मंगलवार, 8 जनवरी 2013

आज के नाराय राजनारायण

Monday, 7 January 2013

राजनारायण

अपने समर्थकों में नेताजी के नाम से मशहूर लोकबंधु राजनारायण देश के उन कुछ गिने चुने नेताओं में से थे, समय और समाज जिनका अपेक्षित मूल्यांकन नहीं कर सका. खासतौर से हमारे मीडिया ने उनकी सामाजिक, राजनीतिक पृष्ठभूमि, उनके संघर्ष और सरोकारों को समझे बिना उनकी छवि एक ऐसे मसखरे, ‘विदूषक’ की बना दी थी जो अपनी भदेस टिप्पणियों के लिए सुर्खियों में आते थे. हमने उनके कई ऐसे संवाददाता सम्मेलन देखे थे जिनमें वह कहना कुछ और चाहते थे लेकिन अखबार वाले (उस समय टीवी चैनलों का प्रचलन नहीं था) उनसे कुछ ऐसा चटखारा सुनना चाहते थे जो अलग ढंग की खबरें बना सके. अक्सर उनसे ऐसा कुछ बोलने के लिए कहा जाता था जो अगले दिन कम से कम स्थानीय संस्करणों के लिए पहले पन्ने की खबर बन सके. इसके बाद (इंट्रो और हेडलाइन) की डिमांड भी होती थी. कई बार नेताजी न चाहते हुए भी ऐसा कुछ बोल भी जाते थे. इसमें अतिशयोक्ति भी संभव है लेकिन हमारी समझ से मुख्यधारा की राजनीति में राजनारायण जी ने अंग्रेजी राज के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में और फिर आजाद भारत में कांग्रेसी राज के खिलाफ समाजवादी आंदोलन के अथक सेनानी के रूप में जितनी बार जेल यात्राएं की और जितना समय भारत की जेलों में बिताया, उतना शायद ही किसी और नेता ने किया होगा. तकरीबन 80 बार वह जेल गए और 17 साल उन्होंने विभिन्न जेलों में काटे. इनमें से तीन साल तो अंग्रेजी राज में और बाकी के 14 साल कांग्रेसी हुकमत के खिलाफ विभिन्न जन समस्याओं को लेकर संघर्ष करते हुए जेलों में बीते. राजनारायण जी एक बड़े जमींदार परिवार से थे. पढ़े लिखे, अपने जमाने के एम ए, एलएलबी थे. लेकिन उनका अधिकतर समय गांव, गरीब, कमजोर तबकों, की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बेहतरी के संघर्ष में ही बीता. स्वतंत्रता सेनानी एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रमुख समाजवादी नेता, विधायक रहे मेरे पिता जी स्व. विष्णुदेव उनके करीबी लोगों में से थे. वे हमें बताते थे कि नेताजी का संघर्ष अपने घर-परिवार से ही शुरू होता था. वह जब वाराणसी जिले में अपने गांव गंगापुर पहुंचते थे तो उनके परिवार के खेत-खलिहानों में काम करने वाले खेतिहर मजदूरों के साथ उनका रिश्ता बराबरी का होता था और अक्सर वह उन्हें ज्यादा मजदूरी के लिए अपने परिवार के विरुद्ध भी संघर्ष के लिए उकसाते. हमारा जिला आजमगढ़ ( अभी मऊ) एक जमाने में समाजवादी और साम्यवादी आंदोलन का गढ़ था. स्व. बाबू विश्राम राय जिले के तपे तपाए समाजवादी नेता थे. संघर्ष और जेल शायद समाजवादियों (तबके) को विरासत में मिला था. पिताजी भी अंग्रेजी दासता के विरुद्ध वर्षों जेल रहे. आजादी मिलने के बाद वह भी डा. राममनोहर लोहिया एवं अन्य समाजवादी नेताओं से प्रभावित होकर समाजवादी आंदोलन में शामिल हो गए और सरकार, पुलिस और अपराधी तत्वों के खिलाफ आजीवन संघर्ष करते रहे. अनगिनत बार जेल गए. कई बार उन पर प्राणघातक हमले भी हुए. ऐसे कई मौके आए जब डॉ लोहिया, मधुलिमए, राजनारायण जी हमारे मधुबन आए और सभाएं की. एक बार की सभा का मुझे याद है. सभा के बाद चाय का इंतजाम था लेकिन किसी ने वहां घर से दही भी लाकर रखी थी. लेकिन चम्मच नहीं था, नेताजी ने