बुधवार, 16 जनवरी 2013

फिरंगी माननसिकता में जी रही है यूपी.पुलिस



अंग्रेजी राज सी

अरविंद कुमार सिंह
आजादी के बाद भले ही भारत में चारों तरफ बेशुमार बदलाव आये हैं, शासन तथा प्रशासन के तौर तरीकों में भी भारी फेरबदल हुआ है,तथा आम आदमी की सोच और मानसिकता मे भी बहुत फर्क आया है,पर उत्तर प्रदेश की पुलिस आज भी पहले जैसी ही बनी हुई है। आजादी के पहले लोग पुलिस को विदेशी प्रशासन के एक अवयय के रूप मे देखा करते थे। आजादी के बाद इस मानसिकता और दृष्टिकोण में सकारात्मक बदलाव आना चाहिए था,पर ऐसा नहीं हुआ। यदि आजादी के ठीक बाद ठोस प्रयास किया गया होता तो पुलिस का मनोबल भी बढ़ता और जनता का नजरिया भी बदलता। पुलिस की मानसिकता को और उसके चरित्र का तत्काल आमूल-चूल परिवर्तन का प्रयास न करना एक ऐतिहासिक भूल थी। अगर सांकेतिक तौर पर पुलिस की वर्दी का रंग खाकी से बदल कर दूसरा कर दिया जाता तो इसी परिवर्तन से ही पुलिस के प्रति दृष्टिïकोण में भारी बदलाव नजर आते। खाकी वर्दी,जो कि आजादी की लड़ाई के दौरान शोषण एवं अत्याचार की प्रतीक थी,उसे कोई सामान्यजन आजादी के बाद कैसे भूल सकता था और पुलिस ने जिस खाकी वर्दी में निरंकुशता का नंगा नाच खेला,वह एकाएक परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्क्रताम का सूत्र मन से स्वीकार कर लेती? वर्तमान संदर्भ में अंग्रेजियत पर आधारित पूरे सिस्टम का परीक्षण जरूरी है।
विरोधी वातावरण में भी उत्तर प्रदेश पुलिस का ब्रिटिश परस्त चरित्र कायम रहा,वह जिस तरह से राष्टï्रवादी आंदोलन के नैतिक मूल्यों के उत्ताल तरंगों से अप्रभावित बनी रही,उन सबके पीछे पुलिस संवर्ग में काम करनेवाले कर्मचारियों और अधिकारियों को दिया गया प्रशिक्षण महत्वपूर्ण और निर्णायक कारण था और इस प्रशिक्षण में फेरबदल किया जाना लाजिमी है। उत्तर प्रदेश में ट्रेनिंग स्कूल से लेकर प्रशासन की बड़ी-बड़ी अकादमियों तक अंग्रेजो द्वारा डाली गयी परंपरा का ही निर्वाह हो रहा है। अंग्रेज नहीं चाहते थे कि जनसामान्य की सहानुभूति पुलिस को मिले,जिससे उनके शासन को संकट हो। पर आजादी के बाद नागरिक अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी की संवैधानिक प्रतिबद्दता से शोषक मानसिकतावाला पुलिस बल कैसे तालमेल बिठा सकता है?अंग्रेजो ने पुलिस बल की रूपरेखा सेना की तर्ज पर रखी और प्रशिक्षण में आउटडोर पाठ्यक्रम में मिलिट्री पैट्रन को ही अपनाया गया। मगर सेना को तो सीमापार दुश्मनो से लडऩा होता है। पर आजादी के बाद प्रदेश में मिलिट्री की मान्यताओं को बना कर रखना कहां तक प्रासंगिक है।
मिलिट्री की तर्ज पर जनसामान्य के साथ व्यवहार किया जाना उचित नहीं है। कुल मिला कर जनतांत्रिक माहौल में ऐसा प्रशिक्षण प्राप्त पुलिस तमाम विसंगतियों का शिकार हो गयी है। मिलिट्री प्रशिक्षण का दोष यह भी है और पुलिस जन उच्च अधिकारी की ओर ही निगाह लगाए रहते हैं। सुरक्षा व्यवस्था से लेकर गुप्तचरी जैसे कार्य और यातायात नियंत्रण का काम वे करते हैं। अंग्रेजो ने विवेकशून्य और पहलशक्ति से परे मात्र उच्चाधिकारियों के आदेश पर कार्रवाई करनेवाला बल इस नाते खड़ा किया था कि वे देश की जनता को अपना स्वाभाविक शत्रु मानते थे। प्रशिक्षण केंद्रों पर जिन कर्मचारियों और अधिकारियों की तैनाती होती है,उसे पुलिस में दंड माना जाता है। दंडित अधिकारी जिनको प्रशिक्षण देंगे उनकी हालत का सहज अंदाज लगाया जा सकता है।
