रविवार, 13 जनवरी 2013

महज 13 करोड़ में बस गई थी नई राजधानी


अजय पांडेय, नई दिल्ली कौन यकीन करेगा कि महज 13 करोड़ रुपये की लागत से अंग्रेजों ने लगभग पूरी नई दिल्ली बसा दी थी। आज इतनी रकम में इस इलाके में शायद एक दुकान भी नहीं मिल पाएगी। 100 साल में दिल्ली में किस कदर परिवर्तन हुए हैं, उसकी झलक खर्च के इस ब्योरे भर से मिल जाती है। मालविका सिंह ने एक पुस्तक लिखी न्यू दिल्ली : मेकिंग ऑफ ए कैपिटल। अपनी इस पुस्तक में उन्होंने सरकारी दस्तावेजों के हवाले से नई दिल्ली की विभिन्न इमारतों की लागत का जो विवरण दिया है, वह आज के परिप्रेक्ष्य में बड़ा रोचक है। गवर्मेट हाउस, जिसे आज हम राष्ट्रपति भवन कहते हैं, के निर्माण की स्वीकृत लागत 95 लाख रुपये थी लेकिन बनते बनते इसकी कुल लागत बढ़कर 1 करोड़, 27 लाख, 53 हजार रुपये हो गई थी। नार्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक की इमारतें, जिन्हें केंद्रीय सचिवालय कहा जाता है, कुल 1 करोड़, 53 लाख, 95 हजार रुपये में बनी थी। इसी प्रकार संसद भवन के निर्माण पर 83 लाख, 50 हजार रुपये की लागत आई थी। बाकी निर्माणों पर भी कुछ करोड़ रुपये ही खर्च हुए थे। कुल खर्च 13 करोड़, 6 लाख, 92 हजार, 150 रुपये का हुआ था। इस खर्च में बिजली, पानी, सीवर आदि ढांचे के विकास पर हुआ खर्च भी शामिल था। रीगल सिनेमा : वर्ष 1925 के आसपास बनी रीगल की इमारत में थिएटर होता था। मशहूर अभिनेता पृथ्वीराज कपूर यहां नौटंकी में अभिनय करते थे। शोमैन कहे जाने वाले उनके बेटे राजकपूर भी यहां आकर अपनी फिल्मों के प्रीमियर देखा करते थे। जब शुरू हुआ नई दिल्ली का निर्माण : नई राजधानी के निर्माण के लिए बनाई गई विशेष समिति में शामिल वास्तुविद् सर एडविन लुटियन और हरबर्ड बेकर को यह जगह बहुत पसंद आई। आज जिसे राष्ट्रपति भवन कहा जाता है, तब इसका नाम गवर्मेट हाउस दिया गया। यह इमारत वायसराय के लिए बनाई गई। यहां पर तीन मुख्य इमारतें बनीं-वाइसरीगल लॉज, इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल और सेंट्रल सेक्रेटेरिएट। आज इन्हें क्रमश: राष्ट्रपति भवन, संसद भवन और केंद्रीय सचिवालय (नार्थ ब्लॉक-साउथ ब्लॉक) के नाम से जाना जाता है। राष्ट्रपति भवन 333 एकड़ के घेरे में फैला है। इसमें 330 विशाल कक्ष बने हुए हैं। मुगल उद्यान है, अनेक फव्वारे हैं, जगह-जगह स्तंभ हैं। आपको यह जानकर हैरत होगी कि सर एडविन लुटियन और सर हर्बट बेकर के समन्वित प्रयास से बनाई गई इस अद्भुत इमारत में कहीं भी स्टील का इस्तेमाल नहीं किया गया। इसके निर्माण के लिए बर्मा और मध्य भारत से मजबूत लकडि़यां मंगवाई गई। इसके निर्माण में हिंदू, मस्लिम और पाश्चात्य सभी वास्तुकलाओं का ध्यान रखा गया।

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