बुधवार, 23 जनवरी 2013

न्यू मीडिया और सामाजिक सरोकार - / शिखा वार्ष्णेय






वास्तव में यह युग सूचना और संचार का युग है जिसमें समाचार पत्र, पत्रकारिता के आदर्शों से विमुख हो रहे हैं। आज के पत्रकारी युग का आदर्श खबरों को देना नहीं बल्कि ऐन-केन प्रकारेण खबरों को बेचना भर रह गया है। परन्तु आज इसके विपरीत तेजी से कदम बढ़ा रही है हिंदी वेब पत्रकारिता- एक ऐसा माध्यम जिसकी न कोई सीमाएँ है न कोई बंधन। निश्चित तौर पर इसके माध्यम से न हम खुद को अभिव्यक्त करते हैं बल्कि खुद को पूरी तरह से उड़ेल देते हैं, शायद इसलिए यह अभिव्यक्ति का सर्वाधिक सशक्त माध्यम बनता जा रहा है क्यों कि जो यहाँ संभव है वह अन्य पारंपरिक माध्यमों में संभव नहीं है।

न्यू मीडिया, सोशल नेट्वोर्किंग, ब्लॉग, - आज के इलेक्ट्रोनिक मीडिया के सन्दर्भ में एक ऐसा माध्यम जो एक विस्फोट की तरह सामने आया है और अपने साथ हर एक को बहा ले गया है। आज की नेट उपयोगिता आज से १० वर्ष पूर्व हो रही नेट की उपयोगिता से एकदम भिन्न है। यह प्रति व्यक्ति संवाद की एक ऐसी प्रजनन भूमि तैयार करता है जो इससे पहले कभी संभव नही थी। यह हर एक व्यक्ति के लिए है और हर एक के बारे में है। यह मानवीय सामाजिक विकास की वृद्धि में एक क्रांतिकारी कदम है। मानव इतना सामाजिक कभी न रहा होगा जितना कि अब हो गया है।

न्यू मीडिया ने युवाओं को जिस तरह अपनी गिरफ्त में लिया है वह मात्र निजी विचारों के आदान प्रदान तक सिमित नहीं है बल्कि वह किसी भी तरह के अभियान को सफल करने में या उसे पलट कर रख देने में भी सक्षम है। जो लोग चार दिवारी में बंद अपनी दुनिया को ही सारी दुनिया समझा करते थे आज इस माध्यम से अपनी भावनाएँ अभिव्यक्त करते हैं । कितनी ही प्रतिभाएँ इस माध्यम से उजागर हुई हैं जिन्हें इससे पहले कोई स्थान या मौका तक नहीं मिला करता था और इसी कारण बहुत सी सामाजिक बुराइयों पर से पर्दा उठता है, बहुत सी नई बातें प्रकाश में आती हैं और उन तक पहुँचती हैं जिनका इनसे सरोकार होता है।

व्यक्तिगत पत्रकारिता के रूप में उदित होने वाले इस माध्यम की मौलिकता का अंत नहीं है। कोई भी सूचना उसके सही रूप में और तेजी से सबके सामने आती है। इन वेबसाइटों ने पत्रकारिता को भी जैसे नई दिशा दे दी है। इनका प्रयोग करने वाला हर सदस्य पत्रकार बन गया है। हर एक ने अपना एक अलग चैनल, अपनी एक अलग शैली बना ली है और अपने ही अंदाज में अपने ही सरोकार और दिलचस्पी से वह सूचनाओं का आदान प्रदान करता है। परम्परिक पत्रकारिता से हट कर नागरिक पत्रकारिता का एक सीधा रूप सामने आया है जो न किसी खेमे का न किसी सरकार का और न ही किसी विशेष विचारधारा का पक्षधर है। इन साइटों का सबसे मजबूत पहलू यह है कि यह हमेशा सक्रिय रहते हैं और हर व्यक्ति तक सीधी पहुँच रखने में सक्षम होते हैं । लोग जो एक दूसरे को जानते नहीं, पहचानते नहीं इनके माध्यम से एक दूसरे से सीधा और तुरंत संपर्क कर सकते हैं और अपने विचारों का आदान प्रदान कर सकते हैं।

