रविवार, 19 फ़रवरी 2012

Newspapers: 400 Years Young!

The World Association of Newspapers has accepted evidence produced by one of the world’s leading printing museums that 2005 marks the 400th anniversary of the birth of the first newspaper in print. Scholars have generally put the date at 1609, the year of the first preserved editions.
The Gutenberg Museum in Mainz, Germany, which houses the world’s first printing press, has told WAN that the ’birth certificate’ of the newspaper, ’Relation’, was unearthed in the town archives of Strasbourg, now in France but at the time a part of the so-called ’Deutsches Reich’.
"The evidence is compelling and I think we can all say Happy - 400th - Birthday this year to the print newspaper!", said Timothy Balding, the WAN Director General. "Our Executive Committee has examined all the facts and has been persuaded that the story stands up".
Martin Welke, founder of the German Newspaper Museum, who is also the ’father’ of the discovery together with Professor Jean Pierre Kintz, a Strasbourg historian, told WAN that the publisher of ’Relation’ was a certain Johann Carolus, who earned his living at the turn of the 17th century by producing hand-written newsletters, sold to rich subscribers at very high prices, reproducing news sent to him by a network of paid correspondents.
"In 1604, he bought a complete printing shop from the widow of a famous printer," said Dr Welke. "In the summer of 1605 he switched to printing his ... newspapers, because it took him ’too much time copying by hand’". Carolus also calculated that he could earn a lot more money "by printing a higher circulation for a lower price".
In October that year, Carolus wrote a petition to the Strasbourg city council asking for "protection against reprints by other printers". And the rest is history...
"Copyright problems already!", said Mr Balding. "And strategic considerations about pricing policy and circulation!"
"Today, more than a billion people a day, across the planet, read a daily newspaper in print - a figure, not incidentally, that has risen nearly five per cent in the last five years", added Mr Balding. "So, we’re not only 400 years old - or rather young - but we are globally enjoying great health and can presumably look forward to the next century or so, at least, with optimism".
The Gutenberg Museum will celebrate the 400th anniversary with a big exhibition in July retracing the evolution of newspapers over their entire history. Dr Welke is the trustee of this jubilee event; Timothy Balding will make a speech at the inauguration.
The Paris-based WAN, the global organisation for the newspaper industry, represents 18,000 newspapers; its membership includes 72 national newspaper associations, individual newspaper executives in 102 countries, 10 news agencies and ten regional and world-wide press groups.
Inquiries to: Larry Kilman, Director of Communications, WAN, 7 rue Geoffroy St Hilaire, 75005 Paris France. Tel: +33 1 47 42 85 00. Fax: +33 1 47 42 49 48. Mobile: +33 6 10 28 97 36. E-mail: lkilman@wan.asso.fr.
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March 2012

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[संपादित करें]समाचारपत्रो का इतिहास

