सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

आज कोई गणेश शंकर विद्यार्थी क्यों नहीं?


जन सरोकारों से हिन्दी मीडिया दूर होती चली जा रही है। हां, मैंने ‘हिन्दी मीडिया‘ शब्द का इस्तेमाल किया है। इसके कुछ ठोस कारण हैं क्योंकि आज भी देशज जन या यों कहें कि (प्रेमचंद के शब्दों में) होरी और धनिया की पीढ़ी हिन्दी ही बोलती है, हिन्दी ही समझती है और अगर पढ़ती भी है तो हिन्दी ही पढ़ती है। मगर आज इस देशज जन को चौथे खम्भे के जारिये चाहे वह प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रानिक, जो परोसा जा रहा है अगर उस पर एक सरसरी निगाह भी डाली जाए तो मंजर बड़ा ही परेशानकुन नजर आता है, एक निराशावाद की बू आती है। कहने का मतलब है कि हिन्दी मीडिया का शब्द संसार, उसके मुद्दे, परिप्रेक्ष्य, रिपोर्टाज, आलेख, विश्लेषण सब कुछ जन सरोकारों से काफी दूर नजर आते हैं।
आज के चैथे खम्भे में परोसा जाने वाला तथाकथित सकारात्मक पत्रकारिता की रपटें, सफलता की कहानियां, केस स्टडी, सरकारों, बड़े घराना (कारपोरेट हाउस), आला अधिकारियों के लिए तो सुकूनप्रद हो सकता है मगर, आम जन के लिए इसमें उनके संकट, संघर्ष, अपेक्षाएं, अवसर के लिए बहुत कुछ नहीं होता है। उदाहरण के लिए पिछले दिनों बीपीएल एवं एपीएल निर्धारण हेतु 26 रुपये एवं 32 रुपये के मुद्दे को ही देखें। क्या आज का चैथा खम्भा अपने गिरेबान में झांककर बता सकता है कि इस मुद्दे पर वह किसका प्रवक्ता बना? शिक्षा अधिकार कानून 2009 के प्रावधानों से बचने के लिए निजी विद्यालयों के संगठनों-संचालकों का पटना में जुटान एवं उग्र तेवर संभवतः पेड न्यूज के सहारे चैथे खम्भे का लीड न्यूज तो बन जाता है। मगर पटना की झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों एवं उनके अभिभावकों का इस कानून के प्रावधानों के अंतर्गत निजी स्कूलों मे 25 प्रतिशत गरीब बच्चों के दाखिला के लिए भगत सिंह चैक पर सुबह से शाम तक का एकदिवसीय धरना पटना से प्रकाषित हिन्दी अखबारों के अंदर के पृष्ठों पर आठ-दस वाक्यों का ही खबर बनता है?
सत्ता नायकों की राजनैतिक यात्राओं पर तो क़लम धारदार दिखती हैं मगर इन्हीं यात्राओं पर विरोध के स्वर को इस चैथे खम्भे में कोई माकूल जगह नहीं मिल पाता। अब तो अखबारों के मुख्य पृष्ठ ही विज्ञापन के पृष्ठ बन रहे हैं। सवाल है चैथा खम्भा लोकतंत्र का प्रहरी कैसे? मज़्लूमों की जुबान कैसे? कहा जा सकता है कि आज की हिन्दी पत्रकारिता स्वयं के आचरण की पारदर्षिता एवं विचारों की उर्जा के संकट से घिर चुका है। काश! निकट भविष्य में कोई गणेश शंकर विद्यार्थी जन्म लेता?
गालिब एक्टिविस्ट हैं

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