मंगलवार, 22 जनवरी 2013

1990 के बाद ख़बरों का मिजाज बदला है



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मीडिया ख़बर के संपादक पुष्कर पुष्प की आईबीएन-7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष से टेलीविज़न न्यूज़ चैनलों के वर्तमान स्वरूप और उससे जुड़े तमाम मुद्दों पर खास बातचीत ......

Ashutosh , Managing Editor , IBN 7
आशुतोष,मैनेजिंग एडिटर,आईबीएन-7
हिंदी न्यूज़ चैनलों के बारे में यह कहा जा रहा है कि कंटेंट के नाम पर बहुत कुछ कूड़ा-कबाड़ा परोसा जा रहा है और कंटेंट का स्तर लगातार गिर रहा है। क्या आप कंटेंट के स्तर से संतुष्ट हैं ?
यह सही है कि हिंदी न्यूज़ चैनल्स पर बहुत कुछ ऐसा नहीं जाना चाहिए जो चला जाता है। लेकिन मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ कि हिंदी न्यूज़ चैनल्स एक तरह से रसातल में चला गया है। वहाँ पर कूड़ा-कबाड़ा दिखाया जा रहा है और कंटेंट पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। मैं तो ऐसे तमाम लोगों को बताना चाहता हूँ कि टीवी चैनल्स में जो लोग हैं वो अपनी-अपनी जिम्मेदारियों से वाकिफ हैं और अपना काम बखूबी कर रहे हैं। और ऐसा बहुत कुछ हो रहा है जो टेलीविज़न और समाचार के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। टेलीविज़न चैनल्स ने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचारियों के खिलाफ मुहिम चलायी। जिसके कारण बड़े-बड़े भ्रष्ट नेता, ब्यूरोक्रेट और पुलिसवाले रंगे हाथों घूस लेते पकड़े गए। ‘कोख के कातिल’ नाम से भ्रूण हत्या के खिलाफ भी टीवी चैनलों ने मुहिम चलाई जो अपने आप में बेमिसाल है।

 न्यूज़ चैनल में से न्यूज़ का कंटेट कम होता जा रहा है और इंटरटेनमेंट का हिस्सा बढ़ता जा रहा है। आप क्या इससे सहमत हैं?
 जो लोग ऐसी बातें करते हैं मैं सिर्फ उनपर हँस सकता हूँ और यह कह सकता हूँ कि उनको न तो ख़बर की समझ है और न तमीज। ऐसी बातें करने वाले बदलते ख़बरों का मिजाज, उसका तेवर नहीं समझ रहे हैं। उनकी नज़र में आज भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह या अटल बिहारी वाजपेयी का दिया बयान ख़बर है। अगर वो यह समझते हैं कि ख़बर है तो मुझे उनसे कोई तर्क नहीं करना है।
लेकिन कुछ हद तक यह आरोप सही भी है जो प्राईम चैनल हैं उनपर प्राईम टाईम में नेट जियो के फूटेज़ दिखाए जाते हैं। ब्रेकिंग न्यूज़ के नाम पर रजत शर्मा जैसे बड़े पत्रकार श्मशान लाईव पर ले जाते हैं और राखी-मीका का प्रकरण छाया रहता है।
नहीं, ऐसा नहीं है। इक्का-दुक्का ऐसा होता है पर पुरी तरह से ऐसा नहीं है। इसके आधार पर आप यह नहीं कह सकते है कि ख़बरें दिखायी ही नहीं जाती। रही बात राखी-मीका प्रकरण की तो क्या यह ख़बर नहीं है। एक लड़की के साथ जर्बदस्ती कोई पूरी मीडिया के सामने ‘किस’ करेगा तो वह ख़बर नहीं है क्या ? चर्चा का विषय नहीं है क्या ? मैं फिर कह रहा हूँ कि इस देश में कुछ ऐसे कुंठित लोग है जिनको राखी और मीका के मामले में भी समस्या है। ऐसे लोग कुछ चीजों को केवल सेक्स और भोग की ही दृष्टि से देखते हैं। यह हमारी दृष्टि में दोष है कि हमको राखी में केवल एक सेक्स आईटम गर्ल का रूप नज़र आता है और मीका के प्रकरण को टेलीविजन में हम बेचने की चीज़ समझते हैं।

स्टार न्यूज़ और आजतक जैसे बड़े न्यूज़ चैनलों पर पिछले दिनों प्राईम टाईम में नेट जियो के पुराने फूटेज़ दिखाए गए और फिर बार-बार उनको लगातार दुहराया गया।
मैं आपसे पूछता हूँ कि नेट जियो ख़बर नहीं है क्या ? ख़बरों का मिजाज बदल गया है और ख़बरों के मायने भी। ये चीजें टीवी के उन तमाम आलोचकों को समझनी पड़ेगी।