सबसे पहला ज्ञात समाचारपत्र 59 ई.पू. का 'द रोमन एक्टा डिउरनाहै। जूलिएस सीसर ने जनसाधरण को महत्वपूर्ण राजनैतिज्ञ और समाजिक घटनाओं से अवगत कराने के लिए उन्हे शहरो के प्रमुख स्थानो पर प्रेषित किया। 8वी शताब्दी मे चीन मे हस्तलिखित समाचारपत्रो का प्रचलन हुआ[1]
अखबार का इतिहास और योगदान: यूँ तो ब्रिटिश शासन के एक पूर्व अधिकारी के द्वारा अखबारों की शुरुआत मानी जाती हैलेकिन उसका स्वरूप अखबारों की तरह नहीं था। वह केवल एक पन्ने का सूचनात्मक पर्चा था। पूर्णरूपेण अखबार बंगाल से 'बंगाल-गजटके नाम से वायसराय हिक्की द्वारा निकाला गया था। आरंभ में अँग्रेजों ने अपने फायदे के लिए अखबारों का इस्तेमाल कियाचूँकि सारे अखबार अँग्रेजी में ही निकल रहे थेइसलिए बहुसंख्यक लोगों तक खबरें और सूचनाएँ पहुँच नहीं पाती थीं। जो खबरें बाहर निकलकर आती थीं। उन्हें काफी तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया जाता थाताकि अँग्रेजी सरकार के अत्याचारों की खबरें दबी रह जाएँ। अँग्रेज सिपाही किसी भी क्षेत्र में घुसकर मनमाना व्यवहार करते थे। लूटहत्याबलात्कार जैसी घटनाएँ आम होती थीं। वो जिस भी क्षेत्र से गुजरतेवहाँ अपना आतंक फैलाते रहते थे। उनके खिलाफ न तो मुकदमे होते और न ही उन्हें कोई दंड ही दिया जाता था। इन नारकीय परिस्थितियों को झेलते हुए भी लोग खामोश थे। इस दौरान भारत में द हिंदुस्तान टाइम्स’, ‘नेशनल हेराल्ड', 'पायनियर', 'मुंबई-मिररजैसे अखबार अँग्रेजी में निकलते थेजिसमें उन अत्याचारों का दूर-दूर तक उल्लेख नहीं रहता था। इन अँग्रेजी पत्रों के अतिरिक्त बंगलाउर्दू आदि में पत्रों का प्रकाशन तो होता रहालेकिन उसका दायरा सीमित था। उसे कोई बंगाली पढ़ने वाला या उर्दू जानने वाला ही समझ सकता था। ऐसे में पहली बार 30 मई1826 को हिन्दी का प्रथम पत्र उदंत मार्तंड’ का पहला अंक प्रकाशित हुआ।
यह पत्र साप्ताहिक था। उदंत-मार्तंडकी शुरुआत ने भाषायी स्तर पर लोगों को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। यह केवल एक पत्र नहीं थाबल्कि उन हजारों लोगों की जुबान थाजो अब तक खामोश और भयभीत थे। हिन्दी में पत्रों की शुरुआत से देश में एक क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ और आजादी की जंग को भी एक नई दिशा मिली। अब लोगों तक देश के कोने-कोन में घट रही घटनाओं की जानकारी पहुँचने लगी। लेकिन कुछ ही समय बाद इस पत्र के संपादक जुगल किशोर को सहायता के अभाव में 11 दिसंबर1827 को पत्र बंद करना पड़ा। 10 मई1829 को बंगाल से हिन्दी अखबार 'बंगदूतका प्रकाशन हुआ। यह पत्र भी लोगों की आवाज बना और उन्हें जोड़े रखने का माध्यम। इसके बाद जुलाई1854 में श्यामसुंदर सेन ने कलकत्ता से समाचार सुधा वर्षण’ का प्रकाशन किया। उस दौरान जिन भी अखबारों ने अँग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कोई भी खबर या आलेख छपाउसे उसकी कीमत चुकानी पड़ी। अखबारों को प्रतिबंधित कर दिया जाता था। उसकी प्रतियाँ जलवाई जाती थींउसके प्रकाशकोंसंपादकोंलेखकों को दंड दिया जाता था। उन पर भारी-भरकम जुर्माना लगाया जाता थाताकि वो दुबारा फिर उठने की हिम्मत न जुटा पाएँ।
आजादी की लहर जिस तरह पूरे देश में फैल रही थीअखबार भी अत्याचारों को सहकर और मुखर हो रहे थे। यही वजह थी कि बंगाल विभाजन के उपरांत हिन्दी पत्रों की आवाज और बुलंद हो गई। लोकमान्य तिलक ने 'केसरीका संपादन किया और लाला लाजपत राय ने पंजाब से 'वंदे मातरमपत्र निकाला। इन पत्रों ने युवाओं को आजादी की लड़ाई में अधिक-से-अधिक सहयोग देने का आह्वान किया। इन पत्रों ने आजादी पाने का एक जज्बा पैदा कर दिया। केसरी’ को नागपुर से माधवराव सप्रे ने निकालालेकिन तिलक के उत्तेजक लेखों के कारण इस पत्र पर पाबंदी लगा दी गई।
उत्तर भारत में आजादी की जंग में जान फूँकने के लिए गणेश शंकर विद्यार्थी ने 1913 में कानपुर से साप्ताहिक पत्र 'प्रतापका प्रकाशन आरंभ किया। इसमें देश के हर हिस्से में हो रहे अत्याचारों के बारे में जानकारियाँ प्रकाशित होती थीं। इससे लोगों में आक्रोश भड़कने लगा था और वे ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए और भी उत्साहित हो उठे थे। इसकी आक्रामकता को देखते हुए अँग्रेज प्रशासन ने इसके लेखकोंसंपादकों को तरह-तरह की प्रताड़नाएँ दींलेकिन यह पत्र अपने लक्ष्य पर डटा रहा।
इसी प्रकार बंगालबिहारमहाराष्ट्र के क्षेत्रों से पत्रों का प्रकाशन होता रहा। उन पत्रों ने लोगों में स्वतंत्रता को पाने की ललक और जागरूकता फैलाने का प्रयास किया। अगर यह कहा जाए कि स्वतंत्रता सेनानियों के लिए ये अखबार किसी हथियार से कमतर नहीं थेतो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

अखबार बने आजादी का हथियार प्रेस आज जितना स्वतंत्र और मुखर दिखता हैआजादी की जंग में यह उतनी ही बंदिशों और पाबंदियों से बँधा हुआ था। न तो उसमें मनोरंजन का पुट था और न ही ये किसी की कमाई का जरिया ही। ये अखबार और पत्र-पत्रिकाएँ आजादी के जाँबाजों का एक हथियार और माध्यम थेजो उन्हें लोगों और घटनाओं से जोड़े रखता था। आजादी की लड़ाई का कोई भी ऐसा योद्धा नहीं थाजिसने अखबारों के जरिए अपनी बात कहने का प्रयास न किया हो। गाँधीजी ने भी हरिजन’, ‘यंग-इंडिया’ के नाम से अखबारों का प्रकाशन किया था तो मौलाना अबुल कलाम आजाद ने 'अल-हिलालपत्र का प्रकाशन। ऐसे और कितने ही उदाहरण हैंजो यह साबित करते हैं कि पत्र-पत्रिकाओं की आजादी की लड़ाई में महती भूमिका थी।
यह वह दौर थाजब लोगों के पास संवाद का कोई साधन नहीं था। उस पर भी अँग्रेजों के अत्याचारों के शिकार असहाय लोग चुपचाप सारे अत्याचर सहते थे। न तो कोई उनकी सुनने वाला था और न उनके दु:खों को हरने वाला। वो कहते भी तो किससे और कैसेहर कोई तो उसी प्रताड़ना को झेल रहे थे। ऐसे में पत्र-पत्रिकाओं की शुरुआत ने लोगों को हिम्मत दीउन्हें ढाँढस बँधाया। यही कारण था कि क्रांतिकारियों के एक-एक लेख जनता में नई स्फूर्ति और देशभक्ति का संचार करते थे। भारतेंदु का नाटक भारत-दुर्दशा’ जब प्रकाशित हुआ था तो लोगों को यह अनुभव हुआ था कि भारत के लोग कैसे दौर से गुजर रहे हैं और अँग्रेजों की मंशा क्या है।

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अब अख्बार अपने उद्देश्य को भुलते जा रहे हैं अब इसमे वसुलि क कर्य भी किय ज रह है जिस्से आम जन्त त्रस्त हो गई है ।

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