मंगलवार, 22 जनवरी 2013

मीडिया एथिक्स vs अजीत अंजुम

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अजीत अंजुम, मैनेजिंग एडिटर, न्यूज़24
अजित अंजुम देश के जाने-माने पत्रकारों में एक हैं। अपनी स्पष्टता और खामियों को खुले तौर पर स्वीकार करते हैं। सनसनी, पोल खोल, रेड अलर्ट और रोज़ाना जैसे चर्चित कार्यक्रमों के लिए वे जाने जाते हैं। फ़िलहाल न्यूज़ 24 चैनल के मैनेजिंग एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। प्रस्तुत हैं आनंद दत्त से मीडिया के मुद्दों पर उनसे हुई बातचीत के मुख्य अंश. (यह बातचीत मूलतः मॉस कॉम बज के लिए ली गयी थी)
क्या मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है?
बिल्कुल चौथा स्तम्भ है। लेकिन जैसे बाँकी तीन स्तंभों में कुछ खामियां पैदा हुई हैं, वैसे ही यहाँ भी हुई हैं। समाज के हर तबके में पतन हुआ है। चौथे खम्भे को आप देखेंगे की यह ऐसे लोगों के कन्धों पर टिका हुआ है जो तमाम तरह की खामियों से दूर होंगे, तो मुझे लगता है की ऐसा सोचना गलत होगा।
तो क्या सोचना सही होगा?
कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है। हाँ, कई बार यह मुद्दों से भटकता हुआ दिखता है, लेकिन मीडिया बहुत कुछ ऐसे काम भी करता है जो वक्त की जरुरत है। सबसे ताजा मामला फेसबुक पर कमेन्ट को लेकर जिस तरह पालघर में दो लड़कियों की गिरफ़्तारी हुई और मीडिया ने उसके खिलाफ कैम्पेन चलाया, सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा।
बाकी तीन स्तंभों को उद्दयोग का दर्जा नहीं दिया गया है, जबकि मीडिया को ये मान्यता प्राप्त है|
वो इसलिए कि बाकी तीन सरकार के पैसे से चलते हैं, लेकिन मीडिया नहीं । उन तीनों स्तंभों के संचालन में सरकार का फंड है, लेकिन जवाबदेही नहीं है। मीडिया में अगर सरकार का पैसा है तो दूरदर्शन, लोकसभा और राज्यसभा टीवी आपके सामने है। लेकिन क्या वो आपके सारे पैमाने — काम करने का तरीका, पारदर्शिता, सरकार, सिस्टम, तमाम तरह की जो सामाजिक बुराईयाँ है उनपर चोट करना — पर यदि मीडिया की भूमिका देखते हैं तो क्या आपको लगता है की सरकार के ये चैनल वहाँ खरे उतरते हैं? एक न्यूज़ चैनल चलता है तो उसमे 500 से 600 करोड़ की पूंजी लगती है। 150 से 200 करोड़ साल भर का रनिंग कॉस्ट होता है। जब इतना पैसा आ रहा है तो पूंजी कॉरपोरेट से ही आएगा। तो उसके कुछ खतरे भी हैं। और अगर उन खतरों पर चलते हुए कुछ बेहतरी का रास्ता नहीं अख्तियार करेंगे तो फिर बंद कर देना चाहिए।
क्या यही एकमात्र रास्ता है?
क्योंकि कोई उपाय नहीं है। आप और हम चैनल शुरू नहीं कर सकते हैं। न ही ये सवाल उठाने वाले लोग 200 करोड़ का चैनल शुरू कर सकते हैं। ज़ाहिर है जहाँ पूंजी लगती है वहां कुछ खतरे भी होते हैं। लेकिन उन आशंकाओं के बावजूद यहाँ बहुत सवाल ऐसे भी उठते हैं जिससे जनता का भला भी होता है।
आज के माहौल में मीडिया एथिक्स की बात करना कहाँ तक उचित है?