चाय की एक चुक्कड़ को तोड़ते हुए उससे चम्मच का काम लिया और दही बड़े चाव से खाई. खूब खायी. लेकिन सत्तर के शुरुआती दशक में मधुबन में राजनारायण जी एक सभा ऐसी भी हुई जिसमें उनका कोपभाजन हमारे पिताजी को बनना पड़ा था. संसोपा में राष्ट्रीय स्तर पर अंदरूनी मतभेद तो पहले से ही चल रहे थे लेकिन संभवत: 1972 में राज्यसभा के लिए उनकी उम्मीदवारी को लेकर संसोपा दो टुकड़ों में विभाजित हो गई थी. उत्तर प्रदेश और आजमगढ़ के भी तमाम बड़े समाजवादी नेता राजनारायण जी के साथ थे जबकि पिताजी मधु लिमए और जार्ज फर्नांडिस के साथ हो लिए थे. उन्होंने न सिर्फ पूर्वी उत्तर प्रदेश बल्कि समूचे उत्तर प्रदेश में सोशलिस्ट पार्टी को खड़ा करने में अपनी ऊर्जा खपाई थी. मैं उन दिनों समाजवादी युवजन सभा में सक्रिय हो रहा था. पार्टी की तरह ही युवजन सभा भी वाराणसी और हैदराबाद के बीच विभाजित हो गई थी. जाहिर सी बात है कि हम लोग मोहन सिंह और देवब्रत मजुमदार के साथ हैदराबाद वाली युवजन सभा के साथ जुड़ गए थे. राजनारायण जी को पिताजी का उनका साथ छोड़कर मधुलिमए और जार्ज फर्नांडिस के साथ जुड़ना बेहद नागवार लगा था. उसी समय वह मधुबन आए थे. उनके भाषण में पार्टी की टूट और उसके कारणों की चर्चा स्वाभाविक थी. एक पुराने समाजवादी कार्यकर्ता शहाबुद्दीन शाह ने नेताजी से पूछ लिया, ‘तो फिर विसुनदेव जी आपके साथ क्यों नहीं हैं.’ नेताजी का तपाकी कटाक्ष था, ‘विसुनदेव बिसुक गइलें.’ लेकिन रिश्तों की यह कड़वाहट तात्कालिक थी. आपातकाल के बाद जब सभी लोग जनता पार्टी के बैनर तले एकजुट हुए तो सारे गिले-शिकवे दूर हो गए. उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव के समय पिताजी यूपी जनता पार्टी के संसदीय बोर्ड के सदस्य थे लेकिन जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर जी ने पिता जी का ही टिकट काट कर एक कांग्रेसी निवर्तमान विधायक जगदीश मिश्र को हमारे नत्थूपुर से जनता पार्टी का उम्मीदवार बना दिया था. कार्यर्ताओं के स्तर पर इसका पुरजोर विरोध हुआ था और पिता जी बागी उम्मीदवार के बतौर चुनाव लड़ गए. मुझे याद है कि मधु लिमए इस बात के लिए मनाने आए थे कि पिताजी को चुनाव मैदान से हट जाना चाहिए. लेकिन राजनरायण जी ने हमें बुलाकर कहा था कि विष्णुदेव के साथ ज्यादती हुई है. मैदान में डटे रहना चाहिए और डंके की चोट पर उन्हें खुद को राजनारायण और चौधरी चरण सिंह का उम्मीदवार घोषित कर प्रचार करना चाहिए. उन्होंने हमें कुछ पैसे भी दिए थे. दूसरी तरफ, हमारे पड़ोसी चंद्रशेखर जी ने जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का फर्ज निभाते हुए पिताजी को हरवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. उन्होंने गांवों में साइकिल से चुनाव प्रचार किया था. पिताजी बहुत कम मतों से चुनाव हार गए थे. पार्टी से बाहर हो जाने के बावजूद राजनारायण की पूरी कोशिश उन्हें अपने साथ जोड़े रखने की थी. जनता पार्टी की टूट के बाद पिताजी चरण सिंह, राजनारायण और मधु लिमए के साथ जनता पार्टी (सेक्युलर) के साथ ही रहे. जिस तरह डा. लोहिया हमेशा शिखर (तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु) से ही टकराने के आदी थे, राजनारायण जी भी 1971 के लोकसभा चुनाव में जीत हार की परवाह किए बगैर रायबरेली में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से ही टकरा गए थे. चुनाव में वह उनसे हार जरूर गए लेकिन अदालती लड़ाई में उन्होंने श्रीमती गांधी को परास्त कर दिया था. आपातकाल उसके बाद ही लगा था. लेकिन एक दिन वह भी आया जब नेताजी ने उसी रायबरेली में इंदिरा गांधी को पटखनी देकर भारतीय संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया था. 