मुझे अक्सर पूर्णिमा वर्मन जी का कथन याद आता है कि "हम इसलिए प्रभावी हैं क्योंकि हम दिन रात काम करते हैं।" यह इस बात की याद दिलाता है कि जब हम एक समूह के रूप में दुनिया के कोने कोने से जुड़ते हैं और एक कोने में दिन होता है और दूसरे में रात तब दोनो कोनों का मिलकर काम करना इसे चौबीस घंटे की निरंतरता प्रदान करता है। इस प्रकार की योजना अगर सामाजिक कार्यों के लिये बन जाय तो सामाजिक सुधार और सरोकार में इनका बड़ा योगदान जुड़ जाता है - जैसा अन्ना के अभियान से जुड़ कर इन साइटें उसे अखिलभारतीय अभियान बना दिया था। एक ऐसा अभियान जिससे पहली बार इतनी बड़ी संख्या में युवाओं को जुड़ते देखा गया। एक ऐसा अभियान जिसने विश्वभर में अपनी आवाज पहुँचाई।

दूसरी और इस प्रकार की साइटें दुर्भावना से युक्त हों तो लन्दन में दंगों का कारण भी बनती हैं। ब्लेक बेरी, फेस बुक और ट्विटर में टैग और सीधे सन्देश के माध्यम से पल पल की खबर यहाँ से वहाँ पहुँचाने की सुविधा ने लन्दन को ३ दिन तक दंगों की भीषण आग में सुलगाये रखा एक ऐसा नजारा जो इससे पहले नजदीकी दिनों में कभी देखा नहीं गया और जिसका अंदाजा तक लन्दन पुलिस तक को नहीं था। हालाँकि यह भी सच है कि इस तरह के दंगे या अभियान उस समय भी हुआ करते थे जब कि इन साइट्स का अस्तित्व नहीं था। लन्दन में हुए दंगे बेशक बढ़ती बेरोजगारी की वहज से हुए हों तब भी उसमें इजाफा करने का और इन्हें फैलाने का कार्य इन साइटों के माध्यम से अवश्य किया गया।

तुनेशिया या मिस्र की क्रांति भले ही लम्बे समय से चली आ रही तानाशाही और भ्रष्ट व्यवस्था का परिणाम हों परन्तु उस आग को भड़काने में इन न्यू मीडिया का पूरा पूरा सहयोग अवश्य था। लन्दन पुलिस के सहायक आयुक्त लिन ओवेन्स के ग्रह मंत्रालय को दिए गए वक्तत्व के मुताबिक इन्हीं साइट्स के कारण पुलिस ने ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट और ओलम्पिक साइट्स पर दंगे होने से रोका और दंगों के बाद इन्हीं साइटों के सहयोग से समूह बनाकर लोगों ने शहर की सफाई में भी अनुकरणीय योगदान किया।

अभी लन्दन में कुछ उदाहरण देखने में आये कि किसी स्कूल का अध्यापक नकली परिचय बना कर इन्हीं सोशल साइट्स पर अश्लील और आपत्तिजनक तस्वीरें भेजा करता था इसी क्रम में एक तस्वीर भूलवश वह अपने एक छात्र को भी भेज बैठा और पकड़ा गया तथा स्कूल से उसे निष्कासित कर दिया गया और मासूम बच्चों का भविष्य बच गया। कुल मिलाकर यह कि किसी का भविष्य बनाना / बिगाड़ना हो या सरकार गिरानी हो अब सब कुछ वेब पत्रकारिता पर टिका है। पैसे देकर प्रसारित किये गए समाचार और विज्ञापन को ख़बरें बनाने वाले समाचारों से इतर - सबसे अहम बात यह है कि न्यू मीडिया की सूचनाएँ किसी दबाव में नहीं होतीं, दोस्ताना हो सकती हैं पर प्रायोजित नहीं होतीं और पाठकों पर थोपी तो कतई नहीं जा सकतीं। यहाँ का पाठक अपनी रुचि और समझ के अनुसार इनका चयन करता है और उसी के अनुसार प्रतिक्रिया करता है।