तब फिर दर्शक न्यूज़ चैनल क्यों देखे। वह नेट जियो ही क्यों न देखें।
पिछले कुछ समय मे खासकर 1990 के आर्थिक सुधारों के बाद ख़बरों का मिजाज तेजी से बदला है। लोग अब मनमोहन सिंह को नहीं देखना चाहते। यह बात वो पत्रकार नहीं समझते जो नैतिकता का लबादा ओढ़ कर जी रहे है और जिनको टेलीविज़न न्यू जर्नलिज्म ने रिजेक्ट कर दिया है। यही लोग टेलीविज़न चैनलों के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। पर वास्तविकता में इनको ख़बर की समझ नहीं है। उनको यह समझ में नहीं आता कि ख़बरों की दुनिया में बीपीओ, सॉफ्टवेयर एक नयी इंडस्ट्री है। बिज़नेस जर्नलिज्म बिल्कुल बदल गया है। अजीम प्रेमजी आज एक बहुत बड़ी ख़बर है। उनको समझ में नही आता कि मुकेश अंबानी जब कुछ कहते हैं तो उससे करोड़ो इंवेस्टर का फायदा-नुकसान होता है और उनके कुछ कहने का बहुत बड़ा मतलब होता है। अभी आपने भागलपुर वाली घटना देखी होगी जिसमें एक लड़के को पीटा जा रहा था। कल ये ख़बरे नहीं हुआ करती थी पर आज यह ख़बर है। आपके लिए यह ख़बर लोकल लग सकती है पर हमारे लिए यह राष्ट्रीय ख़बर है क्योंकि हमारा दर्शक वहाँ बैठा है। आईबीएन-7 की पहुँच कश्मीर से कन्याकुमारी तक है। इसलिए हमारे लिए लोकल और नेशनल दोनों तरह की ख़बरें दिखाना जरूरी है।

मेगसेसे सम्मान प्राप्त पत्रकार पी साईनाथ ने अपने एक बयान में कहा कि भारतीय मीडिया सिर्फ उपर के पाँच प्रतिशत हाई प्रोफाईल लोगों को ही कवरेज देती है ? क्या आप इससे सहमत हैं ?
पी. साईनाथ बहुत बड़े पत्रकार हैं पर उनकी यह बात प्रेस के संदर्भ में ठीक है। टाईम्स ऑफ़ इंडिया और अंग्रेजी के दूसरे अख़बारों के बारे में उन्होंने कहा होगा। आज की तारीख में टेलीविज़न पांच प्रतिशत के बारे में बात नहीं करता बल्कि वह 95 प्रतिशत के बारे में बात करती है। इसीलिए यह पांच प्रतिशत वाले लोग टेलीविज़न से नाराज रहते हैं। यदि कल अपने टीवी चैनल पर हम न्युक्लियर पॉलिसी पर तीन घंटे का प्रोग्राम कर दे और तमाम विद्वानों को बिठा दें तो लोगों को लगेगा कि यह बहुत बड़ा चैनल हो गया है। पर हकीकत यह है कि उसको दक्षिण दिल्ली के छोटे-मोटे अपने आप को प्रबुद्ध समझने वाले कुछ लोग देखेंगे। इंदौर के दर्शकों की भारत की न्युक्लियर पॉलिसी के बारे में जानने की उतनी अधिक अभिरूची नहीं होगी। हाँ यह जरूर हो सकता है कि वह इसपर छोटी जानकारी चाहता हो। उनके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण अपने मोहल्ले, शहर की ख़बर है।

पर यदि बीबीसी रेडियो के न्यूज़ बुलेटिन को देखें तो उसमें राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय और गंभीर मुद्दों वाले समाचार होते हैं फिर भी वह इतना लोकप्रिय है.
पिछले दिनों में बीबीसी को लोकप्रियता काफी घटी है। सर्वेक्षण से यह बात सामने आयी है। पहले मैं भी बीबीसी सुनता था अब नहीं सुनता हूँ। वैसे भी बीबीसी एक ब्रांड है। हमारे टेलीविज़न न्यूज़ चैनलों की उम्र सिर्फ 6-7 साल की है, फिर भी टीवी चैनलों ने काफी काम किया है और कुछ ऐसे ब्रांड भी बन गए हैं जो घर-घर में डालडा की तरह बिक रहे हैं।

अंग्रेजी और हिंदी न्यूज चैनलों के कंटेट और उसके प्रस्तुतीकरण के तरीके में बहुत बड़ा अंतर देखने को मिलता है? क्या यह जायज है कि सीएनएन . आईबीएन कुछ और दिखाए और आई बीएन-7 कुछ और ?
यही तो हमे समझना होगा कि सीएनएन-आईबीएन अंग्रेजी का न्यूज़ चैनल है और आईबीएन - 7 हिंदी का। हिंदी और अंग्रेजी बोलने वालों की सोच, समझ और उनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अलग-अलग होती है। यह दो बिल्कुल अलग-अलग दुनिया है। इसलिए यह जरूरी नहीं है कि आईबीएन-7 की जो हेडलाईन हो वह सीएनएन-आईबीएन की भी हो।