1977 में केंद्र में पहली गैर कांग्रेसी जनता पार्टी की सरकार बनवाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही. राजनारायण जी जनता सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बने. मुझे याद है, मैं उस समय सक्रिय राजनीति से अलग होने और पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय होने की दिशा में बढ़ रहा था.इलाहाबाद से प्रकाशित हिंदी दैनिक अमृत प्रभात के लिए फ्रीलांस जर्नलिस्ट के बतौर उन दिनों मैं सम सामयिक विषयों पर लिखने लगा था. स्वास्थ्य मंत्री के रूप में राजनारायण जी ने ‘बेयर फुट’ डाक्टर की योजना चलाई थी ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य और चिकित्सा की प्राथमिक सुविधाएं आसानी से सुलभ हो सकें. रामनरेश यादव जी के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बन जाने और लोकसभा से त्यागपत्र दे देने के कारण आजमगढ़ में लोकसभा का उपचुनाव हो रहा था. राम बचन यादव जनता पार्टी के उम्मीदवार थे. कांग्रेस ने मोहसिना किदवई को उम्मीदवार बनाया था. उस उपचुनाव में सारे बड़े नेता मौजूद थे. राजनारायण जी भी आए थे. उनके करीबी समाजवादी नेता त्रिलोकीनाथ अग्रवाल के निवास पर नेताजी से मुलाकात हुई. हमने सहमते हुए उनसे इंटरव्यू की दरख्वास्त की. उन्होंने डांटते हुए कहा, ‘‘तुम हमारे घर-परिवार के हो, बेटे जैसे हो. दे देंगे इंटरव्यू. कब करना है.’’ मैंने कहा, ‘नेताजी, जितना जल्दी हो सके’. उन्होंने फौरन पास बैठे लोगों को शांत कर किनारे किया और इंटरव्यू शुरू हो गया. काफी अच्छा बन गया था वह साक्षात्कार जिसे अमृत प्रभात ने अच्छे से प्रकाशित भी किया था. आपातकाल में जबरन नसबंदी के किस्सों के कारण बढ़ती आबादी पर अंकुश लगाने के लिए परिवार नियोजन का कार्यक्रम भी काफी बदनाम हुआ था. राजनारायण जी के स्वास्थ्य मंत्री रहते परिवार नियोजन कार्यक्रम के प्रचार प्रसार के लिए नारे की जरूरत थी. राजनारायण जी रामचरित मानस से बेहद प्रभावित थे. उन्हें लगता था कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम और सीता आम भारतीयों के लिए आदर्श हैं और उनको सामने रखकर कही गई बात भारतीय जनमानस को परिवार नियोजन के लिए प्रेरित कर सकेगी. नतीजतन देश भर और खासतौर से उत्तर भारत की दीवारों पर स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से एक चौपाई लिखी दिखी, ‘‘दुइ सुत सुंदर सीता जाए, लव कुश वेद-पुरानन गाए.’’ और फिर इसी तरह से बताया गया था कि राम के बाकी भाइयों की भी दो-दो ही संतानें थीं. काफी चर्चित रहा था यह विज्ञापन. जनता पार्टी की सरकार में पहले वह तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और फिर चौधरी चरण सिंह के करीबी, ‘हनुमान’ के रूप में मशहूर हुए. यह बात और है कि उनके ‘रामों’ ने उनका इस्तेमाल तो भरपूर किया लेकिन किसी ने उन्हें उनका वाजिब हक नहीं दिया. हालत यह हो गई कि ‘हनुमान’ को अपने ‘रामों’ के विरुद्ध भी मोर्चा