हाँ ये जरुर है कि हर इंसान की तरह, अभिव्यक्ति और उसको प्रदर्शित करने के तरीके भी अलग अलग होते हैं। इस सब में हमें ध्यान रखना होगा कि वेब पत्रकारिता निजी तौर पर किसी को आहत करने वाली नहीं होनी चाहिए। इससे इनकार भी नहीं किया जा सकता कि कुछ एक खबरिया साइटों पर अभिव्यक्ति के नाम पर न सिर्फ भड़ास निकाली जा रही है, बल्कि इसे दूसरो के मान-मर्दन के अस्त्र के रूप में भी इस्तेमाल किया जा रहा है अन्य माध्यमों की तरह इस माध्यम में भी कमियाँ हैं। हिंदी भाषा में भी कई पोर्टल्स मिल जाएँगे जो गंभीर मसलों पर सतही और सनसनीखेज प्रतिक्रियाओं से बाज नहीं आते, ऐसा करने के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि हिंदी भाषा में पोर्टल्स की संख्या दिनों दिन बहुत बढ़ती जा रही है, इस भीड़ में सबसे आगे निकल जाने का मीडिया का पुराना चरित्र भी जुड़ा है लेकिन इसको नियंत्रित करने के लिए कानून का इस्तेमाल करने के बजाय, आत्म संयम जरुरी है, परम्पराओं का निर्माण करना ज्यादा जरुरी है।

अंत में केवल इतना ही कि आज के आपाधापी युग में रफ़्तार का भी बहुत महत्व है, और वेब पत्रिकाएँ उस पैमाने पर खरी उतरती हैं। वो पाठकों तक हर जानकारी उस जगह और उस समय उपलब्ध कराती हैं जिस जगह और जिस समय वे चाहते हैं। वसुधैव कुटुम्बकम के नारे को वेब पत्रकारिता ने चरितार्थ कर दिया है। पूरे ब्रह्माण्ड को एक क्लिक की आवाज पर सामने ला खड़ा कर देने वाली ये वेब पत्रकारिता मानवीय सोच को भी एक क्लिक तक ही सीमित कर देने की भी क्षमता रखती हैं। जहाँ इनसे बाहर कोई जिन्दगी अब नजर नहीं आती। तकनीकी क्षेत्र में जब जब भी बदलाव आया है अपने साथ सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही पहलू लेकर आया है। वेब पत्रकारिता नाम के इस समुन्द्र मंथन से भी विष और अमृत दोनों ही निकले हैं। अब समस्या यह है कि इस युग में शिव कहाँ से आये जो सम्पूर्ण विष को अपने कंठ में उतार ले और समाज के लिए बचे सिर्फ अमृत और यह शिव हम सबको स्वयं बनना होगा।
२९ अक्तूबर २०१२

1 टिप्पणी:

  1. पूर्ण परिपक्व आलेख, आधुनिक वेब पत्रकारिता की बेहतर समीक्षा के लिये शिखा जी को और हम तक पहुँचाने के लिये बबल जी को धन्यवाद! हर उपलब्धि के दो पक्ष होना स्वाभाविक है। वेब पत्रकारिता में अभी बहुत से अच्छे और बुरे परिणाम आने शेष हैं। इस सुविधा के साथ, जबकि हर व्यक्ति स्वयं एक स्वतंत्र पत्रकार बन गया है ...उसका अपना एक पाठक वर्ग तैयार होता जा रहा है, हमारे उत्तरदायित्व भी बढ़ गये हैं। सुविधा जितनी अधिक और त्वरित ख़तरे भी उतने ही अधिक और त्वरित - यह बात ध्यान में रखते हुये फ़िल्ट्रेशन करने की आवश्यकता है। जागरूकों को एक मंच पर आने की आवश्यकता और अपेक्षा है। नकारात्मक या व्यक्ति विशेष को लक्ष्य कर की गयी अभिव्यक्तियों का दायरा अधिक नहीं होता तथापि उनकी उपेक्षा करना घातक हो सकता है। हर पाठक को सजग रहना होगा कि वह किसी बहकावे या उत्तेजनापूर्ण वक्तव्य/सूचना से स्वयं को बचा कर रखे। ऐसा हो सका तो विष कम और अमृत ही अधिक निकलेगा।

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