अभी बहुत सारे नए न्यूज़ चैनल आ रहे हैं या आनेवाले हैं। ऐसे में अगले पांच वर्षों में टीवी इंडस्ट्री और उसमें भी ख़ासकर हिंदी न्यूज़ इंडस्ट्री को आप कहाँ देखते हैं?
देखिए, दो चीजें बिल्कुल साफ होगी। पहले तो कुकुरमुत्ते की तरह से खुल रहे न्यूज़ चैनलों मे से कुछ बंद हो जाएंगे और वही चैनल बचे रहेगे जिनका अपना नेटवर्क होगा और जिनको यह पता होगा कि खबरों को किस दिशा में ले जाना है। दूसरी चीज यह होगी कि टीवी चैनल राष्ट्रीय से होकर बहुत लोकल हो जाएँगें।

आपने सुरेन्द्र प्रताप सिंह के साथ काम किया है। उनकी टेलीविज़न न्यूज़ चैनलों और उसकी ख़बरों को लेकर एक सोच थी। उस सोच के साथ आज का न्यूज़ चैनल कहीं मिलता है?
एसपी बदलाव के पक्षधर थे और बदलाव को जीवन का हिस्सा मानते थे। यदि आज वे होते तो टेलीविज़न आज जिस मुकाम पर खड़ा है उसे देखकर बहुत खुश होते । जब वे आजतक में आए तो उन्होंने ख़बरों का कलेवर ही बदल दिया और उसे बिल्कुल ही नए अंदाज में पेश किया। यह नएपन की तलाश ही उनकी छटपटाहट थी और असल में उनका विज़न भी यही था। जैसा कि आज का न्यूज़ चैनल कर रहा है।

कुछ समय पहले हंसने टेलीविज़न न्यूज़ चैनल पर आधरित अपना विशेषांक निकाला था और उसमें प्रकाशित कहानियाँ इसी इंडस्ट्री से जुड़े लोगों ने लिखी थीं। सारी कहानियों का सार देखें तो ऐसा लगता है कि न्यूज़ चैनलों की दुनिया बेहद खराब, गंदी और क्रूर है और यहाँ पर बहुत अध्कि शोषण होता है?
यह एक ऐसी इंडस्ट्री है जो खुद अपने अंदर झांकने का बूता रखती है और उसके अंदर क्या कमजोरियाँ है उसको वो बेबाकी से लिखती है। कितने अख़बार के दफ्रतरों में काम करने वाले पत्रकारों ने या अन्य तबके  के लोगों ने अपने अंदर झांक कर लिखी है ऐसी कहानियाँ। कम से कम टीवी के लोगों में इतना साहस तो है। इस साहस का तो सम्मान होना चाहिए। अन्य माध्यमों की तुलना में टीवी में सबसे ज्यादा खुलापन, सबसे ज्यादा लोकतंत्र और सबसे ज्यादा आजादी है।

आप आजतकछोड़कर आईबीएन-7 में एक नयी सोच के साथ आए थे। अब जबकि काफी समय बीत चुका है और जिस सफर पर आप आईबीएन के साथ निकले थे उसमें कितने कामयाब हुए।
मैं यह नहीं कह सकता कि मैं सौ प्रतिशत कामयाब हुआ। हाँ लेकिन इतना जरूर है कि एक नए तेवर का चैनल आज लोगों के बीच है। एक ऐसे तेवर का चैनल जो किसी से नहीं डरता और जो अपनी बात रखने के लिए दोबार नहीं सोचता है। यही कारण है कि आईबीएन 7 पर सबसे ज्यादा लीगल केस हैं।

पर आपको यह नही लगता कि आईबीएन 7 भी उसी रास्ते पर चल पड़ा है जिसपर बाकी के न्यूज़ चैनल चल रहे हैं। यानि टीआरपी के लिए अँधाधुंध दौड़..
नही , ऐसा नही है। यह किसी की व्यक्तिगत राय हो सकती है। इसमें मैं कुछ नहीं कर सकता।

तो क्या आप इस बात से इंकार करते हैं कि टीआरपी आपके लिए मायने नहीं रखता।
टीआरपी बिल्कुल मायने रखता है जो यह कहता है कि टीआरपी मायने नहीं रखता मैं उसकी सोच पर हँसता हूँ।

तो फिर आखिर यह टीआरपी चीज क्या है ?
यह तो मैं भी नहीं समझ पाया (हँसते हुए), मैं आपको क्या बताऊँ? कह सकते हैं कि टीआरपी आपकी लोकप्रियता का एक पैमाना है। आखिर इसमें बुराई क्या है ?

पर यह लोकप्रियता का पैमाना कैसे हो सकता है? जबकि इसके पैमाने का आधार ही बहुत छोटा है।
है यह एक पैमाना। फिलहाल इसका कोई विकल्प नहीं। कोई दूसरा आ जाएगा तो इसकी जगह ले लेगा। और फिर उसके हिसाब से चीजें तय होंगी।

तो आप टीआरपी के इस पैमाने से पूरी तरह सहमत नहीं है ?
मैं बिलकुल आपकी बात से सहमत हूँ। पर अभी के समय में टीआरपी एक पैमाना है और इसे झुठलाया नहीं जा सकता। आप उससे सहमत होइये या नहीं होइये। यह एक अलग बहस का मुद्दा हो सकता है।

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