एथिक्स की बात तो हमेशा होनी चाहिए। अगर हम सवाल खड़े नही करेंगे, ऐसे में यदि कोई गलती कर रहा है या गलती हो रही है, तो वह सही रास्ते पर नहीं आ सकता। लेकिन मुझे लगता है कि एथिक्स की परिभाषा के बारे में सोचे जाने की जरुरत है। जब कॉरपोरेट की पूंजी लग रही है तो अगर आप सौ फीसदी सुचिता की बात करेंगे तो मुझे नहीं लगता की वह लागू हो सकता है।
यानि कि इसका कोई उपाय नहीं है?
इसका कोई उपाय नहीं है। उसके लिए पूंजी, कॉरपोरेट और इतने बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर में जो पैसा लग रहा है वह जिम्मेवार है। आधे भरे ग्लास में यह आप पे निर्भर करता है कि आप उसे आधा भरा हुआ कहते है या आधा खाली।
कार्यपालिका, विधायिका और कभी कभी न्यायपालिका यदि गलती करती है तो मीडिया उसकी धज्जियाँ उड़ाने से बाज़ नहीं आता। मीडिया भी इसी रफ़्तार से गलतियाँ कर रहा है। कहाँ जाएँ लोग समाधान के लिए?
उसके लिए लीगल सिस्टम है, अदालत है, मानहानि का केस है। हर जगह मीडिया के खिलाफ केस चलते रहते हैं। ऐसा तो नहीं है की कोई किसी के खिलाफ कुछ भी छाप देगा, दिखा देगा, और उसके खिलाफ़ कार्रवाई नहीं होगी। कार्रवाई तो सिस्टम से ही होगी न।
बाल ठाकरे की मृत्यु मर मीडिया कवरेज की आलोचना करने वालों को आशुतोष ने कहा की वे टीवी के नेचर को नहीं समझ पा रहे हैं। आप कितना सहमत हैं?
बहुत हद तक। किसी चैनल, प्रोग्राम, टाइम स्लॉट का अध्ययन करने की परंपरा हमारे देश में नहीं है। ऐसे में मीडिया की जो आलोचना है वो बहुत ही साधारण किस्म की है। उस साधारण कमेन्ट में कई बार आपके पूर्वाग्रह भी होते हैं। और यह जरूरी नहीं कि आपका पूर्वाग्रह देश के तमाम दर्शकों का सच हो। अगर किसी आदमी की डेथ हुई है और उसमे बीस लाख लोग सड़क पर हैं, तो आप अपने नजरिये से बाल ठाकरे को ख़ारिज कर सकते हैं, लेकिन बीस लाख लोग सड़क पर हैं इस तथ्य को ख़ारिज नहीं कर सकते हैं। दूसरी बात, हमने कंट्रोवर्सिअल कवरेज भी किया। हमने तमाम तरह के सवाल उठाए कि शिवाजी पार्क में क्यों जगह दी गई दाह-संस्कार करने को? हमने उनके विवादित पहलु — हिटलर और इंदिरा की तारीफ़ पर सवाल उठाये। जिसने 40 साल अपने ढंग से राजनीति की उसपे तो बात होनी ही चाहिए।
अभी का जेनरेशन जो पत्रकार बन रही है और आप जिस समय बन रहे थे, उसमें फर्क कहाँ है?
अभी के जेनरेशन को एक्सपोजर ज्यादा मिल रहा है। फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग और ये गूगल ग्रैंडफादर तो हैं ही।
और क्वालिटी के तौर पर?
आज मीडिया करियर ऑप्शन है। बीस साल पहले नहीं था, ना मीडिया का विस्तार था। आज बहुत सारे मीडिया संस्थान हैं । पहले ये पता नहीं होता था कि हम किस रास्ते जाएंगे। लोग इसे रोजगार के लायक ही नहीं समझते थे। अब ऐसा नहीं है। नए लोगों में कुछ अच्छे हैं तो कुछ में जल्दबाजी है, जिसे मैं ठीक नहीं मानता हूँ।

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