खोलना पड़ गया. चरण सिंह के विरुद्ध तो वह उनके ही क्षेत्र में जाकर चुनाव भी लड़ गए थे लेकिन तब तक वह काफी कमजोर हो गए थे, शारीरिक रूप से और राजनीतिक रूप से भी. जनता पार्टी की टूट की पृष्ठभूमि के बारे में ठीक से समझे बगैर राजनारायण एवं मधु लिमए सदृश समाजवादी नेताओं को इसके लिए जिम्मेदार बताकर खलनायक के रूप में पेश किया जाता रहा है. सबको लगता था कि इन सिर फिरे समाजवादी नेताओं की जिद और चौधरी चरण सिंह की प्रधानमंत्री बनने की लिप्सा के कारण ही केंद्र में पहली गैर कांग्रेसी सरकार की अकाल मौत हो गई. लेकिन फिर उसके बाद भी जनता पार्टी क्यों टूट गई. सच तो यह है कि पार्टी और सरकार पर पर्दे के पीछे से सक्रिय राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का वर्चस्व बढ़ रहा था, जनतापार्टी में संघ की पृष्ठभूमि के नेता दोहरी सदस्यता बनाए रखने के पक्षधर थे. इस बात को राजनारायण और मधु लिमए ने समय रहते उठाया. जनता पार्टी में संघ से गहरे जुड़े नेताओं से संघ और जनता पार्टी में से एक को चुनने को कहा गया लेकिन उन्हें यह मंजूर नहीं था. नतीजतन जनता पार्टी टूट गई. यही सवाल 1980 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी की बुरी तरह से हुई पराजय के बाद भी उठा, तब संघ की पृष्ठभूमि वाले नेता और कार्यकर्ता निर्णायक रूप से जनता पार्टी से अलग हो गए और उन्होंने अपनी भारतीय जनता पार्टी बना ली. राजनारायण जी संसद और विधानसभा में भी वह जन समस्याओं और आम जन के दुख दर्द के सजग प्रहरी के रूप में ही नजर आते थे. एक बार जब वह उत्तर प्रदेश में विधायक थे, किसी महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा चल रही थी. राजनारायण जी को लगा कि उन्हें भी उस विषय पर बोलना चाहिए. वह उठ खड़े हुए लेकिन अध्यक्ष ने यह कहते हुए मना कर दिया कि उन्होंने पहले से नोटिस नहीं दी है इसलिए उनके लिए समय निर्धारित नहीं है. लेकिन राजनारायण जी इस जिद पर अड़े रहे कि अत्यंत महत्व के उस विषय पर उनका बोलना जरूरी है. इस बात को लेकर दोनों के बीच तकरार में सात-आठ मिनट निकल गए. राजनारायण जी ने अध्यक्ष से कहा कि हां, ना में दस मिनट निकल गए. इसमें से ही पांच मिनट उन्हें मिल गए होते तो वह अपनी बात पूरी कर लेते. निरुत्तर अध्यक्ष महोदय ने उन्हे पांच मिनट में अपनी बात पूरी करने का समय दिया. राजनारायण जी ने बोलना शुरू किया तो फिर समय की सीमा नहीं रह गई. अंत में हालत यहां तक आ गई कि उन्हें मार्शल के जरिए सदन से बाहर निकालना पड़ा. उस समय उन्हें सदन से बाहर निकालते समय ली गई तस्वीर एक हिंदी पत्रिका में छपी थी. शीर्षक था,‘गरीबों को मिले रोटी तो मेरी जान सस्ती है.’ नेताजी ने बहुतों को बहुत कुछ बनाया लेकिन अपने परिवार के लिए जीतेजी शायद कुछ भी नहीं किया.आज के 'समाजवादी' जहां अपने परिवार-खानदान में सबको सब कुछ बनाने में लगे हैं, नेताजी के परिवार के सदस्यों के बारे में उनके बहुत करीब रहे लोगों के अलावा किसी को शायद यह भी पता नहीं होगा कि उनके परिवार में आज कौन- कौन हैं और किस हाल में हैं. क्या राजनारायण जी की तुलना आज के कुनबा परस्त नेताओं से की जा सकती है.

1 टिप्पणी:

  1. अब पहले जैसे जमीनी नेता व जनहित के लिए समर्पित पत्रकार रह ही कितने गये।

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