प्रशिक्षण में नो आग्र्यूमेंट का सिद्धांत भी सेना के तर्ज पर ही बना है। आज भी ऐसा लग रहा है कि आजादी के इस दौर मे भी अंग्रेजी राज की पुलिस तैयार की जा रही है। ट्रेनिंग कालेज मे अनुशासन के नाम पर आपस में अनुशासनहीनता का जो सिलसिला शुरू होता है,वह दूर तक जाता है। अंग्रेजो ने यह स्थिति एक रणनीति के तहत बनायी थी क्योंकि संवादहीनता से उपजनेवाली कुंठा का प्रतिकूल असर होता। आज सिपाही सारे दायरे तोड़ता जनप्रतिनिधियों के पास जा रहा है,जहां उसकी बात सुनी जाती है। अगर अफसर उसकी बात सुनते तो यह हालत क्यों होती? इस तरह पुलिस बल की कमान धीरे-धीरे जनप्रतिनिधियों के हाथ खिसकती जा रही है। यदि पुलिस के वरिष्ठ अधिकार अपने कनिष्ठों के प्रति संवेदनशील होते तो यह नौबत क्यों आती। प्रशिक्षण में कई खामियां है तथा कई बेईमानी और गाली गलौज तो इस दौरान शरीफ से शरीफ आदमी सीख जाता है। उत्तर प्रदेश के पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों का बाहर निकलता हुआ पेट, बढ़ता हुआ वजन, रोगों का शिकार होना इस बात को दर्शाता है कि पूरे प्रशिक्षण के दौरान शारीरिक फिटनेस के सिद्दांत को सच्ची भावना से नहीं लिया गया था। यह प्रशिक्षण की सबसे बड़ी विफलता है। संस्कार विहीन तथा राष्ट्रीय चरित्र विहीन पुलिस अधिकारी और कर्मचारी कितना घातक हैं सहज अंदाज लगाया जा सकता है।
अंग्रेजों ने अपनी हुकूमत की जड़ों की मजबूती तथा भारतीयों की भावनाओं को कुचलने के लिए जिस पुलिस बल का गठन किया था,वह अत्याचार और आतंक का पर्याय थी। जानेमाने इतिहासकार वी.ए.स्मिथ ने माना था कि दारोगा अपराधियों के बजाय सज्जनो के लिए आतंक थे। आजादी के आंदोलन के दिनो में पुलिस स्वतंत्रता सेनानियों के साथ वही वर्ताव करती थी जो कि चोर डाकुओं के साथ किया जाता है। अंग्रेज ऐसी पुलिस चाहते थे जो कि सरकार के खिलाफ किसी भी अशांति,विरोध या बगावत को कुचल सके। राष्ट्रीय आंदोलन के उभार के बाद तो यह जरूरत और बढ़ गयी थी। जाहिर है कि भारत मे अंग्रेजी राज सेना,पुलिस और नागरिक सेवा इन तीनो पर ही टिका था। मगर पुलिस अंग्रेजी राज का एक अहम स्तंभ थी और उसके सृजनकर्ता लार्ड कार्नवालिस थे,जिसने जमींदारों को पुलिस संबंधी काम से मुक्त करके एक नियमित पुलिस दल की स्थापना की। हालांकि उन्होने भारत की पुरानी थाना व्यवस्था को आधुनिक बनाया तथा यहां अचानक ही ब्रिटेन से भी विकसित पुलिस बल खडा हो गया। कार्नवालिस ने ही थानो के प्रधान (दारोगा)बनाए तथा जिला पुलिस अधीक्षक का पद बनाया। दारोगा तो भारतीय होते थे पर बड़े पदों पर उनको जिम्मेदारियों से मुक्त ही रखा गया। और जैसी पुलिस अंग्रेज बनाना चाहते थे वैसी ही बन गयी।

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