अतीत का पुलिंदा नहीं है, और न ही वह अतीत को दुहराने की प्रक्रिया है। इतिहास हमें भविष्य में आने वाली चुनौतियों का सामना करने की दृष्टि प्रदान करता है। अत: पत्रकारिता का इतिहास भी हमें अपने समय की पकारिता को समझने की दृष्टि प्रदान करती है कि पत्रकारिता किस उद्देश्यों को साथ लेकर चलती है। उक्त पुस्तक में संकलित लेखों के अध्ययन से पता चलता है कि पत्रकारिता का सरोकार सदैव आम आदमी से रहा है। अगर आम आदमी का शोषण हो रहा है तो पत्रकार अपने लेख के द्वारा शोषणकारी शक्ति का प्रतिरोध करता है। साथ ही वह इसके विरूध्द जनजागृति का भी कार्य करता है।
आज हमारे समाज में तकनीकी प्रगति के कारण प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का तेजी से प्रचार-प्रसार हो रहा है। वैसे तो पत्रकारिता अपने जन्मकाल से ही समाज को व्यापक तौर पर प्रभावित करती रही है। यह संकलन आज के हमारे पत्रकारों का मार्गदर्शन करती है कि पत्रकारिता का उद्देश्य सतत गतिशील है। आज हम बिना किसी हिचक के साथ स्वीकार करते हैं कि मीडिया तंत्र में पूंजी का बोलबाला है तथा इस कारण से पूंजीपतियों का प्रभुत्व भी इस पर बढ़ रहा है। हम देखते हैं कि इस कारण से पत्रकारिता निष्पक्षता से अपने दायित्व का निर्वाह नहीं कर पा रही है। अत: जरूरत इस बात की है कि पत्रकारिता को पूंजीपतियों की जागीर न बनाएं और न ही व्यावसायिक उपकरण। पत्रकारिता में व्यावसायिकता वहीं तक स्वीकार्य है जिससे उसके विकास का कार्य चल सके। पत्रकारिता वृहत्तर मानवीय उद्देश्यों को आत्मसात करती है। यह आमजन को वाणी देती है। इस प्रकार से युगीन पत्रकारिता को दिशा प्रदान करने के लिए तथा अपने लक्ष्य से न भटकने देने के दिए समीक्ष्य पुस्तक का अवलोकन महत्वपूर्ण है।
पत्रकारिता के नैतिक मूल्य क्या हों और एक पत्रकार को बतौर संपादक, लेखक किन परिस्थितियों में सार्थक लड़ाई लड़ते हुए अपने समय के सच को व्यक्त करना चाहिए, यह इस पुस्तक में कम से कम जरूर देखने को मिलेगा। पत्रकारिता को बुनियादी समझ व भविष्य के लिए नव पथ-सृजन करती इस पुस्तक को मेरी दृष्टि से पाठकों को अवश्य पढ़ना चाहिए।
(समीक्षक मेरठ स्थित पत्रकार हैं)
(योजना, नवंबर 2011 से साभार)

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